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ठेकेदार की शिकायत पर संपादक हो गया गिरफ्तार!

पत्रकारिता पर तलवार : केंद्रीय उर्वरक तथा रसायन मंत्री एम.के. अझागिरि के नजदीकी माने जाने वाले किसी ठेकेदार सुरेश की शिकायत पर तमिलनाडु की पुलिस ने तमिल साप्ताहिक ‘नेत्रीकन’ के संपादक ए.एस. मणि की आपराधिक मानहानि में जिस तरह गिरफ्तारी की है, उसका किसी भी तरह से समर्थन नहीं किया जा सकता। यह एक सप्ताह के भीतर तमिलनाडु में दूसरी बार पत्रकार की गिरफ्तारी की शर्मनाक घटना है। पिछले ‘दिनामलार’ समाचार पत्र के संपादक बी. लेनिन को भी एक खबर के सिलसिले में उस समय अखबार के दफ्तर में जाकर गिरफ्तार कर लिया गया था, जब वह काम कर रहे थे। स्पष्ट है कि तमिलनाडु में पत्रकारिता स्वतंत्रता लगातार खतरे में है।

पत्रकारिता पर तलवार : केंद्रीय उर्वरक तथा रसायन मंत्री एम.के. अझागिरि के नजदीकी माने जाने वाले किसी ठेकेदार सुरेश की शिकायत पर तमिलनाडु की पुलिस ने तमिल साप्ताहिक ‘नेत्रीकन’ के संपादक ए.एस. मणि की आपराधिक मानहानि में जिस तरह गिरफ्तारी की है, उसका किसी भी तरह से समर्थन नहीं किया जा सकता। यह एक सप्ताह के भीतर तमिलनाडु में दूसरी बार पत्रकार की गिरफ्तारी की शर्मनाक घटना है। पिछले ‘दिनामलार’ समाचार पत्र के संपादक बी. लेनिन को भी एक खबर के सिलसिले में उस समय अखबार के दफ्तर में जाकर गिरफ्तार कर लिया गया था, जब वह काम कर रहे थे। स्पष्ट है कि तमिलनाडु में पत्रकारिता स्वतंत्रता लगातार खतरे में है।

श्री मणि ने एक स्थानीय ठेकेदार को श्री अझागिरी का नजदीकी बताया था और सड़क निर्माण के ठेके देने के मामले में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। यह कभी कहा था कि दक्षिण तमिलनाडु के जिलों के पुलिस तथा राजस्व अधिकारीयों की अधिकतर नियुक्तियां ठेकेदार की मंजूरी के बाद की जाती हैं। ये आरोप किस हद तक सही हैं या नहीं हैं, यह कहना आज कठिन है लेकिन इस बारे में ‘एडीटर्स गिल्ड’ का कहना सही है कि इन आरोपों के विरुद्ध संबद्ध पक्ष अदालत जा सकते हैं और उसके निर्णय की प्रतीक्षा की जा सकती है। इस कार्रवाई से ‘नेत्रीकन’ के संपादक का कम से कम यह कथन तो साबित होता है कि विवादास्पद व्यक्ति मंत्री के बहुत करीब है क्योंकि पुलिस ऐसी ‘तत्परता’ उसी स्थिति में दिखाती है,  जब कोई ऊपरी दबाव जबर्दस्त होता है वरना संपादक पर शांति भंग करने तथा अन्य अनर्गल आरोपों को कानूनी रंग देकर कार्रवाई नहीं होती? यह मामला विशुद्ध रूप से प्रेस को डराने-धमकाने का लगता है।

एडीटर्स गिल्ड का यह कहना भी सही है कि भारतीय दंड संहिता में ‘आपराधिक मानहानि’ की जो धारा है, वह दरअसल ब्रिटिश उपनिवेशवाद की देन है, जब सरकार के विरुद्ध कुछ भी छापने पर संपादकों को गिरफ्तार कर लिया जाता था। सरकार तथा संसद को चाहिए कि इन प्रावधानों को खत्म करे जो कि अकसर पत्रकारों पर दबाव डालने में उपयोग किए जाते हैं। हमारे मंत्री अकसर कहते हैं कि कानून अपना काम करेगा तो फिर अदालतों को ऐसे मामले निबटाने क्यों नहीं दिए जाते? और अगर हम मानते हैं कि हम एक लोकतंत्र में रहते हैं तो कानून और उनका कार्यान्वयन भी लोकतांत्रिक भावनाओं के अनुरूप होना चाहिए।


संपादक की गिरफ्तारी की निंदा : आपराधिक मानहानि से जुडे मामले में तमिल पत्रिका ‘नेत्रीकन’ के संपादक एएस मणि की गिरफ्तारी की पत्रकार संगठनों ने तीखी आलोचना की है। इन संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल श्री मणि को रिहा नहीं किया गया तो तमिलनाडु भवन पर विशाल प्रदर्शन किया जाएगा। नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्टस ने इसकी निंदा की है। इसके अलावा दिल्ली पत्रकार संघ के अध्यक्ष मनोहर सिंह ने पत्रिका के संपादक मणि की अविलंब रिहाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि तमिल पत्रिका में प्रकाशित खबर से केंद्रीय मंत्री अझागिरि और उनके परिचित ठेकेदार सुरेश के मान सम्मान को ठेस पहुंची है तो इसके लिए सुरेश को मानहानि का मुकदमा दायर करना चाहिए। एडिटर्स गिल्ड लंबे समय से भारतीय दंड संहिता में आपराधिक मानहानि से संबंधित इस प्रावधान को हटाने की मांग कर रहा है। दिल्ली पत्रकार संघ के महासचिव मनोज वर्मा ने कहा कि यदि तत्काल श्री मणि को रिहा नहीं किया गया तो तमिलनाडु भवन पर प्रदर्शन किया जाएगा। 

साभार : नई दुनिया

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