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अजस्र पीयूष की भड़ास

अरे संवेदनहीन मीडियामैनों, चंद्रलोक बसाना बाद में, पहले धरती पर ठीक से जीना तो सीख लो : आज वही खबर है जो टीआरपी बढ़ा सके. खबर से किसी का भला होता हो या न हो, अगर टीआरपी के एंगिल से खबर फिट है तो वह चलेगी और दिखेगी.  वाह रे टीआरपी का खेल. आज जो जितना अच्छा झूठ जितने अच्छे तरीके के साथ दिखा देगा, वही सरताज होगा. एक समय था जब लोग मी़डिया को जनचेतना का माध्यम मानते थे. पत्रकारिता एक क्रांति कार्य होती थी. पत्रकार का आदर्श पास सादा जीवन और उच्च विचार होते थे. पर वक्त बदल गया. आज ये पत्रकार वातानुकूलित दफ्तरों में बैठ कर समाज में क्रांति लाने का कार्य कर रहे हैं. वाह सामाजिक क्रांतिकारियों! कौन तुममें अशफाक है तो कौन गणेश शंकर विद्यार्थी, ये तो मालूम नहीं पर डायर और डलहौजी इस पत्रकारिता जगत में भरे पड़े हैं.

अरे संवेदनहीन मीडियामैनों, चंद्रलोक बसाना बाद में, पहले धरती पर ठीक से जीना तो सीख लो : आज वही खबर है जो टीआरपी बढ़ा सके. खबर से किसी का भला होता हो या न हो, अगर टीआरपी के एंगिल से खबर फिट है तो वह चलेगी और दिखेगी.  वाह रे टीआरपी का खेल. आज जो जितना अच्छा झूठ जितने अच्छे तरीके के साथ दिखा देगा, वही सरताज होगा. एक समय था जब लोग मी़डिया को जनचेतना का माध्यम मानते थे. पत्रकारिता एक क्रांति कार्य होती थी. पत्रकार का आदर्श पास सादा जीवन और उच्च विचार होते थे. पर वक्त बदल गया. आज ये पत्रकार वातानुकूलित दफ्तरों में बैठ कर समाज में क्रांति लाने का कार्य कर रहे हैं. वाह सामाजिक क्रांतिकारियों! कौन तुममें अशफाक है तो कौन गणेश शंकर विद्यार्थी, ये तो मालूम नहीं पर डायर और डलहौजी इस पत्रकारिता जगत में भरे पड़े हैं.

आज देश की मांग है युवा नेतृत्व की. पर मीडिया के पास युवाओं का अकाल है. ये अकाल मी़डिया में फैले भाई भतीजावाद क्षेत्रवाद की देन है. कुछ हद तक कहा जा सकता है मीडिया का व्यवसायीकरण इसकी प्रमुख देन है. आज जब देश में मीडिया को लेकर गली कूचों में इससे सम्बंधित पाठ्यक्रम चलाये जा रहे हैं, लोग इसे कैरियर की तरह देख रहे हैं, हजारों होनहार युवा कोर्स कर मीडिया हाऊसों में इन्टर्नशिप के लिये चक्कर लगा रहे हैं, नौकरी तो दूर रही इन्टर्न भी नहीं मिल रही है, तो वहीं कुछ बेवकूफ मीडियामैन बने हुये हैं, क्या मीडिया का यही सच है……?

तो इससे अच्छा है कि चाय की दुकान खोल कम से कम इज्जत की रोटी तो खा सकेंगे. दूसरों को जीने की नसीहत देने वाले ये मीडिया हाऊस शायद जीना ही भूल गये हैं. आज पत्रकारिता मात्र दिखावा ही रह गई है. इस समाज में महिलाओं को सम्मान देने की बात की जाती है तो वहीं सफेदपोश लोग खुद भेड़िया बनकर घात लगाते हैं. ऐसे लोगों की मीडिया में कोई जरूरत नहीं. आज वक्त आ गया है बदलाव का और बताने का कि अभी मीडिया में सच्चाई बाकी है, अभी तय करने होंगे और भी रास्ते. और, चकाचौंध में जी रहे इन संवेदनाहीनों को बताना होगा- अरे बाद में बसाना किसी चंद्रलोक को, पहले तो धरती पे ठीक से रहना तो सीख लो…. तुम गिर चुके हो, इतना सम्भलना तो सीख लो….

लेखक अजस्र पीयूष शुक्ल महुआ न्यूज में आउटपुट इंटर्न हैं.

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0 Comments

  1. Abhishek sharma

    February 5, 2010 at 7:05 am

    [b][/b] Apni dastaan bhadas4media pe kyu daal di….are samvedanheen word se lekar seekh lo tak ki pehli line mahoday lagta hai aapne apne bare me likh dala…

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