यशवंत भाई, गमी का वक्त है, संभावनाओं से लैस साथी शैलेंद्र सिंह यूं चला जाना मुझे भी साल रहा है। भले ही व्यक्तिगत तौर पर मेरा कभी भी भाई शैलेंद्र से वास्ता ना रहा हो। ऐसे माहौल में पता नहीं इस वक्त मेरा कुछ कहना दुरुस्त होगा या नहीं, पर अपनी बात कहे बिना नहीं मानूंगा। क्योंक बीते दो दिनों से शोकगीत सुन-सुन कर उबल रहा हूं,एक भी पत्रकार साथी यह सवाल नहीं उठा रहा है कि भाई शैलेंद्र की मौत के लिए कौन जिम्मेदार हैं। और अब जो नहीं रहा, उसकी भावनात्मक नहीं तो आर्थिक भरपाई (भाई शैलेंद्र के परिवार के लिए) कौन करेगा। कोई इस पर आवाज नहीं उठाता नहीं देख रहा हूं। शोक से ज्यादा मेरे उबाल की वजह कुछ और हीं हैं-
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जिस हादसे में भाई शैलेंद्र गए, उसके लिए शैलेंद्र कतई जिम्मेदार नहीं थे। ना ही उनका थका होना और न ही पौ फटे सैर के लिए अपनी कार से खुली हवा में निकल जाना। यह कोई गुनाह नहीं है।
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सीधे तौर पर शैलेंद्र सिंह की मौत के लिए डीएनडी का निर्माण करने वाली कंपनी जिम्मेदार है। उससे भी कहीं ज्यादा गुनहगार राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्राधिकरण (एनएचआई) है। जिसका काम है, देखे कि टेंडर शर्तों का पालन ठेकेदार कर रहा या नहीं। यह प्राधिकरण, शीपिंग एंड सरफेस ट्रांसपोर्ट मंत्रालय की दुधारू गाय है और फिलहाल इसकी कमान कमलनाथ संभाल रहे हैं। जिनकी उद्यमिता के प्रखर हुनर से पत्रकारिताजगत वाकिफ है।
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फिर अपने शैलेंद्र ही क्यों, डीएनडी और दिल्ली-गुड़गांव के बीच बने राजमार्ग पर अब तक 200 से ज्यादा शैलेंद्र अपनी जान गंवा चुके हैं। ये भी किसी के अपने शैलेंद्र थे।
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सवाल है, जब एनएचआई किसी निजी संस्था को सड़क बनाने का ठेका देता है (अभी कैसे दिया जाता है, इस पर सवाल नहीं उठा रहा हूं) तो साथ में सुरक्षा के बहुविध नियमों का भी हवाला होता है। जिनको शायद ही कभी प्राइवेट आपरेटर अमल में लाते हैं। क्योंकि प्राइवेट आपरेटर इन्हें फिजूल का खर्च मानते हैं।
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एक खुलासा करूं, इन दोनों प्रमुख सड़कों (डीएनडी और दिल्ली-गुड़गांव) सड़क को बनाने में एक कंपनी ने काम पर कोई दस करोड़ खर्च किए और बदले में अगले 20 सालों में कंपनी को 23 हजार करोड़ रुपए मिलने जा रहे हैं। यह आंकड़ा आज की गाड़ियों की संख्या के आधार पर है। दस्तावेजों के साथ जल्द ही इसका खुलासा करूंगा।
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सवाल है, आखिर कंपनी को मिलने वाले इस भारी और बेलगाम नफे से सरकार और देश की जनता और इनकी सड़क पर जान गंवाने वाले भाई शैलेंद्र के परिवार को क्या नफा है।
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अभी तो यह सवाल तो उठा ही नहीं रहा हूं कि एक किलोमीटर सड़क बनाने में कितना खर्च होता है और इन कंपनियों ने वाकई में कितना इसमें झटका। क्योंकि निर्माण सामग्री का कभी किसी प्रयोगशाला में परीक्षण हुआ ही नहीं है। और हुआ भी है तो मेरी जानकारी में किसी मीडिया में इसका खुलासा हुआ है। यदि हुआ है तो कृपया मुझे भी अवगत कराएं।
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ठेका शर्तों के तहत सुरक्षा पर खर्च तय है, पर निगरानी करने वाले मुतमइन हैं, आवाज उठाने वाले (पत्रकार भाई) शोक में हैं। अंबुलेंस, फायरब्रिगेड, ओवर ब्रिज, पेट्रोलिंग गाड़ियां, और भी तमाम सुरक्षा इंतजामात इन ठेका कंपनियों का दायित्व है। वह इनकी संख्या हर किलोमीटर पर तय है। कभी दिखे हैं आपको यह सब तामझाम।
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क्या आपको नहीं लगता कि डीएनडी या किसी सड़क के किनारे खड़ी गाड़ी से भाई शैलेंद्र का हुआ हादसा भ्रष्ट तंत्र की साजिश का नतीजा है। क्या आपको नहीं लगता है कि ठेकेदार की पेट्रोलिंग गाड़ी को उस हत्यारी ट्रक को हटाने का इंतजाम करना चाहिए था।
क्या आपको नहीं महसूस हो रहा है कि अब वक्त शोक में डूबे रहने का नहीं, ठेका कंपनी, मंत्रालय और एनएचआई पर हमला बोलने का है। क्या भाई शैलेंद्र के परिवार के लिए हम इस कहानी को मुकाम तक पहुंचा सकते हैं। यदि हां तो आइए, आप में से ही कोई अगवा बने, मैं पीछे चलने को तैयार हूं। इस श्रद्धांजलि यात्रा में मैं भी शरीक होने को बेताब हूं।
सुमंत भट्टाचार्य
सहायक संपादक
आउटलुक
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