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राजनीति और पत्रकारिता के ब्राह्मणवादी

पत्रकारों को भेजा गया न्योता

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को बदले जाने के लिए ब्राम्हण पत्रकारों ने लाबिंग शुरू कर दी हैं. इंदौर के पैसे से भोपाल में पत्रकारों के लिए एक भोज रखा गया था. भोज तो दरसल एक बहाना था. इंदौर के एक बीजेपी नेता ने इस सब को प्रयोजित किया और ब्राम्हण पत्रकारों को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए ब्राम्हण मुख्यमंत्री को वक्त की जरूरत बताया. हलांकि इस आयोजन के जरिये एक तीर से दों निशाने साधने की कोशिश की गयी है. एक तो ब्राम्हण मंत्रियों को इसके जरिये सीएम शिवराज सिंह से लड़वाने की कोशिश है और दूसरा अगर यह लडाई शुरू होती है तो इसका सीधा लाभ इंदौर को दिलवाया जाये और मालवा के दमदार नेता कैलाश विजयवर्गीय को मुख्यमंत्री बनवाया जाये. इस सब जोर गणित के पीछे ब्राम्हण पत्रकारों को मोहरा बनाया जा रहा है.

पत्रकारों को भेजा गया न्योता

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को बदले जाने के लिए ब्राम्हण पत्रकारों ने लाबिंग शुरू कर दी हैं. इंदौर के पैसे से भोपाल में पत्रकारों के लिए एक भोज रखा गया था. भोज तो दरसल एक बहाना था. इंदौर के एक बीजेपी नेता ने इस सब को प्रयोजित किया और ब्राम्हण पत्रकारों को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए ब्राम्हण मुख्यमंत्री को वक्त की जरूरत बताया. हलांकि इस आयोजन के जरिये एक तीर से दों निशाने साधने की कोशिश की गयी है. एक तो ब्राम्हण मंत्रियों को इसके जरिये सीएम शिवराज सिंह से लड़वाने की कोशिश है और दूसरा अगर यह लडाई शुरू होती है तो इसका सीधा लाभ इंदौर को दिलवाया जाये और मालवा के दमदार नेता कैलाश विजयवर्गीय को मुख्यमंत्री बनवाया जाये. इस सब जोर गणित के पीछे ब्राम्हण पत्रकारों को मोहरा बनाया जा रहा है.

गरीब गुरबे पत्रकार अपने ही बीच के कुछ दल्ले नुमा पत्रकारों की चाल को भोज करने के बाद ही समझ पाए. भोज में शामिल अधिकांश पत्रकार भोज कर वापस हो लिए क्यूंकि इस आयोजन में जो चहरे सामने आये उनमे कुछ घोषित दलाल, कुछ घोषित शराबी और कुछ घोषित स्त्रीलोलुप पत्रकार थे. इनमे वे लोग भी शामिल हैं, जिनके दामन पर अमानत में खयानत और लड़कीबाजी तक के दाग लगे हैं. इस भोज में गए पत्रकार सुरेश शर्मा ने बताया कि मुझे तो इनका एजेंडा तक नहीं पता था. मुझे तो अचानक भाषण देने को खड़ा कर दिया गया. इसका औचित्य क्या था, मुझे तो यह तक नहीं पता था.

ब्राम्हण भोज के लिए लाखों रूपये एक इन्दौरी दलाल ने दिए थे. उनका मकसद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के खिलाफ ब्राम्हण पत्रकारों को एकजुट करना और इस बात को फैलाना था कि शिवराज के सामने ब्राम्हण मंत्री अनूप मिश्रा, गोपाल भार्गव और लक्ष्मीकांत शर्मा अब एक चुनौती हैं लेकिन इस आयोजन में बिचौलिये और कुछ चरित्रहीन ब्राम्हण पत्रकारों के सामने आने से यह शो फ्लॉप हो गया. अच्छी संख्या के बावजूद सभी ब्राम्हण पत्रकारों को एक राए नहीं किया जा सका. इसमें शामिल दो पत्रकारों को लाल बत्ती चाहिए थी तो आठ को सरकारी फिल्म के टेंडर तो बाकि को सप्लाई ऑडर चाहिए थे. सबके अपने-अपने एजेंडे थे. इनमे से २७ लोग ऐसे थे जो पत्रकार बिरादरी में सिर्फ काले काम को छुपाने के लिए हैं.

एक ऐसा था जिसके चेहरे पर उसके काले कारनामों की कालिख साफ़ नज़र आती हैं. इनमे कुछ अपने कारनामों से इतने बदनाम हो चुके हैं कि वे ऐसे आयोजन के जरिये अपने अस्तित्व को तलाश रहे हैं. इनमे से कुछ की चिंता यह थी कि उनकी सरकारी नौकरी वाली बीवियों के तबादले न हों और अगर हो गया है तो उसे कैसे रुकवाया जाये. ब्राम्हण पत्रकारों की एकता के नाम पर हुए इस आयोजन से तमाम सारे उन पत्रकारों ने दूरी भी बनाये रखी जो सिर्फ पत्रकारिता में यकीन रखते हैं. इंदौरी अंदाज में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के खिलाफ मोर्चा खोलने के इस अभियान की वैसे तो अपने आप ही हवा निकल गयी क्यूंकि २७ लोग मिलकर क्या खिचड़ी पका रहे हैं, यह बाकी पत्रकारों की समझ में आ गया.

कार्यक्रम में शामिल मनोज मिश्रा ने कहा कि “दलालों और चरित्रहीनों के रहते ऐसा कोई आयोजन सफल नहीं हो सकता क्यूंकि पत्रकारिता किसी जाति विशेष से जुड़ा मसला नहीं हैं. हम सारे समाज के हैं, सिर्फ ब्राम्हणों के नहीं. जो लोग भी इस आयोजन के पीछे हैं वे भी समझ लें कि पहले पत्रकार को पत्रकार बन जाने दो, फिर उसे ब्राम्हण और राजपूत या दीगर जात में बाँटना. वैसे भी उस आयोजन में जो लोग सामने थे, उनके लक्षण ब्राम्हणों वाले थे नहीं. कुछ की काम वासनायें उनके चेहरे पर थी तो कुछ सुबह से ही दारु पी कर चले आये थे.

इस आयोजन से उम्मीद थी कि सारे ब्राम्हण कलमघिस्सू एक हो कर राजनीति में बदलाव की नई इबारत लिखेंगे लेकिन हुआ ठीक उसका उल्टा. इनमे जिन चेहेरों को सामने लाया गया उनके कारनामों से ब्राम्हण जाति और पत्रकारिता दोनों शर्मसार हुई. सो अधिकांश ब्राम्हण पत्रकारों ने भोज किया और अपने-अपने घर खिसक लिए. आयोजन स्थल पर जो लोग बचे थे, वे सोंचे, वे क्या वाकई पत्रकार हैं और क्या सिर्फ पत्रकारिता कर रहे हैं या इसकी आड़ में उनकी मंशा कुछ और है.


बीएस मीणा के मीडिया हाउस ब्लाग से साभार

 

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