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मंदी का सामना करने में मदद करे सरकार : इलना

अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को वित्तीय राहत प्रदान करने के केंद्र सरकार के फैसले का इलना (भारतीय भाषाई समाचार पत्र संगठन) ने स्वागत किया है। इलना के अध्यक्ष परेश नाथ की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि समाचार पत्रों को आज दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अखबारी कागज के दाम आसमान छू रहे हैं तो दूसरी ओर विज्ञापनों से होने वाली आमदनी घट रही है। आज हजारों-लाखों श्रमिक नौकरियों से हटाए जा रहे हैं। उद्योग-धंधे चौपट हो रहे हैं। लोकतांत्रिक समाज में समाचार पत्रों अहमियत को देखते हुए इलना का सरकार से आग्रह है कि सरकारी विज्ञापन दरों को तुरंत बढ़ाया जाए। साथ ही सरकारी विज्ञापनों का समान रूप से वितरण हो ताकि सीमित संसाधनों के चलते कहीं अधिक मार झेल रहे भारतीय भाषा के समाचार पत्रों को भी उसका पूरा लाभ मिल सके।

अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को वित्तीय राहत प्रदान करने के केंद्र सरकार के फैसले का इलना (भारतीय भाषाई समाचार पत्र संगठन) ने स्वागत किया है। इलना के अध्यक्ष परेश नाथ की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि समाचार पत्रों को आज दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अखबारी कागज के दाम आसमान छू रहे हैं तो दूसरी ओर विज्ञापनों से होने वाली आमदनी घट रही है। आज हजारों-लाखों श्रमिक नौकरियों से हटाए जा रहे हैं। उद्योग-धंधे चौपट हो रहे हैं। लोकतांत्रिक समाज में समाचार पत्रों अहमियत को देखते हुए इलना का सरकार से आग्रह है कि सरकारी विज्ञापन दरों को तुरंत बढ़ाया जाए। साथ ही सरकारी विज्ञापनों का समान रूप से वितरण हो ताकि सीमित संसाधनों के चलते कहीं अधिक मार झेल रहे भारतीय भाषा के समाचार पत्रों को भी उसका पूरा लाभ मिल सके।

इलना की सरकार से मांग है कि पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में काम आने वाली सामग्री पर से वैट हटा लिया जाए, ताकि इसका लाभ वास्तविक उपभोगकर्ताओं तक पहुंचाया जा सके। भारतीय भाषाई समाचार पत्रों को सस्ते दरों पर दीर्घावधि कर्ज उपलब्ध कराया जाए ताकि वे आर्थिक मंदी का सामना कर सकें और उन्हें बंद करने की नौबत न आए। भाषाई समाचार पत्रों को बहुत बड़ी रकम की जरूरत नहीं है। सरकार कई क्षेत्रों को हजारों करोड़ रुपये की राहत दे रही है। ऐसे में अगर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कुछ सौ करोड़ रुपये की राहत दी जाए तो उस रकम का सदुपयोग ही होगा। भारतीय भाषाई समाचार पत्र संगठन के अध्यक्ष परेश नाथ का कहना है कि समाचार पत्रों के बंद होने से समाज में अवसाद और अनिश्चितता का माहौल बनेगा क्योंकि जनता को अपने विश्वसनीय स्रोत से सही खबरें नहीं मिल पाएंगी।

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