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एनडीटीवी ने खराब मंत्रियों की वो सूची क्यों गिराई?

”मैं निजी तौर पर ये भी मानता हूं कि एनडीटीवी स्कूल ऑफ जर्नलिज्म किसी भी दिन आज तक स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से ज़्यादा घातक है। क्यों, इसे समझाने के लिए सिर्फ एक छोटा किस्सा सुनाना चाहूंगा। कुछ समय पहले एनडीटीवी ने मनमोहन सरकार के सबसे अच्छे और सबसे खराब मंत्रियों पर एडिटर्स सर्वे कराया था। देश भर के संपादकों की राय ली गई। एक सूची तैयार की गई। रात आठ बजे के बुलेटिन में उसे चलाया गया। लेकिन फिर खराब मंत्रियों की सूची गिरा दी गई। मगर अच्छे मंत्रियों की सूची चलती रही। वो खराब मंत्री कौन थे और एनडीटीवी ने वो सूची क्यों गिराई इस पर विस्तार से चर्चा किताब में होगी। लेकिन इससे आप एनडीटीवी के चरित्र का अंदाजा लगा सकते हैं। जो चैनल सिर्फ हल्के से दबाव में अपने ही सर्वे को तोड़-मरोड़ सकता है उस चैनल में स्टेट के विरुद्ध खड़े होने का कितना हौसला होगा?”

”मैं निजी तौर पर ये भी मानता हूं कि एनडीटीवी स्कूल ऑफ जर्नलिज्म किसी भी दिन आज तक स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से ज़्यादा घातक है। क्यों, इसे समझाने के लिए सिर्फ एक छोटा किस्सा सुनाना चाहूंगा। कुछ समय पहले एनडीटीवी ने मनमोहन सरकार के सबसे अच्छे और सबसे खराब मंत्रियों पर एडिटर्स सर्वे कराया था। देश भर के संपादकों की राय ली गई। एक सूची तैयार की गई। रात आठ बजे के बुलेटिन में उसे चलाया गया। लेकिन फिर खराब मंत्रियों की सूची गिरा दी गई। मगर अच्छे मंत्रियों की सूची चलती रही। वो खराब मंत्री कौन थे और एनडीटीवी ने वो सूची क्यों गिराई इस पर विस्तार से चर्चा किताब में होगी। लेकिन इससे आप एनडीटीवी के चरित्र का अंदाजा लगा सकते हैं। जो चैनल सिर्फ हल्के से दबाव में अपने ही सर्वे को तोड़-मरोड़ सकता है उस चैनल में स्टेट के विरुद्ध खड़े होने का कितना हौसला होगा?”

Samrendra Singhउपरोक्त कथन है पत्रकार समरेंद्र सिंह का। वे एनडीटीवी इंडिया में कई वर्षों से कार्यरत थे। पिछले दिनों उन्होंने इस मीडिया हाउस को बाय बोल दिया। इस बारे में भड़ास4मीडिया पर छोटी सी खबर भी प्रकाशित हुई। इस्तीफे के बाद आमतौर पर कोई पत्रकार अपने संस्थान के बारे में कुछ भी बोलने से इसलिए परहेज करता है क्योंकि उसे आगे भी नौकरी करने की चिंता होती है। लेकिन समरेंद्र ने बेबाकी के साथ काफी कुछ कह दिया। और ये सब कुछ बयान किया है अपने ब्लाग पर। उपरोक्त कथन भी उन्हीं के ब्लाग पर प्रकाशित एक लंबी पोस्ट से साभार लिया गया है।

अपने ब्लाग मेरे सपने, मेरी तमन्ना में समरेंद्र लिखते हैं- ”ब्लॉग की दुनिया में चार महीने बाद लौट रहा हूं। बीते चार महीनों में मैंने अपने लिये कुछ नहीं लिखा। सिर्फ नौकरी की, लेकिन अब नौकरी से मुक्त हो चुका हूं और वो हर काम कर रहा हूं जिसके लिए मन तरसता था। सुबह देर तक सोता हूं। अख़बार पढ़ता हूं। किताबें पढ़ता हूं। बच्चे के साथ खेलता हूं। गाना सुनता हूं। रात देर तक टीवी देखता हूं। अपने दोस्त गिरिजेश के पास से २९ बेहतरीन फिल्मों की डीवीडी ले आया हूं और हर रोज रात ग्यारह बजे के बाद एक फिल्म देखता हूं।” 

इतना लिखने के बाद समरेंद्र ने पूरा पढ़ने के लिए अपने दूसरे ब्लाग चौखंबा- हक की आवाज का लिंक दिया है। समरेंद्र ने जो कुछ लिखा है, वो किसी भी संवेदनशील पत्रकार को हिलाकर रख देने के लिए काफी है।

आप सभी उनके ब्लाग पर जाएं और उनकी मनःस्थिति को समझें-बूझें। अगर समरेंद्र से कुछ कहना चाहते हैं तो उनके ब्लाग पर कमेंट के रूप में अपनी बात लिख सकते हैं।

समरेंद्र के ब्लाग पर जाने के लिए क्लिक करें– कुछ दिन ज़िंदगी के नाम

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