कल एक ऐसी घटना हुई जो मेरे पूरे करियर में कभी नहीं हुई थी। हमारे प्राइम टाइम शो ‘इंडिया प्राइम’ को करते वक़्त एक ख़बर के दौरान मेरी आंखों में आंसू आ गये। मैं ऑन एयर आंखों में आंसू लिए नहीं जा सकता था इसीलिए दो-तीन गहरी सांसें लीं और उस रुला देने वाली ख़बर के दौरान अपने कान बंद कर लिए। बाद की ख़बरें और शो के मेहमानों से बात थर्राये हुए गले से ही हुई। पीसीआर के मित्रों ने भी ब्रेक में पूछा, सर आर यू ओके, ब्रेक बढ़वाने की ज़रुरत तो नही? मैंने कहा, नहीं, सब ठीक है, हम आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन सब ठीक नहीं था। एक मासूम बच्ची की कराहती हुई आवाज़ लगातार मेरे कानों में गूंज रही थी। राजनैतिक ख़बर हो, मनोरंजन की ख़बर हो या खेल की ख़बर, हर खबर के दौरान मेरी आंखों के सामने पट्टियों-ज़ख़्मों भरा ढाई साल की ज्योति का चेहरा आ रहा था।
वह बड़ी मासूमियत के साथ कह रही थी मेरी मां ने मुझे ट्रेन से नीचे फेंक दिया। दरअसल एक मां ने अपनी ढाई साल की मासूम बच्ची को चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया ये ख़बर सुबह से हर चैनल पर चल रही थी। इस ख़बर को मैंने भी देखा था लेकिन बच्ची की बातों को सुनने का मौक़ा अपने शो मे ही मिला। जिस मासूमियत और दर्द के साथ वो बच्ची बोल रही थी, उसे मेरे शब्द बयां नही कर पायेंगे। लेकिन उस बच्ची के शब्दों को हर वो शख्स समझ पाएगा जिसने ढाई साल के बच्चे को तुतलाते हुए बोलते सुना होगा। बच्चे जो भी बोलते हैं, बहुत अच्छा लगता है, लेकिन अगर इसी तुतलाहट के साथ टूटे-फूटे शब्दों को जोड़कर कोई बच्ची ये बोले कि मुझे मेरी मां ने ही चलती ट्रेन से फेंक दिया और साथ ही साथ ये भी कि मुझे मां की याद आ रही है, मुझे मां के पास जाना है, तो किसी का भी दिल पसीजेगा। ऑन एयर भी दिल पसीजता है लेकिन उसे बयान करना आप के काम की मर्यादाओं के ख़िलाफ है क्योंकि आप सिर्फ़ यही एक ख़बर दर्शकों को नहीं दिखा रहे हैं। कई ओर ख़बरें कतार में हैं जिनका ‘टेस्ट’ अलग है।
मैं इसके बारे में इसीलिए लिख रहा हूं क्योंकि एक लोकप्रिय एंकर को एक बार मैंने ऑन एयर रोते हुए देखकर टिप्पणी की थी कि एंकर को संवेदनशील होना चाहिए लेकिन शो के दौरान दिखना नहीं चाहिए। इस घटना के बाद मुझे महसूस हुआ कि संवेदनाओं को दबाना कितना मुश्किल है और संवेदनहीन दिखना एक एंकर की कितनी बड़ी मजबूरी है। ऐसा नहीं कि भावनाएं दुखी करने वाली ख़बरों पर ही आती हैं। कई बार ज़बरदस्त हंसी को क़ाबू करना भी मुश्किल हो जाता है। इसका अनुभव मुझे और मेरे मित्र सुशांत को साथ में एंकरिंग करते वक़्त तब हुआ था जब प्रमोद मुथालिक को ‘पिंक चड्डियां’ विरोधस्वरूप भेंट की गई थी और ‘पिंक चड्डियां’ शब्द को हमें जितनी बार बोलना पड़ा, हंसी को रोकने के प्रयास उतने ज़्यादा करने पड़े। मुझे अपना ग़ुस्सा भी याद आता है जो मेरे नाम राशि डॉ प्रवीण तोगड़िया से बात करते हुए मुझे आया था। मैंने ऑन एयर उन्हें संयमित भाषा के प्रयोग और शालीनता बनाए रखने की बात तल्ख़ लहजे मे कही थी। वो घटना भी मैं कभी नहीं भूल सकता जब ‘जनमत’ में मेरे कार्यक्रम ‘जनता बोले’ के दौरान जनता के सवालों से घबराए बीजेपी के एक बड़े नेता ‘लैपल’ को तोड़कर मेरी तरफ़ तेज़ी से लपके थे और उसी जनता ने उनके मुंह पर उन्हे एक कमज़ोर नेता कहा था। बाद में ये प्रोग्राम ऑन एयर नहीं किया गया।
जीवन में ऐसे कई मौक़े आए जब ग़ुस्सा, प्रेम, दुख, ईर्ष्या आदि सभी संवेदनाएं आईं लेकिन जब एक एंकर की भूमिका में होता हूं तो संवेदनहीन दिखना मेरी मजबूरी हो जाती है। ये तक़लीफ कुछ वैसी ही है जैसे आप अपने प्रिय मित्रों या परिवार के लोगों पर अपने दुख का असर नहीं पड़ने देना चाहते हैं और अपने भावों में अपनी संवेदनाओं को छुपाने का प्रयास करते हैं। ये प्रयास एक एंकर को मासूम ज्योति जैसी कई ख़बरों को दिखाते वक़्त करना पड़ता है। जो आंसू मेरी आंखों में थे, वो कई दर्शकों की आंखों में भी
रहे होंगे वो शायद उन्हें छलका भी पाए होंगे लेकिन मैं सिर्फ़ आंसू की एक बूंद ही ढलका पाया और फौरन दूसरी ख़बरों के लिए ख़ुद को तैयार किया।
एंकरिंग आसान काम नहीं है दोस्तों, एंकर संवेदनहीन होता नहीं, लेकिन उसे दिखना पड़ता है।











