शुक्रिया सुप्रीम कोर्ट, आदिवासी भाइयों का दर्द समझने के लिए : इरा झा

इरा झा की पत्रकारिता में अलग पहचान है। राष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता में पहली ‘न्यूज वूमन‘ होने के अलावा उन्होंने रिपोर्टिंग में भी मुकाम बनाए हैं। विषेष रूप से आदिवासी-नक्सल रिपोर्टिंग में। बरसों से वह आदिवासियों की समस्याओं / संस्कृति पर लिख रहीं है। करीब तीस साल से पत्रकारिता में सक्रिय इरा झा नक्सलियों का उनकी मांद में (बस्तर के बीहड़ इलाके से) उनका इंटरव्यू कर लाईं।

रायपुर प्रेस क्लब के फैसले में बुराई नहीं

नक्सली क्रिया की प्रतिक्रिया है सरकारी हिंसा : महानगरों के पत्रकार लगातार छत्तीसगढ़ की मीडिया पर दलाली के आरोप लगाते रहे हैं. वे यह भी कहते हैं कि ये कुछ नहीं लिखने, यानि सच छिपाने के पैसे लेते हैं. बुद्धिजीवियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक वर्ग पर नक्सलियों का समर्थक होने का आरोप इसलिए लग रहा है कि ठीक ऐसे समय पर जब बस्तर से हिंसा खत्म करने की अब तक की सबसे बड़ी कोशिश की जा रही है, वे पुलिस और सरकार पर आदिवासियों के दमन और अत्याचार का आरोप लगाकर अभियान चला रहे हैं. रैलियों, सत्याग्रह आदि के माध्यम से पुलिस और सरकार के अभियान को प्रभावित करने की कोशिश में हैं. बीते 22 जनवरी को दो नौजवानों का गला रेतकर नक्सलियों ने सड़क पर फेंक दिया. ये एसपीओ में भर्ती होना चाहते थे- क्या इसकी इतनी क्रूर सज़ा मुहैया कराई जाएगी? इनमें एक तो 11वीं कक्षा में पढ़ने वाला नवयुवक था. तालिबानियों व इनमें क्या फ़र्क है?

रायपुर प्रेस क्लब में नक्सली समर्थक बुद्धिजीवियों की नो एंट्री!

राजनीतिक व्यवस्था में सर्वाधिक लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरोकार मीडिया में यह पहली घटना है जब रायपुर प्रेस क्लब ने नक्सली समर्थक बुद्धिजीवियों को क्लब में कार्यक्रम न करने देने का सर्वसम्मति से फैसला किया है. क्लब ने यह प्रतिबंध समान रूप से वैसे वकीलों पर भी लागू किया है जो क्लब समिति की निगाह में नक्सली समर्थक हैं. नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम अभियान शुरू करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार के पास ऐसे कई रिकार्ड हैं जो अलोकतांत्रिक कानूनों को लागू करने में उसे पहला स्थान देते हैं. लेकिन यह पहली बार है जब राज्य में प्रेस प्रतिनिधियों की एक संस्था जो कि गैर सरकारी है, वह सरकारी भाषा का वैसा ही इस्तेमाल कर रही है जैसा की सरकार पिछले कई वर्षों में लगातार करती रही है.