
…पार्ट वन से आगे… एक दिन शैलेंद्र जी को फिल्म देखने का मूड हुआ… मेरी बाइक से दोनों मराठा मंदिर पहुंचे और वहां किसी फिल्म (नाम नहीं याद है) की टिकट खरीदी… टिकट खरीदने के बाद इनके मूड में आया कि कहीं शराब पी जाए। फिल्म शुरू हो चुकी थी, लेकिन हम दोनों पहुंच गए मरीन ड्राइव्स में एक रेस्टोरेंट … वहां शराब पी…
जब उठकर जाने लगे… तो इन्होंने वेटर को पांच सौ रुपये थमा दिए… इसके बाद जब पार्किंग से अपनी बाइक लेकर जाने लगे… तो वहां खड़ा शख्स मुझसे पार्किंग चार्ज 10 की बजाए 15 रुपये मांगने लगा… जब मैंने उसे डांटा तो वो आदमी रोने-गाने लगा कि गरीब हूं… 15 रुपये ही दे दीजिए। मैं पैसे देता… इससे पहले ही शैलेंद्र जी ने 500 रुपये का नोट थमा दिया और हम लोग चल पड़े। मराठा मंदिर पहुंचे तो लगभग 1 घंटे की फिल्म खत्म हो चुकी थी। इसके बाद इंटरवल तक फिल्म देखी… और फिर उनका मूड पीने का हुआ। और हम लोग लोअर परेल के अपने घर पहुंच गए। आज मुझे उनकी लिखी एक शेर याद आती है…
“इन गलियों से सब लोग गुजर जाते हैं जैसे
ऐसे ही भला मैं भी गुजर क्यूं नहीं जाता”
वाकई जिन गलियों से तमाम लोग यूं ही गुजर गए… उन गलियों में शैलेंद्र खुद को कभी सहज नहीं रख पाए… बल्कि हर वक्त उनकी आंखों में एक दूसरी ही दुनिया विद्यमान रहती थी… उस दुनिया में बहुत कुछ था। लेकिन आप ये न समझ लें कि ये शराब की मदहोशी में डूबी हुई दुनिया थी, बल्कि शराब तो बहाना थी… न तो उन गजलों को लिखने से पहले उन्होंने उस शिद्दत से शराब पीयी… और न ही किताब लिखने के बाद उन्होंने शराब की दुनिया में कभी गोते लगाए। बल्कि मेरे जैसा आदमी जो कभी कभार एकाध पैग ले लेता था… तो वो हमेशा मना करते… लेकिन मैं गवाह हूं उनकी उस किताब का… जो एक मुकम्मल जिंदगी है…
“घड़ी दर घड़ी खुद में उलझा रहा
खिलौनों की मानिन्द बिखरा रहा
न जाने क्यों इतनी बेचैनी लिए
गली-दर-गली मैं भटकता रहा”
शैलेंद्र का कैनवास बहुत बड़ा है। भाषा की कलात्कता से लेकर साहित्य का तड़का लगाने तक हर फ्लेवर उनके अंदर मौजूद हैं। उनसे दोस्ती का आधार था मेरी गजल की किताब। जब उन्हें स्टार न्यूज में काम करने के दौरान पता चला कि मैंने गजलों पर एक किताब लिखी है… और उसका विमोचन मुंबई में ही हुआ है… तो उन्होंने मुझसे वो किताब मांगी। और फिर बताया कि वो भी गजलों पर एक किताब लिखने की योजना बना रहे हैं। आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि जब इनकी किताब “कुछ छूट गया है” के विमोचन के लिए दिल्ली आया तो यहां पर एक रात निदा फाजली, साहित्यकार बोधिसत्व और हमारी महफिल जमी। इस महफिल में रात भर का मुद्दा सिर्फ और सिर्फ शैलेंद्र थे। खुद निदा फाजली ने इनके व्यक्तित्व पर इतना कुछ कहा… जो किसी के लिए भी गर्व की बात हो सकती है।
आज बिल्कुल भी यकीन नहीं होता कि शैलेंद्र हम सबको छोड़कर कहीं चले गए हैं… और फिर कभी नहीं आएंगे… क्योंकि उन्होंने हमेशा छोड़कर जाने की धमकी दी है… वो जाते भी हैं… लेकिन जल्द ही लौट आते हैं… कभी एक दिन में, कभी हफ्तों में तो कभी महीनों में…
“तेज दोपहरी में निकला जो मैं घर से उस दिन
आज तक लौटके फिर घर नहीं देखा मैंने
जीस्त की राह में जिस मोड़ से आगे निकला
उसको भूले से भी मुड़कर नहीं देखा मैंने”
लेकिन इस बार उनका इरादा नेक नहीं था… क्या पता था कि वो लंबी छलांग लगाने के इरादे से देर रात निकले हैं…. और फिर कभी नहीं लौटेंगे… क्या इसकी स्क्रिप्ट उन्होंने पहले से लिख ली थी… वर्ना वो ऐसा क्यों कहते कि
“इक परिंदा चला आसमां नापने
रास्ते में ही दम तोड़कर गिर गया”
लेकिन मेरा भरोसा दूसरा है… शैलेंद्र इतने बेरुखे नहीं हो सकते… कैसे वो मेहा भाभी, आस्था और महज 6 साल के आदि को छोड़ सकते हैं… क्या वो फिर लौटेंगे… क्या वो फिर आकर उन्हें गोद में लेंगे… क्या एक बार फिर वो आदि का मुझसे परिचय करवाएंगे कि तुम्हारा हरीश दोस्त आ गया… दुनिया कुछ भी कहे, लेकिन मुझे पूरा भरोसा है… क्योंकि उन्होंने एक दो बार नहीं… कम से कम सैकड़ों बार पूरे परिवार के सामने इस नज्म को गुनगुनाकर सुनाया है…
“इक बार तेरी राह में आऊंगा मैं जरूर
कुछ है मेरा जो पास तेरे छूट गया है”
शैलेंद्र खुद भी इस दुनिया को छोड़कर कहां जाना चाहते थे… बल्कि एक्सपेरिमेंट करना चाहते थे… उन्हें गीता का हिन्दी अनुवाद पूरा करना था… गजलों की एक नई किताब पूरी हो चुकी थी… नज्म की एक किताब मुकम्मल थी… सिर्फ प्रकाशित करवाना था… फिर आखिर कहां चले गए
“हर दिशा में दिशाविहीन
पसरती जाती है वायु
…लेकिन एक भ्रम
कि बाकी है आयु
अभी और जीना है!!!”
हां एक बात और, शैलेंद्र निराश नहीं थे, वो हारे हुए नहीं थे, असफल नहीं थे, वो शराबी भी नहीं थे… बल्कि वो जीतने वाले इंसान थे… उनमें अब भी जीजीविषा बाकी थी… उन्होंने बहुत कम उम्र में ऐसे मुकाम को हासिल किया, जो किसी के लिए भी ईर्ष्या पैदा कर सकती है। वर्ना उनमें ये लिखने का साहस कैसे पैदा होता…
“होश आया तो मैं इक फैसला करके उठ्ठा
और बाजार में जा खुद को उछाला मैंने
अपने वो दाम वसूले कि सब हुए हैरां
खुद को दौलत की इवज बेच ही डाला मैंने
बाद उस रोज के हर रोज मैं बिकता हूं मगर
अपनी कीमत पे मैं हर वक्त नजर रखता हूं
कौन क्या दाम चुका सकता हैं मेरे मुझको
कौन कितना है खरीदार, खबर रखता हूं
आज हर चीज जहां की है मयस्सर मुझको
आज पहले की तरह जिंदगी बेहाल नहीं
लाख नश्शा है मगर इतनी खबर है मुझको
आज दुनिया है मेरी, अब मैं फटेहाल नहीं
अब है मालूम कहां, कैसे निकलता है ये दिन
रात छलकाती है मस्ती से भरे जाम कहां
सुब्ह किस दर पे दिया करती है पहली दस्तक
शाम हर रोज मचलती है सरे-आम कहां”
अब आप खुद सोचिए किसी इंसान में इतना कुछ लिखने की हिम्मत यूं ही नहीं आती… वो इंसान जिसने बचपन में ही अपने मां-बाप को खो दिया, वो इंसान जिसने बहुत ही गरीबी में अपने बचपन गुजारे, वो मासूम बच्चा जो भूख से बिलखता हुआ कई दिन बिना खाए पिए सो गया… और एक बार गली में फेंके हुए खाने को पाने के लिए कुत्तों से लड़ पड़ा, वो इंसान जिसने कई बार राह चलते गरीबों को रोजगार के लिए दसियों हजार रुपये थमा दिए… आज भी वैशाली में कई रिक्शा वाला उनके नाम को लेकर अपनी रोजी रोटी चला रहा है…
एक बहुत बड़ी हकीकत ये है कि शैलेंद्र ने कभी भी समझौता नहीं किया… अपने उसूलों से, अपने सिद्धांतों से… उन्होंने जितना इस जग से लिया, उतना उसे वापस लौटा दिया… और ये सब करने वाला इंसान हमेशा एक चीज की कमी महसूस करता रहा… उसे वो चीज कभी नसीब नहीं हो पाई… वो मां की कमी को हमेशा महसूस करता रहा… अपनी मर्मस्पर्शी कविता मां में वो लिखते हैं…
“मां! अगर तुम होती मेरी तन्हाई
मैं हमेशा ही तुम्हारी गोद में सर रखकर सोता
तुम दुलारती मुझे, सुनाती जली कटी
और जन्मों से निरंतर जगते चले आ रहे
तुम्हारे इस शापित बेटे को दो चार पलों की
नींद हो जाती मयस्सर”
शैलेंद्र न सिर्फ एक बेहतरीन पत्रकार थे, बल्कि नेक इंसान भी थे… कभी कभी लोगों के साथ उनके मतभेद जरूर होते थे, लेकिन उन्हें अपना बनाने की हुनर भी पता थी। मैं तो उन्हें यही कहना चाहूंगा कि शैलेंद्र आप हमेशा अपनी लेखनी के जरिये… हम सब की यादों में जिंदा रहेंगे… चलते-चलते आपको उनकी लिखी आखिरी गजल भी सुनाना चाहूंगा… जो उन्होंने अपनी मौत से ठीक एक हफ्ते पहले सुनाई थी…
इसमें उन्होंने जिंदगी को अलविदा कहने की बात भी कही थी…
“सालों तक रोया कि मेरे साथ है धोखा हुआ
ध्यान से देखा तो पाया कुछ नहीं ऐसा हुआ
दर्द की एक बूंद थी, कतरा बनी और बह गई
दिल ने खामोख्वाह समझा जख्म फिर गहरा हुआ
रात को कोपल से पैदा हो रही थी रोशनी
रात गहरी थी, न समझा इस कदर ये क्या हुआ
बस महज इक बात थी भारी पड़ी संबंध पर
रिश्तों के जंगल में तबसे हूं यूं ही भटका हुआ
जिंदगी बाहों में भरकर अलविदा तो कह गई
वो मुसाफिर अब तक है मोड़ पर बैठा हुआ”
अलविदा शैलेंद्र….. अलविदा….
…समाप्त….
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लेखक हरीश चंद्र बर्णवाल युवा साहित्यकार और पत्रकार हैं। इन दिनों आईबीएन7 न्यूज चैनल में एसोसिएट एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं।











