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दुख-दर्द

ठगों के मददगार बने अखबार

‘हिंदुस्तान’ और ‘इंडिया टुडे’ वालों ने छला : कोई शापिंग कम्पनी है ‘नापतोल’ नाम से। मेरे मित्र पत्रकार विजय जैन ने विज्ञापन देखा और मुझे बताया। ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में छपे विज्ञापन की भाषा कुछ यूं  थी… हिन्दुस्तान के पाठकों के लिए विशेष, मात्र रु.1795/- में पाएं खुफिया कैमरा…. बताये गये नम्बर पर फ़ोन किया. किसी कन्या ने मीठी आवाज़ में आर्डर लिया. कुछ दिनों बाद पोस्टमैन आया और पैसे लेकर पैकेट दे दिया. खोलकर देखने पर पता लगा कि हम ठगी के शिकार बन गये है. कैमरा ख़राब था. फिर फ़ोन लगाया तो कोई फरियाद सुनने को तैयार नहीं.

‘हिंदुस्तान’ और ‘इंडिया टुडे’ वालों ने छला : कोई शापिंग कम्पनी है ‘नापतोल’ नाम से। मेरे मित्र पत्रकार विजय जैन ने विज्ञापन देखा और मुझे बताया। ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में छपे विज्ञापन की भाषा कुछ यूं  थी… हिन्दुस्तान के पाठकों के लिए विशेष, मात्र रु.1795/- में पाएं खुफिया कैमरा…. बताये गये नम्बर पर फ़ोन किया. किसी कन्या ने मीठी आवाज़ में आर्डर लिया. कुछ दिनों बाद पोस्टमैन आया और पैसे लेकर पैकेट दे दिया. खोलकर देखने पर पता लगा कि हम ठगी के शिकार बन गये है. कैमरा ख़राब था. फिर फ़ोन लगाया तो कोई फरियाद सुनने को तैयार नहीं.

ऐसा ही हादसा मेरे साथ घटा. किसी छुटभैया कम्पनी ने नहीं बल्कि इंडिया टुडे वालों ने छला. मेरे सेल पर मैसेज आया कि इंडिया टुडे बुक क्लब के सदस्यों के लिए बेनेटन सनग्लास मुफ्त. हैंडलिंग चार्ज रु.599/- मात्र. इंडिया टुडे के नाम को देखते हुए पूरे विश्वास के साथ आर्डर दे दिया. कुछ दिन में आर्डर मिल गया. खोलकर देखा तो धक्का लगा. सनग्लास घटिया गुणवत्ता का होने के साथ-साथ टूटा हुआ था. तत्काल उन्हें सूचना दी. महीनों बाट जाने के बाद भी कोई जवाब नहीं आया. मैं उनसे कोर्ट में निपटूंगा ताकि बड़े नाम बाले नटवरलाल फिर किसी के साथ ठगी नहीं कर सकें.

मुझे समझ नहीं आता कि इन बड़े नाम बाले ग्रुपों को पैसे की इतनी क्या जरूरत पड़ गई है जो हर तरह का धंधा करने लगे हैं? क्या इनका पेट इतना बड़ा हो  गया है कि इस प्रकार की ठगी को भी पैसा कमाने का जरिया बनाने लगे हैं? क्या इन्हें नाम खराब होने की कोई परवाह नहीं है? कोई खुफिया कैमरा बेच रहा है तो कोई लिंगवर्धक यन्त्र के विज्ञापन में व्यस्त है.

विज्ञापन समाचार पत्रों के लिए अति आवश्यक है, यह बात सही है. पर इन दिनों फूहड़ विज्ञापनों ने अखबारों पर कब्ज़ा कर लिया है. पहले लोगों का जुमला था कि परिवार के साथ बैठ कर टेलीविजन देखना दुश्वार हो गया है, पर अब यह जुमला अख़बारों पर भी फिट बैठ रहा है. ट्रेन में सफ़र करते समय टाइलेट के भीतर-बाहर लगे विज्ञापनों पर आपने ध्यान दिया होगा. अधिकतर विज्ञापन झोलाछाप डाक्टरों के होते हैं. मसलन आपका चेहरा मुरझाया क्यों, मरदाना कमजोरी, भगन्दर, बवासीर. और इन सभी का इलाज करते है हकीम नुरानी, सिकंदरे आज़म. अब लगभग सभी अखबारों में इनकी भरमार है. आज कल सुर्ख़ियों में है जापानी लिंग वर्धक यन्त्र. इन विज्ञापनों के बाद मुझे नहीं लगता कि डिग्री धारी डाक्टरों की कोई जरूरत है. हिन्दुस्तान के वर्गीकृत विज्ञापन के नीचे पढ़ा कि खोया-पाया विज्ञापनों के साथ एफआइआर की कापी और नाम परिवर्तन के साथ ऐफीडेविट अनिवार्य है. पर लिंग वर्धक यन्त्र के विज्ञापन के प्रकाशन में कहीं कोई शर्त नहीं है. यह क्या बात हुई!

ललितपुर से पत्रकार मनीष चतुर्वेदी की रिपोर्ट

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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