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एक अखबार दूसरे अखबार की खबर क्यों नहीं छापता?

[caption id="attachment_14918" align="alignleft"]चैतन्य भट्टचैतन्य भट्ट[/caption]किसी भी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा एक अच्छी बात है पर पत्रकारिता में प्रतिस्पर्धा के नाम पर अखबारों के बीच जो कुछ भी होता है, उसे मेरे विचार से जायज नहीं ठहराया जा सकता है। मैं पिछले कई बरसों से पत्रकारिता से जुडा हुआ हूं और मैंने इस दौरान ये महसूस किया कि कोई भी अखबार किसी भी दूसरे अखबार द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को कवरेज नहीं देता, भले ही वो कार्यक्रम आम आदमी से जुडे़ हुए क्यों न हों। आखिर ऐसा क्यों? यह सवाल मैंने कई वरिष्ठ पत्रकारों से पूछा पर किसी के पास इसका जबाब नहीं था। सबका यही कहना था कि यह अखबार मालिकों पर निर्भर करता है। यदि इन पत्रकारों की बातों में सच्चाई है तो इस बारे में अखबार मालिकों को विचार करना ही होगा। माना कि अखबारी जगत में कड़ी प्रतिस्पर्धा है और अपने-अपने स्तर पर हर अखबार अपनी प्रसार संख्या बढ़ाना चाहता है। यदि कोई अखबार किसी दूसरे अखबार द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की खबर छापता है तो क्या उसकी प्रसार संख्या गिर जायेगी?

चैतन्य भट्टकिसी भी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा एक अच्छी बात है पर पत्रकारिता में प्रतिस्पर्धा के नाम पर अखबारों के बीच जो कुछ भी होता है, उसे मेरे विचार से जायज नहीं ठहराया जा सकता है। मैं पिछले कई बरसों से पत्रकारिता से जुडा हुआ हूं और मैंने इस दौरान ये महसूस किया कि कोई भी अखबार किसी भी दूसरे अखबार द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को कवरेज नहीं देता, भले ही वो कार्यक्रम आम आदमी से जुडे़ हुए क्यों न हों। आखिर ऐसा क्यों? यह सवाल मैंने कई वरिष्ठ पत्रकारों से पूछा पर किसी के पास इसका जबाब नहीं था। सबका यही कहना था कि यह अखबार मालिकों पर निर्भर करता है। यदि इन पत्रकारों की बातों में सच्चाई है तो इस बारे में अखबार मालिकों को विचार करना ही होगा। माना कि अखबारी जगत में कड़ी प्रतिस्पर्धा है और अपने-अपने स्तर पर हर अखबार अपनी प्रसार संख्या बढ़ाना चाहता है। यदि कोई अखबार किसी दूसरे अखबार द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की खबर छापता है तो क्या उसकी प्रसार संख्या गिर जायेगी?

मेरे ख्याल से तो इसका उत्तर न ही होगा क्योंकि ऐसा माना जाता है कि अखबार और सिगरेट की स्थिति एक जैसी ही होती है। यदि चारमीनार पीने वाले किसी स्मोकर को पांच सौ पचपन जैसी महंगी सिगरेट पिला दी जाये तो हो सकता है कि वो दो चार सिगरेट पी ले पर अंत में उसे चारमीनार पीने की ही इच्छा होगी। ऐसा ही अखबार के साथ है। जो पाठक जिस अखबार को पसंद करता है, उसे वो ही पसंद आता है क्योंकि वो उससे कहीं न कहीं अपना जुड़ाव महसूस करता है। ऐसी स्थिति में यदि वह अपने द्वारा पढे़ जाने वाले अखबार में किसी दूसरे अखबार द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की खबर पढ़ता है तो ऐसा नहीं है कि वह अपना अखबार बदल देगा। जब अखबार वाले बिना किसी जान पहचान वाले की खबरें छापते हैं तो अपनी ही बिरादरी के लोगों की खबरें छापने में कैसा गुरेज?

जहां तक मैं समझता हूं कि इसमें अखबारों में काम करने वालों के भी अपने पूर्वाग्रह होते हैं। मालिकों की ओर से कोई निर्देश न होने के बाबजूद वे ऐसी खबरों को अपने ही स्तर पर सेंसर कर देते हैं। किसी भी अखबार के अपने कार्यक्रम की खबर तो उसके अपने अखबार में छप ही जायेगी पर यदि यही खबर दूसरे प्रतिस्पर्धी पत्रों में भी छप जाये तो इसमें बुराई क्या है? भले ही उसे संक्षिप्त करके ही क्यों न छापा जाये, पर वह छपना चाहिये। अखबार मालिकों को इस ओर पहल करना चाहिये ताकि पत्रकारिता में एक स्वस्थ वातावरण बने और वहां काम करने वाले लोग अपने पूर्वाग्रहो से भी मुक्त हो सकें। हाल ही में दैनिक नई दुनिया के प्रधान संपादक अभय छजलानी को पद्मश्री से सम्मनित किया गया। एक पत्रकार को मिलने वाला ये सम्मान पत्रकारिता की बिरादरी के लिये सम्मान और गौरव का विषय था। पर मैंने देखा कि अन्य अखबारों ने इस समाचार को कोई महत्व नहीं दिया। मात्र पीपुल्स समाचार, भोपाल ही एकमात्र ऐसा अखबार था जिसके  पहले पन्ने पर अभय छजलानी का इंटरव्यू प्रकाशित हुआ। मैं यह बात इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मैं भी पीपुल्स समाचार से जुड़ा हुआ हूं पर यह एक अच्छी शुरुआत थी और इसका अनुसरण अन्य अखबारों को भी करना चाहिये। यदि कोई अखबार कोई भी कार्यक्रम आयोजित करता है तो उसकी खबर अन्य अखबारों में भी आना चाहिये। इससे एक सौहार्द और अपनेपन की भावना अखबारों के बीच विकसित होगी, जो अभी दिखाई नहीं देती। वैसे यह बहस का मुददा हो सकता है और मैं यह चाहता हूं कि इस सवाल पर पत्रकार जगत से जुड़े बुद्धिजीवी अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।


लेखक चैतन्य भट्ट वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों पीपुल्स समाचार, जबलपुर के संपादक हैं। उनसे 09424959520 या फिर [email protected] के जरिए संपर्क कर सकते हैं।

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