ज्यादातर बड़ी पत्रिकाओं की पाठक संख्या में लगातार गिरावट जारी : अगर ट्रेंड यही है तो पत्रिकाओं का भविष्य उज्जवल नहीं कहा जा सकता। सभी बड़ी पत्रिकाओं की पाठक संख्या में लगातार कमी आ रही है। सिर्फ वनिथा और प्रतियोगिता दर्पण ऐसी पत्रिकाएं हैं जिनके पाठक न बढ़े हैं और न घटे हैं। पाठक संख्या के मामले में इन दो पत्रिकाओं की यथास्थिति कायम है। आईआरएस 2009 राउंड टू के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि नंबर वन मैग्जीन सरस सलिल की खटिया खड़ी होने लगी है। आईआरएस के पिछले चार राउंड के सर्वे में पाठक संख्या के मामले में सरस सलिल को सभी भाषाओं की मैग्जीनों में नंबर का दर्जा तो मिला हुआ है लेकिन इसकी पाठक संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। सरस सलिल के पाठक आईआरएस 2008 राउंड वन के सर्वे में 97.7 लाख थे तो आईआरएस 2009 राउंड टू में अब 66.3 लाख रह गए हैं। मतलब आईआरएस के चार राउंड अर्थात दो वर्षों में इस मैग्जीन ने 31 लाख पाठक खो दिए हैं।
तमिल वीकली कुमुदम नंबर दो पर कायम है पर दो वर्षों के भीतर इसे भी 10 लाख पाठकों का चूना लगा है। आईआरएस 2008 राउंड वन में इस मैग्जीन के 74.4 लाख पाठक थे तो अब (आईआरएस 2009 राउंड टू) 64.9 लाख रह गए हैं। नंबर तीन पर कायम मलयालम भाषा की मैग्जीन वनिथा ने अपनी संपूर्ण पाठक संख्या को दो वर्षों के दौरान मेनटेन रखा है। दो साल पहले भी इस मैग्जीन की पाठक संख्या 59.8 लाख थी और अब भी करीब उतनी ही 59.7 लाख है।
चौथे नंबर की पत्रिका इंडिया टुडे इंग्लिश है। इसे आईआरएस 2008 राउंड वन से 2009 राउंड टू के दौरान कुल 12 लाख की पाठक संख्या से हाथ धोना पड़ा है। फिलहाल इसकी पाठक संख्या 56.3 लाख है। पांचवें नंबर पर है कुंगुमम, तमिल वीकली मैग्जीन। पिछले चार राउंड उर्फ दो वर्षों में इस मैग्जीन को भी 20 लाख पाठकों का झटका झेलना पड़ा है। 73.7 लाख पाठक संख्या वाली यह मैग्जीन धड़ाम होकर 54.3 लाख पर आ गई है।
छठें नंबर पर है इंडिया टुडे हिंदी। इस बार इसकी पाठक संख्या 54 लाख है। चार राउंड पहले (आईआरएस 2008 राउंड वन में) यह आंकड़ा 66.6 लाख का हुआ करता था। जाहिर है, 12 लाख पाठकों ने इस मैग्जीन को टाटा बाय बाय बोल दिया है। सातवें नंबर पर है गृहशोभा। चार राउंड पहले इसकी पाठक संख्या 75.8 लाख थी जो अब 50 लाख पर पहुंच गई है। मतलब, बहुत तगड़ा नुकसान उठाना पड़ा है इस मैग्जीन को। करीब 25 लाख पाठकों ने इस मैग्जीन के जरिए अपने घर की शोभा बढ़ाने से इनकार किया है। दो वर्षों में मैग्जीन के 33.5 फीसदी पाठक भाग गए।
यही हाल आनंदा विकटन का है। इसे भी पिछले तीन राउंड में 10 लाख पाठक छोड़ चुके हैं। अब इसकी पाठक संख्या 46.5 लाख है। मेरी सहेली नंबर नौ पर है। इसकी पाठक संख्या 46.4 है। इस सहेली से पिछले चार राउंड में कुल 13 लाख पाठकों ने कुट्टी कर ली है। दसवें नंबर की मैग्जीन प्रतियोगिता दर्पण की पाठक संख्या बरकरार है। इस बार इसकी पाठक संख्या 42.9 लाख पता चली है। इससे ठीक पहले के राउंड में प्रतियोगिता दर्पण की पाठक संख्या 42.5 ला ख हुआ करती थी। आईआरएस 2008 राउंड दो में इसकी पाठक संख्या 43.6 लाख थी। मतलब, प्रतियोगिता दर्पण के पाठक सालिड हैं, वे उसे छोड़कर नहीं जा रहे हैं। यह भी कहा जा सकता है कि जितने लोग इस पत्रिका को पढ़ना बंद कर रहे होंगे, उतने नए लोग इस पत्रिका को पढ़ना शुरू कर रहे होंगे।











