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नई दुनिया से क्यों नाराज है पीएमओ?

जो अखबार मंगाए जाते हैं उनमें नई दुनिया, राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर आदि अखबारों के नाम नहीं : अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं से खास प्रेम है प्रधानमंत्री कार्यालय को : पीएमओ उर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय 45 पत्रिकाएं खरीदता है जिसमें 3 हिंदी की हैं. पीएमओ कुल 43 अखबार मंगाता है जिसमें अंग्रेजी के 23 और हिंदी के दस अखबार हैं. उर्दू के चार, मराठी के दो, मलयालम, पंजाबी, बांग्ला और गुजराती का एक-एक अखबार खरीदा जाता है.

जो अखबार मंगाए जाते हैं उनमें नई दुनिया, राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर आदि अखबारों के नाम नहीं : अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं से खास प्रेम है प्रधानमंत्री कार्यालय को : पीएमओ उर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय 45 पत्रिकाएं खरीदता है जिसमें 3 हिंदी की हैं. पीएमओ कुल 43 अखबार मंगाता है जिसमें अंग्रेजी के 23 और हिंदी के दस अखबार हैं. उर्दू के चार, मराठी के दो, मलयालम, पंजाबी, बांग्ला और गुजराती का एक-एक अखबार खरीदा जाता है.

सूचना के अधिकार के तहत अफरोज आलम साहिल द्वारा हासिल की गई जानकारी के मुताबिक पत्र-पत्रिकाओं पर खरीद पर वर्ष 2009-10 में पीएमओ ने करीब 12 लाख रुपये खर्च किए. हिंदी के जो अखबार पीएमओ मंगाता है, उसमें कुछ तो ऐसे हैं जिनकी प्रसार संख्या बेहद कम है. सूची में कई ऐसे अखबारों के नाम नहीं हैं जो अपने-अपने इलाकों के सरताज हैं और टाप टेन अखबारों में शुमार किए जाते हैं. उदाहरण के तौर पर प्रभात खबर, नई दुनिया, राजस्थान पत्रिका आदि अखबार पीएमओ की अखबारों की सूची से गायब हैं. तो इसे क्या माना जाए? क्या इन अखबारों से पीएमओ को कोई नाराजगी है?

नई दुनिया का नाम पीएमओ द्वारा खरीदे जाने वाले अखबारों की सूची में न होने से नई दुनिया प्रबंधन भी दुखी है. इसका पता उस खबर से चलता है जो आज नई दुनिया, दिल्ली में प्रथम पेज पर प्रकाशित हुई है. भाषा सिंह की बाइलाइन इस खबर में पीएमओ के अधिकारियों, प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्री सभी को लपेटा गया है. खबर में यहां तक कहा गया है कि हजार से कम सरकुलेशन वाले अखबार तो सूची में शामिल हैं पर कई बड़े हिंदी अखबार इस लिस्ट से गायब हैं. नई दुनिया में प्रकाशित खबर भी सूचना के अधिकार के तहत अफरोज आलम साहिल द्वारा मांगी गई जानकारी पर आधारित है. आरटीआई द्वारा हासिल पूरी सूचना-जानकारी इस प्रकार है-

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0 Comments

  1. SANJAYSINGH

    June 16, 2010 at 3:28 am

    DAINIK JAGARAN (WORLD NO-1 IN CIRCULATION) BHI LIST ME NAHI HAI. PMO
    KA KAUN SA CRETERIA HAI, YE SAMJHA NE NAHI AAYA. PMO KO TO SABHI RAJYO K TOP 10 AKHBARO KO MANGA KAR USKI KHABRON PAR KARWAYI KARI CHAHIYE. PRADHANMANTRI PURE DESH KA HOTA HAI NAHI KI DELHI ME MAUJUD / BIKANE PATRIKAO / AKHABARO KA.

  2. Suresh Tomar

    June 16, 2010 at 8:27 am

    sarkar ki itni chaplusi ke baad ye haal hai…. Ab bhi sudher jao NAI DUNIYA

  3. pankaj

    June 16, 2010 at 8:29 am

    kewal prabhat khabar hi kyon kai mahatwapurn akhbar nahin hain list me,delhi ki satta ke liye ye koi anhoni khabar nahin hai,jo hindi paper jate bhi hain unhe shayad hi pmo chhuta hoga

    bjp ke shashan me bhi to aisa hi raha hoga

  4. Dashanand Tiwari

    June 16, 2010 at 9:00 am

    It’s really shocking. may be in PMO there r some officers who don’t knows about news papers.

  5. vimlendu

    June 16, 2010 at 9:19 am

    यह तो हिंदी के साथ सरासर बेईमानी है. जब प्रधनामंत्री कार्यालय ही सही निर्णय लेने में अक्षम है तो दूसरों को दोषी कैसे ठहरा सकते हैं.

  6. juhi

    June 16, 2010 at 12:11 pm

    Bhaiyo
    PMO mein Grihshobha , Femina tatha Women’s Era , ka bhala kaun pathak hoga ? Sochiye to zara .
    Hai Main Sharm se Lal Huee ya ki Rasoi Tips ka kaun lenhar hai vhan ?
    Yah to Rashtriy utsukta va shodh ka vishay hai !!

  7. अमित गर्ग. राजस्थान पत्रिका. बेंगलूरु.

    June 16, 2010 at 1:16 pm

    इसमें हैरत करने अथवा दुखी होने जैसी कोई बात ही नहीं है। अरे, जिनको हिंदी पढऩा नहीं आता वे ङ्क्षहदी अखबार मंगाकर क्या करेंगे? फिर प्रधानमंत्री कार्यालय की इच्छा हो तो मातृभाषा के अखबार पढ़े नहीं तो कोई खास बात नहीं है। वैसे भी सरकारी कारिन्दों के हिन्दी अखबार पढऩे ना पढऩे से हिन्दी की लोकप्रियता पर कोई असर तो पडऩे वाला है नहीं।

  8. गजेन्द्र राठौर, बैंगलोर

    June 16, 2010 at 1:20 pm

    इसे भारत का दुर्भाग्य कहे या हिंदी भाषा अपमान. कि प्रधान मंत्री कार्यालय में ही हिंदी के कुछ अखबार आ रहे है!, मेरी जानकारी के अनुसार देश में अंग्रेजी का बोला बाला बढ़ता ही जा रहा है,
    जहाँ तक मुझे याद है हमारे प्रधान मंत्री महोदय भी विदेश यात्रा पर इस भाषा का ही उपयोग करते है! लेकिन विदेशी प्रधान मंत्री या और कोई भारत आता है तो वह अपनी ही भाषा बोलता है, बाद में उसका अनुवाद किया जाता है!>>>>>>>
    हिंदी के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए! नहीं तो देश बट जायेगा भाई!

  9. praneeta mishra

    June 16, 2010 at 3:21 pm

    mahilaon kee patrikayen pmo kee pasandeeda hain-dekhiye-savy,famina,grihshobha,womens era vagairah aur stardust bhee padhi jati hai unke yahan.

  10. sandip thakur

    June 16, 2010 at 3:40 pm

    PMO me 10 hindi akhbar jate hain per ineh partha kaun hai PMO men.bas jate hain.

  11. Rajat

    June 16, 2010 at 3:42 pm

    italy ke gulamo se aur koi ummid bhi nahi ki ja sakti

  12. omdev

    June 16, 2010 at 4:51 pm

    NEWS PAPER KI PAHCHAN PMO KE PASS PAHUCHNE SE NAHI HOTI BALKI JANTA KE BEECH BADHIYA KHABRAEN PAHUCHNE SE HOTI HAI PHIR MAN MOHAN SAAB KO HINDI ATI HI KHA HAI

  13. rabindra kumar mishra

    June 16, 2010 at 6:02 pm

    हिंदी के नाम पर राजनीति करने वालों की ये असलियत है। राष्ट्रभाषा के साथ ऐसा अपमान। क्या पीएमो आंफिस के कर्मचारियों या पदाधिकारियों की हिंदी कमजोर है। अगर पीएमो की हिंदी से नफरत कहें तो कोई अतिशक्योक्ति नहीं होगी

  14. suresh pandey

    June 17, 2010 at 11:34 am

    अरे भइया हिंदी पढ़ने -लिखने से काले अंग्रेजों के राज में तरक्की कहां से होगी, इसलिए प्रधानमंत्री दफ्तर के बाबू क्यों कर हिंदी पढ़ेंगे। और हिंदी अखबारों में भी तो तैनाती देने के पहले यही पूछा जाता है कि भइया अंग्रेजी से हिंदी में ट्रांसलेशन आता है या नहीं। कुछ संपादक तो अब हिंदी से अंग्रेजी में ट्रांसलेशन करवा रहे हैं। अंग्रेजी बिन सब सून है भइया, इसलिए पीएमओ को भूल कर भी न कोसें। कोसना है तो अपनी किस्मत को कोसे।

  15. nameless

    June 17, 2010 at 6:34 pm

    ye acchi baat hai ki PMO me stardust bhee padha jata hai. bahut accchi khabar hai. tabhi to Padmshri shahrukh aur saif bhai ko milne lagi hai.

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