हिंदुस्तान में नई भर्तियां जारी, प्रमोशन पर भी राजनीति शुरू : दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली में सब ठीक नहीं चल रहा है। कई तरह की हलचल है। इस महीने की सेलरी एकाउंट में पहुंचते ही हिंदुस्तानियों के विकेट फिर गिरने शुरू हो गए हैं। हरिश्चंद्र व दुष्यंत ने इस्तीफा दे दिया, सूत्रों की मानें तो अभी कई और लोग अगले दो दिनों में इस्तीफा देंगे। इनमें से कुछ नई दुनिया जाएंगे तो कुछ टीवी की ओर रुख करेंगे। 2 अगस्त को प्रमुख संपादक मृणाल पांडे कुछ हफ्तों के लिए विदेश यात्रा पर जा रहीं हैं। उनके जाने से पहले ये इस्तीफा हो सकते हैं। उधर, पिछले दिनों मृणाल पांडे ने हिंदुस्तान के नेशनल ब्यूरो की मीटिंग ली और इसमें संपादकीय कर्मियों को कामकाज के बेहतर मौके प्रदान किए जाने के बारे में आश्वस्त किया।
संपादकीय कर्मियों के कांट्रैक्ट सितंबर माह में खत्म होने के चलते उनमें उपजी चिंता को भी उन्होंने दूर किया। उन्होंने घोषणा की कि जिन लोगों के कांट्रैक्ट सितंबर माह में खत्म हो रहे हैं, उनमें से एकाध को छोड़कर बाकी सभी का कांट्रैक्ट री-न्यू कर दिया जाएगा। इसके चलते किसी को परेशान होने की जरूरत नहीं है। उधर, हिंदुस्तान से लोगों के लगातार जाने के बीच इस संस्थान में नई भर्तियां भी जारी है। ताजी भर्ती ऋषिकेश में पैदा हुए और वहीं पढ़ाई-लिखाई करने वाले गुरुचरण सिंह की हुई है। स्वतंत्र पत्रकार के साथ एक्टीविस्ट के रूप में सक्रिय रहे गुरुचरण अब नई पारी दैनिक हिंदुस्तान के नेशनल ब्यूरो में बतौर विशेष संवाददाता शुरू करेंगे।
हिंदुस्तान में कुछ लोगों के प्रमोशन भी हुए हैं। इनमें प्रमुख नाम संजय अभिज्ञान का है। इनपुट हेड के बतौर कार्य करने वाले संजय अब तक एसोसिएट एडीटर थे जिन्हें प्रमोट करके अब डिप्टी रेजीडेंट एडीटर बना दिया गया है। वहीं उनके समकक्ष कार्य कर रहे दिवाकर जो आउटपुट हेड हैं और वे भी एसोसिएट एडीटर हैं, का प्रमोशन नहीं किया गया है। इसके चलते उनके बारे में तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं। संजय अभिज्ञान के प्रमोशन को लेकर हिंदुस्तान के अंदर एक खेमे में नाराजगी है। इनका कहना है कि कम कार्य अनुभव वाले एक व्यक्ति को दूसरे संस्थान से लाकर इस संस्थान में जिस तेजी से प्रमोट किया जा रहा है और उसे सभी से ज्यादा तवज्जो दी जा रही है, वो अन्य लोगों में विक्षुब्धता का सबसे बड़ा कारण है। इनका कहना है कि किसी खास व्यक्ति को लगातार प्रमोट करना और बाकी को उपेक्षित रखना बेहतर कार्य संस्कृति पैदा करने की राह में रोड़ा है। यही वजह है कि पुराने लोग एक एक कर यहां से जा रहें हैं।
वहीं तटस्थ लोगों का मानना है कि प्रमोशन जैसे मामले व्यक्ति की कार्यक्षमता और उसके विजन को देखकर तय किया जाता है, न कि उम्र, अनुभव या करियर। ऐसे में संभव है कि समान पद पर कार्य कर रहे दो व्यक्तियों में से एक को बेहतर कार्य के चलते प्रमोट किया जाए और दूसरे को न किया जाए। इसको लेकर किसी तरह का असंतोष पैदा होना तार्किक नहीं है। खासकर मार्केट इकानामी के इस दौर में जब कार्य क्षमता व प्रोडक्शन ही बेहतर होने का पैमाना हो, वहां अन्य बातों को कोई मतलब नहीं है। उधर, कुछ लोगों का कहना है कि पुराने लोग इसलिए यहां से जा रहे हैं क्योंकि उन्हें बेहतर पद व पैकेज नई जगह पर मिल रहा है। इससे पहले यही लोग हिंदुस्तान में तमाम असंतोष के बावजूद बने हुए थे क्योंकि उस वक्त उनके सामने कोई विकल्प नहीं था। इसलिए किसी व्यक्ति को असंतोष का केंद्र मानना अतार्किक व पूर्वाग्रह प्रेरित ही हो सकता है। खैर, चाहे जो भी पक्ष सही हो, लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि हिंदुस्तान, नई दिल्ली में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।











