बनारस से आ रही सूचना के मुताबिक हिंदुस्तान, वाराणसी के स्थानीय संपादक रवि पंत संस्थान को बॉय-बॉय बोलने की तैयारी कर चुके हैं. सूत्रों के मुताबिक शशि शेखर की हिंदुस्तान में ताजपोशी के बाद मृणाल पांडेय के खास रहे तीन संपादकों पर गाज गिराने की तैयारी की गई थी. संयोग ये कि तीनों ही लोग पहाड़ से ताल्लुक रखते हैं. दिनेश जुयाल, हिमांशु घिल्डियाल और रवि पंत. दिनेश जुयाल तो बदली हुई आबोहवा में खुद को फिट न पाकर अपने पूर्व संस्थान अमर उजाला चले गए. हिमांशु घिल्डियाल ने भास्कर में ट्राई मारा और उनकी नियुक्ति हो गई. बचे रह गए हैं रवि पंत.
सूत्रों के मुताबिक हिंदुस्तान प्रबंधन ने रवि पंत को इशारा कर दिया है कि वे देर-सबेर अपनी व्यवस्था कर लें. बताते हैं कि रवि पंत काफी दिनों से हिंदुस्तान से मुक्ति के लिए प्रयासरत हैं पर उनकी बात फाइनल होने में कोई न कोई पेंच अटक जा रहा है. अब चर्चा है कि रवि दैनिक भास्कर जाने की तैयारी कर चुके हैं. कुछ लोगों का कहना है कि रवि अमर उजाला में जा सकते हैं. पर इतना तो दावे के साथ कहा जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में रवि हिंदुस्तान को गुडबाय बोल सकते हैं.
रवि पंत से जब इस बारे में बात की गई तो उन्हें हिंदुस्तान से इस्तीफे की किसी भी संभावना से इनकार किया. उन्होंने दैनिक भास्कर या अमर उजाला जाने की चर्चा को भी खारिज किया. ज्ञात हो कि रवि पंत बनारस से पहले हिंदुस्तान में ही मेरठ के स्थानीय संपादक के रूप में काम कर रहे थे. उससे पहले वे मेरठ में दैनिक जागरण में कुछ महीनों तक रहे. विनम्र स्वभाव वाले रवि कम समय में ही एक के बाद एक तरक्की करते हुए स्थानीय संपादक की कुर्सी तक पहुंच गए.












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February 17, 2010 at 6:15 am
शिखर पर बहुत फिसलन है
SHIVANI
June 20, 2010 at 12:56 pm
[b][i]मैं हूँ २६ जनवरी …….
कुछ कहने आज आई हूँ ,
यादें वो बीते वक़्त की,
समेट पलकों में लाई हूँ .
मैं हूँ २६ जनवरी …….
सोने की चिड़िया नाम से,
एक देश जाना जाता था ,
संस्कृति के गौरव से ,
जग में पहचान जाता था.
पर वक़्त ने ली करवट ,
एक ऐसा ज़लज़ला आया,
इतिहास के पन्नो पर
अंग्रेजी राज वो कहलाया
हो गए गुलाम अब ,
अपने ही देश में..
बन गए वो मालिक ,
आये मेहमान के भेष में ,
कठपुतली की डोर
जैसे वो नचाते थे
बेबस हिन्दुस्तानी ,
नाचते से जाते थे ,
पर रात हो लम्बी जितनी ,
आखिर बीत ही जाती है,
हर सुबह संग अपने
उम्मीद की किरण लाती है ,
मंगल पाण्डेय ने ५७ में
जो ज्वाला क्रांति की भडकायी थी ..
देश सिर्फ हमारा है,
देशवासियों को समझ आई थी
लक्ष्य निज देश को ,
अब आज़ाद करवाना है
कहती थी एक लड़की ,
फिरंगी को दूर भगाना है ,
लड़ते -लड़ते हो गयी शहीद,
उम्र थी २३ साल,
वाह, रानी लक्ष्मी तूने,,
कायम कर दी मिसाल ,
बस फिर चला जो करवा
आगे -आगे ही बढ़ते गए ,
नेहरु,गाँधी ,भगत सिंह ,
नाम सब जुड़ते गए
सांस ये स्कून की,
आज जो ले पाए है,
मांओ ने अपने लाल
इसके वास्ते लुटाये है,
पर आज शायद हम ,
खुद के ही गुलाम है,
एक-दूजे का गला काटना
यही हमारा काम है,
जिसे देखो ,वो धर्म का ,
राग सा अलापता है ,
क्यों आंतकवाद का खतरा ,
हर पल सर पे मंडराता है ,
न्याय मिलने में यहाँ
एक अरसा बीत जाता है,
देश को लूटे आज ,
देश का ही रखवाला ,
कोई ओढे शाल दुशाला
कोई ओढे कम्बल काला,
शहीदो को देना ,
सच में अगर मान है,
बस देश को अपना जानो ,
वो हमारी पहचान है,
तू बढता जा बस आगे,
में तेरी ही परछाई हूँ,
हूँ में २६ जनवरी,
कुछ कहने आज आई हूँ.
शिव.
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