Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

कहिन

अल्मोड़ा, आंदोलन, साहजी, तिवारीजी और विवाद

संपादक राजीव लोचन साह ने ‘नैनीताल समाचार’ मैग्जीन में एक लेख लिखा. ‘अल्मोड़ा लाजबाब’ शीर्षक से. इसमें उन्होंने काफी कुछ बातें कही हैं, कुछ सीधे, कुछ आड़े-तिरछे व अमूर्त रूप में. उनके इस लिखे का जवाब दिया है उनके साथी रहे अल्मोड़ा के पीसी तिवारी ने. तिवारीजी ने जवाब खुले पत्र के रूप में भेजा है. पहले साहजी का ‘अल्मोड़ा लाजवाब’ पढ़िए फिर तिवारी जी का ‘साहजी के नाम खुला पत्र’. ये लेख व पत्र अपने समय के कई कड़वे सचों की शिनाख्त करा रहे हैं. -एडिटर

संपादक राजीव लोचन साह ने ‘नैनीताल समाचार’ मैग्जीन में एक लेख लिखा. ‘अल्मोड़ा लाजबाब’ शीर्षक से. इसमें उन्होंने काफी कुछ बातें कही हैं, कुछ सीधे, कुछ आड़े-तिरछे व अमूर्त रूप में. उनके इस लिखे का जवाब दिया है उनके साथी रहे अल्मोड़ा के पीसी तिवारी ने. तिवारीजी ने जवाब खुले पत्र के रूप में भेजा है. पहले साहजी का ‘अल्मोड़ा लाजवाब’ पढ़िए फिर तिवारी जी का ‘साहजी के नाम खुला पत्र’. ये लेख व पत्र अपने समय के कई कड़वे सचों की शिनाख्त करा रहे हैं. -एडिटर


अल्मोड़ा…लाजवाब!

राजीव लोचन साह

लाजवाब शहर है अल्मोड़ा! इसमें कोई दो राय नहीं। आप कितनी ही गहराई से इसे जानते हों, लेकिन हर बार इसे देख कर चमत्कृत हो सकते हैं। अरे, तो यह भी इसका एक चेहरा है?

राजनीतिक या सामाजिक रूप से यहां कुछ विशेष न भी घट रहा हो, लेकिन यहां की अदभुत प्रतिभायें कुछ न कुछ ऐसा अवश्य कर डालेंगी कि आप हैरान रह जायेंगे। हो सकता है बाहर रहते हुए आप उस घटना का कोई नोटिस भी न लेते, लेकिन इस नगर में पांव रखते ही वह आपको तीसरी दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण घटना लगेगी।

शराब को ही लें। लम्बे अर्से तक अल्मोड़ा शराब विरोधी आंदोलन का केंद्र रहा। 1984 में यहां से उठे ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन ने पूरे देश में अपनी धमक पहुंचायी थी। अब भी यहां उस दौर के एक वरिष्ठ आंदोलनकारी हैं, जो ‘शराब माफिया’ को लेकर अपने कड़े रुख के कारण पूरे उत्तराखंड में विख्यात हैं। शराब माफिया पर उनके हमले लगातार जारी रहते हैं और खीझा हुआ कथित शराब माफिया भी जब-तब उनके खिलाफ गुमनाम रूप से चटपटे पर्चे बांटता रहता है। इस बार वे शराब माफिया की ओर पीठ फेरे खड़े थे और अपने एक पुराने आंदोलनकारी साथी के खिलाफ पर्चे बांट रहे थे कि वे साम्प्रदायिक मंचों पर जाकर भाषण दे रहे हैं और इस प्रकार देश की साम्प्रदायिक एकता के लिये बहुत बड़ा खतरा बन गये हैं। उनके ईमेल अटलांटिक महासागर पार कर पृथ्वी ग्रह के दूसरे सिरे तक पहुंच रहे थे। इधर शराब माफिया अपना खेल खेल रहा था।

28 मार्च को पूरे प्रदेश की तरह अल्मोड़ा जनपद के लिये भी देशी और विदेशी शराब के ठेके हुए। जनपद मुख्यालय में लॉटरी से भाग्यशाली शराब विक्रेताओं के नाम निकाले गये। लेकिन अन्यत्र कुछ हुआ हो अथवा नहीं, अल्मोड़ा नगर में उस शाम एक भव्य दावत हुई, जिसके छिटपुट धमाके एक सप्ताह बाद भी नगर के विभिन्न गली-कूचों में सुनाई दे रहे थे। कहा जा रहा है कि वह दावत मूलत: पत्रकारों के लिये थी और कसारदेवी के एक भव्य रिजोर्ट में सम्पन्न हुई थी। कुछ लोग कहते हैं कि प्रशासनिक अधिकारी अपनी मौज-मस्ती के मूड में थे, कुछ पत्रकारों ने ही उलाहना देकर कि आप लोग कभी साथ-साथ बैठने का मौका ही नहीं देते, अपने आपको जबरन प्रशासन के गले मढ़ दिया। जिला सूचना अधिकारी दीपक जोशी ऐसी किसी दावत के होने से ही साफ मुकर जाते हैं, जबकि दावत में शामिल पत्रकार दावा करते हैं कि वे वहां बाकायदा मौजूद थे। बहरहाल, इतना सभी मानते हैं कि डी.एम., एस.पी., ए.डी.एम., एस.डी.एम., सी.एम.ओ. जैसे वरिष्ठ अधिकारी वहां थे और जब वे थे तो उनके साथ लगे रहने वाले छोटे स्तर के अधिकारी तो होंगे ही।

दावत में 36 प्रकार के षटरस व्यंजन थे तो कई किस्म की मदिरायें भी थीं। खूब गाना-बजाना हुआ और मस्ती में आये एक एस.डी.एम. साहब यहां तक कहते सुने गये कि यह पूरा रिजोर्ट ही अवैध रूप से बना है। यह आयोजन किसकी ओर से हुआ, यह पूरी तरह साफ नहीं हुआ है। यदि कोई सूचना के अधिकार के तहत पूछे तो शायद स्पष्ट हो जाये। अलबत्ता अनजाने में इस दावत में पहुंच जाने का दावा करने वाले एक पत्रकार कहते हैं कि जब उन्होंने पूछा कि यह दावत हो किसकी तरफ से रही है, तो आबकारी अधिकारी ने गर्व से उन्हें बताया था कि ‘आप लोगों ने लॉटरी की पर्चियां निकाली थीं, इसलिये हमारी ओर से यह दावत है।’ अब जाहिर है कि आबकारी से जुड़े अधिकारी अपनी जेब से ऐसी दावतें तो करते नहीं।

हमारा समाज अब बहुत उदार हो गया है। जहां कहीं महिलाओं की जिंदगी नारकीय हो गई है, वहीं वे किसी बाहरी संगठन अथवा मीडिया की मदद के बगैर शराब के खिलाफ अपनी लड़ाइयां लड़ रही हैं। जैसे अल्मोड़ा से महज 26 किमी. दूर बसौली में। वैसे खाते-पीते घरों की महिलायें बाकायदा शराब के ठेके ले रही हैं। शादी-बारात जैसे निजी आयोजनों में सार्वजनिक रूप से शराब पीना अब बीच-पच्चीस साल पहले की तरह बुरा नहीं माना जाता। अनेक बार सरकारी आयोजनों में भी डिनर के साथ शराब परोस दी जाती है। लेकिन इस दावत की टाइमिंग अदभूत थी। दिन में लॉटरी और शाम को आबकारी महकमे की ओर से दावत!

जाहिर है कि अल्मोड़ा जैसी ‘सांस्कृतिक नगरी’ में चकल्लस तो होना ही था। अब, यहां से प्रेरणा लेकर सारे ही जनपद मुख्यालयों के पत्रकार अगले वर्ष से उस दिन का इंतजार करेंगे, जिस दिन शराब के ठेके छूटने वाले होंगे।

एक पुछल्ला और सुनें। दावत उड़ाने वाले एक पत्रकार कहते हैं, भाई साहब बात कुछ भी नहीं है। यह तो साप्ताहिक अखबारों के उन चुक गये पत्रकारों का भड़ास है, जिन्हें प्रशासन ने घास नहीं डाली। वे नुक्कड़ों-दुकानों में जाकर इसे ‘इशू’ बना रहे हैं। बेमतलब पत्रकारों की एकता तोड़ी जा रही है। है न मजेदार बात? अब आप कभी अल्मोड़ा आयें तो अखबार पढ़ने के झंझट में न पड़ें, ओने-कोने में हो रही फुसफुसाहटों पर कान लगायें।

(‘नैनीताल समाचार’ के 15 से 30 अप्रैल के अंक में प्रकाशित)


साहजी के नाम खुला खत

-पीसी तिवारी-

आदरणीय राजीव लोचन साह। संपादक, ‘नैनीताल समाचार’। आपका सम्मानित पाक्षिक (15-30 अप्रैल 2010) का अंक मुझे कुछ साथियों ने उपलब्ध कराया। आपकी ओर से अक्सर मुझे यह समाचारपत्र मिल जाता था, पर इस बार जानबूझकर, या अनजाने यह महत्वपूर्ण अंक मुझे डाक से अब तक नहीं मिला।

आप जानते होंगे कि पिछले कुछ वर्षों से आपसे तथा आपके अखबार से मेरा कोई खास सम्बन्ध नहीं है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि आपके साथ बिताये गये समय ने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचने को बाध्य किया कि आप उतना ही लोकतन्त्र बरदाश्त कर पाते हैं, जहां तक आप की तारीफ हो। आप संगठन में गुटबाजी करने तथा कमजोर नेता को वश में कर अपनी मनमानी करने के आदी रहे हैं। अगर मैं यह कहूं कि अपनी इन हरकतों से उत्तराखण्ड लोक वाहिनी को पथभ्रष्ट करने और डुबाने में आपने प्रमुख भूमिका निभाई तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। इसलिए मेरा मानना है जिन्हें किसी भी रूप में समाज का काम करना है, उन्हें आगे बढ़ने के लिए आपसे दूरी बनाकर चलना चाहिए। मैं ही नहीं, वरन सभी समझदार साथी इस बात को समझते हैं कि आप दो-तीन महानुभावों के कॉकस में तू मेरी तारीफ कर, मैं तेरी तारीफ करूंगा की होड़ रहती है। और बात चाहे संघर्ष की हो, पत्रकारिता की या संस्कृति की, दिन-रात मरने-खपने वाले साथियों के काम से भी अपना नाम चमकाने में आपको महारथ हासिल हो चुकी है। यदा-कदा जब कभी आपके इस व्यवहार को चुनौती मिली तो आप लोगों ने हर किसी को अपने शातिर अंदाज में निपटाने की भरपूर कोशिश की है।

इसमें कोई शक नहीं है कि एक व्यवसायी परिवार में जन्म लेने तथा उसमें पल़ने-बढ़ने के दौर में आपने अपने हित-लाभ सुरक्षित करना अच्छी तरह सीखा। आपकी पत्रकारिता भी इसका अपवाद नही है। पिछले अनेक वर्षों से आप दिन-रात यह रोना रो रहे है कि ’’सहकारिता के आधार पर उत्तराखण्ड का पाक्षिक’’ जन सहयोग एवं आर्थिक दिक्कतों के चलते कभी भी बंद हो सकता है। आपने इस दर्दनाक अपील से काफी कुछ प्राप्त भी किया है। मित्रवर बहुत अच्छे, ऊंचे संपर्कों, अच्छी आर्थिक पृष्ठभूमि के बावजूद आपने ‘नैनीताल समाचार‘ को चलाने की जिम्मेदारी होशियारी से ’’सहकारिता’’ के हवाले कर दी है और संपादक के रूप में हर प्रकार का श्रेय लेने का महान उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया है। एक ऐसे दौर में जब प्रतिबद्ध लोग अभावों से जूझते हुए अपने साधनों से पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित कर रहे हैं, तब अपने दायित्व दूसरों पर सफलतापूर्वक डाल पाने के आपके हुनर को मैं सलाम करता हूं।

यहां मैं यह अवश्य कहना चाहता हूं कि न्यायपालिका पर भी कलम चलाने का साहस दिखाने वाले आप, अपने समाचार पत्र में नैनीताल के होटल मालिकों के शोषण, पर्यटकों को ठगने, उनसे जमकर वसूली करने की रोज बरोज होती घटनाओं और इन्हीं होटलों में मजबूरी और अभाव से खटने के लिए मजबूर साधारण कर्मचारी की ओर दृष्टिपात नही कर पाते। साहजी आप इस मामले में कुछ कह पायें या न कह पाए हम आपकी मजबूरी को समझते हैं और हमें आपकी इस मजबूरी से सहानुभूति भी है। कम से कम आप हमारी तरह मूर्ख तो नहीं हैं जो असहमत होने पर घर परिवार के लोगों से भी वैसी ही महाभारत कर बैठते हैं जैसे कि बाहर के लोगों से। आपके इस कौशल पर निश्चय ही कुमाऊं विश्वविद्यालय को कुछ शोधपत्र प्रकाशित कराने चाहिए।

राजीवदा अब मैं थोड़ा मुद्दे की बात पर आता हूं जिसके कारण आपके प्रति तटस्थ भाव को छोड़कर मुझे यह खत लिखने को मजबूर होना पड़ा है। आपने अप्रैल 2010 के द्वितीय अंक में अपने नाम से पेज 3 पर ‘अल्मोड़ा….लाजवाब’ लिखा है। इस लेख में अल्मोडा़ नगर और उसके कुछ सरोकारों के लिए आपने वर्षों से चली आ रही अपनी कुंठाओं को जहां सार्वजनिक किया है वहीं कुछ आड़े-तिरछे व्यंग्य बाणों से अपने बौद्धिक अहंकार को भी प्रदर्शित किया है।

साहजी इस लेख को कम से कम दो बार पढ़ने के बाद भी मेरी समझ में यह नहीं आ पाया कि आखिर आप कहना क्या चाहते हैं? आपने लिखा है कि 1984 में यहां (नगर) से उठे नशा नहीं रोजगार आंदोलन ने पूरे देश में अपनी धमक पहुंचायी थी।) जबकि मेरे जैसे लोग समझते हैं कि इस आन्दोलन का प्रारम्भ बसभीड़ा (चैखुटिया) जैसे गांवों की पीड़ा से हुआ था। इस आंदोलन का श्रेय लेने में आप और आपके ”वरिष्ठ आंदोलनकारी साथी कभी पीछे नहीं रहे” पर आपने कुटिल व्यंग्य से मेरे ऊपर यह झूठा आरोप मढ़ दिया कि ”इस बार शराब माफिया की ओर पीठ फेरे खड़े थे।” आपकी बातों से साफ लगता है कि आप लड़ाई लड़ने के लिए नहीं, वरन मात्र श्रेय लेने के लिए पैदा हुए हैं। वरना इतना बड़े सामाजिक राजनीतिक मुद्दे पर आप मेरा ठेका होने जैसी बात नहीं करते।

राजीव दा मेरी ओर इशारा करते हुए आपने लिखा है कि ”अब भी यहां उस दौर के एक वरिष्ठ आंदोलनकारी हैं जो शराब माफिया को लेकर अपने कडे़ रुख के कारण पूरे उत्तराखंड में विख्यात हैं। शराब माफिया पर उनके हमले लगातार जारी रहते हैं और खिझा हुआ शराब माफिया भी जब-तब उनके खिलाफ गुमनाम रूप से चटपटे पर्चे बांटता रहता है। इस बार वो शराब माफिया के खिलाफ पीठ फेरे खड़े बैठे थे और अपने एक पुराने आंदोलनकारी साथी के खिलाफ पर्चे बांट रहे थे कि वे सांप्रदायिक मंचों पर जाकर भाषण दे रहे हैं और इस प्रकार देश की साम्प्रदायिक एकता के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गये हैं। उनके ईमेल अटलांटिक महासागर पारकर पृथ्वी ग्रह के दूसरे सिरे तक पहुंच रहे थे। इधर शराब माफिया अपना खेल खेल रहा था।”

उक्त अनरगल बातें लिखकर आपने मुझ पर बडा़ उपकार किया है। पहली बात मैं स्पष्ट कर दूं कि हम एक शराब माफिया की नहीं, वरन सभी शराब माफियाओं की बात करते हैं। सोचने की बात यह है कि जब हम नशे के सवाल को व्यापक संर्दभों में उठाते हैं तक आप लोग शराब माफियाओं की तर्ज पर इस लडाई को सुनियोजित रूप से व्यक्तिगत लड़ाई बताने की कोशिश में लग जाते हैं। इसलिए आपको आपके शब्दों में खीझा हुआ कथित शराब माफिया पर गुस्सा नहीं आता, वरन उससे सहानुभूति होती है। और उसके द्वारा निकाले गये अनर्गल बेनामी पर्चे आपको चटपटे लगते हैं। मुझे लगता है कि अपनी इस सांस्कृतिक चेतना व पक्षधरता के लिए शराब माफियाओं को आपको अवश्य सम्मानित करना चाहिए। इसके बावजूद मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि जो भी असामाजिक तत्व गुंडे व माफिया आम जनता व आन्दोलनकारियों के साथ चोरी और फिर सीनाजोरी की कोशिश करेगा उसे सबक सिखाने में हम कभी न पहले पीछे थे न आगे पीछे रहेंगे। भले इसके लिए हमें अपना सर्वस्व हीं क्यों न दांव में लगाना पड़े। मैं मानता हूं कि इससे कम तेवरों में हम लोगों में से किसी को भी खुद को आंदोलनकारी कहलाने का हक नहीं है।

साहजी अपने लेख के दूसरे हिस्से में आपने एक महाझूठ को सच की तरह पेश कर मुख्य सवाल से ध्यान बंटाने की कोशिश की है। मुझे आश्चर्य है कि स्वतंत्र व निष्पक्ष पत्रकारिता के आप जैसे धुरन्धर ने नैनीताल समाचार में इस सूचना को स्थान क्यों नहीं दिया? पर अल्मोड़ा में आने वाले सभी प्रमुख अखबारों में 21 मार्च को फोटो सहित खबर लगी थी कि 20 मार्च को आपके खास कथित पुराने आंदोलनकारी विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित एकल शिक्षक अभियान के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए और उन्होंने इस अभियान की जमकर तारीफ की।

मित्रवर! अनेक मामलों में गंभीर वैचारिक, रणनीतिक मतभेद होने के बावजूद इस खबर पर सहसा विश्वास करना हमारे लिए भी कठिन था। पर यह कड़वी सच्चाई थी जिसका खंडन करना आपके बूते की बात नहीं है। मैंने इन समाचारपत्रों की कतरनों को पौड़ी में आयोजित उमेश डोभाल स्मृति समारोह में उपस्थित साथियों को दिखाया और उत्तराखण्ड व देश के कुछ अन्य साथियों, पत्रकारों को भी इसकी प्रमाण सहित जानकारी दी। मेरे जैसे व्यक्ति की दृष्टि में यह घटना एक आन्दोलनकारी के वैचारिक पतन की पराकाष्ठा है। मेरा मानना है कि इस तरह की घटनाओं से एक व्यक्ति नहीं आन्दोलन की पूरी एक धारा भी कलंकित होती है। यदि अपने लोगों को इस सूचना को देना गलती माना जाता है तो इस गलती को बार-बार दोहराने में मुझे आपत्ति नहीं होगी। पर आपने इस खबर में पर्चे बांटने जैसे जिस सफेद झूठ का कथन किया है, क्या आप इसे साबित कर सकते हैं? मुझे आश्चर्य है कि ऐसा निराधार व झूठा प्रचार आप कथित ’’सहकारिता के आधार पर निकाले जा रहे पाक्षिक’’ से क्यों कर रहे हैं? क्या सहकारिता में शामिल आपके सभी साथी आपके इस लेखन से सहमत हैं?

इसके आगे आपने पत्रकारों को आबकारी विभाग से कथित दावत, उसके किस्से, कहानियों का बखान कर इस गंभीर मामले को हंसी में उड़ाने की कोशिश की। यहां पर आपने चालाकी से यह जताने की कोशिश की है कि बाकी पश्चातवती घटनाएं जैसे मेरी प्रत्यक्ष व परोक्ष सहमति से घटित हुई हों जबकि इस घटनाक्रम में मैं किसी जगह उपस्थित भी नहीं था। कृपया बताएं आप जैसा बुद्धिजीवी ऐसा क्यों करता है? जहां तक पत्रकारों को शराब पिलाने की बात है, आप खुद जानते हैं कि उमेश डोभाल स्मृति समारोह जैसे आयोजनो में भी आप जैसे महारथी जो ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलनों का श्रेय लेने की भी भरपूर कोशिश करते हैं, खुलेआम शराब पीते व पिलाते हैं, तब दूसरों पर टिप्पणी करने का आपका क्या अधिकार है? रही बात कोई सूचना के अधिकार के तहत पूछे तो स्पष्ट हो जाये, तो यह अधिकार आपको तथा आपके वरिष्ठ पुराने आंदोलनकारी को भी प्राप्त है। आप स्वयं यह काम क्यों नहीं करना चाहते ? आपके लेख में उक्त दावत में एक एस.डी.एम. की टिप्पणी की ‘रिसोर्ट ही अवैध है’, भी बहुत मजेदार है।

राजीव दा मैंने सुना है कि नैनीताल में जहां आपके होटल चलते रहे हैं वह जगह पूर्व में आपके परिवार को एक अन्य स्थान छोड़ने के एवज में गैर व्यवसायिक उपयोग के लिए मिली थी। पर आप लोगों ने पहली जमीन को तो छोड़ा नहीं और दूसरी जमीन का व्यावसायिक उपयोग शुरू कर दिया। मित्रवर! सच्चाई क्या है, इसे आप बेहतर जानते होंगे पर मैंने सुना है कि इस मामले की फाइल भी नैनीताल नगरपालिका कार्यालय से आपके कुछ हमदर्दों ने गायब करवा दी है। तब आप अपने व्यवसाय को कितना वैध कहेंगे, इस पर आपको स्वयं विचार करना चाहिए।

मित्रवर! आपको शायद मालूम न हो पर सभी आंदोलनकारी शक्तियां जानती हैं कि हम शराब, राजस्व, सियासत के रिश्तों को बेनकाब करने के लिए अभियान चलाये हुए हैं। इसलिए हमने इस समस्या की ओर आपकी तरह पीठ नहीं फेरी है। न आपके व आपके मित्रों की तरह शराब के धंधेबाजों को किसी भी रूप में अपने कार्यक्रमों में बुलाने का पाप किया है। आपका यह लिखना भी सफेद झूठ है कि बसौली में चलने वाले शराब विरोधी आंदोलनों को पत्रकार का सहयोग नहीं मिल पा रहा है।

साहजी कहने को तो बहुत है पर मैं जानता हूं कि आप मुझसे इसलिए नाराज हैं कि वर्षों पहले प्रशासनिक अकादमी नैनीताल में झुसिंया दमाई के नाम पर आयोजित एक कार्यक्रम में हुए फर्जीवाड़े को मैं डॉ. आर. एस. टोलिया के संज्ञान में ले आया था। उत्तराखण्ड लोक वाहिनी के साथ आप लोगों द्वारा एक बड़े एनजीओ के संचालक रवि चोपड़ा से किये गये घालमेल और उमेश डोभाल स्मृति समारोह न्यास में आप लोगों के अलोकतांत्रिक रवैये पर टिप्पणी करने पर भी आप मुझसे खुश नहीं हैं। पर मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बहुत-सी और भी बातें है पर इस समय पत्र लंबा नहीं करना चाहता।

इस पत्र को मैं केवल आपको भेजना चाहता था। पर मुझे लगता है कि आप इसको अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करने का साहस नहीं करेंगे। इसलिए इस पत्र को कुछ अन्य साथियों को भेज रहा हूं ताकि यदि वे चाहें तो इस पर आंदोलनकारियों व समाज के बीच में खुली चर्चा हो सके।

आशा है आप कुशल होंगे।

पी.सी. तिवारी

देवकी निवास धारानौला

अल्मोड़ा -उत्तराखण्ड

संपर्क 09412092159

20 अप्रैल 2010 अल्मोड़ा

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. Nimesh Kumar

    April 25, 2010 at 4:03 pm

    दो बुद्धिजीवियों का टकराव भी होता है , तो काफी कुछ जानने सीखने को मिलता है। शायद इसीलिए पहले शास्तार्थ हुआ करते थे। लेकिन ये महज टकराव नहीं, एक बडी बहस का आगाज है। शराब और शराब से जुडी लम्बी लडाई की बहस… एन जी ओ के कामकाज के बहस… इस सबसे बढकर बहस- विभिन्न आवरण पहनकर लाभ उठाने पर। राजीव जी अपनी नाराजगी जाहिर करने का मौका नहीं चूकते। मुझे याद आ रहा है एक बार उन्होंने अमर उजाला में उनका नाम छपने पर लगे इम्बार्गों के बारे गुजरे वक्त के सबसे ताकतवर समूह सम्पादक का नाम लेकर लिखा था। अमर उजाला में काफी बदलाव आए हैं, कुछ पुराने हीरे दुबारा मालिकों की अंगुठियों के नगीने बन गए हैं। कुछ पर नजरें इनायत होनी बाकी हैं।शायद वो इम्बार्गों हट गया होगा। तिवारी जी के ऐसे तेवर पहली बार देखे हैं। कुछ मिलाकर तर्को वाली इस बौद्धिक लडाई से हम जैसे को काफी कुछ जानने समझने को मिला है।

  2. bhartendu

    April 26, 2010 at 3:50 am

    rajiv lochan sah wa pc tiwari gut ki jhadap nayi nahi hai, bus samne aa gayi gai. middle class family ke in swanamdhanya jannayako ki line kabhi clear nahi rahi. aatma tusti ke liye kabi aandolan kiya, kabhi patrakarita to kabhi rajneeti……..ye log bechari janta ke saath prayog karte rahe……..apne ko krantikari mante hai…..lekin marx ke nam ka chaunka marte hai, gandhi ke nam ki mirch khate hai…….ajeeb hai inki ladaiyan…..pc tiwari green party aur hrln ngo ki funding se jee rahein hai to rajeeev aur samsher ravi chopra, vijay pratap, jaise ngo kings ki conditioning mai khaj mita rahe…..lekin itna tay hai……in logo ne uttarakhand ke jan aandolan ko kamjor kiya hai…..ye ukd, left o maoist sabke liye negative catalyst hai……

  3. dhruv rautela

    April 26, 2010 at 6:11 pm

    पी.सी दा और सर
    आप लोग ही यदि अन्दर की और व्यक्तिगत बातो को ऐसे सार्वजनिक करेंगे तो हम जैसो का तो मनोबल टूटेगा ही …… इस होड़ में की में अच्छा और तू झुटा में हम लग गए तो इस प्रथक पहाड़ी राज्य का क्या होगा ……. प्रदीप टम्टा को देखो आज एक मंच मिल गया …. प्लीस आपसी झगडे बंद करो आप लोग .
    ध्रुव रौतेला , सह संपादक , उत्तर उजाला .

  4. Siddharth Kalhans

    April 27, 2010 at 9:39 am

    Shah ji ke dhundhe to apan ko bhi maloom hain aur Uttarakhand ke her sudhi jan ko bhi hoga. Rahi baat PC Tewari ki to wo Shuchita ki misaal hain aur hum jaise logon ke liye maardarshak hain. Bhai PC Tewari `Haathi gujar jaata hai aur —— bhaunkte hai’. Apni urja jaya na karein. God has sent u to do good. Keep it up

  5. saleem malik

    April 27, 2010 at 2:06 pm

    pata nahi kyon purani kahawat yad aa rahi he, hathi aapas me ladaee karen ya love ! KUCHALI GHAS HI JATI HE.

  6. iiiii

    April 28, 2010 at 2:41 pm

    Bahut theek kar rahe hain…….senior journalists…….Jawab nahi….aap dono ka….Hum to sab aapko dekh kar hi seekh lenge….Hum jaisi nai nasal ki chinta mat karna saab.

  7. sri sri 420 Baba Bhada swami

    April 30, 2010 at 6:49 pm

    Sewa me Sriman Editor General mahodaya ji ,
    Aapke mukhpatara Nainital Samchar me aapka historical aalekh padha ( historical isliye ki ab aap bhi history hi ho gaye ho ,he he he he ,gustakhi maaf ). Padh kar jaisa ki swabhavik hi tha bada aanad aaya, kyonki aajkal DD par to itne bore channel aa rahe hain ki dekhne ka man hi nahi hota. Andolan ke naan par Chanda aur Raajniti ke naam par Dhandha, kya sahi ghaalmel hai. Sriman Balya Nala ke convener mahodaya, baliya nala bah raha hai ya nahi ?? i mean to ask ki baliya nala jisko bachaane ka theka aapke naam pe chhoota hai aaj bhi aapke hotel ki gandgai ko le ja raha hai nahi ? aur aapke priya political leader urf Uttarakhandi Don Quigjot yani ki Dr Bisht ji ki Uttarakhand Parlok Vahini & sons Pvt Ltd kaisi chal rahi hai ?? ab ye mat kahiyega ki pata nahi, aakhir aap uske aajivan koshadhyaksh bhi to ho na ? Ek bahre pure aandolan ko ghar ki dukaan banana to koi aapse sikhe. Upar se turra ye ki patrkaar bhi hain. Bechare PC Bhai to baba bhole shankar hain, pata nahi kitne bhasmasur paal chuke hain. NGOs ko gaali dene se phale apne krantikaari mitron ko bhi to dekh len ?? jinka kharcha hi NGOS hi uthate hain.

  8. bhartendu

    May 1, 2010 at 7:08 pm

    PC TIWARI KO GUSSA KYON AATA HAI ? wah uttARAKHAND KI assembly MAI ghusne ko utawale the……unhai lagta tha YE DHEELE DHALE SAMSHER aur Rajeev unki rah ke rode hai……unhai lokwahini ka adhyaksya nahi banane de rahe…..party mai dabe kuchale rah gaya hai….nahi chali to….jaldbaji mai nai party bana dali….pariwartan party……iske liye gaon jana tha lekin chale gaye taiwan……..sayad wahan se khub dose lekar aayenge aur lokwahini ki mitti paleet kar dalenge……yahi hai PC TIWARI…….unke krantikarita par bahas aage bhi…

  9. sri sri 420 Baba Bhada swami

    May 2, 2010 at 7:57 am

    PC Bhai,
    kab akal aayegi aapko ?? itne saal ho gaye aur abhi tak aapne aise logon ( means Uttarakhand Parlok vahini Pvt Club ke life time office bearers ko ) nahi pahchana ? dhanya ho maharaj aap . Gale me ssanp latkaane aur aur mare huye saanpon ko jinda karne ki aadat kab badlegi aapki ? Jara ek baar web site pe jaa kar Uttrakhand Parlok vahini ki site to dekhiye , jitne kaam Mahatma Gandhi , Subhas aur Carl Marx ne mil kar nahi kiye honge us se jyada kaam kaam kar chuke hain ye log. Aur aap aisi mahan vibhootiyon ko nahi samjh paaye ?? sudhar jao mharaj sudhar jao.

  10. dinesh mansera

    May 6, 2010 at 5:17 am

    kuch to log kahenge logo ka kam hai kahana…ek din baith kar do no shak shuba door kar lejye…

  11. Ashok Kumar

    May 6, 2010 at 4:25 pm

    your news is very good/ exlance

    ashok kumar sharma patna.

  12. P.C. BHAI KA PADOSI

    May 7, 2010 at 12:29 pm

    P.C. BHAI KO ALMORA ME EK BEHRUPIYE KE ROOP ME JANA JATA HAI, SARKARI SHARAB KA VIRODH KARTE HAI OR ANDAR KHANE TASKARO KO MADAD KARTE HAI,
    UTTRAKHAND ME NASHA BANDI KI BAAT KARNE WALE P.C. BHAI KE GHAR KE DARWAJE KE BHAAR HI HAR DUSRI DUKAN ME NAJAYJ SHARAB BIKTI HAI.
    PURA MOHALLA TRAST HAI, PAR P.C. BHAI TO DOOSRO KI BAKHIYA UDHEDNE ME MAST HAI.

  13. kiran

    May 7, 2010 at 2:43 pm

    P.C.TIWARI ne apna pura jeevan hi doosro par keechd uchalne me laga diya , PAR-PEEDA me sukh pane wala ye insan mansik roop se vikshipt hai or BLACK MELING ke liye kukhyat hai.

  14. premsundriyal

    May 8, 2010 at 6:49 am

    दोनो को उत्तराखंड के व्यापक हित के लिए आपसी मनमुटाव को भूल कर कम करना चाहिए | आज pahar को बचाने की चुनौती जियादा बरी है | ऐसे हालत में आपसी मतभेदों के लिए कोई श्थान नहीं होना चाहिए एक दुसरे को नीचा दिखाने से बेहतर है मिलकर कम किया जाय अगरं साथ नहीं चलाज़ा सकता है तो
    एक दुसरे पर कीचर उछालना तो बंद होना ही चाहिए |

  15. premsundriyal

    May 8, 2010 at 6:51 am

    दोनो को उत्तराखंड के व्यापक हित के लिए आपसी मनमुटाव को भूल कर कम करना चाहिए | आज pahar को बचाने की चुनौती जियादा बरी है | ऐसे हालत में आपसी मतभेदों के लिए कोई श्थान नहीं होना चाहिए एक दुसरे को नीचा दिखाने से बेहतर है मिलकर कम किया जाय अगरं साथ नहीं चलाज़ा सकता है तो
    एक दुसरे पर कीचर उछालना तो बंद होना ही चाहिए |
    PREM SUNDRIYAL

  16. rakesh

    May 8, 2010 at 2:00 pm

    DAJU NAMASKAR ! BADA ANAND AA RAHA HAI , ESI TARAH EK DUSRE KI REEL DHOTE RAHO , KRIPYA JAWANI KE DOAR KI GHATNAO KO BHI UJAGAR KARE , P.C TIWARI JI TO ABHI BHI N.D. TIWARI SE KAM NAHI HAI.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...