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शशि शेखर ने डुबा दी अमर उजाला की लुटिया

[caption id="attachment_17375" align="alignleft" width="85"]उपदेश अवस्थीउपदेश अवस्थी[/caption]आईआरएस विश्लेषण (2) : अखबारों की पाठक संख्या अचानक नहीं बदलती : पाठक पढऩा तब बंद करता है जब  त्रस्त हो जाता है : अमर उजाला में अपने अंतिम दिनों में शशि व उनकी टीम ने जो धमाचौकड़ी मचाई, उसके नतीजे आईआरएस 2010 की रिपोर्ट में स्पष्ट दिखाई दिए।

उपदेश अवस्थी

उपदेश अवस्थी

आईआरएस विश्लेषण (2) : अखबारों की पाठक संख्या अचानक नहीं बदलती : पाठक पढऩा तब बंद करता है जब  त्रस्त हो जाता है : अमर उजाला में अपने अंतिम दिनों में शशि व उनकी टीम ने जो धमाचौकड़ी मचाई, उसके नतीजे आईआरएस 2010 की रिपोर्ट में स्पष्ट दिखाई दिए।

अमर उजाला को न केवल 3.49 लाख पाठकों से हाथ धोना पड़ा बल्कि देश के तीसरे सबसे बड़े अखबार होने का गौरव भी उसके हाथ से जाता रहा। निश्चित रूप से यह मुख्य प्रबंधन एवं संपादकों की समीक्षा का विषय है। समाचार पत्रों में रातों रात कुछ नहीं बदलता, खासकर पाठक संख्या। एक पाठक अपने प्रिय समाचार पत्र को तब पढऩा बंद करता है जबकि वह बहुत त्रस्त हो चुका होता है। प्रबंधन या संपादक यदि आज कोई परिवर्तन करते हैं तो उसका असर 6 महीने-साल भर बाद दिखाई देता है।

3.49 लाख पाठक ऐसे हैं जिन्हें शशि शेखर के नेतृत्व वाले अमर उजाला से कोई उम्मीदें नहीं रह गईं थी, अत: उन्होंने अमर उजाला को नकार दिया. मीडिया वर्ल्ड में तो उनके जाने की खबरें खूब चर्चाओं में रही लेकिन अमर उजाला के आम पाठकों को अभी भी यह नहीं मालूम के बदलाव हो चुका है। अमर उजाला के लिए यह अलार्मिंग सिचुएशन है। उसे शशि शेखर मेनिया से बाहर निकलने के लिए नई रणनीति अपनानी होगी। आम पाठकों तक यह संदेश देना होगा कि अब अमर उजाला पुराने ढर्रे पर नहीं चल रहा, बदल गया है।

दलील कुछ भी दो, दिल तो लगाना ही पड़ेगा : आउटलुक के पत्रकार श्री अजीत सिंह जी और उनके विचारों से सहमत सभी साथियों से मैं करबद्ध क्षमाप्रार्थी हूं, परंतु मैं कहना चाहता हूं दलील कुछ भी दो, मर मिटो या अमर हो जाओ, विश्वास करो या न करो लेकिन दिल तो इन्हीं आंकड़ों से लगाना पड़ेगा क्योंकि इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है।

मैं बताना चाहूंगा कि इण्डियन रीडरशिप सर्वे की रिपोर्ट तैयार करने वाली टीम कभी बेगामी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर सर्वे नहीं करती। यह एक प्रतियोगिता है। आईआरएस प्रबंधन इसका आयोजन है। सभी अखबार मालिक जिन्हे लगता है कि उनका अखबार लोकप्रिय है, इस प्रतियोगिता में शामिल होते हैं। शामिल सभी प्रतियोगियों के बीच सर्वे के उपरांत यह निर्धारित किया जाता है कि कौन किस नम्बर पर रहा।

कृपया ध्यान दीजिए, यह एक प्रतियोगिता है जिसमें प्रतिष्ठित अखबार शामिल होते हैं। तो क्या आपको लगता है कि शामिल प्रतियोगी किसी भी प्रकार का भेदभाव या निर्णयों में मनमानी होने देंगे, जबकि इसी रिपोर्ट पर अखबारों की प्रतिष्ठा टिकी है, पूरा का पूरा व्यावसायिक ढांचा टिका है। हमेशा के लिए गांठ बांधकर रखिए, जो लोग अखबारों में पूंजी लगाकर फायदे कमा रहे हैं वे मेरे या आपके जैसे तमाम बुद्धिजीवियों से कहीं ज्यादा चौकन्ने रहते हैं। हर कदम फूंक-फूंक कर रखते हैं, क्योंकि इसी पर टिका होता है उनका करोड़ों का कारोबार।

रहा सवाल देश की आबादी और पाठकसंख्या का तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि यह आईआरएस 2010 क्यू-1, आर-1 के आंकड़े जिसके किनारे पर लिखा हुआ है टीआर। टीआर से तात्पर्य हुआ टोटल रीडरशिप। जो यह बताता है कि तीन माह की अवधि में एक अखबार कितने पाठकों द्वारा पढ़ा गया। कृपया शब्दों पर ध्यान दीजिए, कितने पाठकों द्वारा। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कि एक दूधवाले का हिसाब। उसके पास कुल कितने ग्राहक हैं, कुल कितने नियमित ग्राहक हैं और एक माह में कुल कितने लीटर दूध बेचा गया। यहां कुल ग्राहकों की संख्या में उन लोगों को भी शामिल कर लिया जाएगा जिन्होंने महीने में केवल दो-चार दिन ही दूध लिया। नियमित ग्राहकों में संख्या वह आएगी जो पूरे 30 दिन दूध लेते हैं और यदि महीने भर का दूध की बिक्री लीटर में पूछ ली तो 1 नियमित ग्राहक=30 लीटर दूध।

आईआरएस की रिपोर्ट में कुल पाठक संख्या दर्शाई गई है वह भी पूरे तीन माह की. (ग्राहक संख्या नहीं, ग्राहक संख्या बताने के लिए ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन एकमात्र अधिकृत संस्थान है). यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे यदि वेटिकल सिटी के कुल 800 नागरिक नहाने के लिए लक्स का इस्तमाल करें और औसतन प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह 3 साबुन खर्च करता हो तो लक्स की बिक्री का आंकड़ा 2400 रहेगा जबकि यह आंकड़ा वहां की कुल आबादी से 3 गुना ज्यादा होगा।

आपका फार्मूला सही है, लेकिन उसे एबीसी रिपोर्ट पर अप्लीकेबल कीजिए, आईआरएस रिपोर्ट पर नहीं। मुझे नहीं लगता कि ऐसी किसी भी प्रतियोगिता के निर्णयों पर टिप्पणी करने का अधिकार मुझे या आपको है, जिसके नियमों की आपको जानकारी भी न हो। कृपया खेल के आयोजक, प्रायोजक, खिलाडिय़ों और नियम के विषय में पता लगाइए। फिर टिप्पणी कीजिए। ऐसी रिपोर्ट लिखेंगे तो अगली बार आउटलुक भी इस सूची में दिखाई देगी। शायद तब आपको यही आंकड़े खूबसूरत भी दिखें।

लेखक उपदेश अवस्थी हिन्दी दैनिक राज एक्सप्रेस, भोपाल में उपमहाप्रबंधक के पद पर कार्यरत है.

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0 Comments

  1. banarasi pandit

    May 5, 2010 at 11:12 am

    updesh beta amarujala mean abb jagah khali nahi hea. atul kamheswari ko teel lagane se koi fayada nahi. tum andhage honge lekinh ajj ke readrers nahi. shashi shekhar ke amarujala se jane ke asar ka yeh trailer hea. hindustan abb kis tarah danik jagaran se niumber one ka khitab chin lega yeh bhi 2 sall ke bheter dekha lena. updest beta tumhare jase 100 bhonoo-bhonoo shashi shekhar ke peeche pade rahete hea. unke upper koi asar nahi hota. tum beta atul maheswari kao battao ki banaras ki tarah sabhi jagah cycle stand sanchaalak brand editor sabhi eddtion mea baitha de to shashi shekhear ko kill amarujala,down danik jagran misson easy ho jayega. beta updesh farji deya jaoo. kuck padha-likha karo

  2. Uttank

    May 5, 2010 at 1:09 pm

    Banarasi Pandit ji aapki bhasha bhaut hi ashobhnee hai. Lagta hai ki aap Shashi Sekhar ji ke PRO hain. Achhi baat hai, magar aapko apna kaam ek achhe professional ke tarah karna chaiye. Lagta hai ki aapne Communication ke models ki study nahi ki hai, warna aapka frustration hum logo ko padhne ko nahi milta. Aapki galti nahi hai, qki ho sakta hai ki aap jis media se talluk rakhte hain shayad wahan ka culture hi kuch aisa ho.

  3. Deepak Agarwal

    May 5, 2010 at 1:34 pm

    yeh wale banarsi ji pandit kam panga panthi jyada lagte hain. gaali dene se koi aakhbaar aage nhi nikalta. updesh ji ki to pata nhi lekin yeh pop sahab zarur sashi ji ko makhan laga rahe hain. lakin ab kaam krne walo ka zamana hai. pogapanthiyo ke liye koi jagah nhi hai.

  4. Rahul Jain

    May 5, 2010 at 1:43 pm

    bnarsi pandit ji tmeej seekh lo. ya apna asli name address btao. jo tumhare pitaji ne nhee sikhaya hum aa jate hain tumhe sikhane k liye. shashi shekhar ek brand name hai. log unki tareef bhee krenge aur burai bhee. fadfadaya mat kro.

  5. aviinash aacharya

    May 5, 2010 at 6:13 pm

    meri jaan shashi shekhar 8 saal amar ujala me rahey. es beech jo behtar IRS figur’s hai wo kanha se aaye? esliye agar baar baar aap kisi naam ko target karogey to wo beasar hoga. Banarsi pandit ki bhasha se mai bhi ashamat hoon, lekin ye sach hai ki shashi shekhar ke khilaf kuch bhi likh do yanha chap jaayega eski guarentee hai.

  6. banarasi pandit

    May 5, 2010 at 6:37 pm

    updesh ke sabhi chamchao ko abhivadan kar raha hu. unke vichaar swagatyoge hea. updesh ki yogayta ko parrarkar ka vichar manane wale app jase kis media mean hea. unke sur mean tum sab bhi bhoon-bjoo karo koi fayada nahi. updesh ko shashi shekar ki yogata per sawaal khada karne se pahale yeh bhi dekhana jaruri tha ki unke amarujala mean group editor banane se pahale amarujala irs sarve mea kis sathan per tha. last dec mea aaye sarve kya kahata hea, abb jo reort aaye hea. uske jimmedar kaun hea! shashi shekhar ke naam per vicharaka updesh awasthi jase kashi ki gali-gali mea darjone mil jayenge. updesh yaswant singh ki tarah shashi shekher ke prati durgarha ke shikar hea. asea logo ki kashi ki boli mean wahi kahate hea. jo pichale post mean likhat tha. updesh ke jo chmamach tammej shkihane ki baat kaha raha hea woh sri updesh ji ko duragrah ki jagah sahi soch ki sheekh le. uske bad bachenge to mera pata le lena. kashi se kashmir tak kahi bhi samvad aur app logo ki jo iccha hogi woh kar leya jayega. abhi jis akhbar mea hu. wnaha shashi shkehar ke naan per reporter ki kudali ki jacha chal rahi hea. dashboard per he appkao jawab deta rahunga. updesh type ke logo ko updesh bhi. dil per chot lagi ho dil se nikal do nahi to ghaaon ban jayegea tu tum sabko kaam karane mea diikat hogi phir updesh tum logo ke sath apani bhi lutiya baccha nahi payenge.[b][/b]

  7. UPDESH AWASTHEE

    May 6, 2010 at 8:53 am

    धन्यवाद साथियो
    मैं हार्दिक आभारी हूं श्री उत्तंक जी, दीपक अग्रवाल जी, राहुल जैन साहब और अविनेश आचार्य जी का जिन्होंने प्रतिक्रियाएं पोस्ट कीं. मैं हृदय से आभारी हूं मेरे ऐसे प्रिय साथी का जिन्होंने अपना नाम नहीं लिखा लेकिन बनारसी पंडित के नाम से प्रतिक्रिया पोस्ट की. बनारसी पंडित भी अच्छा नाम है. बनारस का पान बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था, अब बनारस के शब्द बाण भी प्रसिद्धि पा रहे हैं.
    बनारसी पंडित जी को छोड़कर प्रतिक्रियाएं पोस्ट करने वाले सभी साथियों से मैं निवेदन करना चाहूंगा, कृपया इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं कभी न दिया करें, कुछ खाली बैठे हुए लोगों को काम मिल जाता है. एक बेवजह की बहस शुरू होती है जिससे न तो किसी के ज्ञान में वृद्धि होती और न ही कोई रिसर्च सामने आ पाती. अत: ऐसे सभी पाठक साथियों से मैं विनम्र निवेदन करना चाहूंगा, जो बनारसी पंडितजी से सहमत नहीं हैं कि कृपया कोई प्रतिक्रिया पोस्ट न करें. पंडितजी को खुली स्वतंत्रता दें अपनी भड़ास निकालने के लिए.
    अब मैं करबद्ध चरणवंदना करते हुए मुखातिब होता हूं बनारसी पंडित जी से: मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि किसी भी अतुल माहेश्वरी जी से मेरा कोई परिचय नहीं है और मुझे ये भी नहीं मालूम कि शशि शेखर जी के संदर्भ में टिप्पणी करने वालों को श्री अतुल माहेश्वरी जी उपकृत करते हैं. आपने बता दिया धन्यवाद. कृपया ऐसा ज्ञान देते रहें, संभव हो तो शशि शेखर जी की छवि खराब करने की कोशिशों के क्या क्या लाभ हो सकते हैं, एक साथ बता दें. पंडितजी आप निश्चित रूप से मुझसे कहीं ज्यादा ज्ञानी, बुद्धिमान एवं योग्य, परंतु मुझे आश्चर्य है कि आप इतने क्रोधित कैसे हो गए. आईआरएस रिपोर्ट और उसकी समीक्षा के संदर्भ में मेरी कुछ आधा दर्जन से ज्यादा खबरें छपीं हैं. यह उनमें से एक थी. मेरी समीक्षा का आशय केवल इतना सा था कि किसी भी अखबार की पाठक संख्या बढऩे या गिरने का श्रेय हमेशा संपादक को ही दिया जाना चाहिए, अक्सर होता यह है कि पाठक संख्या बढऩे का श्रेय प्रबंधन ले जाता है और पाठक संख्या गिरने पर घबराकर मुफ्त उपहार योजनाएं शुरू कर देता हैं. प्रसार बढ़ाने के लिए शुरू की जाने वाली तमाम योजनाएं संपादकों के गाल पर तमाचा हैं. ऐसा मेरा विचार है, आपका सहमत होना अनिवार्य नहीं है.
    मेरा प्रयास तो केवल इतना है कि संपादक नाम के संस्थान को मजबूती दी जानी चाहिए. अखबार संपादकों के नाम से ही चलते थे और उन्ही के नाम से चलने चाहिए. यह बात प्रबंधन और संपादक दोनों को समझना चाहिए. पंडितजी मैं बहुत छोटा या व्यक्ति हूं और दो बहुत बड़े स्तंभों को एकछत के नीचे लाने का प्रयास कर रहा हूं. मैं तो केवल इतना प्रयास कर रहा रहा हूं कि संपादकीय विभाग के साथी आजादी के नाम पर मनमानी की मांग न करें प्रबंधन के दर्द को समझें और प्रबंधन आर्थिक परेशानियों के चलते संपादकीय विभाग का सम्मान चकनाचूर न करे। पंडितजी, श्री शशि शेखर जी से भी मेरा कोई परिचय नहीं है. उनके हिन्दुस्तान ज्वाइन करने से पहले तक मैं इस नाम को भी नहीं जानता था. इस फेरबदल से जो बवंडर उठा, दूर से मुझे भी दिखाई दिया. यह इत्तफाक भी हो सकता है कि अमर उजाला आईआरएस रिपोर्ट में प्रभावित हुआ इसलिए शशि शेखर जी का जिक्र आ गया. आप यदि अपने क्रोध पर नियंत्रण रखते तो बहस एक सही दिशा में जाती. उनके कार्यकाल की आईआरएस रिपोर्टों को प्रस्तुत करते तो मुझे खुशी होती. लेकिन शायद यह मुश्किल काम था. अपनी पहचान छिपाकर गालीगलौच बहुत आसान काम है.

  8. manorath mishra

    May 6, 2010 at 9:35 am

    banarsi pandit se saari naarazgi jaayaz hai. bas ek jawab aap ya yashwant batayengey kya ki DEC ke jis IRS me Amar Ujala ko growth mili thi uskey liye kya Shashi Shekhar ko credit deney ka kaam aap ne kisi post me likha. Bhadas ke liye Shashi Shekhar attack ki ek vastu hai bas. Takleef ye hai ki Mrinal Pandey ne defemation ki dhamki di, ussey Yashwant ne khub post banakar becha, mukadma ladney ke liye chanda jutaya. ab fir se Shashi Shkehar se reaction ki umeed kar rahey hai taaki fir se chanda-part-2 suru ho sakey. lekin sankat ye hai ki shashi shekhar ki taraf se sannata hai. ajeeb hai na.

  9. यशवंत

    May 6, 2010 at 9:50 am

    भाई, मनोरथ मिश्रा जी, आप जो भी हों, असली नाम वाले या नकली नाम वाले, आपको दो चीजें बताना चाहूंगा. पहली तो ये कि शशि शेखर मीडिया के सेलिब्रिटी हैं. जो सेलिब्रिटी होता है, वह गाहे बगाहे मीडिया में चर्चा-कुचर्चा का विषय बनता रहता है. इसमें कोई बुरा मानने जैसी बात नहीं है. दूसरी बात, मृणाल पांडेय वाले मुकदमें में आपने भले एक पैसा न दिया हो लेकिन आपके पेट में जलन हो रही है. यह स्वाभाविक हिंदी पट्टी वाली मानसिकता है. बता दूं, पांच हजार रुपये से कुछ कम ही इकट्ठे हुए थे उस चंदा मांगो अभियान में लेकिन मैं इसे पांच लाख रुपया मानता हूं क्योंकि किसी ने सौ किसी ने हजार किसी ने पांच सौ देकर पांच हजार रुपये किए तो मैं मानता हूं कि कम से कम दस लोग ऐसे हैं जो ये मानते हैं कि भड़ास के मंच में उनका योगदान है और भड़ास के हर संकट में वे साथ खड़े रहेंगे. आजकल अपने परिवार के लोग भी मुसीबत में मदद नहीं करते, ऐसे में भड़ास के दस अपिरिचित साथी आर्थिक मदद देकर साथ खड़े हुए तो इसे भड़ास की उपलब्धि माना जाना चाहिए.
    तीसरी बात, उपदेश अवस्थी के लिखे पर किसी को नाराज नहीं होना चाहिए क्योंकि यह उनका विचार है और इस लोकतंत्र में हर किसी को अपना विचार प्रकट करने का अधिकार है. वरना यहां तो हर आदमी या तो किसी का तेल लगाता है या विरोध करता है, तार्किक नहीं हो पाता. अगर आप उपदेश जी की बातों से असहमत हैं तो आप लाजिकली कमेंट कर उसे खारिज करने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन आप लगे चंदा, मृणाल, यशवंत के बारे में बतियाने. ऐसे कमेंट को मैं सोचता हूं कि अब आगे से पब्लिस नहीं करना चाहिए क्योंकि अगर हाथियां कुत्तों के भोंकने का जवाब देती रहीं तो वो सफर कैसे तय कर सकेंगी.
    आपका आभार
    यशवंत

  10. vishesh kumar

    May 6, 2010 at 10:34 am

    यशवंत जी शशिशेखर को आप लोगों ने पहले इतना चढ़ा दिया। परंतु सच्चाई कभी किसी को पता नहीं चली। जो लोग उनके साथ पहले काम कर चुके हैं वो जानते हैं कि शशिशेखर क्या चीज हैं। जहां गए, वहां नाश ही हुआ। अविश्वसनीय खबरें तान-तान कर छपवाकर आज अखबार बंद करवाने का श्रेय इन्हीं को है। अमर उजाला में बुद्धिविहीन पेज आपरेटरों को सब एडिटर बनाकर और चेला टाइप गुलाम मानसिकता वाले पत्रकारों को संपादक बनाकर इन्होंने अमर उजाला के अंदर के असली तेवर को खत्म कर दिया। अमर उजाला के जिस विस्तार की बात कही जा रही है शशिशेखर के टाइम में वह पहले के तेवर का हैंगओवर था जिसके कारण बढ़ता चला गया। पर पाठकों ने पिछले कई सालों में जो कुछ छपा उसे देख पढ़ना बंद किया जिसका असर आज सामने है। शशिशेखर के दौर में ही अमर उजाला के मालिकों के बीज झगड़े शुरू हुए और इसमें कितनी भूमिका शशिशेखर की रही है, ये सब जानते हैं। अमर उजाला के एक मालिक, जिन्हें अब अलग किया जा चुका है के बारे में दिल्ली के किसी अखबार में खबर छपी की उन्हें मारने की सुपारी शशिशेखर ने दी थी। आप चाहेंगे तो वो खबर आपतक भिजवा दूंगा। तो ऐसे हैं शशिशेखर जी। उनके चिंटू मिंटू तो नौकरी के वास्ते तेल लगा लगाकर बोलेंगे ही पर सच्चाई यह है कि शशिशेखर संपादक कम, अच्छे मैनेजर ज्यादा हैं जो अपने इर्द-गिर्द अपने से कम दिमाग के लोगों को रखना पसंद करते हैं। इनकी बोलचाल, गालीगलौज, राजनीति के बारे में किसी भी पुराने पत्रकार से पूछा जा सकता है। खासकर आगरा में जो लोग इनके साथ काम कर चुके हैं वे इनकी अराजक व्यक्तित्व के बारे में खूब जानते हैं। अब मुंह न खुलवाइए। जिन्हें आप सेलब्रटी बता रहे हैं वो सही कहा जाए तो पत्रकारिता के नाशक हैं और अब ये हिंदुस्तान में क्या गुल खिलाते हैं, इसकी झलक मिलनी शुरू हो गई है। ठीक ठाक बौद्धिक पढ़ने लायक अखबार को गली कूचे का बना दिया है। न खबर होती है न विश्लेषण। बस रुटीन को अलग अंदाज में पैकेजिंग कर परोसने का खेल चल रहा है। हिंदुस्तान के पास अगर पूंजी की ताकत न हो तो यह अखबार भी कुछ वर्षों में बैठ जाता पर हिंदुस्तान वालों के पास इतना पैसा है और इतनी विस्तार योजनाएं हैं कि अखबार नई यूनिटों के खुलने के कारण बढ़ता जाएगा और इसका श्रेय शशि शेखर के चिंटू शशिशेखर को देते रहेंगे। जय हो शशिशेखर की और जय हो उनके चिंटूओं की।

  11. vishesh kumar

    May 6, 2010 at 10:36 am

    एक बात और कहना भूल गया। शशिशेखर ने कई ऐसे संपादक अपने नेतृत्व में डेवलप किए हैं जो फ्राड, अनैतिक, चरित्रहीन, लायजनर हैं। जिनका काम जीहुजूरी करना और सेटिंग गेटिंग करना है। आप यूपी में निगाह दौड़ा लीजिए। इस टाइप के संपादक को शशिशेखर अपने साथ फिर हिंदुस्तान में भी लेकर चले आए हैं। जो लोग पत्रकार बनने लायक नहीं उन अनैतिक लोगों को इन्होंने संपादक बना दिया है और उन्हें संरक्षण दे रहे हैं। भगवान ही मालिक है।

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