
”मै मुकेश तंवर, निवासी- गांव रावलवास खुर्द जिला व तहसील हिसार, हरियाणा। निवेदन यह है कि मैने बैचलर डिग्री मॉस कम्यूनिकेशन द्वितीय वर्ष की परीक्षा दी है। मै मीडिया में अपना कैरियर बनाना चाहता हूं। मैने एक वर्ष अमर उजाला समाचार पत्र में हिसार में काम किया है। आर्थिक मंदी के कारण अमर उजाला ने अपने हरियाणा के सभी कार्यालय बंद कर दिये जिसके कारण मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी। मै अमर उजाला में कम्प्यूटर आपरेटर के पद पर कार्य करता था, लेकिन काम सवांददाता का करता था। इसके बाद मैने दैनिक भास्कर, हिसार में दो माह काम किया है। मैने आज हर मीडिया कर्मचारी से सुना है कि मीडिया में कुछ नहीं रखा है। सब कहते हैं कि अपना-अपना रोजगार पहले से ही ढूंढ लो, मीडिया में आज कोई नौकरी नहीं है, अभी आप की उम्र है कि आज मीडिया छोडकर कोई अलग कार्य कर लो।
सर, मै भडास4मीडिया को शुरू से देखता-पढ़ता आ रहा हूं। मै आप से जानना चाहता हूं कि क्या ये सच है कि आज मीडिया में कोई नौकरी नहीं है? आज पूरे हरियाणा प्रदेश में जो हजारों छात्र पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं, उनको क्या रोजगार नहीं मिलेगा? सर, आप मुझे इस बारे में अपनी सलाह दे, कि क्या हमें मीडिया में रोजगार नहीं मिलेगा? सर, मेरे जैसे हजारों मीडियाकर्मियों को ये सारे सवाल परेशान कर रहे हैं। इनके जवाब आप भड़ास4मीडिया के माध्यम से दें। आप मेरा पत्र और मेरा नाम प्रकाशित कर सकते हैं। सर, मेरे से कोई गलती हुई हो तो माफ कर देना।”
धन्यवाद
मुकेश तंवर ([email protected])
रावलवास खुर्द, हिसार
मुकेश जी को जवाब
भाई मुकेश जी, नमस्ते
आप और हम पैदा हुए हैं तो जीने के लिए कुछ न कुछ करना ही पड़ता है लेकिन आदमी सोचता ये है कि उसे जो अच्छा लगता है, वही करे और वह करने में पैसे भी मिल जाएं तो सबसे अच्छा होता। इसी कारण आप और हम जैसे हजारों लोग मीडिया के फील्ड में आते हैं। मीडिया के बाहर रहते हुए हमें-आपको मीडिया किसी लुभावनी दुनिया की तरह प्रतीत होती है और ख्वाब में दिखता है कि मीडिया में गए नहीं कि क्राइम रिपोर्टर बनकर थाने-पुलिसवालों को सलाम ठोंकने के लिए मजबूर कर देंगे। जब हम मीडिया के अंदर घुसते हैं तो पाते हैं कि यहां चीजें उतनी आसान नहीं हैं जितनी बाहर से दिखाई दे रही हैं। पत्र-पत्रिकाएं पहले भले ही देश आजाद कराने, लोगों को जागरूक करने, समाज में सकारात्मक बदलाव लाने, सत्ता-नेता-नौकरशाहों के गलत कामों पर लगाम लगाने के लिए निकलती थीं, लेकिन आजकल 99 फीसदी से ज्यादा मीडिया माध्यम (टीवी, रेडियो, अखबार, पत्रिकाएं …) खाने-कमाने, मुनाफा बटोरने, सत्ता से ताकत हासिल करने का जरिया हैं। हर मीडिया माध्यम का मालिक अपने मीडिया से हर साल ज्यादा से ज्यादा मुनाफा चाहता है। इस मुनाफे को पाने के लिए मार्केटिंग से लेकर संपादकीय तक के लोगों को लगाया जाता है। इसके चलते मीडिया माध्यमों में प्रभावशाली पदों पर उन्हीं को नियुक्त किया जाता है जो मालिकों के हितों को न सिर्फ संरक्षित करते हैं बल्कि उसे आगे भी बढ़ाते हैं। ऐसे में आप जैसे हजारों आदर्शवादी, ईमानदार और नौजवान पत्रकार जब किसी मीडिया माध्यम में घुसते हैं तो वे सिद्धांत व व्यवहार के बीच की जो बड़ी खाई पाते हैं, उससे उनका मनोबल टूटने लगता है, उनका सिद्धांत व आदर्श खत्म होने लगता है और धीरे-धीरे या तो वे डिप्रेस्ड हो जाते हैं या फिर उसी सिस्टम व खेल के हिस्से बन जाते हैं। जो ड्रिपेस्ड हो जाते हैं वे अलगाव में पड़कर मीडिया से बाहर होने की स्थिति में पहुंच जाते हैं। जो सिस्टम व खेल का हिस्सा बन जाते हैं वे तरक्की पाते हुए और ज्यादा बड़े पदों पर पहुंच जाते हैं।
अब आते हैं आपके रोजगार के सवाल पर। तो यह सच है कि मीडिया मालिक आजकल आर्थिक मंदी के चलते मार्केट से विज्ञापन अपेक्षाकृत कम मिलने से अपने खर्चे कम करने में लगे हैं। खर्चे कम करने का सीधा मतलब माना जाता है कि स्टाफ की संख्या में कटौती कर दो और जो स्टाफ बचा है उसे काम से ओरवलोडेड रखो। इस प्रक्रिया के चलते आजकल ज्यादातर मीडिया हाउस खर्चे कम करने के लिए स्टाफ कम करने के साथ-साथ अलाभकारी प्रोजेक्टों से भी हाथ जोड़ रहे हैं। इसी कारण अमर उजाला ने पंजाब और हरियाणा से अपने आपरेशन को बंद कर दिया, जिसके चलते आप बेरोजगार हुए। इसी कारण दैनिक जागरण ने गुजरात में अखबार निकालने की योजना को बीच में ही खत्म कर दिया, जिससे दर्जनों पत्रकार सड़क पर आ गए। इसी कारण दैनिक हिंदुस्तान और नवभारत टाइम्स जैसे अखबार में वर्षों से काम कर रहे वरिष्ठ लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसी कारण दैनिक भास्कर अखबार से लोग निकाले जा रहे हैं। इसी कारण टीवी चैनलों में जमकर छंटनी हो रही है। तो इन स्थितियों में कहा जा सकता है कि मीडिया सेक्टर में अगले कुछ वर्षों तक नौकरी की बहुत गुंजाइश नहीं रहेगी। आजकल हजारों दक्ष और अनुभवी मीडियाकर्मी बेरोजगार टहल रहे हैं। अगर किसी मीडिया हाउस को रखना ही होगा तो आप जैसे जूनियर और नए लोगों को रखने के बजाय बेरोजगार घूम रहे इन दक्ष व अनुभवी मीडियाकर्मियों को सस्ते दर पर अपने यहां रख लेगा। नए और जूनियर लोगों के साथ दिक्कत ये होती है कि उन्हें काम सिखाना पड़ता है, जो अनुभवी और दक्ष लोग हैं वे पहले ही दिन से रिजल्ट देने लगते हैं।
हरियाणा में हजारों छात्रों के पत्रकारिता की पढ़ाई करने की बात आपने कही है तो इस पर मेरा कहना है कि आजकल सैकड़ों प्राइवेट व सरकारी मीडिया संस्थान ठीकठाक पैसे वसूल कर पत्रकारिता की डिग्री व डिप्लोमा दे रहे हैं। इस देश में लोकतंत्र है और हर किसी को थोड़ी बहुत औरपचारिकताओं के बाद कोई भी कोर्स चलाने की छूट हासिल है। ये तो आपको तय करना है कि कौन सा कोर्स करें और कौन सा न करें। पत्रकारिता की डिग्री व डिप्लोमा लेना एक बात है और नौकरी पाना दूसरी बात। अगर मीडिया हाउसों को नौकरी देना होगा तो वे देश के प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थानों आईआईएमसी और माखनलाल से आए छात्रों को नौकरी देने में वरीयता देंगे। हरियाणा, यूपी, बिहार जैसे राज्यों से पढ़े छात्रों को नौकरी मिलने के चांसेज बेहद कम रहते हैं। इन जगहों के लोगों को नौकरी मिलती भी है तो इन राज्यों में बेहद कम पैसे में किसी ब्यूरो में नौकरी मिलती है लेकिन मंदी के नाम पर जो नाटक चल रहा है उसमें अब इसकी भी गुंजाइश नहीं बची है।
ऐसे में दोस्त मेरा यही कहना है कि मीडिया से पेट पालने या चूड़ियां बेंचकर पेट पालने में कोई फर्क नहीं है। दिक्कत केवल हमारे आपके लोवर मिडिल क्लास इगो को होती है। हमने मन में कई धारणाएं बन चुकी हैं और इन धारणाओं को हमारा सामाजिक सिस्टम बनाता है कि फलां काम खराब है फलां काम अच्छा है। लेकिन अगर आपने डी कंपनी या सत्या फिल्म देखी होगी तो आपको महसूस हुआ होगा कि क्राइम भी एक करियर है। लेकिन चूंकि हम-आप किसी समाज, किसी देश और किसी संविधान के अंग हैं इसलिए हमें केवल वही काम करना चाहिए जो संवैधानिक और कानूनी दायरे में सही माना जाता है। भारत में संवैधानिक दायरे में रहकर मुनाफा कमाने को कभी गलत नहीं माना जाता। यह अलग बात है कि यही मुनाफाखोरी ही इस देश की ढेर सारी समस्याओं की जड़ भी है। पर जिस तरह आप सागर के भीतर निवास रहते हुए आप जल के बिना जिंदा रहने की कल्पना नहीं कर सकते उसी तरह आजकल के इस बाजारवादी व्यवस्था वाली अर्थनीति में रहते हुए बिना मुनाफे के किसी काम से रोजी-रोटी चलाने की कल्पना नहीं की जा सकती।
मीडिया से अलग अपना काम शुरू करने के बारे में सोचने की सलाह बिलकुल सही है। आप इस पर जल्दी से जल्दी अमल करें। हो सकता है कि शुरू में आपको ढेर सारी दिक्कतें आएं, असफलता हाथ लगे लेकिन इन्हीं दिक्कतों-असफलताओं में ही सफलता का राज छिपा होता है।
उम्मीद करता हूं, आपके सवालों का जवाब मिल गया होगा।
पिछले साल जब सेंसेक्स उफान पर था, न तो विदेश में मंदी की आंधी आई थी और न ही देश में मंदी का कोई नामलेवा था, अखबारों के नए-नए एडिशन रोज लांच हो रहे थे, मीडिया में नए-नए प्रोजेक्ट रोज बन रहे थे, तब मीडिया से संपादकीय अपेक्षा को लेकर एक लेख एक मित्र के ब्लाग पर लिखा था। इसे भड़ास ब्लाग पर भी आप पढ़ सकते हैं। इस लेख से वर्तमान मीडिया को देखने-समझने की दृष्टि विकसित करने में मदद मिल सकती है, क्लिक करें- बदलते दौर में मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा
आभार के साथ
यशवंत सिंह











