भास्‍कर साइट : अंग्रेजी की ऐसी की तैसी!

महोदय ऐसा लगता है कि दैनिक भास्‍कर अपने अंग्रेजी साइट के लिए कुछ अक्षम और मूर्ख पत्रकारों को काम पर रखा है. आज पहली बार मैं दैनिक भास्‍कर का साइट खोला और होम पेज देखने के बाद तो मेरी हंसी रूक ही नहीं रही थी. ऐसा लग रहा है कि इस साइट पर लिखा गया अंग्रेजी के अलावा कुछ भी हो सकता है. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भास्‍कर को कोई योग्‍य पत्रकार नहीं मिला, जिसे कम से कम अंग्रेजी की बेसिक बातों की जानकारी हो. अगर विश्‍वास नहीं हो रहा तो नीचे खुद देख लीजिए.

चार युवा पत्रकारों का संघर्ष

: पिछले दो साल से लड़ रहे हैं भास्‍कर के खिलाफ अदालती लड़ाई : 2008 में जब वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में पूरा देश और समूचा विश्व परेशान था, ऐसे समय में अकारण ही नौकरी से वंचित होकर परेशान होने वालों की लंबी फेहरिस्त में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों और भोपाल, पूना जैसे सेमी मेट्रो के साथ ही छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जैसे छोटे से शहर में समाज और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिये कलम चलाने वाले पत्रकार भी शामिल थे.

तो ये है इनकी तरक्की का राज

भास्‍करइसे कहते हैं अखबार का सही उपयोग, ऐसे ही नहीं इस अखबार ने दिन दोगुनी रात चौगुनी तरक्की कर ली। जी आप बिल्कुल ठीक समझें, यहां बात दैनिक भास्कर की हो रही है। इस अखबार पर हमेशा से ही प्रशासन से साठ-गांठ कर अपना हित साधने के आरोप लगते रहे हैं।

पत्रकार को फुटपाथ पर गुजारनी पड़ी रात

: अमन को चुकानी पड़ी संस्‍थान बदलने की कीमत : मीडिया जगत में ऐसा अक्सर होता रहता है कि एक पत्रकार या डेस्क कर्मी यहां तक कि संपादक तक बढिय़ा मौके व वेतन की तलाश में एक संस्थान से दूसरे संस्थान में चले जाते हैं। लेकिन ऐसा होने के बावजूद भी मीडियाकर्मियों के मन में कोई बदलाव नहीं होता और न ही कोई मनमुटाव। सभी को पता रहता है कि हो सकता है कि आने वाले समय में वह फिर से एक दूसरे के साथ मिलकर काम कर रहे हों, लेकिन बठिंडा में जो हुआ, वह पत्रकार जगत में चलती इस भाईचारे वाली परंपरा के उलट हुआ।