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दुख-दर्द

तमाशा देखते रहो, दिखाते रहो

मीडिया की मौजूदगी में निर्वस्त्र की गई लड़की, मीडियाकर्मी खबर बनाते रहे : संवेदनशीलता और जुझारूपन के लिए विख्यात बिहार में 24 जुलाई 2009 को एक पल ऐसा आया जिसने लोक, तंत्र और मीडिया, तीनों की पोल खोल दी। राजधानी के व्यस्तम सड़क एक्जीविशन रोड पर एक महिला को एक युवक ने सबके सामने निर्वस्त्र कर दिया। लोग तमाशा देखने की मुद्रा में खड़े रहे। दांतें निपोरते रहे।  दो-तीन फलांग पर मौजूद पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। मीडिया वाले खबर बनाते रहे। अगले दिन अखबार इस घटना के तस्वीरों व विवरण से पटे थे। एक अखबार ने शीर्षक दिया ‘पटना हमें माफ करो‘,  दूसरे ने लिखा ‘शर्मसार : एक्जीविशन रोड पर निर्वस्त्र की गयी युवती‘, तीसरे ने ‘लड़की को किया निर्वस्त्र‘ लिखा। ज्यादा से ज्यादा दिखाने-बताने की होड़ में एक अखबार ने लड़की के चेहरे को प्रकाशित कर दिया। निर्वस्त्र वाली तस्वीर छाप दी। एक अन्य अखबार ने लड़की के मूल नाम और पहचान को प्रकाशित कर दिया। ज्यादातर अखबारों और टीवी चैनलों ने इस ‘घटना’ को ‘सनसनीखेज’ बनाकर अपने पाठकों-दर्शकों को ‘जमकर’ बेचा।

मीडिया की मौजूदगी में निर्वस्त्र की गई लड़की, मीडियाकर्मी खबर बनाते रहे : संवेदनशीलता और जुझारूपन के लिए विख्यात बिहार में 24 जुलाई 2009 को एक पल ऐसा आया जिसने लोक, तंत्र और मीडिया, तीनों की पोल खोल दी। राजधानी के व्यस्तम सड़क एक्जीविशन रोड पर एक महिला को एक युवक ने सबके सामने निर्वस्त्र कर दिया। लोग तमाशा देखने की मुद्रा में खड़े रहे। दांतें निपोरते रहे।  दो-तीन फलांग पर मौजूद पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। मीडिया वाले खबर बनाते रहे। अगले दिन अखबार इस घटना के तस्वीरों व विवरण से पटे थे। एक अखबार ने शीर्षक दिया ‘पटना हमें माफ करो‘,  दूसरे ने लिखा ‘शर्मसार : एक्जीविशन रोड पर निर्वस्त्र की गयी युवती‘, तीसरे ने ‘लड़की को किया निर्वस्त्र‘ लिखा। ज्यादा से ज्यादा दिखाने-बताने की होड़ में एक अखबार ने लड़की के चेहरे को प्रकाशित कर दिया। निर्वस्त्र वाली तस्वीर छाप दी। एक अन्य अखबार ने लड़की के मूल नाम और पहचान को प्रकाशित कर दिया। ज्यादातर अखबारों और टीवी चैनलों ने इस ‘घटना’ को ‘सनसनीखेज’ बनाकर अपने पाठकों-दर्शकों को ‘जमकर’ बेचा।

एक अन्य अखबार ने फिल्म की रील की तरह घटनाक्रम को दिखाते हुए तस्वीरें छापी। एक खाली जगह छोड़कर लिख दिया- ‘माफ करें, सामाजिक जिम्मेदारियों के चलते यह दृश्य हम दिखा नहीं सकते हैं’। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने इस घटना को इतनी बार इस तरह से दिखाया कि देखने वाले हर शख्स को शर्मसार होना पड़ा।  मीडिया वाले तस्वीर खींचने, वीडियो बनाने और घटना के विवरण बटोरने-भेजने में जुटे रहे। किसी ने लड़की को बचाने की कोशिश नहीं की। कैमरे में कैद घटनाक्रम से साबित होता है कि यह सब मीडिया की मौजूदगी में हुआ। दूसरे दिन अपनी गलती का एहसास शायद मीडिया को हुआ। एक अखबार के संपादक ने शोक संदेश प्रकाशित किया और कई सवाल उठाए। एक अखबार ने कार्टून छापा। इसमें बापू के तीन बंदर दिखाए। एक मीडिया, जिसके बारे में लिखा गया, तमाशा देखते रहो और दिखाते रहो। नंबर दो पुलिस- जिसके बारे में लिखा गया, आपकी सेवा में सदैव तत्पर। नंबर तीन सरकार- जिसके बारे में लिखा गया, कानून अपना काम करेगा। एक महिला की इज्जत को सरेआम बीच सड़क पर नीलाम किए जाने की घटना ने लोकतंत्र के खंभों के खोखलेपन और गैर-जवाबदेही वाले रवैये को उजागर किया। इन स्तंभों ने खुद के  पतित और नपुंसक होने का पुख्ता सबूत दे डाला। इस शर्मनाक घटना से साबित हो गया है कि हमारा सामाजिक ढांचा और शासन-प्रशासन बेहद पतित हो चुका है। किसी के खिलाफ अगर सरेआम कुछ गलत हो रहा है तो अन्याय के खिलाफ कोई लड़ने सामने नहीं आने वाला।


 
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