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मैंने मां-बाप के डेढ़ लाख रुपये बर्बाद कर दिए

[caption id="attachment_16090" align="alignleft"]पायल चक्रवर्तीपायल चक्रवर्ती[/caption]मुझे आज भी याद है वो दिन जब मुझे कॉलेज की तरफ से चंडीगढ़ जागरण का इन्टर्नशिप का लेटर दिया गया था. मैं अपने करियर के बारे में सोचकर बेहद खुश थी. जब मै लेटर लेकर अपनी बेस्ट फ्रेंड प्रियंका से मिलने गयी, तो खबर सुनकर वह रोने लगी. वो मेरा करियर बनते देख खुश थी लेकिन उसे दुख हो रहा था तो मेरा साथ छूटने का, मेरे जाने का. जागरण ज्वाइन करने के एक दिन पहले मैंने नोएडा में प्रियंका के साथ जमकर शापिंग की. चंडीगढ़ पहुंची तो वहां मैंने प्रेस क्लब के पास किराये पर एक फ्लैट ले लिया था. धीरे-धीरे मैंने अपनी किचन जमाई. रोज खाना बनाने और कपडे़ धोने के बाद टाइम से ऑफिस पहुंचने लगी. मीटिंग अटेंड करने के बाद रिपोर्टिंग पर जाती थी. जल्दी ही मैंने अपने न्यूज़ कांटैक्ट भी डेवेलप कर लिए. पर ये क्या, जागरण में कदम रखने के दूसरे दिन ही मुझे एक फ़ोन आया.

पायल चक्रवर्तीमुझे आज भी याद है वो दिन जब मुझे कॉलेज की तरफ से चंडीगढ़ जागरण का इन्टर्नशिप का लेटर दिया गया था. मैं अपने करियर के बारे में सोचकर बेहद खुश थी. जब मै लेटर लेकर अपनी बेस्ट फ्रेंड प्रियंका से मिलने गयी, तो खबर सुनकर वह रोने लगी. वो मेरा करियर बनते देख खुश थी लेकिन उसे दुख हो रहा था तो मेरा साथ छूटने का, मेरे जाने का. जागरण ज्वाइन करने के एक दिन पहले मैंने नोएडा में प्रियंका के साथ जमकर शापिंग की. चंडीगढ़ पहुंची तो वहां मैंने प्रेस क्लब के पास किराये पर एक फ्लैट ले लिया था. धीरे-धीरे मैंने अपनी किचन जमाई. रोज खाना बनाने और कपडे़ धोने के बाद टाइम से ऑफिस पहुंचने लगी. मीटिंग अटेंड करने के बाद रिपोर्टिंग पर जाती थी. जल्दी ही मैंने अपने न्यूज़ कांटैक्ट भी डेवेलप कर लिए. पर ये क्या, जागरण में कदम रखने के दूसरे दिन ही मुझे एक फ़ोन आया.

यह फोन जागरण के ही एक वरिष्ठ का था. फ़ोन पर कहा गया कि मुझे ऑफिस में किसी से बात नहीं करनी है. यहां तक कि अपने साथी दो दोस्तों से, जो मेरे साथ इन्टर्नशिप के लिए दिल्ली से चंडीगढ़ आये थे, उनसे भी नहीं. मैंने पूछा कि ऐसा क्यों? तो जवाब मिला कि ये ऑफिस का सिस्टम है. एक तो मैंने जीवन में पहली बार ऐसा ऑफिस देखा था जहां लड़कियों के लिए कोई जगह नहीं थी. मैं ऑफिस में अकेली लड़की थी. मुझे जागरण से भगाने के लिए सिस्टम के नाम पर मेरे सामने इम्पोसिबल शर्तें रखी गयीं. पर मैंने खुद को नियंत्रित किया. चुप रहकर काम करना शुरू किया. असली संघर्ष क्या होता है, ये मुझे तब पता चला जब मैंने तीन दिनों तक भूखे पेट काम किया. रोज़ रात घर आकर भूख से बिलबिलाती. अपने बिस्तर पर घुटनों पर बैठ कर उपरवाले से प्रार्थना करती. अपनी इस हालत को मैंने अपने घरवालों से छुपाया क्योंकि मैं जानती थी कि मेरे माता-पिता अपने बच्चे की दयनीय हालत देखकर परेशान हो जाएंगे. अगर कोई मेरी इस हालत के बारे में जानता था तो वो मेरी सहेली प्रियंका थी. उसने मेरा बड़ा साथ दिया.

दुःख और तकलीफ से भरे वो दिन जो मैंने चंडीगढ़ जागरण में बिताये, शायद मेरे लिए जरूरी थे. इतने बड़े संस्थान की असलियत से वाकिफ होना मेरे लिए जरूरी था. समझ में आ चुका था कि गलती मेरी ही थी क्योंकि मैं ना तो परिपाटी से जागरण को चला रहे परिवार से थी और ना ही एक विशेष जाति-क्षेत्र समुदाय से, जिन्हें जागरण में स्पेशल रिजर्वेशन मिलता है. मेरा तीसरा गुनाह ये था कि मैं एक लड़की हूं. शायद अतीत की घटनाओं से वाकिफ लोग अब पांचों उंगलियों के बीच का फर्क देखना भूल गए हैं. इसीलिए मुझे चंडीगढ़ में टिकने नहीं दिया गया. इसीलिए किसी के किये की सजा किसी को भुगतनी पड़ रही है. जब जागरण से मुझे वापसी के लिए कहा गया तो लगा मानों सारे सपने एक झटके में टूट गए हों. जागरण में मुझे काम करने दिया, इसके लिए मैं बड़ी कोशिश की पर कुछ नहीं हुआ. मुझे अंततः वापस ही आना पड़ा. वोल्वो में वापसी की टिकेट बुक करायी और पूरे रस्ते रोते हुए वापस आई. इस दर्द को वही समझ सकता है, जो इस सिचुवेशन से गुजरा हो और ये बात सभी जानते हैं कि जिसने सफलता के लिए घिनौना शार्टकट मारा हो वो इंसान इस दर्द को नहीं समझ सकता है. चलो, पंजाब में मेरी दाल नहीं गली पर जागरण के सीजीएम साहब की मैं बड़ी इज्जत करती थी. सोचा, शायद वो मुझे समझेंगे. दिल्ली वापस आने के बाद मैंने उनसे मिलने का प्लान बनाया और जा पहुंची उनके आफिस.

मुझे आज भी याद है वो दिन, जब मैं जागरण के सीजीएम साहब के पास पहुंची थी ये दुहाई लेकर की मैंने आपके इंस्टीट्यूट के कहने पर आपके यहां दाखिला लिया था और कॉलेज के टॉप टेन स्टूडेंट्स में होने के बावजूद मुझे प्लेसमेंट के नाम पर बेवकूफ बनाया गया और चंडीगढ़ भेज दिया गया. और वहां से मेरी वापसी हो गयी क्योंकि मैं एक लडकी हूं. खैर, मेरे आंसुओं पर सीजीएम साहब भी नहीं तरसे. मुझे ये कहकर वापस कर दिया कि जाओ, यहां कोई वैकेन्सी नहीं है. ठोकर खाने के बाद ये सोच लिया था कि मैंने अपने मां-बाप के डेढ़ लाख रुपये बर्बाद कर दिए. अब नौकरी तो मिलने से रही. अब क्या करूं? मेरे लिए जिंदगी का दूसरा नाम अब डिप्रेशन है. जिस जागरण की मैं बचपन से इज्जत करती रही, उसकी सच्चाई कुछ दिनों में मेरे सामने आ गई. 


पायल से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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