पब्लिक को बेवकूफ बनाने में लगे रहे दोनों रीजनल चैनल

गत दिनों छत्तीसगढ मे नक्सलियों द्वारा अगवा जवानों को छोड़े जाने पर मध्‍य प्रदेश-छत्तीसगढ के दो रीजनल चैनल आपस में भिड़ गये. अपने को सर्वश्रेष्ठ बताने के लिये लग गए ढिंढोरा पीट कर दर्शकों को बेबकूफ़ बनाने में. एक ओर पहला चैनल जिसे अपनी मुहिम बता कर दर्शकों का भरोसा तोड़ रहा था तो दूसरा चैनल भी कहां पीछे रहता भला, तो उसने भी ठान लिया कि हमें भी यही करना होगा नहीं तो टीआरपी दूसरा ले जायेगा.

और मैं असफल हो गया!

[caption id="attachment_15379" align="alignleft"]आशीष जैनआशीष जैन[/caption]आशीष जैन प्रतिभाशाली-संवेदनशील युवा पत्रकार और ब्लागर हैं। आशीष पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद देश के तेज चैनलों में से एक में इंटर्न बने। वहां उन्होंने जो कुछ सीखा और भोगा, उसे उन्होंने शब्दों का रूप दिया है। अपनी भावनाओं को उन्होंने भड़ास4मीडिया के पास लिख भेजा है। उनके लिखे को, उनकी सोच को हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। इस संस्मरण नुमा आलेख में आशीष ने चैनलों के भीतर के असली सच को बयान किया है। चैनलों के स्थापित जर्नलिस्ट किस तरह से नए लोगों के साथ व्यवहार करते हैं, किस तरह बड़े मीडिया हाउसों द्वारा नए लोगों का इस्तेमाल किया जाता है, किस तरह किसी को नौकरी दी जाती है और किस तरह किसी को अच्छा काम करने के बावजूद बाय-बाय बोल दिया जाता है, यह सब आशीष ने अपने इस संस्मरण में लिखा है। आशीष की आंख के आंसू दरअसल पत्रकारिता की उस नई पीढ़ी के आंसू हैं जो आदर्शवादी नजरिए के आधार पर मीडिया में कदम रखती है पर मीडिया के भयानक बाजारीकरण से उसके आदर्श और सपनों के कई खंड हो जाते हैं। पेश है आशीष की आपबीती, आशीष के ही शब्दों में –