खबर बनाते-बनाते तुम खुद खबर बन जाओगे…. सोच भी नहीं सकता। शैलेंद्र बड़े झूठे निकले यार तुम। अभी-अभी ही तो तुमने फोन कर मुझे बुलाया था। और खुद चले गए। कितनी बार तुम मुझसे रुठे, मुझे याद नहीं। छह महीने तक मैं भी रूठा रहा। इस बार तय कर लिया था कि तुमसे बात नहीं करूंगा पर अचानक तुमने फोन किया। मैं गुस्से में था। फिर भी खुशी हुई, बात हुई। तुमने कहा, पटना में क्या रखा है, दिल्ली आजा? मार्च बीतते ही आ जाओ। साथ रहेंगे। आस्था भी याद करती है। मैंने वादा किया था, भाई आ जाऊंगा, चुनाव मई में खत्म होते ही दिल्ली आऊंगा। पर ये क्या दोस्त। मैं तो आने ही वाला था…. कुछ देर और तो रुक जाते….. एक बार और मेरे हाथ का बना भात-दाल और चोखा खा लेते। तुमसे बर्तन माजने को भी मैं कहता….। तुम्हारे न रहने की खबर मिली तो विश्वास नहीं हुआ। पर फिर विश्वास कर लिया…..ऐसा हुआ होगा..क्योंकि तुम कुछ भी कर सकते हो।
मैं और शैलेंद्र हजारीबाग के सेंट कोलंबस कॉलेज मे साथ पढ़ते थे। दिल्ली में भी साथ रहा। एक साथ शकरपुर के एक फ्लैट में हम लोग रहा करते थे। उस समय आयाम नहीं था। बस बिटिया आस्था थी। हम चार लोगों का परिवार था। शैलेंद्र, मेहंदी (भाभी), आस्था और मैं संजीव। मेहंदी रांची चली जाती थीं तो शैलेंद्र बर्तन धोता था। मेरे जिम्मे खाना बनाने का काम था। जब मेहंदी वापस आती थी तो शिकायत करता था। बोलता था- संजीव मुझसे बर्तन धुलवाता है….। मेहंदी प्यार से कहतीं- कुछ तो काम सीखो। यही थी हमारी दोस्ती। उन दिनों शैलेंद्र कुबेर टाइम्स में काम करता था और मैं पत्रकार पुनीत टंडन व फिल्मकार आभा दयाल की प्रोडक्शन हाऊस स्वाति विजुअल्स में बतौर एसोसिएट डायरेक्टर ऑडियो विजुअल प्रोजेक्ट करता था। एक दिन शैलेंद्र ने कहा- मैं भी देखूंगा इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम कैसे होता है। अगले दिन वह मयूर विहार के ई-142 स्वाति स्टूडियो पहुंच गया। पहली बार हाई बैंड एडिट सेट के नोब को हाथ लगाया था और कहा था… संजीव देखना मैं तुमसे बाद ही मीडिया में रहा हूं पर तुमसे आगे निकल जाऊंगा। दोस्त, मुझसे बहुत आगे निकल गए। बहुत खुशी हुई जब केबीसी के बारे में सुना। पर अब जितना आगे निकल गए हो वो अच्छा नहीं लग रहा। अब तो तुम्हारी यादें ही शेष हैं।
तुम्हारा दोस्त-

संजीव कुमार
ब्यूरो, पटना, इंडिया न्यूज
9431290949, 9308706849











