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‘प्रेस काउंसिल का खर्च अखबारों से न लें’

भारतीय भाषाई समाचारपत्र संगठन (इलना) वित्त मंत्री के 2009 के बजट प्रस्ताव से नाखुश है। संगठन के अध्यक्ष परेश नाथ ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपने गुस्से का इजहार किया है। उन्होंने वित्त मंत्री के सम्मुख कई मांगें रखी हैं और उनसे विचार करने का आग्रह किया है। इलना की एक मांग यह भी है कि प्रेस काउंसिल का खर्च सरकार केंद्रीय बजट से दे, न कि अखबारों पर सेस लगाकर उगाहे। विज्ञप्ति में जो कुछ कहा गया है, वह इस प्रकार है– आम बजट में भाषाई समाचारपत्रों की गंभीर स्थिति को अनदेखा करने पर इलना खेद व्यक्त करता है। बजट में ऐसा कुछ नहीं है जो पिछले साल के बढ़े कागज के दामों और लगातार घटते विज्ञापनों के कारण त्रस्त समाचारपत्र प्रकाशकों को किसी तरह की राहत दे सके। बजट में सरकार की विज्ञापन नीति का तो उल्लेख नहीं होता पर फिर भी अभूतपूर्व स्थिति से निपटने के लिए यह समाचार पत्र संगठन इस बजट से कुछ ज्यादा अपेक्षा रखता था ताकि सरकार और आम आदमी के बीच समाचारपत्रों के माध्यम से संवाद निरंतर बना रह सके।

भारतीय भाषाई समाचारपत्र संगठन (इलना) वित्त मंत्री के 2009 के बजट प्रस्ताव से नाखुश है। संगठन के अध्यक्ष परेश नाथ ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपने गुस्से का इजहार किया है। उन्होंने वित्त मंत्री के सम्मुख कई मांगें रखी हैं और उनसे विचार करने का आग्रह किया है। इलना की एक मांग यह भी है कि प्रेस काउंसिल का खर्च सरकार केंद्रीय बजट से दे, न कि अखबारों पर सेस लगाकर उगाहे। विज्ञप्ति में जो कुछ कहा गया है, वह इस प्रकार है– आम बजट में भाषाई समाचारपत्रों की गंभीर स्थिति को अनदेखा करने पर इलना खेद व्यक्त करता है। बजट में ऐसा कुछ नहीं है जो पिछले साल के बढ़े कागज के दामों और लगातार घटते विज्ञापनों के कारण त्रस्त समाचारपत्र प्रकाशकों को किसी तरह की राहत दे सके। बजट में सरकार की विज्ञापन नीति का तो उल्लेख नहीं होता पर फिर भी अभूतपूर्व स्थिति से निपटने के लिए यह समाचार पत्र संगठन इस बजट से कुछ ज्यादा अपेक्षा रखता था ताकि सरकार और आम आदमी के बीच समाचारपत्रों के माध्यम से संवाद निरंतर बना रह सके।

भारतीय भाषाई समाचारपत्र संगठन वित्त मंत्री से निम्न बिंदुओं पर विचार करने का आग्रह करता है-

  1. सूचना व प्रसारण मंत्रालय को अधिक धन दिया जाए ताकि टेलीविजन व दूरसंचार की तरह भाषाई समाचारपत्रों को भी राहत मिल सके।

  2. समाचारपत्रों द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली वेब रोटरी मशीनों को उत्पादन व आयात करों से बिलकुल मुक्त किया जाए या सेट टॉप बॉक्स और टीवी एलसीडी स्क्रीन की तरह केवल पांच प्रतिशत के दायरे में लाया जाए।

  3. प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के खर्च के लिए समाचारपत्रों पर प्रेस काउंसिल एक्ट के अंतर्गत लगाई जाने वाली सेस हटा दी जाए और राष्ट्रपति, न्यायालयों, संसद की तरह केंद्र के बजट से प्रेस काउंसिल को पूरा धन दिया जाए।

  4. भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक के कार्यालय (आरएनआई) को अतिरिक्त राशि दी जाए ताकि उसके कार्यालय हर राजधानी में खुल सकें। उन्हें वे सारा डाटा कंप्यूटरीकृत करने के सिस्टम पर काम करने का धन उपलब्ध कराया जाए ताकि जिलों व कस्बों के प्रकाशकों को दिल्ली चल कर न आना पड़े।

  5. समाचारपत्रों को आफसेट प्लेटों, स्याही, फिल्म, कैमरों पर एक्चुअल यूजर आधार पर उत्पाद व आयात कर से छूट दी जाए।

  6. सरकार पिछड़े क्षेत्रों, हाउसिंग, प्रोसेसिंग आफ बायोडिग्रेडेबल वेस्ट, लघु उद्योगों आदि के लिए लगाई गई फैक्ट्रियों व प्रोजेक्टों को विशेष आयकर छूट देती है और पिछले साल इस राहत में 4779 करोड़ रुपए दिए गए। यह छूट सभी समाचारपत्र संस्थानों को दी जाए क्योंकि वे पिछड़े क्षेत्रों में न लगने पर भी पिछड़े क्षेत्रों तक समाचारपत्र पहुंचाते हैं और शहरों में पिछड़े वर्गों को पाठ्य सामग्री पहुंचाते हैं तथा सामाजिक सेवा का कार्य दूसरों से ज्यादा करते हैं।

  7. समाचारपत्रों व पत्रिकाओं को रेल व डाक से भेजे जाने पर थोड़ी छूट मिलती है पर वही छूट निजी ट्रांसपोर्ट सेक्टर से भेजे जाने पर मिलनी चाहिए।

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