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प्रबंधन रुपये न बटोरे तो पत्रकारों को पैकेज कैसे दे?

हर अच्छे-बुरे आचरण के पीछे अपने-अपने तर्क-कुतर्क होते हैं। पैसे लेकर अखबारों में खबर छापने के मुद्दे पर एक सज्जन ने एक टिप्पणी भड़ास4मीडिया के पास मेल के जरिए भेजा है, जिसमें उन्होंने पैसे लिए जाने की पैरोकारी की है। इन सज्जन ने अपना नाम जो दिया है, वो संभवतः असली नहीं है लेकिन उन्होंने जो लिखा है, वो अखबार प्रबंधन के कृत्य-कुकृत्य को जायज ठहराने का प्रयास है। इन सज्जन की टिप्पणी को यहां इसलिए प्रकाशित किया जा रहा है ताकि दूसरा पक्ष भी सामने आ सके। भड़ास4मीडिया एक खुला मंच है जिसमें प्रबंधन और कर्मी, दोनों का पक्ष पूरे सम्मान के साथ प्रकाशित किया जाता है। -संपादक, भड़ास4मीडिया

हर अच्छे-बुरे आचरण के पीछे अपने-अपने तर्क-कुतर्क होते हैं। पैसे लेकर अखबारों में खबर छापने के मुद्दे पर एक सज्जन ने एक टिप्पणी भड़ास4मीडिया के पास मेल के जरिए भेजा है, जिसमें उन्होंने पैसे लिए जाने की पैरोकारी की है। इन सज्जन ने अपना नाम जो दिया है, वो संभवतः असली नहीं है लेकिन उन्होंने जो लिखा है, वो अखबार प्रबंधन के कृत्य-कुकृत्य को जायज ठहराने का प्रयास है। इन सज्जन की टिप्पणी को यहां इसलिए प्रकाशित किया जा रहा है ताकि दूसरा पक्ष भी सामने आ सके। भड़ास4मीडिया एक खुला मंच है जिसमें प्रबंधन और कर्मी, दोनों का पक्ष पूरे सम्मान के साथ प्रकाशित किया जाता है। -संपादक, भड़ास4मीडिया

प्रबंधन रुपये न बटोरे तो पत्रकारों को पैकेज कैसे दे?

पिछले कुछ दिनों से विभिन्न पोर्टलों पर लोकसभा चुनाव में अखबारों और चैनलों द्वारा रुपये लेकर खबरें छापने और दिखाने पर जोरदार टिप्पणियां की जा रहीं हैं। मेरा यह कहना है कि पिछले कुछ सालों में जिस तरह महंगाई बढी है, अखबारों के खर्चों में वृद्धि हुई है और आय के साधन पहले से कम हुए हैं, प्रतिस्पर्धा के चक्कर में अखबार कुकरमुत्ते की तरह उग आए है, ऐसे में प्रबंधन ने यह कदम उठाकर कोई गलत नहीं किया है। जो पत्रकार इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं, उन्होंने यह नहीं सोचा कि हम पत्रकार वक्त बे-वक्त जो ज्यादा सेलरी, बढिया पैकेज की मांग करते हैं, वह सब हमें कहां से मिलेगा? प्रबंधन के पास इसके अलावा कोई और रास्ता बचा है? आज 1-2 हजार रुपए के लिए हम तुरंत नौकरी बदल देते हैं। बड़े कहे जाने वाले पत्रकार पैकेज की मांग करते हैं। कहीं न कहीं हमारे इन पैकेजों की पूर्ति के लिए ही तो यह सब हो रहा है।

जो वरिष्ठ पत्रकार (प्रभाष जोशी जी जैसे लोग) इसका विरोध कर रहे हैं, ऐसे ईमानदार और निष्ठावान पत्रकारों की संख्या देश में नगण्य है. बाकी सारे पत्रकार कहीं न कहीं भ्रष्टाचार में, लेन-देन में अपने हाथ काले कर चुके है. जो नेता अखबार प्रबंधन पर अनैतिक होने का आरोप लगा रहे हैं, वे स्वयं भ्रष्टाचार के सागर में पूरा जीवन गोते लगाते रहे हैं। हम पत्रकार भी कम नहीं है। मुझे लगता है कि हमें प्रबंधन पर टिप्पणी करने से पहले यह सोचना चाहिए कि प्रबंधन के इस आचरण में हमारा कितना योगदान है?

– गणेश बाबा उर्फ बाबा दीपक ([email protected])


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