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पांच फाउन्डर मेंबरों ने झारखंड न्यूज़लाइन छोड़ा

झारखंड की राजधानी रांची से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक अखबार ‘झारखंड न्यूज़लाइन’ के पांच संस्थापक सदस्यों ने अखबार को गुड बाय कह दिया है। अखबार छोड़ने वाले ये सभी सदस्य संपादकीय विभाग के हैं। जिन लोगों ने न्यूज़लाइन छोड़ा है, उनमें संपादक शिशिर टुड्डू, सहायक संपादक प्रशांत सिंह, समाचार संपादक शशिकांत राठौर, मुख्य उप संपादक अनिमेष और वरीय संवाददाता संदीप जैन शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि झारखंड न्यूज़लाइन ब्राडशीट साइज़ में झारखंड से प्रकाशित होनेवाला पहला सांध्य दैनिक है और इस अखबार की परिकल्पना उक्त लोगों के अलावा वरिष्ठ पत्रकार ललित मुर्मू और अनूप बागे ने अखबार के मालिक रॉशन कुमार सुरीन के साथ बैठकर तैयार की थी।

झारखंड की राजधानी रांची से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक अखबार ‘झारखंड न्यूज़लाइन’ के पांच संस्थापक सदस्यों ने अखबार को गुड बाय कह दिया है। अखबार छोड़ने वाले ये सभी सदस्य संपादकीय विभाग के हैं। जिन लोगों ने न्यूज़लाइन छोड़ा है, उनमें संपादक शिशिर टुड्डू, सहायक संपादक प्रशांत सिंह, समाचार संपादक शशिकांत राठौर, मुख्य उप संपादक अनिमेष और वरीय संवाददाता संदीप जैन शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि झारखंड न्यूज़लाइन ब्राडशीट साइज़ में झारखंड से प्रकाशित होनेवाला पहला सांध्य दैनिक है और इस अखबार की परिकल्पना उक्त लोगों के अलावा वरिष्ठ पत्रकार ललित मुर्मू और अनूप बागे ने अखबार के मालिक रॉशन कुमार सुरीन के साथ बैठकर तैयार की थी।

प्रशांत सिंह, शशिकांत राठौर और अनिमेष इस अखबार में काम करने से पहले झारखंड के प्रतिष्ठित अखबार प्रभात खबर में कार्यरत थे। न्यूज़लाइन की परिकल्पना साकार करने में इन तीनों का बड़ा योगदान रहा। पूरे झारखंड में टीम का गठन होने के बाद अखबार का प्रकाशन 28 अगस्त 2007 से शुरू हुआ। संथालपरगना छोड़कर पूरे राज्य में अखबार भेजा जाने लगा। टीम में इतना उत्साह था कि बिना किसी पूर्वाभ्यास के ही अखबार का प्रकाशन शुरू हो गया। इससे बड़ी बात यह थी कि टीम में उक्त लोगों के अलावा सभी लोग फ्रेशर थे, जिन्हें टीम के फाउंडर मेंबरों ने प्रशिक्षित किया और सिस्टम डेवलप कर अखबार निकाला।

सूत्रों का कहना है कि शुरुआत में सब कुछ ठीकठाक था। अखबार ने अपनी पहचान कुछ ही दिनों में बना ली। देर रात से लेकर दोपहर ढाई बजे तक के घटनाक्रमों की खबरें प्रकाशित की जाने लगीं। मीडिया में इसे ‘शर्मा गेस पेपर’ के नाम से जाना जाने लगा। ‘शर्मा गेस’ ऐसा गेस पेपर है, जो झारखंड में होने वाली मैट्रिक, इंटर और स्नातक स्तर की परीक्षाओं से पहले छात्र इसे ही पढ़ कर परीक्षाओं में बैठते हैं। पाठकों के अलावा विभिन्न मॉर्निंगर अखबारों के संवाददाता शाम में इस अखबार की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगे।

सूत्रों के मुताबिक इस बीच अखबार प्रबंधन में कुछ ऐसे लोगों का प्रवेश हुआ, जिन्हें अखबारी दुनिया की ए, बी, सी, डी की भी जानकारी नहीं थी। कहा जाता है कि मैनेजिंग कमेटी का हिस्सा बनने के बाद इन लोगों ने अखबार के मालिक रोशन सुरीन को अपने हिसाब से समझाना शुरू कर दिया। कई उलटे-सीधे फैसले लिये जाने लगे। फाउंडर मेंबरों ने विरोध जताते हुए इन बातों की जानकारी श्री सुरीन को दी। इसके बावजूद श्री सुरीन ने कोई कदम नहीं उठाया। सूत्रों के मुताबिक मैनेजमेंट में शामिल लोग यह दावा करने लगे कि अखबार में मेरा भी पैसा लगा है, इसलिए हम जो भी निर्णय लेते हैं, उसे हर हाल में माना जाये। श्री सुरीन सभी मामलों में रहस्यमय तरीके से चुप्पी साधे रहे।

मैनेजमेंट के इस रवैये से दुखी होकर विज्ञापन प्रबंधक संजय कुमार मिश्रा ने अखबार छोड़ दिया। इसका विपरीत प्रभाव विज्ञापन के संकलन पर पड़ा। इसके बावजूद प्रबंधन की कार्यशैली में कोई सुधार नहीं हुआ। इससे तंग आकर सितम्बर माह में प्रशांत सिंह, शशिकांत राठौर, अनिमेष और संदीप जैन ने अखबार छोड़ दिया। सूचना मिली है कि ये चारों किसी नये अखबार के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इनसे कई पत्रकार संपर्क में भी हैं।

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