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पत्रकारिता की काली कोठरी से (12)

Alok Nandanयाद आता रहा रूसो

बहुत जल्द ही जम्मू के गली कूचों से मेरी पहचान हो गई। मेरे जम्मू पहुंचने के कुछ दिन बाद शेखर भी जालंधर से जम्मू भेजा गया। राजेन्द्र तिवारी ने उन्हें डेस्क पर लगा दिया। दिन में वे खाली रहते इसलिए मैं रिपोर्टिंग पर निकलता तो वे मेरे साथ हो लेते। जम्मू के जलशोधन संयत्र को देखने के इरादे से एक दिन सुबह मैं उन्हें साथ लेकर निकल पड़ा। वे अक्सर मुझे समझाते थे कि आप पर दिल्ली का हैंगओवर है।

Alok Nandanयाद आता रहा रूसो

बहुत जल्द ही जम्मू के गली कूचों से मेरी पहचान हो गई। मेरे जम्मू पहुंचने के कुछ दिन बाद शेखर भी जालंधर से जम्मू भेजा गया। राजेन्द्र तिवारी ने उन्हें डेस्क पर लगा दिया। दिन में वे खाली रहते इसलिए मैं रिपोर्टिंग पर निकलता तो वे मेरे साथ हो लेते। जम्मू के जलशोधन संयत्र को देखने के इरादे से एक दिन सुबह मैं उन्हें साथ लेकर निकल पड़ा। वे अक्सर मुझे समझाते थे कि आप पर दिल्ली का हैंगओवर है।

छोटे शहरों में रिपोर्टिंग करने के तरीके कुछ और होते हैं। यहां पर आपको बीट के ग्रामर के अनुसार ही चलना होगा।  जम्मू शहर में पानी की सप्लाई तवी नदी से होती थी। तवी नदी से पानी निकालकर उसे एक विशेष प्रक्रिया के तहत साफ किया जाता था। उसके बाद उसे एक बड़ी टंकी में स्टोर किया जाता था। तवी नदी में जमकर डुबकी लगाने के बाद हम लोग संयत्र देखने पहुंचे। तवी से पानी निकाल कर उन्हें साफ करने के बाद जल बोर्ड वालों ने टंकी को खुला छोड़ रखा था। उस साफ पानी में सैंकड़ों बंदर डुबकियां लगा रहे थे। यह बात मुझे कुछ हजम नहीं हुई। वापस आफस आने के बाद मैंने खबर बनाई कि पूरा जम्मू बंदरों का पेशाब पी रहा है। तीन कॉलम में जब यह खबर अमर उजाला में छपी तो जम्मू के लोगों ने मुझे हाथोंहाथ लिया। मेरे नाम से दिन भर आफिस के फोन घनघनाते रहे। मेरे नेटर्वक का रातोंरात तेजी से विकास हो गया। मेरे पास खबरों का अकाल नहीं था। चारो तरफ से खबरे खुद दौड़-दौड़ कर मेरे पास आ रही थी, लेकिन इन खबरों में मेरी कोई रुचि न होती थी। मैं जिस उद्देश्य के लिए यहां आया था, वह उद्देश्य कहीं पीछे छूटता जा रहा था।

मैं आतंकवाद पर काम करने वाले लोगों के नेटवर्क से जुड़ना चाह रहा था, ताकि कश्मीर समस्या पर अपना एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण बना सकूं। जम्मू की नालियों  और गलियों में मगजमारी करने से यह संभव नहीं था। आतंकवाद की खबरों को नवीन नवाज देख रहा था। इस पर उसकी अच्छी पकड़ थी। एक दिन जम्मू के एक इलाके में मुठभेड़ में दो आतंकियों के मरने की सूचना उसके पास आई। दोनों व्यक्तियों को जम्मू के एक कब्रगाह में दफनाने की तैयारी चल रही थी। उसे स्कूटर चलाना नहीं आता था। उसके कहने पर मैं उसके साथ हो लिया। मैं स्कूटर चला रहा था और वह पीछे बैठा था। भीड़ भरे रास्ते से होकर गुजरते हुये हम लोग उस कब्रगाह तक पहुंचे जहां दोनों के शव रखे थे। लोग कब्रगाह के चारो ओर बहुत बड़ी संख्या में फैले थे। पुलिस और सेना के जवानों का कहीं कोई अता-पता न था। लोगों के बीच एक अजीब सी खामोशी छाई थी। नवीन नवाज ने मुझे अपनी जुबान पूरी तरह बंद रखने की सलाह दी। करीब आधे घंटे बाद शव को कब्र में दफनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। वहां पर मौजूद सभी लोगों ने एक-एक मुठ्ठी मिट्टी कब्र में डाले। मिट्टी डालने वालों में नवीन नवाज भी शामिल थे। पहली बार उस कब्रगाह में इस्लाम की आध्यात्मिक शक्ति को व्यावहारिक स्तर पर नजदीक से देखने और समझने का अवसर मिला। मरे व्यक्ति के कब्र पर एक मुठ्ठी मिट्टी डालने के इस रिवाज की गहराई को मैं महसूस कर सकता था। इस्लाम की एकता को बड़ी बारीकी से इन्हीं रिवाजों से बुना गया था। जेहाद के नाम पर इन रिवाजों का इस्तेमाल बड़ी सहजता से इस्लाम का कोई भी जानकार कर सकता था। उस कब्रगाह में इस्लाम की शक्ति की बुनावट को मैं स्पष्ट रूप से देख सकता था। 

धीरे-धीरे नवीन नवाज के काम करने के तरीके का मैं कायल हो गया था। जम्मू से लेकर कश्मीर तक घटने वाली हर आतंकी घटना पर उसकी पैनी नजर होती थी। अपनी खबरों के लिए वह सेना के सोर्स का ज्यादा इस्तेमाल करता था। इसके अलावा कश्मीर से निकलने वाले छोटे-बड़े अखबारों में काम करने वाले लोगों से भी उसके अच्छे संपर्क थे। मैं अपने तरीके से पूरे राज्य में चलने वाली आतंकी गतिविधियों के लिंक को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। मेरी नजर जम्मू-कश्मीर में सक्रिय दुनियाभर की खुफिया इंटेलिजेंसिया पर थी। इसी समय एक ऐसी घटना घटी जिसके कारण इस इंटेलिजेंसिया के नेटर्वक से मैं सीधे तौर पर जुड़ गया।  उस दिन मैं हमेशा की तरह जम्मू अस्पताल में भटक रहा था। अस्पताल के अधिकतर लोगों से मेरी जान पहचान हो चुकी थी। वहां पर तैनात पुलिस के लोगों के बीच भी मेरी अच्छी पैठ बन गई थी। एक इंस्पेक्टर ने मुझ अपने साथ चाय पीना का न्योता दिया। साथ ही एक बड़ी खबर देने का वादा किया। खबर की लालच में मैं उसके साथ बैठ गया। वह करीब दो घंटे तक इधर-उधर की बात करते हुये मुझे अपने साथ बिठाये रखा। साथ ही वह कहता जा रहा था कि वह मुझे एक बड़ी खबर देगा और जरूर देगा। उसकी बातों से उबकर जब मैं वहां से जाने लगा तो उसने बताया कि दूर घाटी में एक सवारी बस ने पलटी मार दी है। सेना के जवान हेलीकॉप्टर से लोगों को निकालने में लगे हैं। बचे-खुचे और मरे लोगों को सीधे जम्मू हॉस्पिटल लाया जा रहा है। यह खबर किसी के पास नहीं है। थोड़ी देर इंतजार कर लो। वो लोग पहुंचने ही वाले हैं। मैं वहीं पर बैठकर बड़ी बेसब्री से उनका इंतजार करने लगा।

करीब 15 मिनट बाद खून से लथपथ लोगों से भरी हुई सैनिकों की तीन लॉरियों अस्पताल परिसर में दाखिल हुई। उनके आते ही अस्पताल में अफरातफरी मच गई। खून से सने हुये इन लोगों को उतारकर अंदर ऑपरेशन थियेटर में लाया जा रहा था। मैंने जब ऑपरेशन थियेटर में दाखिल होने की कोशिश की तो वहां पर मौजूद कुछ डॉक्टरों ने मुझे रोक दिया। मैंने उन्हें बताया कि मैं भी एक डॉक्टर हूं और इन्हीं लोगों के साथ आया हूं। उन लोगों ने मुझे तत्काल अंदर ले लिया। डॉक्टर लोग एक-एक करके मरीजों को चेक कर रहे थे। ऑपरेशन थियेटर में चारों ओर लोग कराह रहे थे। कराह रहे लोगों से मैं उनके नाम और पते पूछ रहा था। मरे हुए लोगों की जेबें तलाश करके उनके नाम और पते मालूम करने की कोशिश कर रहा था। बस ने कैसे पलटी मारी, इस संबंध में भी उनके बयान दर्ज कर रहा था।  उस भयावह स्थिति में मेरी यही कोशिश थी कि इन लोगों के सही नाम और पते मैं हासिल कर लूं ताकि इन लोगों के परिवारों तक इनकी सूचना पहुंच जाये। मेरे आंखों के सामने कुल सोलह लोगों की सांसें बंद हुई थीं। सत्रह लोग पहले से ही मर चुके थे। उनकी जेबों को टटोलने के बाद जो नंबर और पते मिले थे, उन पर संपर्क करने के लिये जब मैं बाहर निकला तो वहां पर जम्मू की सारी मीडिया मौजूद थी। बाहर बूथ से एक-एक नंबर डायल करके मैंने उनके परिवार वालों से संपर्क साधा। करीब आधे घंटे के बाद डॉक्टर और पुलिस वाले भी मरने वालों की सूची तैयार करने में लगे हुये थे। उन लोगों की सूची में 30 लोग शामिल थे। उनके पास किसी का नाम-पता नहीं था। इन लोगों का नाम और पता जानने के लिए उन लोगों ने मुझसे संपर्क किया। अलग कमरे में कुछ पुलिस अधिकारियों के साथ बैठकर मैंने सबके नाम और पते लिखवाये। इसके बाद मरने वालों के नाम और पते के लिए इंटेलिजेंसिया के कुछ लोगों ने मुझसे संपर्क किया। मेरे द्वारा दी गई सूची को पुलिसवालों ने मानक मानते हुये उसे मीडिया के हवाले कर दिया। उस दिन के लिए मेरे पास पर्याप्त खबरें थीं, अत: काफी देर तक इंटेलिजेंसिया के लोगों के साथ बैठकर बातचीत करता रहा। मेरे काम करने के ढंग पर वे लोग फिदा थे और एक तरह से उन लोगों ने अपने नेटर्वक में मुझे उसी दिन शामिल कर लिया था।

रात में आकर जैसे ही मैं अपने कंप्यूटर पर खबर लिखने बैठा, राजेन्द्र तिवारी मेरे सिर के ऊपर आकर खड़ा हो गये और पूछा कि आप कौन सी खबर लिखने जा रहे हैं। मैंने कहा कि बस पलटी के बाद अस्पताल में जो कुछ हुआ, उसका मैं प्रत्यक्षदर्शी हूं। स्वाभाविक है, इसी पर खबर लिखूंगा। उन्होंने छूटते ही कहा, ‘यह आपका बीट नहीं है। इस खबर को क्राइम रिपोर्टर लिखेगा। आप रहने दीजिये। कोई और खबर हो तो लिखिये।’ बीट संस्कृति के वाहक राजेंद्र तिवारी के ये शब्द सुनकर मैं हतप्रभ था। करीब तीन दर्जन लोग मेरी आंखों के सामने मरे थे और राजेंद्र  तिवारी कह रहे थे कि इन लोगों की दास्तान को मैं सिर्फ इसलिए नहीं लिखूं क्योंकि यह मेरा बीट नहीं थी। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि इस आदमी के लिए खबर महत्पूर्ण है या बीट-व्यवस्था। अपने गुस्से पर काबू पाते हुये मैंने दो गिलास ठंडा पानी पीया और बैठकर कंप्यूटर के स्क्रीन को निहारने लगा। एक साथ सैकड़ों सवाल मेरे दिमाग में कौंध रहे थे। बीट के झमेले में खबर को रेड़ लगाने का औचित्य मेरी समझ के परे था। बीट संस्कृति पत्रकारिता के आड़े आ रही थी और मैं इसे स्पष्ट रूप से देख सकता था। बीट संस्कृति को बेहतर पत्रकारिता के लिए समृद्ध किया गया था, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन पत्रकारिता में लकीर के फकीर बने राजेन्द्र  तिवारी को यह बात मैं उस वक्त समझाने की स्थिति में नहीं था। उस वक्त उनसे गलथेथरी करने का कई औचित्य भी नहीं था।

करीब एक घंटे के बाद क्राइम रिपोर्टर तरुण मरने वाले लोगों की उसी सूची के साथ ऑफिस में दाखिल हुआ, जो मैंने जम्मू अस्पताल के प्रबंधकों और पुलिसवालों को बनाकर दिया था। इस सूची की नकल करने के अलावा उसके पास और कुछ भी नहीं था। उसी सूची के आधार पर तरुण ने खबर बनाया और उसी खबर को राजेन्द्र  तिवारी ने आगे भेज दिया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वालों की मेहरबानी से यह खबर तब तक पूरे देशभर में फैल चुकी थी। तरुण की मरी-सी खबर देखकर अमर उजाला के अग्रणी पंक्ति के अधिकारी लोग राजेन्द्र तिवारी से इस बस पलटी पर और खबर मांगने लगे। राजेन्द्र तिवारी दौड़े हुये मेरे पास आये और बोले कि आप इस पर अपना आंखों देखा हाल लिख दें। मैंने सपाट शब्दों में कहा, यह मेरा बीट नहीं है। इच्छा तो यही हो रही थी कि इस खबर को न लिखूं, लेकिन इस खबर को मैं जी चुका था, और मेरे अंदर का स्वाभाविक पत्रकार इसे लिखने के लिए बौखला रहा था। बिजली की गति से मेरे हाथ कंप्युटर के की-बोर्ड पर चलने लगे। और देखते ही देखते मैंने विभिन्न एंगल से तीन बड़ी खबरें बना दी। मेरी सभी खबरों को अमर उजाला ने लगभग सभी संस्करणों में छापा था। जम्मू में दुनियाभर की इंटेलिजेंसिया के लोग सक्रिय थे और उन लोगों के बीच मेरी पैठ दिन प्रतिदिन गहरी होती जा रही थी। विभिन्न मुल्कों के तमाम फील्ड ऑफिसर इस बात को स्पष्टरूप से मानते थे कि जम्मू-कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में भारतीय सैनिक अघोषित युद्ध की स्थिति में सांस ले रहे हैं। घने, उबड़-खाबड़ जंगलों में छापामार टुकड़ियों से कब और कहां पर इनका सामना हो जाये, ये खुद नहीं जानते थे। वहां पर भारतीय सेना के साथ दो-दो हाथ करने वाले युवकों को विधिवत सैनिक प्रशिक्षण दिया गया था। भारतीय सैनिकों की तरह उन्हें भी विधिवत वेतन और सारी सुविधायें मुहैया कराई जाती थी। मुठभेड़ में मारे जाने के बाद उन्हें शहीद का दर्जा दिया जाता था ताकि नई पौध को इस रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया जाता रहे। उनकी ओर से यह पूरी तरह से संगठित युद्ध था। पाकिस्तान की सीमा से सटे स्थानीय लोगों की सहानुभूति भी उन्हीं लोगों के प्रति थी, जो स्वतंत्र कश्मीर की मांग कर रहे थे। वहां के लोग कश्मीर की स्वतंत्रता के सपने तो जरूर देख रहे थे, लेकिन पाकिस्तान में विलय के पक्ष में नहीं थे। युवाओं को सैनिक के तौर पर रोजगार और सम्मान दोनों मिल रहा था। 

कश्मीर और उसके ईद-गिर्द के इलाके में जारी हिंसा और प्रतिहिंसा का सीधा असर जम्मू पर पड़ रहा था। जम्मू में डोगरों की संख्या अधिक थी और अपनी प्राचीन गाथा से वे लोग बेहद प्यार करते थे। कश्मीर से पलायन करने वाले पंडित जम्मू में तेजी से बसते जा रहे थे, जो डोगरों को पसंद नहीं था। डोगरा समुदाय के कई प्रभुत्वशाली लोगों के इनर सर्किल में मैं शामिल हो गया था, जो विभिन्न मुल्कों की इंटेलिजेंसिया के लिए काम करते थे। ये लोग कश्मीर से पलायन करने वाले लोगों की बाढ़ को रोकने के पक्ष में थे। जम्मू में आकर बसे पलायित लोगों को डोगरे हिकारत की नजर से देखते थे। इन पलायित कश्मीरी पंडितों पर चर्चा के दौरान उनके चेहरे पर नफरत की लकीरें मैं स्पष्टतौर पर पढ़ सकता था। इंटेलिजेंसिया के लोगों की बाते सुन-सुनकर मेरी इच्छा अंदर घाटी में जाने की हो रही थी, लेकिन मैं अमर उजाला की प्रशासनिक व्यवस्था की जंजीरों में बुरी तरह से जकड़ा हुआ था। ऐसे मौकों पर रुसो की यह उक्ति मुझे बार-बार याद आती थी, ‘आदमी स्वतंत्र जन्म लिया है, लेकिन सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा हुआ है।’  


पत्रकार आलोक नंदन इन दिनों मुंबई में हैं और हिंदी सिनेमा के लिए सक्रिय हैं। वे मीडिया के दिनों के अपने अनुभव को धाराविहक रूप में पेश कर रहे हैं। पीछे के पार्ट को पढ़ने के लिए भाग (1),  (2), (3)(4), (5), (6), (7), (8), (9), (10), (11) पर क्लिक कर सकते हैं। 13वां पार्ट अगले रविवार को पढ़ें।

आलोक से संपर्क [email protected] से किया जा सकता है।

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