हकीकत से दूर हैं पत्रकार : शर्मिला टैगोर

अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री शर्मिला टैगोर कोलकाता में मीडिया के उपर काफी कुछ बोलीं। उनका मानना है कि इन दिनों ज्यादातर पत्रकार जमीनी हकीकत से दूर होकर कलम चला रहे हैं और यह ठीक नहीं है। यह न तो जनहित में है और न ही लोकतंत्र के हित में। उन्होंने कहा कि यह सच है कि मीडिया आज बाजार से संचालित हो रहा है, लेकिन अगर बाजार ही सब कुछ है तो फिर लिखने-पढ़ने और लोगों को जागरूक बनाने का क्या मतलब रह जाएगा।

शर्मिला मंगलवार को कोलकाता के राष्ट्रीय पुस्तकालय में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में हिस्सा बोल रही थीं। संगोष्ठी का विषय था- ”बाजार, मीडिया और लोकतंत्र”। इसका आयोजन इंस्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट स्टडीज, कोलकाता और यूनिसेफ इंडिया ने मिलकर किया था। संगोष्ठी का समापन मंगलवार को हुआ। संगोष्ठी में अर्थशास्त्री अमित बागची, एके शिवकुमार, प्रांजल गुहा ठाकुरता, पी साईनाथ, अंतरा देवसेन, दीपंकर सिंहा, एन राम, अजीजुल हक ने भी हिस्सा लिया। शर्मिला ने कहा कि मीडिया को कुछ भी लिखने से पहले उस खबर की अच्छी तरह छानबीन करनी चाहिए। जिम्मेदारी से कभी नहीं भागना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को आत्मनिर्णय करना चाहिए कि क्या लिखें और क्या न लिखें। शर्मिला ने कहा कि मीडिया को यह नहीं भूलना चाहिए कि 1975 में आपातकाल के दौरान जब काले कानून थोपे गए तो इस देश की जनता ने ही मीडिया का साथ दिया था। इसलिए मीडिया को भी जिम्मेदार होकर काम करना चाहिए और जमीनी हकीकत से रूबरू होकर खबरें लिखनी चाहिए।

शर्मिला ने सुझाव दिया कि अब वक्त आ गया है कि मीडिया को खुद के लिए सुधार-आंदोलन चलाना चाहिए, क्योंकि आज ‘पेड न्यूज’ यानी पैसे लेकर खबर छापने का जो हल्ला हो रहा है उसमें कुछ तो हकीकत है ही। उन्होंने कहा कि ‘पेड न्यूज’ का भंडाफोड़ किसी और ने नहीं किया है, बल्कि मीडिया के ही एक समूह ने किया है। शर्मिला ने कहा कि यह सच है कि बड़े घराने ही अखबारों के मालिक हैं और यह भी सच है कि उनकी नीतियों के आधार पर खबरें छपती हैं, लेकिन आत्मनिर्णय के आधार पर भी पत्रकारों को अपनी रिपोर्ट लिखनी चाहिए।

शर्मिला ने कहा कि गलत खबर देने और लिखने वाले पत्रकारों के खिलाफ मीडिया को ही एक स्वतंत्र मीडिया वॉच ग्रुप का गठन करना चाहिए ताकि खबर पर कायदे से निगरानी हो सके। उन्होंने सवाल उठाया कि इन दिनों भारतीय मीडिया का सामाजिक चरित्र बदल गया है। संगोष्ठी में हिस्सा लेते हुए दूसरे वक्ताओं ने भी शर्मिला की बातों से अपनी सहमति जताई और कहा कि लोकतंत्र को अगर मजबूत बनाना है तो भारतीय मीडिया को भी अनुशासित होना होगा और जमीनी हकीकत के आधार पर चीजों को रखना होगा। साभार : जनसत्ता

Comments on “हकीकत से दूर हैं पत्रकार : शर्मिला टैगोर

  • Arvind Kumar Gupta says:

    किसी पर अंगुली उठाने पर पांच में से तीन अंगुलिया उठाने वाले की ओर रहती है !शर्मीला जी जिस अनुशासन, छान बीन और बाज़ार की बात आप मीडिया के लिए कर रही है क्या इन बातो का ख़याल आपको उस समय भी था जब आप एक जिम्मेदार कुर्सी पर विराजमान थी !शायद आपको याद नहीं होगा की एड्स जागरूकता के सन्देश का बहाना लेकर ऐसी तमाम फिल्मो को पास कर दिया गया जिसे बैठकर एक साथ माँ बेटा और पिता पुत्री या ये कहे की पूरा परिवार एक साथ नहीं देख सकता !ऊपर से तर्क देना की हम वही दिखाते है जो समाज में होता है लेकिन शायद ये भूल जाते है की आज वही समाज में होता है जो आप दिखाते हैं !
    रही बात मीडिया की तो …………..मीडिया केवल एक माध्यम है किसी भी बात को लोगो तक पहुचाने का !माध्यम है उनकी आवाज को बुलंद करने का जो बोल नहीं सकते,हम सुनाते है उनको जो किसी की नहीं सुनते !हो सकता है की सुनाने के चक्कर में आवाज़ तेज हो जाय ,जो होना लाजिमी है तो इसमें हमारी क्या गलती ! शर्मीला जी रही बात पेड न्यूज़ की तो ये आरोप है जो की हर जिम्मेदारो पर लगते रहते है !शायद इससे आप भी नहीं बच पायी होंगी !
    आपने कहा की आज मीडिया का चरित्र बदल गया है तो मै कहना चाहुगा की मीडिया का चरित्र नहीं बल्कि काम करने का तरीका बदल गया है बाकी चरित्र तो वही है ख़बरें …………………..!
    आपकी हां में हां मिलाने वाले उन महानुभाव से केवल इतना कहना चाहुगा कि…………अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है ……. हम सुधरेगे तो युग सुधरेगा ………. नसीहत देने से पहले खुद अपने घर में सुधार आन्दोलन चलाये ! जो देश की तरक्की का पहला कदम होगा !
    –लेखक एक न्यूज़ चैनल का प्रतिनिधि है !

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  • paras tripathi says:

    भाई साहब मै आपकी बात से सहमत हू और शर्मिला
    जी की भी बहुत सारी फिल्मे भी देखी है
    पारस त्रिपाठी

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  • neeraj mahere etawah says:

    शर्मिला जी को पत्रकारों पर प्रबचन नहीं देने चाहिए था
    क्योकि वे साधवी नहीं है और पत्रकार उनकी सारी जमीनी
    हकीकत जानते है कही कोई लिख बेठा तो मामला बिगड़
    जाएगा इसलिए वे जल्द माफ़ी मांग ले तो उनके लिए ठीक
    होगा
    अगर मेरे पत्रकार साथी मुझसे सहमत है तो साथ दे
    नीरज महेरे नई दुनिया इटावा

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  • daulat singh chauhan says:

    आपातकाल में मीडिया का जनता ने साथ दिया तो सरकार की हार हुई लेकिन आज तो मीडिया का मुकाबला बाजार से है, जो न तो किसी नीति से न किसी सिद्धांत से बल्कि सिर्फ और सिर्फ पैसे से चलता है। मीडिया को धंधा बनाने वालों ने इसी पैसे को हथियार बना लिया है। धंधेबाजों के बीच पैसे के हथियार से जंग छिड़ी हुई है। कम से कम पैसे में ज्यादा से ज्यादा अखबार बेचने और टीआरपी के आंकड़ों के आधार बाजार से विज्ञापन हथियाने की होड़ चल रही है। इससे भी पेट नहीं भर रहा तो समाचार को बेच कर पैसा कमाया जा रहा है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि आपातकाल में सरकार के खिलाफ मीडिया का साथ देने वाली जनता मीडिया को निगल रही पैसे की ताकत के खिलाफ मीडिया का साथ दे। इस बात पर विचार करे कि इतनी महंगाई के दौर में क्या एक, डेढ़ या दो रुपए में अखबार कैसे मिल सकता है। इतनी कम कीमत वाला अखबार निश्चय ही पैसे का जुगाड़ करने के लिए कोई न कोई समझौता करेगा और वह समझौता कलम की ताकत का ही होगा क्योंकि मीडिया के पास इसके अलावा बेचने के लिए कुछ है ही नहीं। बाजार की ताकतों ने कलम की ताकत को ही खरीद लिया है और इसे अपने धंधे का हथियार बना लिया है।
    जनता ही नहीं मीडिया को नसीहतें देने वालों को भी इस बात को समझना होगा, वरना अखबार पढ़ने से पहले या न्यूज चैनल देखने से पहले इस वैधानिक चेतावनी का मनन कर लें कि इसमें जो कुछ लिखा गया है या दिखाया जा रहा है वह सत्य ही हो जरूरी नहीं, पढ़कर या देख कर समझने से पहले अपने विवेक का इस्तेमाल करें।

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  • purushottam kumar singh says:

    Bhai sahebmain aap se bilkul sahmat hun.Aaj kal Media ko dusre sector ke Mahan log,Paturya ka ………….. samajh baithe hain. Jis ko bhi mauka milta hai daba kar chal deta hai.Apne gireban main koi nahi jhakne ko tayyar hai. Sab log media houses ya reporter ko kuch updes dene main piche nahi rahna chahte. Sarmila Madam ne bhi wahi kiya hai. Sayyad yahi hum logon ke kaam ka asar hai.

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  • neeraj mahere etawah says:

    फिल्म अभिनेत्री शर्मिला जी का कहना हो सकता है ठीक हो
    लेकिन क्या वे हिन्दी फिल्मो की अशलीलता पर भी कभी
    बोलती है या केबल पत्रकारों पर ही मेरी उनको शलाह है
    की वे पहले अपने गिरेबान मै देखे की वे जिस अशलीलता
    को २१वी सदी की नई तस्वीर मानकर उन्हें प्रसारित करने की
    अनुमती देती है क्या वे फिल्मे अपनी साश यानी सैफ की दादी
    को दिखा सकती थी या नहीं और सायद वे ये नही जानती की
    भारत की ७१% जनता मुम्बई मै नही गाँव मै रहती है गाय के
    गोबर के उपले ही बनाती है और जब शहर मै आकर शर्मिला जी
    की अनुमती बाली फिल्मो के पोस्टर देखती है तो अपना मुह अपने
    पल्लू से डक लेती है मुझे लगता है की पत्रकार इतनी गंदी और
    अशलील हरकत तो शर्मिला जी के साथ नही करते होगे
    अगर आप मुझसे सहमत हो तो मेरा पत्रकार साथी साथ दे

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  • Anshul Srivastava says:

    Neeraj Ji apne bilkul sahi likha hai ki ye film industries k log khud kya kar rhe hai wo nhi dekhte aur hum agar kuch likhte ya dikhate hai to wo galat hai are inko kya pta ki ab inke bete saif ko hi dekh lijiye ki filmo me to aise dikhate hi ki sayad pyar karna aur pyar ka matla sayad hi koi inse behtar janta ho lekin sach me aisa nhi hai saif sadi suda hone k bad bhi kareena se dosti ki aur sadi karni chahi lekin aisa nhi kiya aur ab usko bhi chod diya ab kisi aur ko pakdege sharmila ji jinke ghar shishe ke hote hai wo dusro k ghar pr patthar nhi mara karte neeraj ji mai aapse sahmat hu

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