इस एक आरोप ने मेरा सब कुछ छीन लिया : अविनाश

भोपाल में पत्रकारिता की छात्रा से छेड़छाड़ और दुर्व्यवहार के आरोप में संपादक की कुर्सी गंवाने वाले पत्रकार और ब्लागर अविनाश दास ने अपना पक्ष रखते हुए एक मेल भड़ास4मीडिया के पास भेजा है। मेल की शुरुआत में अविनाश ने लिखा है- ‘मुझ पर जो अशोभनीय लांछन लगे हैं, ये उनका जवाब नहीं है। इसलिए नहीं है, क्‍योंकि कोई जवाब चाह ही नहीं रहा है। दुख की कुछ क़तरने हैं, जिन्‍हें मैं अपने कुछ दोस्‍तों की सलाह पर आपके सामने रख रहा हूं – बस।’ अविनाश ने जो कुछ लिखा है, उससे चार चीजें स्पष्ट हो रही हैं- एक, वे खुद को निर्दोष बता रहे हैं, दो- भास्कर से उनकी नौकरी जा चुकी है, तीन- उन्हें सब कुछ फिर से शून्य से शुरू करना होगा, चार- अपना पक्ष रखकर अपनी छवि बचाने की कोशिश में जुट गए हैं। अविनाश के मेल को यहां हू ब हू प्रकाशित किया जा रहा है-

मैं शून्‍य की सतह पर खड़ा हूं और मुझे सब कुछ अब ज़ीरो से शुरू करना होगा

Avinash Dasमैं दुखी हूं। दुख का रिश्‍ता उन फफोलों से है, जो आपके मन में चाहे-अनचाहे उग आते हैं। इस वक्‍त सिर्फ मैं ये कह सकता हूं कि मैं निर्दोष हूं या सिर्फ वो लड़की, जिसने मुझ पर इतने संगीन आरोप लगाये। कठघरे में मैं हूं, इसलिए मेरे लिए ये कहना ज्‍यादा आसान होगा कि आरोप लगाने वाली लड़की के बारे में जितनी तफसील हमारे सामने है – वह उसे मोहरा साबित करते हैं और पारंपरिक शब्‍दावली में चरित्रहीन भी। लेकिन मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं और अभी भी पीड़‍िता की मन:स्थिति को समझने की कोशिश कर रहा हूं।

मैं दोषी हूं, तो मुझे सलाखों के पीछे होना चाहिए। पीट पीट कर मुझसे सच उगलवाया जाना चाहिए। या लड़की के आरोपों से मिलान करते हुए मुझसे क्रॉस क्‍वेश्‍चन किये जाने चाहिए। या फिर मेरी दलील के आधार पर उसके आरोपों की सच्‍चाई परखनी चाहिए। लेकिन अब किसी को कुछ नहीं चाहिए। पी‍ड़‍िता को बस इतने भर से इंसाफ़ मिल गया कि डीबी स्‍टार का संपादन मेरे हाथों से निकल जाए।

दुख इस बात का है कि अभी तक इस मामले में मुझे किसी ने भी तलब नहीं किया। न मुझसे कुछ भी पूछने की जरूरत समझी गयी। एक आरोप, जो हवा में उड़ रहा था और जिसकी चर्चा मेरे आस-पड़ोस के माहौल में घुली हुई थी – जिसकी भनक मिलने पर मैंने अपने प्रबंधन से इस बारे में बात करनी चाही। मैंने समय मांगा और जब मैंने अपनी बात रखी, वे मेरी मदद करने में अपनी असमर्थता जाहिर कर रहे थे। बल्कि ऐसी मन:स्थिति में मेरे काम पर असर पड़ने की बात छेड़ने पर मुझे छुट्टी पर जाने के लिए कह दिया गया। खैर, इस पूरे मामले में जिस कथित क‍मेटी और उसकी जांच रिपोर्ट की चर्चा आ रही है, उस कमेटी तक ने मुझसे मिलने की ज़हमत नहीं उठायी।

मैं बेचैन हूं। आरोप इतना बड़ा है कि इस वक्‍त मन में हजारों किस्‍म के बवंडर उमड़ रहे हैं। लेकिन मेरे साथ मुझको जानने वाले जिस तरह से खड़े हैं, वे मुझे किसी भी आत्‍मघाती कदम से अब तक रोके हुए हैं। एक ब्‍लॉग पर विष्‍णु बैरागी ने लिखा, ‘इस कि‍स्‍से के पीछे ‘पैसा और पावर’ हो तो कोई ताज्‍जुब नहीं…’, और इसी किस्‍म के ढाढ़स बंधाने वाले फोन कॉल्‍स मेरा संबल, मेरी ताक़त बने हुए हैं।

मैं जानता हूं, इस एक आरोप ने मेरा सब कुछ छीन लिया है – मुझसे मेरा सारा आत्‍मविश्‍वास। साथ ही कपटपूर्ण वातावरण और हर मुश्किल में अब तक बचायी हुई वो निश्‍छलता भी, जिसकी वजह से बिना कुछ सोचे हुए एक बीमार लड़की को छोड़ने मैं उसके घर तक चला गया। मैं शून्‍य की सतह पर खड़ा हूं और मुझे सब कुछ अब ज़ीरो से शुरू करना होगा। मेरी परीक्षा अब इसी में है कि अब तक के सफ़र और कथित क़ामयाबी से इकट्ठा हुए अहंकार को उतार कर मैं कैसे अपना नया सफ़र शुरू करूं। जिसको आरोपों का एक झोंका तिनके की तरह उड़ा दे, उसकी औक़ात कुछ भी नहीं। कुछ नहीं होने के इस एहसास से सफ़र की शुरुआत ज़्यादा आसान समझी जाती है। लेकिन मैं जानता हूं कि मेरा नया सफ़र कितना कठिन होगा।

एक नारीवादी होने के नाते मेरी सहानुभूति मेरे आलोचकों के साथ है – इस वक्‍त मैं यही कह सकता हूं।

-अविनाश दास

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *