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कार्टूनिस्ट की नजर में लालू-मुलायम खलनायक!

महिला विधेयक पर कार्टूनिस्ट पंकज का एक कार्टून काफी जबरदस्त है. कार्टून का टोन तो यही है कि महिला विधेयक में दलित-पिछड़े तबके की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था न होने के चलते बिल का विरोध करने वाले मुलायम-लालू खलनायक सरीखे लोग हैं और राज्यसभा में बिल पास हो जाने के कारण इन दोनों को मुंहकी खानी पड़ी है. पर लालू-मुलायम की बातें बिलकुल गलत तो नहीं ही कही जा सकती. क्या यह सच नहीं है कि महिला बिल के इसी रूप में पारित हो जाने के बाद देश के भ्रष्ट नौकरशाहों और भ्रष्ट नेताओं की पत्नियां ही नेतागिरी में शीर्ष पर होंगी, किसी गांव-कस्बे की गरीब महिला नहीं.

महिला विधेयक पर कार्टूनिस्ट पंकज का एक कार्टून काफी जबरदस्त है. कार्टून का टोन तो यही है कि महिला विधेयक में दलित-पिछड़े तबके की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था न होने के चलते बिल का विरोध करने वाले मुलायम-लालू खलनायक सरीखे लोग हैं और राज्यसभा में बिल पास हो जाने के कारण इन दोनों को मुंहकी खानी पड़ी है. पर लालू-मुलायम की बातें बिलकुल गलत तो नहीं ही कही जा सकती. क्या यह सच नहीं है कि महिला बिल के इसी रूप में पारित हो जाने के बाद देश के भ्रष्ट नौकरशाहों और भ्रष्ट नेताओं की पत्नियां ही नेतागिरी में शीर्ष पर होंगी, किसी गांव-कस्बे की गरीब महिला नहीं.

अगर दलित-पिछड़े तबके की महिलाओं के लिए महिला बिल में आरक्षण की व्यवस्था हो जाती तो देश के हर जाति-समुदाय की महिलाओं का प्रतिनिधित्व होता और कुछ ऐसी महिलाएं भी संसद में देखने को मिल जातीं जो सिर्फ महिला बिल में आरक्षण के चलते गांव से संसद तक पहुंच गई हों. लोकतंत्र में मौका व लाभ उन लोगों को ज्यादा मिलना चाहिए जो वंचित है, गरीब हैं, दलित हैं. खैर, यह विषय भयंकर विवाद का बन चुका है और संभव है कि आप इन बातों से इत्तफाक न रखें. ऐसे में अच्छा यही है कि आप यह कार्टून देखें और कार्टूनिस्ट की मानसिकता के बारे में बताएं.

कार्टूनिस्ट पंकज

कार्टूनिस्ट पंकज

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0 Comments

  1. अमलेन्दु उपाध्याय

    March 11, 2010 at 11:39 pm

    http://batbolegihamnahin.blogspot.com/
    कांग्रेस, भाजपा और लेफ्ट तीनों के रासायनिक समीकरण को समझना बेहतर रहेगा। कांग्रेस की महिला विरोधाी मानसिकता को इस तरह समझा जा सकता है कि सोनिया की विरासत संभालने के लिए जब राहुल और प्रियंका में जोर आजमाइश हुई तो कमान राहुल को सौंपी गई प्रियंका को नहीं। इसी तरह भले ही भाजपा ने लोकसभा में विपक्ष का नेता सुषमा स्वराज को बनाया हो लेकिन वह भी महिलाओं को टिकट देने के मामले में अपने महिला विरोधाी चेहरे को छिपा नहीं सकी। इसी तरह महिला आरक्षण बिल पारित न होने तक लोकसभा न जाने की कसम खाने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपनी केन्द्रीय कमेटी में अभी तक किसी महिला को स्थान नहीं दे सकी है और अगर वृन्दा कारत, प्रकाश कारत की पत्नी न होतीं तो शायद माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी भी अपनी सोलह सदस्यीय पोलित ब्यूरो में किसी महिला को स्थान नहीं देती। ऐसे में यह उम्मीद कैसे की जाए कि यह संशोधान विधोयक पारित होने के बाद आम भारतीय नारी को विधायिका में स्थान मिल जाएगा? होगा वही जो अब तक होता आया है कि कुछ खास परिवारों की महिलाएं ही इसका लाभ उठाएंगी और आम भारतीय नारी की किस्मत राम भरोसे ही रहेगी। इसलिए इस बिल के पारित होने का औचित्य तभी होगा जब कम से कम दो बड़े दल कांग्रेस और भाजपा इस पर अपनी नीयत साफ रखें।

    दूसरी ओर बिल को लेकर समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने जो रुख राज्यसभा के अंदर अपनाया उसे कम से कम कोई भी लोकतांत्रिक व्यक्ति सही नहीं ठहरा सकता। लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का हक है, असहमति जताने का भी हक है लेकिन सदन के अंदर हंगामा मचाना संसदीय आचरण नहीं है। लेकिन क्या सरकार का इन दलों से बात न करने के रवैये को भी उचित ठहराया जा सकता है? हालांकि इन दलों ने जो आपत्तियां उठायी हैं उन्हें थोथी महिला विरोधाी हरकत कहकर नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। इस बात में कोई शक नहीं है कि इस बिल का लाभ सबसे ज्यादा सवर्ण महिलाएं और खासतौर पर कुछ परिवारों की ही महिलाएं उठाएंगी। इस बिल को लेकर समाजवादी धाड़ा दलित, मुस्लिम और पिछड़ा विरोधाी होने का जो आरोप लगा रहा है उसे 9 मार्च के अखबारों की सुर्खियों और तथाकथित नारीवादी महिलाओं की लालू- मुलायम के खिलाफ जातिवादी टिप्पण्0श्नियों ने सही साबित कर दिया है। लगभग सभी न्यूज चैनल्स पर एंकरों ( इन्हें पत्रकार कदापि न समझा जाए ) की सपा और राजद पर टिप्पणियां भी साबित कर रही थीं कि महिला आरक्षण की आड़ में पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ साजिश रची जा रही है।
    read more on
    http://batbolegihamnahin.blogspot.com/

  2. anaam

    March 11, 2010 at 5:43 am

    ye aarakshan-waarakshan kya hai. isse kuch nahi hoga. sarkar agar kuch karna chahti hai, waastav men mahilaaon aur apne haq se wanchit logo ko aage badhana hai to sabse pahle unhe shikchit karna hoga. taaki unhe apne haq-o-huquq ki jaankaari ho sake aur use paane k liye we lad saken. nahi to aarakshan kaa laabh bhi 14 saal baad kewal creamilayes, paise waalon aur prabhaawshaali logo ko hi milega. hame kisi neta ya wyakti ke baare me purwagrah se grasit nahi hona chahiye. ho sakta hia unka wirodh sahi ho. aur waise bhi wo bill hi kya jiska wirodh na ho. bhaarat me isse pahle bane dusre bill ke bhi kriyanwayan aur unki wartmaan men zameeni haqqiqat par gaur karna chahiye, puri tasweer saaf ho jayegi.

  3. Rizwan Chanchal Lucknow

    March 10, 2010 at 11:34 pm

    Pankaj ka yeh Kartoon wastwa me bilkul fit hai accha hai sarahniya hai iske liye unhe meri badhai

  4. naresh

    March 10, 2010 at 1:55 pm

    kartoon bhi theek hai aur iski mansikta bhi..aakhir kab tak yeh desh aarkshan ke santap ko jhelega…sanvidhan nirmataon ne khud kaha tha ki aarkshan ki suvidha pichhde tabke ko uthhane ke liye hai aur ise das saal baad vapis le liya jana chahiye lekin aajadi ke 60 saal baad bhi aarkshan jyon ka tyon hai aur sirf jaati ke adhaar par hi logon ko moka milta hai kabliyat ke adhar par nahi..yashwant ji main is par aap se sehmat nahi hu…dar-asal ab gend political partiyon ke pale me hai ki voh kul kitni dalit mahilaon ko ticket dete hain..aarkshan me aarkshan jayaj nahi hai…

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