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सम्मान

‘भरा हवै गन्दा पानी, नही बनै देत नाला’

‘पशु अस्पताल मा लाग हवै ताला’ : खबर लहरिया की ताकत को दुनिया ने पहचाना : यूपी के बदहाल बुंदेलखंड इलाके के अखबार ‘खबर लहरिया’ ने बाजार के हाथों बिक चुकी पत्रकारिता को न सिर्फ आइना दिखाया है बल्कि यह साबित भी किया है कि अंधेरा चाहे जितना हो जाए, उजाले पैदा करने का माद्दा रखने वाले लोग हर दौर में जिंदा रहते हैं। यूनेस्को द्वारा साक्षरता सम्मान के लिए चुने जाने के बाद साप्ताहिक अखबार खबर लहरिया की चर्चा भले आज हर ओर होने लगी है, लेकिन इस कोशिश को शुरुआत में हर तरफ से नकारा ही गया। इस अखबार को इलाके की बेहद गरीब, आदिवासी और कम-पढ़ी लिखी महिलाओं की मदद से निकाला जा रहा है।

‘पशु अस्पताल मा लाग हवै ताला’ : खबर लहरिया की ताकत को दुनिया ने पहचाना : यूपी के बदहाल बुंदेलखंड इलाके के अखबार ‘खबर लहरिया’ ने बाजार के हाथों बिक चुकी पत्रकारिता को न सिर्फ आइना दिखाया है बल्कि यह साबित भी किया है कि अंधेरा चाहे जितना हो जाए, उजाले पैदा करने का माद्दा रखने वाले लोग हर दौर में जिंदा रहते हैं। यूनेस्को द्वारा साक्षरता सम्मान के लिए चुने जाने के बाद साप्ताहिक अखबार खबर लहरिया की चर्चा भले आज हर ओर होने लगी है, लेकिन इस कोशिश को शुरुआत में हर तरफ से नकारा ही गया। इस अखबार को इलाके की बेहद गरीब, आदिवासी और कम-पढ़ी लिखी महिलाओं की मदद से निकाला जा रहा है।

'खबर लहरिया' का फ्रंट पेजइस अखबार की संपादक मीरा कहती हैं कि यह अखबार बुंदेलखंड की आदिवासी कोल महिलाओं में शिक्षा की भूख जगाने में मदद कर रहा है।  इस अखबार में संपादन और समाचार का पूरा काम महिलाएं करती हैं। अखबार बांटने के काम में पुरुष हॉकर मदद करते हैं। ग्रामीण महिलाओं के इस अखबार में काम करने के लिए कम से कम आठवीं कक्षा पास होना जरूरी है, लेकिन नवसाक्षर भी जुड़ सकते हैं। मीरा ने बताया कि अखबार में सभी तरह की खबरें होती हैं लेकिन पंचायत, महिला सशक्तीकरण, ग्रामीण विकास की खबरों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। समाचार स्थानीय बुंदेली बोली में और बड़े अक्षरों में छापे जाते हैं ताकि नवसाक्षर महिलाएं आसानी से पढ़ सकें। राजनीति शास्त्र से मास्टर डिग्री ले चुकीं मीरा ने कहा कि संवाददाता के रूप में गांव की गरीब महिलाओं के जुड़ने का उनके परिवार व समाज के लोग ही विरोध करते हैं। लेकिन अब यह कम हो गया है। यह अखबार बुंदेलखंडी बोली में चित्रकूट से आठ वर्षो से और बांदा से तीन वर्षो से प्रकाशित किया जा रहा है। स्वयंसेवी संस्था निरंतर के प्रयासों के कारण यह अखबार अपना व्यवस्थित वजूद बनाने में कामयाब हुआ है। दो रुपये मूल्य वाले इस अखबार की प्रसार संख्या 4500 और पाठक संख्या 20000 के करीब है। खबर लहरिया सहित चार पाक्षिक समाचार पत्रों को आठ सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर पेरिस में वर्ष 2009 के किंग सिजोंग साक्षरता पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। इसके तहत प्रत्येक पुरस्कार विजेता को 20,000 डॉलर की राशि दी जाती है। दक्षिण कोरिया ने यूनेस्को में किंग सिजोंग साक्षरता पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 1989 में की थी।  संयुक्त राष्ट्र द्वारा साक्षरता पुरस्कार के लिए चुने जाने से उत्साहित देश के ग्रामीण इलाके से पूरी तरह महिलाओं द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र ‘खबर लहरिया’ अब देश के अन्य हिस्सों में भी अपने विस्तार की योजना बना रहा है। इस समाचार पत्र की शुरुआत नई दिल्ली और उत्तर प्रदेश में काम करने वाली एक संस्था ‘निरंतर’ ने 2002 में की थी। उत्तर प्रदेश के खबर लहरिया का एक पाठकचित्रकूट और बांदा जिले में ‘खबर लहरिया’ महिलाओं को पत्रकारिता का भी प्रशिक्षण देता है।

सम्मान से उत्साहित एनजीओ ‘निरंतर’ से जुड़ीं शालिनी जोशी ने कहा, “यह पुरस्कार हमारे काम को प्रामाणित करता है। यह हमारी विश्वसनीयता को प्रामाणित करता है। अब हम बिहार के तीन जिलों से भी ‘खबर लहरिया’ के प्रकाशन की योजना बना रहे हैं। ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण का विचार अब फैल रहा है। इस समाचार पत्र में 15 महिलाएं काम करती हैं। इन महिलाओं को निरंतर ने पत्रकार के रूप में प्रशिक्षित किया है। इसके मुख्य दल में पांच महिलाएं शामिल हैं।  अब इस समाचार पत्र के लिए हमारे पास युवा संवाददाता हैं।”


‘खबर लहरिया’ अखबार के अन्य पेज पढ़ने के लिए और निरंतर संस्था के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं- Nirantar – a centre for gender and education

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