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तुम्हें तो टीवी पर नहीं देखा!

सारिका चौहानमुझे पत्रकारिता के फील्ड में आए महज डेढ़ साल हुए हैं। आप ये जानकर हसेंगे कि मुझे ये लगता था कि जो हमारे टीवी पर लोग दिखते हैं, मतलब रिपोर्टर और एंकर,  केवल यही लोग न्यूज चैनल्स में काम करते हैं। मुझे क्या, अभी बहुत लोगों को यही लगता है। जब हमारे घर कोई आता है और पूछता है कि तुम कहां काम करतो हो? तो मैं बोलती हूं- न्यूज चैनल में। उनके मुंह से बस एक बात सुनने को मिलती है- बेटा, तुम्हें तो कभी टीवी पर नहीं देखा। फिर उन्हें मैं समझाती हूं कि केवल टीवी पर दिखने वाले ही न्यूज चैनल में काम नहीं करते बल्कि उसमें और लोगों की मेहनत भी शामिल होती है। मेरा एक मित्र है जो हमारे ही चैनल में वीडियो एडिटर है। उसकी मां का सपना है कि वो टीवी पर दिखे। लेकिन वो अपनी मां को कैसे समझाए की टीवी पर दिखने के अलावा भी लोग अपना कितना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। जैसे जब कोई रिपोर्टर अपनी स्टोरी कर के आता है तो एक स्क्रिप्ट राइटर डिसाइड करता है कि उस स्टोरी को कैसे उठाना है।

सारिका चौहानमुझे पत्रकारिता के फील्ड में आए महज डेढ़ साल हुए हैं। आप ये जानकर हसेंगे कि मुझे ये लगता था कि जो हमारे टीवी पर लोग दिखते हैं, मतलब रिपोर्टर और एंकर,  केवल यही लोग न्यूज चैनल्स में काम करते हैं। मुझे क्या, अभी बहुत लोगों को यही लगता है। जब हमारे घर कोई आता है और पूछता है कि तुम कहां काम करतो हो? तो मैं बोलती हूं- न्यूज चैनल में। उनके मुंह से बस एक बात सुनने को मिलती है- बेटा, तुम्हें तो कभी टीवी पर नहीं देखा। फिर उन्हें मैं समझाती हूं कि केवल टीवी पर दिखने वाले ही न्यूज चैनल में काम नहीं करते बल्कि उसमें और लोगों की मेहनत भी शामिल होती है। मेरा एक मित्र है जो हमारे ही चैनल में वीडियो एडिटर है। उसकी मां का सपना है कि वो टीवी पर दिखे। लेकिन वो अपनी मां को कैसे समझाए की टीवी पर दिखने के अलावा भी लोग अपना कितना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। जैसे जब कोई रिपोर्टर अपनी स्टोरी कर के आता है तो एक स्क्रिप्ट राइटर डिसाइड करता है कि उस स्टोरी को कैसे उठाना है।

एक वीडियो एडिटर, जो उस स्टोरी को आकार देता है, पैकेजिंग के लोग जो वॉयस ओवर करवाते हैं, देखते हैं कि कोई गलती तो नहीं जा रही। कोई भी स्टोरी टाइम पर मिले,  रनडाउन पर बैठा इंसान जो, डिसाइड करता है कि स्टोरी को कितनी इंपार्टेंस देनी है। पैनल पर बैठे लोग, जो एंकर को कमांड देते हैं और देखते हैं कि ऑन एयर कोई गलती ना जाए। इसके अलावा पीसीआर, एमसीआर और रन डाउन से कोऑर्डिनेट करना। इसके अलावा और भी कई लोग हैं जो न्यूज चैनल को चलाते हैं। जिनके बगैर ये काम नहीं कर सकता… टैक्निकल डिपार्टमेंट,  ग्राफिक्स और भी कई लोग… आप मेरे इस आर्टिकल को पढ़कर आप सोच रहे होंगे कि इसमें एंकर को तो कोई जगह ही नहीं दी गई। दरअसल न्यूज चैनल एक शिप है और एंकर उसका ANCHOR जो उस शिप को स्टेबल कर के रखता है। जो दर्शकों को बांधे रखता है। लोग किसी पार्टिकुलर एंकर को देखने के लिए उस न्यूज चैनल को देखते हैं। वो उस चैनल का एक्स फैक्टर होता है।  जो दर्शकों को बांधे रखता है, जिसकी वजह से उन सब लोगों की मेहनत रंग लाती है जो उस चैनल में काम कर रहे हैं। तभी तो जो दिखता है वही बिकता है।


सारिका चौहान का यह लिखा सलाम जिंदगी ब्लाग से साभार लिया गया है। उनके इस लिखे पर टिप्पणी दर्ज करने के लिए आप सलाम जिंदगी पर क्लिक कर सकते हैं।

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