आजकल के प्रोफेशनल दौर में किसी का बेवफा होना कोई मुद्दा नहीं रह गया है. बल्कि बेवफाई, अवसरवादिता जैसी चीजें सत्य, अहिंसा की तरह हो गई हैं जिसको जीवन में उतारने से जीवन सफल हो जाता है. पहले सत्य और अहिंसा किसी मनुष्य के आभूषण माने जाते थे. अब बेवफाई और अवसरवादिता तरक्की के सीढ़ी बन गए हैं. ऐसे गड़बड़झाले वाले माहौल में किसी पर बेवफा का आरोप लगाना उसकी तारीफ करने जैसा ही है, बावजूद इसके, हम यहां एक संपादक की बेवफाई का जिक्र कर उसकी तारीफ करना चाहते हैं. ये हैं राघवेंद्र. पूरा नाम राघवेंद्र झा. करीब महीने भर पहले प्रभात खबर, भागलपुर के संपादक बनाए गए राघवेंद्र ने अपने प्रबंधन और अपने बासेज को अंधेरे में रखते हुए गुपचुप तरीके से दैनिक भास्कर, रांची ज्वाइन कर लिया है. भागलपुर में प्रभात खबर को लांच किया जाना है. करीब डेढ़ महीने पहले बेरोजगार राघवेंद्र के संपर्क करने पर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने उन्हें काम करने का मौका दे दिया.
यही नहीं बल्कि उन्हें अपनी नई लांच होने वाली भागलपुर यूनिट का संपादक बनाकर टीम गठन की जिम्मेदारी भी दे दी. राघवेंद्र की नियुक्ति पर प्रभात खबर के कई लोगों ने आपत्ति भी की थी क्योंकि राघवेंद्र प्रभात खबर के साथ अपनी पहली पारी में कई वजहों से विवादित हो गए थे. सो, ढेर सारे लोग नहीं चाहते थे कि राघवेंद्र के अतीत को देखते हुए उन्हें प्रभात खबर में काम करने का फिर मौका मिले. लेकिन राघवेंद्र की बेरोजगारी, उनके भावुक अनुरोध को देखते हुए प्रधान संपादक हरिवंश ने उन्हें फिर मौका दे दिया, इस उम्मीद के साथ कि अतीत से सबक लेते हुए राघवेंद्र आगे खुद को बदलेंगे और बेहतर काम करके अपने और अपने करियर को फिर से जमा सकेंगे.
पर कई लोग बदलते नहीं. वे मौके की तलाश में रहते हैं और मौका मिलते ही अपने असल रूप में आ जाते हैं. राघवेंद्र ने भी यही किया. प्रभात खबर से नियुक्ति पत्र मिलते ही राघवेंद्र फिर सक्रिय हो गए. भास्कर प्रबंधन से संपर्क साधा. चुपचाप इंटरव्यू दे डाला. वे प्रभात खबर प्रबंधन को यही कहते-बताते रहे कि वे कहीं नहीं जा रहे हैं और उनके बारे में कुछ लोग अफवाह उड़ा रहे हैं, जिस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है. पिछले तीन दिनों से राघवेंद्र का मोबाइल फोन स्विच आफ था. इस दौरान वे भास्कर ज्वाइन कर चुके थे. राघवेंद्र के इस कदम से प्रभात खबर प्रबंधन हतप्रभ है. वरिष्ठ पद पर आसीन एक पत्रकार से जिस न्यूनतम मर्यादा की उम्मीद की जाती है, वह राघवेंद्र ने प्रभात खबर प्रबंधन के साथ नहीं निभाया. उस प्रभात खबर प्रबंधन के साथ जिसने उन्हें बेरोजगारी के दिनों में सड़क पर होने के कारण न सिर्फ अपने यहां काम करने का मौका दिया बल्कि बड़ी जिम्मेदारी भी दी. फिलहाल राघवेंद्र झा की बेवफाई की रांची की मीडिया में खूब चर्चे हैं.












Pramod Kaushik, News Editor, SARVOTTAM TIMES
August 10, 2010 at 9:57 am
Yashwant ji aajkal aise logon ki hi jyada pooch hoti hai aur itihas se sabak lene ki bajae log inhe baar baar mauka dete rahten hain. Darasal ye log itne meethe hote hain ki baar baar dhokha khane ke bavjood bhi log inke jhanse me aa hi jate hain jabki sache logon ko lachedaar baaten karni nahi aati.
aise me in logon ka koi dosh nahi hai dosh to inpar bharosa karne walon ko hi diya jana chahiye.
shyam singhal
August 10, 2010 at 10:19 am
yah pravritti to sachmuch sharmanaak hai.
shyam singhal
August 10, 2010 at 10:22 am
This is a shameful tendency.
alok nandan
August 10, 2010 at 11:00 am
राघवेंद्र जी ने वही किया है जो एक सुलझे हुये इनसान को करना चाहिये….यदि आज की तारीक में किसी को कहीं बेहतर जगह और बेहतर पैसा मिलता है तो वह उस ओर लपकता है तो इसमें बुरा क्या है….और जहां तक राघवेंद्र जी के बेरोजगार होने की बात है तो वह प्रभात खबर में जाने से पहले पटना से एक साप्ताहिक अखबार गणादेश निकाल रहे थे और यहां की शासन व्यवस्था के खिलाफ उसमें खुलकर लिख भी रहे थे….वह भी उस दौर में जब सारे अखबार वाले विज्ञापन के लिए के लिए मुख्यमंत्री और उनकी टीम के सामने नाक रगड़ रहे थे….प्रभात खबर में राघवेंद्र जी अपनी काबिलियत से गये थे….ऐरे गैरे नथू खैरे को उठाकर प्रभात तो क्या कोई भी अखबार संपादक नहीं बना सकता है….उनका आकलन करना है तो उनके कामों से कीजिये….हो सके तो गणादेश को मंगा के पढ़िये….और उसमें छपने वाली रिपोर्टों को देखिये….फिर पता चल जाएगा कि जिसे आप उनकी बेरोजगारी का दौर कर रहे हैं उस दौर में उन्होंने उम्दा पत्रकारिता की है……गणादेश की कुछ खबरे मैंने तेवरआनलाइन पर भी डाली हैं….मीना के तीन बेटों को लापता किया व दो को मारने की फिराक में है पटना के डीएम का गार्ड….यह खबर की हेडिंग है…..यह गणादेश के धारदार पत्रकारिता का नमूना है…प्रभात खबर ज्वाइन करने के पहले उन्होंने गणादेश से इस्तीफा दिया था……वह रोड पर नहीं थे…जैसा कि आप लिख रहे हैं….
आलोक नंदन का जवाब
August 10, 2010 at 11:19 am
आलोक नंदन जी, आपकी दिक्कत है कि आप हमेशा अपने हिसाब से तर्क गढ़ते हैं, कुतर्क की हद तक… अगर राघवेंद्र इतनी ही तेवर वाली पत्रकारिता कर रहे थे उन्हें प्रभात खबर में नौकरी के लिए नाक रगड़ने की क्या जरूरत थी… करते रहते अपनी पत्रकारिता…. अगर कथित तेवरदार पत्रकारिता में उनका मन नहीं लगा और प्रभात खबर में नौकरी चाहने लगे तो उन्हें कम से कम झूठ तो नहीं बोलना चाहिए था…. किसी ने आप पर भरोसा करके अपने साथ जोड़ा और आप झूठ पर झूठ बोल रहे हैं और आखिर में विश्वासघात कर जाते हैं…. नौकरी छोड़ना गलत नहीं है…. गलत है भरोसे की हत्या करना…. नौकरी छोड़ने से पहले आप उस प्रबंधन को भरोसे में लेते जिसने आप पर भरोसा किया…. राघवेंद्र तो यही कहता रहा कि वो कहीं नहीं जा रहा है…. क्या प्रभात खबर के नियुक्ति पत्र के बगैर भास्कर में राघवेंद्र को नौकरी मिल जाती? शायद वे कथित तेवरदार पत्रकारिता ही कर रहे होते अब तक…. आलोक नंदन जी, अब तो सुधर जाइए….. फिजूल के कुतर्क करना बंद करिए….
pradeep pallove
August 11, 2010 at 9:13 am
RAGVENDRA kabi berojgar nahi raha.nokari ki chinta agar ratha to way bhi managment ka gee haguri kartya.RAGVENDRA koi mari machali nahi jo dhara k sath bathya.way to jinda dil walaya insan hi.biprit may bahna sabky bas ki bat nahi. kavi ragvendra k sath kam karky tho dakiya. door jana ki jarurat nahi hi .MIND MAGZINE nikal kar dakh ligiya na. hi kisiko istharah likhnay ka okat. koi sampadak yesh tharah likwany ki himmat karaga.Dc dhanbad bila rajesh k barya me bila ki lila jasa samachar kisi ko likhny ki himmat hi.agar likh v diya to koi sampadak chap sakaga.sayad nahi. wasa v RAGVENDRA koi talab ki pani nahi jo ek jagah raghkar ganda ho gaya.ALOK Jee thik kha rahya hi GANADESH ko phar kar dekh ligya.patna me ek kalakar bhugh say mar jatha hi. bhara akhbaro k liya yah koi khabar nahi RAGVENDRA ny likha kalkkar to mar gya kam say kam inki mm ko bacha ligya.RAGVENDRA par ekk anguli uthanay kya pahalay apni yur tin anguli uthi hi .jara choch kar kisi k barya mi likhiya.PRABHAT KHABAR kavi katha hi Bhagalpur say akhabar august me niklaga phir khatha hi october me niklaga phir chunoe ke bad khagayga january me niklagyga.Iss bich kiya RAGVENDRA Prabhat khabar say bridhya avastha pension lata raha woo v bina kaam ke.kya yeh sahi yoga . PALLOVE
pankaj
August 11, 2010 at 9:14 am
yah pahali bar nahi hai jab isne dhoka nahi diya hai- iske pahale kitno ko chuna laga diya hai
pankaj
August 11, 2010 at 10:01 am
yah unki purani fitrat hai aour kitno ko unhksns chuna lagaya hai iska thikana nahi hai
Bhootnath
August 11, 2010 at 12:00 pm
Raghvendra ne dhanbad prabhat khabar ka sampadak rahte kya gul khilaya tha yah na to Harivansh g se chhoopa hai aour na DHN ke patrakaro se,fir MIND patrika mein to ve master mind nikle. DHANBAD se ve apne munh par kalikh potwa kar hi bhage thhe.is kathit krantikari patrakar ne yaha khoob loota. fir yah baat samajh se pare hai ki harivansh ne aakhir use bulaya kyo.
Bhootnath
August 11, 2010 at 12:00 pm
Raghvendra ne dhanbad prabhat khabar ka sampadak rahte kya gul khilaya tha yah na to Harivansh g se chhoopa hai aour na DHN ke patrakaro se,fir MIND patrika mein to ve master mind nikle. DHANBAD se ve apne munh par kalikh potwa kar hi bhage thhe.is kathit krantikari patrakar ne yaha khoob loota. fir yah baat samajh se pare hai ki harivansh ne aakhir use bulaya kyo.
anaam
August 11, 2010 at 12:17 pm
Bhai Yashvant Harivansh ka aap badi khayal rakhte hai. Raghvendra ka istifa unse na juda hota to headline kuchh aour banthi, usme raghvendra ki taarif v hoti kintu yaha to aapko jaatidharm ka palan karna thha na!
alok nandan
August 11, 2010 at 6:00 pm
नौकरी छोड़ने से पहले आप उस प्रबंधन को भरोसे में लेते जिसने आप पर भरोसा किया…. ..शशि शेखर जी ने अमर उजाला छोड़ने के पहले क्या अमर उजाला प्रबंधन को भरोसे में लिया था? और मृणाल पांडे को हिन्दुस्तान से रुखसत करने के पहले क्या हिन्दुस्तान प्रबंधन ने उन्हें भरोसे में लिया था?? मुझे लगता है कि इस मामले पर अबप पूरी तरह से आब्जेक्टिल होकर विचार करने की जरूरत है….
उन्हें प्रभात खबर में नौकरी के लिए नाक रगड़ने की क्या जरूरत थी…तो क्या जो लोग नौकरी के लिए कहीं पर अप्रोच करते हैं तो उसे नाक रगड़ना माना जाएगा??? मैं समझता हूं यदि डेमोक्रेटिक सेटअप कोई अखबार रन कर रहा है और कोई पत्रकार वहां पर नौकरी के लिए आवेदन करता है तो इसे सम्मानजनक तरीके से लेना चाहिये न कि नाक रगड़ने वाली मुहावरा के साथ…..वर्किंग पीपुल का यह डेमोक्रेटिक अधिकार है कि वह जहां चाहे वहां अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी हासिल करने के लिए अप्रोच कर सकता है….और आप किस भरोसे की बात कर रहे हैं???? टीवी 18 ग्रुप से एक झटके में सैंकड़ों लोगों को बाहर कर दिया गया था, हिन्दुस्तान ने भी कुछ ऐसा ही किया था….पत्रकारों की नौकरी से भली तो एक वेश्या का कोठा है जहां पर सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की गारंटी तो होती है…..क्या आज की तारीख में प्रबंधन भरोसे मंद है???? अरुण शौरी को रातों रात प्रबंधन ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था….
राघवेंद्र तो यही कहता रहा कि वो कहीं नहीं जा रहा है…. क्या प्रभात खबर के नियुक्ति पत्र के बगैर भास्कर में राघवेंद्र को नौकरी मिल जाती?…..तो क्या नियुक्ति पत्र एक पत्रकार को बनाता है या व्यक्ति पत्रकार होता है तब उसे नियुक्ति पत्र मिलता है???
राघवेंद्र जी ने चाहे जो कुछ किया हो, लेकिन उनका स्तर इतना नहीं गिरा है कि उनके लिए थर्ड पर्सन के साथ एक वचन का इस्तेमाल किया जाये…..पत्रकरों को संबोधित करने में भाषा की यह गिरावट क्यों????? तर्क और कुतर्क के बीच की बारीक लकीर क्या है????
nirmal
August 12, 2010 at 1:20 am
Achanak achhi nauokari log nahi chor dete iske piche raj hai- Pata chala Hai ki buero office kholane ke nam par achha khasa paisa use mila auor usne use hazam kar liya. harivans ko report kuch aor deta tha karata kuch auor tha. rahata tha bhagalpur me batata tha kishangang me. nauokari dilane ke nam par bahuto se chamchagiri karbayi auor paise ki ugahi ki. pol khulane ke bad jane me hi bhalayi samjhi. iske wahi shikar huwe jisane is par bharosa kiya. prabhat khabar dhanbad chorne ke bad isne mind patrika ke nam par agrawal ko chuna lagaya jisme iske sikar huwe prabhat khabar ke kuch reporter. kamayi jab ho gayi to patrika band kar diya. is frod ke kahne par prabhat khabar se job chorkar ane wale reporter road par aa gaye. bad me kisi tarah unhone phir prabhat khabar join kiya. iske sentimental crime ka sikar huwe lokesh, uttam, prem, kamal,sushil ashok,nirala, ranjit se pucha ja sakta hai. seth ki kamayi se safari kharid li aour sathi ko chor diya ram bharose.. hari anant hari katha ananta ki tarah hai iske kisse jiska khulasa bad me karunga. patna jane bad bhi iska dhandha chalu rahaha iske lut ke sikar aour bhi huwe
Tewar
August 12, 2010 at 10:53 am
chatukarita ki had ka pata to aajtak nahi chala hai, lekin yashvant ji apko to GADKARI ki bhasha me esmamle ke champian mana jana chahiye. Apki es kalabaji ke liye Prabhat khabar se add mil jayega. badhai ho.
anaam
August 12, 2010 at 11:44 am
Nirmal ka comment mein sab to theek hai par UTTAM koe bare mein baat hi kuchh aour hai. wah to RAGHVENDRA ka sabse bada chamcha thaa tatha avaidh koyale ki karobar se vasuli bhi vahi karta thha, yah kaha jay to galat nahi hoga ki RAGHVENDRA ko bhrast banane mein UTTAM ka bada yogdan hai,
binay kumar singh,Palamu
August 13, 2010 at 9:00 am
paisa hi sab kuchh nahi hai. bishwas ki raksha bhi jajuri hai. awashar milne par jana chahiye lekin ek editor se itni apeksha jarur hoti hai ki wah netaon ki tarah chupchap khi na chala jaye.
abhishek kumar jha
August 14, 2010 at 9:46 am
kisi par aarop lagane se pahle us sakhs k bare me sachai pata hona chahie jis raghvendra ji k bare me aap aarop laga rahe hain ki wo berojgar the aur bewafai ki to isse pahle apko sochna chahie ki prabhat khabar ko bihar me jagah dilane wale raghwendra ji hi hain .wo suljhe hue insan hain aur unhone wahi kiya jo ek suljhe hue insan ko karna chahie.aur han wo berojgar bhi nahin the wo ek saptahik akhbar nikal rahe the .aur wo bhi tab jab sare media nitish ki chaplusi karne me lage the aur us samay ganadesh ne sarkar ki bakhiya udherne ka kam kiya .raghwendra ji se imandari aur nispaksh patrakarita se aj k patrakaro ko sikh leni chahie . aur aap us imandar nidar patrakar k bare me kuchh bhi likh dete hain .patrakarita k nispakhsta ko banae rakhe pls is tarah bebuniyad aarop nahi lagaya karen
uma
August 16, 2010 at 11:56 am
(इससे पहले के पोस्ट को रद कर लें)
नहीं मालूम यशवंत जी आप कौन सी पत्रकारिता कर रहे हैं। क्या मकसद है और कोई मर्यादा भी है या नहीं।
कम से कम खबरों के बीच छूट रहे स्पेस की अंतर्कथाओं को तो गुनते। आपको पत्रकारों की पैरोकारी करनी है या प्रबंधन का पक्ष रखना है कुछ भी स्पष्ट नहीं। गुस्ताखी के साथ यह बात कहनी पड़ रही है।
कुछ दिनों पहले जिस हरिवंश जी और प्रभात खबर की जमकर खिचाई आपने की थी, आज उन्हें डिफेंड करने के लिए अपने हिसाब से एक पत्रकार को नंगा करने की कोशिश की। नहीं मालूम, पत्रकार बिरादरी के लिए आपने कितना क्या किया है, पर राघवेंद्र हैं कि प्रभात खबर से बाहर होकर उन्होंने उनका साथ निभाने के अपराध में जिन लोगों को बेघर किया गया उनके लिए निहायत निजी जीवन को संकट में डालकर जी-जान लगाई। यह अलग बात है कि फिनांसर कमजोर निकला और पत्रिका अधिक नहीं चल सकी। इन पंक्तियों को लिखनेवाला प्रभात खबर से निकाला नहीं गया था, पर अनप्रोफेशनल एटीच्यूड के प्रति मुख्यालय की संपादकीय लापरवाही से आजीज आकर नौकरी छोड़ी। राघवेंद्र जी के छोड़ने के बाद की बात है। फिर उनके साथ उनकी पत्रिका में हो लिया। पत्रिका से उनकी रुखसती के बाद मैंने पत्रिका चलाई और अपनी असहायता और दुर्दशाओं से पीडि़त होकर पत्रिका में राघवेंद्र जी के खिलाफ छापा भी। हरिवंश जी के प्रति मेरी श्रद्धा कभी कमी नहीं। प्रभात खबर को छो़ड़ने के बाद दुबारा मुझे बुलाकर मेरी परीक्षा (लिखित के साथ हर तरह की) ली गई। और परीक्षा उस व्यक्ति ने ली जो कभी मेरे समांतर कलकत्ते में था। बहुत छिछोरे अंदाज में वह (जिसने हरिवंश जी के बेतहाशा भरोसे को तोड़ा) मुझे अन्यत्र भेजने को तैयार हो गए। मैं नहीं गया। फिर हरिवंश जी के बुलावे पर मैं गया और क्विंटल भर का आश्वस्ति-प्रशस्ति लेकर लौटा। इस बार उन महोदय को हिदायत दी गई कि इस बार यह हाथ से जाए नहीं। जहां कहीं भी दो, प्रभारी बनाकर दो। लेकिन सज्जन को मुझसे न जाने कौन सी खुन्नस थी, उन्होंने कोई रुकावट डाल दी।
मैं यह सब इसलिए बोल रहा हूं कि मैं राघवेंद्र जी का दलाल नहीं और हरिवंश जी का अंधभक्त नहीं। हरिवंश जी ने जिन चार-पांच पत्रकार को सींचा, वे सब आज उनके साथ नहीं। नहीं मालूम यह सेलेक्शन का दोष है या…आज मैं सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हूं, खुश हूं। मीडिया में वापसी नहीं चाहता।
प्रभात खबर की दूसरी पारी से पहले राघवेंद्र जी को कम से कम तीन बार आफर मिल चुके थे। लेकिन अपनी तरह की धार की पत्रकारिता (आक्रामकता का) करने वाले राघवेंद्र की खासियत से उनके विरोधी खेमे के पत्रकार भी कबूलते हैं कि बिहार-झारखंड में इस मजबूती के साथ अपने पत्रकार टोली-बिरादरी का साथ देनेवाला कोई और नहीं। प्रभात खबर को जो छवि और प्रसार उस दौर में मिला फिर वह सपना रहा। उसके बाद से धनबाद संस्करण में चार साल में छह प्रभारी-संपादक आ गए। रही बात प्रभात खबर छोड़कर चुपके-चुपके भास्कर जाने की, तो यह आपके भड़ास में नहीं समाया हो, पर वे भास्कर की प्राथमिकता में बहुत दिनों से थे। और क्षेत्र में लोग जानते थे। उच्च पदों पर आसीन लोगों की फजीहत अखबारों में किस तरह हो रही है इसे यशवंत जी आप बखूबी जान रहे हैं। दर्जनों उदाहरण है कि प्रावधान के बावजूद बगैर पूर्व सूचना के मुअत्तली की नोटिस थमा दी जा रही है। यदि प्रोफेशनलिज्म की भाषा में टेकनिकल स्किल है और तर्क है कि बाजार में उपलब्ध बेस्ट आप्शन से वह वंचित क्यों रहे। यह प्रतिष्ठान के लिए तो चलेगा, पर एक पत्रकार जब अपने भविष्य को लेकर ऐसा कोई फैसला लेता है तो क्यों नागवार हो जाता है। एक अखबार के लिए संपादक या पत्रकार का आप्शन पाना मुश्किल नहीं, पर एक संपादक या पत्रकार के लिए अखबार का आप्शन ढूंढ लेना बहुत मुश्किल है। यदि राघवेंद्र जी बताकर चले जाते तो प्रतिबद्धता और ईमानदारी बची रह जाती और बिना बताए चले गए तो सारी प्रतिबद्धता और ईमानदारी पल भर में छूमंतर हो गई। कितने संपादक हैं जो प्रभात खबर की प्रिंटलाईन में हरिवंश जी धार को कुंद करने का काम कर रहे हैं और हर तरह की दलाली में संलग्न हैं। शायद आप भी जान रहे हों।
यशवंत जी इसमें क्या जायज होना चाहिए आप चुनें। किसी जमाने के नामचीन पत्रकार विनोद कुमार, दिग्गज शायरों के साथ मंच शेयर करनेवाले और गंगा पत्रिका में गंगास्नान करानेवाले अच्छे-खासे पत्रकार देवेंद्र गौतम, दीपक शर्मा, धनबाद के नामचीन खेल पत्रकार विजय सिन्हा का कौन सा दोष था कि उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। प्रबंधकीय या संपादकीय स्वेच्छाचारिता के कारण जब दर्जनों पत्रकार सड़क पर आ जाते हैं तो आप किसी को इस अंदाज में कोसते हैं? राघवेंद्र जी के संदर्भ में आपने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, वह कहीं से शालीन नहीं कहा जा सकता। हां, एक खेमा को खुश जरूर किया जा सकता है। लेकिन इसका हासिल क्या होगा। पत्रकारीय सरोकार को बल मिलेगा क्या?
prabhat
August 17, 2010 at 11:19 am
apke aalekh kee saree baten sahin nahin hai,lekin ek baat sach hai ki Raghwendra kisi kaa nahin hai… wo kisi ke ho hee nahin sakte..
PALLOVE GODDA
August 18, 2010 at 11:59 am
UMA JEE
Aap ko RAGVENDRA JEE KITNA MANTE THE MANE DHAKA HI.AAP TO SRIGAN KE SAMPADAK TAK BANE.AAP NE HI KUCH MITRO KE ATI MATWAKANSA NI PATRIKA KO DUWA DIYA BARNA AAG RAGVENDRA JEE KAHI AUR RATHE.KHER BITE BAT KO BHULNE SAY HI PAHIDA HI.LAKIN KOI RAGVENDRA JEE KE MERIT PER KOI ANGULI UTHATHA HI TO DUKH HOTA HI
pranv singh katihar (sadhna spritual channel)
September 7, 2010 at 6:34 am
my friends
i know mr. ragvendra ji personally. he is very coprative and helpful man. sometime persone will very busy in this time have a minor mistakes. dil pe mat le yaar.
pranav
9431285367