भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग छह)

‘मुझे प्यार, पैसा या नाम मत दो, अगर कुछ दे सकते हो तो सत्य दो। (मैकेंडलेस के पास मिली हेनरी डेविड थोरो की किताब लाइफ इन दी वुड्स में यह पंक्ति जिस पृष्ठ पर था, उसके ऊपर में मैकेंडलेस ने बड़े अक्षरों में लिखा था ‘सत्य’)। क्योंकि बच्चे निश्छल होते हैं  इसलिए उन्हें न्याय से प्यार होता है, और चुंकि  हममें से अधिकांश दुष्ट  और कपटी होते हैं, इसलिए हमें दया की जरूरत होती है। -जी के चेस्टरटन।

 

उस वक्त अचानक सबकुछ बदल जाता है। हमारी आवाज और नैतिक  सोच। समझ में नहीं आता  कि क्या सोचा जाय और किसकी  बात सुनी जाय। अचानक ऐसा  लगता है जैसे हम किसी बच्चे  की तरह चलना सीख रहे थे कि अचानक सहारा छूट गया  और अब खुद ही चलना सीखना  पड़ेगा। आसपास कोई ऐसा  नजर नहीं आता- ना परिवार का कोई और ना ही दुनिया में कोई अपना, जिसके विचारों को सम्मान के साथ स्वीकार किया जाय।

ऐसे ही अकेले  हो गए इंसान के मन में आता  है कि वह अपना जीवन, सत्य या सौंदर्य को समर्पित होकर जीए, जिसके लिए आदमी के द्वारा शासित दुनिया में कोई  जगह नहीं है। उसके बाद  जीवन का कोई ऐसा उद्देश्य समझ में आने लगता है जिसे अपना अंतिम ध्येय बनाकर  जीने की इच्छा जगती है और वह दुनिया, जिसमें हम अब तक जी रहे थे, कहीं दूर पीछे छूट जाता है। (बोरिस पास्तरनाक की पुस्तक डॉक्टर जिवागो की इन पंक्तियों को क्रिस मैकेंडलेस ने चिह्नित कर रखा था और उसके बगल में उसने लिखा था, ‘जीवन में उद्देश्य की जरूरत’)

नीले रंग  के स्लीपिंग बैग, जिसे मैकेंडलेस की मां ने उसके लिए सीया था, में उसकी लाश को मिले सात सप्ताह से ज्यादा बीत चुके थे। उसके पिता वाल्ट मैकेंडलेस मैरीलैंड के अपने घर की खिड़की पर खड़े-खड़े, सामने चेसपीक खाड़ी की तरफ सूनी आंखों से एकटक देखते हुए कह रहे थे,” कितनी अजीब बात है कि जिस बच्चे के अंदर इतनी करुणा भरी थी उसी ने अपने मां-बाप को जीवन भर इतना दर्द दिया।“ चेसपीक के समुद्री किनारे पर मैरीलैंड में वाल्ट मैकेंडलेस का बिना किसी दाग-धब्बे का, सुंदर, सजा हुआ सुव्यवस्थित घर था। जमीन से लेकर छत तक, हर जगह की खिड़कियों से चेसपीक खाड़ी के दूर तक फैले सौंदर्य को देखा जा सकता था। उसके डाइनिंग रूम में चार बड़े पोस्टर बोर्ड पर क्रिस मैकेंडलेस की बहुत सारी तस्वीरें लगी थीं, वे तस्वीरें भी जो उसने अपनी आवारगी के दौरान लिए थे। उसकी मां बिली ने उन तस्वीरों को दिखाते हुए एक की तरफ इशारा किया जिसमें एक बच्चा घोड़े पर बैठा था, वह पीले रंग के बरसाती कोट पहने आठ साल का मैकेंडलेस था, जो अपने हाईस्कूल के पहले ट्रिप पर गया था। एक तस्वीर में वह अपने परिवार के आसपास घूमते हुए शरारत भरी हरकतें कर रहा था, उसे देखते हुए वाल्ट ने दुख में डूबी आवाज में कहा,”जैसे अन्य बच्चे किसी का साथ खोजते हैं, क्रिस का वैसा स्वभाव न होना मुझे सबसे ज्यादा मुश्किल भरी बात लगती थी। मैंने अन्य बच्चों से ज्यादा समय क्रिस को दिया था। भले ही वह हमें परेशान कर देता था, लेकिन उसका साथ रहना अच्छा लगता था।“

वाल्ट मैकेंडलेस ने घर में पहने जाने वाले कपड़े पहन रखे थे, उसमें भी वह प्रभावशाली व्यक्तित्व के लग रहे थे। वह पेशे से विज्ञान के एक बेहद रहस्यमय क्षेत्र से जुड़े थे- सिंथेटिक एपरचर रडार (Synthetic Aperture Radar or SAR) अतिउच्च तकनीक को विकसित करनेवालों में उनका नाम था। यह यंत्र 1978 के एक बड़े अमेरिकी अंतरिक्ष मिशन में एक उपग्रह सीसेट(Seaset) के साथ धरती की कक्षा में स्थापित किया जाना था। नासा में इस सीसेट उपग्रह के प्रोजेक्ट मैनेजर थे, वाल्ट मैकेंडलेस। इस तरह के शक्तिशाली पद पर काम करने के कारण वाल्ट के स्वभाव में था हर चीज पर नियंत्रण करना। हलांकि वे नम्र आवाज में बात करते थे, लेकिन उनके अंदर में भरी इनर्जी का आवेग बाहर दिखती थी। यही इनर्जी, निस्संदेह वाल्ट ने अनुवांशिक तौर से अपने बेटे क्रिस मैकेंडलेस को दिया था।

जब वाल्ट  बोलते थे तो लोग उनकी बात  सुनते थे। किसी बात का उनको बुरा लगता था तो उनकी आंखे छोटी हो जाती और जुबान रूक जाती थी। उनके परिवार के लोगों के अनुसार वाल्ट का कभी भी फूट पड़नेवाला गुस्सा कुछ सालों से अहिंसक हो चला था। 1990 में क्रिस के गायब होने के बाद उनके भीतर बहुत बदलाव आ गया था। बेटे के इस तरह से घर छोड़कर जाने ने उनको हिलाकर रख दिया था। उनके व्यक्तित्व की कोमलता वाला स्वभाव अब उभर कर सामने आया था।

वाल्ट बचपन में बहुत गरीब था। कोलोराडो शहर के स्कूल में पढते हुए उसने वहां विश्विद्यालय में स्कॉलरशिप पायी थी।  कॉलेज में पढ़ाई के दौरान  के खर्चे के लिए वह पार्ट  टाइम नौकरी करता था। उसने मार्चुरी(शवदाह घर) में  काम किया था लेकिन सबसे ज्यादा पैसा उसने चार्ली नोवाक  के रॉक बैंड के साथ पियानो बजाते हुए कमाया। वाल्ट  बहुत बढिया संगीतकार था। 1957 में सोवियत संघ ने जब स्पूतनिक 1 को अंतरिक्ष में  छोड़ा तब पूरा अमेरिका भय के माहौल में जीने लगा। इस राष्ट्रीय भय के दबाब में आकर सरकार ने अरबों डॉलर वहां के एयरोस्पेस उद्योग में झोंकना शुरू किया। यह वाल्ट के लिए अच्छा अवसर लेकर आया, जो तब तक शादी करके एक बच्चे का बाप बन चुका था। उसने एक एयरक्राफ्ट कंपनी में नौकरी कर ली जिसने उसे तीन साल के लिए टक्सोन भेजा। उसने एंटीना सिद्धांत में एरिजोना विश्वविद्यालय से अपनी मास्टर डिग्री पूरी की। अपनी थीसिस पूरी करने के बाद उसे कैलिफोर्निया में एक बड़े अंतरिक्ष मिशन में भेज दिया गया।

टोरेंस  शहर में उसने एक बड़ा बंगला  खरीदा। बहुत मेहनती होने के कारण जल्दी-जल्दी प्रोमोशन पाने लगा। वाल्ट मैकैंडलेस को इस बीबी से पांच बच्चे हुए। वाल्ट तब तक चांद पर उतरने वाले अंतरिक्ष यान सर्वेयर 1 का टेस्ट डायरेक्टर हो चुका था। उसके सितारे बुलंद थे। 1965 में उसकी शादी टूट गई और बीबी मार्सिया उससे अलग हो गई। वाल्ट ने अपनी सेक्रेटरी के साथ प्रेम करना शुरू कर दिया जिसका नाम बिली जॉनसन था। बिली ने 12 फरवरी 1968 को एक बच्चे को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया क्रिस्टोफर जॉनसन मैकेंडलेस। वाल्ट ने एक गिटार खरीदकर बिली को दिया जिसे बजाकर वह बच्चे को खुश किया करती थी। यही गिटार 22 साल बाद नेशनल पार्क सर्विस के रेंजरों को लेक मीड इलाके में पड़े लावारिश डॉटसन कार की पिछली सीट पर पड़ा मिला था।

क्रिस मैकेंडलेस ने अपनी प्रतिभा बचपन से ही दिखानी शुरू कर दी थी। जब वह दो साल का था तब वह एक आधी रात को बिना किसी को जगाए पड़ोसी के घर में चुपके से घुसकर चाकलेट का डब्बा चुरा लाया था। जब तीसरी क्लास में था तब उसके एक टेस्ट में बहुत ज्यादा अंक आने के बाद उसे अतिप्रतिभाशाली बच्चों के लिए चलने वाले क्लास में भेज दिया गया।

बिली ने याद करते हुए बताया, “ क्रिस इस बात से खुश नहीं था क्योंकि उसे अब और ज्यादा होमवर्क करना पड़ता था। इसलिए वह उस क्लास से निकलने की कोशिश में लग गया। उसने वहां के शिक्षकों और प्रधानाध्यापक को यह समझाने की कोशिश की कि टेस्ट में उसको नंबर देने में कोई गलती हुई है, वह उस अतिप्रतिभाशालियों के लिए अलग से चलने वाले क्लास के लायक नहीं है।“

क्रिस से तीन साल छोटी बहन कैरीन  ने बताया,” वह हमेंशा अपने आप में खोया रहता था। वह असामाजिक नहीं था, उसके कई दोस्त थे और हर कोई उसे पसंद भी करता था। लेकिन वह अकेले ही घंटों रह सकता था। उसे किसी खिलौने या दोस्त की जरूरत नहीं थी।“

जब क्रिस छह साल का था तब वाल्ट नासा (NASA, अमेरिकी अंतरिक्ष संगठन) में चला आया और एरिजोना के अन्नाडेल में उसने एक मकान खरीदा। वहां चार साल बाद उसने नासा की नौकरी छोड़कर अपने घर में ही एक कंसल्टिंग फर्म शुरू किया, जिसमें बिली उसकी बिजनेस पार्टनर थी। वाल्ट को अपने पहली बीबी के परिवार को भी पैसा देना पड़ता था। इसलिए, ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने के लिए वाल्ट और बिली ने दिन-रात काम करना शुरू किया।

कैरीन ने बताया,” मम्मी पापा घंटों काम करते रहते थे। मैं और क्रिस जब सुबह को जागते थे तब भी उन दोनों को काम करते पाते थे, जब स्कूल से लौट कर आते थे तब भी और रात में सोने जाते थे तब भी दोनों को बदहवाश होकर काम करते, हम दोनों देखते थे। उन्होंने बहुत पैसा कमाया।“

लेकिन इस तरह से दिन-रात काम करने के कारण वाल्ट और बिली दोनों  मानसिक तनाव के शिकार रहने लगे और उनके बीच झगड़ों का दौर शुरू हो चुका था। वे बातों-बातों में एक दूसरे को तलाक की धमकी भी देते थे। कैरीन ने इस बारे में कहा,” मैं और क्रिस ये सब देखा करते थे और इन सब कारणों से हम दोनों के बीच भावनात्मक लगाव और ज्यादा बढ गया था। लेकिन हमारा परिवार एक दूसरे के साथ कभी-कभी अच्छा वक्त भी गुजारता था। हम सब सप्ताह के छुट्टियों वाले दिन ट्रिप पर निकल जाते थे, बड़े झीलों से लेकर नीले पहाड़ों की तरफ। क्रिस को इन ट्रिपों से बहुत प्यार था। हमारे परिवार को शुरू से ही आवारगी का शौक था और इसको क्रिस ने बचपन ही से सीखा था।“

इन्हीं  ट्रिपों के दौरान यह परिवार मिशीगन के पहाड़ों की तरफ  चला जाता था, जहां क्रिस  की मां बिली का घर था। बिली के पिता हलांकि ट्रक ड्राईवर  थे लेकिन एक नौकरी पर ज्यादा दिन नहीं टिकते थे। वाल्ट  ने उनके बारे में बताया,” बिली के पिता समाज में फिट नहीं हो पाते थे। उनका स्वभाव क्रिस जैसा ही था।“ बिली के पिता लॉरेन जॉनसन जिद्दी और स्वप्नशील स्वभाव के थे। उन्होंने खुद से संगीत और कविता सीखी थी। पहाड़ में रहने वाले जंगली जानवरों से उनको बहुत प्रेम था। बिली ने अपने पिता के बारे में बताया,” उनको जानवरों की सेवा में मजा आता था। कहीं किसी जानवर को फंसा या घायल पाते तो अपने घर लाते और उसके स्वस्थ होने के बाद फिर से उसे जंगल में छोड़ आते। उनके ट्रक के नीचे एक बार एक हिरण दबकर मर गयी। वे बहुत दुखी हुए। उसके बच्चे को उसने घर लाकर अपने बच्चे की तरह पाला-पोषा। अपने परिवार को पालने के लिए लॉरेन जॉनसन ने कई काम किये। मुर्गियां पालीं, अस्तबल बनाकर घोड़ों को बेचा। लेकिन परिवार का ज्यादातर खाना शिकार से आता था।

बिली ने बताया, “मेरे पिता को जानवरों को मारने में दया आती थी और जब भी वे किसी हिरण को मारते थे तो रोते थे। लेकिन हमें खिलाने के लिए उनको ऐसा करना पड़ना था। साथ ही, उनको शिकार करने आने वालों के लिए गाईड का भी काम किया करते थे, जिसके कारण उनको और भी कष्ट होता था। शहर से आनेवाले लोग बड़े गाड़ियों में आते थे और पापा को उनको दिन भर जंगल में घुमाना पड़ता था। पापा को उनसे वादा करना पड़ता था कि वे उनको हिरण का शिकार करवाएंगे। लेकिन वे शिकारी इतना शराब पिए हुए रहते थे उनका निशाना चूक जाता था। आखिर में उनको खुद ही हिरण को गोली मारनी पड़ती थी। उनको इस बात से घृणा थी।“

लॉरेन जॉनसन  और क्रिस मैकेंडलेस दोनों को एक-दूसरे से बहुत प्यार था। उस बूढे का जंगल से और बियाबानों की घुमक्कड़ी से प्रेम ने उस बच्चे पर बहुत प्रभाव डाला था। जब क्रिस आठ साल का था तब वाल्ट उसे ओल्ड रैग के पहाड़ की चोटी की चढ़ाई करने ले गया था। तीन दिन के इस ट्रिप में क्रिस अपने बैग को खुद ही ढोता रहा। उसके बाद तो दोनों बाप-बेटे हर साल उस पहाड़ की चढाई करने जाते थे। जब क्रिस थोड़ा और बड़ा हुआ तो वाल्ट पूरे परिवार के साथ कोलोराडो की रॉकी माउंटेन नेशनल पार्क की सबसे ऊंची चोटी(14256 फीट) पर चढाई के लिए गया। इस ट्रिप के बारे में वाल्ट ने बताया,” तेरह हजार फीट चढने के बाद मैं बहुत थक गया और मैंने वापस लौटने का फैसला किया क्योंकि आगे की चढाई और भी खतरनाक थी। लेकिन क्रिस चोटी तक जाना चाहता था। लेकिन मैं नहीं माना और वह रास्ते भर इस बात की शिकायत करता रहा। उस समय वह बारह साल का था, अगर वह चौदह या उससे ऊपर का होता तो शायद मुझे छोड़कर आगे चोटी की तरफ बढ जाता। वह बचपन से ही निडर किस्म का था और अपने आसपास के खतरों की बिल्कुल परवाह नहीं करता था।“

क्रिस को जिस काम में मन लगता उसमें वह बहुत ऊंची सफलता के साथ काम करता था। उसे स्कूल में हमेंशा ही अच्छे अंक मिले। एक बार जब उसे फिजिक्स में कम अंक मिले तो वाल्ट और बिली उसके शिक्षक से मिलने गए। शिक्षक ने बताया कि लगभग दौ सौ बच्चों को उसने लैब रिपोर्ट बनाने के लिए एक तयशुदा फार्मेट दिया था लेकिन इस नियम को क्रिस ने मूर्खतापूर्ण माना और अपना रिपोर्ट किसी और फार्मेट में बनाकर दिया, इसलिए उसे कम अंक दिए गए।

क्रिस और उसकी बहन कैरीन, दोनों ने अपने पिता से संगीत की प्रतिभा  पायी थी। क्रिस गिटार, पियानो और फ्रेंच हार्न बजाता  था। वाल्ट ने उसके बारे में बताया,”उसको इतनी कम उम्र में ये सब बजाते देखकर मुझे आश्चर्य होता था। मैं जब पियानो बजाता था तो वह अच्छी आवाज में गाता था। वह किसी पेशेवर गायकों जैसी सुरीला था। क्रिस एक बैंड अमेरिकन युनिवर्सिटी सिम्फनी में फ्रेंच हार्न बजाया करता था लेकिन उसने बैंड लीडर के द्वारा कुछ नियम बनाये जाने के बाद, उसका विरोध करते हुए बैंड छोड़ दिया।“

लेकिन उसकी बहन कैरीन का कहना कुछ  और ही था,” मेरे भाई के बैंड छोड़ने के पीछे का कारण मैं थी। मैं क्रिस की तरह फ्रेंच हार्न बजाना चाहती थी और वही एक ऐसी चीज थी जिसमें मैं क्रिस से बेहतर थी। मैं अभी-अभी बैंड में शामिल हुई थी और वह सीनियर था। उससे बेहतर बजाने के कारण मुझे बैंड में आगे के बैंच पर जगह मिली थी औऱ क्रिस को मुझसे पीछे बैठना बर्दाश्त नहीं हुआ।“

लेकिन संगीत  की इस प्रतिस्पर्धी भावना  ने क्रिस और कैरीन के रिश्ते को नुकसान नहीं पहुंचाया था।  वे दोनों अन्नाडेल में  अपने घर पर घंटों एक दूसरे  के साथ खेलते हुए बिताते थे। कैरीन ने याद करते हुए कहा,”वह मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार करता था और मुझे लेकर काफी प्रोटेक्टिव था। जब गली में मेरे साथ चलता था तो मेरा हाथ पकड़े रहता था। जब वह जूनियर हाईस्कूल में था तब मैं ग्रेड स्कूल में पढ रही थी। उसकी छुट्टी मुझसे पहले हो जाती थी लेकिन वह घर साथ जाने के लिए मेरा इंतजार करता था।“

क्रिस ने अपनी मां अपनी से गहरी काली आंखे पायी थी। वह शरीर से मजबूत था लेकिनछोटे कद का था इसलिए स्कूलों के ग्रुप फोटो में हमेंशा आगे खड़ा रहता था। उसने कई खेलों में अपना हाथ आजमाया लेकिन किसी में भी पारंगत होने का धैर्य उसमें नहीं था। कोलोराडो में एक बार बर्फ पर स्कीईंग करने के लिए जाने के बाद फिर वहां लौटकर नहीं गया। वाल्ट ने उसे गोल्फ सिखाने की लेकिन उसे ज्यादा दिन तक झेल नहीं पाया।

वाल्ट ने इस बारे में बताया,”क्रिस अतिप्रतिभाशाली था। लेकिन जैसे ही कोई उसकी प्रतिभा को निखारने की कोशिश में उसे कोई गाइड करता, तो एक अजनबी सी दीवार उसका रास्ता रोक देती थी। क्रिस किसी प्रकार के निर्देश का घोर विरोध करता था। मैं रैकेटबॉल (एक खेल) का अच्छा खेलाड़ी था। मैंने उसे इस खेल को तब से सिखाना शुरू किया जब वह ग्यारह साल का था। जब वह पंद्रह साल का हुआ उसके बाद मुझे इस खेल में मात देने लगा। वह बहुत तेज और ताकत से खेलता था। उसके खेलने में कुछ कमियों के बारे में जब मैंने उसे बताया तो उसने मेरी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। एक बार एक पैंतीस साल का बहुत अनुभवी खिलाड़ी एक टूर्नामेंट खेलने के लिए उसका टेस्ट ले रहा था। क्रिस अच्छा खेल रहा था लेकिन जैसे ही टेस्ट लेने वाले ने उसके खेल की एक कमी गिनाई, क्रिस ने वहीं उस टेस्ट को छोड़ दिया।“

रणनीति  बनाकर खेलना क्रिस ने सीखा ही नहीं था। वह एक ही तरीका जानता था, भरपूर  ताकत लगाकर सीधे-सीधे खेलना। उसका ऐसा स्वभाव तब से हो गया था जबसे उसने लम्बी  दौड़ प्रतियोगिता में भाग  लेना शुरू किया। उसके अंदर एक एथलीट था। वह जब दस बरस  का था तब पहली पहली बार दस किलोमीटर के रोड रेस में  भाग लिया था और लगभग एक हजार आदमियों को पीछे छोड़ते हुए  इस बच्चे ने 69 वां स्थान  पाया था। थोड़ा बड़ा होने तक वह इस क्षेत्र के लंबी रेस के टॉप धावकों में से एक था।

जब क्रिस  बारह साल का था तब वाल्ट  और बिली ने कैरीन के लिए  एक पपी(पिल्ला) खरीदा था। क्रिस उस पिल्ले को रोज अपने साथ सुबह ले जाता और उसके साथ दौड़ लगाता। कैरीन ने इस घटना को याद करते हुए कहा,”पपी हलांकि मेरे लिए खरीदा गया था लेकिन क्रिस से उसको अलग करना नामुमकिन था। पपी बहुत तेज दौड़ता था और जब भी दोनों साथ दौड़ते, वह क्रिस को हर बार हरा देता था। बहुत कोशिश करने के बाद जिस दिन पहली बार क्रिस ने उस पपी को दौड़ में हराया था उस दिन वह काफी उत्साहित और खुश था। वह दिन भर खुशी के मारे-मारे रोते-रोते चिल्लाया था ‘मैंने उसे हरा दिया’।

वर्जीनिया को फेयरफॉक्स में एक प्रतिष्ठित स्कूल, डब्ल्यू टी वुडसन हाईस्कूल में एथलीट टीम का कैप्टन क्रिस मैकेंडलेस था। उस टीम में रहे गोर्डी ने उसे याद करते हुए बताया,”क्रिस ने हम सबके लिए एक अभ्यास प्लान किया था जिसका नाम उसने दिया था-रोड वैरियर्स(सड़क के योद्धा)। उसके साथ हम सब एक लंबे और कठिन दौड़ पर निकलते थे। वह हमें जानबूझकर जंगलों, खेतों और अनजाने रास्तों पर दौड़ाते हुए ले जाता था और हम रास्ता भूल जाते थे। इन सबके पीछे एक ही उद्देश्य था- किसी अंजान जगह की तलाश। जब हम थक जाते तो धीरे-धीरे दौड़ने लगते और किसी पहचान वाले सड़क पर नजर पड़ते ही फिर तेजी से अपने घर की तरफ दौड़ने लगते थे। क्रिस इसी तरह से पूरी जिंदगी जीता रहा।“ मैकेंडलेस ने दौड़ को अध्यात्मिक कसरत के रूप में लिया था, यह आवारगी उसके लिए धर्म की तरह थी। उसके टीम के एक और सदस्य इरिक ने बताया,” क्रिस दौड़ने के इस अध्यात्मिक महत्व का बयान कर हमें मोटिवेट किया करता था। वह हमें इस दुनिया की बुरी ताकतों के बारे में बताकर कहता था कि हम ये सोचें कि इन बुरी ताकतों के विरूद्ध दौड़ लगा रहे थे, वो बुरी ताकतें जो हमारे अंदर की अच्छाईयों की राह में दीवार बनकर खड़ी थी। वह कहता कि “अच्छा सोचना मन पर निर्भर है और इसके लिए हमें अपनी सारी उर्जा लगा देनी चाहिए।“ एक हाईस्कूल के बच्चे के मुंह से इतनी बड़ी बातें सुनकर हम उसके प्रभाव में चले आते थे।“ लेकिन मैकेंडलेस के लिए दौड़ना सिर्फ अध्यात्मिक बात नहीं था, प्रतियोगिता भी था और वह जीतने के लिए दौड़ता था। उसकी टीम में रह चुकी मैकेंडलेस की दोस्त मैक्सी ग्लिमर ने बताया,”वह अपने दौड़ने को लेकर काफी गंभीर था। मैं उसे दौड़ते देखा करती थी। वह हमेंशा बेहतर करने की कोशिश करता और उस वक्त काफी दुखी होता था जब वह अपनी आशा के अनुसार प्रदर्शन नहीं करता था। जब वह किसी रेस में अच्छा नहीं करता था तो अपने लिए हिंसक हो जाता था। वह किसी से इसके बारे में बात नहीं करता था। अगर मैं उसे समझाने की कोशिश करती तो और गुस्सा होकर मेरी तरफ से ध्यान हटा लेता था। उसने अपनी निराशा को अपना लिया था। कहीं अकेले में जाकर वह खुद को पीटता था।“

ग्लिमर  ने आगे कहा,” वह सिर्फ दौड़ को लेकर ही संजीदा नहीं था। हर काम में उसका रवैया इसी तरह का था। हाईस्कूल में कोई बहुत मेहनत का काम नहीं करना चाहता लेकिन वह करता था और मैं भी करती थी, इसलिए हम दोनों अच्छे दोस्त थे। ब्रेक के दौरान हम दोनों साथ बिस्किट खाते और जीवन के बारे में, दुनिया के बारे में बहुत सारी गंभीर बातें करते। मैं ब्लैक नस्ल की हूं और मुझे ये कभी समझ में नहीं आया कि लोग नस्ली भेदभाव क्यूं रखते हैं। क्रिस मुझसे ऐसी ही विषयों पर बात किया करता था। वह यह सब समझ सकता था और उसके अंदर भी इसी तरह के प्रश्न रहते थे। मैं उसे बहुत पसंद करती थी। वह बहुत अच्छा था।“

मैकेंडलेस जीवन के इस भेदभाव और असमानता को दिल पर लेता था। वुडसन हाईस्कूल में ही एक बार वह दक्षिण अफ्रीका में हो रहे रंगभेद को लेकर पागल सा हो गया था। वह इस बारे में दोस्तों से दक्षिण अफ्रीका में हथियारों की स्मगलिंग कर वहां चल रहे रंगभेद विरोधी आंदोलन में साथ देने के बारे में गंभीरता से बातें किया करता था। उसके दोस्त इरिक ने उस वाकये को याद करते हुए कहा,”इस बारे में एक बार उससे मेरी बात हुई थी। क्रिस को सिस्टम के साथ चलना पसंद नहीं था, वह लाईन में इंतजार करते हुए नहीं रूक सकता था। वह कहा करता,”हम पैसा जमा करके दक्षिण अफ्रीका चाहें तो अभी जा सकते हैं। सिर्फ ये तय करो` कि जाना है कि नहीं।“ मैं उसका विरोध करते हुए कहता कि हम अभी बच्चे थे और वहां जाकर कुछ खास नहीं कर सकते थे। लेकिन उससे तर्क करना बहुत मुश्किल था। वह सीधे जबाब देता, ’मुझे लगता है कि तुम सही या गलत की कोई परवाह ही नहीं करते हो’।”

सप्ताह  की छुट्टियों में जहां उसके दोस्त शराब के बार  में जाने की कोशिशों में  लगे रहते थे, वहीं वाशिंगटन की बदनाम गलियों में वेश्याओं और बेघरों से बातें करने, उसके लिए खाना खरीदने और उनको जीवन सुधारने की सलाह देने में बिताता था। क्रिस  की मां बिली ने बताया,”क्रिस यह समझ नहीं पाता था कि उसके देश में इतने लोगों को भूखा क्यों छोड़ दिया जाता था। वह इस समस्या के बारे में घंटों सोचा करता था।“ एक बार क्रिस एक बेघर आदमी को चुपके से, अन्नाडेल के घर लाकर अपने गाड़ी के ट्रेलर में रहने के लिए जगह दिया और वाल्ट या बिली को कभी पता नहीं चला कि उनके यहां कोई रहता था।‘

एक बार  क्रिस अपने दोस्त इरिक के घर गया और उससे कहीं चलने को कहा। उस घटना को याद करते हुए इरिक ने कहा,” वह शुक्रवार की रात थी और मुझे लगा कि वह मुझे जार्जटाउन की पार्टी में ले जा रहा था। लेकिन वह मुझे फोर्टीन्थ स्टेट की बदनाम गलियों में लेकर चला गया। उसने मुझसे कहा,”इरिक, हम जिन बातों को किताब में पढते हैं उसे हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक उसे देख और जी न लें। आज की रात हम उन्हीं बातों को देखने और जीने आए हैं।“ अगले कुछ घंटो तक हम वहां दलालों, शराबियों और गंदे जीवन जीनेवालों के बीच रहे। मुझे बहुत डर लग रहा था। जब शाम घिर आई तब क्रिस ने पूछा कि मेरे पास कितने पैसे थे। मेरे पास पांच डॉलर और क्रिस के पास दस थे। उसने मुझे गाड़ी में गैस भरवाने भेज दिया और खुद खाना खरीदने चल पड़ा। वह अपने साथ हैमबर्गर का एक बड़ा झोला लेकर लौटा और हमदोनों उसे फूटपाथ पर सोये दुर्गंध से भरे लोगों को बांटने लगे। यह रात मेरे लिए अद्भुत थी। लेकिन क्रिस ने इस तरह के काम कई बार किए थे।“

जब वह हाईस्कूल में था तब ही उसने आगे पढने के लिए कॉलेज  जाने से मना कर दिया था।  जब वाल्ट और बिली ने उससे कहा कि उसे अपने जीवन में  अच्छे कैरियर को पाने के लिए  कॉलेज डिग्री की जरूरत  थी तो क्रिस का कहना था कि कैरियर बीसवीं शताब्दी में  गढा गया निरर्थक सा काम  था, जिसका उसके जीवन में  कोई महत्व नहीं था। उसने कहा कि वह बिना किसी कैरियर के जी सकता था। वाल्ट ने आगे उसके बारे में बताया,”हम उसकी बातों को सुनकर तनाव में आ गए। बिली और मैं दोनों ही गरीब परिवार से आए थे। कॉलेज की डिग्री को हम इतने हल्के से नहीं लेते थे और फिर हम अपने बच्चों को पढाने के लिए ही ती इतने मेहनत से पैसा कमा रहे थे। बिली ने क्रिस को अपने पास बिठाया और कहा,”क्रिस, अगर तुम सचमुच दुनिया के लिए कुछ बेहतर करना चाहते हो तो सबसे पहले अपने जीवन को बेहतर बनाओ। कॉलेज जाओ, कानून की डिग्री लो और उसके बाद तुम अपना असर लोगों पर छोड़ पाओगे।“

उसके दोस्त  इरिक ने इस बारे में कहा,“ क्रिस कॉलेज में बेहतर ग्रेड से पास हुआ और अपने मां-बाप को शिकायत करने का कोई मौका नहीं दिया। उसे कोई समस्या नहीं हुई क्योंकि वह अपने जीवन में इस तरह की सफलता प्राप्त करता आया था। उसके मां-बाप उससे अपनी बात मनवाने में सफल रहे इसलिए तो आगे की पढाई के लिए वह इमोरी यूनिवर्सिटी जानेवाला था, हलांकि यह सब उसकी नजर में बकबास और निरर्थक था।“

यह आश्चर्यजनक था कि जिस क्रिस ने कई मौकों  पर अपने मां-बाप की बातों  पर ध्यान नहीं दिया था, वह कॉलेज की पढाई करने की बात  पर उनके दबाब में आ गया  था। लेकिन ऐसे उदाहरण हैं जिससे क्रिस का अपने मां-बाप के साथ संबंधों  में विरोधाभाष प्रकट  होता था। उसकी दोस्त ग्लिमर उससे मिलती तो उसके सामने  वह अपने मां-बाप का चरित्र चित्रण तानाशाह के रूप  में करता था जबकि अपने पुरूष  दोस्तों से उसने इस तरह  की कोई बात कभी नहीं की।  इरिक ने इस बात पर रौशनी  डालते हुए बताया,” मैं समझता था कि उसके मां-बाप बहुत अच्छे थे। बिल्कुल हमारे या किसी अन्य के मां-बाप की तरह। क्रिस को किसी का आदेश पसंद नहीं था। मैं समझता हूं कि वह किसी भी मां-बाप से नाखुश ही रहता। उसे मां-बाप नाम के जीव के विचार से ही समस्या थी।“

मैकेंडलेस का व्यक्तित्व बहुत जटिल था। वह बहुत अकेला भी था लेकिन किसी समूह के साथ भी उतनी ही खुशी के साथ रहता था। वह एक्सट्रीमिस्ट था। अपनी विकसित सामाजिक चेतना के बावजूद वह ऐसा नहीं था जिसे मजाक पसंद ना हो। वह मजाकिया भी था।

मैकेंडलेस के जीवन की सबसे पेचीदा पक्ष था- पैसों के बारे में उसके विचार और भावनाएं। वाल्ट और बिली ने गरीबी के दिन देखे थे। इसलिए वे पैसे न होने का दर्द अच्छी तरह जानते थे और बहुत संघर्ष के बाद उन्होंने पैसा कमाया था और उनको उन पैसों से आनंद उठाने में कुछ भी गलत नहीं दिखता था। बिली ने इस बात पर जोर देकर कहा,” हमने बहुत मेहनत से काम किया। जब हमारे बच्चे छोटे थे तब से ही पाई-पाई बचाकर हमने भविष्य को बेहतर बनाया।“ जब भविष्य बेहतर हुआ तब भी वाल्ट और बिली ने उन पैसों को दिखावे में खर्च नहीं किया। अच्छे कपड़े, बिली के लिए कुछ गहने, एक कार, समुद्र किनारे घर और एक नाव खरीदा। अपने बच्चों को वे यूरोप घूमाने ले गए। बिली ने यह स्वीकार किया कि क्रिस को यह सब करना अच्छा नहीं लगता था। उसका बेटा क्रिस मैकेंडलेस जो टाल्सटॉय का भक्त था, पैसों को बहुत बुरी चीज मानता था। उसे वह आत्मा को भ्रष्ट कर देनेवाला शैतान मानता था। यह बहुत बिडंबना भरी बात थी क्योंकि क्रिस एक पूंजीवादी माहौल में पैदा हुआ प्राणी था। बिली ने उसे याद करते हुए कहा,”वह जन्म से ही उद्योग करने लगा था।“ उसकी बहन कैरीन ने बताया,”वह आठ साल का था जब उसने अपने सब्जियों की खेती की थी और अन्नाडेल में ठेले पर लेकर घर-घर जाकर इस छोटे बच्चे ने उसे बेचा था। ऐसे भोले चेहरे वाले बच्चे को देखकर कौन सब्जियां खरीदने से खुद को रोक सकता था। यह बात क्रिस अच्छी तरह जानता था। जब वह घर लौटता तो ठेला खाली रहता और उसके जेब में पैसे भरे रहते।“

जब वह बारह साल का था तब उसने फोटोकॉपी करने का धंधा करना शुरू किया। घरों से फोटोकॉपी के लिए पेपर लेना और फिर उसे फोटोकॉपी सहित वापस देकर पैसा ले आना उसका काम था। वह अपने मां-बाप के ऑफिस में फोटोकॉपी करता था और इसके लिए कम रेट पर पैसे चुकाता था जबकि अपने ग्राहकों से वह दो सेंट प्रति कॉपी के हिसाब से वसूलता था जो उस जगह के बाजार से सस्ता था। उसने काफी मुनाफा कमाया।

1985 में  वुडसन हाईस्कूल में पढते  हुए उसने एक लोकल बिल्डिंग कान्ट्रेक्टर के पास सेल्समेन की नौकरी करनी शुरू की और इतना सफल हुआ कि उसके अंदर उसी स्कूल के आधे दर्जन लड़के काम करने लगे। उसके बैंक एकाउंट में सात हजार डॉलर जमा हो गए। उसी पैसे से उसने अपनी सेकेंडहेंड डॉटसन कार खरीदी थी। क्रिस ने इतना बेहतरीन काम किया था कि 1986 में हाईस्कूल की पढाई खत्म होते वक्त उस बिल्डर ने वाल्ट मैकेंडलेस को फोन कर कहा कि वह क्रिस की आगे की पढाई का खर्च खुद उठाएगा अगर वह क्रिस को अन्नाडेल में ही रोक ले, इमोरी विश्वविद्यालय न जाने दे ताकि वह काम भी करता रहे और पढाई भी।

वाल्ट ने उस वाकये को याद करते हुए  कहा,”जब मैंने क्रिस को उसके बॉस द्वारा दिए गए ऑफर के बारे में बताया तो उसने सुनते ही इंकार कर दिया। उसने बॉस को बता दिया कि उसे अपने और कई काम अभी करने हैं।“ जैसे ही हाईस्कूल की पढाई खत्म हुई, क्रिस ने अपने नए खरीदे हुए सेकेंडहेंड डॉटसन कार से पूरी गर्मी देश भर में घूमने की घोषणा कर दी। किसी को यह पता नहीं था कि यह यात्रा आगे चलकर पूरे महादेश की साहस भरी आवारगी का रूप ले लेगी। ना ही उसके परिवार में कोई यह देख पाया कि इस यात्रा में खोजी मैकेंडलेस को कुछ ऐसी चीजें मिलेंगी जो उसको अपने अंदर डूबने और सबसे दूर जाने को प्रेरित करेगी, साथ ही जो उनसे प्यार करते थे उनको उलझनें, गलतफहमियां और दुख देकर जाएगी।

1986 के बसंत में वाल्ट और बिली सप्ताह की छुट्टी में क्रिस के हाईस्कूल की पढाई पूरी होने के बाद उसके लिए एक छोटी पार्टी रखी। उसी आसपास में 10 जून को वाल्ट का जन्मदिन भी था। उस पार्टी में क्रिस ने अपने पिता वाल्ट को तोहफा दिया, एक महंगा टेलीस्कोप।

क्रिस की बहन कैरीन ने बताया,”मुझे याद है, जब क्रिस ने पापा को वह टेलीस्कोप दिया था तब मैं वहीं बैठी थी। क्रिस ने थोड़ी शराब पी थी और उसी में वह होश खो बैठा था। वह बहुत भावुक हो उठा। वह रोने लगा था। उसने किसी तरह अपने आंसुओं को रोका और पापा से कहा कि हलांकि उसके और पापा के बीच सालों से कुछ मतभेद रहे थे, फिर भी पापा ने जितना कुछ उसके लिए किया है और जितना संघर्ष किया है, उसके लिए वह अपने दिल में बहुत सम्मान की भावना ऱखता है। उसने बहुत ही लम्बी और भावपूर्ण बातें कही थी। सभी भावुक हो गए थे। उसके बाद वह अपने ट्रिप पर चला गया था।“

वाल्ट और बिली, मैकेंडलेस को जाने से नहीं रोक सके। हलांकि वाल्ट ने अपना क्रेडिट कार्ड देने में सफलता पायी और उससे वादा लिया कि तीन दिन पर वह फोन किया करेगा। वाल्ट ने उस पल को याद करते हुए कहा,”जब वह जा रहा था तो हमारे हृदय में बहुत कष्ट हो रहा था। लेकिन हम उसे जाने से रोक नहीं पाए।“ हाईस्कूल पास करने के बाद के इस आवारगी में क्रिस अपनी डॉटसन कार लेकर दक्षिण की ओर गया उसके बाद पश्चिम में टेक्सास के मैदानों से होते हुए न्यू मैक्सिको और एरिजोना पहुंचा। फिर उसके बाद प्रशांत महासागर के किनारे की तरफ वह घूमा। शुरू में उसने अपने पिता की बातों का सम्मान करते हुए नियमित फोन किया लेकिन उसके बाद गरमी का मौसम बीतते-बीतते उसने फोन करना धीरे-धीरे कम कर दिया और पतझड़ में इमोरी युनिवर्सिटी में अपने नए कॉलेज की पढाई के शुरू होने से ठीक दो दिन पहले घर वापस लौटा, तब उसकी दाढ़ी के साथ बाल भी बड़े हो गए थे और तीस पौंड घटे वजन के साथ शरीर दुबला हो चला था।

कैरीन ने कहा,”जैसे ही मैंने सुना कि वह घर आया है तो मैं उसके कमरे की तरफ दौड़ी। वह अपने कमरे में सोया था और शरीर से बहुत कमजोर लग रहा था। वह सलीब पर टंगे ईसा जैसा दुबला दिख रहा था। जब मां ने देखा कि उसका वजन बहुत घट गया था, वह बहुत दुखी हुई। उसने पागलों की तरह खाना बनाना शुरू कर दिया ताकि उसे जल्दी से मोटा किया जा सके।“

अपने ट्रिप  के आखिरी दिनों में क्रिस  मोजेव के रेगिस्तान में  खो गया था और वहां शरीर में  पानी की कमी हो जाने से मरते-मरते बचा था। उसके मां-बाप  ने जब उसके साथ हुई इस अनहोनी के बारे में सुना तो वह सावधान हुए थे लेकिन नहीं जानते थे क्रिस को आगे भविष्य में इस तरह के खतरे ना उठाने के लिए कैसे कहा जाय़।

वाल्ट ने उस समय के मैकेंडलेस के मनोदशा के बारे में बताया,” क्रिस ने अब तक कई सारे काम सफलता के साथ किए थे इसलिए उसे अपने ऊपर अति आत्मविश्वास हो चला था। अगर उससे कुछ भी कहा जाता तो वह विनम्रतापूर्वक सुन लेता था और वही करता था जो वह चाहता था। इसलिए उस वक्त मैंने उससे कुछ नहीं कहा। मैं उसके साथ टेनिस खेला करता था और इस दरम्यान हम दोनों के बीच बातें भी होती थी। इसी तरह एक दिन मैंने उसके द्वारा जानबूझकर उठाए गए उस खतरे के बारे में बात की। मैं तब तक समझ चुका था इस बारे में क्रिस से सीधे ये कहने से कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा कि आगे से ऐसा खतरा मत उठाना। इसलिए मैंने यही बात कुछ अलग तरीके से कही। मैंने कहा कि उसके इन ट्रिपों पर मुझे कोई ऐतराज नहीं था लेकिन वह थोड़ी सी सावधानी बरतकर चले और वह जहां जाय उसके बारे में हमें बताता रहे।“ वाल्ट की बातों को सुनकर क्रिस गुस्सा हो गया और वाल्ट के इन बातों का उल्टा असर ये पड़ा कि आगे से क्रिस ने उनसे अपने योजनाओं के बारे में बातें करनी बंद कर दी।

उसकी मां  बिली ने बताया,” क्रिस को लगता था कि हम मूर्ख थे जो उसकी इतनी चिन्ता कर रहे थे। अपने ट्रिप के दौरान उसने कहीं से एक छुरा और रायफल पाया था। जब हम उसे कॉलेज छोड़ने अटलांटा जा रहे थे तो वह दोनों चीजें अपने साथ ले गया था। वाल्ट ने हंसते हुए उस घटना को याद किया,” हम जब उसे छोड़ने हॉस्टल जा रहे थे तब हमने सोचा था कि उसके रूममेट के मां-बाप भी वहां होंगे लेकिन वहां सिर्फ उसका रूममेट था। उस कमरे में मैकेंडलेस अपने छुरा और रायफल के साथ अंदर गया। और जानते हैं क्या हुआ? नब्बे दिन बाद उसका रूममेट कॉलेज छोड़कर जा चुका था और मैकेंडलेस तब तक कॉलेज के प्रतिभाशाली छात्रों में गिना जाने लगा था।“

वाल्ट और बिली को तब जाकर और भी आश्चर्य  हुआ जब उन्होनें देखा कि इमोरी  विश्वविद्यालय के जीवन में  मैंकेंडलस को मजा आ रहा था। क्रिस अब क्लीन शेव्ड, छोटे बाल के साथ उसी लूक में फिर आ गया था जैसा कि वह हाईस्कूल के दौरान था। उसने अपने स्कूल के अखबार में लिखना शुरू कर दिया। ग्रेजुएशन के बाद लॉ की पढाई करने के बारे में वह बड़े उत्साह के साथ बात करता था। अगली गर्मी में छुट्टियों में वह अपने घर अन्नाडेल लौटा और अपने पिता की कम्पनी में वह कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर विकसित करने लगा। उसने एक सॉफ्टवेयर बनाया जिसके बारे में वाल्ट ने बताया,” वह प्रोग्राम अभी भी बढ़िया काम करता है और उसकी कई कॉपी हमने बेची भी। लेकिन जब मैंने उस सॉफ्टवेयर के बारे में पूछा कि उसने इसे कैसे बनाया और यह इतना अच्छा कैसे काम करता था तो उसने रहस्य बताने से इंकार करते हुए कहा कि मुझे सिर्फ उस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से मतलब रखना चाहिए। इस बात से मुझे गुस्सा आया। क्योंकि वह सीआईए एजेंट जैसी बड़ी चीज बनने की योग्यता रखता था। लेकिन क्रिस ऐसा ही था और हर चीज के बारे में उसका ऐसा ही रवैया था।“

क्रिस के व्यक्तित्व के कई पहलुओं से उसके मां-बाप परेशान रहते थे। हलांकि क्रिस बहुत उदार और दूसरों का खयाल रखनेवाला था। साथ ही, एक काम को लगातार पागल होकर करना, धैर्य न होना, सिर्फ अपने बात पर अडिग रहना ऐसे गुण थे जो उसके कॉलेज के दिनों में और बढते ही गए थे। उसके दोस्त इरिक ने कहा,”मैं क्रिस के साथ एक पार्टी में गया था। क्रिस बदल सा गया था। वह अन्तर्मुखी के साथ-साथ बहुत शान्त हो चुका था। जब मैंन उसे कहा कि मैं उसे देखकर खुश था तो उसने इस औपचारिकता पर नाराजगी भरे आवाज में बोला कि ऐसी बातें तो सब कहते थे। उससे बात करना बहुत मुश्किल हो रहा था। उसका अपना अध्ययन ही ऐसा विषय था जिसपर वह रुचि के साथ बात करता था। इमोरी विश्वविद्यालय का माहौल बहुत ही सामाजिक है, लेकिन क्रिस उन सबसे कटकर जीवन जी रहा था। वह अपने आपको दोस्तों से दूर होकर खुद में ज्यादा मगन रहता था।“

अगली गर्मी  छुट्टियों में क्रिस  फिर से घर अन्नाडेल आया  और उसने डोमिनो कंपनी में  पिज्जा बेचने का काम शुरू कर दिया। कैरीन ने उसे  याद करते हुए कहा,” उसे यह सब करने में कोई परेशानी नहीं होती थी। उसने बहुत पैसा कमाया। वह हर रात घर आकर पैसे को जोड़ा करता था। वह इस बात की भी परवाह नहीं करता था कि वह इतना काम करके थक गया होगा। वह टेबल पर बैठकर हिसाब लगाता था कि उसने कितने पिज्जे बेचे, उसने आनेजाने में कितना गैस खर्च किया और डोमिनो ने उसे कितना पैसा चुकाया, उसने शाम तक कितना मुनाफा कमाया और अपनी कमाई को पिछले दिनों की कमाई से तुलना किया करता था। उसने हर चीज का बारीकी से हिसाब रखा और मुझे दिखाया कि वह यह बिजनेस कैसे करता था। उसके लिए पैसा मायने नहीं रखता था, बस ये मायने रखता था वह इसे कितना ज्यादा से ज्यादा कमा सकता था। उसके लिए पैसा कमाना एक गेम की तरह था जिसमें वह ज्यादा से ज्यादा स्कोर करना चाहता था।“

क्रिस का अपने मां-बाप के साथ संबंध  उस गरमी तक और भी खराब हो गया  था और वाल्ट या बिली को इसका कारण समझ में नहीं आता  था। बिली ने इस बारे बताया,”वह हम दोनो के साथ सही व्यवहार नहीं कर रहा था। वह अपनी योजनाओं के बारे में हमसे कुछ नहीं बताता था और ज्यादा से ज्यादा समय अपने अंदर खोया रहता था।“

क्रिस का यह गुस्सा औऱ नाराजगी हाईस्कूल के बाद किये गए ट्रिप के बाद और बढ गया था। अपने डॉटसन कार से की गई उस आवारगी के दौरान क्रिस उस इलाके  में गया था जहां उसका बचपन गुजरा था। वहां जाकर उसे अपने परिवार के पुराने दोस्तों से मुलाकात कर अपने पिता की पहली शादी और तलाक से जुड़े कई बातें जानने का उसे मौका मिला, जिसके बारे में उसे पहले मालूम नहीं था।

वाल्ट अपनी पहली पत्नी मार्सिया से अलग नहीं रह रहा था। बिली के साथ उसका प्रेम परवान चढने के बाद और उससे क्रिस के पैदा होने बहुत दिनों बाद तक वाल्ट मार्सिया के पास जाता रहा था और उसी दरम्यान क्रिस जब दो साल का था, मार्सिया ने वाल्ट के एक और बच्चे को जन्म दिया था। वाल्ट चुपके से अपने दोनों औरतों के साथ संबंध को जी रहा था। इन सब बातों को छुपाने के लिए वाल्ट ने बिली और सबसे झूठ बोला था। वाल्ट की इस दोहरी जिंदगी के बारे में जब क्रिस को पता चला तो उसके मन को गहरे जख्म लगे। इस घटना ने सबको दुख दिया था।

संयोग से वाल्ट, बिली और उसके बच्चों, क्रिस और कैरीन के साथ वह जगह छोड़ दिया। उसके बाद मार्सिया के साथ उसका तलाक और बिली के साथ उसकी शादी को कानूनी रूप दिया गया। वाल्ट और बिली ने पिछली जिंदगी की सारी समस्याएं भुलाकर नयी जिंदगी जीनी शुरू कर दी। उसके बाद दो दशक बीत चुके थे। अपराधबोध, जख्म और कलह जैसी बातें बहुत पीछे छूट चुकी थी और ऐसा लग रहा था जैसे तूफान शांत हो चुका था। लेकिन तभी 1986 में क्रिस फिर से उसी पुराने जगह जाकर उस दुखदायी घटना के बारे में सबकुछ मालूम कर आया और तूफान फिर से अस्तित्व में आ गया।

कैरीन ने बताया,”क्रिस चिंतनशील था। अगर कोई बात उसे अंदर ही अंदर खाती रहती थी तो उसे वह किसी को बताता नहीं था। वह उसपर और सोचता चला जाता था और उसके अंदर वो दुखदायी भावनाएं बढती चली जाती थी।“

ऐसा ही कुछ  क्रिस के साथ तब हुआ जब वह अपने ट्रिप के दौरान  अपने पिता के दोहरे जीवन के रहस्य को जानकर लौटा था।  बच्चों के बारे में देखा गया  है कि कभी-कभी अपने मां-बाप  के गुनाहों पर कड़े फैसले  लेते हैं और उनको कभी माफ  नहीं कर पाते। क्रिस ने भी यही किया था। क्रिस  नैतिक विचारों को जीता था और उन्हीं मुश्किल पैमाने पर रखकर अपने आसपास की दुनिया के बारे में सोचता था, जहां उन नैतिकताओं का घोर अभाव था।

लेकिन क्रिस  खुद उन नैतिक पैमानों  को बहुत बार नजरअंदाज कर देता था। वह एक ऐसे आदमी का बहुत दिनों तक प्रशंसक रहा  जो शराबी होने के साथ-साथ  अपनी गर्लफ्रैंड को खूब पीटता  था, जबकि क्रिस को ये बातें  मालूम थी। उसने अपने प्रिय  साहित्यिक जीनियसों, जैक  लंडन और टाल्सटॉय की बड़ी-बड़ी कमियों को भी नजरअंदाज कर दिया था। टाल्सटॉय अपनी किताबों  में सेलीबेसी(ब्रह्मचर्य) की वकालत करने के बावजूद अपनी जवानी में बहुत बड़ा सेक्सुअल एडवेंचरर था। उसने तेरह बच्चे पैदा किए थे और उनमें से कुछ बच्चे उस दौरान पैदा हुए थे जब सेक्स के विरुद्ध लिखी गई उसकी एक किताब छपने जा रही थी। लेकिन अन्य सामान्य लोगों की तरह क्रिस भी लेखकों या कलाकारों को उसके काम के कारण सम्मान करता था, उनके जीवन से उसे कोई मतलब नहीं था, यही उदार सोच उसने अपने पिता के मामले में नहीं अपनायी थी।

जब भी वाल्ट मैकेंडलेस अपने बच्चे क्रिस या कैरीन को कुछ भी समझाता या डांटता तो तुरंत क्रिस अपने पिता के जीवन के उन काले तथ्यों को बताना शुरू करता और उसे पाखंडी कहता। जैसे-जैसे समय बीता, क्रिस का यह खुद को सही ठहराने वाली प्रवृति बढती चली गई और अब उसपर काबू पाना मुश्किल था। क्रिस अपने मां-बाप को धोखेबाजी के लिए माफ करने को कतई तैयार नहीं था। उसने कैरीन और अन्य लोगों से कहा,” उन दोनों के इस धोखे ने उसके पूरे बचपन को झूठी कहानी सा बना दिया है।“

उसने धीरे-धीरे अपने गुस्से को शांत रहकर या रिश्तों में दूरी बनाकर अभिव्यक्ति देने लगा। 1988 तक आते-आते उसका अपने मां-बाप के प्रति रवैया ज्यादा कठोर हो गया और बढते-बढते उसका गुस्सा अब वह दुनिया में हो रहे अन्याय के प्रति दुखी रहने में बदल गया। बिली ने बताया,”क्रिस इमोरी विश्वविद्यालय में पढ रहे धनाढ्य बच्चों की आलोचना करता था।“ उसने नस्लीय समस्या, दुनिया के भूख और धन के असमान वितरण जैसे मुद्दे पर बोलना शुरू कर दिया। अपनी भोग और पैसे के प्रति उसके इस वैराग्य के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह उदारवादी था। वास्तव में वह अमेरिकन डेमोक्रेटिक पार्टी का आलोचक था और रोनाल्ड रीगन की नीतियों का समर्थक था। उसने अपने कॉलेज में रिपब्लिकन क्लब भी बना रखा था। लेकिन उसका यह रवैया भी शायद इस कारण था क्योंकि रिपब्लिकन की नीतियों में व्यक्ति के जीवन में राज्य का हस्तक्षेप कम था। मैकेंडलेस के प्रिय लेखक थोरो ने ‘सिविल डिसओबिडिएंस’ में लिखाः ‘वह राज्य सबसे अच्छा है जो सबसे कम शासन करता है।‘

क्रिस ने इमोरी युनिवर्सिटी के अखबार  ‘इमोरी ह्वील’ में कई विचार लिखे। तब से आधा दशक बीतने के बाद भी उन विचारों को पढकर क्रिस के उन भावनात्मक उग्रता का पता चलता है। उस अखबार का संपादक मोरिस ने बताया,”क्रिस के लेखन में भावनात्मक आवेग रहता था।“आगे मैकेंडलेस में यह आवेग बढता ही गया। 1989 के बसंत की छुट्टियों में मैकेंडलेस फिर एक बार बिना किसी तैयारी के अपनी डॉटसन कार लेकर लंबे ट्रिप पर गया। वाल्ट ने क्रिस के उस ट्रिप के बारे में बताया,”पूरी गर्मी उसने हमें सिर्फ दो पोस्टकार्ड लिखा। पहले पोस्टकार्ड में उसने लिखा’ग्वाटेमाला जा रहा हूं’। यह पढकर मुझे भारी चिंता हुई कि कहीं वह अलगाववादियों का साथ तो देने नहीं जा रहा। उसे वे लोग दीवार से ख़ड़ा करके गोली मार देते। फिर गर्मी के अंत में दूसरे पोस्टकार्ड में लिखा’कल फेयरबैंक से घर लौट जाऊंगा’। उसने दक्षिण जाने का इरादा बीच में छोड़ उत्तर में अलास्का की तरफ मुड़ गया था।‘

उत्तर की ओर अलास्का के धूल भरे  हाइवे पर यह उसकी पहली यात्रा थी। वह सिर्फ कुछ दिन वहां रूका और कॉलेज क्लास शुरू होने से पहले वापस लौट आया। उस यात्रा में धरती की विशालता, ग्लेशियर का सौंदर्य और आर्कटिक के आकाश ने उसपर गहरा प्रभाव छोड़ा था। वहां से इमोरी लौटने के बाद उसने हॉस्टल छोड़ दिया और उसने एक कमरा किराये पर लेकर, उसमें साधुओं सा जीवन जीने लगा। उसके बाद वह क्लास में कम जाने लगा। लाईब्रेरी की चाभी उसे एक प्रोफेसर ने दे रखी थी जिसमें वह घंटों पढता रहता था। उसके हाईस्कूल के एक दोस्त एंडी ने दो साल बाद क्रिस को उसी लाईब्रेरी में देखा जबकि वह भी इमोरी विश्वविद्यालय में ही पढता था। क्रिस ने अजनबीपन से उससे कुछ मिनट बातें की और फिर पढने में डूब गया।

क्रिस ने उस साल शायद ही कभी अपने मां-बाप से संवाद किया था। उसने फोन नहीं रखा था, इसलिए उसके मां-बाप भी उससे संपर्क नहीं कर पाते थे। वाल्ट और बिली अपने बेटे से भावनात्मक दूरी होने के बाद दुखी रहने लगे थे। बिली ने क्रिस को एक पत्र लिखाः ‘तुम हम सबको बिल्कुल भूल गए हो जो तुमसे इतना प्यार करते हैं। जो भी तुम कर रहे हो, जिसके साथ भी तुम रह रहे हो, क्या तुम्हारी नजर में वह ठीक है?’ क्रिस की नजर में यह पत्र उसके जीवन में हस्तक्षेप की कोशिश थी और उसने अपनी बहन कैरीन से कहा,”क्या मतलब है यह लिखने का कि मैं किसी के साथ रहा हूं। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि वे सोचते हैं कि मैं होमोसेक्सुअल हूं। वे ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं। कितनी बचपना भरी बातें हैं ये।“

1990 के बसंत  में जब वाल्ट, बिली और  कैरीन; मैकेंडलेस के ग्रेजुएशन डिग्री प्रदान किए जाने वाले सामारोह में गए थे तब वह खुश दिख रहा था। अपनी डिग्री लेने जाते समय मैकेंडलेस को उन्होंने मुस्कुराते देखा था। वहीं पर उसने अपने अगले लंबे ट्रिप के बारे में बताया था और कहा था कि उस आवारगी से पहले वह अन्नाडेल में उन सबसे मिलने आएगा। उसके कुछ दिन बाद उसने अपना सारा पैसा भूख से लड़ने वाली संस्था ऑक्सफेम(OXFAM) को दे दिया, अपने डॉटसन कार में सामान भरा और उनके जीवन से निकल गया। उसके बाद उसने अपने मां-बाप से कोई संपर्क नहीं किया यहां तक कि कैरीन से भी नहीं जिसका वह इतना खयाल रखता था।

कैरीन ने कहा,”उसके इस तरह रिश्ता तोड़ लेने से हम सब दुखी थी। मां और पापा तो दुखी के साथ गुस्सा भी थे। लेकिन मैं जानती थी कि वह जहां था, खुश था और अपनी आजादी को ज्यादा से ज्यादा पाना चाहता था। वह जानता था कि अगर मुझे चिट्ठी लिखता या फोन करता तो सबको उसके बारे में पता चल जाता और मां, पापा उसे वापस लाने वहां पहुंच जाते।“ वाल्ट ने कैरीन के इस बात से सहमति जताई।

जैसे-जैसे महीने बीतते गए, क्रिस  की ओर से कोई संवाद नहीं आया और घर में चिंता बढ गई। बिली हर रोज अपने दरवाजे पर क्रिस के लिए एक नोट(Note) चिपकाकर जाती थी। बिली ने बताया,”जब भी हम बाहर जाते और रास्ते में किसी आवारे को देखते उसका चेहरा हमें क्रिस की तरह नजर आता था और हम गाड़ी मोड़कर उसे पास से देखने आते थे। बहुत दुखदायी समय था। ठंड और तूफान वाली रातें बहुत डरावनी लगती थी। मन में खयाल आता था कि पता नहीं क्रिस कहां होगा, इस ठंड में उसके पास गर्म कपड़े होंगे कि नहीं, या कहीं वह घायल और अकेला न हो।“

जुलाई 1992, क्रिस के अटलांटा छोड़ने के ठीक दो साल बाद, चेस्पीक  के समुद्री किनारे के उस मकान में आधी रात को अचानक  बिली उठ बैठी, उसने वाल्ट  को जगाया। उसने जोर देकर कहा,”क्रिस मुझे बुला रहा है। मैं सपना नहीं देख रही। सच कह रही हूं। मैंने उसकी आवाज सुनी है। वह मुझे पुकार रहा है, ‘मां, मेरी मदद करो।‘ लेकिन मैं उसकी मदद नहीं कर सकती क्योंकि मैं नहीं जानती कि वह कहां था।“

इस धरती की सरजमीं मेरे वजूद का एक हिस्सा है। जो रास्ता मुझे पहाड़ियों और निचले मैदानों की ओर जितना ले गई, उतना ही मुझे अपने आत्मा के अंदर भी ले गई। आवारगी में जिन जगहों से मैं गुजर रहा, उसे पढ और सोच रहा था, वह एक खोज था जिसने मेरी आत्मा को इस सरजमीं से जोड़ा। एक समय ऐसा आया जब मैं और मेरी सरजमीं, दोनों मेरे अंदर एक हो गए। उसके बाद मेरी आवारगी का रूप बदल गया। मैंने पढने और सोचने से होने वाले तनाव को छोड़कर सीधे घूमना शुरू किया, बिना पीछे मुड़कर देखे हुए। मैं कहां हूं, क्या हूं; यह सब तय करना मैंने इन पगडंडियों पर छोड़ दिया। ये पहाड़ें, वो छायेदार जगहें, बर्फीली वादियां खुद-ब-खुद बयां कर देंगी कि मैं कहां हूं। फिर उसके बाद सारी दुनिया मुझे खोजती रहे अगर खोज सकती है तो। (जॉन हैन्स, की किताब दी स्टार्स, दी स्नो, दी फायरःट्वेंटी फाइव इयर्स इन दी नार्दर्न विल्डरनेस से उद्धृत)

वर्जीनिया बीच पर क्रिस मैकेंडलेस की बहन के घर में दो तस्वीरें हैः एक में क्रिस के बचपन की तस्वीर और दूसरे में सतरह बरस का क्रिस, कैरीन के साथ। कैरीन उन दोनों तस्वीरों के देखकर बोली,” कितने आश्चर्य की बात है कि दोनों तस्वीरों के बीच दस बरस का फासला है लेकिन दोनों में क्रिस का हाव-भाव एक जैसा है।“ कैरीन ठीक कह रही थी। दोनों तस्वीर में क्रिस लेंस की तरफ तनावग्रस्त और अनिच्छा भाव से देख रहा है, जैसे लग रहा है कि उसे किसी ने गहरे चिंतन के बीच में ही टोक दिया और वह कैमरे के सामने खड़े होकर समय गंवाने को लेकर गुस्सा है।

उस घर में वहीं बैठा पपी(पिल्ला) अब तेरह साल जवान कुत्ता हो चुका था जिसे कैरीन के लिए  बचपन में वाल्ट लाया था और जिससे क्रिस को काफी लगाव था। कैरीन ने कहा,”क्रिस को जानवरों से बहुत प्यार था। जिस साल वह गायब हुआ था, वह अपने साथ इस कुत्ते को भी ले जाना चाहता था। इमोरी से ग्रेजुएशन के बाद उसने मां और पापा से इस बारे में पूछा था लेकिन दोनों ने मना कर दिया क्योंकि एक कार के नीचे आ जाने के कारण कुत्ते का पैर जख्मी था और उसका इलाज चल रहा था। लेकिन अपने फैसले पर अब वह पछता रहे हैं। अगर क्रिस इस कुत्ते को अपने साथ ले जाता तो शायद वह इतना खतरा नहीं उठा पाता। क्रिस को भले अपनी जान प्यारी नहीं थी लेकिन वह इस कुत्ते की जान को कभी खतरे में नहीं पड़ने देता।“

कैरीन अपने भाई क्रिस के जितनी ही लंबी हैं-पांच फीट आठ ईंच  की, और चेहरा भी लगभग क्रिस  से मिलता जुलता है इसलिए  लोग पूछ बैठते हैं कि दोनों जुड़वे तो नहीं।  क्रिस की तरह ही कैरीन  भी अपने मां-बाप से लड़ती  रहती थी। लेकिन दोनों  के गुण जितने मिलते थे उससे ज्यादा दोनों एक दूसरे से भिन्न प्रकृति के थे। क्रिस के गायब हो जाने के बाद कैरीन ने अपने मां-बाप को बहुत संभाला और अब अपने रिश्ते को वो बहुत अच्छा कहती हैं। उसे समूह में आनंद आता है जबकि क्रिस को अकेलापन में ज्यादा पसंद था। हलांकि क्रिस की तरह वह भी नस्लभेद और सामाजिक अन्याय की विरोधी हैं लेकिन पैसे से उसका कोई बैर नहीं है। कैरीन बोली,“हमेंशा मां-पापा को दिन रात व्यस्त देखकर अच्छा नहीं लगता था लेकिन मैं भी आज वही कर रही हूं जो वे कर रहे थे। क्रिस मेरे कैपिटलिस्ट मानसिकता का मजाक उड़ाता था।“ इन सबके बावजूद क्रिस और कैरीन के बीच भावनात्मक जुड़ाव गहरा था। क्रिस ने एक बार कैरीन को लिखा,”मैं तुमसे अपने मन की बात कहता सुनता हूं क्योंकि दुनिया में एक तुम ही हो जो मुझे समझती हो।“

क्रिस के मरने के दस महीने बाद भी कैरीन उस दुख से उबरी नहीं है। “मैं तकरीबन रोज रो देती हूं उसे याद करके। अक्सर जब भी मैं अकेले कार से जा रही होती हूं तब खुद को उसे याद करने से रोक नहीं पाती और टूट सी जाती हूं।“

17 सितम्बर  की शाम को वह अपने  कुत्ते को नहला रही  थी तभी उसका पति फिश  घर पहुंचा। उसे इतनी  जल्दी शाम को ऑफिस से  लौटा देखकर कैरीन को  आश्चर्य हुआ क्योंकि  वह देर रात तक वहां  काम करता रहता था। “वह कुछ ज्यादा ही मजाकिया व्यवहार कर रहा था लेकिन उसके चेहरा आतंकित सा लग रहा था। वह अंदर गया, फिर बाहर आया और कुत्ते को नहलाने में मेरी मदद करने लगा। मैं समझ गयी कि कुछ गलत हो चुका है क्योंकि वह कुत्ते को कभी नहीं नहलाता था। उसने कहा कि वह कुछ बात करना चाहता था। मैं उसके साथ अंदर गयी। फिश वहां सर झुकाए उदास बैठा था। वह दिल पे चोट खाये आदमी जैसा लग रहा था। मैंने कहा कि लगता है कि ऑफिस में किसी ने उसे मजाक में झूठ कह दिया कि मैं किसी और के साथ बाहर कहीं थी। मेरे इतना कहते ही वह हंसने लगा,”क्या किसी के पास इतना फालतू समय है कि वह तुम्हें दे।“ उसने मेरी तरफ देखा, उसकी आंखें लाल थी।“

फिश ने कहा,”तुम्हारा भाई मर गया।“ फिश को ये समाचार क्रिस के सौतेले बड़े भाई सैम मैकेंडलेस ने दी थी। कैरीन की आंखे भर आयीं और उसके सामने अंधेरा सा छाने लगा। कैरीन रो पड़ी,”नहीं, क्रिस मरा नहीं है।“ वह इतनी जार-जार रो रही थी कि फिश को लगा कि कहीं पड़ोसी ये सोचकर पुलिस को ना बुला ले कि वह उसे पीट रहा था। कैरीन, कॉउच पर बैठी-बैठी लगातार रोए जा रही थी और जब फिश ने उसे सहारा देने की कोशिश की तो उसने उसे धक्का देकर कहा कि वह उसे अकेला छोड़ दे। अगले पांच घंटे तक वह इसी तरह पागल होकर रोती रही। लेकिन रात 11 बजे तक वह थोड़ी शांत हुई। उसने कुछ कपड़े बैग में रखे, फिश के साथ कार में बैठी और अपने मां-बाप के पास चेस्पीक समुद्री किनारे की तरफ चल पड़ी जो वहां चार घंटे की दूरी पर था।

रास्ते  में कैरीन ने एक चर्च देखकर  फिश को गाड़ी रोकने को कहा। “मैं चर्च के अंदर गई और एक घंटे तक अंदर बैठी रही। मैं ईश्वर से कुछ जबाब चाहती थी। लेकिन मुझे कोई जबाब नहीं मिला।“

हलांकि  फेयरबैंक पुलिस को क्रिस  के सौतेले भाई सैम ने यह पुष्टि कर दिया था कि अलास्का  में जिस आवारे की मौत  हुई, वह उसका भाई था। लेकिन  वहां के जांचकर्ता अभी  क्रिस के दांतों के रेकार्ड  से मिलान करने में लगे  थे, उसके बाद ही कुछ कहने को तैयार थे। बिली ने तब तक लाश की तस्वीर पर नजर  नहीं डाली जब तक कि एक दिन  बाद यह साबित नहीं हो गया  कि सुषाना नदी के पास के बस में मिली लाश उसके बेटे की ही थी।

अगले दिन  कैरीन और सैम फेयरबैंक प्लेन से गए, क्रिस का अवशेष  लाने के लिए। वहां उसे क्रिस  का वह सारा सामान दिया गया  जो वहां मिला थाःउसका रायफल, दूरबीन, रोनाल्ड फ्रांज द्वारा दिया गया फिशिंग रॉड, जेन  द्वारा दिया छुरा, पौधों को जानकारी देने वाला किताब, उसकी डायरी, कैमरा और पांच फिल्म रोल। उसके चौबीस  घंटे बाद दोनों एंकरेज गए जहां साइंटिफिक क्राइम डिटेक्शन लेबोरेटरी द्वारा पोस्टमार्टम के बाद क्रिस  को जलाया गया था। एक प्लास्टिक  बॉक्स में क्रिस के राख  कैरीन को दिया गया।

कैरीन ने उस पल को याद करते हुए कहा, “वह बॉक्स बहुत बड़ा था। उस पर क्रिस का नाम गलत लिखा था। क्रिस्टोफर आर मैकेंडलेस। जबकि आर (R) की जगह जे (J) होना चाहिए था। एक क्षण के लिए मन में खयाल आया कि यह क्रिस नहीं कोई और है। मैं पागल हो गई थी। क्रिस मेरे इस पागलपन को नहीं समझ पाता। वह इसका मजाक उड़ाता।“

उसके बाद  वे सारे सामान के साथ मैरीलैंड, वाल्ट और बिली के पास लौट आए। लौटते समय फ्लाईट में कैरीन के सामने एयर होस्टेस ने जो-जो खाने का सामान रखा, वह उसे खाती गई। कैरीन ने कहा,”उस फ्लाईट में जो भी खाने का सामान था, वह बेहद घटिया किस्म का था लेकिन मैं उसे फेंक नहीं सकी ये यादकर कि मेरा भाई भूख से मर गया था।“ उसके एक सप्ताह बाद तक कैरीन को लगता रहा कि उसका भूख मर सा गया था और उसका वजन दस पाउंड कम हो चुका था, दोस्तों ने सोचा कि कहीं उसे एनेराक्सिया (एक मानसिक बिमारी जिसमें आदमी खुद को जानबूझकर भूखा रखता है) तो नहीं हो गया।

मैरीलैंड में बिली खाना त्याग चुकी थी। जब तक वह फिर से उसके खाने की इच्छा जगी तब तक उसका भी वजन आठ पौंड कम हो चुका था। उधर वाल्ट अचानक खूब खाने लगा और उसका वजन आठ पौंड बढ गया। एक महीने बाद खाने के टेबल पर बिली उन तस्वीरों को देख रही थी जिसमें क्रिस के आखिरी दिन कैद थे। वह जैसे-जैसे तस्वीर देखती जा रही थी, वैसे-वैसे टूटकर रोती जा रही थी; वह एक मां का रोना था जिसने अपना बेटा खो दिया था और यह इतनी बड़ी क्षति थी जिसे मापने के लिए मन के पास पैमाना नहीं था। उस दर्द की ऊंचाई और गहराई को करीब से देखने पर लगता था कि इतना गहरी और ऊंची शायद ही धरती पर कोई चीज थी जिसे देखने के लिए आदमी जान का खतरा उठाता था। क्रिस की मां बिली अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश करते हुए बोल पड़ी,”मुझे बिल्कुल समझ में नहीं आता कि उसने इस तरह से जान जोखिम में क्यूं डाला। मैं बिल्कुल समझ नहीं पाती।“

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबे क्रिस्टोफर ने खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। सारे पैसे दानकर, परिचय-पत्र फेंककर और परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी-घुमक्कड़ी का जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया। वहां जीवन की विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए जीवन की खोज जारी रखी। वह ऐसा क्यों बना… अलास्का में उसके साथ क्या हुआ.. यह सब-कुछ जॉन क्राउकर नाम के पत्रकार ने बहुत शोध के बाद अपने किताब ‘Into the wild’ में लिखा। सीन पेन ने इसी नाम से एक बेहतरीन फिल्म बनाई जो विश्व के सौ महान सिनेमा में गिनी जाती है। Into the wild’ का हिंदी में अनुवाद कर रहे हैं युवा पत्रकार राजीव कुमार सिंह। इसका पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा और पांचवां पार्ट आप लोग पढ़ चुके हैं। ये था छठवां पार्ट। राजीव ने इस उपन्यास का अनुवाद करके पत्रकारिता क्षेत्र में दस्तक दी है। उनके अनुवाद में कई कमियां-गल्तियां हैं, ऐसा उनका कहना है। पर इसे एक युवा पत्रकार का शुरुआती गंभीर प्रयास मानते हुए कमियों की अनदेखा की जाए, ऐसा वह अनुरोध करते हैं। राजीव की इच्छा है कि उनके परिचय में लिखा जाए- एक बेरोजगार पत्रकार जिसे एक अदद नौकरी की तलाश है। राजीव से संपर्क rajeevsinghemail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग पांच)

यह सही  है कि कई रचनात्मक लोग जीवन में टिकाऊ रिश्ते नहीं बना पाते। और कुछ तो एकदम अकेले रहते हैं। यह भी सच है कि कुछ मामलों में किसी बड़े मानसिक दुख को झेलने  के बाद किसी व्यक्ति के अंदर रचनात्मकता फूट पड़े।  लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह किसी मानसिक बिमारी के कारण है। किसी से व्यवहार न  रखने वाले बच्चे को अगर  वैसे ही विकसित होने दिया जाय तो वह अपने जीवन में किसी नए अर्थ की खोज को अपनी सबसे बड़ी जरूरत मानता है, जो किसी रिश्ते पर निर्भर नहीं करता। (एंथनी स्टोर, सोलिट्यूड: ए रिटर्न टू सेल्फ किताब से उद्धृत)

 

बड़ा सा ग्रीन एलीवेटर ‘जॉन डीरे 8020’, तिरछे पड़ते शाम की रौशनी में साउथ डाकोटा के आधे कटे खेत में अपने पहिए पर चुपचाप खड़ा था। उस मशीन के मुंह से वायन वेस्टरबर्ग का जूता बाहर झांक रहा था जो ऐसा लग रहा था जैसे कोई विशाल मशीनी सांप अपना भोजन धीरे-धीरे निगल रहा हो। “मुझे कमबख्त टूल दो, दोगे क्या?” मशीन के अंदर से गुस्सा भरे आवाज में वह बोल रहा था। “या तुम सब अपने जेब में हाथ डाले, बिना काम के ही व्यस्त हो।“ कुछ दिनों के अंदर ही मशीन तीसरी बार खराब हुआ था और वेस्टरबर्ग बहुत कोशिश कर रहा था कि रात गिरने से पहले वह उसे ठीक कर ले। एक घंटे बाद जब वह बाहर निकला तो वह ग्रीज और अनाज के छिलके में सना हुआ था। मशीन ठीक हो चुका था।

“गुस्से में बोलने के लिए माफी चाहता हूं।“ वेस्टरबर्ग ने माफी मांगते हुए कहा। “हम सब दिन के 18 घंटे काम करते हैं। मैं थोड़ा चिड़चिड़ा होने लगा हूं। वैसे भी इस सीजन में हमें आने में थोड़ी देर हो गई और हमारे पास आदमियों की भी कमी है। हम एलेक्स के वापस आने का इंतजार कर रहे थे ताकि वो हमारे साथ काम करे।“

अलास्का में मैकेंडलेस की लाश को मिले पचास दिन बीत चुके थे। सात महीने पहले, मार्च की एक सर्द दोपहरी को मैकेंडलेस कार्थेज पहुंचा और वह काम करने को तैयार था। एलेक्स ने वेस्टरबर्ग को बताया कि वह 15 अप्रील तक उसके पास काम करेगा ताकि कुछ पैसे जमा हो जाय। एलेक्स को अलास्का जाने के लिए कुछ गर्म कपड़ों के साथ अन्य सामान की जरूरत थी। कार्थेज के उस चार सप्ताह के दौरान मैकेंडलेस ने काफी मेहनत से काम किया। गंदगी के बीच लगातार ऐसे-ऐसे काम किए जिसे कोई नहीं करना चाहता था। गंदे स्टोरहाउस को साफ करना, कीटाणुनाशक का छिड़काव, पेंट करने के साथ-साथ और भी काम उसने किए। मैकेंडलेस को थोड़ा और बेहतर काम देने के लिए वेस्टरबर्ग ने उसे फ्रांट इंड लोडर(खेती में काम आनेवाला एक विशेष ट्रैक्टर) चलाना सिखाया। वेस्टरबर्ग ने बताया, “एलेक्स मशीनों के बीच नहीं रहा था, इसलिए उसका क्लच और लीवरों के बीच उलझ कर काम करना काफी हास्यास्पद सा लगता था। वह निश्चित तौर पर मशीनी दिमाग का नहीं था।“

वेस्टरबर्ग  ने कहा, “ऐसा नहीं था कि वह किसी और दुनिया का था। लेकिन  एलेक्स के सोचने में कहीं न कहीं कुछ कमी थी। मुझे याद है कि एक बार मैं उसके किचन में गया था तो वहां बहुत तेज दुर्गंध था।  मैंने माईक्रोवेव ओवेन खोलकर  देखा तो उसके सतह पर खराब हो चुके तेल का परत जमा  था। एलेक्स उसी ओवेन में  खाना बनाता था और उसे कभी  नहीं लगा कि उस तेल को धूप  लगाकर सुखा देना चाहिए। ऐसा  नहीं था कि वह आलसी था। एलेक्स हमेंशा चीजों को साफ और व्यवस्थित रखता था। फिर भी उसने उस सड़े हुए तेल पर ध्यान नहीं दिया था।“

जब मैकेंडलेस बसंत में कार्थेज पहुंचा था तो वेस्टरबर्ग ने उसे अपनी गर्लफ्रेंड गेली बोराह से मिलवाया था, जो छोटे कद की दर्द भरी आंखों और लंबे बालों वाली नाजुक सी औरत थी। वह 35 साल की विडो, दो बच्चों की मां थी। जैसे ही वह मैकेंडलेस से मिली, उससे काफी घुल-मिल गई। बोराह ने मैकेंडलेस के बारे में बताया, “वह पहली नजर में शर्मीला सा था। वह कुछ ऐसे रहता था जैसे उसे लोगों के बीच रहने में परेशानी होती थी। मैंने देखा था कि वह हमेंशा अपने साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहता था। हम एलेक्स को रोज रात खाने पे अपने घर बुलाते थे। वह बहुत खाता था। कभी अपने प्लेट में खाना नहीं छोड़ता था। वह खाना भी अच्छा बना लेता था। वह चावल बहुत खाता था। कहा करता था कि वह 25 पौंड चावल के सहारे पूरे महीने खा सकता है। एलेक्स जब मुझसे मिलता था तो बहुत सारी बातें करता था। गंभीर बातें। कुछ चीजें उसे अंदर ही अंदर खाती रहती थी। वह अपने परिवार से दूर रहता था। उसने मुझे सिर्फ अपनी बहन के बारे में बताया, जिससे उसको काफी लगाव था।”

वेस्टरबर्ग  अपनी तरफ से उसके परिवार की समस्या में कोई रुचि नहीं लेता था। उसने कहा, “अगर एलेक्स यहां रहता तो मैं उसे कहता कि वह क्यों अपने मां-बाप से बात नहीं करता, क्यों उन्हें बेकार समझता है। मेरे पास तो एक ऐसा लड़का भी काम करता था जिसके मां-बाप थे ही नहीं, फिर भी वह मां-बाप के बारे में कभी बुरा नहीं बोलता था। जितना एलेक्स ने नहीं देखा होगा उससे कहीं ज्यादा तो मुझे मां-बाप ने झेलाया था। मुझे लगता है कि कुछ ऐसी बात उसके औऱ उसके बाप के बीच में हो गई थी, जो उसके दिमाग में बैठ गया था और वह उससे मुक्त नहीं हो पा रहा था।“

वेस्टरबर्ग  ने क्रिस और उसके पिता वाल्ट  के रिश्ते के बारे में जो भी कहा था, वह एक व्यावहारिक दिमाग का सटीक बयान था।  दोनों बाप-बेटे जिद्दी थे।  वाल्ट का बच्चों को नियंत्रित  करने के लिए किया गया अतिशय  व्यवहार और मैकेंडलेस की स्वच्छंद प्रवृति के बीच कभी सामंजस्य हो ही नहीं सकता था। वाल्ट के अनुसार काम करते हुए क्रिस अपने स्कूल और कॉलेज में बेहतरीन अंकों से पास हुआ था लेकिन क्रिस का गुस्सा अंदर ही अंदर बढ रहा था। उसे मां-बाप के सोच में हिपोक्रेसी दिखी और शर्तों पर दिए गए प्यार ने उसको आतंकित किया। उसने गहराई से सोचने पर पाया कि उसके पिता में नैतिक खामियां थी। क्रिस विद्रोही हो गया। गायब होने से पहले उसने अपने मां-बाप के व्यवहार के बारे में शिकायत करते हुए कैरीन से कहा, “ उनका व्यवहार अतार्किक, दमनकारी, असम्मानजनक और अपमानित करने वाला है जो अब मेरे सहन करने की सीमा को पार कर चुका है। वे मेरी भावनाओं को नहीं समझते हैं इसलिए ग्रेजुएशन के कुछ महीने बाद तक मैं उन्हें इस मुगालते में रखना चाहता हूं कि उनकी सोच ही ठीक है और हमारे रिश्ते स्थिर हैं। जब सही समय आएगा तो मैं अचानक उन्हें अपने जीवन से निकाल फेंकूंगा। मैं उनको बेटे के रुप में तलाक दे दूंगा और जब तक जिंदा रहूंगा, इन मूर्खों से बात नहीं करुंगा। एक बार जाऊंगा तो फिर कभी लौटकर नहीं आउंगा।“

वेस्टरबर्ग  ने ये महसूस किया था कि एलेक्स का अपने मां-बाप के साथ और उसके साथ व्यवहार, दोनों  में काफी विरोधाभाष था।  यहां पर वह मिलनसार था और एक साथ कई लोगों को खुश  रखता था। जब वह साउथ डाकोटा लौटकर आया तो चिट्ठियां  उसका इंतजार कर रही थी।  वे उनलोगों की चिट्ठियां  थीं जो उनसे आवारगी की राह  पर मिले थे। वेस्टरबर्ग याद  करते हुए कहते हैं, “उनमें से एक चिट्ठी उस लड़की की थी जिसे मैकेंडलेस से प्यार हो गया था। जिससे वह टिम्बक्टू जैसी जगह, निलांद कैम्पग्राउंड में मिला था।“ एलेक्स ने वेस्टरबर्ग और बोराह को कभी भी अपने किसी रोमांटिक संबंध के बारे में नहीं बताया था। “उसने कभी किसी गर्लफ्रैंड के बारे में नहीं बताया था। हां, वह यह जरूर कहा करता था कि एक दिन वह शादी करके परिवार बसाना चाहेगा। उसने किसी संबंध को हल्के में नहीं लिया था। वह ऐसा नहीं था जो किसी भी लड़की के साथ सो जाय़। ”

ब्रह्मचर्य (सेलीबेसी) और नैतिक शुद्धता पर मैकेंडलेस ऊंचे विचार रखता था। थोरो की एक किताब की इन पंक्तियों को मैकेंडलेस ने कलम से घेरा थाः- ‘ब्रह्मचर्य से आदमी का जीवन खिलता है। जीनियस, हीरोईज्म, पवित्र आत्मा और इस तरह की चीजें इसके बाद ही मिलती हैं।‘

अमेरिकन सेक्स को लेकर पागल रहते हैं। जब कोई आम नौजवान इस मांसल सुख से दूर जाने की कोशिश करता है, तब वे उसे देखकर अंदर से हिल जाते हैं और नाक-भौं सिकोड़ते हैं। उसे संदेह की नजर से देखा जाता है। मैकेंडलेस के चरित्र में सेक्स को लेकर जिस तरह इन्नोसेंसी थी, उस तरह के चरित्र वाले मशहूर लोगों की अमेरिकी समाज में प्रशंसा होती थी, लेकिन उनके बीच में कोई ऐसा आदमी हो तो यही अमेरिकी उसकी निंदा करते थे।

मैकेंडलेस का सेक्स के प्रति रवैया उन लोगों से मिलता जुलता था, जिनके अंदर आवारगी के लिए जुनून था- जैसे थोरो(जिंदगी भर कुंवारे रहे), प्रकृतिवादी जॉन म्यूर और न जाने ऐसे कितने गुमनाम धार्मिक, खोजी, साहसिक और समाज में मिसफिट लोग। मैकेंडलेस के अंदर ऐसी कई जिज्ञासाएं थी, जिसकी तलाश में वह सेक्स को भूल सा गया था। उसकी जिज्ञासाओं का, मानवीय संपर्क समाधान नहीं कर सकता था। इसलिए, वह अलास्का की ओर भाग चला था। मैकेंडलेस ने वेस्टरबर्ग और बोराह को यह भरोसा दिया था कि जब उसकी अलास्का यात्रा पूरी हो जाएगी तो वह साउथ डाकोटा फिर आएगा। उसके बाद क्या करेगा, यह आगे की परिस्थिति पर निर्भर करेगा।

वेस्टरबर्ग  ने बताया,” मुझे लगा कि अलास्का उसकी आखिरी और बड़ी साहसिक आवारगी थी और उसके बाद वह कहीं किसी जगह घर बसा लेगा। मैकेंडलेस कहता था कि वह अपनी इस आवारगी के अनुभवों को लेकर एक किताब लिखेगा। उसको कार्थेज में रहना अच्छा लगा था। वह बहुत ज्यादा पढा-लिखा था, इसलिए कोई नहीं यह कह सकता था कि वह इस तरह मेरे पास बाकी जिंदगी खेतों में ग्रीन एलीवेटर चलाते हुए गुजारता। लेकिन, वह अलास्का से मेरे पास वापस जरूर लौटकर आता, यहां एलीवेटर चलाकर मेरी मदद करता और आगे की जिंदगी की तैयारी करता।“

1992 के बसंत  में मैकेंडलेस की नजर सिर्फ और सिर्फ अलास्का जाने पर टिकी थी। जहां कहीं मौका पाता वह अपने अलास्का ट्रिप के बारे में बात करना शुरू कर देता। उसने आसपास रह रहे अनुभवी शिकारियों से जानवरों के शिकार, उसके चीर-फाड़ और मांस को सुरक्षित रखने के उपाय के बारे में जानकारी प्राप्त की। बोराह उसे गर्म कपड़े खरीदने के लिए मिशेल शहर ले गई थी। अप्रील 1992 के बीच में वेस्टरबर्ग ने मैकेंडलेस को एक-दो सप्ताह रूक जाने को कहा क्योंकि काम करने के लिए उसके पास आदमियों की कमी थी और वह खुद बहुत व्यस्त था। लेकिन, मैकेंडलेस ने उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया।

वेस्टरबर्ग  ने दुखी स्वर में बताया,”एक बार एलेक्स के दिमाग में जो बात आ जाती थी, उसे कोई नहीं बदल सकता था। मैंने उसे यहां तक कहा कि दस दिन रूक जाओ, मैं तुम्हें फेयरबैंक जाने के लिए प्लेन का टिकट कटा दूंगा और अप्रील के आखिर तक तुम अलास्का में रहोगे लेकिन मैकेंडलेस ने मना कर दिया। उसने कहा कि वह उत्तर की तरफ पैदल ही आवारगी करेगा। प्लेन से जाना खुद को धोखा देने जैसा होगा। यह उसके पूरे यात्रा का मकसद ही चौपट कर देगा।“

मैकेंडलेस के कार्थेज छोड़ने के दो दिन पहले, वेस्टरबर्ग की मां मैरी वेस्टरबर्ग ने अपने घर उसे खाने पर बुलाय़ा। इस बारे में वेस्टरबर्ग ने बताया,”मां को मेरे यहां काम करने वाले किसी आदमी से मिलने में कोई रुचि नहीं थी और वह एलेक्स से मिलने के लिए भी उत्साहित नहीं थी। लेकिन, मैं उसे बार-बार कहता कि इस बच्चे से एक बार मिल लो और उसने एक दिन मैकेंडलेस को खाने पर बुलाया। दोनों मिलते ही बातें करने लगे और उनकी बातें पांच घंटे तक लगातार चलती रही।“

जहां बैठकर  मैकेंडलेस ने मैरी वेस्टरबर्ग के साथ खाना खाया था, उसी जगह बैठी मैरी ने उस रात को याद करते हुए कहा, “ एलेक्स के अंदर कुछ खास था जो किसी को भी उसकी तरफ खींचता था। एलेक्स मुझे अपने उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्व लगा। मैंने जो कुछ भी कहा, वह जिज्ञासा से उस विषय में और पूछता रहा। उसे ज्ञान की बहुत ज्यादा भूख थी। हम सबके जीवन जीने के तौर-तरीके से अलग वह अपने विचारों और विश्वासों के साथ जीना चाहता था। हम घंटों किताबों के बारे में बातें करते रहे। कार्थेज में बहुत कम लोग किताबों के बारे में बातें करना पसंद करते हैं। मैं नहीं चाहती थी कि वह रात खत्म हो। मैं अगली बार उसके कार्थेज में लौटकर आने की राह देख रही थी। मैं उसे कभी नहीं भूला पायी। मैं उसके चेहरे को हमेंशा याद करती रही। मैंने तो एलेक्स के साथ सिर्फ कुछ घंटे बिताए थे और मुझे उसकी मौत पर कितना गहरा दुख हो रहा है।“

कार्थेज की आखिरी रात को वेस्टरबर्ग और उसके आदमियों के साथ  कैबरेट में मैकेंडलेस ने जमके पार्टी की। पार्टी में खूब ह्विस्की बहा। सभी तब आश्चर्यचकित रह गए जब मैकेंडलेस बैठकर पियानों पर मधुर धुनें बजाने लगा। ऐसा नहीं था कि वह शराब के नशे में आकर अपने अंदर छुपी प्रतिभा से सबको मुग्ध कर रहा था। उस पल को याद कर वेस्टरबर्ग की प्रेमिका बोराह बोली,”एलेक्स सच में पियानो बहुत अच्छे से बजाना जानता था। हम सब तो खो गए थे उसके धुनों में।“

15 अप्रील 1992 की सुबह सभी मैकेंडलेस को अलविदा कहने के लिए एलीवेटर के पास जमा हुए। मैकेंडलेस का बैग काफी भारी था। उसके जूते में लगभग एक हजार डॉलर ठूसा हुआ था। उसने वेस्टरबर्ग के पास अपनी डायरी और फोटो एलबम सुरक्षित रहने के लिए रख गया और उसे अपने द्वारा रोनाल्ड फ्रांज के यहां बनाया गया चमड़े का बेल्ट दिया।

वेस्टरबर्ग  ने बताया, “एलेक्स कैबरेट के बार में बैठकर घंटो उस बेल्ट को निहारा करता था। जैसे कि वह किसी गुप्त चित्रात्मक भाषा को पढने की कोशिश कर रहा हो। उस बेल्ट पर उकेरी गई हर तस्वीर के पीछे एक लंबी कहानी छुपी हुई थी।“

जाते समय  जब मैकेंडलेस बोराह के गले लगकर उसे अलविदा कह रहा था तब बोराह ने उसके आंखों में आंसू देखे थे। “मैं उसके आंखों में आंसू देखकर डर गई थी। वह बहुत ज्यादा दिनों के लिए के लिए नहीं जा रहा था लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी खतरनाक मिशन पर जा रहा था और वह जानता था कि वह वापस जिंदा नहीं भी लौट सकता था। तभी से मेरे मन में आशंका भरी भावनाएं आती रहती थी कि शायद हम एलेक्स से दुबारा नहीं मिल सकेंगे।“

वेस्टरबर्ग  का एक आदमी रॉड वुल्फ, ट्रैक्टर पर सुरजमुखी लादकर साउथ डाकोटा के एन्डरलिन शहर जा रहा था। उसने मैकेंडलेस को इंटरस्टेट 94 तक ट्रैक्टर से छोड़ दिया। उसने बताया,”मैं जब उसे अलविदा कह रहा था तब उसके कंधे से लटक रहे चाकू के देखकर मुझे लगा कि रास्ते में उसे शायद ही कोई लिफ्ट देगा। फिर भी, मैंने मैकेंडलेस से कुछ नहीं कहा। उससे हाथ मिलाया, गुड लक कहा और चिट्ठी लिखने की याद दिलाई।“

मैकेंडलेस ने एक सप्ताह बाद वेस्टरबर्ग को एक छोटी सी चिट्ठी लिखी, जिसपर मोन्टाना के डाक का मुहर लगा थाः-18 अप्रील को मैं एक मालगाड़ी से ह्वाईटफिश पहुंचा। यहां पर मेरा अच्छा समय बीत रहा है। मैं आज बॉर्डर कूदकर अलास्का की तरफ उत्तर दिशा में चल पड़ूंगा। सबको मेरा प्यार।अपना खयाल रखना। एलेक्स।

उसके बाद, मई के शुरूआती दिनों में  वेस्टरबर्ग को दूसरा पोस्टकार्ड मिला, अलास्का से भेजा हुआ, जिसपर ध्रुव पर रहने वाले भालू का फोटो था। इस पर 27 अप्रील, 1992 का डाकमुहर था और उस पोस्टकार्ड पर लिखा था- फेयरबैंक से सबको सलाम करता हूं। यह अंतिम चिट्ठी है शायद। मैं यहां दो दिन पहले पहुंचा हूं। युकोन क्षेत्र से गाड़ी पकड़ने में काफी परेशानी हुई। लेकिन, मैं किसी तरह यहां पहुंच ही गया। मुझे लिखी गई हर चिट्ठी को, भेजनेवाले के पते पर वापस भेज देना। मुझे यहां से वापस लौटने में शायद ज्यादा दिन लग जाय। अगर इस साहसिक यात्रा में मेरी जान चली जाती है और अगर तुम मेरी आवाज फिर से न सुन पाओ, उससे पहले मैं तुमको बताना चाहता हूं कि वेस्टरबर्ग तुम महान आदमी हो। अब मैं अपनी आवारगी पर निकलता हूं। एलेक्स।

उसी तारीख  को मैकेंडलेस ने जेन और बॉब को भी इसी संदेश का एक पत्र भेजा, जिसमें लिखा थाः-

मित्रों,

यह मेरी आखिरी चिट्ठी है। मैं अब अपनी आवारगी और आदिम जीवन जीने की तरफ बढ रहा हूं। अपना खयाल रखना। तुम सबसे मुलाकात बहुत यादगार रहा। एलेक्स।

हालांकि  रचनात्मक प्रतिभावाले लोगों में यह स्वभाव होता है कि वो किसी भी चीज को बहुत गहराई से जीने लगते हैं, जिसके कारण उनके अंदर कोई खास अन्तर्ज्ञान पैदा होता है। लेकिन जो अपने गमों और मानसिक जख्मों से कुछ रचनात्मक चीज नहीं निकाल पाते, उनके लिए जीवन जीने का यह तरीका ज्यादा दिन नहीं टिकता। (थियोडोर रोसजाक, की किताब ‘इन सर्च ऑफ मिराक्युलस’ से उद्धृत)

अमेरिका में एक परम्परा है- अपने मानसिक जख्मों के इलाज के लिए आवारगी करो, धर्म बदल लो, कहीं आराम करो या और कोई तरीका अपनाओ। और, हेमिंग्वे की कहानी की तरह, अगर जख्म बहुत बुरा न हो तो यह बहुत ही उपयोगी चीज है। – एडवर्ड होगलैंड

जब मैकेंडलेस की लाश अलास्का में रहस्यमय परिस्थितियों में मिलने की खबर वहां के मीडिया में छपी तब बहुत सारे लोगों ने यही निष्कर्ष निकाला कि लड़के का दिमाग खराब था। इस बारे में स्टोरी जब आउटसाइड मैगजीन में छपी तो मैकेंडलेस की निंदा में लिखे गए पाठकों के पत्रों का अंबार लग गया। सबने मैकेंडलेस को मूर्ख कहा और उसकी मौत को बेकार की खबर। साथ ही, स्टोरी के लेखक पर भी मैकेंडलेस की मौत को बढा-चढाकर पेश करने का आरोप लगाया। सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रतिक्रिया अलास्का के पाठकों ने लिखी। स्टेम्पेड ट्रेल के पास के कस्बे हिली से एक पाठक ने लिखा, “मैकेंडलेस इस स्टोरी में एक आत्मकेंद्रित चरित्र है।“ इस बारे में एक अन्य पत्रकार का विचार था,”क्रिस मैकेंडलेस की जीने की शैली और आवारगी के सिद्धांत में कुछ भी सकारात्मक बात नहीं है। बिना किसी तैयारी के बर्फीले बियाबान में जाना और वहां मौत के अनुभवों के बीच जीने से कोई अच्छा आदमी नहीं बन जाता।“ एक पाठक ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा, “क्यूं कोई इस दुनिया को छोड़कर कहीं और जाकर जीने का प्रयास करता है? क्यूं कोई बेटा अपने मां-बाप को इतना ज्यादा दुख देता है?“

सबसे कटु आलोचना का पत्र आर्कटिक सर्किल से उत्तर में कोबुक नदी के पास के एक गांव एंबलर से आया, निक जेम्स का, जिसने लिखा-

‘मैं पिछले पंद्रह साल से ऐसे कई मैकेंडलेस जैसे लोगों को देख रहा हूं, सबकी एक ही कहानी हैः आदर्शवादी, उर्जा और उत्साह से भरे युवा, जिसने खुद अपनी क्षमताओं का गलत आकलन किया, देश की जिंदगी को कमतर समझा और आखिर में मुसीबतों के शिकार हुए। मैकेंडलेस इन सब से अलग नहीं था, सिवाय इसके कि वह वहां जाकर मर गया और मीडिया में हर जगह उसकी चर्चा हुई। जब मैं उसके मां-बाप के बारे में सोचता हूं, तो मैकेंडलेस के प्रति मेरी अंदर कोई सहानुभूति नहीं बचती। उस पर मैकेंडलेस का सन्यासीपन और साहित्य लिखने जैसी बातें उसका गुनाह कम नहीं करती बल्कि और बढा देती है। मैकेंडलेस की डायरी, पोस्टकार्ड या नोट्स में लिखी भाषा एक औसत आदमी के लेखनी जैसी है, जैसे किसी हाईस्कूल के बच्चे की भाषा।‘

अलास्का के लोगों के लिए मैकेंडलेस एक साधारण, अपरिपक्व नौजवान था जो अपने प्रश्नों के उत्तर के खोज में बिना किसी तैयारी के बियाबान उजाड़ में चला गया, जहां उसे सिर्फ मच्छड़ और अकेली मौत मिली। उनकी नजर में ऐसे दर्जनों लोग इसी तरह अलास्का के बीहड़ में जाते हैं और उधर ही गायब हो जाते हैं। उनमें से कुछ लोगों की यादें आज भी अलास्का के वासियों में ताजा हैं।

1970 में  तनाना गांव से एक ऐसा  ही संस्कृतिविरोधी आदर्शवादी  नौजवान गुजरा था जिसका  कहना था कि अब वह बाकी  की जिंदगी प्रकृति के  साथ संवाद करने में  बिताएगा। उसी जाड़े के बीच में उसका सारा सामान- दो रायफल, कैंप लगाने का सामान, एक अबूझ इकोलोजिकल थ्योरी और सत्य एवं सौंदर्य के बारे में तर्क से परे भाषणनुमा लिखी बातों वाली डायरी- टोफ्टी के एक खाली केबिन में मिला, जिसमें हवाओं द्वारा उड़ाकर लाया गया बर्फ भरा था। उस नौजवान का कहीं कुछ पता नहीं चला।

उसके कुछ  साल बाद  वियतनाम का एक आदमी ब्लैक नदी के किनारे एक झोपड़ी बनाकर दुनिया से दूर जाकर रहने लगा। फरवरी के अंत तक उसके पास भोजन खत्म हो चुका था और वह भूख से मर गया, लेकिन उसने कहीं से भोजन पाने की कोई कोशिश नहीं की जबकि वहां से सिर्फ तीन मील दूर उसे खाना मिल सकता था। इसी तरह के मौत के बारे में एडवार्ड होगलैंड लिखते हैं- अकेलेपन पर प्रयोग के लिए अलास्का, दुनिया में बेहतर जगह नहीं है।

1981 में  प्रिंस विलियम साउन्ड  के समुद्री किनारे चलते  हुए मैं (जॉन क्राउकर) एक सनकी जीनियस से मिला था। मछली मारने के बोट पर नौकरी की तलाश में मैं अलास्का के कारडोवा के जंगल में कैंप लगाए हुए इंतजार कर रहा था, सालमोन मछलियों के व्यावसायिक सीजन आने का। एक बरसाती शाम को जब मैं शहर में घूम रहा था, तब मेरे बगल से एक मानसिक परेशान और बेतरतीब सा आदमी गुजरा जिसकी उम्र चालीस के करीब थी। उसकी बड़ी-बड़ी दाढी और कंधे तक लंबे बाल थे। लंबे बालों को चेहरे पर लटकने से बचाने के लिए उसने उसे पुराने-गंदे नायलन के हेडबैंड से बांध रखा था। एक कंधे पर लदे छह फुट लंबे लकड़ी के भारी टुकड़े के भार से झुकते हुए वह मेरे सामने से तेज कदमों से चला आ रहा था। वह जैसे ही पास आया, मैंने उसका अभिवादन किया और उसने भी बुदबुदाते हुए जबाब दिया। हम उस बारिश की फुहारों के बीच बात करने के लिए रूके। मैंने उससे यह नहीं पूछा कि जंगल में ऐसे अनेक लकड़ी के टुकड़े रहते हुए भी वह यह गीला और भारी टुकड़ा क्यूं ले जा रहा है। कुछ मिनट इधर-उधर की सामान्य बातें करने के बाद हम दोनों अपने-अपने रास्ते पर चल पड़े। लेकिन इस छोटी सी बातचीत से मैंने निष्कर्ष निकाला कि वह आदमी बेहद आत्मकेंद्रित किस्म का था। उसे वहां के स्थानीय लोगों ने हिप्पी कोव का मेयर नाम दिया था। शहर के उत्तर में ज्वारभाटा द्वारा बनाए गए पानी के स्रोत के किनारे पर वह लम्बे बालों वाला आवारा मेयर कुछ सालों से रह रहा था।

कारडोवा के हिप्पी कोव में रहने वाले मेरे जैसे अधिकांश लोग वहां मछलियों के व्यापारिक केंद्र में ऊंचे वेतन की नौकरी पाने की लालसा से रहते थे या वहां काम न मिलने पर सालमोन मछली के पैकिंग फैक्टरी में काम करते थे। लेकिन, मेयर हम सबसे बिल्कुल अलग किस्म का जीव था। मेयर का असली नाम जेने रोजेलिन था। वह सियेटल के अरबपति विक्टर रोजेलिन का बड़ा सौतेला लड़का था और 1957-65 के बीच रहे वाशिंगटन के मशहूर गवर्नर अल्बर्ट रोजेलिन का भतीजा था। जेने रोजेलिन अपनी जवानी में अच्छा एथलीट और पढने में बहुत तेज था। वह बहुत पढता था, उसने योग का अभ्यास किया और मार्शल आर्ट में पारंगत था। वाशिंगटन और सिएटल विश्वविद्यालय में पढते हुए उसने मानवविज्ञान, इतिहास, दर्शनशास्त्र और भाषाशास्त्र का विशद अध्ययन किया, जबकि वह किसी और विषय में डिग्री ले रहा था। उसका मानना था कि उसे ज्ञान पाने के लिए किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं थी।

सियेटल  को छोड़ने के बाद रोजेलिन  उत्तर की ओर ब्रिटिश कोलम्बिया  के समुद्री किनारे से होते हुए अलास्का चला आया। 1977 में वह कारडोवा आया  और शहर के किनारे के जंगल में मानव विज्ञान पर एक महत्वाकांक्षी प्रयोग करने में अपना जीवन लगा दिया। 1987 में वहां के अखबार डेली न्यूज के रिपोर्टर मैकिने को उसने बताया,”मेरी रुचि यह जानने में है कि क्या आधुनिक तकनीक से आदमी स्वतंत्र हो सकता है कि नहीं?” वह जानना चाहता था कि क्या आज का इंसान अपने पूर्वजों की तरह उस समय का जंगली जीवन जीने में सक्षम था, जब बड़े-बड़े खतरनाक जानवर खुलेआम धरती पर घूमते थे या इंसान अपनी जड़ों इतना दूर आ चुका था कि बिना बारुद, स्टील और सभ्यता के हथियार के बिना नहीं जी सकता था? इस बात को जानने के लिए उस जीनियस ने अपने आपको आधुनिक समाज की हर चीज से दूर कर लिया और अपने आसपास की चीजों से, खुद के द्वारा बनाए गए उन औजारों को सहारे जीने लगा जिसका इस्तेमाल लाखों साल पहले सभ्यता पूर्व मानव किया करता था।

अखबार डेली न्यूज के रिपोर्ट मैकिने ने रोजेलिन के बारे में कहा, “वह मानता था कि सभ्यता और आधुनिकता के विकास के साथ मानव जीवन धीरे-धीरे निम्न स्तर के जीव बनता चला गया और रोजेलिन का लक्ष्य उसी सभ्यता पूर्व प्राकृतिक अवस्था के जीवन को प्राप्त करना था। उसने सभ्यता के हर चरण के जीवन- रोमन काल, लौह-सभ्यता, तांबा सभ्यता-को जीकर खुद पर प्रयोग करना शुरू किया। वह अपने जीवन के अंतिम दिनों पत्थर के औजारों वाले युग में पहुंच गया था।”

रोजेलिन अपने भोजन के रूप में जड़ों, जंगली बेरी, समुद्री पौधों और भाले से शिकार किए गए जानवरों का इस्तेमाल करता था, चीथड़े पहनता था और भयंकर जाड़े को सहन करता था। ऐसा लगता था जैसे उसे इस तरह के कठिन जीवन में आनंद आता था। अपना झोपड़ा भी बिना किसी कुल्हाड़ी या औजार के बनाया था जिसमें कोई खिड़की नहीं थी। रिपोर्टर मैकिने ने उसके बारे में बताया,”वह दिनभर अपना समय लकड़ी के लट्ठ को धारदार पत्थर से चीरने में बिताता था। जैसे अपने ऊपर खुद के द्वारा थोपे गए कठिन जीवन का मेहनत काफी नहीं था उसके लिए, इसलिए जब कोई काम नहीं रहता तो वह जमकर कसरत किया करता था। भारी चीजें उठाता, खूब दौड़ता और प्रायः अपनी पीठ पर भारी पत्थर लादकर चलता रहता। गर्मी के दिनों में भी वह प्रतिदिन अठारह मील की दूरी तय करता था।“

रोजेलिन का यह प्रयोग दस साल से ज्यादा समय तक चलता रहा और एक दिन उसे लगा कि उसके प्रश्न का उत्तर उसे मिल गया था। उसने एक मित्र को पत्र में लिखाः- ‘मैंने अपनी जवानी की शुरूआत इस परिकल्पना से किया था कि पत्थर युग के आदमी की तरह फिर से बना जा सकता था। तीस साल तक मैं अपने जीवन को वैसा बनाने के लिए तैयारी में लगा रहा और प्रयोग करता रहा। मैं ये दावा करना चाहूंगा कि आखिरी दस सालों में मैंने पत्थर युग के जीवन के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक यथार्थ का सही-सही अनुभव किया। उस सत्य अनुभव का सीधे-सीधे सामना करने के बाद मैं ये कह सकता हूं कि आज के इंसान का अपनी जमीन औऱ आधुनिक सभ्यता छोड़कर किसी और जीवन को अपनाना संभव नहीं है।‘

रोजेलिन ने अपने परिकल्पना और प्रयोग में मिली असफलता को शांति  से स्वीकार किया। उनचास  बरस की उम्र में रोजेलिन  ने खुशी-खुशी घोषणा किया कि अब वह अपने पत्थर युग में  जीनेवाले लक्ष्य को छोड़ देगा और आगे वह विश्व में सालों भर प्रतिदिन 18 से 27 मील पैदल आवारगी करते हुए अपना जीवन बिताएगा। लेकिन वह अपना यह ट्रिप शुरू नहीं कर सका। नवंबर 1991 में उसकी लाश झोपड़े में पेट के बल जमीन पर पड़ी मिली, उसके छाती में एक खंजर घुसा हुआ था। जांच के बाद पता चला कि उसने खुद को खंजर मार लिया था। लेकिन सुसाइड नोट नहीं लिखा था। रोजेलिन ने ऐसा कुछ पीछे नहीं छोड़ा था जिससे यह जाना जा सके कि उसने इतने बुरे तरीके से खुद को क्यों मार डाला था। रोजेलिन की मौत और उसके अजीबोगरीब अस्तित्व की कहानी डेली न्यूज अखबार में प्रमुखता से पहले पन्ने पर छापी गई थी।

उसी अखबार  में जॉन वाटरमेन के अपने साहसिक यात्रा के दौरान गायब हो जाने की घटना को कम प्रमुखता मिली थी। 1952 में जन्मे जॉन, वाशिंगटन के उसी क्षेत्र में पला-बढा था जहां का क्रिस मैकेंडलेस था। उसके पिता गे वाटरमेन संगीतज्ञ और स्वतंत्र लेखक के रूप में मशहूर थे, जिन्होंने राष्ट्रपतियों और वाशिंगटन के कई महत्वपूर्ण नेताओं के भाषण लिखे थे। गे वाटरमेन खुद पर्वतारोही (माउंटेनियर) थे और अपने तीनों बेटों को कम उम्र में उसने पहाड़ चढना सिखाया था। जॉन वाटरमेन उनका मझोला बेटा था जो तेरह बरस में पहली बार पहाड़ पर चढा था। वह प्रकृतिप्रेमी था। जब भी उसे मौका मिलता, चट्टान पर चढना शुरू कर देता। उसने पहाड़ चढने का जमकर ट्रेनिंग लिया। वह खूब कसरता करता औऱ हर रोज तेजी से चलते हुए ढाई मील दूर स्कूल जाता था। दोपहर को वापस लौटकर वह दुबारा स्कूल चल देता था। 1969 में जॉन, सोलह बरस में अलास्का के माउंट मैकिनले की ऊंची चोटी चढकर अमेरिकी महाद्वीप में कम उम्र में ये काम कर दिखाने वाला तीसरा शख्स बना था। अगले कुछ सालों तक उसने अलास्का, कनाडा और यूरोप के कई महत्वपूर्ण ऊँचाईयों को छुआ। जब तक वह 1973 में फेयरबैंक के अलास्का विश्वविद्यालय में एडमिशन लेता तब तक उत्तरी अमेरिका में नौजवान पर्वतारोही के रूप में मशहूर हो चुका था।

जॉन मुश्किल  से पांच फीट तीन इंच लंबा था। उसका चेहरा बच्चों जैसा, बदन मजबूत और जिमनास्ट जैसा था। उसे जानने वाले बताते हैं कि वह असामाजिक, आत्मकेंद्रित, अवसादग्रस्त पागल किस्म का बच्चा था जो लोगों से बहुत भद्दा मजाक किया करता था। उसके पर्वतारोही दोस्त जेम्स ब्रेडी ने बताया,”मैं जब पहली बार उससे मिला था तब वह कॉलेज कैंपस में इधर-उधर घूम रहा था, उसके हाथ में एक घटिया किस्म का गिटार था और जो भी सुनता उसे अपने साहसिक यात्रा के बारे में लंबे-लंबे गीत गिटार को बेतरतीब ढंग से बजाते हुए सुनाता। फेयरबैंक शहर, इस तरह के कई उटपटांग किस्म के लोगों को आकर्षित करता है लेकिन जॉन तो फेयरबैंकीय स्तर से कहीं बड़ा पागल था। कई लोगों के सामने ये मुश्किल रहती थी कि सामने आ जाने पर कैसे उससे निबटा जाय।“

जॉन के इस तरह के व्यक्तित्व होने के कई कारण थे। पारिवारिक  सूत्रों के अनुसार, जब वह छोटा था तभी उसके माता-पिता के बीच तलाक हो गया था और दोनों ने जॉन को छोड़ दिया।  पिता उससे कोई मतलब नहीं रखता था, इस वजह से वह टूट गया। तलाक के बाद जब बड़े भाई  को लेकर पिता से मिलने गया  तो पिता ने मिलने से इंकार  कर दिया। दोनों भाई फेयरबैंक में चाचा के पास आकर रहने लगे। एक बार जब जॉन ने पिता के फेयरबैंक में पर्वतारोहन के लिए आने की बात सुनी तो वह काफी खुश हुआ। लेकिन, पिता ने फेयरबैंक आकर भी उससे मिलने की जहमत नहीं उठाई।  जॉन का दिल और टूट गया।

अपने बड़े भाई बिल के साथ जॉन का बहुत ज्यादा भावनात्मक लगाव था। मालगाड़ी पर चढते समय  हुई दुर्घटना में बिल  अपना एक पैर खो चुका था। 1973 में बिल, बड़े ट्रिप पर जाने की बात एक चिट्ठी में लिखकर  अचानक गायब हो गया था।  जब जॉन पहाड़ पर चढना सीख  रहा था उसी दरम्यान उसके आठ नजदीकी दोस्त या तो दुर्घटना में जान गवां बैठे थे या फिर आत्महत्या कर चुके थे। यह सहज ही अनुमान लगाया  जा सकता है कि इन सब दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से जॉन के कच्चे  मानसिक स्थिति पर बहुत बुरा प्रभाव डाला था। मार्च 1978 में जॉन ने अपने सबसे बड़े साहसी पर्वतारोहन की योजना की घोषणा की। माउन्ट हन्टर, जिसपर तीन पर्वतारोही टीम अबतक चढ पाने में असफल रही थी, वह उसपर अकेल चढने जा रहा था। उसके इस साहस के बारे में क्लाईम्बिंग मैगजीन के पत्रकार ग्लेन रैंडाल ने लिखा कि जॉन ने अपने साथियों को बताया था कि वह हवा, बर्फ और मौत की चढाई करने जा रहा था।

माउन्ट  हंटर के मीलों बियाबान में हर तरफ बर्फ जमा था। बर्फ की खड़ी दीवारें ऐसी भुरभुरी थी जैसे कठोर बर्फ पिघलाकर फिर से जमाया गया हो। फिर आगे, कम चौड़े और ढलान वाले छोटे पर्वतों की श्रृंखला थी, जिसे एक-एक करके, पैर फैलाते हुए लंबे-लंबे डग मारते पार करना पड़ा था। बहुत बार तो वह दर्द और अकेलेपन के कारण टूट जाता और बहुत रोता। 81 दिन की बेहद खतरनाक और थका देनेवाली चढ़ाई करने के बाद जॉन 14573 फीट ऊंचे अलास्का के माउन्ट हंटर पहाड़ की चोटी पर जाकर खड़ा हो गया। अगले नौ सप्ताह उसी खतरों से भरे रास्ते से नीचे उतरा। इस तरह 145 दिन जॉन पहाड़ों में बिल्कुल अकेले चलता रहा। जब वह फिर से फेयरबैंक लौटा तो उसका 20 डॉलर में किराए पर लिया गया फ्लैट टूट चुका था और उसे अपना पेट पालने के लिए सिर्फ एक काम मिल पाया- प्लेट धोने का।

फेयरबैंक  के पर्वतारोहियों के छोटे से समूह में उसे इस साहसिक यात्रा के लिए हीरो माना गया। उसने उस चढाई का स्लाईडशो सबको दिखाया जिसके बारे में  याद करते हुए उसके दोस्त  ब्रेडी ने बताया, ”वह बेहद यादगार अनुभव था। उसने अपने सारे विचार और भावनाओं, असफलता और मृत्यु से डर के बारे में हमें इतने सजीवता से बताया कि लग रहा था जैसे कि चढाई के दौरान हम उसके साथ ही चल रहे थे।“

इस ऐतिहासिक काम के महीने बाद जॉन  ने अनुभव किया कि उसे आराम से नहीं बैठना चाहिए। माउंट  हंटर की सफलता ने उसे और उत्साह से भर दिया था। जॉन का दिमाग आगे कुछ और करने की सोचने लगा। ब्रेडी ने उसे याद करते हुए कहा,”जॉन अपनी आत्म-आलोचना किया करता था, हमेंशा खुद को जानने-समझने की कोशिश करता था। वह जुनून से भरा हुआ आदमी था, दीवाना था। वह अपने साथ हमेंशा नोटपैड रखता था। उसमें वह रोज अपने दिन भर किए गए काम के बारे में लंबी-चौड़ी बातें लिखा करता था। एक बार मैं उससे मिलने गया और जैसे ही मिलकर जाने लगा, उसने तुरंत अपना नोटपैड निकाला और हमारे बीच जो भी बातें हुई थीं, उसे लिख डाला। हमने ज्यादा बात नहीं की थी फिर भी उसने इसपर तीन-चार पेज लिख डाला था। वह कहीं पर उन सारे कागजों को ढेर जमा किए हुए था और मुझे लगता है जिसकी महत्ता सिर्फ जॉन समझ सकता था और कोई नहीं।“

जल्दी ही जॉन अपने स्कूल में चुनाव लड़ा, जिसमें स्वच्छंद सेक्स और गहरे नशा वाले ड्रग्स को कानूनी वैधता को उसने मुद्दा बनाकर राजनीतिक अभियान चलाया। हलांकि वह चुनाव हार गया जिसके बारे में उसे छोड़ सबको विश्वास था। जॉन चुप नहीं बैठा रहा। उसने अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने के लिए अभियान चलाने लगा। फीड दी स्टार्विंग( भूखे को भोजन दो) पार्टी के बैनर तले वह चुनाव लड़ गया और उसके घोषणापत्र में पहली प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना था कि इस ग्रह पर कोई भी भूख से ना मरे। अपने चुनाव प्रचार के लिए उसने फिर से जाड़े में देनाली के दक्षिणी पहाड़ के सबसे बड़े ढाल पर कम से कम भोजन साथ में लेकर अकेले चढने की योजना बनाई। इसके लिए खुद को प्रशिक्षित करने के दौरान वह बर्फ से भरे बाथटब में खुद को डूबा लेता था।

जॉन हेलीकॉप्टर से काहिल्तना ग्लेशियर तक पहुंचकर दिसम्बर 1979 में  ऊपर चढना शुरू किया लेकिन  चौदह दिन बाद उसने अपनी यात्रा रोक दी। उसने अपने पायलट को कहा,”मुझे यहां से ले चलो, मैं मरना नहीं चाहता।“ दो महीने बाद उसने दूसरी बार चढने की तैयारी की। लेकिन, देनाली के दक्षिण के एक गांव में, जहां पर्वतारोही अलास्का के पहाड़ों पर चढने से पहले रूकते थे, जॉन के केबिन में आग लगने से उसका सारा सामान और नोटपैडों का ढेर-जिसमें उसकी कविताएं और रोज के जीवन का वर्णन लिखा था और जिसे वह अपने जीवन की कृति मानता था- जलकर खाक हो गया।

जॉन इस नुकसान से काफी आहत हुआ। एक दिन  बाद उसने खुद को एंकरेज मनोचिकित्सालय में भर्ती  करवा लिया लेकिन दो सप्ताह बाद उसने वह जगह छोड़ दिया, जब उसे विश्वास हो गया  कि वहां उसे हमेंशा के लिए बंद रखे जाने की साजिश की जा रही थी। 1981 के जाड़े में उसने फिर से एक बार देनाली के पहाड़ पर अकेले चढना शुरू किया। लेकिन इस बार उसने इस काम के लिए और भी कठिन रास्ता चुना। उसने तय किया कि वह समुद्र के किनारे से 160 मील के कठिन वृताकार रास्ते पर चलते हुए पहाड़ की तलहटी तक पहुंचेगा। उसने फरवरी में चलना शुरू किया लेकिन रूथ ग्लेशियर तक जाते-जाते उसका उत्साह खत्म हो गया, जहां से चोटी तीस मील दूर थी। वह बीच से ही लौट गया। लेकिन, मार्च में फिर से उसने ऊपर चढने के लिए कमर कस लिया और जाने से पहले उसने अपने पायलट दोस्त क्लिफ हडसन से कहा,”हो सकता है कि मैं तुमको दुबारा न देख सकूं।“

अलास्का के पहाड़ों में उस मार्च  में कुछ ज्यादा ही सर्दी  थी। उस महीने के आखिर में  रुथ ग्लेशियर के पास एक पर्वतारोही मग्स स्टम्प की मुलाकात जॉन से हुई। स्टम्प विश्व प्रसिद्ध पर्वतारोही था। जॉन से मिलने के कुछ  दिन बाद वह सिएटल में  मेरे(इस किताब के लेखक) पास आया था और बताया,”जॉन खोया-खोया सा लग रहा था। उसने पागलपन भरी कुछ बातें की। वह देनाली के सर्द पहाड़ पर चढ रहा था लेकिन उसके पास बहुत कम सामान था। उसने एक सस्ता सा गर्म सूट पहन रखा था और उसके पास स्लीपिंग बैग नहीं था। उसके पास खाने के नाम पर कुछ आटा, चीनी और तेल का एक बड़ा गैलन था।

अपने किताब  ब्रेकिंग प्वाइंट में ग्लेन  रैंडाल ने लिखाः-जॉन कई सप्ताह तक रूथ ग्लेशियर के पास शेलडोन पहाड़ के क्षेत्र में एक केबिन में पड़ा रहा। काटे बुल, जो जॉन का दोस्त था और उसी क्षेत्र में चढाई कर रहा था, ने बताया कि जॉन नीचे उतर रहा था और लापरवाह था। उसने अपने पायलट क्लिफ हडसन को वह रेडियो लौटा दिया था जिससे संकट के समय जॉन उसे खबर करता था। उसने हडसन से कहा,”मुझे अब इसकी जरूरत नहीं है।“ जॉन को अंतिम बार 1 अप्रील को रूथ ग्लेशियर के नार्थवेस्ट फॉर्क के पास देखा गया जिससे आगे वह उस रास्ते की ओर से गया जिसमें कई बड़े-बड़े बर्फीले दरार थे। उसके बाद उसका कुछ पता नहीं चला। ऐसा माना गया कि वह किसी दरार में गिरकर मर गया। नेशनल पार्क सर्विस उसे एक सप्ताह तक खोजती रही लेकिन उसका कहीं नामोनिशान नहीं मिला। कुछ पर्वतारोहियों को शेलडन पहाड़ में जॉन के केबिन में पड़े उसके सामान वाले बैग के ऊपर रखा एक कागज मिला जिसपर लिखा था- मेरा आखिरी सलाम, 13/3/1981, 1-42 पीएम।

क्रिस मैकेंडलेस के साथ हुई घटना की तुलना अलास्का के लोग जॉन वाटरमेन से करने लगे। क्रिस मैकेंडलेस की तुलना एक और शख्स से की गई जिसका नाम था कार्ल मेकन था। कार्ल टेक्सास से फेयरबैंक आया था और उस समय ट्रांस अलास्का पाइपलाईन प्रोजेक्ट में उसे अच्छे वेतन की नौकरी मिली थी। वह मिलनसार लेकिन खोया-खोया सा रहनेवाला आदमी था। 1981 के मार्च में जब जॉन अपनी आखिरी यात्रा पर जा रहा था, उसी समय कार्ल ने एक पायलट को किराया देकर उसे सुदूर कोलीन नदी के पास बने एक झील के पास की झाड़ियों में उतारने को कहा, वह जगह युकोन किले से उत्तर-पूर्व में 75 मील दूर ब्रूक्स पर्वत श्रृंखला के दक्षिणी छोड़ पर था।

पैंतीस  साल के शौकिया फोटोग्राफर कार्ल ने अपने दोस्तों से कहा कि वह जंगली जीवन की तस्वीर लेने के लिए इस ट्रिप पर जा रहा था। उसने 500 फिल्म रोल, .22 और .30 कैलिबर के रायफलें, एक शॉटगन और चौदह सौ पौंड खाने का सामान अपने साथ लेकर वहां गया। उसका उद्देश्य अगस्त तक उसी बियाबान में रहना था। लेकिन, उसने गर्मी के खत्म होने के बाद उसे वहां से निकालकर दुनिया में ले आने के लिए किसी पायलट को पहले से कह के नहीं रखा और इसका परिणाम हुआ कि कार्ल की वहीं मौत हो गई।

कार्ल द्वारा किए गए इतने बड़े गलती के बारे में जानकर नौ महीने तक उसके साथ पाइपलाइन कम्पनी में काम कर चुके फेयरबैंक के नौजवान मार्क स्टोपेल को कोई आश्चर्य़ नहीं हुआ। मार्क ने उसके बारे में कहा,”कार्ल बहुत दोस्ताना, सीधा-सादा सा और हम सबके बीच मशहूर था। हलांकि वह स्मार्ट लगता था, लेकिन वह थोड़ा स्वप्नशील था और दुनिया की वास्तविकता से जरा दूर था। वह रंगीन मिजाज था और जमकर पार्टी में मस्ती करता था। साथ ही वह बहुत जिम्मेदार इंसान था लेकिन कभी-कभी किसी भावावेग में आकर भी कोई काम कर बैठता था जिसमें बहुत साहस की जरूरत होती थी। कार्ल के उस बियाबान से वापस लौटने की पहले से तैयारी, भूल जाने की बात सुनकर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। वैसे भी मैं किसी बात से जल्दी चकित नहीं होता क्योंकि मेरे मित्रों में किसी की हत्या हो गई, कोई डूब कर मर गया तो कोई इसी तरह के किसी दुर्घटना का शिकार हो गया। अलास्का में इस तरह की अजीबोगरीब घटनाएं होती रहती हैं।”

अगस्त के आखिर में जब दिन छोटा होने लगा, ब्रूक्स रेंज के पहाड़ों  में हवा का तीखापन बढने लगा और तब जाकर कार्ल को चिंता होने लगी, जब उसे वहां से बाहर निकालने के लिए कोई पायलट नहीं आया। कार्ल ने डायरी में अपनी गलती स्वीकार करते हुए लिखा,”मैं सोचता हूं कि मुझे यहां आने से पहले दूरदृष्टि के साथ यहां से निकलने के बारे में योजना बनाना चाहिए था। मैं कोई न कोई रास्ता खोज लूंगा।“ कार्ल की यह डायरी, उसके मरने के बाद पांच भागों में फेयरबैंक डेली न्यूज में छापा गया।

सप्ताह  दर सप्ताह कार्ल ने जाड़े  को बढते हुए महसूस किया।  उसका खाना खत्म होने पर था।  कार्ल ने उस वक्त तक अपने बंदूक के दर्जनों गोलियों  को बेकार मानकर झील में  फेंक दिया था। उसने इस बात  पर दुखी होकर डायरी में  लिखा-“मैं दो महीने पहले झील में फेंके गए उन गोलियों के बारे में देर तक सोचता रहा। मेरी जब-जब उन गोलियों के पांच डब्बों पर नजर पड़ती थी तब-तब मुझे लगता था कि मैं मूर्ख था जो इसे ले आया और मैंने उसे झील में फेंक दिया। मुझे क्या पता था कि जाड़े में मुझे भूखे रहने से बचाने में, इन गोलियों की जरूरत शिकार करने में पड़ सकती थी।“

तभी, सितम्बर  की एक सुबह को ऐसा लगा जैसे कि वह इस खतरे से बच जाएगा। कार्ल  अपने बचे-खुचे गोलियों से बत्तख के शिकार में लगा  हुआ था कि तभी वहां की शांति  एक हवाईजहाज की आवाज से टूटी।  जल्दी ही जहाज कार्ल के सर के ऊपर था। पायलट ने दूर से कैंप देखकर थोड़ा  नजदीक से देखने के लिए  जहाज की ऊंचाई को कम करके दो गोलाकार चक्कर लगाया। कार्ल अपने स्लीपिंग बैग  के नारंगी चमकीले कवर को लहराने लगा। लेकिन जहाज में पहिए लगे थे इसलिए वह उन झाड़ियों में नहीं उतर सकता था। जहाज के जाने के बाद कार्ल को यह विश्वास था कि पायलट ने उसे देख लिया था औऱ वहां उतर सकने वाले जहाज को वह जरूर भेजेगा उसे ले जाने के लिए। वह इतना आश्वस्त था कि उसने अपनी डायरी में लिखाः’जब जहाज चला गया तो मैंने तुरंत अपना बैग पैक करने और कैंप समेटने में लग गया।‘

लेकिन उस दिन कार्ल को लेने कोई  प्लेन नहीं आया, अगले दिन  भी नहीं, उसके अगले दिन भी नहीं। कार्ल की नजर जब शिकार करने के लाइसेंस पर पड़ी तब उसे लगा कि कोई जहाज फिर से क्यों नहीं आया। उस लाइसेंस पर, धरती से हाथों के द्वारा ऊपर से गुजरते जहाज को सूचना देने के चित्र छपे थे। कार्ल ने अपनी डायरी में लिखा,’ मुझे याद आया कि जहाज के दूसरे चक्कर के दौरान मैंने मुट्ठी बांधकर अपने दाहिने हाथ को ऊपर उठाकर लहराया। दरअसल यह खुशी का प्रतीक है। दुर्भाग्य से मुझे बाद में पता चला कि एक हाथ हवा में उठाकर लहराना एक युनिवर्सल सिग्नल है जिसका मतलब है ‘सब ठीक है’, मदद की जरूरत नहीं है। दोनों हाथ उठाने के सिग्नल का अर्थ है ‘संकट में हूं, जल्दी मदद भेजो।‘’

कार्ल ने आगे लिखा,’जहाज को दूर उड़ा ले जाने के बाद पायलट एक चक्कर लगाने फिर वापस लौटकर आया और मैंने उसे कोई सिग्नल नहीं दिया। मुझे उस वक्त अपनी पीठ को उस जहाज की ओर कर लेना चाहिए था। हो सकता था कि वे मुझे अंजान जानकर बम से उड़ा देते।‘

सितंबर  के अंत से बर्फ के ढेर जमा  हो रहे थे, झील का पानी जम चुका था। कार्ल का खाना खत्म हो चुका था। कार्ल  ने गुलाब के फलों को जमा  करने और खरगोशों को फंसाने की कोशिश की। झील में  जाकर मरे एक ध्रुवीय हिरण को चीर-फाड़ कर उसका मांस निकाल  कर उसने रख लिया था। अक्टूबर तक कार्ल के शरीर का सारा वसा खत्म हो चुका था और अब लंबे सर्द रातों में उसे खुद को गर्म रखना कठिन हो रहा था। उसने अपनी डायरी में लिखा,’शहर में किसी को तो मेरे बारे में सोचना चाहिए था कि मैं अब तक क्यों नहीं लौटा?’ लेकिन कोई नहीं आया।

कार्ल के दोस्त मार्क स्टोपेल ने उसे याद करते हुए बताया,” यह कार्ल ही सोच सकता था कि उस परिस्थिति में कोई जादू से वहां आकर उसे बचाएगा। वह खूब ट्रक चलाता था और उसे चलाते हुए विचारों में खो जाता था। वहीं बैठे-बैठे उसने ब्रूक्स के पहाड़ों में जाने का सोचा था। इस खोज को उसने काफी गंभीरता से लिया था। वह वहां जाने के लिए योजना बनाता रहता और मुझसे पूछता था कि वहां जाने के लिए कौन-कौन से सामान ले जाने चाहिए। इतनी सावधानी से तैयारी करने के बावजूद उसके कुछ आवारा कल्पनाएं भी थी। जैसे कि कार्ल उन झाड़ियों में अकेले नहीं जाना चाहता था। उसका बहुत बड़ा सपना ये था कि वह किसी सुंदर औरत के साथ जंगल में जाकर रहेगा। वह हमारे साथ काम करने वाली कुछ लड़कियों की तरफ काफी आकर्षित था और उससे बात करने की कोशिश में अपना काफी समय और उर्जा नष्ट करता था-यह भी उसका कल्पनालोक ही था। वहां कुछ भी उसके अनुसार होने की कोई गुंजाईश नहीं थी। मेरा मतलब है कि उस पाइपलाईन कैंप में जहां हम काम करते थे, हर औरत के लिए चालीस लड़के मौजूद थे। लेकिन कार्ल स्वप्नशील आदमी था। वह ब्रूक्स रेंज की ओर जाने तक सोचता रहा कि शायद इनमें से कोई लड़की अपना इरादा बदलकर उसके साथ चल दे। वह लोगों से हमेंशा झूठी आशाएं लगाए रखता था। इसलिए जब वह खतरे में फंसा तो वहां भी उसे वही आशा रही कि कोई अचानक उसके खतरे में होने के बारे में जानेगा और उसे बचाने चला आएगा। लेकिन उसकी कल्पना की दुनिया इतनी दूर थी कि उससे कोई खुद को जोड़ नहीं पाता था।“

जब कार्ल का भोजन खत्म हो गया तब उसने अपनी डायरी में लिखा, “मैं अब ज्यादा चिंतित हो रहा हूं। इमानदारी से कहूं तो अब मुझे डर लगना शुरू हो चुका है।“ वहां का तापमान शून्य से पांच डिग्री फारेनहाइट नीचे चला गया था, जिसके कारण कार्ल के हाथ और पैर की उंगलियों में सर्दी के फफोले निकल आए थे। वह कमजोर हो गया और होश भी कम रहने लगा था। सर्दी ने उसकी सूख रही हड्डियों को और तोड़कर रख दिया। उसने अपनी डायरी में लिखा,’हाथ, नाक और पैर की स्थिति धीरे-धीरे खराब होती जा रही है। नाक पर काफी सूजन और फफोले निकल आए हैं। निश्चित तौर पर धीरे-धीरे बहुत दुखदायी मौत मेरे करीब आ रही है।‘ कार्ल ने एक बार सोचा कि कैंप को छोड़कर युकान फोर्ट की ओर पैदल चला जाय लेकिन फिर उसने सोचा कि वह इतना मजबूत नहीं रह गया था और वहां पहुंचने से पहले ही वह रास्ते में सर्दी और थकान से मर जाएगा।

“मैं इस तरह से नहीं जी सकता” कार्ल ने नवंबर के अंत में अपनी डायरी के आखिर में लिखा, जिसका सौ पन्ना अब तक भर चुका था। “हे ईश्वर, मुझे मेरे पापों और कमजोरियों के लिए क्षमा करना। मेरे परिवार का खयाल रखना। उसके बाद वह अपने टेंट के दीवाल के सहारे पीठ लगाकर लेट गया। अपने रायफल की नाली को अपने सर से लगाया और अंगूठे से ट्रिगर दबा दिया। 2 फरवरी 1982 को अलास्का राज्य के सिपाहियों को उसका कैंप मिला। अंदर झांककर देखा तो उसका कंकालनुमा लाश पत्थर जैसा कठोर हो चुका था।

रोजेलिन, जॉन, कार्ल और मैकेंडलेस के साथ हुई घटनाओं के बीच काफी समानताएं हैं। रोजेलिन और जॉन की तरह मैकेंडलेस खोजी था एवं प्रकृति की कठिन परिस्थितियों के प्रति अव्यावहारिक रोमांचक कल्पनाओं से भरा था। जॉन और कार्ल की तरह उसमें भी कॉमन सेंस का अभाव था। लेकिन जॉन की तरह मैकेंडलेस मानसिक रोगी नहीं था। कार्ल की तरह वह इतना स्वप्नशील नहीं था कि वह सोचता कि उन बियाबान के झाड़ियों में उसे कोई बचाने के लिए प्रकट होगा।

मैकेंडलेस इन सबसे अलग था। हलांकि वह खतरों के प्रति गंभीर नहीं था, अलास्का में रहने के लिए प्रशिक्षित भी नहीं था और मूर्खता की हद तक असावधान था, लेकिन फिर भी उसमें क्षमताएं थी तभी वह 113 दिन तक उस सर्द बियाबान में जिंदा रह सका। ना तो वह पागल था, ना तो असामाजिक। मैकेंडलेस कुछ और था- जिसे आसानी से परिभाषित नहीं किया जा सकता था।

शायद सत्य का खोजी था। मैकेंडलेस के साथ हुई त्रासदी को समझने के लिए दक्षिणी यूटा में हुए इसी तरह की एक घटना के अध्ययन की जरूरत है। 1934 में बीस साल का लड़का अमेरिका के दक्षिणी यूटा की तरफ रेगिस्तान में गया और कभी वापस नहीं लौटा। उसका नाम एवरेट रुस (Everest Ruess) था।

डेविस क्रीक  सालों भर नाले जैसा पतला धारा बना रहता है और कभी-कभी तो वो भी नहीं। फिफ्टीमाइल प्वाइंट  के ऊंचे चट्टानों के दरार से निकलता एक झरना दक्षिणी यूटा(अमेरिका का एक राज्य) के गुलाबी बलुआ पत्थरों के बड़े-बड़े टुकड़ों के बीच से चार मील बहता हुआ 190 मील के दायरे में फैले पावेल झील में जाकर मिल जाता है। इन नदियों के किनारे डेविस गुल्च एक बेहद खूबसूरत घाटी है, जिसकी तलहटी का थोड़ा सा उपजाऊ रेगिस्तानी जमीन इस सूखे पथरीले देश से गुजरने वाले लोगों को जीवन देता है। इसके टेढे-मेंढे दीवारों की भित्तियों पर अतीत के मानवों द्वारा बनाए गए 900 साल पुराने चित्र सजे हैं। इन चित्रों को बनाने वाले अमेरिकन आदिवासी जनजाति केयेंटा अनासाजी, यहां से बहुत पहले चले गए थे और वहां सुरक्षित कोनों में बने उनके पत्थरों के घर अब खंडहर बन चुके थे। उन आदिवासियों के छोड़े गए टूटे-फूटे बर्तन, उन जंग खा रहे टिन के डिब्बों के साथ मिलकर वहीं के बालू में पड़े थे, जो बाद की शताब्दी में उस घाटी में अपने जानवरों को चराने और पानी पिलाने के लिए आने वाले किसानों के द्वारा फेंके गए थे।

डेविस गुल्च  घाटी में नीचे उतरने का मतलब था किसी नए दुनिया में  प्रवेश करना। इस खूबसूरत  और छुपे हुए घाटी में लगभग छह दशक पहले बीस साल का नौजवान एवरेट रुस ने भित्तीचित्रों पर बने आदिम चित्रों के ठीक नीचे अपना छद्म नाम ‘नेमो 1934’ लिखा था, यही नाम उसने उस खंडहरनुमा घर के दरवाजे पर भी लिखा था जिसमें आदिवासी अनाज जमा किया करते थे। एवरेट ने ठीक वही काम किया था जिसे 58 साल बाद क्रिस मैकेंडलेस ने किया, जिसने अपना नाम अलास्का के बियाबान में खड़े बस की दीवार पर लिखा था,’एलेक्जेंडर सुपरट्रैंप’,मई 1992’। अद्भुत बात यह कि घाटी के भित्तिचित्रों पर लिखने वाले आदिम लोगों ने भी शायद इसी तरह के भावना के आवेग में इन पथरीले दीवारों पर रहस्यमय चित्रों को उकेरा होगा।

घाटी में  अपना नाम उकेरने के कुछ  दिन बाद ही एवरेट रुस  गायब हो गया और उसका कहीं कुछ पता नहीं चला। उसके खोज के बड़े-बड़े प्रयासों के बाद भी कोई जानकारी  नहीं मिली कि उसका क्या हुआ। उसे घाटी का रेगिस्तान  निगल गया था। आज साठ साल  बाद भी वह रहस्य बना हुआ  है, कि एवरेट रुस गया कहां?

एवरेट रुस 1914 में कैलिफोर्निया के ऑकलैंड में पैदा हुआ था। उसके पिता क्रिस्टोफर रुस; कवि, दार्शनिक होने के साथ कैलिफोर्निया पेनल सिस्टम में अधिकारी थे। उसकी मां स्टेला, कलाकार मिजाज होने के साथ-साथ बोहेमियन (आवारा) प्रवृति की थी। उसके मां-बाप ऑकलैंड से फ्रेन्सो होते हुए फिर लॉस एंजेल्स पहुंचे और वहां से बॉस्टन के बाद ब्रूकलिन होते हुए न्यू जर्सी से इंडियाना में गए। फिर, वहां से भी निकलकर अखिर में स्थायी रूप से दक्षिणी कैलिफोर्निया में जा बसे। एवरेट उस समय चौदह साल का था।

सोलह साल  की उम्र में एवरेट पहली बार अकेले लम्बे ट्रिप  पर गया, उसने 1930 की पूरी गर्मी  पैदल और लिफ्ट लेकर आवारगी करते हुए योसेमाइट के घाटियों  से गुजरते हुए कारमेल की पहाड़ियों की एक बस्ती में पहुंचा। वहां पर उसने एडवर्ड वेस्टन का दरवाजा खटखटाया। एडवर्ड वेस्टन फोटोग्राफर था और उसने अगले दो महीने तक उस लड़के को पेंटिंग और ब्लॉक प्रिंटिंग का काम करते देखकर खूब उत्साहित किया और अपने स्टूडियो का इस्तेमाल करने की छूट दी।

गर्मी के अंत में एवरेट ने हाईस्कूल डिप्लोमा लेने के लिए घर लौटा, जिसे उसने 1931 में हासिल किया।  एक महीने से भी कम समय बाद  वह फिर से रोड पर था और यूटा, एरिजोना और न्यू मेंक्सिको की घाटियों में आवारगी करता रहा, जो क्रिस मैकेंडलेस के अलास्का जैसा ही रहस्यमय जगह था। उसके बाद वह सिर्फ दो बार मां-बाप से मिलने गया। उसने पढाई बीच ही छोड़ दी जिसके कारण उसके पिता काफी निराश हुए। इसके अलावे उसने एक जाड़ा कुछ पेंटरों के साथ रहते हुए बिताया। फिर उसके बाद वह बाकी जिंदगी बहुत कम पैसों के साथ, धूल भरे रास्तों पर सोते हुए और कभी-कभी दिन भर फाकाकशी करते हुए खुशी-खुशी आवारा जीवन बिताने लगा। वालेस स्टेगनर के शब्दों में,”एवरेट बेहद रुमानी, सौंदर्य प्रेमी और बियाबान की शांति में घूमने वाला आदिम प्रकृति का था।“  18 साल की उम्र में वह जंगल की खाक छानने, पहाड़ों की चोटी पर चढने और सौंदर्य से भरपूर बियाबानों में घूमने के सपने देखा करता था। एवरेट ने जो भी सपना देखा उसे पूरा करने के लिए निकल गया, सालों उन गुमनाम रुमानी जगहों की आवारगी करने के लिए।

जानबूझकर  उसने अपने शरीर को कष्ट दिया ताकि किसी भी परिस्थिति को सहने की क्षमता का उसमें विकास हो सके। जिन बियाबानों की तरफ लोग जाने से मना करते थे वह उसी रास्तों पर जानबूझकर गया। पहाड़ों, घाटियों की आवारगी करते हुए उसने अपने मां-बाप और दोस्तों को लम्बे-लम्बे पत्र लिखे जिसमें उसने समाज और शहरी सभ्यता वाले जीवन की आलोचना की। उसने कई जगहों से ऐसे कई पत्र लिखे। इन पत्रों में एवरेट के प्रकृति से गहरे जुड़ाव और अपनी आवारगी के प्रति दीवानगी का इजहार है। उसने लिखा,”मैं इन बियाबानों में कई खतरनाक अनुभवों से गुजरता रहता हूं और ये सब मुझे बहुत रोमांचित करते हैं। यह मेरे जीने के लिए बेहद जरूरी हैं।“

एवरेट रुस  के पत्र और क्रिस मैकेंडलेस की डायरी और पत्रों में लिखे विचारों में काफी समानता है। एवरेट के पत्रों में लिखे कुछ अंशः-

‘मैं हमेंशा से सोचता रहा हूं कि मैं इसी तरह बियाबानों की अकेली आवारगी भरी जिंदगी जीना चाहता हूं। पगडंडियां मुझे अपनी तरफ खींचती हैं। और, तुम मेरी इस दीवानगी को समझ नहीं सकते। ये अकेली पगडंडियां मेरे लिए बेहतर हैं और मैं कभी अपनी आवारगी नहीं छोड़ूंगा। और जब मेरे मरने का समय आएगा, तो मैं उसके लिए बहुत वीरान और गुमनाम बियबान में चला जाऊंगा।‘

‘प्रकृति का सौंदर्य मेरा जीवन है। मैं शहर में अपने आप को जीवन से कटा हुआ पाता था। वहां मेरे कुछ दोस्त हैं लेकिन उनमें से किसी के अंदर भी मुझे समझने की जरा भी ताकत नहीं थी। इसलिए मैं अकेला उन सबसे दूर चला गया। दुनिया के लोग जिस तरह का जीवन जीते हैं मैं उससे हमेंशा असंतुष्ट रहा। मैंने हमेंशा एक भावपूर्ण और बेहतर जीवन जीना चाहा।‘

‘इस साल अपनी आवारगी में मैंने वैसी जगहों को चुना जिधर साहस की ज्यादा जरूरत थी। और, कितने दिल को छूने वाले खूबसूरत जगहों में गया- दूर तक फैले समतल मैदान, गुमनाम पठारियां, सिंदूरी रेत वाले रेगिस्तान के ऊपर खड़े बड़े-बड़े नीले पहाड़, अनेक घाटियां और इंसानों द्वारा हजारों साल पहले छोड़ दिए चोटियों पर मौजूद झोपड़ें।‘

एवरेट रुस  के इस पत्र के लगभग आधी शताब्दी  बाद क्रिस मैकेंडलेस ने इसी तरह की बात वायन वेस्टरबर्ग को पोस्टकार्ड में लिखाः-

‘मैंने तय किया है कि आवारगी का ये जीवन मैं और जीउंगा। मुक्ति और सौंदर्य के इस रूप को मैं नहीं छोड़ सकता।‘

एवरेट रुस  के विचारों की प्रतिध्वनि क्रिस मैकेंडलेस के उन पत्रों में भी है जो उसने रोनाल्ड फ्रांज को लिखे थे। एवरेट रुस, क्रिस मैकेंडलेस के जैसा ही रुमानी था और दोनों ने ही अपने जीवन की सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। पुरातत्ववेत्ता क्लेबार्न लॉकेट ने 1934 में एक चोटी पर आंसाजी आदिवासियों के घर की खुदाई करते समय एवरेट को अपने यहां रसोईए का काम दिया था। उसने बताया,”एवरेट बेहद लापरवाह तरीके से खतरनाक चोटियों की चढाई करता था।“

इस बात  को एवरेट ने भी बड़े उत्साह से एक पत्र में लिखा,’सैकड़ों बार मैं एकदम सीधी खड़ी चोटियों या ढहते बलुआ पत्थरों पर, पानी या आदिवासियों के घरों की खोज में अपने जीवन को दांव पर लगाकर चढा। दो बार तो जंगली सांढो के हमले से बाल-बाल बचा। इन सब खतरों से बचते हुए मैंने अपनी साहस भरी आवारगी लगातार जारी रखी।‘

उसने अपने आखिरी पत्र में अपने भाई  को लिखाः- ‘मैं जहरीले सांपों और ढहते पहाड़ी ढलानों पर गिरने से कई बार बचा। एक बार तो जंगली मधुमक्खियों ने मुझे डंक मारा। मैं तीन-चार दिनों तक उसके जहर के कारण सो नहीं पाया।‘

एवरेट रुस  भी मैकेंडलेस की तरह शारीरिक परेशानियां से डरता नहीं था, बल्कि जैसे उसका स्वागत करता था। एवरेट ने एक पत्र में अपने दोस्त बिल जैकब को लिखा,”जहरीले फल के असर से छह दिन तक मैं छटपटाता रहा और मेरा दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा था। दो दिन तक तो मुझे होश ही नहीं रहा कि जिंदा था या मर गया। गर्मी में दो दिन तक मेरा शरीर ऐंठता रहा और बैचैनी से करवट बदलता रहा, चींटियां और मक्खियां मेरे शरीर पर मंडराती रहीं, जहर के कारण मेरे चेहरे, बाहें और पीठ पर बड़े-बड़े चकत्ते हो गए। मैं कुछ खा नहीं सका- वहां आसपास कुछ नहीं था सिवाय मेरी पीड़ा के। मेरे साथ ऐसी कई घटनाएं हुई लेकिन मैंने जंगल को नहीं छोड़ा।‘

मैकेंडलेस की तरह ही एवरेट रुस ने आवारगी करने से पहले अपना नया नाम रखा- एक नहीं, कई नाम। 1 मार्च 1931 को उसने अपने परिवार को लिखा,’मैंने अपना नया नाम रख लिया है- लेन रेम्यू। आप सब मेरे नए नाम को स्वीकार करें।‘ दो महीने बाद उसन फिर एक पत्र में लिखा,’मैंने फिर से अपना नाम बदल लिया है- इवर्ट रूलेन। पिछले नाम को सुनकर सबको अजीब लगता था और वह नाम फ्रेंच(फ्रांस का) जैसा लगता था।‘ और फिर अगस्त में उसने अपना पुराना नाम एवरेट रुस को अपना लिया, अगले तीन साल तक वह खुद को इसी नाम से बुलाता रहा। डेविस गुल्च घाटी में घुसने के बाद उसने अपना नाम ‘नेमो’ रख लिया जिसका मतलब था, ‘कोई नहीं’। उसने अपने नए नाम को घाटी के भित्तियों के नर्म चट्टानों पर दो बार खोद-खोद कर लिखा। उसके बाद गायब हो गया। उस समय वह बीस साल का था।

अंतिम पत्र उसने 11 नवंबर 1934 को अपने मां-बाप और भाई को डेविस गुल्च घाटी से 50 मील उत्तर के एक जगह एस्केलेंटे से लिखा कि वह एक-दो महीने तक कोई संवाद नहीं कर पाएगा। उसने भाई को पत्र में लिखाः- ‘मैं सोचता हूं, जब फिर से लौट के सभ्यता वाली दुनिया में लौट के जाऊंगा, वह समय जल्दी नहीं आनेवाला है। मैं प्रकृति के बियाबानों में आवारगी करते हुए थका नहीं हूं। मुझे प्रकृति का सौंदर्य और अपने घुमक्कड़ जीवन में हमेंशा से दीवानगी की हद तक आनंद आता रहा है। मुझे मोटरकार के बदले घोड़े की सवारी करना, छत के बदले चमकते सितारों से भरा आसमान, हाइवे के बदले कोई अजनबी और कठिन पगडंडी जो किसी अंजानी जगह ले जाती हो और शहरों के असंतुष्ट माहौल के बदले बियाबान की गहरी शान्ति पसंद है। मैं ऐसा महसूस करता हूं जैसे मैं इसी तरह के वातावरण में जीने वाला आदमी हूं। क्या अब भी तुम यहां जीने की मेरी ईच्छा की आलोचना करोगे? मैं जिस अद्भुत सौंदर्य से घिरा रहता हूं, मेरे लिए इतना ही काफी है। मैं तुम्हारी तरह रूटीन में बंधी वही रोज की एक जैसी जिंदगी जीने के लिए बाध्य नहीं हो सकता। मैं कभी भी कहीं पर स्थायी रूप से नहीं रह पाउंगा। मैं जीवन की गहराई में जाकर बहुत कुछ जान चुका हूं और मैं तुम्हारे जैसे निरर्थक जीवन में वापस नहीं लौट सकता।‘

उस चिट्ठी लिखने के आठ दिन बाद एवरेट  को रास्ते में दो चरवाहे मिले, जिसके कैंप में उसने दो रातें बिताईं। ये दोनों  चरवाहे अंतिम लोग थे जिन्होंने  उसे आखिरी बार जिंदा  देखा था। एवरेट के एस्केलेंटे छोड़ने के तीन महीने बाद, उसके मां-बाप के पास वह सारी चिट्ठियां वापस लौट आयी  जिसे उन्होंने एवरेट को एरिजोना  के पते पर लिखा था जहां एवरेट  काफी लंबे समय तक रूका था।  मां-बाप ने चिंतित होकर एस्केलेंटे के अधिकारियों से संपर्क किया और मार्च 1935 में एक खोजी दल एवरेट को खोजने रवाना किया गया। खोज उन चरवाहों के कैंप से शुरू की गई जहां एवरेट को आखिरी बार देखा गया था। आसपास के क्षेत्रों में खोजने पर डेविड गुल्च घाटी के तलहटी में एवरेट के दोनों गधे मिल गए, जो वहां की झाड़ियों में चर रहे थे। वहां से थोड़ा नीचे की तरफ जाने पर एक कैंप मिला, जिसमें सुबूत मिले कि एवरेट यहां रूका था। उसके पास में ही आदिवासियों द्वारा हजारों साल पहले छोड़े गए एक अनाज भंडारघर के दरवाजे के पत्थरों पर खुदा हुआ था, ‘नेमो 1934’। वहीं पर आदिवासियों के टूटे-फूटे बर्तनों को एक चट्टान पर सजाकर रखा गया था। और नीचे जाने पर तीन महीने बाद खोजी दल ने घाटी के एक दीवार पर फिर वही नाम लिखा पाया, जिसके आसपास आदिवासियों द्वारा बनाए गए रहस्यमय चित्र थे। सिवाय एवरेट के दोनों गधों के एवरेट रुस का कोई भी सामान कहीं नहीं मिला।

सबने ये सोचा कि एवरेट रुस, घाटी की दीवारों पर चढने के दौरान  गिर कर मर गया। उस घाटी की अधिकांश ढलानों पर चढने के रास्ते में चिकनी भुरभुरी  किस्म की चट्टानें थी और इन खतरनाक रास्तों पर एवरेट  के चढने के शौक को देखते  हुए वहां से गिरकर मरने की बात विश्वसनीय लग रही  थी। लेकिन आसपास और दूर  की ढलानों में खोजने के बाद कहीं किसी मानव के अवशेष  का निशान नहीं मिला।

लेकिन ध्यान  देने वाली बात ये थी कि गुल्च  घाटी से आगे एवरेट अपने भारी-भरकम सामानों को बिना गधों पर लादे आगे कैसे जा सकता था? इसलिए इस रहस्यमय परिस्थिति में खोजकर्ताओं के द्वारा  उसकी मौत के बारे में एक दूसरा अनुमान लगाया गया- उस घाटी में घूमनेवाले चोरों के गिरोह ने एवरेट रुस को मारकर या तो उसकी लाश को जमीन में गाड़ दिया या फिर कोलोराडो नदी में फेंक दिया और वे उसका सामान चुराकर ले गए। लेकिन इस अनुमान को साबित करने वाला कोई भी सुबूत नहीं मिला।

एवरेट के अपना नाम ‘नेमो’ रख लेने की बात का राज खोलते हुए उसके पिता ने कहा कि उनका बेटा जूल्स वेर्ने की किताब ‘ट्वेंटी थाउजेंड लीग्स अंडर दी सी’ पढा करता था जिसके हीरो का नाम कैप्टन नेमो था, जो साफ दिलवाला था और जिसने दुनिया की सभ्यता वाले जीवन को छोड़कर, धरती से सारा रिश्ता तोड़ लिय़ा था। एवरेट रुस के जीवनीकार डब्ल्यू एल रुसो उसके पिता की बातों से सहमति जताते हैं और कहते हैं,”उसका संगठित समाज से नाता तोड़ लेना, दुनिया के सुखों को छोड़ देना और घाटी में जाकर अपना नाम नेमो रख लेना इस बात की ओर संकेत करता है कि वह अपनी पहचान जूल्स वर्ने की किताब के नायक से करता था।“

एवरेट रुस  का कैप्टन नेमो से प्यार के प्रकट होने के बाद, उसकी मौत  के रहस्यों की खोज करनेवाले के इस अनुमान को बल मिला कि गुल्च  घाटी छोड़ने के बाद एवरेट  नए पहचान के साथ कहीं किसी कोने में गुमनामी की जिंदगी जी रहा था।

एक साल  पहले एरिजोना के किंगमेन के एक गैस स्टेशन पर मेरी(जॉन क्राउकर) बात वहां एक कर्मचारी से हुई जो बड़े विश्वास से कह रहा था कि वह 1960 के आखिर तक एवरेट रुस को जानता था जो नवाजो(अमेरिकन आदिवासी) इंडियन रिजर्वेशन के एक सुदूर बस्ती में रहता था। उस कर्मचारी के दोस्त के अनुसार, एवरेट ने वहीं एक नवाजो आदिवासी औरत से शादी कर लिया था और उसका एक बच्चा भी था। लेकिन, एवरेट के बारे में इस तरह की सूचनाएं कितने सही हैं, कहना मुश्किल है।

केन स्लेट  ने एवरेट रुस के मौत के रहस्य को खोजने में काफी समय बिताया। केन को यह विश्वास है कि एवरेट 1934 से 1935 के बीच में मरा था और कैसे मरा था, इसका राज वह जानता है। 65 साल का केन स्लेट पेशे से रिवर गाईड(नदियों की सैर करानेवाला) था और स्वभाव से गुस्सैल था। स्लेट उस क्षेत्र में चालीस साल से रह रहा था और एवरेट के बड़े भाई वाल्डो को साथ लेकर उस हर जगह की उसने खाक छानी थी जहां एवरेट गया था; उन सभी लोगों से उसने बातें की थी जो एवरेट से रास्ते में मिले थे।

स्लेट ने बताया,” वाल्डो सोचता था कि एवरेट की हत्या हुई थी लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता। जिन लोगों पर हत्या करने का संदेह था, मैंने उनकी बस्ती के कई लोगों से बात की। मैं नहीं सोचता वे हत्यारे थे लेकिन कौन जानता है, ऐसा हो भी सकता था। छुपकर कौन क्या करता है, इस बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता। कुछ लोगों का मानना है कि एवरेट घाटी के ढलान से गिरकर मर गया। हां, यह भी सही हो सकता है क्योंकि ऐसा इस देश में होता रहता है। लेकिन मैं नहीं सोचता कि ऐसा हुआ होगा। मेरा मानना है कि एवरेट की मौत नदी में डूबने से हुई।“

एक साल  पहले गुल्च घाटी से नीचे जाते समय केन स्लेट ने करीब चालीस मील पूरब में सेनजुआन  नदी के पास आदिवासियों के अनाज रखनेवाले घर के दरवाजे पर नेमो लिखा देखा। स्लेट  का अनुमान था कि यह नाम डेविस  घाटी के छोड़ने के बहुत दिन  बाद नहीं लिखा गया था।  स्लेट ने आगे कहा,” अपने गधों को उसने वहीं छोड़ दिया और सामानों को कहीं किसी गुफा में छिपा दिया। उसके बाद वह उपन्यास का पात्र कैप्टन नेमो बन गया। नवाजो रिजर्वेशन में उसके कई आदिवासी मित्र थे। इसलिए मैं सोचता हूं कि वह यहां से उधर की ओर चला। नवाजो के लिए जाने के लिए कोलोराडो नदी को पार कर एक पहाड़ी रास्ते से गुल्च घाटी पार करते हुए सैन जुआन नदी तक जाना पड़ता है। एवरेट उसी सैनजुआन नदी को पार करने की कोशिश करते समय डूबकर मर गया। ऐसा मैं सोचता हूं। अगर एवरेट नदी पारकर उस पार जिंदा पहुंच गया होता और नवाजो में रहता तो उसके लिए अपनी पहचान छुपाकर ज्यादा दिन रहना संभव नहीं था। एवरेट वहां के लोगों के बीच ज्यादा दिन तक टिक कर नहीं जी पाता। वह अकेला रहनेवाला आदमी था। एवरेट मेंर स्वभाव जैसा ही था और लगता है कि मैकेंडलेस भी उसी स्वभाव का था। हम किसी का साथ पसंद करते हैं लेकिन लोगों के साथ ज्यादा दिन तक टिककर नहीं रह सकते। इसलिए हम वहां से भाग निकलते हैं और कुछ दिन बाद फिर वापस लौटकर, फिर उस नर्क से निकल आते हैं। यही काम एवरेट भी कर रहा था। एवरेट कुछ अलग किस्म का था। उसने और मैकेंडलेस ने कम से कम अपने सपनों का पीछा तो किया। वही उनको महान बनाता है। उन्होने जो किया, वह बहुत कम लोग कर पाते हैं।“

एवरेट रुस  और क्रिस मैकेंडलेस के जीवन को समझने के लिए उनके कामों और विचारों को गहराई से देखने की जरूरत है। आइसलैंड के दक्षिणी-पश्चिमी किनारे पर एक द्वीप है-पापोस। उत्तरी अटलांटिक से गरजकर आनेवाली तेज हवाओं के चोट को झेलते वृक्षविहीन और चट्टानों से भरे इस द्वीप का नाम यहां पहले-पहल बसने वाले उन आइरिस साधुओं के नाम पर पड़ा जो पापर कहे जाते थे और जो इस जगह को छोड़कर जा चुके थे। मैं(जॉन क्राउकर) गर्मी के एक दोपहर को उन पथरीले चबुतरों के अवशेषों पर टहल रहा था जहां हजारों साल पहले कभी उन साधुओं ने अपना घर बनाया था।

ये साधु आयरलैंड के पश्चिमी किनारे की ओर से नावों से, आइसलैंड के इस पापोस द्वीप पर पांचवीं शताब्दी की शुरूआत में आ गए थे। आयरलैंड से साधुओं का यह समूह अपने छोटे नावों में विश्व के सबसे खतरनाक समंदर में चल पड़ा था, बिना ये जाने कि आगे उन्हें कौन सा जगह मिलेगा या मिलेगा भी कि नहीं। इसी तरह इन साधुओं ने जान दांव पर लगाया और कई बार उसे खो भी दिया- ऐसा करने का उद्देश्य ना तो पैसों की खोज थी और ना ही नाम की और ना ही उन साधुओं को किसी की जमीन पर कब्जा करना था। आर्कटिक के महान खोजी और नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रित्जोफ नानसेन ने बताया,”ये सभी समुद्री यात्राएं शान्त जगहों की तलाश में की गई थी, जहां ये साधु शान्ति से रह सकते थे, दुनिया के शोर-गुल और लालच से दूर।“

आइसलैंड के समुद्री किनारे पर, जहां साधू रह रहे थे, नवीं शताब्दी  में नार्वे के कुछ लोग  चले आए। साधुओं ने उनको देखकर सोचा कि अब उस जगह  पर भीड़ हो रही थी, हलांकि अभी तक वहां के बड़े क्षेत्र  पर कोई भी नहीं बसा था।  सभी साधु अपनी नावों पर सवार हुए और समुद्र में  नाव खेते हुए  ग्रीनलैंड  की ओर चल पड़े। खतरनाक लहरों  वाले उस समंदर में वे इधर-उधर  जाते रहे, उसके पीछे उनके आत्मा  के शांति से जीने की भूख  थी। आत्मा की शांति की इतनी खतरनाक और जान से भी ज्यादा प्यारी तीव्र प्यास, आधुनिक भोगवादी जीवन की कल्पना से भी बाहर की बात है। इन साधुओं के जीवन को जानने के बाद, उनके साहस की पराकाष्ठा और अपनी इच्छा को पाने की दीवानगी की कहानी किसी पर भी गहरा प्रभाव छोड़ती है। इन साधुओं के जीवन से एवरेट रुस और क्रिस मैकेंडलेस के जीवन को समझने में मदद मिलती है।

एंकरेज, 12 सितंबर- पिछले रविवार, अलास्का  के सुदूर बियाबान के एक कैंप में घायल अवस्था में  वहां से नहीं निकल पाने के कारण एक आवारे युवक की मौत हो गई। वह कौन है, अभी पता  नहीं चला है। लेकिन, उसके पास से मिले डायरी और दो नोट से एक दर्दनाक कहानी  का पता चलता है, जिसमें युवक के जिंदा रहने के अथक और निराशाजनक कोशिशें दर्ज हैं। डायरी से पता चलता है कि यह युवक अमेरिकन है और इसकी उम्र 20 से 30 के बीच है। शायद, वह झरने में गिरने से घायल हो गया था और कैंप में तीन महीने से फंसा था। उसने वहां शिकार या जंगली जड़ों को खाकर जान बचाने की कोशिश की, लेकिन वह कमजोर होने से नहीं बच सका। उसने जो दो नोट लिखे हैं, उनमें से एक को वह छोड़ जाता था, जब वह आसपास के क्षेत्रों में भोजन की तलाश में जाता, जिसमें लिखा था कि कोई उसकी मदद करे। दूसरे नोट में उसने दुनिया को अलविदा कहा था।

फेयरबैंक  में हुए पोस्टमार्टम  के रिपोर्ट में कहा गया  है उसकी मौत जुलाई के अंत  में भूख से हुई है। उसके पास मिले नोट में एक नाम  लिखा है, जो विश्वास किया जाता है कि उसी का है। लेकिन, उसकी पहचान के बारे में अभी पुख्ता सुबूत नहीं मिलने के कारण उस नाम को अभी गुप्त रखा जा रहा है। (न्यूयार्क टाईम्स, सितम्बर 13, 1992)

न्यूयार्क टाईम्स में ये खबर छपने से एक सप्ताह पहले से अलास्का  पुलिस उस युवक के असली पहचान  की खोज कर रही थी। मैकेंडलेस जब मरा तो उसके बदन पर एक नीले रंग का शर्ट था। उसकी लाश के साथ मिले रहस्यमयी डायरी के अधिकांश पन्नों में वनस्पतियों से जुड़े गहरे निरीक्षण को लिखा गया था, जिससे यह अनुमान लगाया गया कि मैकेंडलेस जीवविज्ञानी था। लेकिन इस अनुमान से उस लाश के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं चला। न्यूयार्क टाइम्स में छपने के तीन दिन पहले 10 सितम्बर को उस आवारे के मरने की यह खबर एंकरेज डेली न्यूज के मुख्य पृष्ठ पर छप चुका था। जब जिम गिलियन, जिसने एलेक्स को स्टेम्पेड ट्रेल तक छोड़ा था, की नजर उस खबर पर पड़ी, जिसमें एक मैप भी छपा था जिसके अनुसार यह लाश स्टेम्पेड ट्रेल के पास मिला था, तो उसके रोएं-रोएं में सिहरन सी दौड़ गई। उसके मन में एलेक्स की याद अब भी ताजा थी, जो उसके द्वारा दिये गए जूते को अपने जूतों के ऊपर से पहनकर उसकी नजर के सामने से उस स्टेम्पेड ट्रेल की पगडंडी पकड़कर गया था।

गिलियन  ने याद करते हुए बताया,”अखबार में छपी थोड़ी सी सूचना से ऐसा लग रहा था कि यह एलेक्स ही था। मैंने अलास्का पुलिस को बुलाया और कहा कि मैंने इस लड़के को लिफ्ट दिया था।“

“क्या तुम विश्वास के साथ ऐसा कह सकते हो? पिछले एक घंटे में तुम ऐसे छठे आदमी हो जिसने दावा किया है कि इस युवक को जानते हो” अलास्का पुलिस के एक जवान रोजर इलिस ने पूछा। गिलियन ने उसे विश्वास दिलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन रोजर हिल को विश्वास नहीं हो पा रहा था। गिलियन ने तब ऐसे कई ऐसे सामानों के नाम बताए जिसका जिक्र अखबार में नहीं था लेकिन जो लाश के पास पाया गया था। तभी रोजर ने नोटिस किया कि उसकी डायरी में पहले पन्ने पर लिखा था,” फेयरबैंक को अलविदा, गिलियन के साथ बैठा, आगे शुभ हो।“ तब तक पुलिस को उस आवारे के पास मिली फिल्म रोल के फोटो से उसकी खुद अपनी खींची गई कई तस्वीरें मिल चुकी थी।

गिलियन  ने बताया,” जब पुलिस वो तस्वीरें मेरे पास लेकर आयी तब तो कोई संदेह ही नहीं रह गया कि वह एलेक्स ही था।“ मैकेंडलेस ने गिलियन को बताया था कि वह साउथ डाकोटा का रहनेवाला था इसलिए पुलिस ने आगे उस युवक के सगे-संबंधी की खोज शुरू कर दी। उसके बाद रेडियो बुलेटिन पर उस गुमनाम मैकेंडलेस के मरने की सूचना प्रसारित की जाने लगी जिसका घर साउथ डाकोटा बताया जा रहा था। कार्थेज, जहां वायन वेस्टरबर्ग के साथ मैकेंडलेस रुका था, साउथ डाकोटा से बीस मील दूर पर बसा एक छोटा शहर था। पुलिस ने सोचा कि उसने युवक के घरवालों को खोज निकाला था लेकिन यह आशा झूठी साबित हुई।

मैकेंडलेस ने बसंत में वेस्टरबर्ग को फेयरबैंक से पत्र लिखने के बाद उसके बाद फिर संपर्क नहीं किया था। 13 सितम्बर को जब मोंटाना के खेतों से काम समेटकर अपने आदमियों के साथ कार्थेज लौट रहा था तो जेम्सटाउन के पास उसके ट्रक में लगा रेडियो बज उठा,”वायन, मैं बॉब बोल रहा हूं।“

“हां, बॉब, बताओ वायन बोल रहा हूं।“

“जल्दी से समाचार सुनो, पॉल हार्वे क्या कह रहा है। वह किसी लड़के के बारे में बता रहा है जो अलास्का में भूख से मर गया। पुलिस नहीं जानती, वह कौन है। लग रहा कि वह एलेक्स है।“

वेस्टरबर्ग  ने समाचार सुना तो उसमें दी गई सूचना से उसे भी दुख के साथ अंदेशा हुआ कि वह एलेक्स ही था। जैसे ही दुखी वेस्टरबर्ग कार्थेज पहुंचा, तुरंत उसने अलास्का पुलिस को फोन कर कहा कि वह मैकेंडलेस को जानता था। तब तक देश भर के मीडिया में उस लड़के के मरने और उसके डायरी आदि के बारे बहुत कुछ प्रसारित हो चुका था। उसके बाद से पुलिस के पास अनेकों कॉल आ चुके थे जिसमें लोग दावा कर रहे थे कि वह उस लड़के से परिचित थे। इस कारण वेस्टरबर्ग के फोन को भी पुलिस गंभीरता से नहीं ले रही थी।

पुलिस ने वेस्टरबर्ग से कहा कि अब तक 150 कॉल आ चुके थे जिसमें एलेक्स को किसी ऩे अपना बेटा बताया तो किसी ने दोस्त, भाई या और कुछ। तब वेस्टरबर्ग ने कहा,”  मैं झूठ नहीं कह रहा। मेरे पास मैकेंडलेस काम कर चुका है और मेरे पास उसका सोशल सिक्युरिटी नंबर मौजूद है।“

वेस्टरबर्ग  को बहुत खोजने पर मैकेंडलेस द्वारा भरे गए दो फार्म मिले। पहले फार्म में उसने झूठी सूचनाएं दी थीं। लेकिन दूसरा फार्म, जिसे उसने अलास्का जाने से दो सप्ताह पहले 30 मार्च 1992 को भरा था, उसमें सही-सही सूचना दी थी। उसमें उसका नाम क्रिस्टोफर जे मैकेंडलेस और सोशल सिक्यूरिटी नंबर- 228-31-6704- लिखा था। वेस्टरबर्ग ने फिर अलास्का पुलिस को फोन किया और इस बार पुलिस ने उसे गंभीरता से लिया।

मैकेंडलेस द्वारा लिखा गया सोशल सिक्यूरिटी नंबर सही निकला। उससे पता चला कि उसका घर उत्तरी वर्जीनिया में था। अलास्का पुलिस ने वर्जीनिया के अधिकारियों को इस बात की सूचना दी। उसके बाद वहां फोन डायरेक्टरी में मैकेंडलेस के फोन नंबर की खोज शुरू हुई। तब तक मैकेंडलेस के मां-बाप उस जगह को छोड़कर मैरीलैंड में जा बसे थे और वर्जीनिया का उनका फोन नंबर नहीं था। लेकिन मैकेंडलेस का बड़ा भाई अन्नाडेल में रह रहा था जिसका नंबर डायरेक्टरी में मौजूद था। 17 सितम्बर को सैम मैकेंडलेस के पास फेयरफैक्स शहर से एक पुलिस जासूस अधिकारी का फोन आया।

सैम मैकेंडलेस, क्रिस से नौ साल बड़ा था और वह भी वाशिंगटन पोस्ट अखबार में किसी आवारा के मरने के लेख को पढ़ चुका था। “मैंने उस लेख को पढ़ा तब दिमाग में दूर तक ऐसा कोई खयाल नहीं आया कि वह क्रिस हो सकता था। मुझे वो पढकर लगा था कि ओह कितनी बड़ी त्रासदी है और उस लड़के के परिवार के बारे में सोचकर भी परेशान हुआ था। कितनी दुखद कहानी थी।“

सैम क्रिस  का सौतेला भाई था जो अपने मां के पास कैलिफोर्निया और कोलोराडो में पला-बढा  था। वह 1987 में जब वर्जीनिया  आया तब तक क्रिस पढाई के लिए अटलांटा जा चुका था।  इसलिए वह अपने भाई से अच्छी  तरह परिचित नहीं था। जब जासूस अधिकारी ने सैम  से फोन पर क्रिस के बारे में बात की तब सैम को लगा,”मुझे विश्वास हो चला था कि वह क्रिस ही था। मैं जानता था कि वह अकेले ही अलास्का गया था।“

जासूस के कहने पर सैम मैकेंडलेस फेयरफैक्स पुलिस विभाग गया जहां अधिकारी ने उसे उस आवारे के पास से मिली तस्वीरें दिखाई, जिसे फेयरबैंक से फैक्स किया गया था। सैम ने उस घटना को याद करते हुए कहा, ”लाश की तस्वीर सिर की तरफ से खींची गयी थी। उसके लंबे बाल, बड़ी दाढ़ी और बदन कंकालनुमा था। मैकेंडलेस तो छोटे बाल रखता था और वह क्लीन-शेव्ड रहता था। फिर भी, निस्संदेह वह क्रिस ही था। मैं तुरंत घर वापस लौटा, अपनी पत्नी मिशेल को साथ लेकर अपने पिता और मैकेंडलेस की मां बिली के पास मैरीलैंड चल पड़ा। मुझे सूझ नहीं रहा था कि मैं ये सब बातें उनको कैसे बता पाउंगा। आप किसी को कैसे कहेंगे कि उनका बच्चा मर चुका है?”

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबे क्रिस्टोफर ने खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। सारे पैसे दानकर, परिचय-पत्र फेंककर और परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी-घुमक्कड़ी का जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया। वहां जीवन की विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए जीवन की खोज जारी रखी। वह ऐसा क्यों बना… अलास्का में उसके साथ क्या हुआ.. यह सब-कुछ जॉन क्राउकर नाम के पत्रकार ने बहुत शोध के बाद अपने किताब ‘Into the wild’ में लिखा। सीन पेन ने इसी नाम से एक बेहतरीन फिल्म बनाई जो विश्व के सौ महान सिनेमा में गिनी जाती है। Into the wild’ का हिंदी में अनुवाद कर रहे हैं युवा पत्रकार राजीव कुमार सिंह। इसका पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा पार्ट आप लोग पढ़ चुके हैं। ये था पांचवां पार्ट। राजीव ने इस उपन्यास का अनुवाद करके पत्रकारिता क्षेत्र में दस्तक दी है। उनके अनुवाद में कई कमियां-गल्तियां हैं, ऐसा उनका कहना है। पर इसे एक युवा पत्रकार का शुरुआती गंभीर प्रयास मानते हुए कमियों की अनदेखा की जाए, ऐसा वह अनुरोध करते हैं। राजीव की इच्छा है कि उनके परिचय में लिखा जाए- एक बेरोजगार पत्रकार जिसे एक अदद नौकरी की तलाश है। राजीव से संपर्क rajeevsinghemail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग चार)

मैकेंडलेस का कैमरा जब काम करने लायक नहीं रहा तो तस्वीर खींचने का काम तो बंद हुआ ही, उसने अपनी डायरी लिखनी भी बंद कर दी। फिर अलास्का पहुंचने पर ही उसने फिर से लिखना शुरू किया। इसलिए मई 1992 में लास वेगास छोड़ने के बाद वह कहां-कहां गया, इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

 

जेन को लिखे गए उसकी चिट्ठी से पता चलता है कि जुलाई और अगस्त में उसने ऑरेगान के समुद्री किनारे की तरफ, संभवतः एस्टोरिया के क्षेत्र में डेरा डाला था, जिसके बारे में उसने शिकायत भरे लहजे में लिखा था कि वहां का कुहरा और बारिश कभी-कभी उसके लिए असहनीय हो जाता था। सितम्बर में कैलिफोर्निया के यूएस हाइवे 101 की तरफ आवारगी करने के बाद क्रिस फिर रेगिस्तान की ओर मुड़ गया। और, अक्टूबर के शुरुआत में वह एरिजोना के बुलहेड सिटी पहुंच चुका था। सड़कों  के किनारे बने मकानों की कतारों और कई हिस्सों में बंटे बेतरतीब बस्तियों वाला बुलहेड सिटी कोलोराडो नदी के आठ से नौ मील के दायरे में बसा था। बुलहेड सिटी की सबसे खास बात थी यहां का फोर लेन मोहेव वेली हाइवे, जिसपर गैस स्टेशन, फास्ट फूड की दुकानें, वीडियो शॉप, ऑटो पार्ट की दुकानें और टूरिस्टों को आकर्षित करने वाली चीजों का बाजार था। जिस शहर में अमेरिकियों को फंसाने के लिए बुर्जुआ चीजों का जाल बिछा हुआ हो उस बुलहेड सिटी में ऐसा कुछ नहीं दिखता था जो थोरो और टॉल्सटॉय के विचारों को माननेवाले मैकेंडलेस को आकर्षित करे। लेकिन, उसको बुलहेड से गहरा लगाव था। हो सकता है कि यह लगाव उन फुटपाथजीवियों से प्रेम के कारण था, जो यहां की सामुदायिक पार्क से कैम्पग्राउंड तक भरे पड़े थे या फिर उसे इस शहर को घेरने वाली रेगिस्तानी लैंडस्केप से प्यार हो गया था। कारण जो भी हो, मैकेंडलेस जब एक बार इस शहर में आया तो फिर दो महीने तक यहीं का होकर रह गया। जबसे उसने अटलांटा छोड़ा था और जब तक वह अलास्का नहीं पहुंचा था, इस बीच में संभवतः बुलहेड सिटी में सबसे ज्यादा दिन रुका था।

अक्टूबर में मैकेंडलेस ने वेस्टरबर्ग को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उसने बुलहेड के बारे में लिखाः “जाड़ा बिताने के लिए यह सबसे बेहतरीन जगह है और संभवतः मैं अपनी आवारगी छोड़कर कुछ बेहतर करने के लिए यहीं बस जाऊंगा। देखता हूं कि बसंत आने पर क्या होता है क्योंकि मेरे पांव उस मौसम में ही आवारगी करने के लिए बेचैन होते हैं।“ जब वह ये सब बातें लिख रहा था तब फुल टाईम जॉब कर रहा था, मैकडोनाल्ड के स्टोर में। कुछ कमाने के लिए वह बेमन से अब सांसारिक जीवन जी रहा था, यहां तक कि उसने वहां के लोकल बैंक में एकाउंट भी खुलवाया था। मैकडोनाल्ड में नौकरी के लिए आवेदन करते समय उसने अपना असली नाम क्रिस मैकेंडलेस लिखा था और अपना असली सोशल सिक्युरिटी नंबर दिया था। उसके मां-बाप को उसके बारे में आसानी से पता लग सकता था लेकिन उनके प्राईवेट इन्वेस्टीगेटर पीटर को ये बात कभी नहीं मालूम हो सकी।

दो साल  बाद उसी मैकडोनाल्ड के कर्मचारियों से क्रिस मैकेंडलेस के बारे में पूछने पर वे उसके बारे में कुछ ज्यादा याद नहीं कर पाये। असिस्टेंट मैनेजर जार्ज ड्रेसजन ने याद करते हुए कहा, “एक चीज मुझे उसके मोजे के बारे में याद आ रहा है। वह हमेंशा बिना किसी मोजे के जूते पहनता था। लेकिन हमारे मैकडोनाल्ड में कर्मचारियों को जूते और मौजे पहनना अनिवार्य है इसलिए क्रिस को भी पहनना पड़ता था। जैसे ही शिफ्ट खत्म होता था तो सबसे पहले वह अपने मोजे उतारकर फेंक देता था। वह एक अच्छा और मेहनती लड़का था। विश्वास करने लायक।”

दूसरी असिस्टेंट मैनेजर लोरी जार्जा उसके बारे में कुछ दूसरा ख्याल रखती थी। “मुझे आश्चर्य लग रहा था कि उसे यहां कैसे रख लिया गया। वह सबकुछ करता था लेकिन बहुत धीमी गति से। जब ग्राहकों की लंच टाईम में भीड़ लगी रहती थी तब भी वह उसी धीमी रफ्तार से काम करता था। उससे कितना भी कहो, लेकिन उसपर कोई असर नहीं पड़ता था। काउंटर पर कस्टमरों की लाईन लग जाती थी और मैं उसे क्यूं जल्दी करने कह रही हूं, उसे समझ में ही नहीं आता था। ऐसा लगता था जैसे अपनी दुनिया में गुम रहता था। लेकिन उसपे भरोसा किया जा सकता था और वह रोज काम पर आता था, इसलिए कभी उसे यहां से निकाला नहीं गया। उसे पैसे भी कम दिए जाते थे। उससे काम करवाना काफी कठिन था। काम के बाद मैंने उसे कभी नहीं देखा कि वह किसी से बात करता हो या और कुछ करता हो। वह हमेशा पेड़ और प्रकृति की बातें करता था जिससे हमें लगता था कि उसका कुछ स्क्रू ढीला हो गया था। जब उसने मैकडोनाल्ड छोड़ा तो शायद मेरी वजह से। जब उसने काम शुरू किया था तो उसके पास रहने के लिए घर नहीं था। जब काम पर आता था तो उसके बदन से बदबू आती थी। मुझे कहा गया कि मैं उसे नहाने के लिए कहूं। मैंने जब उसे नहाने के लिए कहा तब से ही हम दोनों के रिश्ते बिगड़ गए। अन्य कर्मचारी भी उसे मजाक बनाते हुए उसे साबुन का ऑफर करने लगे। इन बातों से वह गुस्सा होता था लेकिन कभी दिखाता नहीं था। तीन सप्ताह बाद वह चुपचाप यहां से चला गया।”

मैकेंडलेस ने यह सबसे छिपाया था कि उसके पास कुछ खास सामान नहीं था। उसने सबसे कहा था कि वह लौघलिन नदी के आसपास कहीं रहता था। जब किसी ने उसे घर तक छोड़ना चाहा तो वह बहाना बनाकर विनम्रता से मना कर देता था। वास्तव में वह शहर के छोड़ पर रेगिस्तान में कैंप डाले हुए था। उसके बाद उसने एक मोबाईल होम में रहना शुरू कर दिया। मोबाईल होम में उसे शरण कैसे मिली, इस बारे में उसने जेन को एक चिट्ठी में लिखा।

“एक सुबह मैं जब शेविंग कर रहा था तब एक बूढा मेरे पास आया। मुझसे पूछा कि क्या मैं बाहर सोता हूं, मैंने हां कहा। उसने कहा कि वह एक पुराने ट्रेलर में सोता है। अगर मैं चाहूं तो वहीं बगल के एक दूसरे ट्रेलर में सो सकता हूं लेकिन एक समस्या है कि वह ट्रेलर किसी और का है। इसलिए उसने मुझे हमेशा मालिक की नजर से बचने की बात कही। मुझे उसका प्रस्ताव अच्छा लगा। ट्रेलर अंदर से बेहतर दिख रहा था। साफ सुथरा होने के साथ इसमें पर्याप्त जगह है और कुछ बिजली के स़ॉकेट भी काम करते हैं। इसमें एक ही खराबी है और वह है यह बूढ़ा जो मुझे पागल लगता है और इसके साथ रहना कभी-कभी काफी कठिन हो जाता है।“

वह बूढा चार्ली अभी भी वहीं रहता था। उसी छोटे पुराने से जंग खा रहे ट्रेलर में। उससे जुड़ा हुआ वह बड़ा सा ट्रेलर था जिसमें मैकेंडलेस सोता था। पश्चिम में दूर तक नंगे पहाड़ दिख रहे थे। एक फोर्ड टोरिनो वहीं गंदे यार्ड में पड़ा था जिसके ईंजन से कोई पौधा निकलता दिख रहा था। बगल की झाड़ी से पेशाब का दुर्गंध यहां तक फैला था। अपनी याद्दाश्त को टटोलते हुए चार्ली चिल्ला उठा, “क्रिस, क्रिस, अच्छा वो, हां, हां, याद आ गया वो।“ चार्ली, स्वीटशर्ट और खाकी पैंट में शरीर से कमजोर और नर्वस लग रहा था। उसने याद करते हुए कहा कि मैकेंडलेस वहां एक महीने तक रुका था।

“बहुत अच्छा था वो, बहुत बेहतर इंसान”, चार्ली बोला। “अपने आसपास ज्यादा लोगों को पसंद नहीं करता था। अच्छा था, लेकिन मुझे लगता था कि उसके अंदर बहुत सारी मानसिक उलझनें थी। वह हमेंशा अलास्का के जैक लंडन को पढ़ता रहता था। ज्यादा नहीं बोलता था। मूडी था। किसी बात की परवाह नहीं थी उसे। बच्चों की तरह कुछ न कुछ खोजता रहता था। मैं भी कभी वैसा ही था लेकिन जल्द ही मुझे समझ में आ गया कि मैं क्या खोज रहा हूः पैसा! हा हा! वह हमेंशा अलास्का जाने की बातें किया करता था। शायद उसके लिए, जिसे वह खोज रहा था। जब वह यहां से गया तो वह क्रिसमस के आसपास का समय था। उसने मुझे 50 बक और सिगरेट का पैकेट दिया।”

नवंबर के आखिर में मैकेंडलेस ने जेन को कैलिफोर्निया के इंपेरियल वैली के एक छोटे से शहर निलांद के पते पर पोस्टकार्ड लिखा। “बहुत दिनों के बाद उसने हमें ये पोस्टकार्ड लिखा था जिसपर मैकेंडलेस ने अपना पता भी लिखा था। इसलिए हमने तुरंत उसे जबाब दिया कि हम उससे मिलने अगले सप्ताह बुलहेड आ रहे हैं, जो निलांद से नजदीक ही था।“ जेन ने याद करते हुए कहा।

जेन की चिट्ठी पाकर मैकेंडलेस बहुत रोमांचित हुआ। “ मैं तुम दोनों को जिंदा और सुखी पाकर बेहद खुश हूं। इतने खूबसूरत क्रिसमस कार्ड का शुक्रिया। यह मेरे लिए बहुत सुखद है। मैं यह सुनकर रोमांचित हो रहा हूं कि कि तुमलोग मुझसे मिलने आ रहे हो। हमेंशा तुम्हारा स्वागत है। डेढ साल बाद तुमलोगों से मिलने का मौका फिर से मिलेगा“ 9 दिसम्बर 1991 को चिट्ठी में उसने लिखा। उसने चिट्ठी में बुलहेड सिटी के उस ट्रेलर तक पहुंचने का नक्शा खींच दिया। चार दिन बाद, चिट्ठी मिलते ही जेन और बॉब ने उससे मिलने की तैयारी करनी शुरू कर दी। दोनों उसे खोजते हुए ट्रेलर तक पहुंच गए और गाड़ी के पीछे एलेक्स के बैग को उनलोगों ने पहचान लिया। जेन ने बताया, “ हमारे साथ हमारा कुतिया सुन्नी भी गयी था जिसने हमसे पहले ही एलेक्स को सूंघ लिया। मुझे आश्चर्य हुआ कि उसे अभी तक एलेक्स याद था। उसे देखते ही वह पागल सी हो गई।”

मैकेंडलेस ने जेन से कहा कि वह बुलहेड शहर से उब चुका है और अपने साथ काम करने वाले नकली इंसानों से भी उब चुका है इसलिए इस शहर को वह जल्दी छोड़ देगा। जेन और बॉब  निलांद से तीन मील दूर ऐसी जगह रहते थे जिसे लोग स्लैब कहते थे। स्लैब पहले एक नौसेनिक एअर बेस था जिसे वहां से हटाया जा चुका था और अब वहां पर कंक्रीट का मकान रेगिस्तान में चारों तरफ बिखरा था। नवंबर की सर्दियों में देश भर से पांच हजार से ज्यादा कई तरह के आवारे आकर यहां की धूप में डेरा जमाते थे। निलांद स्लैब उनलोगों के लिए मौसमी राजधानी की तरह था, जो समाज में उपेक्षित, उबे हुए, बेरोजगार और जलावतन थे। हर उम्र के लोग यहां आते थे। जब मैकेंडलेस यहां आया तो वहां रेगिस्तान में एक बड़ा बाजार लगा था। एक जगह जेन कुछ फोल्डिंग टेबल्स और सेकेंड हैंड सामान लेकर बैठी थी। मैकेंडलेस भी उसके सेकेंड हैंड किताबों के ढेर का दुकानदार बनकर बैठ गया। जेन उस पल को याद करते हुए बोली,” उसने मेरी बहुत सहायता की। जब मैं कहीं जाती थी तो वह टेबल के पास बैठता था। उसने किताबों को कैटेगराईज किया और बहुत सारी किताबें बेची। एलेक्स को क्लासिक का बहुत ज्यादा ज्ञान था। जैक लंडन की किताबों से उसे खास लगाव था। जो भी दुकान पर आता उससे वो कहता कि जैक लंडन की किताब ‘कॉल ऑफ दी वाईल्ड’ जरूर पढना चाहिए।”

मैकेंडलेस बचपन से ही जैक लंडन की किताबों से प्यार करता था। उसके पूंजीवादी समाज की भर्त्सना के साथ, आदिम जीवन के सौंदर्यबोध ने मैकेंडलेस के अंदर जुनून भर दिया था। जैक लंडन के अलास्का के वर्णन से मोहित मैकेंडलेस उसके किताबों को बार-बार पढ़ता था। वह भूल चुका था कि ये सब साहित्य में रची गई कल्पना है, जिसका संबंध जैक लंडन की रुमानी फैंटेसी से ज्यादा है, जबकि आर्कटिक क्षेत्र के जीवन की हकीकत कुछ और है। मैकेंडलेस ने इस तथ्य को भी नजरअंदाज कर दिया था कि जैक ने सिर्फ एक जाड़ा, अलास्का में बिताया था। जैंक लंडन शराबी था और उसकी खुद की जिंदगी की हकीकत उसके किताबों में लिखी आदर्शों से कोसों दूर थी।

निलांद स्लैब में एक सत्रह बरस की लड़की भी रहने आयी थी जिसका नाम ट्रेसी था। वह मैकेंडलेस से प्यार करने लगी थी। जेन उस वाकये को याद करते हुए बोली, ”वह बहुत सुंदर और अच्छी थी और उसके मां-बाप की गाड़ी हमसे चार गाड़ी बाद लगी थी। बेचारी ट्रेसी ने एलेक्स के साथ निराश कर देने वाला इश्क करना शुरू किय़ा। हमेंशा वह एलेक्स को एकटक देखती रहती। मुझे वो कहती रहती एलेक्स को वो उसके साथ घूमने जाने को कहे। एलेक्स उसके साथ अच्छे से पेश आता था। लेकिन उसे छोटी बच्ची समझता था। ट्रेसी अपना टूटा दिल लेकर रह गई। हलांकि एलेक्स ने ट्रेसी के प्यार पर कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन ऐसा नहीं था कि वह तन्हा रहता था। वह अपने आसपास के लोगों से खूब बातें करता था लगभग सात दर्जन लोगों को उसने दोस्त बनाया था। वह तन्हाई चाहता था लेकिन उसकी प्रवृति साधुओं जैसी नहीं थी। वह सबसे मिलता-जुलता था।

”जेन ने कहा कि मैकेंडलेस उसके साथ हमेशा हंसता-खेलता रहता था। “उसे मुझे परेशान करने में मजा आता था। जब मैं कपड़ा सूखने के लिए रस्सी पर टांगने जाती थी तो मेरे कपड़ों में वह पेपर पिन लगा देता था। वह बच्चे की तरह मुझसे खेलता रहता था। वह मेरे पिल्लों को लांड्री बास्केट में रख देता था और पिल्ले चिल्लाते-चिल्लाते उस बास्केट से उछलकर निकलने की कोशिश करते थे। मैं जब परेशान होकर मैकेंडलेस पर चिल्लाती थी तब जाकर वह रूकता था। उसके बाद पिल्ले उसके आसपास मंडराते थे और उसे खोजते रहते थे। एलेक्स जानवरों से भी घुल-मिल जाता था।”

एक दिन मैकेंडलेस किताब की दुकान पर बैठा था कि कोई जेन को एक गिटार दे गया, बेच देने के लिए। “एलेक्स उसे उठाकर बजाते हुए गाने लगा और उसे सुनने के लिए भीड़ जुट गई। उसकी आवाज बहुत सुंदर थी। तब तक मैं ये बात नहीं जानती थी“, जेन ने कहा।

मैकेंडलेस हमेंशा सबसे अलास्का जाने की बात किया करता था। वह रोज सुबह कसरत किया करता था। बॉब से हमेंशा देहातों में जिंदा रहने के तौर-तरीके पर लम्बी-चौड़ी बातें किया करता था। जेन बोली,”मैं सोचती थी कि एलेक्स का दिमाग खराब हो गया था, जब वह अलास्का की बर्फीली वादियों में जाकर कुछ दिन बिताने की बात करता था। एलेक्स ने अपने मां-बाप के बारे में कभी नहीं बताया। मैं पूछती थी कि तुम जो कर रहे हो, उसके बारे में तुम्हारे मां-बाप या परिवार में और किसी को मालूम है कि नहीं। वह जबाव नहीं देता था। वह मुझपे गुस्सा हो जाता था और कहता था कि मैं उसकी मां बनने की कोशिश ना करूं। बॉब उधर से कहता कि एलेक्स को अकेला छोड़ दो। वह आदमी हो चुका है, अब बच्चा नहीं रहा। लेकिन मैं उससे पूछती रहती थी और वह बातचीत का विषय बदलने की कोशिशें करता रहता था। मैं चाहती थी कि उसका कोई देखभाल करने वाला हो, अभी तो मैं उसकी देखभाल कर रही थी।“

“मैकेंडलेस एक बार टेलीविजन पर फुटबाल मैच देख रहा था और मैंने देखा कि वह अमेरिकन आदिवासी खिलाड़ियों का पक्ष ले रहा है। मैंने उससे पूछा कि “क्या तुम ईसा के जन्म से भी पहले का आदमी हो?” तो उसने कहा कि “हां, मैं हूं“। और यही आदिमता उसके मनस में बसी रहती थी।“

एक दिन  मैकेंडलेस ने कहा कि अब उसके जाने का वक्त आ चुका है। उसने कहा कि वह निलांद से पचास मील पश्चिम, साल्टन सिटी जाएगा। मैकडोनाल्ड वालों से उसे पेमेंट भी लेना था। जेन ने उसे वहां तक गाड़ी से छोड़ देने की बात कही जिसे मैकेंडलेस ने स्वीकार किया लेकिन जब जेन ने उसे कुछ पैसे देने की कोशिश की तो वह गुस्सा हो गया। जेन ने उससे कहा था,”इस दुनिया में जीने के लिए पैसे की जरूरत पड़ती है।“ लेकिन उसने जेन की एक न सुनी। जेन ने उससे कहा,” तो फिर ये चाकू रख लो। इसे तुम आसानी से अलास्का ले जा सकते हो और जब कभी पैसे की जरूरत पड़े तो उसे बेच कर कुछ पैसा पा सकता हो।“

बहुत बहस करने के बाद जेन, मैकेंडलेस को कुछ सामान स्वीकार करवाने में सफल रही जिसमें कुछ लम्बे अंडरवियर और गर्म कपड़े थे, जिसके बारे में जेन का सोचना था कि उसे अलास्का के सर्दी में इन सब चीजों की जरूरत पड़ सकती थी। “उसने मुझे खुश करने के लिए ये सब स्वीकार कर लिया था लेकिन जब वह चला गया तो हमने इन सब कपड़ों को अपने गाड़ी में पड़ा पाया। एलेक्स बहुत अच्छा था, लेकिन कभी-कभी मुझे पागल सा कर देता था।“

जेन कह रही थी, “मैकेंडलेस अपने आप में सबसे अलग सा था। मैं सोचती थी कि अंत में सुरक्षित वापस लौट आएगा। क्योंकि वह बुद्धिमान था। उसने मैक्सिको तक की यात्रा डोंगी से कर डाली थी। वह माल ढोने वाले ट्रेनों में बैठकर सफर कर लेता था। वह अपने लिए अकेला ही काफी था। इसलिए मैं सोचती थी कि अलास्का से भी वह ठीक-ठाक लौटेगा।“

किसी ने तब तक अपने अंदर के जीनियस को नहीं पहचाना, जब तक उसके जीनियसनेस ने उसे भटकाव के रास्ते पर नहीं डाला। हां, भटकने का परिणाम ये जरूर होता है कि शरीर कमजोर हो जाता है, फिर भी इस पर कोई दुख नहीं व्यक्त कर सकता क्योंकि जिंदगी उस पल अपने उच्च अस्तित्व को तलाशती रहती है। अगर दिन और रात ऐसे हों, जिसका आप हमेशा खुशी से स्वागत करें, जीवन फूलों की खुशबू बिखेरे, इसमें तारों की जगमगाहट हो- तो यही जीवन अमर और सफल है।

जीवन की इस बड़ी सफलता के प्रशंसक नहीं मिलते क्योंकि उसके अस्तित्व पर सबको संदेह होता है। लेकिन वही उच्च अस्तित्व मेरे लिए परम सत्य है और वही रोज मेरे जीवन की प्राप्ति भी। मेरी ये प्राप्ति उतनी ही रहस्य भरी है जितनी कि सुबह और शाम की रौशनी का सौंदर्य। अपने लिए ब्रह्मांड से कुछ लेता हूं, जैसे इंद्रधनुष का कोई टुकड़ा अपने दामन से पकड़ता हूं। (हेनरी डेविड थोरो की किताब लाइफ इन दी वुड्स से उद्धृत। मैकेंडलेस के पास मिली इस किताब में ये पंक्तियां चिह्नित की गई थीं)।

4 जनवरी, 1993 को इस किताब (Into the wild) के लेखक को एक अंजाने की चिट्ठी मिली जिसमें टेढे- मेढे अक्षरों में कुछ लिखा था, जिसकी लिखावट बताती थी कि चिट्ठी का लेखक शायद कोई बूढा है। चिट्ठी में ये लिखा थाः-

‘मैं उस मैगजीन की कॉपी चाहता हूं जिसमें एक नौजवान के अलास्का में मरने की स्टोरी छपी है। मैंने मार्च 1992 को एलेक्स को साल्टन सिटी से ग्रांड जंक्शन तक छोड़ा था। उसने कहा था कि वह संपर्क में रहेगा। उसने अंतिम चिट्ठी मुझे अप्रील 1992 में लिखी थी। जब तक हमारे साथ रहा तब तक उसने अपने कैमरे से अपनी और मेरी तस्वीरें ली थी। अगर आपके पास उस मैगजीन की कॉपी है तो मुझे भेज दीजिए, पैसे मैं भेज दूंगा….रोनाल्ड फ्रांज।’

जिस स्टोरी के बारे में रोनाल्ड फ्रांज ने लिखा था, वह आउटसाइड मैगजीन के जनवरी 1993 वाले अंक में छपा था। मैकेंडलेस अपनी आवारगी के रास्ते में जिस-जिस से मिला था उसपर ना भूलने लायक प्रभाव छोड़ा था। उनमें से कुछ लोगों ने तो उसके साथ सिर्फ चंद दिन बिताए थे। मैकेंडलेस से सबसे ज्यादा प्रभावित होना वाला शख्स था रोनाल्ड फ्रांज, अस्सी बरस का बूढा जिसने उसे जनवरी 1992 को रास्ते में अपने ट्रक में पहली बार लिफ्ट दिया था।

निलांद  में जेन से विदा लेने के बाद मैकेंडलेस साल्टन सिटी पहुंचा और वहां के रेगिस्तान में अपना कैंप लगा दिया। पूरब में साल्टन सी था, जो शांत और छोटा सा समंदर था, जिसकी सतह समुद्री सतह से 200 फीट ऊपर थी। यह समंदर 1905 में इंजीनयरिंग की एक बड़ी गलती से बना था। कोलोराडो नदी से इंपेरियल वेली घाटी के खेतों की सिंचाई के लिए एक नहर निकाली गई थी। नदी में आयी बाढ का सारा पानी नहर में बहकर साल्टन सिंक(बहुत बड़ा गहरा क्षेत्र) में जमा होने लगा। दो साल तक जमा हो रहे पानी के बाढ ने वहां के सारे खेतों और बस्तियों को डूबा दिया और चार सौ मील के दायरे में रेगिस्तान को समंदर में बदल दिया।

कैलिफोर्निया  के पाम स्प्रिंग्स से, हरे-भरे पेड़ों के बीच से होकर जाते रास्ते पर पचास मील दूर साल्टन सी के पश्चिमी किनारे की जमीन पर रियल स्टेट वालों की नजर गई। टूरिस्टों के लिए आरामदेह रिसोर्टों को बनाने के साथ, बाजार सहित और सारी चीजें वहां बनाने की प्लानिंग की गई। लेकिन काम अधूरा ही रहा। अब वहां पर जो भी खंडहरनुमा चीजें बची थी, उसे भी रेगिस्तान धीरे-धीरे अपने में फिर से समाता जा रहा था। वहां की सड़कों पर पेंड़ों की टूटी टहनियां हवाओं में इधर-उधर घूमती रहती थी । किनारे से एक कतार में लगे ‘फॉर सेल (बिकाऊ है)’ का साइनबोर्ड सूरज की गरमी से मिटता जा रहा था और खाली पड़े बिल्डिंगों का रंग भी उख़ड़ता जा रहा था। ‘साल्टन सी रियल्टी एंड डेवलपमेंट’ के दफ्तर के ऊपर ‘बंद’ लिखी तख्ती टंगी थी। इस पूरे क्षेत्र में पसरे सन्नाटे को सिर्फ हवा के झोंके की आवाज तोड़ते थे। साल्टन सी के किनारे से दूर जाती जमीन उंची उठती चली जाती थी और ‘अंजा बोरेगो’ के विशाल, बंजर और सूखे रेगिस्तान में बदल जाती थी। इसके शुरुआती निचले हिस्से में यह उजाड़ बस्ती थी, जिसे एक बरसाती नदी काटती थी। यहीं से थोड़ी ऊंचाई की ओर जाने पर, सूरज की रोशनी के सामने वाले हिस्से पर इंडिगो और बारह फुट ऊंची ओक्टिलो की झाड़ियां थी। मैकेंडलेस यहीं बालू पर झाड़ियों के नीचे एक प्लास्टिक के नीचे सोता था। जब भी उसे जरूरत पड़ती, वह वहां से चार मील दूर पैदल या लिफ्ट लेकर शहर जाता था और चावल खरीदकर, एक प्लास्टिक जग में पानी भरकर फिर वापस लौट आता था। जनवरी के बीच में एक गुरुवार को वह जग में पानी भरकर वापस लौट रहा था कि एक बूढे आदमी, रोनाल्ड फ्रांज ने उसे अपनी गाड़ी में बिठा लिया।

“तुम्हारा कैंप कहां है?” फ्रांज खोज-बीन करने लगा।

“ओह माय गॉड गर्म झरने के बाद”, मैकेंडलेस ने जबाब दिया।

“मैं इस इलाके में छह साल से रह रहा हूं। मैंने तो कभी ऐसी जगह का नाम नहीं सुना। मुझे वहां ले चलो।“

बोरेगो रेगिस्तान से साल्टन के रास्ते से होते हुए मैकेंडलेस ने बायीं ओर रेगिस्तान में गाड़ी को मोड़ने के लिए कहा। वहां से नीचे की तरफ एक मील आगे चलने के बाद अजीब सा कैंप लगा था, जहां लगभग दो सौ लोग सर्दी बिताने आए हुए थे। उनमें से कुछ लोग वहां नंगे घूम रहे थे। वहां बीच में एक गर्म पानी का कुंआ था। जिससे दो पाईप के द्वारा पानी लाकर पत्थरों से घिरे छोटे-छोटे गड्ढे भरकर तालाब बनाए गए थे, जिससे गर्म पानी का भाप उठ रहा था। यही था ओह माय गॉड गर्म झरना।

मैकेंडलेस उस गर्म झरने के पास नहीं रहता था। उससे भी दो मील आगे उसका कैंप था। फ्रांज, एलेक्स से कुछ बात करते हुए उसको कैंप तक छोड़कर वापस शहर लौटा, जहां वह एक मकान में अकेले रहता था। फ्रांज ने अपनी जिंदगी का अधिकांश हिस्सा आर्मी में रहते हुए शंघाई और ओकिनावा में बिताया था। 1957 की पहली जनवरी की शाम को उसकी बीबी और इकलौते बच्चे की मौत एक शराबी के गाड़ी से कुचलकर हो गई, उस वक्त वह देश से बाहर था। फ्रांज का बेटा अगले जून तक मेडिकल ग्रेजुएशन पूरा करने वाला था। फ्रांज ने इस दुख में अपने आपको ह्विस्की में डूबो दिया। छह महीने बाद वह खुद को संभालने और शराब छोड़ने में कामयाब रहा। लेकिन वह कभी भी इस दुख से उबर नहीं पाया। सालों बाद उसने अपने अकेलेपन से मुक्ति पाने के लिए बच्चों को गोद लेना शुरू कर दिया। अब तक उसने चौदह बच्चे गोद लिए थे जिसमें से एक फिलाडेल्फिया में और एक जापान में मेडिसीन पढ़ रहे थे।

जब फ्रांज मैकेंडलेस से मिला तो उसकी वही अतृप्त पिता की भावना जग गई। वह इस नौजवान को अपने दिलोदिमाग से नहीं निकाल पाया। लड़के ने अपना नाम एलेक्स बताया था और सरनेम बताने से इंकार किया था। उसने अपना घर वेस्ट वर्जीनिया बताया था। वह विनम्र था। फ्रांज को वह दिखने से ही तेज लड़का लगता था। उसने सोचा कि वह इतना अच्छा होते हुए भी इस झरने के पास इन न्यूडिस्टों, शराबियों और नशेड़ियों के बीच क्यूं जी रहा है? रविवार को चर्च में प्रार्थना करने के बाद फ्रांज ने तय किया कि एलेक्स से बात कर पूछेगा कि वह ऐसा जीवन क्यूं जी रहा है। उसने सोचा कि एलेक्स को वह समझाएगा कि वह पढे़, नौकरी करे और जीवन का कुछ सदुपयोग करे। जब फ्रांज, मैकेंडलेस के कैंप पहुंचा और वहां उसे सुधारने के लहजे में बोलना शुरू किया तो मैकेंडलेस ने उसे बीच में रोक दिया।

“सुनो, मिस्टर फ्रांज, तुमको मेरी चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। मैंने कॉलेज की पढ़ाई की है। मैं बेघर नहीं हूं। मैं यह जीवन अपनी मर्जी से जी रहा हूं।“ इसके तुरंत बाद एलेक्स अपनी आवाज की कड़वाहट खत्म कर फ्रांज के साथ गर्मजोशी से बोलना शुरू किया। दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे। जैसे ही दिन बीता, वे दोनों पाम स्प्रिंग्स की तरफ फ्रांज की ट्रक से गए। वहां एक रेस्टूरेंट में खाना खाया। फिर ट्रामवे से सैन जा सिन्टो की चोटी पर दोनों पहुंचे। अगले कुछ सप्ताह तक मैकेंडलेस और फ्रांज ने एक दूसरे के साथ काफी समय बिताया। एलेक्स अपना कपड़ा साफ करने और मांस पकाकर खाने के लिए अक्सर फ्रांज के यहां आया करता था। उसने फ्रांज को यह बता दिया कि वह बसंत तक यहां रुकेगा, फिर उसके बाद अपने सबसे बड़े साहसिक, अलास्का यात्रा पर निकलेगा। उसके बाद एलेक्स ने अस्सी साल के बूढे़ को लेक्चर देते हुए उसको सुस्त से अस्तित्व से निकलकर सड़क की जिंदगी जीने की सलाह दे डाली। उसने फ्रांज से अपना सारा सामान बेच देने और एपार्टमेंट छोड़ देने को कहा। फ्रांज उस लड़के का साथ पाकर बहुत प्रसन्न था।

फ्रांज चमड़े की चीजें बनाने के काम में मास्टर था। उसने एलेक्स को अपनी कला का रहस्य बताया और सिखाया। पहले काम के रुप में मैकेंडलेस ने अपना लेदर बेल्ट बनाया जिसके ऊपर उसने अपने आवारगी किए हुए जगहों को दर्शाया। बेल्ट के बांयी छोर पर एलेक्स लिखा, उसके बाद ‘सीजेएम’ यानि क्रिस्टोफर जॉनसन मैकेंडलेस। गाय के चमड़े से बने उस बेल्ट पर एक ‘नो यू टर्न’ का चिह्न, कार को डूबोती हुई बाढ और कड़कती हुई बिजली, लिफ्ट के लिए उठा अंगूठा, एक चील, सियरा नेवाडा, प्रशांत महासागर में तैरता सालमोन, प्रशांत के किनारे से गए हाइवे से आरेगॉन से वाशिंगटन, पहाड़ें, मोंटाना के गेंहू के मैदान, साउथ डाकोटा, वेस्टरबर्ग का कार्थेज में घर, कोलोराडो नदी, कैलिफोर्निया की खाड़ी, टेंट के किनारे पड़ी डोंगी, लास वेगास, मोरो बे, एस्टोरिया दर्शाया और बेल्ट के दूसरे छोर पर बक्कल के पास लिखा, एन(N) यानि शायद नार्थ। अपने पीछे मैकेंडलेस द्वारा छोड़ा गया यह बेल्ट रचनात्मकता और कला के अद्भुत नमूना है।

फ्रांज मैकेंडलेस से बहुत प्यार करने लगा था। “वह स्मार्ट बच्चा था।“फ्रांज ने दुखी स्वर में कहा। इतना कहते हुए फ्रांज अपने दोनों पैरों के बीच पड़े रेत के टुकड़े की ओर देखने लगा। उसने बोलना बन्द कर दिया। अपने कमर के सहारे किसी तरह झुककर वह अपने पैंट के निचले हिस्से के धूल को झाड़ने लगा। उसके झुकने से पुरानी हड्डियां के जोड़ के कड़कने की आवाज, शांत माहौल में गूंज गया। कुछ मिनट बाद फ्रांज ने फिर से बोलना शुरू किया। आकाश की तऱफ आंखे छोटी कर देखते हुए फ्रांज उस लड़के साथ बिताए गए पलों को याद करना शुरू किया। फ्रांज ने कहा कि कभी-कभी मैकेंडलेस का चेहरा, गुस्से से काला होने लगता था और वह मां-बाप, नेताओं और अमेरिकी समाज की मानसिकता की आलोचना करता था। लड़का उसे छोड़कर चला न जाय, इसलिए फ्रांज बस चुपचाप सुनता रहता था और उसे बोलने देता था। फरवरी में एक दिन सुबह अचानक मैकेंडलेस ने सैन डियागो जाने की घोषणा कर दी और कहा कि वह अलास्का ट्रिप के लिए कुछ पैसे कमाना चाहता था।

“तुमको सैन डियागो जाने की जरूरत नहीं है।“फ्रांज विरोध करते हुए बोला। “तुमको जितने पैसे चाहिए, मुझसे ले लो।“

“नहीं मैं सैन डियागो जाऊंगा और मैं सोमवार को जा रहा हूं।“

“ठीक है, तो मैं तुमको वहां तक छोड़ दूंगा।”

“बेकार की बातें मत करो।“ मैकेंडलेस फ्रांज के प्रस्ताव से सहमत नहीं था।

“मुझे उधर कहीं जाना है। चमड़े के सप्लाई के सिलसिले में।“ फ्रांज ने बहाना बनाते हुए कहा।

यह सुनते ही मैकेंडलेस ने अपने व्यवहार के लिए माफी मांगी। उसके बाद वह कैंप गया और अपना सारा सामान फ्रांज के अपार्टमेंट में ले आया। मैकेंडलेस अब अपना बैग आगे नहीं ढोना चाहता था। फ्रांज की गाड़ी से वह पहाड़ों को पार करते हुए समुद्री किनारे तक आया। फ्रांज ने उसे सैन डियागो के पास उतारा, तब बारिश हो रही थी। “मेरे लिए यह काफी कठिन काम था। उसके जाने से मैं काफी दुखी था।“ फ्रांज बोला।

19 फरवरी  को मैकेंडलेस ने फ्रांज को फोन किया, उसके 81वें जन्मदिन की बधाई देने के लिए। मैकेंडलेस को यह तारीख याद रही क्योंकि खुद उसका जन्मदिन सात दिन पहले पड़ता था। 12 फरवरी को वह चौबीस साल का हो चुका था। इस बातचीत के दौरान मैकेंडलेस ने स्वीकार किया कि उसे सैन डियागो में काम खोजने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था।

28 फरवरी  को उसने जेन को चिट्टी  में लिखाः- ‘हेलो जेन, पिछले सप्ताह सैन डियागो की गलियों में भटक रहा था। पहले दिन तो बहुत बारिश हुई। नौकरी नहीं मिल पा रही। इसलिए मैं उत्तर की तरफ कल जा रहा हूं। 1 मई से पहले मैं अलास्का जाने की योजना बना चुका हूं। लेकिन मुझे कपड़े खरीदने के लिए कुछ पैसों की जरूरत है। हो सकता है कि मैं साउथ डाकोटा में अपने एक दोस्त के पास लौट जाऊं और वहीं काम करूं। अभी कहां जाऊंगा, मालूम नहीं। जहां जाऊंगा, वहां पहुंचकर पत्र लिखूंगा। आशा करता हूं कि वहां तुम सब ठीक से होगे। एलेक्स।

5 मार्च को मैकेंडलेस ने एक दूसरा पत्र जेन को लिखा और एक पत्र फ्रांज को भी। जेन को उसने लिखाः- ‘सिएटल में हूं। आवारा हूं यहां पर। रेल से सफर करता हूं। लेकिन रेल से सफर करने के कुछ नुकसान हैं। पहला तो ये कि शरीर धूल से भर जाता है। दूसरा, रास्ते में ट्रेन गार्डों से उलझना पड़ता है। कल मैं एक मालगाड़ी में बैठा जा रहा था। जब लगभग 10 बजे मुझे टार्च की तेज रौशनी में एक गार्ड ने पकड़ लिया। उसने कहा, “यहां से जाओ वरना जान से मार दूंगा।“ मैंने देखा कि उसके हाथ में रिवाल्वर था। उसने मेरी तलाशी ली। उसके बाद फिर गुर्राया, ”इस ट्रेन के आसपास मत दिखना वरना जान से जाओगे। जाओ, रास्ता नापो।“ कितना पागल था वह। मैं हंसा और उसी ट्रेन पर पांच मिनट बाद फिर से चढ गया और ऑकलैंड पहुंच गया। मैं पत्र लिखता रहूंगा। एलेक्स।‘

एक सप्ताह बाद फ्रांज का फोन बजा। “आपरेटर का फोन था।“ फ्रांज ने बताया। “ उसने कहा कि क्या वह किसी एलेक्स नाम के लड़के से बात करना चाहेगा। जब मैंने एलेक्स की आवाज सुनी तो वह बारिश के मौसम में सूरज की रौशनी की तरह था।“

“मुझे लेने आओगे।“ मैकेंडलेस ने पूछा।

“हां, कहां हो सिएटल में।“

“रॉन”, मैकेंडलेस हंसा,” मैं सिएटल में नहीं हूं। कैलिफोर्निया में हूं। तुम्हारे सड़क पर।“

नौकरी नहीं मिल पाने के कारण मैकेंडलेस कई मालगाड़ियों की सवारी करते हुए फिर से रेगिस्तान में पहुंचा था। कैलिफोर्निया के कॉल्टन में उसे एक गार्ड ने फिर पकड़ लिया और जेल में डाल दिया। जेल से छूटने पर वह पाम स्प्रिंग के दक्षिण में पहुंचकर फ्रांज को फोन किया था। जैसे ही मैकेंडलेस ने फोन रखा, फ्रांज उसे लेने निकल पड़ा।

“हम दोनों सिजलर गए और वहां मैंने उसे स्टिक और लोबस्टर खिलाया। उसके बाद हम साल्टन सिटी लौट आए।“ फ्रांज ने याद किया। मैकेंडलेस ने कहा कि वह सिर्फ एक दिन रुकेगा। अपना कपड़ा साफ करेगा और अपना बैग पैक करेगा। वायन वेस्टरबर्ग ने उसे कार्थेज काम करने के लिए बुलाया था और मैकेंडलेस वहां पहुंचने के लिए बेसब्र था। 11 मार्च, 1992, बुधवार का दिन था वह।

फ्रांज  ने मैकेंडलेस से कहा कि उसे वह ज्यादा से ज्यादा कैलिफोर्निया के ग्रांड जंक्शन तक छोड़ देगा क्योंकि फिर उसे लौटकर सोमवार को साल्टन सिटी में एक जरूरी आदमी से मिलना था। मैकेंडलेस के स्वीकार करने पर फ्रांज ने राहत की सांस ली। जाने से पहले फ्रांज ने उसे एक बड़ा सा चाकू, एक फर कोट और अलास्का के लिए कुछ जरूरी सामान दिया। ट्रक से गुरुवार को साल्टन सिटी से दोनों चले। बुलहेड सिटी में रूककर मैकेंडलेस ने बैंक में अपना खाता बंद करवाया और फिर दोनों चार्ली के ट्रेलर तक गए, जहां मैकेंडलेस ने अपनी कुछ किताबें, सामान और फोटोफाईल रखा था। मैकेंडलेस उसके बाद फ्रांज को लंच के लिए लौघलिन के गोल्डेन नगेट कैसिनो ले गया जहां एक वेट्रेस ने उसे पहचान लिया,”एलेक्स, एलेक्स! तुम फिर वापस आ गए।“

फ्रांज  ने इस ट्रिप से पहले एक वीडियो कैमरा खरीदा था, जिससे  वह रास्ते भर दृश्यों की फिल्में  बनाता गया। जब भी फ्रांज उसकी तरफ कैमरा करता, मैकेंडलेस नीचे की तरफ झुक जाता, फिर भी कुछ दृश्य उसके भी फ्रांज के कैमरा में कैद हो ही गए। इसी तरह के एक फूटेज में मैकेंडलेस बर्फ के ढेर पर ख़ड़ा था और कह रहा था, “चलो, ऱॉन”। वह फिर कुछ देर बाद वीडियो कैमरा का विरोध करते हुए कहता था,”आगे और भी बहुत कुछ है, रॉन।“ जीन्स और गर्म स्वेटर पहने हुए मैकेंडलेस सांवला, मजबूत और स्वस्थ लग रहा था। फ्रांज ने कहा कि यह यादगार ट्रिप था। “कभी हम बिना बोले घंटो ड्राईव करते रहते। जब वह सो रहा होता तब भी मैं खुश रहता ये सोचकर कि वो मेरे आसपास तो है।“

रास्ते  में फ्रांज ने मैकेंडलेस से अपने दिल की एक खास मुराद कही, “ मेरी मां, अपने मां-बाप की इकलौती संतान थी। मेरे पिता भी अपने मां-बाप के इकलौते थे। मैं भी उनका इकलौता बेटा था। मेरे इकलौते बेटे की मौत हो चुकी है। अब मैं इस वंश में अकेला रह गया हूं। अगर मैं भी मरा तो मेरा परिवार खत्म हो जाएगा। एलेक्स अगर मैं तुमको गोद लूं तो तुम मेरे पोते कहलाओगे।“

मैकेंडलेस उसके इस प्रस्ताव से विचलित हो उठा। और उसने मामले को टालने के लिए कहा, ”रॉन, अलास्का से मैं लौटता हूं, फिर इस विषय पर बात होगी।“

14 मार्च को ग्रांड जंक्शन के इंटरस्टेट 70 के किनारे एलेक्स को उतारकर फ्रांज दक्षिणी कैलिफोर्ऩिया लौट आया। मैकेंडलेस फिर से उत्तर की तरफ जाते हुए रोमांचित था और वह इस बात से खुश था कि एक बार फिर उसने मानवीय रिश्तों के खतरों से खुद को बचाने में सफलता हासिल की, जो अपने साथ कई भावनात्मक बोझ लिए हुए आती थी। वह अपने परिवार के कैद से फरार हो गया। उसके बाद उसने जेन, बॉब और वायन वेस्टरबर्ग को भी खुद से कुछ दूर रखने में सफलता पायी और उसके बाद तुरंत किसी को छोड़कर चल देना ताकि उससे किसी को अपेक्षा ना रहे। और अब रॉन, फ्रांज की भी जिंदगी से भी बिना किसी दर्द के बाहर निकल आया था।

फ्रांज  मैकेंडलेस के साथ क्यूं इतना दिल लगा बैठा था, इस बारे में कोई बस अनुमान लगा सकता है। लेकिन फ्रांज का उससे प्रेम सच्चा, पवित्र और काफी इंटेंस था। फ्रांज काफी सालों से अकेला रह रहा था। उसके पास न तो परिवार था और न ही कोई दोस्त। अनुशासित और स्वतंत्र फ्रांज इस उम्र में भी अच्छी तरह से जी रहा था। जब मैकेंडलेस उसकी जिंदगी में आया तो उसने इस बूढे आदमी के जीवनशैली के विचारों को चुनौती दिया। फ्रांज मैकेंडलेस के विचारों से प्रभावित हुआ लेकिन इसके साथ ही उसे यह भी महसूस हुआ कि वह कितना अकेला था। उस बूढे के मन के खालीपन को एलेक्स ने आकर भर दिया। जब वह वहां से अचानक जाने लगा तो उसके इस अचानक उठाए गए कदम से फ्रांज का दिल बुरी तरह से आहत हुआ।

अपैल में साउथ डाकोटा से फ्रांज के पास मैकेंडलेस की एक लम्बी चिट्ठी आई, जिसमें लिखा थाः-‘हेलो रॉन,! एलेक्स लिख रहा हूं। मैं यहां साउथ डाकोटा के कार्थेज में दो सप्ताह से हूं। ग्रांड जंक्शन से चलकर तीन दिनों में मैं यहां पहुचा था। आशा करता हूं कि तुम साल्टन सिटी बिना किसी समस्या के पहुंच गए होगे। मैं यहां काम करके खुश हूं। सब ठीक चल रहा है। मौसम ज्यादा खराब नहीं रहता, कभी कभी तो आश्चर्यजनक रुप से बढिया रहता है। दक्षिण कैलिफोर्निया में तो अभी काफी गर्मी पड़ रही होगी। मुझे आश्चर्य होगा अगर तुम बाहर निकलने की फुर्सत पाओगे और गर्म झरने के पास जाकर देखोगे कि कितने आदमी 20 मार्च को वहां पर इंद्रधनुष देखने के लिए जमा हो रहे हैं। ऐसा लगता कि वहां खूब मस्ती होगी लेकिन मैं नहीं सोचता कि तुम ऐसे लोगों को अच्छी तरह समझ पाओगे। मैं साउथ डाकोटा में ज्यादा दिन नहीं रहने जा रहा। मेरा मित्र वेस्टरबर्ग चाहता है कि मैं मई तक यहीं ग्रीन एलीवेटर पर काम करूं और उसके बाद पूरी गर्मी उसके साथ दूसरी जगह जाकर यही काम करूं। लेकिन मेरी आत्मा तो पूरी तरह से अलास्का जाने के लिए बेचैन है।

मैं 15 अप्रैल से पहले यहां से निकल जाऊंगा। मुझे नीचे लिखे पते पर पत्र लिखना। रॉन, तुमने जो मेरी इतनी सहायता की, हमदोनों ने जो समय साथ गुजारा, उसने मुझे बहुत सुख दिया। मैं आशा करता हूं कि मुझसे अलग होकर तुम बहुत ज्यादा दुखी नहीं होगे। हो सकता है कि हम दोनों को एक दूसरे से फिर से मिलने में बहुत वक्त लग जाय। लेकिन इस अलास्का यात्रा के बाद तुम मेरी आवाज जरूर सुनोगे। मैं फिर से तुमको ये सलाह देना चाहूंगा कि अपने जीवन में पूरी तरह परिवर्तन लाओ, और उन चीजों के बारे में मजबूती के साथ सोचना शुरू कर दो जिसे तुमने पहले करने का कभी नहीं सोचा या उसे करने से हिचकते रहे। इतने सारे लोग दुखी जीवन जीते हुए भी अपने दुख को कम करने के लिए कोई कदम नहीं उठा पाते क्योंकि वह सोचते हैं कि एक सुरक्षित जीवन, परम्परा के अनुसार जीने से उन्हें शान्ति मिलेगी और वह उसी में जीने के लिए अभिशप्त रहते हैं। लेकिन सच तो ये है कि एक साहसी आत्मा के लिए सुरक्षित जीवन से ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला चीज और दुनिया में कुछ नहीं है। मानव का जीवन साहस, जुनून के साथ आवारगी करने के लिए बना है। जीवन में आनंद नये अनुभवों से टकराने से मिलता है इसलिए अनंत आनन्द के जरूरी है कि जीवन के आकाश का क्षितिज हमेंशा बदलता रहे, जिस पर हर दिन हो एक नये सूरज का उदय। इसलिए रॉन अगर जीवन से कुछ और पाना चाहते हो अपने सुरक्षित जीवन के एकालाप से बाहर निकल आओ, अव्यवस्थित और आवारगी का जीवन शुरू करो, जो तुमको पहले पहल पागलपन सा लग सकता है। लेकिन जैसे ही तुम्हें इसकी आदत लग जाएगी, तब तुम इसके अर्थ और अमिट सौंदर्य का आनंद देखोगे। इसलिए रॉन, साल्टन सिटी से निकलकर रोड की जिंदगी जीना शुरू करो।

मैं गारंटी देता हूं कि तुम बहुत खुश होगे। लेकिन मुझे डर है कि तुम मेरी बात नहीं मानोगे। तुम सोचते हो कि मैं जिद्दी हूं लेकिन रॉन तुम मुझसे ज्यादा जिद्दी हो। तुम्र्हारे पास बहुत अच्छा मौका है कि तुम धरती के सबसे सुंदर दृश्य, ग्रांड कैनयोन, को जाकर करीब से देखो, जिसे हर अमेरिकन को जीवन में कम से कम एक बार देखना चाहिए। कुछ कारणों से, जो मेरी समझ से बाहर है, तुम और कुछ करना नहीं चाहते सिवाय जल्दी से जल्दी घर जाने के, उसी परिस्थिति में फिर से, जिसे तुम रोज-रोज देखते हो। मुझे डर है कि तुम इसी तरह भविष्य में भी जीते रहोगे और खुदा ने जो खूबसूरती इस धरती पर बिखेरी है, उसे खोजने में विफल रहोगे। एक जगह सेटल होकर मत रहो। आवारगी करो, आदिम मानव बन जाओ, हर दिन एक नया क्षितिज तलाशो। तुम अभी बहुत दिन जिंदा रहोगे, रॉन! और यह बड़े अफसोस की बात होगी अगर तुमने अपने जीवन को बदलने के अवसर गवां दिए या नये अनुभवों को नहीं खोज पाए तो। तुम गलत होगे अगर सोचोगे कि आनंद मानवीय रिश्तों से पाया जा सकता है। ईश्वर ने तो आनंद हर जगह बिखेरा है। यह हर चीज में और हर जगह है, जिसे हम अनुभव कर सकते हैं। इसे पाने के लिए बस करना ये है कि जो आदतन हम जीते रहते हैं उसे छोड़कर उससे अलग अव्यवस्थित किस्म का जीवन जीना शुरू करें। मेरा कहना ये है इस तरह की नयी खुशी की रौशनी पाने के लिए तुमको ना तो मेरी जरूरत है और ना ही किसी और की। वह खुशी बाहर तुम्हारा इंतजार कर रहा है, बस बाहर निकलो और उसे पकड़ लो। जो आदमी तुमको बाहर नहीं निकलने दे रहा, वह तुम खुद हो, तुम्हारी नये परिस्थितियों में ना जीने की जिद है।

रॉन, अपने गाड़ी पर कैंप लगाने लायक सामान लादकर साल्टन सिटी से बाहर निकलो और देखो पश्चिमी  अमेरिका की तरफ जाकर कि खुदा ने कितनी खूबसूरती रची है। तुम चीजों को देखोगे, लोगों से मिलोगे, काफी कुछ सीखोगे। और यह सब तुम कम से कम खर्च में करना। होटल में मत रूकना, अपना खाना खुद बनाना। जितना कम खर्च करोगे उतना ही आनंद पाओगे। मैं आशा करता हूं कि जब तुमसे मिलूंगा तो तुम बिल्कुल नए रूप में मिलोगे, तुम्हारे पास साहस के बहुत सारे अनुभव होंगे। सारे संकोच खत्म कर दो और बहाने बनाने बंद कर दो। बाहर निकलो और ये काम करना शुरू करो। तुम बहुत खुशी पाओगे।

अपना खयाल रखना, रॉन

नीचे लिखे पते पर पत्र लिखनाः-

एलेक्स  मैकेंडलेस

मेडिसन, SD 57042

आश्चर्यजनक  रूप से, उस अस्सी साल के बूढे ने चौबीस साल के आवारा  बच्चे की सलाह को दिल से मानना शुरू कर दिया। फ्रांज ने फर्नीचर और अधिकांश  सामान को स्टोर में रख दिया। कैंपिंग के लिए  एक बेड और अन्य जरूरत के सामान उठाकर वह चल पड़ा। उसने अपना अपार्टमेंट छोड़ दिया और रेगिस्तान में जाकर कैंप लगा लिया, उसी के पास जहां मैकेंडलेस रूका था।

उसी गर्म झरने के पास फ्रांज ने मैकेंडलेस की जगह को अपना लिया। उसने कुछ पत्थर को जमाकर अपनी गाड़ी के लिए पार्किंग क्षेत्र बना लिया। उसने आसपास इंडिगो की झाड़ियां और पौधे लगा दिए ताकि लैंडस्केप सुंदर हो सके। उसके बाद वह रेगिस्तान में रहते हुए अपने दोस्त का इंतजार करने लगा।

रोनाल्ड फ्रांज (उसका असली नाम कुछ  और था। उसने लेखक से अनुरोध किया था कि उसके असली नाम  का उपयोग नहीं किया जाय। इसलिए  लेखक ने उसे यह नाम दिय़ा है।) उम्र के नौवें दशक में होने के बावजूद दिखने से मजबूत लगता था, जो दो दिल के दौरे को झेल गया था। छह फीट लंबा, मोटी बाहें और चौड़ी छाती वाला यह बूढा जब खड़ा होता था तो एकदम सीधा, बिना कांधे को झुकाए हुए।

जब रेगिस्तान  के उस कैंप में लेखक उससे मिलने पहुंचा तो उस वक्त वह एक पुरानी जींस और उजली टी शर्ट, अपने द्वारा बनाया हुआ एक सुंदर सजावट वाला चमड़े का बैल्ट, उजले मौजे और एक पुराना सा जूता पहने था। भौंह के इर्द-गिर्द बनी झुर्रियां और नाक पर उभरी नसों, जो खूबसूरती से गढे गए टैटू की तरह लगते थे, से सिर्फ उस बूढे की उम्र का पता चलता था। मैकेंडलेस के मरने के एक साल पूरे हो चले थे।

फ्रांज  को लेखक ने अपना परिचय दिया और उसे विश्वास दिलाने के लिए उसे कुछ फोटो दिखाए  जिसमें उसने पिछली गर्मी में किए गए अलास्का यात्रा की अपनी तस्वीरें दिखाईं जिस दौरान उसने मैकेंडलेस के स्टेम्पेड ट्रेल की यात्रा की खोजबीन की थी। उसमें लैंडस्केप चित्र, ट्रेल, झाड़ियों के चित्र, दूर पहाड़ों और सुषाना नदी के चित्र। फ्रांज उन तस्वीरों को देखता रहा। लेखक तस्वीरों के बारे में बताता जा रहा था और फ्रांज कभी-कभी अपने सिर को समझने की मुद्रा में हिला रहा था। वह उन सबको देखकर खुश था। जैसे ही उस बस की तस्वीरें उसके सामने आयीं, उसकी नजर थोड़ी सख्त हो गई। जैसे-जैसे मैकेंडलेस के सामानों की तस्वीरें उसके नजर से गुजरने लगी, उसकी आंखे नम होने लगी। उसको एहसास होने लगा कि वह कितना दुखदायी चीज देख रहा है और आगे और किसी तस्वीर को देखे बिना उसने फोटो एलबम को अपने आगे से हटा दिया। अपने आपके शांत करने के लिए फ्रांज टहलने लगा।

फ्रांज  अब मैकेंडलेस वाले जगह पर नहीं रहता था। उस जगह तक जाने वाली सड़क को बाढ बहा ले गई थी और अब वह बोरेगो बंजरपट्टी की तरफ बीस मील पीछे चला आया था और कॉटनवुड पेड़ों के पास के एकांत में अपना कैंप लगा लिया था। ओह माय गॉड गर्म झरना को भी अब इंपेरियल वेली हेल्थ कमीशन के आदेश पर बुल़डोजर के द्वारा नष्ट कर उसे कंक्रीट से भर दिया गया था। कमीशन के अधिकारियों का कहना था कि उस झरने को इसलिए नष्ट कर दिया क्योंकि वहां नहानेवालों को गंभीर बिमारी होने का खतरा था। लेकिन साल्टन सिटी स्टोर के एक क्लर्क का कहना था कि उस झरने को इसलिए खत्म कर दिया क्योंकि वह बहुत सारे हिप्पियों और आवारा किस्म के लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता था।

मैकेंडलेस के जाने के आठ महीने बाद तक फ्रैंज वहीं कैंप में रहा जहां से वह एलेक्स के आने की राह देखा करता था। 1992 के आखिरी सप्ताह में उसने साल्टन सिटी से लौटते समय दो आवारों को अपने गाड़ी में बिठाया। फ्रांज ने याद करते हुए कहा,” उनमें से एक मिसिसीपी से और दूसरा नेटिव अमेरिकन था। गर्म झरने के पास से गुजरते हुए मैंने उसे एलेक्स और अलास्का जाने के बारे में बताया।“

अचानक उनमें से एक बोला,”क्या उसका नाम एलेक्स मैकेंडलेस था।“

“हां, बिल्कुल ठीक, क्या तुम उससे मिले हो”

“मुझे तुमसे ये कहना अच्छा नहीं लगा रहा है मिस्टर कि तुम्हारा दोस्त अब इस दुनिया में नहीं है। वह अलास्का के बर्फ में जमकर मर गया। विश्वास ना हो तो आउटसाइड मैगजीन पढ लो।“

फ्रांज  सहसा इस बात पर भरोसा नहीं कर पाया और उसने उससे लंबी पूछताछ की। जो भी उस आवारे ने बताया, सब सही था। फ्रांज को लगा कि कुछ बहुत ही गलत हो गया। अब, मैकेंडलेस कभी वापस नहीं लौटेगा। फ्रांज ने वाकये को याद करते हुए कहा,” जब एलेक्स वहां से जा रहा था तो उसने गॉड से प्रार्थना किया था कि यह बच्चा बहुत खास है, इसकी रक्षा करना। लेकिन गॉड ने एलेक्स को मरने दिया। 26 दिसम्बर को जब मैंने ये जाना, तब गॉड को मानना छोड़ दिया। मैंने चर्च की अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और नास्तिक हो गया। मैंने फैसला लिया कि जो गॉड एलेक्स जैसे बच्चे को इतनी बुरी तरह से मरने के लिए छोड़ सकता है, मैं उसमें विश्वास नहीं कर सकता।“

“जब मैंने उन आवारों को रास्ते पर उतारा, उसके बाद फिर वापस लौटकर, स्टोर से एक बोतल ह्विस्की खरीदी। रेगिस्तान में बैठकर मैं उसे पूरा पी गया। मुझे पीने की आदत नहीं थी इसलिए मैं बीमार हो गया। मैंने सोचा कि इस बिमारी से मर जाऊं तो अच्छा रहेगा लेकिन मैं नहीं मरा। जिंदा बचा रहा, बीमार और कमजोर।“

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबे क्रिस्टोफर ने खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। सारे पैसे दानकर, परिचय-पत्र फेंककर और परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी-घुमक्कड़ी का जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया। वहां जीवन की विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए जीवन की खोज जारी रखी। वह ऐसा क्यों बना… अलास्का में उसके साथ क्या हुआ.. यह सब-कुछ जॉन क्राउकर नाम के पत्रकार ने बहुत शोध के बाद अपने किताब ‘Into the wild’ में लिखा। सीन पेन ने इसी नाम से एक बेहतरीन फिल्म बनाई जो विश्व के सौ महान सिनेमा में गिनी जाती है। Into the wild’ का हिंदी में अनुवाद कर रहे हैं युवा पत्रकार राजीव कुमार सिंह। इसका पहला, दूसरा और तीसरा पार्ट आप लोग पढ़ चुके हैं। ये था चौथा पार्ट। राजीव ने इस उपन्यास का अनुवाद करके पत्रकारिता क्षेत्र में दस्तक दी है। उनके अनुवाद में कई कमियां-गल्तियां हैं, ऐसा उनका कहना है। पर इसे एक युवा पत्रकार का शुरुआती गंभीर प्रयास मानते हुए कमियों की अनदेखा की जाए, ऐसा वह अनुरोध करते हैं। राजीव की इच्छा है कि उनके परिचय में लिखा जाए- एक बेरोजगार पत्रकार जिसे एक अदद नौकरी की तलाश है। राजीव से संपर्क rajeevsinghemail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

Keep media out of lokpal purview, says Editors Guild

The Editors Guild of India on Friday favoured keeping the media out of the purview of the proposed anti-corruption watchdog, the Lokpal. A three-member team of the apex body of editors, which appeared before the parliamentary panel examining the Lokpal bill, stated that media in the country was broadly a “private body” and could not be covered by the anti-corruption watchdog.

The Guild was represented by its president TN Ninan, general secretary Coomi Kapoor and treasurer Suresh Bafna in the meeting with the parliamentary standing committee on law and justice.

Many MPs cutting across party lines, including those in the committee, have been demanding bringing the media and NGOs under the ambit of the proposed Lokpal.

In the meeting, some members are understood to have told the Guild representatives that there is no demand to bring the “news content” under the Lokpal, but only the “business content”, since media houses also buy assets likes land for their infrastructure.

Committee chairman Abhishek Singhvi is learnt to have stated that the Guild members put across their views “clearly and proactively.”

As many as 21 other organisations and individuals were also invited to appear before the committee on Friday, to state their views on the Lokpal issue. Courtesy: HT

थानाध्‍यक्ष ने ग्रामीणों पर चढ़ाई जीप, भड़के लोग, फूंका थाना, बिगड़ा माहौल, फायरिंग, पांच घायल

वैसे भी जिस बंदे के बदन पर खाकी होती है, उसके हाव-भाव-ताव सब अलग होते हैं. जनता उनके लिए कीड़े-मकोड़े से ज्‍यादा नहीं होती. खाकी बदन पर चढ़ते ही ये खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं और आईपीसी की धाराओं को अपनी रखैल. जब जैसा चाहा वैसा किया, फिर कानून की कमजोरी का फायदा उठाते हुए बच निकले. आज गाजीपुर जिले के बिरना थाने क्षेत्र में हुई घटना भी ऐसे ही एक पुलिस वाले की गुंडई तथा कानून से खुद को ऊपर समझने की मानसिकता का परिचायक है.

इस दारोगा का नाम है रणजीत राय. युवा है, जोश है, पर होश में कभी नहीं रहता है. यह खुद को दंबग का सलमान खान समझता है और जनता को भेड़-बकरी. पिस्‍टल दिखाने और चलाने का इसे बहुत ज्‍यादा ही शौक है. अब आते हैं कानून के इस दबंग के चलते बिगड़ी कानून-व्‍यवस्‍था की कहानी पर. जो बात थोड़ी समझदारी और नरमी से सलट सकती थी, वह इस दारोगा की दबंगई के चलते हादसा बन गई. घटना बन गई. पर इसका कुछ बिगड़ेगा इसकी उम्‍मीद ना के बराबर है. क्‍यों कि यह दबंग अपने अफसरों का काफी चहेता है. हां, जो घायल हुए हैं, जिनका बिगड़ा है वो अपने बारे में सोचे, अपना सोचे.

अब आते हैं मूल घटना पर. गाजीपुर जिले के बिरना थाना क्षेत्र का कबूतरी गांव. यहां के एक स्‍कूल के प्रबंधक तथा पेशे से शिक्षक धर्मेंद्र बिंद, उनकी लाश उनके ही स्‍कूल में फंदे से लटकी मिलती है. पुलिस को सूचना दी जाती है. शाम की घटना है, पर पुलिस रात को पहुंचती है. पहुंचते ही धर्मेंद्र की मौत को आत्‍म हत्‍या घोषित कर देती है. अब जब खाकी वालों ने आत्‍महत्‍या घोषित कर दिया तो फिर यह हत्‍या या कोई संदिग्‍ध मौत कैसे हो सकती है. आखिर इनके मुंह से निकले वाक्‍य खुद कानून जो बन जाते हैं. परिजन-ग्रामीण कहते हैं कि धर्मेंद्र की हत्‍या हुई है. वो मुकदमा दर्ज करने की बात करते हैं, पोस्‍टमार्टम कराने की बात करते हैं. पर जब खाकी ने एक बार कह दिया कि आत्‍महत्‍या तो फिर किसी और जांच का सवाल ही कहां रह जाता है.

धर्मेंद्र के परिजन और ग्रामीण अपना विरोध जताते हैं. सुबह वे थाने के सामने पहुंचकर सड़क पर बैठ जाते हैं तथा उनकी मांग होती है कि मामला दर्ज कर जांच की जाए. अगर एक तरीके से देखा जाए तो किसी की मौत पर उसके परिजनों को शक है तो पुलिस को इसकी जांच करनी चाहिए, पर इन खाकी वाले दबंगों की कही बात पत्‍थर की लकीर बन जाती है. बिरना पुलिस मुकदमा लिखने और जांच करने को तैयार नहीं हुई. ग्रामीण भी मौके पर जमे रहे. इस बीच इस जाम-प्रदर्शन की सूचना जिले के आला हाकिमों को दी जाती है. आला हाकिम अपने प्रिय दबंग दारोगा और जंगीपुर थाने के थानाध्‍यक्ष रणजीत राय तथा मरहद थाने के थानेदार को मौके पर पहुंचने को कहती है.

मरदह थानाध्‍यक्ष मौके पर पहुंच जाते हैं. अब बारी आती है दबंग थानाध्‍यक्ष रणजीत राय की. यह दबंग स्‍टाइल में अपनी सरकारी जीप धरनारत ग्रामीणों की भीड़ में घुसा देता हैं. भगदड़ मचती है. कुछ लोग घायल होते हैं. कुछ को चोट लगती है. इसके बाद यह दारोगा ग्रामीणों की मां-बहन करता है तथा पिस्‍टल हाथ में लहराने लगता है. इस अमानवीय व्‍यवहार के बाद जनता भड़क जाती है और पुलिस विरोधी नारे लगाने लगती है. इसके बाद भी रणजीत राय का मन नहीं भरता है. वो पिस्‍टल लेकर भीड़ को दौड़ा लेता है. इसके साथ कुछ पुलिसकर्मी लाठीचार्ज कर देते हैं. फिर भीड़ उग्र हो जाती है और पथराव शुरू कर देती है. तब यह दबंग अपने सिपाहियों के साथ वापस भागता है. थाने में आकर घुस जाता है.

उग्र भीड़ अब अनियंत्रित हो जाती है. कई वाहनों को तोड़ने-फोड़ने के बाद थाना परिसर में रखे गए पुराने वाहनों को आग लगा देती है. थाने की चहारदीवारी तोड़ डालती है. फिर मामला और बिगड़ जाता है और पुलिस गोलियां चलाती है, जिसमें कम से कम पांच ग्रामीणों को छर्रा लगता है तथा कई गिर-पड़कर घायल हो जाते हैं. सूचना पाकर एसपी, डीआईजी तथा आईजी भी मौके पर पहुंच गए. इन वरिष्‍ठ अधिकारियों ने पूछताछ के बाद घटना की मजिस्‍ट्रेटियल जांच की घोषणा किया है. मौके पर पहुंचे सांसद राधामोहन सिंह ने पुलिस की लापरवाही बताते हुए सीबीआई जांच की मांग की.

उल्‍लेखनीय है कि पूरे मामले को बिगाड़ने वाले यह दारोगा नंदगंज थाने में तैनाती के दौरान भी नियम कानून की धज्जियां उड़ाते हुए महिलाओं को कई घंटे थाने पर बैठाए रखा था, जिसमें इसे लाइन हाजिर भी किया गया था.रणजीत राय को हाथ में पिस्‍टल लेकर लोगों को डराने का शौक है. इसे इसमें बहुत मजा आता है. कई बार पिस्‍टल लहराकर यह अपने इस शौक का सार्वजनिक प्रदर्शन कर चुका है. बीते 25 मई को भी जंगीपुर थाना क्षेत्र में एक सड़क हादसे के बाद प्रदर्शन कर रहे लोगों पहले लाठियों से पिटवाया. जब ग्रामीण भी विरोध करने लगे तो इस दारोगा ने हाथों में पिस्‍टल लेकर प्रदर्शनकारियों पर टूट पड़ा था.

गरीबी, बेरोजगारी, स्‍वास्‍थ्‍य जैसी वास्‍तविक खबरें मीडिया से गायब हैं : काटजू

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के नवनियुक्‍त चेयरमैन जस्टिस एम काटजू बीते दस अक्‍टूबर को मीडिया से मुलाकात की थी. इस दौरान उन्‍हों ने मीडियाकर्मियों से चौथे खम्‍भे के बारे में ढेर सारी बातें कीं. कई सुझाव दिए, कई बातें रखी, मीडियाकर्मियों की बातें भी सुनीं. जस्टिस काटजू ने पत्रकारों की जिम्‍मेदारी पर भी काफी कुछ सुझाव दिए, विचार रखे. इन्‍हीं सुझावों-विचारों को ‘द हिंदू’ ने अपने यहां प्रकाशित किया है.

उसी से साभार लेकर जस्टिस काटजू का वक्‍तव्‍य यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

Justice Katju interacts with mediapersons

Friends,

I wish to thank you all for accepting my invitation for this get together and for coming here.

As you know, I have only recently become the Chairman of the Press Council of India. It is a new job for me as I was earlier in the legal world for 40 years, 20 years as a lawyer and 20 years as a Judge.

Now, that I have come into your world I need your guidance, advice and suggestions so that I may be able to perform my duties properly.

I have arranged this get together of media people because I think that the time has now come in this country when some introspection is required by the media. Many people, not only those in authority but even ordinary people, have started saying that the media has become irresponsible, wayward and needs to be reined in.

Only a couple of days back I read in the newspapers that the Union Government has issued some regulations regarding licences for news channels, about which there was a lot of reaction.

Under the Constitution of India freedom of the media is part of the freedom of speech guaranteed by Article 19 (1) (a) of the Constitution. However, no freedom can be absolute, and reasonable restrictions can be placed on them. One of the basic tasks of the media is to provide truthful and objective information to the people which will enable them to form rational opinions, which is a sine qua non in a democracy. But is the Indian media performing this role properly?

I may only mention certain defects in the functioning of the Indian media today:

(i)The media often twist facts. In this connection, I would like to give an example.

I sat for several months with Hon’ble Mrs. Justice Gyan Sudha Misra in a Bench of the Supreme Court. One day, a leading English newspaper of the country published on its front page a photograph of Hon’ble Justice Misra with the caption “Supreme Court Judge says that her daughters are liabilities”.

This was a totally distorted and fallacious news and that too published in the front page of a leading English newspaper.

The correct facts were that Supreme Court Judges have to disclose their assets and liabilities. Against the liabilities column Justice Misra wrote ‘two daughters to be married’. Strictly speaking it was not necessary to mention this because liabilities means legal liabilities e.g. housing loan, car loan, etc. However, the intention of Justice Misra was obviously to say that she had to spend a lot of money in her daughters’ future marriage. She has three daughters (no son) only one of whom has been married and two are yet to be married. Justice Misra never said nor intended to say that her daughters were liabilities, and the news published was totally false and defamatory with the obvious intention of creating a sensation.

This publication was of tremendous embarrassment and grief not only to Justice Misra but also to members of her family. Did the publisher of this news items ever think how much pain and embarrassment it would cause to Justice Misra and her family? Obviously not. All that the publisher of that news sought was to create a sensation by twisting the correct facts.

Even if Justice Misra had made a mistake in writing “ two daughters to be married” against the column of liabilities, should the media have cashed in on this mistake and totally distorted it without realizing how much pain it was causing to some people? I ask the media people assembled here today to themselves introspect and seek the answer.

(ii)The issue of paid news has become prominent of late. In the 2009 elections, it was a scandal. How to stop this vicious practice needs to be discussed among us. Incidentally, in compliance with the order of the Chief Information Commissioner dated 19.9.2011, we have placed the 71-page report of the Committee consisting of Shri Paranjoy Guha Thakurta and Mr. Sreenivas Reddy on our website www.presscouncil.nic.in with the disclaimer that the Press Council had rejected this report in its meeting held on 26.4.2010.

(iii)The media often portrays non issues as real issues while the real issues are sidelined. The real issues in the country are economic, that is the terrible economic conditions in which 80% of our people are living, the poverty, unemployment, lack of housing and medical care etc. Instead of addressing these real issues, the media often tries to divert the attention of the people to non-issues, such as that the wife of a film actor has become pregnant, whether that lady will give birth to a single child or to twins etc. Are these the real issues facing the nation?

In the Lakme India Fashion Week event, there were 512 accredited journalists covering the event in which models were displaying cotton garments, while the men and women who grew that cotton were killing themselves at a distance of an hour’s flight from Nagpur in the Vidharbha region. Nobody told that story except one or two journalists, locally.

Is this a responsible way for the Indian media to function? Should the media turn a Nelson’s eye to the harsh economic realities facing over 75 per cent of our people, and concentrate on some ‘Potemkin villages’ where all is glamour and show biz? Are not the Indian media behaving much like Queen Marie Antoinette, who said that if the people had no bread, they should eat cake.

No doubt, sometimes the media mentions farmers’ suicides, the rise in the price of essential commodities, and so on, but such coverage is at most 5 to 10 per cent of the total. The bulk of the coverage goes to showing the life of film stars, pop music, fashion parades, cricket and astrology.

(iv)Bomb blasts have taken place near the Delhi High Court, in Bombay, Bangalore etc. Within a few hours of such bomb blasts many T V channels started showing news item that Indian Mujahidin or Jaish-e-Mohammed or Harkatul-jihad-e-islam have sent e-mails or SMS claiming responsibility. The names of such alleged organizations will always be Muslim names. Now an e-mail can be sent by any mischievous person, but by showing this on TV channels and next day in the newspapers the tendency is to brand all Muslims in the country as terrorists and bomb throwers.

The truth is that 99% people of all communities, whether Hindu, Muslim, Christian or Sikh and of whatever caste or region are good. But the manner in which such news is shown on TV screens and published in the newspapers tend to create the impression that all Muslims are terrorists, and evil, which is totally false. The person who sends such e-mails or SMS obviously wants to create hatred between Hindu and Muslims, which is the old British divide and rule policy continuing even today. Should the media, wittingly or unwittingly, become part of this policy of divide and rule?

I have only referred to some of the defects in the Indian media. No doubt there are defects not only in the media but in other institutions also e.g. the judiciary, bureaucracy etc. but all of us must try to remove these defects.

There are two ways of removing these defects in the media. One is the democratic way, that is by discussions, consultations and persuasion, which is the method I prefer. The other way is by using harsh measures against the media e.g. by imposing heavy fines on the defaulters, stopping Government advertisements for them, suspending their licence etc.

In my opinion, in a democracy, we should first try the first method for rectifying the defects, namely the democratic method. It is for this purpose that I have decided to have regular get togethers with the media, including the electronic media, so that we can all introspect and ourselves find out ways and means of rectifying the defects in the media, rather than this being done by some government authority or external agency.

For this purpose, I propose to have such get togethers, like the one as we are having today, every two or three months, in which we will discuss issues relating to the media and try to think how we can improve the performance of the media so that it may win the respect and confidence of the people of the country.

Such meetings will not be formal meetings of the Press Council of India but only informal get togethers. No doubt, the electronic media is not under the Press Council of India Act, but surely there is nothing wrong in discussing matters relating to media with them also. After all, the ultimate purpose of the print media and the electronic media is the same, and journalistic ethics apply to both.

No doubt, if the media proves incorrigible, harsh measures may be required, but in my opinion that should be resorted to only as a last resort and in extreme situations. Ordinarily, we should first try to resolve the issues by discussion, consultation and self-regulation. That is the approach which should be ordinarily first tried in a democracy. I, therefore, respectfully request the Union Government to kindly defer implementation of its recent decision regarding the news channel license, so that we can ourselves discuss the issue thoroughly and ourselves take corrective measures in this connection.

Till now the function of the Press Council was only adjudication. I intend to make the Press Council an instrument of mediation in addition, which is in my opinion the democratic approach. For this purpose, I need the help and co-operation and advice of all of you.

Presently, India is passing through a transitional period in its history, the transition being from feudal agricultural society to modern industrial society. This is a very painful and agonizing period in history. If you have read the history of Europe from the 16{+t}{+h} to the 19{+t}{+h} Centuries, which was the transitional period there, you will find that this period was accompanied by tremendous turbulence, turmoil, wars, revolutions, social churning, chaos, intellectual ferment etc. It was only after going through this fire that modern society emerged in Europe. Presently, India is going through this fire. We are going through a very painful period in our history, which I think will last for another 20 years or so before modern industrial society emerges in India.

The media too must help society in going through this transitional period as quickly as possible, and by reducing the pain. This, it can do by attacking feudal ideas e.g. casteism and communalism and promoting modern scientific ideas.

Before I conclude, I once again repeat my appeal to the Indian Government through the Prime Minister to release Dr. Khalil Chisty who is in Ajmer Jail. He is 80 years old and has not very long to live. He was an eminent virologist in Karachi Medical College and was a Ph.D from Edinburgh University. He is a heart patient and has many other ailments also. He is unable to walk. In the name of humanity I appeal to the Indian Government to release him and allow him to get back to home in Karachi to his wife and daughter who live there. The Pakistan Government honoured my appeal and released Gopal Das from a Pakistani Jail. I am sad that the Indian Government has not yet honoured my appeal made several months ago to the Hon’ble Prime Minister, the Hon’ble Home Minister, and His Excellency the Governor of Rajasthan. In my opinion, the prestige of our country will be increased if Dr. Chisty is released, whereas if he dies in jail, we will be disgraced.

I now wish all of you to give your views. Courtesy : The Hindu

न्‍यूज कॉरपोरेशन के चेयरमैन बने रुपर्ट मर्डोक

रुपर्ट मर्डोक को न्यूज़ कॉरपोरेशन के चेयरमैन के पद से हटाने की कोशिश विफल रही हैं. लॉस एंजिलस में हुई कंपनी के शेयरधारकों की बैठक में रुपर्ट मर्डोक को किसी स्वतंत्र चेयरमैन से बदलने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया है. रुपर्ट मर्डोक के अलावा उनके बेटों – जेम्म और लचलान और बोर्ड ऑफ़ डाइरेक्टर्स के अन्य सदस्यों को दोबारा चुन लिया है.

न्यूज़ कॉरपोरेशन के प्रमुख ने कहा है कि वो ब्रिटेन में फ़ोन हैकिंग के आरोपों की की तह तक जाएंगे. आपको याद दिला दें कि मर्डोक के अख़बार न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड पर ब्रिटेन में लोगों के फ़ोन हैक करने के गंभीर आरोप लगे थे. उसके इस अख़बार को बंद कर दिया गया था. साभार : बीबीसी

डाक्‍टरों की लापरवाही से पत्रकार के मासूम पुत्र की मौत

भगवान माने जाने डाक्‍टरों की लापरवाही ने एक मासूम की जान ले ली. टीवी टुड़े ग्रुप चैनल तेज के एसोसिएट ईपी प्रणव रावल के पांच साल का बच्‍चा डाक्‍टरों की गलत इलाज के चलते  असयम काल के गाल में समा गया. रावल ने अपने पुत्र को तबीयत खराब होने पर इंदिरापुरम, गाजियाबाद के एक अस्‍पताल में भर्ती कराया था. डाक्‍टरों ने मासूम को टाइफाइड बताकर इलाज शुरू कर दिया, जिससे बच्‍चे की हालत बिगड़ गई.

इधर, जांच में यह बात सामने आई कि बच्‍चे को टाइफाइड नहीं बल्कि डेंगू हुआ था. गलत दवाओं के असर बच्‍चे के कई अंगों पर विपरीत प्रभाव पड़ा जिससे उसकी मौत हो गई. बच्‍चे की अन्‍त्‍येष्टि के दौरान काफी संख्‍या में पत्रकार उपस्थित रहे. एक मासूम की मौत से सभी लोग आहत थे. इस दुखद सूचना के बाद टीवी टुडे में भी माहौल गमगीन हो गया था. प्रणव रावल की गिनती टीवी टुडे ग्रुप के अच्‍छे तथा सुलझे पत्रकारों में की जाती है.

रामप्रकाश त्रिपाठी बने हिन्‍दुस्‍थान समाचार के नेशनल हेड

: दीपक गोस्‍वामी खबर भारती से जुड़े : नई दिल्‍ली : आरएसएस की समाचार एजेंसी हिन्‍दुस्‍थान समाचार में नेशनल हेड के तौर पर रामप्रकाश त्रिपाठी के ज्‍वाइन कर लेने की खबर है। श्री त्रिपाठी अब तक दैनिक जागरण के कानपुर स्थित यूपी डेस्‍क में बतौर मुख्‍य उपसम्‍पादक के पद पर कार्य कर रहे थे। हालांकि उनके इस्‍तीफे की अब तक पुष्टि नहीं हो पायी है। लेकिन बताते हैं कि वे कानपुर से मुक्‍त होकर दिल्‍ली में नया कार्यभार सम्‍भालने पहुंच रहे हैं।

पिछले करीब दो दशकों से अमर उजाला और दैनिक जागरण में अपनी सेवाएं दे चुके श्री त्रिपाठी अयोध्‍या विवाद पर गहराई से काम कर चुके हैं। तांत्रिक चंद्रास्‍वामी की अयोध्‍या में करतूतों का खुलासा भी श्री त्रिपाठी ने अपनी रिपोर्टों में खूब किया है। इसके अलावा भी वे पंजाब के गुरुदासपुर समेत कई अखबारों में काम का अनुभव रखते हैं।

उधर खबर है कि हिन्‍दुस्‍थान समाचार ने अपने तेवर को धार देने की तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। अब तक बाइस से ज्‍यादा ब्‍यूरो कार्यालय खोले जा चुके हैं। हालांकि जिलों में अभी तक पकड़ नहीं बन पायी है। देश के पांच राज्‍यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए हिन्‍दुस्‍थान समाचार प्रबंधन यह काम श्री त्रिपाठी के ही नेतृत्‍व में करना चाहता है। हालांकि एक अन्‍य खबर के मुताबिक इस समाचार संस्‍थान का आर्थिक ढांचा अभी पुख्‍ता नहीं हो पाया है। इसके लिए संघ-नेतृत्‍व भाजपा शासित प्रदेशों को केंद्र बनाने की तैयारियों में जुटा हुआ है।

उधर समझा जाता है कि श्री त्रिपाठी के हिन्‍दुस्‍थान समाचार में चले जाने का सबसे बुरा असर दैनिक जागरण की यूपी डेस्‍क पर पड़ेगा। वजह यह कि काम के मामले में श्री त्रिपाठी यहां अपने दूसरे सहयोगियों के मुकाबले जमीन-आसमान का अंतर रखते रहे हैं। जाहिर है कि श्री त्रिपाठी की अपने नये मुकाम की ओर रवानगी की खबर से यूपी डेस्‍क में हड़कम्‍प मचा हुआ है।

इधर, राजस्‍थान से सूचना है कि दीपक गोस्‍वामी ने खबर भारती ज्‍वाइन कर लिया है। उन्‍हें स्‍टेट हेड बनाया गया है। दीपक पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इनकी गिनती राजस्‍थान के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है।

सड़क हादसे में दो पत्रकारों की मौत

लीबिया के सिर्ते शहर के तटीय इलाके में एक सड़क दुर्घटना में दो जापानी पत्रकारों की मौत हो गई जबकि एक अन्य घायल हो गया। समाचार एजेंसी सिन्हुआ के मुताबिक शुक्रवार को हुए इस हादसे में एक अन्य पत्रकार घायल हो गए। तीनों पत्रकार जापान के आसाही सिमबून समाचार पत्र के कर्मचारी थे।

सूत्रों के मुताबिक पीड़ितों में शामिल एक पत्रकार मिस्र मूल की एक महिला थी, जो सम्भवतः स्थानीय कर्मचारी थी और दो अन्य लोग जापानी मूल के थे। साभार : अमर उजाला

खुशवंत की कलम बंद होना

अखबार के पन्नों पर लगातार सत्तर साल तक चलने वाली कलम एक दिन अपनी उम्र का हिसाब जोड़े और ‘अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल’ जैसे वैरागी-भाव से कह दे कि ‘बहुत हुआ..अब और नहीं..कि मेरा समय यहीं समाप्त होता है..’ तो सहसा यकीन करना मुश्किल हो जाता है। इस हफ्ते एक अंग्रेजी पत्रिका ने लिखा है कि सरदार खुशवंत सिंह का बहुचर्चित स्तंभ अब अखबारों में नहीं दिखाई देगा।

पत्रिका ने खुशवंत सिंह को यह कहते हुए उद्धृत किया है, ‘मैं 97 साल का हूं.. अब किसी भी दिन मौत आ सकती है..।’ लेकिन अदा देखिए कि अपने लेखन में खुद को हमेशा ‘एक शरारती बुजुर्ग’ के रूप में दिखाने के लिए सजग रहने वाले खुशवंत सिंह ने जब कलम हमेशा के लिए रख देने की घोषणा की है तब भी शायद ही कोई कह सके कि वैराग्य की इस बेला में उनका बांकपन चला गया। अगर बांकपन चला गया होता तो खुशवंत सिंह यह न कहते कि लेखनी को विराम देने के बाद मुझे बहुत याद आएंगे, वे रुपए जो मिला करते थे और ‘वे लोग जो अपने बारे में लिखवाने के लिए मेरी चापलूसी किया करते थे।’

कहां ढलती उम्र और मौत की अनसुनी आहट को भांपने की कोशिशों के बीच यह बोध कि अब लिखा न जा सकेगा और कहां इस वैरागी-बोध के बीच रह-रह कर कोंचने वाली यह दुनियावी याद। पावनता के बीच किसी शरारत का यह छौंक या कह लें एक खास किस्म का बांकपन ही खुशवंत सिंह के पत्रकारीय शब्द-संसार की जान है। इसलिए, स्तंभ न लिखने के उनके फैसले को पढ़कर कोई बहुत कोशिश करे तो भी उनके बारे में भर्तृहरि की वह पंक्ति न याद करना चाहेगा जिसमें अफसोसनाक मंजूरी के स्वर में कहा गया है कि कालो ना याति वयमेव याता..समय नहीं बीतता हम ही बीत जाते हैं, तृष्णा जीर्ण नहीं होती हम ही जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं। हां, नियमित स्तंभलेखन से विदा लेते खुशवंत सिंह के बयान को पढ़कर भारतीय साहित्य के एक सर्वमान्य ‘शरारती’ बुजुर्ग गालिब जरूर याद आएंगे जो कह गए कि ‘गो हाथ को जुंबिश नहीं, आंखों में तो दम है, रहने दो अभी सागरो-मीना मेरे आगे।’

छोड़ दें खुशवंत सिंह के साहित्यकार, इतिहासकार और अनुवादक के रूप को और अपने को केंद्रित करें सिर्फ उनके पत्रकारीय कर्म पर तो भारतीय पत्रकारिता के इस बुजुर्ग के बारे में नजर आएगा कि उसकी ‘शरारत’ सिर्फ हंगामा खड़ा करने के मकसद से नहीं थी, बल्कि उसमें कोशिश हमेशा व्यवस्था की खामियों से असंतुष्ट की तरह यही रहती थी कि ‘यह सूरत बदलनी चाहिए।’ लेकिन उनकी शैली किसी मिशनरी पत्रकार की शैली नहीं थी जो इस या उस विचारधारा के चश्मे से सामने पड़े तथ्यों को देखता और सच्चाई के अपने रूपाकार में फिट करता है। गैर-पत्रकारीय प्रतिबद्धताओं के साथ खुशवंत सिंह की कलम ने समझौता नहीं किया। उन्होंने बड़े-बड़ों को अपने कॉलम में उनकी क्षुद्रताओं के लिए कोसा लेकिन कुछ इस तरह की वह ‘गुदगुदी’ और ‘चिकोटी’ और ‘गप्प’ जान पड़े। उन्होंने अपने से छोटों को कुछ बड़ा करने का उकसावा दिया लेकिन प्रेरणादायी प्रवचन की उस शैली में नहीं जिससे उनका गुरुडम झांकता हो बल्कि कुछ इस तरह की सीख लेने वाले को लगे कि अरे यह तो मैं पहले से ही जान रहा था। खुशवंत सिंह ऐसा कर पाए, क्योंकि वे पत्रकार को न तो समाज-सुधारक की भूमिका में देखने के हामी रहे, न ही इस या उस राजनीतिक पंथ के भक्त या गुरु के रूप में देखने के पैरोकार।

पत्रकारीय कर्म की अपनी स्वयात्तता होती है, घनघोर प्रतिबद्धताओं से उपजा लेखन पक्षपाती और इसी कारण मुद्दे की समग्रता को किसी हड़बड़ाई हुए एकहरेपन में समेटने वाला लेखन भी होता है, खुशवंत सिंह अपने स्तंभ में हमेशा याद दिलाते रहे। अपने पत्रकारीय कर्म की स्वायत्तता की रक्षा में ही उन्होंने ‘गप्प, गुदगुदी और शरारत’ वाली शैली विकसित की। राजनीतिक प्रतिबद्धताओं की दुहाइयों से पटे पड़े पत्रकारीय संसार में अकसर यह बात भुला दी जाती है कि बतरस किसी चीज का साधन नहीं, बल्कि स्वयं में एक साध्य हो सकता है। और, शब्दशिल्पी जानते हैं कि बतरस उस दिन से साध्य रहा है जिस दिन किसी गोपी ने कृष्ण की मुरली खास बतरस के ही लालच में छुपा दी थी, ‘बतरस लालच लाल की मुरली दई लुकाय।’ शब्द कोई पत्थर नहीं कि उसे निशाना ताक कर किसी पर मारा जाए और कलम आखिर तक कलम ही रहती है उसे तोप या तलवार के मुकाबिल समझने के दिन मसीहाओं के साथ लद गए– खुशवंत सिंह के भीतर का शब्द-शिल्पी इस सहज स्वीकार के साथ अपनी कलम उठाता था। उनसे संबंधित हाल की दो घटनाओं के जिक्र से यह बात स्पष्ट हो जाएगी। ज्यादा दिन नहीं हुए जो नीरा राडिया टेप-कांड में कुछ पत्रकारों का जिक्र कारपोरेटी महात्वकांक्षाओं से ऊपजी पत्रकारिता की मलिनताओं की मिसाल के रूप में सामने आया। टेप के सार्वजनिक हो जाने के बाद आम राय यह बनी कि महत्वपूर्ण पद पर बैठे पत्रकार पत्रकारिता से इतर भी सत्ता-समीकरणों में गोट इधर से उधर करने का काम करते हैं।

पत्रकारिता की मलिनताओं के इस शोर के बीच यह खुशवंत सिंह का सजग विवेक था जिसने याद दिलाया कि यह कहानी प्रहसन से ज्यादा कुछ नहीं है क्योंकि टेप में ‘एक अग्रणी चैनल के एंकर को एक महत्वाकांक्षी राजनेता के लिए सिफारिश करने को कहा जा रहा है। यह कहानी पूरी तरह से प्रहसन जान पड़ती है क्योंकि (राजसत्ता के लिए) पत्रकार की सिफारिश कोई मायने नहीं रखती।’ दूसरी घटना बरखा दत्त और राजदीप सरदेसाई की कार्यक्रमों की प्रशंसा से जुड़ी है। इसी साल मई महीने में उन्होंने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में अपने स्तंभ में लिखा, ‘बरखा और राजदीप सरदेसाई अपने कार्यक्रम में आमंत्रित अतिथियों से सही सवाल पूछने के लिए भरपूर होमवर्क करते हैं। यह भी ध्यान रखते हैं कि कार्यक्रम में परस्पर विरोधी राय रखने वाले महत्वपूर्ण व्यक्ति शामिल हों ताकि दर्शक को निजी राय बनाने से पहले विभिन्न विचारों की जानकारी हो जाए।’ किसी को खुशवंत सिंह के लेखन से असहमति हो सकती है, लेकिन अपने सत्तर साल के पत्रकारीय कर्म में उन्होंने पत्रकारिता के जिन विधानों (जानकारी, शिक्षा और मनोरंजन को एकरूप बनाना) का पालन किया उससे असहमत होना मुश्किल है। हालांकि 1969 से ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ से शुरू होने वाला उनका नियमित स्तंभ 40 साल के अपने सफर में दर्जनों पत्रों की यात्रा करने के बाद अब मौन हो गया है, लेकिन इस कॉलम ने उन्हें जो हैसियत बख्शी है, वह किसी पत्रकार के लिए लंबे समय तक दुर्लभ रहेगी। पत्रकार खुशवंत सिंह की हैसियत की ही मिसाल है कि आज जब उन्होंने अपनी कलम रख दी है तो भी गुजरी 18 तारीख को ‘द हिंदू’ ने उनकी चिट्ठी को अपने लिए एक प्रमाणपत्र मानकर बॉक्स-आयटम में छापा है। कारण, इस चिट्ठी में खुशवंत सिंह ने वह लिखा है, जो किसी भी अखबार के लिए एक मुंहमांगी मुराद की तरह है। उन्होंने ‘द हिंदू’ के लिए लिखा है, ‘संपादक महोदय, आप और आपके कर्मचारीगण देश को दुनिया का सबसे पठनीय अखबार देने के लिए बधाई के पात्र हैं।’

चंदन श्रीवास्‍तव का लेख दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लिया गया है.

आम्रपाली शर्मा ने मुंबई मिरर ज्‍वाइन किया

सिनेमा और इंटरटेनमेंट से जुड़ी पत्रकार आम्रपाली शर्मा ने फिर टाइम्‍स ऑफ इंडिया ग्रुप से जुड़ गई हैं. उन्‍होंने इस ग्रुप का अखबार ‘मुंबई मिरर’ ज्‍वाइन किया है. इससे पहले आम्रपाली इसी ग्रुप के इंटरटेनमेंट चैनल जूम में इनपुट हेड थी, परन्‍तु तीन महीने पहले उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था. ‘मुंबई मिरर’ में भी उन्‍हें इंटरटेनमेंट सेक्‍शन की जिम्‍मेदारी दी गई है. आम्रपाली इस ग्रुप के पहले लहरें टीवी, आईबीएन7, स्‍टार न्‍यूज तथा आजतक जैसे संस्‍थानों से जुड़ी रही हैं. इस संदर्भ में संपर्क किए जाने पर उन्‍होंने ‘मुंबई मिरर’ ज्‍वाइन करने की पुष्टि की.

अखंड हिमाचल को अब नहीं छाप रहा दैनिक भास्‍कर

हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर से छपने वाले अखबार अखंड हिमाचल, जो चंडीगढ़ में दैनिक भास्कर की प्रेस से छपवाया जा रहा था, को भास्कर प्रबंधन ने वित्तीय गड़बडि़यों के चलते छापना बंद कर दिया है. पता चला है कि अंखड हिमाचल के प्रबंधकों ने प्रिंटिग की एवज में जो चेक भास्कर को दिया वह बाउंस हो गया. बाद में भास्‍कर की ओर से रितेश बंसल को सुंदरनगर भेजा गया. तब जाकर वसूली हो पाई.

हालात यह रहे कि इन सब दिक्‍कतों के चलते अखबार छापने में भी मुश्किलें आईं. बाद में अंखड हिमाचल को मोहाली के जगजीत प्रेस में छपवाने का इंतजाम किया गया. हालांकि अखबार की प्रिंट लाइन में अभी भी भास्कर का नाम ही दिया जा रहा है, लेकिन सच यह है कि अखबार को भास्कर नहीं छाप रहा, लेकिन इस सारी कवायद में कंपनी की जो साख गिरी उससे जगजीत प्रेस में भी अखबार छपवाने में खासी दिक्कत पेश आ रही है. यही वजह है कि अब हिमाचल प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में अखबार को नहीं भेजा जा रहा है.

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

श्रीलाल शुक्ल को इलाज के लिए साहित्य अकादमी ने एक लाख रुपए दिए

लखनऊ। एक अच्छी खबर है। हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक श्रीलाल शुक्ल को इलाज के लिए साहित्य अकादमी ने एक लाख रुपए की मदद स्वीकृत की है। यह पहली बार हुआ है कि साहित्य अकादमी ने किसी हिंदी लेखक को इलाज के लिए इतनी बड़ी सहायता दी है। उल्लेखनीय है कि श्रीलाल शुक्ल गोमती नगर स्थित सहारा हास्पिटल में बीते हफ़्ते से भर्ती हैं और उन की हालत में निरंतर सुधार हो रहा है।

अभी श्रीलाल जी को ज्ञानपीठ सम्मान भी राज्यपाल श्री वी. एल.जोशी ने सहारा हास्पिटल में जा कर उन्हें दिया था। साहित्य अकादमी तथा व्यास सम्मान सहित तमाम सम्मान श्रीलाल जी को मिल चुके हैं। रागदरबारी उपन्यास श्रीलाल जी का बेस्ट सेलर उपन्यास है। इसी उपन्यास पर उन्हें चालीस साल पहले साहित्य अकादमी भी मिला था। लखनऊ के मोहनलालगंज के पास बसे गांव अतरौली के श्रीलाल शुक्ल पद्म भूषण से भी बीते साल विभूषित किए गए थे। अब वह कोई दो साल से अस्वस्थ चल रहे हैं। साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने बताया कि यह पहली बार है कि साहित्य अकादमी ने किसी हिंदी लेखक को इलाज के लिए कोई धनराशि उपलब्ध कराई है।

अकादमी में ऐसी कोई नियमावली भी नहीं है। [इस के पहले एक बार बांग्ला भाषा की लेखिका मल्लिका सेनगुप्ता को भी साहित्य अकादमी द्वारा इलाज के लिए मदद दी गई थी। उन्हें कैंसर था। अब वह दिवंगत हैं।] पर श्रीलाल जी के हिंदी में अवदान को देखते हुए यह फ़ौरी निर्णय लिया गया है। यह एक लाख की धनराशि चेक से सहारा हास्पिटल के नाम आज भेज भी दी गई है। गौरतलब है कि साहित्य अकादमी के इतिहास में भी यह पहली बार हुआ है कि हिंदी का कोई लेखक साहित्य अकादमी का उपाध्यक्ष हुआ है। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी पहले भी साहित्य अकादमी में हिंदी के संयोजक थे। अब उपाध्यक्ष हैं। वह आज रात कनाडा जा रहे हैं। टोरंटो, ओटावा में हिंदी फ़ेस्टिवल में शिरकत करने। 12 सदस्यीय भारतीय लेखकों के एक प्रतिनिधिमंडल का वह नेतृत्व करेंगे। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी श्रीलाल शुक्ल का हालचाल उन के परिवारीजनों से लिया है।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

भास्‍कर की नई रीत : किसी परिजन के मरने पर पहले अवकाश लें फिर अर्थी को कंधा दें!

: डेस्‍क हेड के चलते इंसानियत शर्मसार : दैनिक भास्‍कर, जो अपने आप को भारत का सबसे बड़ा मीडिया समूह कहता है तथा अपने कर्मचारियों के लिए हमेशा कुछ न कुछ नए आयाम लेकर आता है, में हाल ही में एक घटना को लेकर जो कुछ हुआ, उसने इंसानियत को शर्मसार तो किया ही, मानवीयता को भी कहीं का नहीं छोड़ा.

बात दैनिक भास्‍कर, इंदौर के साल भर पहले लांच हुए खंडवा संस्‍करण की है. वहां पर कार्य करने वाले साथी के दादाजी का आकस्मिक निधन हो गया था. चूंकि वो साथी पहले से ही चार दिन के अवकाश पर था. अपने बीमार दादाजी का हालचाल लेने ही घर गया हुआ था. उसी दौरान उसके दादाजी का निधन हो गया. उसने फोन से डेस्‍क हेड को इस दुखद घटना से अवगत करा दिया. साथ ही अवकाश मांगते हुए कहा कि वह रस्‍म पगड़ी पूरी होने के बाद आएगा. परन्‍तु सातवें या आठवें दिन उस साथी के पास डेस्‍क हेड का एसएमएस आता है कि आप जब भी ऑफिस आएं अपने दादाजी का मृत्‍यु प्रमाण पत्र साथ में लाएं.

करीब 13 दिन बाद जब वह साथी ऑफिस आया और अपने दादाजी का मृत्‍यु प्रमाण पत्र डेस्‍क हेड के सामने पेश किया. इसके बाद साथी को एचआर डिपार्टमेंट में भेज दिया गया, परन्‍तु जब वेतन की बात आई तो उसका 11 दिन का वेतन काट दिया गया. जब उसने एचआर से बात की तो पता चला कि उसका अवकाश डेस्‍क हेड द्वारा अनुमोदित ही नहीं किया गया था. उधर, डेस्‍क हेड कहते हैं कि आपको पूर्व में सूचना देनी चाहिए थी.

अब यह कहां तक न्‍याय संगत है कि जिसके परिवार में कोई दुखद घटना हो जाए तो अर्थी छोड़कर पहले संस्‍थान में अवकाश की अर्जी देने जाएगा और उसके बाद अर्थी को कंधा देगा. इसके पहले भी खंडवा कार्यालय में दो-तीन साथी के परिवार में ऐसी आकस्मिक घटना घटित हुई थी, परन्‍तु उनसे आज तक मृत्‍यु प्रमाण पत्र नहीं मांगा गया. इस पूरे प्रकरण को लेकर स्‍थानीय समाचार संपादक चुप्‍पी साधे हुए हैं. क्‍या भविष्‍य में भास्‍कर कर्मियों को मृत्‍यु प्रमाण पत्र पेश करना होगा?

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

इंडिया टुडे के सीनियर एडिटर श्‍यामलाल यादव को लेकर चर्चाएं

इंडिया टुडे के सीनियर एडिटर श्‍यामलाल यादव को लेकर दिल्‍ली की मीडिया में कई तरह की चर्चाएं और अफवाहें फैली हुई हैं. कहा जा रहा है कि श्‍यामलाल इंडिया टुडे से रिजाइन देकर ज्‍यादा बड़े पद और पैकेज पर इंडियन एक्‍सप्रेस ज्‍वाइन करने जा रहा है. जितने मुंह उतनी बातें कही जा रही हैं. कोई कह रहा है कि इंडिया टुडे के बदले माहौल में वे अपने को असहज पा रहे थे. किसी का कहना है कि वे कुछ बदलाव चाहते थे इसलिए इंडिया टुडे छोड़ने जा रहे हैं.

इस संदर्भ में जब भड़ास4मीडिया ने श्‍यामलाल यादव से संपर्क किया तो उन्‍होंने इन सूचनाओं को महज कोरा अफवाह करार देते हुए कहा कि वे कहीं नहीं जा रहे हैं. वे इंडिया टुडे के साथ ही हैं. मुझे भी इन अफवाहों और चर्चाओं ने हतप्रभ किया है. गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही श्‍यामलाल यादव कीव में हुए खोजी पत्रकारिता सम्‍मेलन से वापस लौटे हैं. उल्‍लेखनीय है कि नई मैनेजमेंट के आने के बाद से कई पुराने साथी इंडिया टुडे ग्रुप छोड़ चुके हैं.

राष्ट्रीय सहारा और डीएलए के सौजन्य से!

पत्रकारिता करने के साथ अब अखबार तथा उसके पत्रकार मिलकर देवी जागरण टाइप कार्यक्रम कराने लगे हैं. ये लोग आयोजन के नाम पर पैसे इकट्ठे कराते हैं, जिसकी आड़ में उगाही के आरोप भी लगते हैं. कांशीराम नगर में भी राष्‍ट्रीय सहारा और डीएलए के सौजन्‍य से देवी जागरण का आयोजन किया गया था. इसके लिए जिले के वरिष्‍ठ अधिकारियों को मुख्‍य अतिथि बनाया गया था.

इस कार्यक्रम का आयोजन 10 अक्‍टूबर को नगर पालिका बालिका इण्‍टर कालेज में 10 अक्‍टूबर को होना था, परन्‍तु यह प्रोग्राम उक्‍त दिन नहीं हो पाया. इसके बाद से ही इस कार्यक्रम को आयोजित करने वाले पत्रकारों राष्‍ट्रीय सहारा के विजतेंद्र तोमर और डीएलए के नीरज कौशिक पर ठगी तथा अन्‍य कई तरह आरोप लगाए जाने लगे. एक पत्र भेजकर बताया गया है कि इस घटना को अकिंचन भारत तथा पंजाब केसरी अखबार ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है.

इस संदर्भ में जब भड़ास4मीडिया ने जब डीएलए के पत्रकार नीरज कौशिक से संपर्क किया तो उन्‍होंने बताया कि एक परिजन का निधन हो जाने के कारण कार्यक्रम को स्‍थगित करना पड़ा. हम इस कार्यक्रम को आगे कराएंगे. यह हमें बदनाम करने की साजिश है. हमलोग पर बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं. वहीं राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार विजतेंद्र तोमर ने कहा कि यह स्‍थानीय पत्रकारों की राजनीति है. वो अपनी निजी खुन्‍नस निकालने के लिए बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं.

क्या दैनिक जागरण ने एक लाख रुपये लेकर खबर का प्रकाशन रोक दिया?

दैनिक जागरण, बरेली में अब खबरें बिकने लगी हैं. अमर उजाला और हिंदुस्‍तान ने जिस खबर को प्रमुखता से छापा जागरण उसी खबर को घोंट गया. गीता नामक पाठिका ने पत्र भेजकर भड़ास4मीडिया को सूचित किया है कि प्रशासन ने एक भ्रामक विज्ञापन के मामले में नाइस कालेज पर छापेमारी की. इस खबर को अमर उजाला और हिंदुस्‍तान ने प्रमुखता से छापा पर जागरण इस खबर को पैसा लेकर खा गया.

गीता ने पत्र में लिखा है कि इस खबर के लिए संपादकीय के दो वरिष्‍ठों ने एक होटल में बैठकर इस खबर को न छापने के लिए समझौता किया था. इसके लिए एक लाख रुपये में डील हुई थी. इन दोनों संपादकीय कर्मियों ने सीजीएम एएन सिंह को अंधेरे में रखकर गुमराह किया तथा उन्‍हें गलत कहानी सुनाई. इस डील के बारे में एएन सिंह को कोई जानकारी नहीं दी गई.

अमर उजाला में प्रकाशित खबर

हिंदुस्‍तान में प्रकाशित खबर

इतनी माइलेज तो बाइक भी नहीं देती, हम तो इंसान हैं

: राष्ट्रीय सहारा न्यूज ब्यूरो में किया जा रहा है कर्मचारियों का शोषण : रूहेलखण्ड मण्डल में राष्ट्रीय सहारा न्यूज ब्यूरो में काम कर रहे कर्मचारियों का धड़ल्ले से शोषण किया जा रहा है। दस-दस माह बीतने के बाद भी नहीं मिल पाया है मानदेय। मुख्यालय पर सम्पर्क करने पर कहा जाता है कि हम अपने संवाददाताओं से बात करते हैं कर्मचारियों से नहीं। इस कारण से कई कर्मचारी मानदेय न मिलने के कारण काम छोड़ कर चले जाते हैं।

उनके स्थान पर नये कर्मचारी लगाये जाते हैं तो उनके साथ भी वही व्यवहार होता है। क्या सहारा ग्रुप के सहारा श्री अपने ग्रुप में काम करने वाले कर्मचारियों को मानदेय देने से मना करते हैं। कागजी औपचारिकता के नाम पर महीनों परेशान किया जाता है। रुपये मांगने पर कहा जाता है कि काम करना है तो करो वरना रास्ता देखो। यही वजह है कि रूहेलखण्ड में दैनिक समाचार पत्र अपनी पकड़ नहीं बना पाया है। इसके ब्यूरोचीफ दलाली में लगे हुए हैं। बेखौफ होकर पत्रकारिता के सिद्धान्त ताक पर रखे जा रहे हैं। ब्यूरो चीफ सौ रुपये देकर सौ दिन काम कराना चाहता है, इतना माइलेज तो बाइक भी नहीं देती है तो हम तो इन्सान हैं। पीड़ा बयां करने वाले का पहचान गुप्त रखने का अनुरोध है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

राहुल गांधी के अमेठी दौरे के दौरान पत्रकारों पर हमला, एक घायल

राहुल गांधी का अमेठी दौरा कवर करना तीन न्‍यूज चैनलों के पत्रकारों को महंगा पड़ते-पड़ते बचा. रायबरेली से आजतक के पत्रकार शैलेंद्र सिंह, आईबीएन7 के महेंद्र प्रताप सिंह, इंडिया न्‍यूज के शिव प्रसाद यादव हुडंई आई टेन कार से राहुल का दौरा कवर करने के लिए अमेठी गए हुए थे. राहुल गांधी जब फुरसतगंज नहर कोठी के पास पहुंचे तो काफी संख्‍या में ग्रामीणों ने उनके काफिले को रोक लिया तथा अपनी परेशानी बताई.

ग्रामीणों की परेशानी सुनने के बाद राहुल आश्‍वासन देकर निकल गए. ये तीनों पत्रकार वहीं पर रुककर ग्रामीणों की बाइट ली तथा विजुअल बनाया. इसके बाद जब ये लोग जाने लगे तभी इनकी कार से एक बुजुर्ग साइकिल सवार को धक्‍का लग गया. हालांकि उन्‍हें ज्‍यादा चोटें नहीं आईं परन्‍तु ग्रामीणों ने इसकी गाड़ी घेर ली तथा अभद्रता करने लगे. पत्रकारों ने विरोध किया तो विवाद बढ़ गया. तब तक काफी संख्‍या में गांव वाले इकट्ठा हो गए तथा इन लोगों को मारने के लिए घेर लिया.

माहौल खराब होता देख ये लोग किसी तरह गाड़ी समेत वहां से निकले. इतने में गांव वालों ने उनकी गाड़ी पर पथराव शुरू कर दिया, जिससे गाड़ी चला रहे आजतक के पत्रकार शैलेंद्र सिंह को पत्‍थर लग गया तथा उनका सिर फट गया. इन लोगों की कार भी क्षतिग्रस्‍त हो गई. यह कार आईबीएन7 के रिपोर्टर महेंद्र प्रताप सिंह की बताई जा रही है. गांव वालों ने उन्‍हें काफी दूर तक दौड़ाया. परन्‍तु किसी तरह ये लोग बचकर निकलने में कामयाब रहे. इन लोगों ने किसी के खिलाफ मामला दर्ज नहीं कराया है.

इस संदर्भ में जब महेंद्र प्रताप सिंह से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि ये मामला कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी का था. हमलोग राहुल के काफिले के पीछे-पीछे चल रहे थे. कांग्रेसियों का एक गुट अन्‍ना के आड़ में पुराने लोगों का टिकट काटे जाने की मांग करने के लिए जगह-जगह अपने लोगों को फिट कर रखा था, जो राहुल से स्‍वच्‍छ छवि के प्रत्‍याशी को टिकट देने की मांग कर रहे थे. इन्‍हीं लोगों की भीड़ एक जगह इकट्ठी थी. राहुल गांधी का काफिला यहां नहीं रूका, पर जब तक हमलोगों की गाड़ी पहुंचती भीड़ का एक हिस्‍सा सड़क पर आ गया. इसी बीच किसी की साइकिल में हमारी कार हल्‍की टच हो गई. इन लोगों ने हमें भी राहुल गांधी के साथ का समझ लिया. इसी बीच किसी ने ड्राइविंग सीट वाले तरफ से पत्‍थर चला दिया, जिससे शैलेंद्र को चोट आ गई. इसके बाद किसी ने कोई बदतमीजी नहीं की. बाद में राहुल गांधी के साथ चल रही एम्‍बुलेंस के डाक्‍टरों ने शैलेंद्र को पट्टी बांधा. गाड़ी को ज्‍यादा नुकसान नहीं हुआ, इसलिए हमने एफआईआर दर्ज कराना भी उचित नहीं समझा.

यूएनआई के वरिष्‍ठ खेल पत्रकार गौतम साठे का निधन

यूएनआई के वरिष्‍ठ खेल पत्रकार गौतम साठे का गुरुवार की रात थाणे स्थित आवास पर हार्टअटैक से निधन हो गया. वे 42 साल के थे. वे बीते एक दशक से यूएनआई के साथ जुड़े हुए थे. वे अपने पीछे पत्‍नी, मां, भाई और एक बहन छोड़ गए हैं. साठे की तबीयत बिगड़ने पर उनके परिजन उन्‍हें पास के एक अस्‍पताल ले गए परन्‍तु डाक्‍टरों ने उन्‍हें मृत घोषित कर दिया.

गौतम साठे ने यूएनआई के कई बड़े स्‍पोर्टस एसाइनमेंट कवर किए थे. वे 2008 में मुंबई पर हुए आतंकी हमले के दौरान मेट्रो सिनेमा के पास आतंकवादियों की गोली से बाल बाल बच गए थे. गौतम साठे का अंतिम संस्‍कार उनकी मां और भाई के पहुंचने के बाद कल किया जाएगा.

झारखंड के ब्‍यूरो कार्यालयों से हटा दिए जाएंगे कम्‍प्‍यूटर ऑपरेटर

हिंदुस्‍तान प्रबंधन खर्च घटाने के नाम पर रोज-रोज नए फरमान जारी करता रहता है. नई खबर है कि झारखंड में अगले महीने से सभी ब्‍यूरो कार्यालयों से कंपोजिटरों को हटाने का आदेश दे दिया गया है. अमूमन हर अखबार के ब्‍यूरो कार्यालयों में रिपोर्टरों की खबरों को टाइप करने के लिए कंपोजिटर यानी कम्‍प्‍यूटर ऑपरेटर रखे जाते हैं, पर हिंदुस्‍तान अब इनको हटाकर अपना खर्च कम करने जा रहा है.

हिंदुस्‍तान के तहसील कार्यालयों पर काम करने वाले रिपोर्टरों को पहले ही लैपटॉप लेने का फरमान जारी कर दिया गया था, ताकि ब्‍यूरो कार्यालयों में फैक्‍स आदि का खर्च कम हो. 22 जिलों वाले झारखंड में ज्‍यादातर तहसीलों के प्रतिनिधियों ने प्रबंधन के आदेश के बाद पहले ही लैपटॉप खरीद लिया था या उधार-नगद करके अपना काम चला रहे थे. तहसील प्रतिनिधियों द्वारा टाइप किया मटेरियल भेजे जाने के चलते ब्‍यूरो कार्यालयों पर भी काम कम हो गया है. बताया जा रहा है कि अब ऑपरेटर का काम खुद प्रतिनिधियों को करना होगा. वे अपनी रिपोर्ट खुद टाइप करेंगे, जिन रिपोर्टरों को टाइप करने नहीं आता उन्‍हें जल्‍द से जल्‍द यह काम सीख लेने का निर्देश भी दे दिया गया है.

दूसरी तरफ, झारखंड में हिंदुस्‍तान का कई जिलों में प्रसार भी लगातार गिरता जा रहा है. खबर है कि कोडरमा, हजारीबाग, पलामू समेत कुछ अन्‍य जिलों में अखबार का प्रसार संख्‍या लगातार गिरता जा रहा है. इसने भी प्रबंधन को चिंता में डाल रखा है, जिससे खर्च कम करने के उपाय किए जा रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि मैनेजमेंट जल्‍द ही झारखंड में कुछ फेरबदल करने की योजना बना रहा है. जमशेदपुर यूनिट को लेकर कुछ ज्‍यादा ही चर्चाएं हैं. चर्चानुमा सूचना के अनुसार जमशेदपुर में बनारस से किसी वरिष्‍ठ के भेजे जाने की बात चल रही है. एक दो नामों पर कयास भी लगाया जा रहा है, पर किसे भेजा जाएगा अभी पुष्‍ट नहीं हो पा रहा है.

लांचिंग से पहले ही खबर भारती को झटका, आउटपुट हेड अभिषेक श्रीवास्‍तव का इस्‍तीफा

: नीरज ने हिंदुस्‍तान को बाय किया : डाक इंचार्ज बने विनोद शर्मा :  खबर भारती से अभिषेक श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर आउटपुट हेड थे. लांचिंग से पहले ही अभिषेक का जाना खबर भारती के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है. मूलरूप से गाजीपुर के रहने वाले अभिषेक ने करियर की शुरुआत यूएनआई से की थी. इसके बाद नवभारत टाइम्‍स, दैनिक भास्‍कर, इकोनॉमिक्‍स टाइम्‍स, सीनियर इंडिया और बीएजी के साथ जुड़े रहे हैं. अभिषेक फ्रीलांसिंग के साथ अनुवाद का काम भी करते रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि खबर भारती के सीईओ नाजिम नकवी से किसी बात पर विवाद होने के बाद इन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया. इस संदर्भ में पूछे जाने पर अभिषेक श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफे की पुष्टि की परन्‍तु और कुछ भी बताने से इनकार कर दिया.

हिंदुस्‍तान, एटा से नीरज सक्‍सेना ने इस्‍तीफा दे दिया है. दो दिन पूर्व ब्‍यूरोचीफ से अनबन होने के बाद नीरज अवकाश पर चले गए थे. नीरज ने करियर की शुरुआत 98 में राष्‍ट्रीय सहारा से की थी. कई वर्षों तक यहां रहने के बाद वे हिंदुस्‍तान से जुड़ गए थे. इसके बाद अमर उजाला ज्‍वाइन कर लिया था, परन्‍तु बाद में उन्‍हें प्रबंधन ने वापस बुला लिया था. संभावना है कि वे फिर अमर उजाला से जुड़ सकते हैं.

राष्‍ट्रीय सहारा, वाराणसी से खबर है कि पिछले दिनों अभयानंद शुक्‍ल की अस्‍थायी रूप से डाक इंचार्ज बनाए गए विनोद शर्मा को स्‍थायी प्रभारी बना दिया गया है. वे बनारस ज्‍वाइन करने से पहले नोएडा मुख्‍यालय पर कार्यरत थे.

80 देश, 550 विदेशी पत्रकार और एकमात्र भारतीय श्‍यामलाल यादव का लेक्‍चर

अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए कई पुरस्‍कार प्राप्‍त कर चुके वरिष्‍ठ पत्रकार एवं इ‍ंडिया टुडे के एसोसिएट एडिटर श्‍यामलाल यादव को कीव (उक्रेन) में खोजी पत्रकारिता पर व्‍याख्‍यान देने के लिए आमंत्रित किया गया था. 13 से 16 अक्‍टूबर तक कीव में आयोजित ग्‍लोबल इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्‍म कांफ्रेंस में श्‍यामलाल यादव ने ‘डाटा फ्लड इन इंडिया आफ्टर आरटीआई’ विषय पर अपना स्‍पीच/लेक्‍चर दिया.

इस कांफ्रेंस में अस्‍सी देशों के साढ़े पांच सौ पत्रकारों ने भाग लिया. परन्‍तु व्‍याख्‍यान देना का मौका गिने चुने लोगों को ही दिया गया. गौरतलब है कि कीव में आमंत्रित किए जाने के साथ  श्‍यामलाल यादव की इसी खोजी रिपोर्ट को यूनेस्‍को ने विश्‍व के तीस महत्‍वपूर्ण खोजी रिपोर्टों के साथ चुना था, जिसे उन्‍होंने सेमिनार में प्रस्‍तुत किया. उल्‍लेखनीय है कि श्‍यामलाल यादव की गिनती देश के दिग्‍गज खोजी पत्रकारों में होती है. वे इसके पहले पिछले साल दिसम्‍बर में प्रतिष्ठित लारेंजों नटाली पुरस्‍कार भी प्राप्‍त कर चुके हैं. उन्‍हें पिछले वर्ष खोजी पत्रकारिता के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्‍कार भी दिया गया था. नीचे श्‍यामलाल यादव द्वारा तैयार किया गया लेक्‍चर.


DATA FLOOD IN INDIA AFTER RTI

Shyamlal Yadav

64 years ago, when India became Independent, sceptics predicted that democracy cannot succeed in a country like ours. Yet no country has more heroically pursued the promise of democracy. Against the odds of staggering poverty, conflicting religious passions, linguistic pluralism, regional separatism, caste injustice and natural resource scarcity, Indians have lifted themselves to become a stalwart democracy and emerging global power. One of the reasons for this are the strong institutions that we have, among them, an independent judiciary, defense services that are absolutely no political; and last but not least, a free and fair press.

The media in India have been fiercely independent. And it is with a large measure of pride that I say that the magazine I work India Today was responsible for the resignation of Prime Minister IK Gujral. Having said that, I must also say that the media work under great constraints, largely due to the obstacles that governments frequently put up to hinder journalists exposing government misdoing.

It is in this context that when, after a long battle, Right to Information (RTI) i.e. Freedom of Information (FOI) Act was made a reality in India in October 2005, it was supposed to be a great weapon for ordinary citizen to make government machinery accountable and transparent. Within just few months of implementation of this act many success stories started coming out. These were related to small issues of lives of ordinary citizen like problems related to ration cards, electricity, passport, telephone, school admission etc. Many scandals in last five years involving politicians and bureaucrats, defence personnel were unearthed and in many scandals the course of investigations were changed due to credible documents received through RTI Applications.

This is still going on and due to some recent revelations of inter-ministry conflicts government representatives has started targeting the openness under this act. But common citizen apart, what the journalists need to do under RTI Act? After the enactment of this historic act, the editors at India Today thought that it could be a greater weapon for investigative journalism. Considering that with the growing number of news channels, news papers and magazines the competition for getting something EXCLUSIVE through traditional means of investigative reporting had become more and more difficult, they assigned me to explore and expose the mismanagement of public money at high offices of our country, by using this act.

That is how I started to work on this new dimension of investigative journalism. In fact, there is no prominent government office in the country including union ministries and departments, their subordinate offices, Public Sector Undertakings, investigation agencies, police organisations, Lok Sabha and Rajya Sabha secretariats, Election Commission of India, planning commission, Central Vigilance Commission, state governments, chief ministers offices, secretariats of state assemblies and legislative councils where my RTI applications have not reached. Wherever I smell a story I filed an RTI. Some stories have already been published and many more are in the process. I have so far filed around 2500 RTI applications across the country and many stories were result of these.

In a news organisation no journalist can think that his or her employers will allow him or her to work for months on a single story, therefore I work simultaneously on number of ideas and file them when they get matured. Like, the story selected for UNESCO CASEBOOK this year STREAMS OF FILTH was a result of around 39 RTI applications and it took almost a year before it was published in India Today dated 30th December 2009. In the process I collected the information from various stake holders of the river pollution control mechanism in our country one-by-one.

First and foremost story under this exercise was published as FREQUENT FLIERS and the headline on cover was THE FLYING CABINET. That was a cover story in our magazine dated 18th February 2008 but it needed lot of patience and persistent efforts. Crux of the story was: “Seventy-one of the 78 UPA ministers (besides prime minister) have made 786 foreign trips spending about 3,798 days and travelling 1.02 crore km in 1,287 days.” Getting this information from an office which is more trained for hiding the information was not an easy task. I filed first RTI application on 27th September 2007 to Prime Minister’s Office asking the details of foreign travels made by union ministers with a format as countries, cities, dates, number of companions, expenses made etc. In fact, in response to that application, they provided every detail baring the purpose of visit and the expenditure made upon those trips. For expenses it said, “The culled information does not include expenditure involved in each trip which this office does not maintain and may be obtained from individual ministries/departments.” Therefore, with in next two days I sent RTI Applications to each and every union ministry asking for the details of foreign travels made by union ministers in each ministry. I got reply from each ministry baring Defence and Textiles and for these two we used the information gathered from PMO. In fact, the information of all the ministries was cross checked with the document provided by PMO. I compiled the relevant information and calculated the distance covered by each and every minister and when I totaled the distance of travels made by all the ministers it was 1.02 crore kilometres and when I divided it by the circumference of the earth the result was 256 and that was the punch line of my story that “THE MINISTERS OF THE UPA TRAVELLED AT WILL TO LOG ENOUGH MILES TO CIRCLE THE EARTH 256 TIMES.” This story was a result of four month exercise and information was gathered through 59 RTI applications from all the union ministries.

Impact of this story was that after a few months on 4th June 2008 Prime Minister Mr. Manmohan Singh wrote personal letters to all of his ministers that they should curtail the foreign travel expenditure and thus the issues raised in our story were proved. His letter was addressed to every minister and part of it was like this: “I am, therefore, writing to ask you to severely curtail expenditure on air travel, particularly foreign travel, except in cases where it is deemed to be absolutely necessary. This economy may be made applicable immediately for your own self and also for all senior functionaries in your ministry.”

Soon, I filed RTI applications to all union ministries asking the details of foreign travel made by the bureaucrats of director and above ranks for the same period as for ministers. It took around six months to come the information from each ministry baring three, and I compiled the figures from the information we received in 1297 pages in total and calculated the distances of foreign travel destinations of bureaucrats like I did in the Ministers’ story. It took over a month to calculate the distances of destinations of around 10,000 trips made by such officers excluding the long stay travels for fellowships/study tours etc. Even a minor mistake could have created a problem for me, therefore, I did not take any chance and I crosschecked the data again and again. This time the formula of circumference of the earth has become old, therefore I thought something new. When final figures of bureaucrats’ mileage came out as 5.65 crore kilometers I divided this figure by the distance of moon and back and the result was 74. Therefore, this was the punch line that “1,576 officials of 46 Central ministries have travelled 5,65,62,426 kilometers, which is equivalent to 74 trips to moon and back. They collectively stayed abroad for 24,458 days (over 67 years) and spent over Rs 56,38,03,300 in less than three-and-a half years (January 1, 2005 to April 30, 2008) on official trips.” This story was published in India Today dated 15th September 2008. The information for this story was result of over 80 RTI applications, reminders and appeals.

Both these stories of foreign travel made by the people who are running our government system created lot of discussion and curtail the foreign travel expenditure had become a slogan of austerity drive thereafter. Few days after the bureaucrats foreign travel story the union Finance Ministry issued two circulars (dated 23rd September and 1st October 2008) regarding the austerity in foreign travel and the last circular dated 1st October 2008 said, “All mileage points earned by Government employees on tickets purchased for official travel shall be utilised by the concerned Department for other official travel by their officers. It is responsibility of the officer concerned to ensure that free mileage points are used only for official travel and not for personal trips. Any other incentives and similar packages like free companion etc should be so negotiated by Ministries/Departments so that the benefit comes to the department.”

Though, I realised that on some of the ideas my efforts were waste but many ideas worked well and made an impact. And that is main inspiration and motivation along with my editors’ support for me to explore more. There are number of experiences in my mind through this exercise that how thick skinned our bureaucracy is. Interestingly, when I filed separate RTI applications to the Prime Minister’s Office and the Cabinet Secretariat, the two high offices of our system, asking them about the implementation of code of conduct for union ministers with regard to declaration of their assets and liabilities. The PMO responded that the requisite information was concerned with Cabinet Secretariat and the Cabinet Secretariat responded that the same was concerned with the PMO. The said code of conduct came into existence way back in 1964 by a resolution of union council and its copy was forwarded to every state government to follow the same. But it was not being implemented since it is not mandatory. The responses of both high offices were reflecting the confusion of implementation of the same. I sent the letters back to both offices with one’s response to other. After all I got a letter from Cabinet Secretariat that they were compiling the information and will get back. Our story about this confusion among authorities was published as OPEN SECRET in India Today dated 30th June 2008. Success to it was that many RTI activists started the same exercise and finally in the present government, all the ministers have filed their details of assets and liabilities and now it has been put on the website as well. That was a great impact created by our story. Thanks to similar exercise a story was published on the system of assets declaration in provinces’ government. The impact was too quick that the story on their apathy was published in February 2009, and now the governments of every province are implementing that system one-by-one which was not implemented since 1964.

Another experience I have is the dealing with Central Bureau of Investigation (CBI). For a story it took me complete one year and I had to file over 100 RTI applications, reminders and appeals. In fact I filed an application to CBI asking the details of anti corruption cases registered against the officers of Indian Administrative Service (IAS), India Police Service (IPS) and Indian Revenue Service (IRS) during last 15 years. I compiled the list of accused bureaucrats and send to the Central Vigilance Commission (CVC) and the Department of Personnel and Training (DoPT), Ministry of Home Affairs (MHA) and Ministry of Finance, the cadre controlling authorities for IAS, IPS and IRS respectively, asking that what actions have been taken against them till date. The story was published as A LOT TO HIDE in India Today dated 7th April 2008 and the crux of the story was that “The cozy relationship that bureaucrats share makes the wheels of justice grind real slow.”

Another interesting experience is with Life Insurance Corporation of India (LIC). We came to know through my application from LIC that there have been 5.91 crore policies which were lapsed permanently during seven years due to discontinuance of the premium. I thought, the huge money of ordinary citizen went to government accounts, therefore, I filed another appeal requesting that how much total money have been deposited against those policies till the date they lapsed permanently. They responded that the requisite information was exempted since it will divert extra ordinary resources. When I approached Central Information Commission (CIC) the Information Commissioner Mr AN Tewari decided the case against me. But we posted a single column story on our website on 24th December 2008. It impacted very quickly and on 19th January 2009 LIC issued an advertisement in prominent newspapers that it was going to launch the revival scheme for revival of those (permanently lapsed policies) for the first time. To know that whether it was really first time in the history of LIC, I approached LIC and it confirmed us that “We have launched this revival scheme for the first time as an experiment. After examining the responses of policy holders, we will decide what to do further with our rules.” It was clear that it was an impact of my story.

There are number of such stories which are finding space in India Today time to time. In my experience, the RTI is as much powerful weapon for media as is the article 19-1-A of Constitution of India which gives Freedom of Speech and Expression. In the age of media revolution where everybody is struggling for exclusive and credible information we have proved that the RTI act is a great weapon but unfortunately there are very few journalists who use this act for their professional purposes. One more problem is that the government machinery which is trained to hide the information is by the time learning that how to mishandle the RTI application and how to confuse the applicant. But RTI Act has certainly so much power that the government servants can be forced to work properly if they want to remain on their posts. With the effectiveness of this act only those people may prefer to join the government services who want to be PUBLIC SERVANTS in real sense. Other stories include that how the 20 percent personal foreign trips made by union ministers have been for Dubai; how the Deputy Chairperson of Planning Commission has made 42 foreign trips abroad in seven years and spent every ninth day abroad. There are numerous such ideas I am still working upon.

RTI has certainly opened a new scope for media but unfortunately most of the media is depending upon Non Government Organisations (NGOs) and some RTI activists for this type of information. There are very few journalists who are visualising ideas themselves and exploring information from the government machinery using RTI act. Thanks to far sightedness of our editors, we at India Today are exception in this regard and we are getting information under RTI. Most of my stories which were explored through RTI applications were almost impossible without RTI Act. It is fact that, out of 78 ministers involved in ministers Foreign travel story and around 1500 officers involved in officers foreign travel story there was not a single rejoinder from anybody in contradiction of our facts and that’s the beauty of RTI act for the media. But this is up to the media to make this reality. At India Today we did it and we are still doing it. We have proved that RTI is a great weapon for media. And while the RTI Act is a reality in over 70 countries, it is for journalists to make the best use of it let people know what their rulers are doing in the name of governance.

Shyamlal Yadav is Senior Editor with India’s leading weekly India Today and is awarded by number of journalism awards at national and international level for his journalistic work. His list of awards include: Lorenzo Natalie Journalism Prize (2010), Developing Asia Journalism Award (2010), Best Investigative Reporter of India (2010), First National RTI Award-2009, Statesman Rural Reporting Award-2007.

करोड़ों की जमीन कौडि़यों में खरीदी आईपीएस अधिकारियों ने, आई-नेक्‍स्‍ट ने खोला पोल

यूपी के आईपीएस अफसर कितने ईमानदार हैं, इसका पोल खोला है आई-नेक्‍स्‍ट ने. इस बाइलिंगुअल टैबलाइड ने यूपी के विभिन्‍न जिलों और मण्‍डलों में पदास्‍थापित आईपीएस अधिकारियों द्वारा दाखिल किए गए दस्‍तावेजों के आधार पर खुलासा किया है कि इन लोगों ने करोड़ों की जमीन कौडि़यों में पाई है. ज्‍यादातर आईपीएस अफसरों के पास करोड़ों की जमीन हैं लेकिन इन्‍होंने गलत सूचना देते हुए अपने प्रॉपर्टी की कीमत मान्‍य सर्किल रेट से बहुत कम बताई है.

इन पुलिस अधिकारियों ने आधी अधूरी जानकारी विभाग को दी है. ज्‍यादातर अधिकारियों ने प्रॉपर्टी का सौदा अपने पत्‍नियों के नाम से किया है. अखबार अपने इंट्रो में लिखता है – ”राजधानी के चिनहट एरिया में प्‍लाट की वैल्‍यू पांच रुपये स्‍क्‍वायर फीट, गोमती नगर में पचास रुपये स्‍क्‍वायर फीट और दिल्‍ली के करीब गाजियाबाद में केवल 86 रुपये स्‍क्‍वायर फीट, ग्रेटर नोएडा का रेड 294, नैनीताल का 190 रुपये स्‍क्‍वायर फीट, देहरादून में 130 रुपये स्‍क्‍वायर फीट. यह तो रही अर्बन एरिया की बात. रुरल एरिया में शुरुआत पौने चार रुपये स्‍क्‍वायर फीट से है. माफ कीजिएगा यह कीमत आपके लिए नहीं है. इस भाव में जमीन खरीदने के लिए कम से कम आपको आईपीएस होना जरूरी है.”

इस खबर में बताया गया है कि जो दस्‍तावेज आई-नेक्‍स्‍ट के हाथ लगे हैं. उसके अनुसार अधिकारियों ने इसी कीमत पर अपनी प्रॉपर्टी का वैल्‍यूएशन किया है, जबकि वास्‍तविक तौर पर मौजूदा सर्किल रेट इससे कई गुना ज्‍यादा है. करोड़ों की प्रॉपर्टी की कीमत लाखों में बताई गई है. आई-नेक्‍स्‍ट की लिस्‍ट में कई चर्चित आईपीएस अधिकारियों के नाम हैं, जिनमें प्रेम प्रकाश, रघुवीर लाल, राजेश कुमार राय, गोपाल गुप्‍ता, विजय कुमार, जावेद अख्‍तर, अमिताभ ठाकुर, प्रमोद कुमार तिवारी, आशीष गुप्‍ता, ध्रुवकांत ठाकुर, चंद्र प्रकाश, राजेंद्र पाल सिंह, राजकुमार के नाम शामिल हैं. हालांकि खबर में यह भी बताया गया है कि डा. पूर्णिमा सिंह, ब्रज मोहन सारस्‍वत एवं डा. कश्‍मीर सिंह जैसे अधिकारियों ने अपने प्रॉपर्टी की सही कीमत बताने की हिम्‍मत भी दिखाई है. नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढि़ए आई-नेक्‍स्‍ट में प्रकाशित महानुभावों की खबर.

करोड़ों की जमीन कौडि़यों में खरीदी अफसरों ने (एक)

करोड़ों की जमीन कौडि़यों में खरीदी अफसरों ने (दो)

पेड न्‍यूज मामले में बसपा विधायक उमलेश यादव अयोग्‍य घोषित

: महाराष्‍ट्र के सीएम अशोक चव्हाण के खिलाफ भी हैं ऐसी शिकायतें : नई दिल्ली : चुनाव आयोग ने पेड न्यूज मामले में किसी राजनीतिज्ञ के खिलाफ पहली बार कार्रवाई करते हुए उत्तर प्रदेश से विधायक उमलेश यादव को तीन साल के लिए अयोग्य करार दिया। आयोग ने महिला विधायक उमलेश यादव के खिलाफ यह कार्रवाई दो हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों पर हुए चुनाव खर्च के बारे में गलत बयान देने के लिए की है।

उमलेश यादव विवादों में घिरे डीपी यादव की पत्नी हैं। वह डीपी यादव की पार्टी राष्ट्रीय परिवर्तन दल के टिकट पर बिसौली (बदायूं) से विधायक चुनी गई थीं। बाद में राष्ट्रीय परिवर्तन दल का बसपा में विलय हो गया। इस सीट से चुनाव हारे उम्मीदवार योगेंद्र कुमार उर्फ कुन्नू बाबू ने उनके खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत की थी। योगेंद्र ने जुलाई 2010 में प्रेस काउंसिल से भी इस मामले की शिकायत की थी।

मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी के नेतृत्व वाले तीन सदस्यीय आयोग ने यह निर्णय उम्मीदवार योगेंद्र कुमार की शिकायत पर दिया जिसकी प्रेस परिषद में की गई शिकायत को सही पाया गया था और यही आयोग की कार्रवाई का आधार बना। उमलेश के खिलाफ हुई इस कार्रवाई के बाद अब महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण पर भी गाज गिर सकती है। उनके खिलाफ भी कुछ ऐसी ही शिकायतें दर्ज हैं। चव्हाण का मामला भी चुनाव आयोग के समक्ष लंबित है। (इनपुट : एजेंसी)

प्रभात खबर ने गया से शुरू किया अपना 10वां संस्‍करण

महातीर्थ गया से प्रभात खबर आज (21 अक्तूबर, 2011) से प्रकाशित होने लगा है. महात्मा बुद्ध की इस धरती, जहां से दुनिया को ज्ञान की रोशनी मिली, यहां से प्रकाशन शुरू करने वाला प्रभात खबर पहला दैनिक अखबार है. इसी के साथ प्रभात खबर बिहार का भी पहला ऐसा दैनिक अखबार हो गया है जो राज्‍य के चार शहरों, पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर और गया से प्रकाशित हो रहा है.

झारखंड के चार शहरों (रांची, जमशेदपुर, धनबाद व देवघर) से प्रकाशित होने वाला प्रभात खबर अकेला अखबार पहले से है. प्रभात खबर को पूर्वी भारत (बिहार, झारखंड व बंगाल) के सबसे ज्‍यादा 10 शहरों (रांची, पटना, जमशेदपुर, धनबाद, देवघर, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, गया, कोलकाता और सिलीगुड़ी) से प्रकाशित होने का भी गौरव प्राप्त है. इन तीन पूर्वी राज्‍यों के इतने शहरों से कोई दूसरा अखबार प्रकाशित नहीं होता है. इतना ही नहीं, बड़ी पूंजी वाले देश के बड़े घराने अपने प्रसार अभियान के तहत जहां देश के दूसरे हिस्सों में कम पूंजी वाले अखबारों की जमीन हड़प कर उन्हें बंद होने पर मजबूर कर रहे हों या कमजोर कर रहे हों, वहां छोटी पूंजी (अपने प्रतिस्पर्धियों की पूंजी के मुकाबले) के बल फैलने-ब़ढने का श्रेय भी अकेले प्रभात खबर को जाता है. 5000 करोड़ टर्न-ओवर या इससे भी ज्‍यादा बड़ी अखबार कंपनियों, देश के तीन सबसे बड़े अखबारों के मुकाबले देश में सिर्फ प्रभात खबर ही मजबूती से टक्कर ले रहा है. इस प्रतिस्पर्धा के बीच प्रभात खबर के बढ़ने की गति भी तेज हुई और आज वह देश के 10 बड़े हिंदी अखबारों के मुकाबले पाठक संख्या में सबसे तेज वृद्धि दर दर्ज कर रहा है.

पाठक सर्वेक्षण करनेवाली स्वतंत्र संस्था आइआरएस के 2011 की दूसरी तिमाही के सर्वे आंकड़ों के मुताबिक प्रभात खबर ने 2010 की दूसरी तिमाही के मुकाबले 41 फीसदी औसत पाठक जोड़े हैं और कुल पाठक संख्या के लिहाज से प्रभात खबर देश के शीर्ष 10 अखबारों में सातवें पायदान पर पहुंच गया है. आइआरएस के मुताबिक 2011 की दूसरी तिमाही में बिहार में प्रभात खबर की औसत पाठक संख्या में 27 फीसदी और अकेले पटना में 39 फीसदी की वृद्धि पहली तिमाही की तुलना में हुई है. यहां ध्यान देने की बात यह है कि इस आंकड़े में मुजफ्फरपुर और भागलपुर संस्करणों की पाठक संख्या शामिल नहीं है. प्रभात खबर की झारखंड में रोजाना लगभग चार लाख प्रतियां बिक रही हैं. तीनों राज्‍यों में कुल मिला कर प्रभात खबर की इस समय 7.35 लाख से ज्‍यादा प्रतियां रोजाना बिक (स्नेत- ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन जनवरी-जून, 2011 और सीए प्रमाणपत्र) रही हैं. बड़े अखबार, बड़े महानगरों या धनी राज्‍यों से बिहार-झारखंड में आये हैं या आ रहे हैं, लेकिन अविभाजित बिहार के रांची में लगभग 27 साल पहले (14 अगस्त 1984) जन्म लेने वाला प्रप्रभात खबर यहीं की मिट्टी से निकलकर अपने बलबूते तेजी से ब़ढ-फैल रहा है.

ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि प्रभात खबर की पत्रकारिता बाजार और भीड़ की पत्रकारिता नहीं है. प्रप्रभात खबर को अपनी मिट्टी यानी अपनी जन्मभूमि से रागात्मक लगाव है. हमारी पत्रकारिता का उद्देश्य व ध्येय साफ है, हम पारदर्शी तरीके से काम करते हैं. हमारी पत्रकारिता की मूल कसौटी है कि हमारे पाठक या हमारा समाज या राजनीति या राज्‍य, आज ज्ञान और विकास के जिस पायदान या स्तर पर खड़े हैं, वहां से हर दिन आगे ब़ढें. हम लोग विकास की दौड़ में पीछे छूट गये राज्‍य हैं. हम बीमार राज्‍यों में गिने जाते हैं. ये चुनौतियां बड़ी हैं लेकिन यह भी तय है कि हम-आप यानी यहां के नागरिक ही सार्थक पहल और कर्म से अपने समाज, अपने राज्‍य और अपनी दुनिया को बेहतर बना सकते हैं. हम जिस क्षेत्र में (गया-बोधगया और सामान्य तौर पर मगध) रहते हैं, उस जमीन में बिहार का सिरमौर बनने की सभी संभावनाएं मौजूद हैं. दुनिया के मानचित्र पर हमारी जमीन की एक अंतरराष्‍ट्रीय पहचान है. यानी हम खुद को सजग, जिम्मेदार व जवाबदेह बना कर सभी राज्‍यों के बीच बिहार को सिरमौर और बिहार में अपनी धरती, अपने क्षेत्र, अपने शहर को अव्वल बना सकते हैं. कर्म और व्यवहार के स्तर पर हम सब, यहां के हर नागरिक के लिए यह चुनौती है. इसमें हर कदम पर प्रभात खबर आपका सहयात्री और सहभागी है.

हम विद्यार्थी हों, नौकरी-पेशा हों, प्राध्यापक-शिक्षक हों, डॉक्टर हों, राजनीतिक हों, किसान हों, मजदूर हों, व्यापारी हों, गृहिणी हों, उद्यमी हों, सरकारी कर्मचारी हों, पुजारी हों या कुछ और हों, हम हर तबके, हर वर्ग के लोग यानी हर व्यक्ति आज जहां खड़ा है, वहां से आगे ब़ढे – चेतना के स्तर पर, भौतिक स्तर पर और ज्ञान के स्तर पर. इस यात्रा में प्रभात खबर सीढ़ी और सहयोगी का काम करे, हमारी पत्रकारिता का कर्म व धर्म यही है. आज का समय ज्ञान का युग कहा जाता है. यदि आपके पास ज्ञान है, कौशल है और लगन है तो आप दुनिया में कहीं भी जाकर अपनी जगह बना सकते हैं. ज्ञान और कौशल आप तक पहुंचे और इसका माध्यम प्रभात खबर बने, यही हमारी पत्रकारिता का लक्ष्य है. देश और दुनिया का परिवेश तेजी से बदल रहा है और ऐसे में सब कुछ सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता और सब कुछ सरकारों के भरोसे संभव भी नहीं. हमें खुद अपने क्षेत्र और राजय में नवोन्मेष (इनोवेशन) व उद्यमिता (एंटरप्रेन्योरशिप) की नयी लहर पैदा करनी होगी. ऐसा परिवेश आपके सहयोग और सुझावों से ही संभव है.

अब तक प्रभात खबर गया में पटना से छप कर आता था. इसमें और गया में छपने पर क्या कोई अंतर पड़ेगा? अंतर होगा. अब प्रभात खबर आपको गया की ही नहीं देश-विदेश की देर रात की खबरों, घटनाक्रमों की जानकारी देगा. अब गया संस्करण की रचना गया की ही आबो-हवा में होनी शुरू हो गयी है. परिलक्षित होगा आपकी खबरों, आपके आसपास की खबरों, घटनाक्रमों की रिपोर्टिग में और ज्‍यादा गहराई, और ज्‍यादा पैनेपन के साथ. यानी प्रभात खबर अब आपके बीच रहकर आपकी बात करेगा और आपकी बुलंद आवाज बनेगा. आज गया से प्रकाशित प्रभात खबर का 10वां संस्करण आपके हाथों में सौंपते हुए हम आपसे उम्मीद कर रहे हैं कि हमारी जिस भिन्‍न और सोद्देश्य पत्रकारिता को आप पाठकों ने मान्यता दी है, उस पर पैनी निगाह रखने का काम भी आप करें, जिससे हम अनजाने में भी अपनी पत्रकारिता से डिगने न पायें. आपसे सुझाव और मार्गदर्शन की अपेक्षा है. साभार : प्रभात खबर

विज्ञापन कम, एमपी के रीजनल चैनलों का निकल रहा दम

मध्य प्रदेश में स्थानीय समाचार चैनल तो हैं, लेकिन बेहाल हैं। दरअसल स्थानीय खबरों को ही अपनी खासियत मानने वाले इन चैनलों को नामी ब्रांड के मुहर वाले क्षेत्रीय खबरिया चैनलों से जबरदस्त टक्कर मिल रही है। नतीजा, उनकी माली हालत खस्ता हो रही है।

राजधानी भोपाल में इस वक्त 3 चैनल स्थानीय खबरें दर्शकों तक पहुंचाते हैं। इंदौर में इनकी संख्या 5 है। ये चैनल जाहिर तौर पर स्थानीय केबल नेटवर्क के दम पर चलते हैं। इनमें अपने-अपने शहरों की खबरें ज्यादा दिखती हैं। भोपाल के प्रमुख स्थानीय चैनल बीटीवी के समाचार प्रमुख रवींद्र कैलाशिया ने बताया, ‘हमारे लिए तो स्थानीय खबरें ही खास हैं। इसमें शहर में होने वाले कार्यक्रमों से लेकर जनता के मुद्दे तक सभी हम दिखाते हैं।’

कवरेज ही इन चैनलों की खासियत है। इस मामले में ये राष्ट्रीय चैनलों से कम नहीं हैं। लाइफ स्टाइल हो या ज्योतिष या कोई समसामयिक मसला, ये चैनल सभी पर कार्यक्रम दिखाते हैं। हालांकि समाचार बुलेटिनों पर ज्यादा जोर दिया जाता है। इंदौर के ऐसे ही एक चैनल के शीर्ष अधिकारी ने बताया, ‘समाचार बुलेटिन पर हमारा ज्यादा ध्यान रहता है। जरूरत पड़े तो विशेष कार्यक्रम भी तैयार किए जाते हैं।’ लेकिन क्षेत्रीय सैटेलाइट चैनलों ने कमाई के मोर्चे पर इनका जीना हराम कर दिया है। बड़े कारोबारी घराने तो स्थानीय चैनलों को अनदेखा करते ही हैं, कई बार छोटे कारोबारी भी उनसे कन्नी काट जाते हैं। दरअसल स्थानीय चैनल टिकर (स्क्रीन पर नीचे चलने वाली पट्टी) पर दिन भर विज्ञापन चलाने के लिए 750 रुपये वसूलते हैं। 60 सेकंड का विज्ञापन 2,000 रुपये में प्रसारित किया जाता है। इसके उलट क्षेत्रीय चैनल 30,000 रुपये मासिक यानी 1,000 रुपये रोजाना पर टिकर विज्ञापन चलाते हैं। 1 मिनट के विज्ञापन के लिए वे 1,500 रुपये वसूलते हैं।

ऐसे में कम कीमत में शहर विशेष के बजाय पूरे राज्य में विज्ञापन प्रसारित कराने के लिए छोटे कारोबारी भी क्षेत्रीय चैनलों के पास ही पहुंच जाते हैं। अब तो हालत यह है कि शहर में होने वाले कवि सम्मेलन या भागवत कथा के विज्ञापन भी क्षेत्रीय चैनलों को मिलने लगे हैं। सरकारी विज्ञापन तो इन छोटे चैनलों के नसीब में पहले से ही नहीं हैं। भोपाल के एक स्थानीय चैनल के मार्केटिंग प्रमुख ने बताया, ‘सरकार के बजाय हमें छोटे और मझोले कारोबारी ही ज्यादा विज्ञापन देते हैं। अब वहां भी दिक्कत हो रही है।’

हालांकि कमाई कम होने पर भी वेतन के मामले में ये चैनल पीछे नहीं हैं। ट्रेनी रिपोर्टर से लेकर चीफ रिपोर्टर या प्रोड्यूसर तक की भर्तियां ये चैनल करते हैं। उनका वेतन 7,500 से 20,000 रुपये तक होता है। 1 चैनल में औसत 5 रिपोर्टर और 3 ऐंकर होते हैं। प्रोड्यूसर और मार्केटिंग अधिकारी अलग होते हैं। साभार : बीएस

पुलिस-प्रशासनिक उत्‍पीड़न के खिलाफ गाजीपुर के पत्रकारों ने मोर्चा खोला

: जिला मुख्‍यालय पर बेमियादी धरना-प्रदर्शन शुरू : गाजीपुर जनपद में प्रशासन द्वारा पत्रकारों का लगातार उत्पीड़न किये जाने की घटनाओं से क्षुब्ध होकर जनपद के समस्त पत्रकारों ने पूर्व घोषित कार्यक्रम के तहत जिला मुख्यालय के सरजू पाण्डेय पार्क में अपना बेमियादी धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया। बसपा सरकार में प्रशासनिक स्तर पर हो रहे लापरवाही का इससे बड़ा मिसाल क्‍या होगा कि स्वयं लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को अपनी मांगों के समर्थन में धरना प्रदर्शन का रास्ता अख्तियार करना पड़ रहा है।

पत्रकारों के धरना-प्रदर्शन पर बैठ जाने के चलते तमाम अखबारों व इलेक्ट्रानिक चैनलों के दफ्तर खाली पडे़ रहे। पत्रकारों के धरना प्रदर्शन को देखकर आम जनता में यह चर्चा जोरों पर रही कि इस शासन में जब पत्रकारों का ही यह हाल हो गया है कि उन्‍हें भी धरना-प्रदर्शन का रास्ता अख्तियार करना पड़ रहा है तो अब आम जनता अपनी मांगों को मनवाने के लिए कौन सा रास्‍ता अपनाएगी।

गाजीपुर पत्रकार एसोसियेशन के तत्वाधान में धरना दे रहे पत्रकारों ने जिला प्रशासन की कार्य प्रणाली की तीव्र भर्त्‍सना करते हुए कहा कि वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार गुलाब राय पर हुये शर्मनाक मामले में पुलिस सात माह बाद अज्ञात आरोपियों को भी गिरफ्तार नहीं कर पायी और न लूटे गये कैमरे को बरामद कर पाई। पत्रकार अनिल उपाध्याय के जमीन सम्बन्धी विवाद में न्यायालय द्वारा बिना जमानती वारण्ट जारी होने के बावजूद नामजद आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर रही है। पत्रकार अनिल कश्यप के मुहल्ला झण्डातर स्थित दुकान सम्बन्धी विवाद में पुलिस द्वारा एकतरफा करते हुए आरोपी के खिलाफ कार्रवा करने की बजाय उल्टे पत्रकार अनिल कश्यप का ही उत्पीड़न किया जा रहा है। ईटीवी के छायाकार संजीव की गत 9 अक्टूबर को हीरो होण्डा मोटरसाइकिल रेलवे स्टेशन से गायब हो गयी, जिसकी बरामदगी पुलिस आजतक नहीं कर पायी।

वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि पत्रकार व प्रशासन के बीच सामन्जस्य स्थापित करने हेतु शासन के निर्देशानुसार स्थायी पत्रकार समिति का जिले में गठन किया जाय। पत्रकारों ने चेतावनी दी कि यदि इन मांग को यथाशीघ्र पूरा नहीं किया गया तो आम नागरिकों को भी इस आन्दोलन से जोड़ा जायेगा और जब जनपद के पत्रकार, अधिवक्ता, बुद्धिजीवी, सामाजिक, राजनैतिक कार्यकर्ता, छात्र व अन्य संगठन जुड़ जायेंगे तो आन्दोलन की धार को रोकना प्रशासन के लिए मुश्किल हो जायेगा।

धरने में वरिष्‍ठ पत्रकार कार्तिक कुमार चटर्जी, सत्येन्द्र नाथ शुक्ला, अशोक कुमार श्रीवास्तव, लोकनाथ तिवारी, अभय नरायण राय, अनिल निर्मल, राधेश्याम यादव, रामअवध यादव, आदित्य नरायण सिंह, जयशंकर राय, दयाशंकर राय, पंकज पाण्डेय, अनिल कुमार उपाध्याय, रितेश पाण्डेय, बालाजी पाण्डेय, आशीष कुमार राय, यशवन्त सिंह, दीपक दयाल पाण्डेय, बृजबिहारी पाण्डेय, डा. एके राय, विजयशंकर तिवारी, अनिल कुमार, राजकमल, अभिनव चतुर्वेदी, विनोद पाण्डेय, पदमाकर पाण्डेय, रमाकान्त पाण्डेय, आरसी खरवार, हरिनरायण, केके चटर्जी, नरेन्द्र पाण्डेय, राजेश खरवार, वेदप्रकाश शर्मा, सूर्यवीर सिंह, विनय कुमार सिंह, शशिकान्त यादव, राजेश दूबे, श्याम सिन्हा, आशुतोष त्रिपाठी, कृपाशंकर राय, अजय शंकर तिवारी, फुलचन्द भारती, अनिल कुमार अनिलाभ, अनन्त प्रकाश वर्मा, पं. कृष्ण बिहारी द्विवेदी, नवीन कुमार श्रीवास्तव, अविनाश प्रधान एडवोकेट, शशिकान्त सिंह, ललित मोहन, तुषार सिंह, विनोद सिंह, चन्द्र कुमार तिवारी आदि लोग उपस्थित रहे। धरने की अध्यक्षता बीके राय एवं संचालन विजय कुमार मधुरेश ने किया।

जागरण प्रोन्‍नति परीक्षा में एलएन त्रिपाठी अव्‍वल, नौ अन्‍य भी सफल

: ढाई सौ लोगों ने दी थी परीक्षा : इलाहाबाद : प्रोन्‍नतियों को लेकर जागरण द्वारा शुरू किये गये परीक्षा आयोग ने वाराणसी संस्‍करण के एलएन त्रिपाठी को योग्‍यतम पाया है। उनके साथ नौ अन्‍य लोग भी मुख्‍य उप सम्‍पादक और मुख्‍य संवाददाता की श्रेष्‍ठता सूची में शामिल हैं। इस परीक्षा में करीब ढाई सौ पत्रकारों ने भाग लिया था।

इलाहाबाद मूल के रहने वाले और वर्तमान में वाराणसी दैनिक जागरण में कार्यरत एलएन त्रिपाठी को जागरण की आंतरिक परीक्षा में सर्वश्रेष्‍ठ अंक हासिल हुए हैं। उन्‍होंने ऑन लाइन लिखित परीक्षा में अव्‍वल होने के साथ ही साक्षात्‍कार बोर्ड के सभी सवालों के जवाब सफलतापूर्वक देने के चलते भी सर्वाधिक नम्‍बर मिले। अब तक घोषित दस सफल प्रतिभागियों में एलएन त्रिपाठी का नाम सर्वोच्‍च है।

श्री त्रिपाठी जागरण के पहले हिन्‍दुस्‍तान के इलाहाबाद संस्‍करण में कार्यरत थे। फिर वे दैनिक जागरण इलाहाबाद से जुड़े लेकिन कुछ ही समय बाद वहां की राजनीति के चलते भी उनकी पटरी नहीं खायी और आखिरकार उन्‍हें वाराणसी जागरण से सम्‍बद्ध कर दिया गया।

बहरहाल, इन प्रोन्‍नतियों की परीक्षा में सफल एलएन त्रिपाठी के अलावा सेंट्रल डेस्‍क की स्मिता श्रीवास्‍तव, लखनऊ से राजीव ओझा, वाराणसी से ही सुरेश पाण्‍डेय, अलीगढ़ से नवीन सिंह, इलाहाबाद से अम्बिका बाजपेई, लखनऊ से ही सुभाष सिंह, कानपुर सेंट्रल डेस्‍क से धर्मेंन्‍द्र पांडेय, आगरा से राजेश मिश्र, पटना से अमित आलोक और देहरादून से किरण शर्मा शामिल हैं।

गुमराह करने वाले विज्ञापनों पर रोक के लिए नियामक ईकाई गठित करेगी सरकार!

गुमराह करने वाले विज्ञापनों को लेकर ग्राहकों की बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर सरकार टेलीविजन, केबल तथा प्रिंट मीडिया पर आने वाले ऐसे प्रचार पर रोक लगाने के लिए नियामकीय इकाई गठित करने पर विचार कर रही है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि हम गुमराह करने वाले विज्ञापनों पर अंकुश लगाने के लिए नियामकीय एजेंसी गठित करने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

मंत्रालय ने गुमराह करने वाले विज्ञापनों से निपटने के उपायों पर चर्चा के लिए इस साल अगस्त में अंतर-मंत्रालयी समिति गठित की थी। पिछले महीने प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी इस प्रकार के विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए मंत्रालय को नियामकीय प्रणाली तैयार करने का निर्देश दिया था। अनुचित व्यापार व्यवहार से उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की जिम्मेदारी मंत्रालय के पास है। नियामकीय एजेंसी के अलावा मंत्रालय विशेषज्ञों से इस बात पर भी चर्चा कर रहा है कि क्या गुमराह करने वाले विज्ञापनों को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत अनैतिक व्यापार व्यवहार के रूप में विश्लेषित किया जा सकता है।

कानून के तहत अनैतिक व्यापार व्यवहार को अपराध माना जाता है। इसका विस्तार करते हुए इसमें गुमराह करने वाले विज्ञापनों को शामिल किया जा सकता है। अधिकारी ने कहा कि मंत्रालय इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या उपभोक्ता संरक्षण कानून को संशोधित कर इसके दायरे को बढ़ाया जाए या इस प्रकार के विज्ञापनों की निगरानी के लिए कार्यकारी इकाई गठित करने हेतु नया विधेयक लाया जाए।

उन्‍होंने कहा कि फिलहाल टेलीविजन, रेडियो, केबल तथा प्रिंट मीडिया पर आने वाले विज्ञापनों की नियमन भारतीय विज्ञापन गुणवत्ता परिषद तथा न्यूज ब्राडकास्टिंग एसोसिएशन जैसे निजी निकायों द्वारा किया जाता है। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि विज्ञापनों के जरिये ग्राहक गुमराह नहीं हो। फिलहाल ऐसी कोई उचित प्रणाली नहीं है जिससे ऐसे विज्ञापनों के जरिये वादा करने वाली कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

अधिकारी ने कहा कि फिलहाल खाद्य प्रसंस्करण, स्वास्थ्य तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय अलग-अलग विभिन्न कानूनों के तहत गुमराह करने वाले विज्ञापनों से निपटता है। दुनिया में कम से कम 30 से 40 ऐसे देश हैं जहां स्व-नियमन है। कुछ देशों में कार्यकारी निकाय या व्यापार आयोग है जो गुमराह करने वाले विज्ञापनों से निपटता है। साभार : हिंदुस्‍तान

केंद्र सरकार ने पांच कश्‍मीरी अखबारों का विज्ञापन बंद करने का निर्देश दिया

भारतीय कश्मीर के कुछ अख़बारों में कथित भारत विरोधी प्रचार को देखते हुए केंद्र सरकार ने उन अख़बारों को सरकारी विज्ञापन देना बंद करने का दिशानिर्देश जारी किया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से सभी केंद्रीय मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को ये दिशानिर्देश जारी किया है, जिसके तहत पाँच अख़बारों को वित्तीय मदद और विज्ञापन नहीं दिया जाएगा.

कश्मीर टाइम्स के अलावा, अँगरेज़ी दैनिक ग्रेटर कश्मीर और राइज़िंग कश्मीर और उर्दू अख़बार बुलंद कश्मीर और एत्तलात पर ये प्रतिबंध लगाया जा रहा है. वैसे स्थानीय मीडिया संस्थानों को वर्षों से सरकारी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है. पिछले तीन वर्षों से स्थानीय टेलीविज़न चैनलों पर समाचारों का प्रसारण प्रतिबंधित है जबकि मोबाइल फ़ोन पर एसएमएस भी सीमित रखे गए हैं. मगर ये पहला मौक़ा है जबकि अख़बारों को विज्ञापन देने से सरकार इनकार कर रही है.

वैसे सरकारी प्रवक्ता फ़ारुख़ रिंज़ू ने बीबीसी को बताया कि उन्हें दिल्ली से अभी तक इस बारे में आधिकारिक रूप से कोई जानकारी नहीं मिली है. मगर वरिष्ठ पत्रकार परवेज़ बुख़ारी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह कश्मीर में प्रेस को ख़ामोश करने के लिए आर्थिक नाकाबंदी कर रही है. बुख़ारी के अनुसार, “ये बड़ा घटनाक्रम इस लिहाज़ से है कि कश्मीर से बाहर के पत्रकारों और संपादकों को भी पता चलेगा कि कश्मीरी मीडिया पर किस तरह का प्रतिबंध लगाया जा रहा है.”

उनका कहना था कि कश्मीर घाटी में जब भी हालात बिगड़ते हैं या प्रेस में गंभीर मुद्दे उठाए जाते हैं तो उनके सुर इसी तरह बदले जाते हैं. सरकारी आदेश में कहा गया है कि अगर इन अख़बारों के सुर बदले तो इस फ़ैसले पर पुनर्विचार हो सकता है. स्थानीय पत्रकारों ने पिछले कुछ वर्षों में ऐसी पाबंदियों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन भी किया है. साभार : बीबीसी

दस साल बाद हुई पत्रकारों की जीत, वेतन बोर्ड होगा लागू

इस्लामाबाद। पाकिस्तान में पिछले 10 साल से वेतन बोर्ड को लेकर जारी कानूनी जंग को पत्रकारों ने जीत लिया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सातवां पत्रकार वेतन बोर्ड लागू करने का आदेश दे दिया। कोर्ट ने आदेश देकर कहा कि इस बोर्ड के नियमों को जल्द से जल्द लागू किया जाए। इसके अलावा कोर्ट ने सभी अखबार मालिकों पर जुर्माना भी लगाया।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश इफ्तिखार चौधरी ने वेतन बोर्ड को यथावत लागू करने तथा ऑल पाकिस्तान न्यूज पेपर्स सोसायटी और पाकिस्तान हेरल्ड पब्लिकेशन की याचिकाओं को रद्द करते हुए वेतन बोर्ड को यथावत लागू करने का आदेश दिया।

उन्होंने याचिकाकर्ताओं को अदालत का समय बर्बाद करने के लिए जुर्माना भरने का भी आदेश दिया है। मुख्य न्यायधीश ने गत 29 सितम्बर को समाचारपत्र मालिकों के वकीलों द्वारा दी गई दलील सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। समाचारपत्र मालिकों ने सिंध उच्च न्यायलय के गत 31 मई को सातवें वेतन बोर्ड पर दिए गए फैसले को चुनौती दी थी। पाकिस्तान फेडरेशन आफ यूनियन जर्नलिस्ट ने 10 वर्ष कानूनी जंग लड़ने के बाद इस मामले में जीत हासिल की है। साभार : पत्रिका

हिंदुस्‍तान से अमित कुमार का इस्‍तीफा, दो सीनियर रिपोर्टरों को लेकर उहापोह

हिंदुस्‍तान, रांची से खबर है कि क्राइम रिपोर्टर अमित कुमार से जबरदस्‍ती इस्‍तीफा ले लिया गया है. अमित की गलती बस इतनी थी कि उनसे क्राइम की एक खबर छूट गई थी. अमित की गिनती हिंदुस्‍तान के तेजतर्रार रिपोर्टरों में होती थी. अमित काफी समय से हिंदुस्‍तान को अपनी सेवाएं दे रहे थे. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने वाले हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. इसके पहले भी वे कई अखबारों में कार्यरत रहे हैं.

दूसरी खबर यह है कि हिंदुस्‍तान, रांची के सीनियर रिपोर्टर नीरज सिन्‍हा तथा अनिल श्रीवास्‍तव का रिन्‍यूवल लेटर अब तक नहीं आया है. इसको लेकर उहापोह की स्थिति है. ये दोनों लोग काफी समय से हिंदुस्‍तान से जुड़े हुए हैं. अभी तक स्‍पष्‍ट नहीं है कि इन लोगों का कांट्रैक्‍ट रिन्‍यूवल होगा भी या नहीं. इस संदर्भ में अनिल श्रीवास्‍तव को कॉल किया गया परन्‍तु उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया, नीरज का फोन नॉट रिचेबल बताता रहा. सूत्रों का कहना है कि सारा मामला ऑफिसियल पॉलिटिक्‍स से जुड़ा हुआ है. इसके पहले पिछले साल अक्‍टूबर में फीचर एडिटर रहे घनश्‍याम श्रीवास्‍तव का नाम भी रिन्‍यूवल लिस्‍ट में नहीं आया था, जिसके बाद उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था. बताया जा रहा है कि ऑफिसियल पॉलिटिक्‍स में एक खास वर्ग को निशाना बनाया जा रहा है.

मुद्दा टीम अन्ना नहीं भ्रष्टाचार है

: ज़रूरत भारतीय जनमानस को समझने की है : “अन्ना सही हैं; अन्ना ग़लत हैं; अन्ना राजनीति कर रहे हैं, टीम अन्ना में फूट हो गई है; अन्ना फैक्टर की वजह से कांग्रेस उपचुनाव हारी है, अन्ना संघ के हाथों में खेल रहे हैं; लोकपाल बनाने से क्या भ्रष्टाचार मिट जाएगा, इतने क़ानून आए क्या भ्रष्टाचार मिटा?” इन तमाम प्रश्नों के बीच में मूल प्रश्न कहीं खो गया है।

वह मूल प्रश्न है क्या देश में भ्रष्टाचार चरम पर नहीं है? क्या इससे निज़ात पाना ज़रूरी नहीं है और क्या देश में आज़ादी के बाद पहली बार इतना बड़ा जनाक्रोश नहीं उभरा है? इन्हीं तीन प्रश्नों में ऊपर के सभी प्रश्नों का जवाब भी है। अंग्रेजी में एक मुहावरा है “शूटिंग द मैसेंजर”(संदेशवाहक को ही मार देना)। उहापोह की इस स्थिति में यह एक सामान्य प्रतिक्रिया देखने में आ रही है जो कि कुछ लोगों के अतार्किक चिंतन का फल है। क्या अन्ना को लेकर उभरे प्रश्नों से भ्रष्टाचार के मूल प्रश्न को बाधित किया जा सकता है? क्या टीम अन्ना के सदस्यों पर हमले से इस जनांदोलन को दबाया जा सकेगा? भारतीय समाज को गहराई से समझे बगैर फौरी तौर पर इस मुद्दे पर संशय रखना या समाधान निकालना अनुचित है। जब भारत को आज़ादी देने की बात चल रही थी तब हाउस ऑफ कॉमन्स में लॉर्ड इरविन की घोषणा पर आठ नवंबर 1929 को एक जबरदस्त बहस हुयी और बॉल्डविन ने कंज़रवेटिव पार्टी के समर्थन का आश्वासन दिया। गुस्साए चर्चिल ने अखबार डेली मेल में लिखा कि अंग्रेज़ों ने सदियों की बर्बरता से भारत को बचाया लेकिन इन भारतीयों को खुद सरकार चलाने देना मूर्खतापूर्ण होगा। चर्चिल ग़लत साबित हुए। 64 साल भारत प्रजातंत्र की राह पर हिचकोले लेकर ही सही अपनी गाड़ी चलाता रहा, न रास्ता बदला न गाड़ी टूटी। बस एक बार 1975 में पंक्चर हुई थी।

एक दूसरा उदाहरण लें। भारत के संविधान को अंगीकार करने के एक साल बाद विश्व विख्यात संविधान विशेषज्ञ सर आइवर जेनिंग्स को मद्रास विश्वविद्यालय में एक भाषण देने के लिए बुलाया गया। विषय था भारतीय संविधान और इसके प्रावधान। जेनिंग्स ने लगभग कटाक्ष करते हुए कहा कि संघीय व्यवस्था बेहद जटिल है। अंत में भारतीय संविधान को उन्होंने पश्चिमी उपकरणों का पूर्वीकरण बताया। उन्ही जेनिंग्स ने कुछ दिन बाद तत्कालीन सीलोन (श्रीलंका) का संविधान बनाया, वह संविधान महज सात साल चल पाया। हमने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की स्थिति देखी जहां 64 साल में लगभग 30 साल फौजी शासन रहा। ताजा उदाहरण नेपाल का है, सोवियत संघ टुकड़ों-टुकड़ों में बंट गया, चीन को एक पूर्ण यू-टर्न लेना पड़ा, अरब के देश अशांत हैं।

भारत में केवल एक बार आपातकालीन स्थिति लागू की गयी जिसके बारे में बाद में प्रसिद्ध संपादक इंदर मेहरोत्रा का कहना था कि आपातकाल लगाए जाने का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि अब कोई सरकार इसे दुबारा लगाने की हिम्मत नहीं करेगी। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ जनांदोलन को भारतीय समाज की आंतरिक शक्ति के मद्देनज़र देखना होगा। यह सही है कि भ्रष्टाचार एक व्यवस्थात्मक बुराई कम सामाजिक बुराई ज़्यादा है और ऐसे में इसका समाधान केवल संस्थाएं खड़ी कर या क़ानून बनाकर नहीं किया जा सकता। लेकिन नए शासन पद्धति में इसके बिना आत्मपरिवर्तन के रास्ते समाज को सुधारना कत्तई संभव नहीं है।

भारतीय समाज के कुछ अद्भुत लक्षणों में से एक है सहिष्णुता। पश्चिमी समाज के प्रजातंत्र की उपादेयता पर प्रश्नचिह्न लगाने पर सुकरात को ज़हर दे दिया, ईसा मसीह को सही बात करने पर शूली पर चढ़ा दिया, धर्म के नाम पर इसाईयों के दो वर्गों के बीच में जबरदस्त मार-काट हुई, गैलिलियो को धार्मिक अवधारणाओं के ख़िलाफ वैज्ञानिक सोच विकसित करने पर जेल में डाल दिया गया, जबकि भारतीय समाज ने ईश्वर पर अनास्था व्यक्त करने वाले चारवाक को भी दार्शनिक के रूप में देवत्व का स्थान दिया। दुनिया से एक लंबे अंतराल के बाद घृणित ग़ुलाम परंपरा बंद हुयी, भारत में सती प्रथा का लोप हुआ और शूद्रों के प्रति घृणा भाव काफी हद तक बदला। इन सभी बदलावों के पीछे जहां एक तरफ समाज के सार्थक सोच की भूमिका थी वहीं तत्संबंधित संस्थाएं व क़ानूनों ने भी एक बड़ी भूमिका निभायी।

मशहूर किताब ब्राइब के लेखक नूनन ने अपनी विस्तृत विवेचना के बाद कहा था कि जैसे-जैसे समाज की सोच बेहतर होती जाती है उसी-उसी तरह सामाजिक दोष या अन्य बुराइयां भी खत्म होती जाती हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ समाज के चरित्र को बदलना एक लंबी प्रक्रिया है लिहाज़ा लोकपाल नामक संस्था से तत्काल किसी चमत्कार की उम्मीद भले न हो लेकिन इसे इस आधार पर रोकना एक घातक सोच होगी। “कुछ नहीं होगा” का भाव न केवल आत्मघाती है बल्कि पराजयी भी है। प्रश्न अन्ना या टीम अन्ना का नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार का है, जिसकी वजह से एक बड़ा वर्ग अभाव का जीवन जी रहा है।

इसमें दो राय नहीं है कि संस्थाओं की उपादेयता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं क्योंकि इन पर काबिज़ लोगों में वह नैतिक बल नहीं है। उदाहरण के तौर पर राजनीतिक वर्ग, न्यायपालिका, मीडिया, कार्यपालिका सभी जनअपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर रहे हैं लेकिन इसकी वजह से प्रयास नहीं रोके जा सकते। उदाहरण के तौर पर राजनीतिक वर्ग के प्रति जनता का विश्वास नहीं है। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि हम लोकतंत्र में या लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास नहीं रखते। उसी तरह न्यायपालिका में गड़बड़ियां हैं पर इसका नियंत्रण कार्यपालिका को नहीं दिया जा सकता। मीडिया में अतिरेक है, अनैतिकता है इसका मतलब यह नहीं कि इसे सरकारी चंगुल में सौंपा जा सके। यही है भारतीय प्रजातंत्र की खूबी।

संक्रमण काल के परिशोधन में इस तरह की उहापोह की स्थिति आती है लेकिन सार्थक प्रयास वह है जिसमें मूल अवधारणाओं को बगैर छेड़े व्यक्ति की सोच में बदलाव कर दिया जाए और साथ ही संस्थाओं की भी उपादेयता स्थापित हो जाए।  किसी शायर ने कहा है-

जज़्बए दिल की मगर तासीर उलटी है,
कि जितना खींचता हूं और खिंचता जाए है मुझसे।

इस आंदोलन को दबाने की भी कोई भी सरकारी या गैरसरकारी कोशिश इसे और उभारेगी।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

इंडिया टुडे से विदा हो गए ए‍सोसिएट एडिटर ओम सर्राफ

: आबिद मंसूरी ने प्रज्ञा से इस्‍तीफा दिया : नाराज नीरज सक्‍सेना अवकाश पर : ढाई दशक की लम्‍बी सेवा के बाद इंडिया टुडे से ओम सर्राफ विदा हो गए. वे एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत थे. ओम सर्राफ तीन साल पहले ही इंडिया टुडे से रिटायर हो चुके थे, परन्‍तु प्रबंधन ने इनके अनुभव तथा सेवाओं को देखते हुए इन्‍हें एक्‍सटेंशन दिया था.

ओम इंडिया टुडे के लांचिंग टीम के सदस्‍य थे. इन्‍होंने सब एडिटर के रूप में इंडिया टुडे ज्‍वाइन किया था. इन दिनों ये यूपी तथा उत्‍तराखंड का प्रभार देख रहे थे. इंडिया टुडे ज्‍वाइन करने से पहले ये जनसत्‍ता को भी अपनी सेवाएं दे रहे थे. मूल रूप से जम्‍मू-कश्‍मीर के निवासी ओम सर्राफ डेढ़ दशक तक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में भी मीडिया प्रभारी के रूप में सक्रिय रहे. बताया जा रहा है कि ओम सर्राफ के काम की जिम्‍मेदारी अब मुहम्‍मद वकार और मनीषा पांडेय को सौंप दी गई है. अब ये दोनों ही यूपी तथा उत्‍तराखंड डेस्‍क की जिम्‍मेदारी संभालेंगे.

प्रज्ञा से खबर है कि आबिद मंसूरी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे पीसीआर में कार्यरत थे. बताया जा रहा है कि आबिद चैनल के अंदर की स्थिति से परेशान थे. वे पिछले साढ़े तीन साल से प्रज्ञा के साथ जुड़े़ हुए थे. आबिद अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. प्रज्ञा से पहले भी वो कई चैनलों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

हिंदुस्‍तान, एटा से खबर है कि ब्‍यूरोचीफ के रवैये से नाराज स्ट्रिंगर नीरज सक्‍सेना ने 31 अक्‍टूबर तक अवकाश ले लिया है. नीरज ने मेल भेजकर ब्‍यूरोचीफ की शिकायत प्रधान संपादक शशि शेखर, वेस्‍ट यूपी के प्रभारी केके श्रीवास्‍तव से की है. हालांकि नीरज ने इस्‍तीफा नहीं दिया है, परन्‍तु उनका कहना है कि वे अब वरिष्‍ठों के निर्देश के बाद ही लौटेंगे. हालांकि दूसरी तरफ से जो खबर आ रही है वह यह है कि ब्‍यूरोचीफ अनुज शर्मा द्वारा किसी बात के लिए मना करने पर नीरज नाराज हो गए थे तथा अभद्र व्‍यवहार कर दिया था. इसके बाद दोनों लोगों के बीच विवाद हो गया.

NPHL launches Prabhat Khabar in Gaya on 21st October

This Edition launch will be 10th in total extending to 3 states and PK will be the 1st Newspaper to have 4 editions each in Bihar & Jharkhand (2 More than its nearest competitors) and 1st newspaper to Start from Gaya.

NPHL, one of the leading Hindi newspapers of Eastern India, today launched its 10th edition from Gaya. The publication has already been highly popular with its recent launches in Bhagalpur on 10th Feb 2011 where it had become No. 1 in city from the date of the launch.

With this launch, PK has now spread its reach to 4 locations each in Bihar & Jharkhand (Patna, Muzaffarpur, Bhagalpur, Gaya, Ranchi, Jamshedpur, Dhanbad & Deoghar) and 2 locations in West Benga (Kolkata & Silliguri). It is the first newspaper from Gaya and speaking on this occasion, Mr. K K Goenka, Managing Director of NPHL said , “The launch of Prabhat Khabar from Gaya is indeed a feather in the cap as we have worked very hard for the timely launch of this edition. Now we can proudly say that No One Understands and Covers Bihar & Jharkhand Better than Us! We are now present in 8 locations in these 2 states which is 2 more than our nearest competitors, and will be a very important competitive advantage for us. Prabhat Khabar is fast excelling in its journey of becoming the strongest media powerhouse of Eastern India. The ‘religious city of Gaya’ is already very famous in the international map due to Bodhgaya, which has a very rich tradition and history and we firmly believe that given our competitive advantage, Prabhat Khabar will emerge as a powerful vehicle to participate in the region’s progress and soon become the most preferred advertising media for all.”

Mr. R K Dutta, Executive Director of NPHL further added, “The launch of Gaya holds considerable importance to our expansion strategy in Bihar enabling us to further broaden our presence in Bihar & Jharkhand. We are very much optimistic and confident that we will deliver the best mix of content to cater the local taste of the people of this region and will command a market share of 40% in the overall circulation pie of nearly 2 Lac copies in this region. With this launch we now look forward to further consolidate our presence in this region.”

About Gaya : Surrounded by small rocky hills by three sides and river flowing on the fourth side, Gaya is the 2nd largest city of Bihar and proudly bears a spiritual legacy. Documented history of Gaya dates back to enlightenment of Goutam Budha and it is also important in Hinduism from the point of view of salvation to the souls of ancestors. The largest mosque of Bihar is situated here and it truly reflects the “unity in diversity” feeling of Indian culture. Gaya is a hot tourist spot which attracts pilgrims from worldwide and is also a major location for the textile industry.

About the Company : Prabhat Khabar – The people’s voice for the last 27 years has only got stronger and more powerful, relentlessly promoting a pure form of fearless journalism. The movement of mass awakening – Prabhat Khabar has become a symbol of truth and courage in journalism, a fire burning in the hearts and minds of people. With Ten Editions in three States (Jharkhand, Bihar & West Bengal) aggregating a reader family of 61.50 Lac individuals (Source IRS 2011-Q2 TR), is based in 80+ districts of India with a daily circulation of 7.35+ copies (Source: ABC Jan-June’2011 & CA Certificate). It also has FM Radio operations –Radio Dhoom, 104.8 FM in Ranchi & Jamshedpur and a successful Events and Brand Division – Prabhat Buzz. Press Release

तनख्वाह को लेकर हड़ताल, 19 को नहीं प्रकाशित हुआ जदीद मेल

दूसरी कंपनियों की तरह अखबारों में भी समय पर तनख्वाह नहीं मिलना आम बात है। इन दिनों उर्दू अखबार जदीद मेल में कुछ ऐसा ही चल रहा है। यहाँ के स्टाफ को जब सितम्‍बर महीना की तनख्वाह समय पर नहीं मिली तो इन्‍होंने वहाँ हड़ताल कर दी और काम करने से मना कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि बुधवार यानी 19 अक्टूबर का अंक नहीं छाप सका।

आज के अखबार के पहले पेज पर एक नोटिस लगी है, जिसमें लिखा गया है कि कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर में खराबी की वजह से अखबार प्रकाशित नहीं हो सका। जबकि सच्चाई यह नहीं है। तनख्वाह में देर होने से नाराज़ स्टाफ ने काम करने से मना कर दिया, जिस कारण अखबार नहीं छाप सका। ज्ञात रहे ही जब यह अखबार शुरू हुआ था तो भड़ास पर दस जनवरी 2011 को एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें यह कहा गया था कि भारत में उर्दू के समाचार-पत्रों की हालत कभी भी अच्छी नहीं रही, इसके बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों खास तौर पर दिल्ली से उर्दू अखबारों के निकलने का सिलसिला हर दौर में जारी रहा।

लेख में यह भी कहा गया था कि जिस अखबार के मालिक तेज़ और चालाक हैं वो तो कहीं न कहीं से अखबार चलाने के लिए पैसा निकाल ही लेते हैं, जिनको यह फन नहीं आता वो अपनी हिम्मत से अखबार निकाल तो रहे हैं, मगर कब तक निकालते रहेंगे यह कहना मुश्किल है। उर्दू अखबारों की आर्थिक तंगी के बावजूद एक नए अखबार ने दिल्ली में दस्तक दी है। अखबार के मालिक ने ऐसी हिम्मत कैसे कर ली और यह अखबार कितने दिनों तक चलेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल तो स्टाफ को समझा बुझा कर जदीद मेल ने कुछ समय के लिए मामला टाल दिया है आगे क्‍या होगा यह समय बताएगा।

उन्‍नाव में ईटीवी एवं जी न्‍यूज के पत्रकारों से मारपीट, मामला दर्ज

उन्‍नाव में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के दो पत्रकारों के साथ कुछ लोगों ने मारपीट की. पत्रकारों की कार तोड़ दी गई. हालांकि दोनों को ज्‍यादा चोटें नहीं आई है. ये लोग किसी खबर को कवर करके वापस लौट रहे थे. पत्रकारों ने उन्‍नाव कोतवाली में अज्ञात लोगों के खिलाफ तहरीर दिया है, जिस पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है. मामले की जांच कर रही है.

जानकारी के अनुसार ईटीवी यूपी-उत्‍तराखंड के रिपोर्टर नीरज द्विवेदी तथा जी न्‍यूज यूपी के रिपोर्टर प्रसून शुक्‍ला बुधवार रात 9 बजे किसी स्‍लाटर हाउस की खबर कवर कर अपनी कार से वापस लौट रहे थे. ये लोग जैसे ही आईबीपी चौराहे पर पहुंचे कुछ बाइक सवारों ने इनकी कार में टक्‍कर मार दिया. इन लोगों ने जब बाइक सवारों को ठीक से बाइक चलाने की चेतावनी दी तो वे लोग इन दोनों से उलझ पड़े. गाली-ग्‍लौज देते हुए हाथापाई भी की. इनकी कार को क्षतिग्रस्‍त कर दिया. इसके बाद वे फरार हो गए. इसके बाद दोनों पत्रकार उन्‍नाव कोतवाली पहुंचे तथा अज्ञात लोगों के खिलाफ मारपीट करने तथा धमकी देने की लिखित शिकायत दी. हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि यह विवाद दिवाली पर लेने देन को लेकर हुआ है.

इस संदर्भ में जब नीरज द्विवेदी से बात की गई तो उन्‍होंने बताया कि हम लोग स्‍लाटर हाउस पर खबर बनाने गए थे. हमारे यहां इस संदर्भ में ब्रेकिंग भी चली थी. इसके बाद जब हम विजुअल बनाकर वापस लौट रहे थे तो चार-पांच बाइकों पर सवार आठ-नौ लोगों ने कार में टक्‍कर मार दी. जब हमने विरोध किया तो हमसे उलझ पड़े. हमसे मारपीट करने की भी कोशिश की गई. इस संदर्भ में प्रसून शुक्‍ला से बात की गई तो उन्‍होंने इसे मामूली विवाद बताया. इस संदर्भ में नीरज की शिकायत पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है. उन्‍नाव कोतवाली के इंस्‍पेक्‍टर ने बताया कि पत्रकारों की शिकायत पर अज्ञात लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 427 एवं 7 क्रिमिनल एक्‍ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. जांच चल रही है.

रामजी गुप्‍ता ने राजस्‍थान पत्रिका एवं गौरव मिश्रा ने न्‍यूज24 ज्‍वाइन किया

आई-नेक्‍स्‍ट, इलाहाबाद से रामजी गुप्‍ता ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर चीफ सब एडिटर थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी राजस्‍थान पत्रिका, जयपुर के साथ शुरू की है. रामजी पिछले एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इन्‍होंने करियर की शुरुआत 2001 में दैनिक भास्‍कर, झांसी के साथ की थी. इसके बाद कानपुर में अमर उजाला ज्‍वाइन कर लिया. बाद में इनका तबादला नोएडा सेंट्रल डेस्‍क पर कर दिया गया. 2007 में इन्‍होंने कानपुर में हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन कर लिया. दो वर्ष सेवा देने के बाद 2009 में आई-नेक्‍स्‍ट, इलाहाबाद से जुड़ गए थे.

पिछले दिनों आईबीएन7, सहारनपुर से कार्यमुक्‍त होने वाले गौरव मिश्रा ने अपनी नई पारी सहारनपुर में ही न्‍यूज24 के साथ शुरू की है. गौरव पिछले एक दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं तथा आईबीएन7 के अलावा कई अन्‍य चैनलों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

कांग्रेसी पार्षद ने दबंग दुनिया पर मान‍हानि का मुकदमा दायर किया

इंदौर। कांग्रेस पार्षद अनवर कादरी ने इंदौर से प्रकाशित दबंग दुनिया के मालिक, प्रकाशक सहित चार लोगों के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया है। इस अखबार में कादरी से जुड़ी खबरें प्रकाशित हुई थीं, जिसमें उनका संबंध एक कोलोनाईजर से बताकर एक जमीन के मामले में गड़बड़ी करने का आरोप लगाया गया था।

कादरी के मुताबिक गत दिनों 12 से 14 अक्टूबर तक उक्त अखबार में दुर्भावनावश कादरी कालोनी संबंधी खबरें प्रकाशित की गई हैं, जबकि उनका अवैध कालोनाईजर से कोई संबंध नहीं है और न उल्लेखित की गई अल उमर पैराडाइज से कोई वास्ता। इस कालोनी के आसपास के कालोनाईजर द्वारा मालिक किशोर वाधवानी व संवाददाता के जरिये भ्रामक खबरें प्रकाशित कराई गई हैं, जिससे उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को हानि पहुंची है। परिवाद 17 अक्टूबर को प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी भूपेंद्र नकवाल की कोर्ट में पेश किया गया है। इसमें आरोपी किशोर वाधवानी, प्रकाशक अतुल पाठक, संपादक कीर्ति राणा व संवाददाता विनोद शर्मा के खिलाफ धारा 499, 501 व 502 में प्रकरण दर्ज कर उन्हें दंडित किए जाने की मांग की है। परिवाद पर 22 अक्टूबर को बयान होंगे।

कथाकार स्वयं प्रकाश को कथाक्रम सम्मान की घोषणा

लखनऊ : वरिष्ठ कथाकार स्वयं प्रकाश को वर्ष 2011 के प्रतिष्ठित ‘आनंद सागर कथाक्रम सम्मान’ से नवाजा जाएगा। कथाक्रम के संयोजक शैलेन्द्र सागर ने बताया कि स्वयं प्रकाश को यह पुरस्कार आगामी 12-13 नवम्बर को आयोजित होने वाले ‘कथाक्रम-2011’ कार्यक्रम के मौके पर प्रदान किया जाएगा। यह निर्णय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की अध्यक्षता वाली कथाक्रम सम्मान समिति द्वारा लिया गया है।

कथा लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान करने वाले लेखक को प्रतिवर्ष दिये जाने वाले इस पुरस्कार के तहत 15 हजार रुपए नकद तथा प्रशस्ति पत्र दिया जाता है। बीस जनवरी 1947 को इंदौर में जन्मे स्वयं प्रकाश अपनी कहानियों और उपन्यासों के लिये विख्यात हैं। वह अब तक पांच उपन्यास लिख चुके हैं जबकि उनके नौ कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इससे पहले स्वयं प्रकाश

स्‍वयं प्रकाश
को राजस्थान साहित्य अकादमी तथा पहल सम्मान पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।

मूलत: राजस्थान के निवासी स्वयं प्रकाश के कथा साहित्य में वैज्ञानिक सोच और सहजता का अनूठा और विरल संगम है। उनकी रचनाएं पाठक को अपने साथ बहाकर ले जाते हुए वैचारिक रूप से उद्वेलित और समृद्ध भी करती हैं। अपनी अधिकतर रचनाओं में वे मध्यमवर्गीय जीवन के विविध पक्षों को सामने लाते हुए उनके अंतर्विरोधों, कमजोरियों और ताकतों को कुछ इस तरह से प्रस्तुत करते हैं कि वे हमारे अपने अनुभव संसार का हिस्सा बन जाते हैं। साम्प्रदायिकता एक और ऐसा इलाका है जहां स्वयं प्रकाश की रचनाशीलता अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रदर्शित होती है। स्वयं प्रकाश की कई बार खिलंदड़ी भाषा और अत्यधिक सहज शैली का उन्हें हमारे समय के सर्वाधिक लोकप्रिय कथाकार बनाने में बड़ा योगदान है।

शबाना आजमी से सबक सीखें सेलीब्रिटी और सरकारें

आजमगढ़ : मशहूर शायर कैफी आजमी अपने अन्तिम दिनों में मिजवां गांव में शिक्षा व्यवस्था को लेकर काफी परेशान रहा करते थे, लेकिन उनकी बेटी शबाना आजमी ने पिता के इन्तकाल के बाद उनके सपनों को साकार किया और गांव में लड़कियों के लिए शिक्षा केन्द्र, कम्प्यूटर शिक्षा और कढ़ाई सिलाई के साथ ही चिकनकारी सेन्टर की स्थापना की।

शबाना के प्रयास से ही चिकनकारी सेन्टर से वर्तमान समय में देश के मशहूर फैशन डिजाइनर अब आर्डर पर कपड़े तैयार कराते हैं। परन्‍तु शबाना इतने पर ही रूकने को तैयार नहीं हैं। वो अपने गांव की बालिकाओं के उन्नयन के लिए कितनी गंभीर हैं यह तब पता चला जब इस बार उन्होंने एक अनोखी व अत्याधुनिक प्रणाली का इस्तेमाल कर लड़कियों को बेहतर अंग्रेजी सिखाने का बीड़ा उठाया है। यह प्रयास प्रदेश में एकदम अनूठा है जिसमें अमेरिका की संस्था द्वारा मिजवां की छात्राओं को इण्टरनेट की स्काइप आनलाइन वीडियो सेवा द्वारा अंग्रेजी बोलने व लिखने की शिक्षा दी जाएगी। शबाना ने खुद इस सेवा का प्रदर्शन किया।

शबाना बताती हैं कि जब उन्होंने यह महसूस किया कि सारी कोशिशों के बावजूद अंग्रेजी इस क्षेत्र के लड़के-लड़कियों के बेहतर भविष्य में बाधक बन रही है तो इसके लिए उन्होंने प्रयास किया और वालन्टियर आफ टीचर्स, जिसे अमेरिका की एन फाउन्डेशन चलाती है, की मदद ली और मिजवां गांव में अब इण्टरएक्टिव टेलीविजन विधि के माध्यम से अंग्रेजी सीखने के केन्द्र की स्थापना की गयी। अब गांव के बच्चे आडियो-वीडियो की इस विधि के माध्यम से अंग्रेजी बोलना सीख सकेंगे, जिससे उनका भविष्य बेहतर बन सकेगा। हम तो यही कहेंगे कि लाखों करोड़ों खर्च कर कर्मचारियों की पूरी सेना लगा कर जो काम सरकार नहीं कर पा रही है, उसे आजमगढ़ के मिजवां और यहां की बेटी शबाना आजमी से सबक ले कुछ तो प्रयास करना ही चाहिए।

देवव्रत श्रीवास्‍तव

संपादक

आजमगढ़ लाइव न्‍यूज पेपर

दिमाग को चेंज कर रहा है फेसबुक!

वॉशिंगटन : फेसबुक पर कितने मित्र हैं आपके? हाल ही में हुए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि सोशल नेटवर्किंग साइट पर ढेर सारे दोस्तों वाले व्यक्तियों के दिमाग में एक खास तरह का पदार्थ ज्यादा सघन पाया जाता है जिससे इस बात की संभावना बढ़ी है कि इस तरह के साइट लोगों के दिमाग को बदल रहे हैं।

लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि जिन व्यक्तियों के फेसबुक पर बहुत ज्यादा दोस्त होते हैं, उनमें दिमाग के कुछ हिस्सों में कम ऑनलाइन दोस्तों वालों की तुलना में ज्यादा ग्रे पदार्थ पाया जाता है। दिमाग के ये क्षेत्र नामों और चेहरों को याद रखने की क्षमता से जुड़े होते हैं।

प्रोसिडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी बायोलोजिकल साइंसेज में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया कि या तो सोशल नेटवर्किंग साइट दिमाग के इन भागों को बदल देते हैं या इस तरह के दिमाग के साथ पैदा लेने वाले व्यक्ति फेसबुक जैसी वेबसाइट पर अलग व्यवहार करते हैं। साभार : एजेंसी

वो मेरे साथी नहीं, गुरु थे

सरताज : सन 69 के आसपास तब नैनीताल जिले के किच्छा कस्‍बे के एक हाई स्कूल में पढ़ता था मैं. और नौंवीं दसवीं में मेरा एक सहपाठी था, सरताज जैदी. उसकी हथेलियाँ राजनाथ सिंह से भी बड़ी थीं. बहुत खूबसूरत गाता था वो. मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ उसपे किसी भी अनवर या सोनू निगम से कहीं ज्यादा फब्ती थी. वैसी ही मुर्कियाँ लेता था वो. उसे सुनना रफ़ी साहब के साथ जीने जैसा था.

कुछ तो गायन की प्रतिभा मुझे अपने पूज्य पिता जी से विरासत में मिली थी. कोई पेशेवर गायक नहीं थे वे. लेकिन संगीत के प्रति प्रेम उनमें बहुत अधिक था. पाकिस्तान से विस्थापित होकर आये थे ’47 में. मेहँदी हसन को रेडियो पे गाँव के दीवान चंद ग्रोवर अंकल के साथ वे रात रात भर सुनते थे. शौक इतना था कि उसे पूरा करने के लिए खुद का सिनेमा लगा लिया था शहर में. मुगले आज़म उन्होंने उस छोटे से कस्‍बे में कोई तीन हफ्ते चलाई और कुल इकसठ में से कोई पचास शो तो उन्होंने खुद भी देखे थे. ऐसे में सरताज के साथ पढ़ना, रहना और अक्सर उसके साथ युगलबंदी करना जैसे एक आसान और सुखद अनुभव हो गया था. उसी ने सलाह दी कि आवाज़ मुकेश जी से ज्यादा मिलने की वजह से मैं उनके गीत गाया करूं. स्कूल से बाद में यूनिवर्सिटी के कार्यक्रमों तक मैं मुकेश को ही गाता और उस की वजह से अपने गुरुओं, साथियों और दोस्तों का प्यार पाता रहा. वो शौक धीरे-धीरे मुकेश जी के प्रति अपार श्रद्धा में परिवर्तित हो गया. बाद में सन ’76 में अपने दोस्त और सहपाठी ज़फर मूनिस के साथ टिकट उपलब्ध न हो पाने के बावजूद इलाहाबाद में मुकेश जी के एक कार्यक्रम में घुसना और उनसे स्टेज के पीछे जा कर मिलना आज भी जैसे रोमांचित कर देता है.

बघेल : प्लस वन टू को तब यूपी में इंटरमीडिएट कहा जाता था. वो करने मैं पंतनगर गया तो सुभाष भवन (होस्टल) में कमरा मिला. पलिया कलां के दो भाई प्रेम और सुनील मिल गए. दोनों मुझसे एक साल जूनियर थे. लेकिन खासकर प्रेम को संगीत बहुत प्रिय था. दस्तक फिल्म आई ही आई थी और हम लोग हल्द्वानी के लड़कियों की तरह गोरे, पतले और वैसे ही नाज़ुक बिरेंदर को नायिका मान कर ‘तुमसे कहूं एक बात परों से हलकी’ गाया करते थे. तब यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष जयराम वर्मा सहित सीनियर कुछ शायद मुझे और मेरे एक दोस्त रवितेज गोराया को इस लिए भी अपने साथ रखते थे कि हम दोनों ही कुल बारह किलोमीटर दूर ज़मींदारों के बेटे थे. रवितेज के दारजी (पिता जी) सरदार गुरबचन सिंह गोराया यूपी स्टेट अकाली दल के अध्यक्ष हुआ करते थे. कुछ उसके बड़े भाई साहब सर्वजीत सिंह उन दिनों बाद में गन्ने की प्रजाति में क्रान्ति ले आने वाले टिश्यू कल्चर पे शोध कर रहे थे. उनका बहुत नाम और सम्मान था यूनिवर्सिटी में. ये वजहें थीं कि रवितेज कुछ ज्यादा ही एक्टिविस्ट सा और दबंग था. वर्मा जी जब भी ज़रूरत पड़ती अगल बगल के गाँवों से लड़के लुड़के खूब मंगा लेते थे.

डील डौल में मुझ से काफी हल्का मगर एक साल सीनियर बिहार एक लड़का आर.एस.बघेल पता नहीं बड़ों की हमारी संगत से मुझे खुद से सीनियर मान कर हर बार पहले नमस्कार करने लग गया था. तब बड़ों का सम्मान कुछ ऐसा था कि लाबी में अगर सामने से कोई सीनियर आता हो तो सम्मानस्वरूप एक किनारे रुक जाना होता था. अभिवादन करना होता था और उनके पास से निकल जाने के बाद जाना होता था. बघेल भाई ये करते रहे. उनकी मुझ से वरिष्ठता से पूरी तरह अनभिज्ञ मैं वो अभिवादन स्वीकार भी करता रहा. पता तब चला कि जब आर.एस.बघेल एक दिन सुबह सवेरे दनदनाते हुए मेरे कमरे के बाहर आये. गरियाते हुए. मैं नींद से जागा. बाहर निकला तो उनका सवाल था कि मेरी हिम्मत कैसे हुई उन से नमस्ते करवाते रहने की. रवितेज ने उनको उनकी वरिष्ठता का ज्ञान हो जाने के बाद भी पटक ही दिया होता अगर मैंने उसे रोका और बघेल ‘सर’ से माफ़ी नहीं मांग ली होती. उन्हें जब लगा कि जैसे उन्हें, वैसे ग़लतफ़हमी मुझे भी थी तो उन ने अपने कहे को ये कह के समेटा कि कोई नमस्ते करवाने नहीं, उस लायक हो जाने से बड़ा होता है. बघेल ‘सर’ से मिली वो सीख मुझे आज भी याद है.

दिनेश मोहन : कुछ ही दिन बाद चितरंजन भवन का एक ब्लाक तैयार हो गया तो हम इंटर कालेज वाले वहां शिफ्ट हो गए. कुल 456 कमरों वाला वो होस्टल दरअसल इसी नाम से मशहूर था. इस होस्टल के लिए मारामारी कुछ ज्यादा रहती थी. लड़कियों का होस्टल सरोजिनी इसके बगल में था. ‘चिंगारी कोई भड़के’ गाना जब भी रेडियो पर आता तो सैकड़ों ट्रांज़िस्टर फुल वाल्यूम के साथ बाहर बालकनी में आ विराजते थे. मैं 65 नंबर कमरे में था. मेरी बगल में मुझसे एक साल सीनियर बी.एस.सी.-एजी कर रहे दिनेश मोहन कंसल थे. एक दिन डेढ़ सौ लड़कों से भरे कैफेटेरिया (कैंटीन) में खाना खाते समय उन्होंने अपनी पूरी भरी थाली मुझ पे ये कहते हुए दे मारी थी कि अगर खाना मैंने थाली में बचा ही देना था तो उतना लिया क्यों? उन ने कहा था, मालूम है जितना खाना तुमने छोड़ा उतना सिर्फ अगर इसी होस्टल के लोग छोड़ दें तो सामने वाली पूरी कालोनी आज रात पेट भर के सो सकती थी. एक दिन मैं कामन बाथरूम में वाश बेसिन खाली होने के इंतज़ार में ‘ठाड़े रहियो…’ की व्हिसलिंग कर रहा था. जैसे ही रुका तो उन्हीं कंसल ‘सर’ ने पूरे गाने की व्हिसलिंग करने को बोला. वे मुझे वहां से कोई पचहत्तर किलोमीटर दूर बरेली ले कर गए. पाकीज़ा दिखाई. यूनिवर्सिटी की कल्चरल सोसायटी का मेम्बर बनवाया और एक दिन यूनिवर्सिटी के आडिटोरियम में गाना गवाया.

महेंद्र सिंह पाल : यहाँ से ग्रेजुएशन करने मैं नैनीताल गया तो आसानी से कहीं कोई होस्टल या कोई प्राइवेट कमरा तक नहीं मिला. एक दोस्त ने कहा ऐसा करते हैं प्रेजिडेंट (छात्र संघ के) महेंद्र सिंह पाल के कमरे में चलते हैं. वो नेता हैं, अच्छे आदमी हैं. किसी को मना नहीं करते. वहां और भी बहुत से लोग रहते हैं. वहीं रह लेते हैं. हम लंग्हम हाउस (होस्टल) के उनके उस कमरे में रहने और नीचे ही कारपेट पे सोने लगे. उन ने कहीं मुझे गुनगुनाते सुन लिया होगा. उनकी बदौलत मैं एनुअल फंक्शन के दौरान आडिटोरियम की स्टेज पे चढ़ और हीर गाने के बाद छा गया. इसके बाद तो सारा कालेज जानने पहचानने लगा. काशीपुर के विजय भटनागर ने नाल बजानी सिखा दी. मैं गाने के साथ-साथ बजाने भी लगा. गुरुओं से भी प्यार मिला. पढ़ाई में भी ठीक-ठाक था. हमारी टीम छात्रसंघ चुनाव जीत गई. कल्चरल एसोसिएशन के चुनाव में मुझे खड़ा कर दिया. स्टेज पे उधर गाने बजाने से लेकर अनाउन्समेंट तक सब मैं ही करता था. चुनाव में जैसे मुकाबले जैसा कुछ था ही नहीं. मतदान से दो दिन पहले मैंने ‘अमरप्रेम’ देखी. सुबह कालेज आया तो नीचे से पहाड़ चढ़ती आती लड़कियों की तरफ मुंह करके खड़े अपने ही छात्रसंघ वाले साथियों पर राजेश खन्ना का डायलाग मार दिया…’ इन्हें देख कर तुम्हें अपनी बहनों की याद नहीं आती?’ ..अगले दिन मतदान था. मैं चुनाव हार गया.

गुड्डो : ग्रेजुएशन कम्प्लीट हो गई. मैं इलाहाबाद चला गया, ला पढ़ने. यहाँ मिला ज़फर मूनिस. पाकिस्तान से आने के बाद से पिता जी का मन मुसलामानों में ज्यादा रमते देखा था. अपना भी बचपन कई मुसलमान चचाओं और चचियों की गोद में गुज़रा था. ऊपर से सरताज की हर जगह तलाश. बस ज़फर अपना दोस्त हो गया. इस लिए भी कि उसके अब्बा हुज़ूर तब इलाहबाद के नामी वकील थे और अपने को सीखने के लिए ज़फर के घर जैसा कोई और हो नहीं सकता था. मैं अक्सर उसके घर आने जाने लगा. उसकी तब छोटी सी बहन ने एक दफे राखी का मतलब पूछा. मैंने बताया कि कैसे इस बहाने से बहन भाई की लम्बी दुआ के बदले में उस से अपनी हिफाज़त का वायदा लेती है. एक दिन वो हमेशा की तरह उछलती कूदती आई और कुर्सी के पीछे लटके मेरे हाथ की कलाई पे धागा सा बाँध कर तालियाँ बजाती, ये चिल्लाती हुई भीतर चली गई कि अब आप भी भाई जान हो गए. वो गुड्डो अब कोई पैंतीस साल से लगातार राखी बांधती आ रही है.

इलाहाबाद में मैं अपने ही एक प्रोफ़ेसर सी.एस.सिन्हा के साथ कर्नलगंज में रहता था. उनकी पत्नी के बारे में मुझे कुछ नहीं पता. लेकिन अम्मा आती थीं कभी कभार बनारस से. हर आधे घंटे बाद पान के लिए बाज़ार रपटाते थे सिन्हा सर. इलाहाबाद की गर्मी बड़ी भयंकर होती है. एक दिन मैं चार पान इकट्ठे ही बंधवा लाया. तीन बाहर छुपा, एक उनको थमा दिया. आधे घंटे बाद फिर आदेश हुआ तो नीचे श्रीवास्तव के कमरे में बीस मिनट बिता मैं ऊपर आया. उन तीन में एक बीड़ा उठाया. दिया. जैसे उन ने मुंह में डाला तो खूब गरियाए. बोले, बे गधे मुझे पागल समझता है तू. जितनी तेरी उम्र है उस से ज्यादा साल मुझे पान खाते हो गए. जा, ताज़ा पान लगवा के ला.

श्रीवास्तव जी : यहाँ मुझे असली गुरु मिला नीचे वाला श्रीवास्तव. उसके कमरे पे मेरी नज़र बहुत दिन से थी. एक तो वो ग्राउंड फ्लोर पे होने के कारण ठंडा रहता था. दूसरे सरकारी नल उसके कमरे के ठीक बाहर लगा था. पता लगा कि श्रीवास्तव का सलेक्शन हो गया डाक्टरी के लिए. मैंने सुबह ही उन्हें ऊपर से आवाज़ दी. वे ब्रश मुंह में डाले डाले बाहर निकले. जैसे ही उन ने ऊपर देखा, मैंने पूछा कब तक जाओगे आप कमरा छोड़ के?…श्रीवास्तव ने अधबीच में ही ब्रश मुंह से निकाला. कुल्ला किया. ऊपर देखा और बड़े प्यार से कहा, “मुझे बहुत अच्छा लगता अगर आप पूछते कि मैं कब तक यहाँ हूँ”. वो दिन और आज का दिन. कुछ भी लिखने और बोलने से पहले आज मैं दस बार सोचता हूँ. उस आदमी ने मेरी सोच बदल दी. मैं अपने उन सभी मित्रों का बहुत आभारी हूँ जिन्होंने मुझे मुझ जैसा होने में मदद की.

दुर्भाग्य ये है कि बहुत तलाश के बावजूद मैं सरताज, दिनेश मोहन कंसल और श्रीवास्तव जी को ढूंढ नहीं सका. पर, मुझे यकीन है कि वे जहां भी होंगे मेरे जैसे लोगों को तराश रहे होंगे.

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहने के बाद इन दिनों न्यू मीडिया में जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम समेत कई पोर्टलों के जरिए सक्रिय हैं. इनसे संपर्क journalistcommunity@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

सहारा समूह को 1800 करोड़ रुपये वापस देगा इनकम टैक्‍स विभाग

कई तरह की मुश्किलों से घिरे सहारा समूह को भारी आर्थिक लाभ होने जा रहा है. हालांकि यह पैसा न तो कमाई है और ना ही बाजार से जुटाया गया है. सहारा का यह पैसा इनकम टैक्‍स डिपार्टमेंट के पास था, जिसे अब वो लौटा रहा है. आईटी ने काफी साल पहले 1800 करोड़ रुपये की धनराशि सहारा समूह से यह कह कर वसूल किया था कि उसे अपने रेवेन्‍यू पर विभाग को टैक्‍स देना होगा.

सहारा ने पैसा तो जमा कर दिया परन्‍तु इसका विरोध करते हुए कहा था कि यह रेवेन्‍यू नहीं डिपाजिट है और इस पर टैक्‍स नहीं लग सकता है. अब खबर है कि इनकम टैक्‍स की अपील अथॉरिटी ने सहारा समूह के इस तर्क को मान लिया है और यह रकम वापस करने की अनुमति दे दी है.

इंडियन एक्‍सप्रेस ने लिखा, सस्‍ते हवाई टिकट खरीद आयोजकों से पूरे पैसे वसूले किरण बेदी ने

भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाली टीम अन्ना की एक अहम सदस्य किरण बेदी पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं. अंग्रेजी दैनिक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खबर के मुताबिक किरण बेदी उन संस्थानों और एनजीओ से अपनी हवाई यात्रा का पूरा किराया वसूलती थी, जो उन्‍हें सेमीनार या अन्‍य आयोजनों में आमंत्रित करते थे, जबकि उन्हें खुद का टिकट उससे कम कीमत पर मुहैया होता था.

अखबार लिखता है कि 1979 में एक आईपीएस अधिकारी के तौर पर राष्ट्रपति से वीरता पदक (गैलेंट्री अवार्ड) पा चुकी किरण बेदी को एयर इंडिया के इकोनॉमी क्लास के किराए में 75 फीसदी की छूट हासिल है. इसके बावजूद उन्‍होंने 2006 से लेकर 29 सितंबर, 2011 के बीच 12 बार ऐसा किया है, जब उन्हें एयर इंडिया के हवाई किराए में छूट मिली थी और उन्होंने उन संस्थानों से उस टिकट के बदले पूरा पैसा लिया. इन यात्राओं के चेक इंडिया विजन फाउंडेशन के खाते में जमा हुए, जिसकी मालकिन किरण बेदी हैं. किरण बेदी ने इस मामले पर ट्वीट करते हुए लिखा है कि ये देखकर हैरानी हुई कि इकोनॉमी क्लास में सफर करके नेक काम के लिए पैसे बचाना भी अखबारों की सुर्खियां बनता है. किरण बेदी ने कहा है कि वे किसी भी जांच के लिए तैयार हैं.

टीवी पर विज्ञापन : साल भर में 18 करोड़ से ज्‍यादा फूंक डाला माया सरकार ने

पिछले एक वर्ष अर्थात 20 सितम्बर 2010 से 20 सितम्बर 2011 के मध्य उत्तर प्रदेश सूचना एवं जन संपर्क निदेशालय द्वारा विभिन्न चैनलों तथा टेलीविजन पर कुल नौ बार विज्ञापन दिया गया, जिसमें कुल 18.45 करोड़ रुपये का व्यय हुआ था. यह सूचना मेरे द्वारा उत्तर प्रदेश शासन के सूचना और जनसंपर्क विभाग द्वारा आरटीआई के अंतर्गत इस अवधि में उत्तर प्रदेश सूचना एवं जन संपर्क निदेशालय द्वारा विभिन्न चैनलों तथा टेलीविजन पर प्रसारित कराये गए सरकारी एडवरटीजमेंट के सम्बन्ध में मांगी सूचनाओं के उत्तर में दी गयी है.

इस अवधि में 17 से 30 अक्टूबर 2010, 07 फरबरी से 16 अप्रैल 2011 एवं 12 मई से 14 सितम्बर 2011 तक की अवधि के मध्य प्रसारित किये गए. ये सभी विज्ञापन 40.0 सेकण्ड तथा 5.35 सेकेण्ड के थे, जो सभी न्यूज़ चैनलों पर प्रसारित किये गए थे. हम सबों को उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य में सरकार द्वारा मात्र स्व-प्रचार में इतनी बड़ी धनराशि व्यय किये जाने की कटु निंदा करनी चाहिए, जहां एक तरफ तो लोग भुखमरी से मर रहे हैं और दूसरी ओर सरकार करोड़ों रुपये अपनी शान में कसीदे गढ़ने में खर्च कर रही है. यह सचमुच एक ऐसी स्थिति है जिसे कदापि ठीक नहीं कहा जा सकता और यह आज के समय की सरकारों की मानसिकता की द्योतक है. अब समय आ गया है जब इन कार्यों के लिए आम जनता को सरकारों को जिम्मेदार बनाते हुए उनसे उनके कार्यों का हिसाब लेना चाहिए.

डॉ. नूतन ठाकुर

कन्‍वेनर

नेशनल आरटीआई फोरम

बेहतरीन मानवीय रिपोर्टिंग के लिए द हिंदू के रिपोर्टर अमन सेठी पुरस्‍कृत

द हिंदू के पत्रकार अमन सेठी को बेहतरीन मानवीय रिपोर्टिंग के लिए आईसीआरसी और प्रेस इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडिया (पीआईआई) ने प्रथम पुरस्‍कार प्रदान किया है. इस पुरस्‍कार के तहत सेठी को 50000 रुपये प्रदान किया गया. उन्‍हें यह पुरस्‍कार छत्‍तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हुए दंगों के बारे में लिखे गए रिपोर्ट पर दिया गया है. दोनों संस्‍थान संयुक्‍त रूप से इस पुरस्‍कार का आयोजन करते हैं.

द्वितीय पुरस्‍कार तहलका मैगजीन के उमर बाबा, तृतीय पुरस्‍कार मलयालम न्‍यूज पेपर राष्‍ट्रीय दीपिका के रेजी जोसेफ तथा सांत्‍वना पुरस्‍कार टाइम्‍स आफ इंडिया के अनूप शर्मा को प्रदान किया गया. इन लोगों को यह पुरस्‍कार अल्‍पसंख्‍यक आयोग के अध्‍यक्ष वजाहत हबीबुल्‍ला, पीआईआई चीफ वी मुरली व रेडक्रास के फ्रेंकोइस स्‍टेम ने प्रदान किया.

उमर को कश्‍मीर घाटी में हुए दंगों की रिपोर्ट पर, जोसेफ को श्रीलंका के तमिल शरणार्थियों के बारे में लिखी गई रिपोर्ट तथा अमित शर्मा को असम के बारे में चार पार्ट में लिखी गई रिपोर्ट पर यह पुरस्‍कार दिया गया है. इस पुरस्‍कार के लिए पत्रकारों का चयन तीन सदस्‍यीय टीम ने किया,‍ जिसमें आईएएनएस के एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर नारायण स्‍वामी, जेएनयू की अनुराधा चिनाय तथा अधिवक्‍ता वीरेंद्र ग्रोवर शामिल थे.

नवम्‍बर में लांच होगा न्‍यूज चैनल खबर भारती, तैयारी पूरी

साईं प्रकाश टेली कम्‍युनिकेशन लिमिटेड ने न्‍यूज चैनल खबर भारती को नवम्‍बर के मध्‍य तक लांच करने की योजना तैयार की है. डेढ़ महीने पहले चैनल को सरकार से लाइसेंस मिल चुका है. चैनल का ऑफिस, स्‍ट्रक्‍चर तथा टीम भी पूरी तरह तैयार कर ली गई है. प्रबंधन का कहना है कि चैनल को बाजारु बनाने की बजाय अच्‍छा प्रोडक्‍ट बनाएंगे तथा ग्रामीण भारत को, उसकी समस्‍याओं पर फोकस करेंगे.

गौरतलब है कि काफी दिनों से इस चैनल को लांच करने की तैयारी चल रही थी. लगभग 275 लोगों की टीम तैयार कर ली गई है, जिनमें युवा और अनुभव दोनों का मिश्रण है. चैनल की लांचिंग के लिए स्‍टूडियो, पीसीआर, एमसीआर काफी पहले से ही तैयार किया जा चुका है. चैनल की लांचिंग के संदर्भ में बात करते हुए सीईओ नाजिम नकवी ने बतया कि मिड नवम्‍बर तक इस चैनल को लांच कर दिया जाएगा. कंटेंट को लेकर हमारा विजन बिल्‍कुल क्‍लीयर है. हमारी कोशिश पारम्‍परिक न्‍यूज बुलेटिनों से हटकर थोड़ा अलग करने की है. हमारा विजन बिल्‍कुल क्‍लीयर है कि हमें क्‍या नहीं दिखाना है. हम शहरों की बजाय हम असली भारत यानी ग्रामीण क्षेत्र को प्रमुखता देंगे.

उन्‍होंने बताया कि उनके पास एक बेहतरीन टीम हैं. सभी लोग कर्मठ हैं, अपने काम जानते हैं. ये मीडिया प्रोफेशनल नहीं बल्कि पत्रकार हैं. नाजिम नकवी ने कहा कि टीएन मनीष वीपी न्‍यूज के रूप में टीम को लीड कर रहे हैं, जो साधना, सहारा और वाइस आफ इंडिया से जुड़े रहे हैं. मनीष जमीन से जुड़े पत्रकार हैं. आजतक से परवेज खान को लाया गया है, जो प्रोग्रामिंग टीम को लीड करेंगे. मार्केटिंग को विंस्‍टन पीटर लीड करेंगे, जो आजतक, यूटीवी से जुड़े रहे हैं. चैनल के रीजनल या नेशनल होने के सवाल पर उन्‍होंने कहा कि यह हिंदी बेल्‍ट का चैनल होगा. पहले चरण में हम इसे छत्‍तीसगढ़, मध्‍य प्रदेश तथा राजस्‍थान में दिखाएंगे. इसके बाद इसे दूसरे हिंदी राज्‍यों में भी दिखाया जाएगा. फिलहाल यह केबल पर उपलब्‍ध रहेगा. कुछ समय बाद इसे डीटीएच प्‍लेटफार्म पर लाया जाएगा.

मनोज, रवि एवं अहसान की नई पारी

बदायूं से खबर है कि मनोज वर्मा ने हिंदी दैनिक अनन्‍त घोष ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें यहां क्राइम रिपोर्टर बनाया गया है. इससे पहले वे हिंदुस्‍तान तथा खुसरो मेल को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. इस अखबार से रवि कुमार और अहसान अली ने भी अपनी नई पारी शुरू की है. दोनों लोगों ने पेजीनेटर के तौर पर ज्‍वाइन किया है. रवि इसके पहले दैनिक जागरण, हलद्वानी को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

आगरा में बीपीएन टाइम्‍स को जिंदा करने की तैयारी, फर्म का नाम भी बदला गया

आगरा में आखिरी सांस ले रहे रहे चिटफंडियों के अखबार बीपीएन टाइम्‍स को फिर से नया जीवन देने की तैयारी हो रही है. ग्‍वालियर में इस अखबार के चिटफंड आफिसों पर छापा पड़ने तथा सील होने के बाद अखबार का प्रकाशन लटक गया था. पर अब खबर है कि चिटफंडिए नया फर्म बनाकर इसे फिर से जीवित करने की कोशिश में लग गए हैं. इसके संपादन की जिम्‍मेदारी शिव शंकर तिवारी को सौंपी गई है.

गौरतलब है कि एक साल पहले आगरा से अमी आधार निडर के संपादकत्‍व में बीपीएन टाइम्‍स की लांचिंग हुई थी. सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था परन्‍तु ग्‍वालियर के जिलाधिकारी द्वारा चिटफंडियों पर लगाम कसने के चलते बीपीएन टाइम्‍स भी उसकी चपेट में आ गया, क्‍योंकि इस ग्रुप की मदर संस्‍था भी चिटफंड के कारोबार से जुड़ी हुई थी. ग्‍वालियर में इस ग्रुप के कई कार्यालयों को सील कर दिया गया. ग्‍वालियर एडिशन के अखबार के कार्यालय को भी सील कर दिया गया. आगरा एडिशन भी ग्‍वालियर यूनिट से ही प्रकाशित होकर आता था, लिहाजा कार्यालय सील होने का असर आगरा पर भी पड़ा. ग्रुप की आर्थिक स्थिति भी खराब हो गई.

अखबार की कुछ सौ कापियां दिल्‍ली से छपवाकर आगरा भेजी जाने लगी. इसके चलते प्रसार भी प्रभावित हुआ. बिगड़े हालातों में कर्मचारियों का पैसा देना मुश्किल हो गया, जिसके बाद संपादक अमी आधार निडर ने सभी कर्मचारियों का बकाया दिलाने के बाद खुद भी इस्‍तीफा दे दिया. उनके साथ लगभग डेढ़ दर्जन लोगों ने अखबार छोड़ दिया. इसके बाद डाक इंचार्ज शिव शंकर तिवारी किसी तरह अखबार को खींचतान कर चलाते रहे हैं. अब खबर है कि शिव शंकर को बीपीएन टाइम्‍स का संपादकीय प्रभारी बना दिया गया है. इस संस्‍करण को फिर से जोर-शोर से शुरू करने की तैयारी की जा रही है. फिलहाल इसे नोएडा से छपवाकर आगरा भेजने की योजना है.

सूत्रों का कहना है कि सब कुछ ठीक ठाक रहा तो बीपीएन टाइम्‍स के प्रकाशन की व्‍यवस्‍था आगरा से ही करा दी जाएगी. हालांकि इसमें कितना समय लगेगा यह अभी तय नहीं हो पाया है. इसके साथ ही कंपनी ने एक नई फर्म बीएल इंफोटेक का निर्माण कर लिया है. अब इसी नाम से बीपीएन टाइम्‍स के अखबारों का प्रकाशन किया जाएगा. गौरतलब है‍ कि इसके पहले इसे बीपीएन न्‍यूज नेटवर्क के नाम से जाना जाता था.

कल्‍याण कुमार बने सी टीवी के हेड

: चैनल के नए कार्यालय के लिए हवन-पूजन हुआ : आगरा से खबर है कि यहां से जल्‍द लांच होने जा रहे सी टीवी के साथ वरिष्‍ठ पत्रकार कल्‍याण कुमार ने अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें इस चैनल का हेड बनाया गया है. कल्‍याण कुमार इसके पहले शेखर टाइम्‍स के संपादक थे. दूसरी तरफ चैनल का नया आफिस खोलने के लिए दिल्‍ली रोहित हाउस में हवन पूजन किया गया. चैनल को जल्‍द से जल्‍द लांच करने की तैयारियां अंतिम दौर में पहुंच गई हैं.

सी टीवी के हेड बने कल्‍याण कुमार शाहजहांपुर में शेखर टाइम्‍स से जुड़ने से पहले दैनिक जागरण, बरेली के संपादकीय प्रभारी थे. कैंटीन को लेकर हुए विवाद के बाद उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था. इसके पहले वे वॉयस ऑफ इंडिया के साथ जुड़े हुए थे. जागरण, पानीपत में भी वे वरिष्‍ठ पोस्‍ट पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं. जागरण से इस्‍तीफा देने के बाद उन्‍होंने शेखर टाइम्‍स ज्‍वाइन कर लिया था.

दैनिक भास्‍कर, धनबाद से चार लोगों ने दिया इस्‍तीफा

दैनिक भास्‍कर, धनबाद से सूचना है कि चार लोगों ने संस्‍थान को बाय बोल दिया है. ये लोग स्‍टेट हेड ओम गौड़ के रवैये से परेशान थे. चीफ सब के रूप में कार्यरत अंजय श्रीवास्‍तव यहां से इस्‍तीफा देकर हिंदुस्‍तान, पटना चले गए हैं. दूसरे चीफ सब एडिटर विकाश शुक्‍ला भी यहां से इस्‍तीफा देकर यूपी लौट गए हैं. विकास यूपी के ही रहने वाले हैं. उन्‍होंने कहां ज्‍वाइन किया है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. सब एडिटर मान सिंह भी विकास की तरह अपने प्रदेश में लौट आए हैं. वे भी यूपी के रहने वाले हैं. खबर है कि इन्‍होंने हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन किया है.

वहीं डीबी स्‍टार में सब एडिटर के पद पर कार्यरत दीपक वर्मा भी यहां से इस्‍तीफा दे दिया है. वे प्रभात खबर जमशेदपुर से भास्‍कर, धनबाद गए थे. उन्‍होंने धनबाद में एक स्‍थानीय अखबार ज्‍वाइन कर लिया है. बताया जा रहा है कि रांची में एनई रहे अंकित शुक्‍ला की गुड बुक में रहे इन लोगों को लगातार प्रताडि़त किया जा रहा था, जिसके चलते इन लोगों ने अखबार को अलविदा कह दिया.

सुमन सौरभ प्रभात खबर, देवघर के नए आरई, जमशेदपुर भेजे गए कुमार सौरभ एवं प्रदीप जायसवाल का इस्‍तीफा

: अपडेट : प्रभात खबर, रांची में हलचल है. पिछले काफी समय से जड़वत लोगों को इधर-उधर करके गतिशील बनाने का काम किया जा रहा है. प्रबंधन का निर्णय काफी दिनों से जमे-जमाए लोगों को रास नहीं आ रहा है. पिछले दिनों जमशेदपुर भेजे गए दो लोगों ने इस्‍तीफा देकर अपना बिजनेस चलाने का‍ निर्णय लिया है. इधर, प्रभात खबर, देवघर से सूचना है कि सुमन सौरभ को देवघर का नया आरई बना दिया गया है. पुराने संपादक संजय मिश्र होल्‍ड पर हैं.

रांची में तैनात सुमन सौरभ देवघर एडिशन के स्‍थानीय संपादक बना दिए गए हैं. सुमन काफी समय से रांची में जमे हुए थे. वे अब तक स्‍थानीय संपादक की भूमिका निभा रहे संजय मिश्र के ऊपर भेजे गए हैं. संजय मिश्र का तबादला नहीं किया गया है. बल्कि एक तरह से उन्‍हें होल्‍ड पर रख दिया गया है. दूसरी तरफ पिछले दिनों प्रमोट करके भेजे गए कुमार सौरभ और प्रदीप जायसवाल ने इस्‍तीफा दे दिया है. प्रबंधन ने रांची में डीएनई के पद पर कार्यरत कुमार सौरभ को एनई बनाकर जमशेदपुर भेजा था, परन्‍तु उन्‍होंने वहां जाने से इनकार करते हुए इस्‍तीफा दे दिया. चीफ सब से डीएनई बनाकर जमशेदपुर भेजे गए प्रदीप जायसवाल भी वहां ज्‍वाइन करने की बजाय इस्‍तीफा दे दिया. फिलहाल इन दोनों लोगों ने कहीं ज्‍वाइन नहीं किया है. इस संदर्भ में जब प्रदीप जायसवाल से बात की गई तो उन्‍होंने इस्‍तीफा के संबंध में कुछ भी बताने से इनकार कर दिया.

इसी उथल-पुथल के बीच एक खबर और आ रही है कि प्रभात खबर के एक वरिष्‍ठ संपादकीय सहयोगी दूसरे जगह आशियाना तलाशने की कोशिश में जुटे हुए हैं. अगर सूत्रों की माने तो रविवार को उन्‍होंने एक प्रतिद्वंद्वी अखबार के स्‍टेट हेड के साथ लम्‍बी मुलाकात की है. अब इन लोगों के बीच क्‍या बात हुई है, इसकी जानकारी तो नहीं मिल पाई है, परन्‍तु समझा जा रहा है कि बात बन गई तो अगले कुछ दिनों में ये प्रभात खबर को अलविदा कह सकते हैं. फिलहाल इस मुलाकात को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं.

अमर भारती से अमोल दीक्षित एवं पॉलिटिकल एक्‍सप्रेस से सैयद अली का इस्‍तीफा

अमर भारती, आगरा से खबर है कि अमोल दीक्षित से इस्‍तीफा दे दिया है. अमोल सर्कुलेशन विभाग में कार्यरत थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी हिंदुस्‍तान एक्‍सप्रेस के साथ शुरू की है. इन्‍हें यहां भी सर्कुलेशन की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. उल्‍लेखनीय है कि अमर भारती से लोगों के पलायन का सिलसिला जारी है. कुछ और लोगों के दूसरे अखबारों में जाने की चर्चाएं हैं. अमोल इसके पहले भी कई अखबारों में काम कर चुके हैं.

सैयद अली अख्‍तर ने पॉलिटिकल एक्‍सप्रेस से इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सब एडिटर थे. ये अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. वे पिछले छह सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं.

अन्‍ना हजारे ने मीडियावालों से कहा ‘बाहर निकलो’

पूरा दिन अन्ना हजारे के कमरे से बाहर निकलने का इन्तजार करनेवाले मीडिया कर्मियों को स्वयं अन्ना हजारे ने हिंदी में कह दिया कि बाहर निकलो. शनिवार का दिन, सुबह के करीब 9 बजे होंगे, हेडलाइंस टुडे के राहुल कँवल और उनके साथियों ने अपना सेटअप लगाया अन्ना के कमरे में, जहां पर होनी थी सीधी बात. लेकिन जैसे ही यह खबर अन्ना के सहयोगी ने बाहर फैलाई वैसे ही स्टार न्‍यूज के साथ-साथ बाकी सभी चैनल के रिपोर्टर तिलमिला उठे.

अन्‍य सभी चैनलों के मीडियाकर्मी जब ‘यह हमारे प्रति अन्याय है’ का शोर मचाने लगे तो अन्ना स्वयं बाहर आये और बोले अब बस करो और यहाँ से निकलो. किसी को कोई बाइट नहीं मिलेगी. अन्ना हजारे का यह रूप देखकर बड़े-बड़े रिपोर्टरों को मानो सांप ने सूंघ गया. सभी ऐसे छुप गये कि वहां सन्‍नाटा छा गया. अन्ना हजारे ऐसा भी कुछ कर सकते हैं किसी को विश्‍वास नहीं हुआ.

एक दिन में मीडिया के कारण जो व्‍यक्ति देश और पूरी दुनिया में मशहूर हुआ, उसका मीडिया को इस प्रकार लताड़ लगाना कितना सही या गलत है, यह अलग विषय है, पर कुछ भी हो अन्‍ना ने जो मौन ब्रत धारण किया है उसका कारण भी मीडिया ही है. क्‍योंकि रालेगण सिद्धि में मौजूद मीडिया कर्मियों को उनके दफ्तर से यह आदेश मिलता था कि अन्‍ना से इस पर सवाल पूछो, यह पूछो, उस पर सवाल पूछो, पर रालेगण सिद्धि में कवरेज कर रहे पत्रकारों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था, यह किसी को नहीं पता था.

अन्‍ना हजार के इस प्रकार के घमंडी रवैये से मीडिया वाले सन्‍न हो गए. लेकिन इतना सब होने के बाद भी टीआरपी की लालच कहां सुधरने देती है, बात होने लगी- अगर किसी ने अन्‍ना के गुस्‍से में चिढ़े हुए मूड का क्लिप ही चला देता तो टीआरपी मिल जाती. पर अन्‍ना के अचानक बदले स्‍वभाव से किसी का दिमाग काम ही नहीं कर रहा था. किसी के दिमाग में यह बात आई ही नहीं. इस बात का थोड़ा असर आईबीएन पर हुआ. उसने अन्‍ना के पीए सुरेश पठारे को कथित रूप से दिए गए 30 हजार के आईपॉड की खबर चला दी.

अभी अन्‍ना के साथियों के और कुछ रूप बाहर आने बाकी हैं, जो अगले कुछ दिनों पूरे देश को दिखाई देने लगेंगे. दूसरी मिसाल अन्‍ना के गांव के सरपंच की राहुल गांधी से मुलाकात की बात है. जब न्‍यौता मिला ही नहीं तो बिन बुलाए मेहमान की तरह सरपंच दिल्‍ली गए क्‍यूं? आखिर अन्‍ना, जो भ्रष्‍टाचार और कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, सरपंच को राहुल से मिलने की इजाजत क्‍यूं दी. महाराष्‍ट्र की तत्‍कालीन विलासराव देशमुख सरकार के समय बने हिंद स्‍वराज ट्रस्‍ट और बाकी सरकारी मदद से ही अन्‍ना ने गांव में भक्‍त निवास और स्‍कूल आदि बनवाएं, कांग्रेस के इशारे पर ही शिवसेना गठबंधन सरकार के खिलाफ आंदोलन किया था.

कभी कभी तो लगता है कि अन्‍ना हजारे का आंदोलन भी कांग्रेस ही चलवा रही है. क्‍यों कि बार-बार टिप्‍पणी करके अन्‍ना को उलझाए रखते हुए कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पर उठी उंगली की खबरों से आम जनता का ध्‍यान दूसरी ओर ले जाने का काम किया है. मौन ब्रत के के लिए भला कुटिया बनाने की क्‍या जरूरत, जिस पर पांच लाख का खर्च आया है. वो किसने किया इस पर किसी मीडिया वाले ने ध्‍यान नहीं दिया या उनका ध्‍यान ही नहीं गया.

सुनील दत्‍ता की रिपोर्ट.

सहारा को झटका : सैट ने छह सप्‍ताह के भीतर पैसा लौटाने का निर्देश दिया

सहारा समूह कंपनियों की अपील खारिज करते हुए प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (सैट) ने उन्हें निवेशकों से वैकल्पिक पूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर (ओएफसीडी) के जरिये जुटाया गया धन छह सप्ताह के भीतर लौटाने का आदेश दिया है। सैट ने आज अपने आदेश में सेबी के निर्णय के खिलाफ सहारा समूह की अपील खारिज की जाती है।

अपीलीय न्यायाधिकारण ने अपीलकर्ता आज की तारीख से छह सप्ताह के भीतर निवेशकों को सेबी के पूर्णकालिक सदस्यों द्वारा निर्धारित शर्तों के तहत पैसा लौटाये। सेबी के आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए सैट ने कहा कि इस प्रकार की योजनाओं के जरिये कोष जुटाने का मामला बाजार नियामक (सेबी) के क्षेत्राधिकार में आता है। अभी यह पता नहीं चल पाया है कि सहारा कंपनियों को कितना पैसा निवेशकों को लौटाना होगा जिन्होंने ओएफसीडी के जरिये पैसा लगाया था।

सैट ने दोनों कंपनियों सहारा इंडिया रियल एस्टेट कारपोरेशन (अब सहारा कमोडिटी सर्विसेज कारपोरेशन लि.) तथा सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कारपोरेशन को छह सप्ताह के भीतर पैसा लौटाने को कहा। उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (सेबी) ने जून में नियामक नियमों के उल्लंघन का हवाला देते हुए सहारा समूह की दोनों कंपनियों को ओएफसीडी के जरिये लाखों निवेशकों से जुटाये गये पैसे को लौटाने को कहा था।

इसी प्रकार का मुद्दा सहारा ने उच्चतम न्यायालय में भी उठाया था। न्यायालय ने तब मामले को सैट के पास ले जाने को कहा था। सहारा समूह ने सेबी के इस आदेश को सैट में चुनौती दी थी। याचिका में दलील दी गयी थी कि यह मामला सेबी के न्यायिक क्षेत्रा में नहीं है क्योंकि कंपनियां सूचीबद्ध नहीं हैं। उसमें कहा गया था कि कंपनियां निजी स्वामित्व वाली कंपनी है और वे कंपनी मंत्रालय के अधीन आती हैं। मामले में सहारा की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन की दलील को खारिज करते हुए सैट ने आदेश में कहा, इस दलील में कोई दम नहीं है। साभार : वन इंडिया हिंदी

श्रीलाल शुक्ल की बेहद खराब तबियत नेशनल मीडिया के लिए खबर नहीं है

मुझे कभी कभी शर्म आती है। इस पेशे पर। अपने दोस्तों पर। लोगों पर। प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल कई दिनों से गम्भीर रूप से बीमार हैं। उनको अस्पताल में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों के मुताबिक उनकी हालत नाजुक है। ऐसे महान साहित्यकार की गंभीर तबियत खराब है, लेकिन अभी तक यह नेशनल मीडिया के लिए महत्वपूर्ण नहीं बन पाई है।

भला बने भी कैसे इस स्टोरी पर टीआरपी (टीवी रेटिंग) और पेजव्यू (वेबसाइट में खबरों की रेटिंग) कम आने का जो खतरा है। मेरे हर मीडियाकर्मी मित्र को पता है कि ऐसी खबरें मुनाफेदार नहीं होती। चलिए मान लिया कि मीडिया को इस खबर से मुनाफा नहीं था इसलिए इसका महत्व नहीं दिया। लेकिन उन लोगों का क्या जो मीडिया से जुड़े नहीं हैं। जो खबरें पढ़ते और सुनते हैं। आखिरकार यही लोग तो तय करते हैं कि किसी खबर की टीआरपी या पेजव्यू क्या होगा।

मैंने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर इस संबंध में एक पोस्ट डाली। लिखा कि, ”प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल गम्भीर रूप से बीमार है। उनको लखनऊ के गोमतीनगर स्थित सहारा अस्पताल में भर्ती कराया गया है। खबर है कि उनको साहित्य जगत का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार आज अस्पताल में ही दिया जाएगा। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी हालत नाजुक है। आइए हम सब मिलकर उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना करें; क्योंकि दुआएं दवा से ज्यादा कारगर होती हैं।” करीब चार घंटे बीत गए, लेकिन एक भी व्यक्ति ने इस पोस्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया। मुझे बहुत ग्लानि हुई।

मैं सोचने लगा कि इतना प्रखर साहित्यकार जिसे अस्पताल में ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसा साहित्य जगत का सर्वोच्च सम्मान मिलने वाला है। उससे संबंधित पोस्ट पर एक भी साथी ने कमेंट करना मुनासिब क्यों नहीं समझा। आखिरकार जो लोग खुद को साहित्यकार या साहित्य का प्रेमी समझते हैं वो इतना संवेदना शून्य कैसे हो गए हैं। जबकि मेरे फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में कई साहित्कार और साहित्य प्रेमी मित्र भी हैं।

खैर, अपनी पहली पोस्ट के चार घंटे के बाद मुझे रहा नहीं गया तो मैने एक और पोस्ट डाली। इंतजार किया। लगा कि इस बार तो लोगों की प्रतिक्रिया जरूर मिलेगी। पर निराशा हाथ लगी। मेरा एक इंजीनियर मित्र ने इसके लिए अफसोस जाहिर किया, लेकिन और किसी भी मित्र का एक भी कमेंट नहीं आया। यह भी तय था कि यदि पूनम पांडे से संबंधित कोई पोस्ट डाला होता तो कमेंट्स की भरमार हो जाती। बता दूं कि पूनम पांडे के एक वीडियो को एक हफ्ते में 70 लाख लोगों ने देखा था।

भई, अब मैं इतना समझ चुका हूं कि ऐसे मुद्दों पर हमारे मीडियाकर्मी मित्रों से ज्यादा वो लोग दोषी हैं, जो खुद को संवेदनशील होने का ढोंग करते हैं। यदि आप ऐसी खबरों को पढ़ना शुरू कर देते हैं। जो निश्चित ही टीआरपी और पेजव्यू अधिक रहेंगे। ऐसे में पत्रकारिता और ड्यूटी दोनों हो जाएगी। बताता चलूं कि श्रीलाल शुक्ल को सांस लेने में तकलीफ की शिकायत है। उनके फेफड़े में संक्रमण है। फिलहाल वह आईसीयू में भर्ती हैं। उनको 20 सितम्बर को वर्ष 2009 के लिए 45वां ज्ञानपीठ पुरस्कार कहानीकार अमरकांत के साथ संयुक्त रूप से देने की घोषणा की गई थी।

उनके लिए जिन्हें नहीं पता कि कौन है श्रीलाल शुक्ल : हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश में सन् 1925 में हुआ था। उनका पहला प्रकाशित उपन्यास ‘सूनी घाटी का सूरज’ (1957) तथा पहला प्रकाशित व्यंग ‘अंगद का पांव’ (1958) है। स्वतंत्रता के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत दर परत उघाड़ने वाले उपन्यास ‘राग दरबारी’ (1968) के लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके इस उपन्यास पर एक दूरदर्शन-धारावाहिक का निर्माण भी हुआ। श्री शुक्ल को भारत सरकार ने 2008 मे पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।

उपन्यास :  सूनी घाटी का सूरज · अज्ञातवास · रागदरबारी · आदमी का ज़हर · सीमाएँ टूटती हैं। कहानी संग्रह:  यह घर मेरा नहीं है · सुरक्षा तथा अन्य कहानियां · इस उम्र में। व्यंग्य संग्रह:  अंगद का पांव · यहां से वहां · मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें · उमरावनगर में कुछ दिन · कुछ जमीन पर कुछ हवा में · आओ बैठ लें कुछ देर। आलोचना: अज्ञेय: कुछ राग और कुछ रंग।

लेखक मुकेश कुमार ‘गजेंद्र’ दैनिक भास्‍कर से जुड़े हुए हैं. यह लेख उनके ब्‍लाग चौथा खंभा से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

कम समय में ही अलग पहचान बनाई थी प्रदीप राय ने

गाजीपुर : गाजीपुर पत्रकार एसोसिएशन की ओर से कैम्प कार्यालय पर जनपद के युवा पत्रकार प्रदीप राय के आकस्मिक निधन पर एक शोक सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शान्ति की कामना की गई। श्री राय जनपद के बडे़ ही कर्मठ पत्रकारों में शुमार होते थे। इन्होंने अपनी पत्रकारिता उस वक्त आरम्भ किया था जब जनपद के लोग दूरदर्शन के समाचार के भरोसे हुआ करते थे, उस वक्त इन्होंने जनपद में सिटी न्यूज चलाकर तहलका मचा दिया था।

इसके बाद लोग जनपद में इन्हें इलेक्ट्रॉनिक चैनल का जनक भी कहा करते थे। अल्प समय में सिटी न्यूज से कैरियर का आगाज करने वाले श्री राय बीएजी से जुडे और उसके बाद स्टार न्यूज को जनपद में एक मुकाम हासिल कराया। इनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जनपद के किसी भी नेता अधिकारी या फिर बुद्धिजीवी वर्ग के बीच  इलेक्ट्रानिक चैनल का नाम लेने पर सबसे पहले उसके जुबान पर प्रदीप राय का नाम ही आता था। स्टार न्यूज में सेवा देने के बाद वो अपने मेहनत के दम पर दिल्ली में जी न्यूज के संवाददाता नियुक्त हुए। अपने कार्यशैली के बूते वे दिल्ली में भी कम समय में पत्रकार साथियों में अपनी काफी अच्छी पैठ बना लिया था। इसी दौरान उनके तबियत में कुछ खराबी आई, जिसके बाद वो जनपद वापस आकर ईलाज कराना आरम्भ कर दिया।

वे पिछले एक साल से ज्‍वाइंडिस से पीडि़त थे। कल शाम उनकी तबियत अचानक बिगड़ी और डाक्टरों की सलाह पर उन्हें वाराणसी ले जाया गया, जहां पर आज सुबह 6 बजे उन्‍होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर जनपद में आग की तरह फैल गई और हर कोई एक दूसरे से उक्त खबर की पुष्टि करने में जुट गया। उनका अंतिम संस्कार वाराणसी गंगा घाट पर ही किया गया। इनके निधन से जनपद के मीडिया जगत में शोक की लहर व्याप्त हो गई है। श्री राय अपने पीछे माता-पिता के साथ पत्‍नी और एक दस माह की बिटिया छोड गये हैं। शोक सभा में वरिष्ठ पत्रकार कार्तिक चटर्जी, अनिल उपाध्याय, अनिल कुमार, प्रवीण गुप्ता, शशिकान्त यादव, शशिकान्त सिंह, आरसी खरवार, गुलाब राय, मोहन तिवारी, सूर्यवीर सिंह, बबलू खरवार, बाबा, श्याम सिन्हा, आशुतोष त्रिपाठी, अशोक श्रीवास्‍तव, विनोद गुप्ता, दयाशंकर राय, पंकज राय, इन्द्रासन यादव, शहनवाज, सोनू, गोपाल जायसवाल के साथ ही कई अन्य पत्रकार भी मौजूद रहे। जनपद मऊ के पत्रकारों ने भी ब्रहम स्थान स्थित पत्रकार राहुल सिंह के आफिस पर शोक सभा कर प्रदीप को श्रद्धाजंलि दी और इस दुख की बेला में उनके परिवार वालों को इस गम को सहने की शक्ति देने की भगवान से कामना की।

गाजीपुर से अनिल कुमार की रिपोर्ट.

एनडीटीवी को त्रिशंकु अवस्‍था से निकालने की तैयारी, मनोरंजन भारती को अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी

खबरों के लिए पहचान रखने के बावजूद टीआरपी बाजार में एनडीटीवी की पहचान बीच के चैनलों में होती है. यानी ना स्‍वर्ग में ना नर्क में, बस त्रिशंकु की तरह बीच में. अब चैनल को इस त्रिशंकु अवस्‍था से निकालकर अलग पहचान देने की कवायद में एनडीटीवी के वरिष्‍ठ लोग लगे हुए हैं. स्‍ट्रेटजी में थोड़ी परिवर्तन किया जा रहा है. जिनके सिर पर ज्‍यादा जिम्‍मेदारियां हैं उन्‍हें डिस्‍ट्रीब्‍यूट किया जा रहा है. यानी एनडीटीवी में अब खेल केवल खबरों का होगा.

सूत्रों का कहना है कि चैनल को गियर अप करने की तैयारी की जा रही है. इसके लिए मामूली फेरबदल किए गए हैं. इनपुट हेड सुनील सैनी अब तक खबरों के आने से लेकर ब्‍यूरो तक की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. अब उनके इस अधिकार में आंशिक कटौती कर दी गई है. इनपुट हेड तो वो रहेंगे पर अब ब्‍यूरो और रिपोर्टरों को समझाने-हड़काने-धमकाने-शाबाशी देने का काम पॉलिटिकल एडिटर मनोरंजन भारती के जिम्‍मे कर दिया गया है. अब खबरों के लिए मनोरंजन भारती ही इन लोगों को सीधे निर्देश देंगे. स्‍टोरी मंगवाएंगे. इसके बाद ये स्‍टोरियां इनपुट हेड यानी सुनील सैनी के पास पहुंचा दी जाएंगी. सूत्रों का कहना है कि मनोरंजन भारती ने अब कुछ समय के लिए एंकरिंग से भी तौबा कर ली है. वे जमकर रिपोर्टरों को खबरों के लिए घसीटेंगे.

सूत्रों का कहना है कि अब चैनल को बिल्‍कुल खबर बेस्‍ड बनाने की तैयारी की जा रही है. अब इस पर फिक्‍स प्रोग्रामिंग नहीं होगी. बुलेटिन पूर्ण रूप से खबरों से भरे होंगे. वैसे भी टीआरपी में भले ही एनडीटीवी त्रिशंकु बना हो पर भूत-प्रेती न्‍यूज चैनलों के दौर में इसे खालिस खबरों के लिए जाना जाता है. अपनी इस पहचान को और मजबूत करने तथा शुद्ध-शुद्ध खबरिया चैनल होने की कोशिशों में जुट गया है. इसके लिए आनंदो, मनोरंजन भारती, सुनील सैनी, अभिज्ञान प्रकाश एवं रवीश कुमार साथ मिलकर हर रोज के हिसाब से रणनीति बनाने में लगे हुए हैं. वैसे भी जिस तरह न्‍यूज चैनलों के नाक में नकेल डालने की तैयारी सरकार कर रही है, उस स्थिति में धरती हिलाने, स्‍वर्ग की सीढ़ी दिखाने, नागमणि पाने वाले चैनलों को भी देर सबेर खबरों पर लौटना पड़ेगा. इस स्थिति को ध्‍यान में रखकर एनडीटीवी अगुवा बनने की रणनीति तैयार कर रहा है.

जैसे मेरी दिवाली नाश हुई, वैसे कभी पीके तिवारी की भी होगी

संजीव कुमार (काल्‍पनिक नाम, क्‍योंकि ये नहीं चाहते इनका और विभाग का नाम सामने आए) प्रज्ञा टीवी (महुआ ग्रुप का धार्मिक चैनल) में कार्यरत थे. चैनल में काफी समय से नौकरी कर रहे थे. अपने काम में माहिर थे. हालांकि चैनल के अंदर की स्थितियों से उनके मन में एक भय सा हमेशा बना रहता था, पर अपने काम और लंबे जुड़ाव के चलते उन्‍हें ये उम्‍मीद थी कि कोई भी निर्णय लिए जाने के पहले उन्‍हें बताया-पूछा जरूर जाएगा. ऐसा ही एक अंजाना सा डर और उम्‍मीद प्रज्ञा में काम करने वाले लगभग हर कर्मचारी के मन में है.

खैर, इन सब डरों से इतर संजीव और उनके जैसे कई लोग आने वाले त्‍योहारों को लेकर उत्‍साहित भी थे. दशहरा ठीक ठाक बीत गया था. उम्‍मीद थी कि दीपावली भी अच्‍छी होगी. उन्‍होंने तैयारी कर रखी थी कि दीपावली में क्‍या-क्‍या करना है. उनके बच्‍चों ने भी दीपावली पर कौन-कौन से पटाखे चाहिए, इसकी लिस्‍ट थमा दी थी. पत्‍नी ने भी नए चादर और पूजा के सामान लेने के बारे में अभी से बता दिया था. किसी ने अपने परिवार के साथ कहीं जाने का कार्यक्रम बना लिया था. प्रज्ञा में काम करने वाले लगभग सभी कर्मचारियों के घर में ऐसा ही माहौल था. सबने अपने परिवार वालों के साथ दीपावली मनाने के लिए योजनाएं तैयार कर ली थीं.

दीपावली को धूमधाम से मनाने की उधेड़बुन में लगे प्रज्ञा के ज्‍यादातर कर्मचारी उस रोज भी समय से अपने काम पर पहुंचे थे. आफिस में सब कुछ सामान्‍य लग रहा था. दोस्‍तों-सहकर्मियों से हाय-हैलो करते अपने-अपने डेस्‍क पर पहुंच गए थे. पर अभी वे ठीक से बैठे भी नहीं थे कि एचआर से बुलावा आ गया. यह घबराहट पैदा करने वाली बात थी. बारी-बारी से बुलाया जा रहा था. पहले जिसे बुलाया गया, उसकी सासें तेज हो चुकी थीं. कांपते कदमों से वो कांफ्रेंस रूम में बैठे एचआर हेड के पास पहुंचा. पहुंचते ही बताया गया कि मैनेजमेंट का आर्डर है, कास्‍ट कटिंग करनी है, इसलिए एक फार्मेट दिया जा रहा है, इसे भरकर मेल कर दीजिए, आपको रिजाइन करना है. उसने खुद को निकाले जाने का कारण पूछने की कोशिश की परन्‍तु एचआर कुछ भी सुनने-बताने को तैयार नहीं. मन में गुस्‍सा था, पर नौकर होने का डर भी दिल के किसी कोने में पनपे आवेग को बाहर लावा बनकर निकलने से रोक दिया. बल्कि ये लावा गर्म आंसू की शक्‍ल में आंखों के कोरों से टपक पड़े. कुछ जगहों पर शर्ट गीली हो चुकी थी. वो कांफ्रेंस रूम से बाहर निकल आया.  मन ही मन बोल चुका था- जैसे मेरी दिवाली खराब हुई है, वैसे ही कभी पीके तिवारी की भी होगी, ये मेरी बददुआ है.

तभी दूसरे का नाम बुलाया गया. फिर से वही कहानी. इधर एचआर और मैनेजमेंट के फैसले का तीखा नस्‍तर झेलकर आ चुके कर्मी से अंदर हुई बात जानने की अफरातफरी मच गई. सब जानने को बेचैन थे कि अंदर क्‍या हुआ होगा. थोड़ी देर संयत रहने की कोशिशों के बीच उसने कंपकपाती आवाज में बता दिया मैनेजमेंट का फरमान है विदाई का. सभी के चेहरे फक्‍क पड़ गए और निगाहें कांफ्रेंस रूम की तरफ टिक गईं. दूसरा शख्‍स भी गीली आंखों के साथ बाहर आ रहा था. एक-एक करके ग्यारह लोगों की बलि एचआर ने कास्‍ट कटिंग के नाम पर ले ली थी. इसके पहले भी कई लोग इस बेदी पर चढ़ चुके थे. किसी ने विरोध भी करने की कोशिश की तो उसके सामने अपनी मजबूरियों का पहाड़ आ गया. शायद यही सच है कि मीडिया में आवाज उठाने वाले इतने निरीह हैं कि अपने समर्थन में आवाज नहीं उठा सकते. कारण परिवार, बच्‍चे, माता-पिता, आगे की तमाम आर्थिक मजबूरियां और पचड़े न फंसने की मन:स्थिति.

प्रज्ञा में अब काम करने वाले कर्मचारी आधे मन से काम कर रहे हैं. बस वे एक दिन नौकरी बच जाने की चिंता में घर जा रहे हैं. अंदरुनी सूत्रों का कहना है कि अब पीसीआर से लगभग दो दर्जन कर्मचारियों को निकाले जाने की योजना है. इन्‍हें भी एक साथ नहीं बल्कि कई टुकड़ों में निकाला जाएगा ताकि विरोध का स्‍वर मुखर न हो सके. शूटिंग का काम बंद हो चुका है. कोई कार्यक्रम शूट नहीं हो रहा है. स्क्रिप्‍ट राइटिंग नहीं हो रही है. कॉपी राइटरों से पहले ही इतना लिखवा लिया गया है कि अगले दो महीनों तक किसी की जरूरत ही नहीं पड़े. संभावना जताई जा रही है कि पीसीआर के बाद एमसीआर तथा एडिटिंग के लोगों को भी बाहर का रास्‍ता दिखाया जाएगा. सबसे दुखद यह है कि यह सारी कार्रवाई बिल्‍कुल गैर-कानूनी तरीके से बिना कोई नोटिस या अतिरिक्‍त सेलरी दिए की जा रही है.

अब भी पीके तिवारी के इस चैनल में सब कुछ ऐसा ही चल रहा है. पत्रकारों को बंधुआ मजदूरों से भी निम्‍न समझने वाला शख्‍स कितना संवेदनहीन और भावनाशून्‍य है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस शख्‍स ने कर्मियों को निकाले जाने के पहले उनकी दीवाली के बारे में भी नहीं सोचा. लगभग ढाई सौ कर्मचारियों वाले इस प्रज्ञा टीवी में अब आधे से कुछ ही ज्‍यादा कर्मचारी रह गए हैं. कास्‍ट कटिंग के नाम पर आए दिन छोटे-छोटे समूहों में इन लोगों को निकाला जा रहा है. कभी प्रज्ञा में चिकेन खाने के नाम पर तो कभी किसी और नाम पर कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है. अभी भी कई दर्जन कर्मचारियों पर छंटनी की तलवार लटक रही है. सब अपनी दीवाली खराब होने के डर के बीच काम करने आ रहे हैं. इस बीच कुछ कर्मचारियों ने दूसरे ठिकानों की तलाश शुरू कर दी है, पर जिस तरह के हालात अन्‍य चैनलों में हैं, वो प्रज्ञा से कोई बहुत ज्‍यादा अच्‍छे नहीं हैं.

पीके तिवारी का पूरा ग्रुप ही अंदर से खोखला हो चुका है. पिछले दिनों पीके तिवारी के चैनलों और कंपनियों पर आईटी और ईडी के पड़े छापों के बाद से इस चैनल की स्थिति खराब है. खोखलापन सामने आ चुका है. लंदनवाली कंपनी में काफी संगीन तरीके से वित्‍तीय लेनदेन और घपलेबाजी, बैंक एवं बीमा कंपनियों से भी लेनदेन में घालमेल और गड़बड़ ट्रांजिक्‍शन की शिकायत पर यह कार्रवाई हुई थी. कई खातों को ईडी ने कुछ खातों को सील भी कर दिया था. इस मामले में जांच अभी भी जारी है. बताया जा रहा है कि इसमें पीके तिवारी की गर्दन पूरी तरह लपेटे में आने की संभावना है. अब खर्च समेटने के लिए ही पीके तिवारी अपने मानस पुत्रों के निर्देश पर चैनलों के तमाम कार्यालय बंद कर रहे हैं और कास्‍ट कटिंग के नाम पर छंटनी कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि इन मानस पुत्रों ने लम्‍बी-लम्‍बी छोड़कर पीके को अपने शीशे में उतारा था. पूरी छूट, पूरी आजादी देने के बाद भी असली काम नहीं हो पाया और शीशा भी टूट गया है. अब इसी शीशे से कई लोग जख्‍मी किए जाने वाले हैं.

अपने नाम के अनुरूप यह पूरा ग्रुप महुआ के नशे में दिख रहा है. पत्रकारों को ताश के पत्‍तों की तरह फेंटने में माहिर पीके तिवारी अब तक कई अच्‍छे पत्रकारों को अपने हरम में रखना चाहते थे तथा उनके अपने काले-पीले-नीले धंधे के लिए लाइजिनिंग करवाना चाहते थे, परन्‍तु इन लोगों ने जब इनकार कर दिया या लाइजनिंग कर पाने में सक्षम नहीं हुए तो तिवारी जी ने बिना आव-ताव देखे एक झटके में बाहर का रास्‍त दिखवा दिया. हालांकि इनको निकाले जाने से पहले इन्‍होंने इनके हाथों छोटे पत्रकारों को निकलवाने का पाप भी करवाया. अब भी हालात ऐसे ही हैं. महुआ न्‍यूज, महुआ तथा प्रज्ञा चैनल से भी सीनियर लोगों के सिर पर हाथ रखकर छोटे लोगों को बाहर का रास्‍ता दिखवाया जा रहा है. वैसे चर्चाओं पर विश्‍वास करें तो पीके तिवारी एक बार फिर इतिहास दुहराने वाले हैं. आखिर आदत जो ठहरी.

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र. उन्‍होंने अपना नाम और पहचान गुप्‍त रखने का अनुरोध किया है. उनके अनुरोध का सम्‍मान करते हुए उनका नाम और पहचान नहीं दिया जा रहा है.

प्रदीप कहते थे- ‘अभी बहुत दूर जाना है’, पर इतने दूर चले जाएंगे, ये आशंका न थी

आज सुबह सुबह कुछ पुराने दोस्तों के मैसेज आये कि अपना एक पुराना साथी अब इस दुनिया में नहीं रहा… मन में जिज्ञासा हुई कि कौन है वो, तभी मैंने कुछ दोस्तों को फोन मिलाया तो पता चला कि जी न्यूज के काबिल व तेज तर्रार रिपोर्टरों में से एक प्रदीप राय नहीं रहे। प्रदीप से मेरी मुलाकात कुछ 5 साल पहले फील्ड में हुई थी.. तब मैं आजाद न्यूज में क्राइम रिपोर्टर हुआ करता था। उन्हीं दिनों प्रदीप दिल्ली में नये-नये आये हुए थे।

इसके पहले बनारस में जी न्यूज में हुआ करते थे, लेकिन दिल्ली आफिस ने एक अच्छा रिपोर्टर बनारस में पड़ा हुआ है, सोच कर दिल्ली बुला लिया। दिल्ली में पहली मुलाकात खबरों को लेकर हुई थोड़ी बहुत बात हुई… उसके बाद हम दोनों ने एक दूसरे को अपने-अपने नंबर दिए और फिर रोज बातें होने लगी। प्रदीप से उन दिनों रोजाना सुबह खबरों को लेकर बात हो जाया करती थी, लेकिन धीरे-धीरे खबरों की दोस्ती व्यक्तिगत हो गयी और घनिष्टता इसलिए भी बढ़ गयी कि मैं गोरखपुर से था और प्रदीप गाजीपुर से… और प्रदीप का वो देशी अंदाज हाथ में सिगरेट लिए हर बात में कहना बाबा टेंशन कांहे ले रहे अभी सब ठीक कर लिया जाएगा… प्रदीप खबरों को लेकर हमेशा से संजीदा रहा करते थे, लेकिन कभी न तो तनाव लेते थे और न ही किसी को तनाव में देख सकते थे… फिर तभी मैं सीएनईबी चैनल चला गया और मेरी बीट बदल गयी… क्राइम से पॉलिटिकल बीट कवर करने लगा। धीरे-धीरे मेरी और प्रदीप की मुलाकतें कम होने लगीं।

प्रदीप और मैं दोनों अलग-अलग बीट कवर करने लगे और इस दौरान व्यस्तता के कारण मेरी प्रदीप की मुलाकत और बात कम होती गयी, लेकिन जब कभी हम मिलते तो उसी जिंदादिली और जज्‍बे से… जब कभी मैं दिल्ली की जिंदगी और असफलताओं से परेशान हो जाया करता तो प्रदीप मुझे हमेशा हिम्मत दिलाते और कहते विपिन भाई जब हम लोग छोटे-छोटे शहरों से इतनी दूर आएं हैं तो हमें अभी और दूर जाना है.. प्रदीप की बातों से हिम्मत आती और फिर वही हंसी-ठिठोली शुरु हो जाती… देखिए बातों ही बातों में बताना भूल गया कि प्रदीप हमेशा फोन करके मुझसे मेरी नई नौकरी के लिए पार्टी की मांग करते और मैं बस अगले हफ्ते का वादा करता। इस दौरान 3 साल और बीत गए और मैंने न्यूज24 ज्वाइन कर लिया और मुझे लखनऊ भेज दिया गया।

ये सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि लखनऊ आने की बात प्रदीप को नहीं बता सका और लखनऊ आने के बाद प्रदीप भाई का फोन आया और नाराज होने लगा, लेकिन फिर जब सारी बात बताई तो प्रदीप ने अपनी खुशी जताई और दो-दो पार्टी पेंडिंग है बोल के फोन रख दिया। इसके बात कई बार प्रदीप से बात हुई और हर बार मैं दिल्ली आकर पार्टी देने का वादा करता और प्रदीप लखनऊ आकर पार्टी लेने का वादा… अक्सर बातों-बातों में प्रदीप भी दिल्ली छोड़ कर वापस बनारस जाने कि बात किया करते थे और मुझसे शिकायत की बाबा भाई को अकेले छोड़ कर चले गए. इसी दौरान प्रदीप की शादी हुई एक बेटी भी हुई और अचानक आज सुबह इस दुख भरी खबर ने बिल्‍कुल हिला कर रख दिया। मैंने अपना एक बेहतरीन साथी खो दिया… अब भी भरोसा नहीं हो रहा कि मुझसे नौकरी की पार्टी के लिए हमेशा झगड़ा करने वाला प्रदीप अब नहीं रहा… लेकिन प्रदीप मुझे हमेशा तुमसे एक शिकायत रहेगी कि मैंने दिल्ली छोड़ा, तुम तो हम लोगों को हमेशा के लिए इस दुनिया में अकेला छोड़ कर चले गए…. भगवान आपकी आत्मा को शांति दें और आपके परिवार को इस दुख भरी घड़ी, मुश्किल भरी घड़ी में लड़ने की हिम्मत दें.

विपिन चौबे

न्यूज24

लखनऊ

अशोक पांडेय बने नेटवर्क10 के एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर, दिसम्‍बर में लांच होगा चैनल

नेटवर्क10 को एक बार फिर पूरे जोश के साथ लांच करने की तैयारी की जा रही है. पिछले दिनों के अनुभवों से सबक लेते हुए मैनेजमेंट अब फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. इस बीच एक बड़ी खबर यह है कि हिंदुस्‍तान, झारखंड के वरिष्‍ठ संपादक रहे अशोक पांडेय को नेटवर्क10 प्रबंधन ने अपने साथ जोड़ लिया है. उन्‍हें एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर बनाया गया है.

संभावना है कि अशोक पांडेय एवं बसंत निगम के नेतृत्‍व में चैनल की लांचिंग होगी. प्रिंट मीडिया में अशोक पांडेय एक जाना पहचाना नाम है. टॉप के अखबारों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. पिछले सत्‍ताइस साल से पत्रकारिता में सक्रिय अशोक पांडेय ने करियर की शुरुआत 1984 में दैनिक जागरण के साथ की थी. 1986 में दैनिक आज से जुड़ गए. आगरा, कानपुर और लखनऊ में चीफ सब एडिटर रहे. 94 में फिर से दैनिक जागरण के साथ मेरठ और देहरादून में समाचार संपादक के रूप में जुड़े. 98 में इंडियन एक्‍सप्रेस साथ मुंबई चले गए.

सन 2000 में वापस दैनिक जागरण, देहरादून के साथ समाचार संपादक के रूप में जुड़ गए. 2004 में दैनिक भास्‍कर ज्‍वाइन कर लिया. अजमेर तथा हिसार के स्‍थानीय संपादक रहे. 2007 में अमर उजाला से जुड़ गए तथा लखनऊ में संपादक बने. 2009 में हिंदुस्‍तान से जुड़ गए तथा कानपुर और झारखंड में सीनियर एडिटर रहे. आतंरिक विवादों से क्षुब्‍ध होकर 2011 में इन्‍होंने हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा दे दिया था. एक छोटे से ब्रेक के बाद फिर से मुख्‍य धारा की मीडिया में सक्रिय हो गए हैं. इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के साथ यह इनकी पहली पारी है. मूल रूप से कानपुर के रहने वाले अशोक पांडेय छात्रसंघ अध्‍यक्ष भी रह चुके हैं. कई किताबों का लेखन व संपादन भी किया है.

इधर, नेटवर्क10 प्रबंधन चैनल लांचिंग की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर चुका है. प्रबंधन फिलहाल उत्‍तराखंड तथा वेस्‍ट यू‍पी को ध्‍यान में रखकर इस चैनल को लांच करने जा रहा है. सूत्रों का कहना है कि 15 नवम्‍बर से इस चैनल को टेस्‍ट सिगनल पर डाल दिया जाएगा. एक दिसम्‍बर को उत्‍तराखंड बेस्‍ट चैनल की लांचिंग होगी. 31 दिसम्‍बर को यूपी चैनल भी लांच कर दिया जाएगा. प्रबंधन का कहना है कि वेस्‍ट यूपी तो ये अपने अंडर रखेंगे परन्‍तु ईस्‍ट यूपी के लिए नेटवर्क पार्टनर की तलाश की जाएगी. आने वाले छह से आठ महीनों में प्रबंधन की एमपी-सीजी, बिहार-झारखंड चैनल लांच करने की भी योजना है. फिलहाल प्राथमिकता उत्‍तराखंड चैनल को लांच करने की है. पिछले दौर में झटका खा चुका प्रबंधन अब कोई गलती दोहराना नहीं चाहता है. इस चैनल की ब्रांडिंग एनडीटीवी वर्ल्‍डवाइड कर रहा है.

साधना में कर्मचारियों को मिला इंक्रीमेंट, यूपी चैनल भी नवम्‍बर महीने में लांच करने की तैयारी

दीवाली के पहले कई रीजनल चैनलों के कर्मचारियों में दहशत का माहौल है तो साधना न्‍यूज में इस बार दीवाली खुशियां लेकर आई है. मैनेजमेंट अपने सभी कर्मचारियों को दस से लेकर पन्‍द्रह प्रतिशत तक का इंक्रीमेंट देने जा रहा है. उम्‍मीद है कि इस महीने के अंत इस निर्णय पर फाइनल मुहर लगाकर कर्मचारियों को इंक्रीमेंट की चिट्ठी बांट दी जाएगी. यूपी-उत्‍तराखंड न्‍यूज चैनल के लांचिंग की तैयारियां भी अंतिम दौर में है. इस चैनल को भी नवम्‍बर माह में लांच करने की योजना है.

पहले खबर इंक्रीमेंट की. साधना प्रबंधन ने अपने लगभग 400 कर्मचारियों को इंक्रीमेंट का तोहफा देने जा रहा है. सभी को दस से पंद्रह प्रतिशत के बीच इंक्रीमेंट दिया जाएगा. इसका निर्धारण परफारमेंस के आधार पर किया गया है. इस खबर के बाद से साधना के कर्मचारियों में खुशी है. उनकी दीवाली और भी अधिक रंगीन हो गई है. इसके साथ ही साधना प्रबंधन चैनल का स्ट्रिंगरशिप माडल भी चेंज करने जा रहा है. अब तक अन्‍य चैनलों की तरह खबर की संख्‍या के आधार पेमेंट दिए जाने की परिपाटी चल रही थी. अब इस को बदलकर तय संख्‍या में खबर और तय माहवारी माडल किया जा रहा है, जिसके तहत प्रबंधन महीने में स्‍टोरी भेजे जाने का एक न्‍यूनतम संख्‍या तय कर देगा और इसके लिए उन्‍हें तय धनराशि प्रदान की जाएगी. ऐसा खबर भेजने के बाद भी पैसा न मिलने की गलत-सही शिकायतों के चलते किया जा रहा है.

दूसरी तरफ साधना जल्‍द ही यूपी-उत्‍तराखंड बेस्‍ड अपना रीजनल चैनल भी लांच करने जा रहा है. खबर है कि एडिटर इन चीफ एनके सिंह के दिशा निर्देशन तथा नेतृत्‍व में यह चैनल अगले महीने ही लांच किया जाने वाला है. इस प्रोजेक्‍ट पर काफी समय से तैयारियां चल रही थीं. लखनऊ कार्यालय में काम शुरू हो गया है. जल्‍द ही प्रदेश के सभी जिलों में स्ट्रिंगरों की नियुक्ति भी पूरी कर ली जाएगी. बताया जा रहा है कि चैनल का प्रसारण नोएडा कार्यालय से किया जाएगा, परन्‍तु कंट्रोल स्‍टेट ब्‍यूरो के हाथ में होगा. चैनल को जल्‍द से जल्‍द लांच करने के लिए ही अग्निमा दुबे को लखनऊ भेजा गया है.

परख इंडिया से जुड़े बृजभूषण, अमर भारती से नीरज और केएम का इस्‍तीफा

आगरा से खबर है कि पिछले दिनों लांच हुए साप्‍ताहिक अखबार से परख इंडिया के साथ बृजभूषण ने अपनी नई पारी शुरू की है. इन्‍हें आगरा-अलीगढ़ मंडल का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. पिछले 13 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय बृजभूषण ने करियर की शुरुआत ईटीवी से की थी. इसके बाद सहारा समय, सीवीबी, न्‍यूज वन इंडिया चैनल समेत कई अखबारों को भी अपनी सेवाएं दी हैं.

अमर भारती, आगरा से खबर है कि यहां से नीरज सिंह और केएम सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. ये लोग अखबार की लांचिंग के समय जुड़े थे. बताया जा रहा है कि नीरज अपनी नई पारी हिंदुस्‍तान एक्‍सप्रेस के साथ शुरू करने जा रहे हैं. ये काफी समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. इधर केएम सिंह के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी है कि वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने वाले हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने अनिरुद्ध बहल और सुहासिनी राज के खिलाफ दिल्‍ली सरकार की याचिका खारिज की

: आपराधिक मामला शुरू करने के लिए मांगी गई थी अनुमति : सुप्रीम कोर्ट ने संसद में सवाल पूछने के लिए रुपये लेते 11 सांसदों को कैमरे में कैद करने वाले पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मामला शुरू करने की अनमुति संबंधी याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति रंजन प्रकाश देसाई की खंडपीठ ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने गत वर्ष 24 सितंबर को अपने आदेश में स्टिंग ऑपरेशन करने वाले कोबरा पोस्ट के पत्रकारों अनिरुद्ध बहल और सुहासिनी राज के खिलाफ आपराधिक मुकदमा शुरू करने की राज्य सरकार को इजाजत देने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि दोनों पत्रकारों ने भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए स्टिंग ऑपरेशन किया था, जो किसी भी तरीके से अनुचित नहीं था। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

राज्य सरकार की दलील थी कि पैसे देकर सवाल पूछने के लिए सांसदों को प्रेरित करके दोनों पत्रकारों ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की सभी दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को जायज ठहराया और राज्य सरकार की याचिका निरस्त कर दी। उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2005 में दोनों पत्रकारों ने संसद में सवाल पूछने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के 11 सांसदों को पैसे लेते हुए कैमरे में कैद किया था, जिसके बाद राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया था। साभार : एजेंसी

आर्थिक दिक्‍कतों से जूझ रहा है विकीलीक्‍स : असांज

पेरू : विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज ने उन रिपोर्टों को बकवास करार दिया है, जिनमें कहा गया था कि उनके संगठन के कार्यकर्ता विकीलीक्स को छोड़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि ‘ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट’ अभियान को प्रेरित करने में उनके संगठन की अहम भूमिका रही है। पेरू में आयोजित अंतर अमेरिकी प्रेस संघ की बैठक को संबोधित करते हुये असांज ने कहा कि विकीलीक्स की इस समय सबसे बड़ी दिक्कत क्रेडिट कार्ड कंपनियों द्वारा इसको चलाने के लिए आर्थिक योगदान का खत्म हो जाना है।

उन्होंने बताया कि उनके संगठन ने अपने स्टाफ में कोई कटौती नहीं की है। साथ ही असांज का कहना था कि विकीलीक्स पिछले 11 महीनों से अपनी जमा पूंजी पर निर्भर रह कर संचालन कर रहा है। असांज के अनुसार विकीलीक्स को छोड़कर जाने वाला एकमात्र प्रवक्ता था जो जर्मनी का था। हांलाकि उन्होंने उसका नाम नहीं बताया। असांज का कहना था कि इन दिनों फैल रहा ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट आंदोलन, जिसमें वैश्विक आर्थिक संकट के लिए पूंजीवादियों के लालच को दोषी माना जा रहा है, उसके पीछे कुछ हद तक विकीलीक्स के आंदोलनकारियों की ही प्रेरणा है। साभार : एनबीटी

अमर उजाला को जरूरत है युवा पत्रकारों की

अगर घटनाओं पर पकड़ हो, सामान्‍य ज्ञान बढि़या हो, हिंदी-अंग्रेजी पर पकड़ अच्‍छी हो, न्‍यूज सेंस ठीक-ठाक हो…. तो आपके लिए अमर उजाला के साथ करियर बनाने का बेहतरीन मौका है. चयन होने के बाद आपको न सिर्फ पत्रकारिता की व्‍यवहारिक ट्रेनिंग दी जाएगी बल्कि एक साल तक प्रशिक्षण स्‍टाइपेंट भी मिलेगा. साल भर में कई सत्रों में पत्रकारिता के गुण सिखाए जाएंगे.

एक साल की ठोंक पीट का बाद जो पत्रकार सही आकार ले लेंगे, उन्‍हें अमर उजाला से पूर्णकालिक पत्रकार में जुड़ने का पुरस्‍कार भी मिलेगा. अगर आप भी पत्रकार बनने का दमखम रखते हैं तथा आपकी उम्र अधिकतम 23 साल है तो 300 शब्‍दों में एक निबंध लिखकर 30 अक्‍टूबर तक अमर उजाला को भेज दें. अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए हेडिंग पर क्लिक करें.

ताकत कलम की… जोश सच का

सोमवार को नहीं छपा जनवाणी का डाक एडिशन

सोमवार को मेरठ यूनिट से जुड़े कई जिलों के लोगों को जनवाणी पढ़ने को नहीं मिला. सारे अखबार मौजूद थे पर जनवाणी बाजार से गायब. खबर एक सवाल कई. सबने अपने अपने तरीके से अखबार न मिलने को लेकर सवाल उठाए. किसी ने हॉकर से पूछा बंद हो गया क्‍या अखबार, किसी ने हड़ताल के बारे में पूछा, किसी ने हॉकरों की हड़ताल के बारे में पूछा, किसी ने और कोई कारण पूछा, अखबार ना आने को लेकर काफी हो हल्‍ला रहा.

हॉकरों ने सीधा जवाब दिया कि अखबार ही नहीं आया. अखबार छप नहीं पाया. ऐसे ही जवाब देते हॉकरों ने कल का सुबह गुजारा. हम भी जनवाणी के डाक एडिशनों के लोगों तक नहीं पहुंच पाने के कारणों की तह में गए. पता चला कि प्रिंटिंग मशीन में तकनीकी खराबी के चलते डाक एडिशन छप ही नहीं पाए. किसी तरह आनन-फानन में मशीन को चालू किया गया, तब जाकर सिटी और अपकंट्री एडिशन का प्रकाशन हो सका. हालांकि इस दौरान यूनिट में काफी अफरातफरी मची रही. अखबार के तमाम वरिष्‍ठ लोग मौके पर जमे रहे. मंगलवार को सभी एडिशन अपने समय से प्रकाशित हुए.

इस संदर्भ में जब अखबार के संपादक यशपाल सिंह से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि डाक एडिशन को छोड़कर बाकी सभी एडिशन प्रकाशित हुआ था. पैनल में खराबी के चलते डाक एडिशन नहीं छप पाया, जिसे जल्‍द सुधार लिया गया तथा इससे 62 हजार सिटी एवं अपकंट्री एडिशन की प्रतियां प्रकाशित की गईं. उन्‍होंने कहा कि मशीन हैं, खराब हो जाती हैं. इन स्थितियों से तमाम अखबार और यूनिट अक्‍सर जूझते रहते हैं.

साधना प्रबंधन ने अग्निमा दुबे को लखनऊ भेजा, इन्‍न के हेड बने दिलीप गुप्‍ता

साधना न्‍यूज से खबर है कि एक्‍जीक्‍यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में ज्‍वाइन करने वाली अग्निमा दुबे को लखनऊ भेज दिया गया है. अग्निमा डेढ़ दशक से ज्‍यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. वे लगभग 16 सालों तक दैनिक भास्‍कर से जुड़ी रही हैं. माना जा रहा है यह निर्णय यूपी में आगामी विधान सभा चुनाव को देखते हुए लिया गया है. अग्निमा यूपी हेड पंकज वर्मा को रिपोर्ट करेंगी.

आगरा से लांच होने जा रहे हिंदुजा ग्रुप के केबल टीवी इन्‍न का हेड दिलीप गुप्‍ता को बनाया गया है. इन्‍न टीवी दिलीप के नेतृत्‍व में ही लांच होगा. दिलीप इसके पहले भी कई स्‍थानीय नेटवर्क में काम कर चुके हैं.

न्‍यूज चैनलों पर ‘सेंसरशिप’ की तैयारी मे जुट रहे हैं नौकरशाह

: कुछ भी दिखाने वाले न्यूज चैनलों के संपादक भी जब एनबीए और बीईए में पद पाए हैं तो आत्‍ममंथन कैसे : सरकार की नई गाइडलाइंस में इमरजेंसी की महक : यूपी चुनाव से पहले गाइडलाइन तैयार करने की जल्‍दी : न्यूज चैनलों पर नकेल कसने के लिये सरकार ने अपनी पहल तेज कर दी है।

इंडियन इनफॉरमेशन सर्विस यानी आईआईएस के उन बाबुओं को दुबारा याद किया जा रहा है, जिन्हें न्यूज चैनलों की मॉनिटरिंग का अनुभव है। 1995 से 2002 तक सरकारी गाइडलाइंस के आधार पर सूचना प्रसारण के नौकरशाह पहले दूरदर्शन और मेट्रो चैनल पर आने वाले समसामायिक कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग करते रहे। इस दौर में न्यूज और करेंट अफेयर के तमाम कार्यक्रमों की स्क्रिप्ट पहले सरकारी बाबुओं के पास आती थीं। उसके बाद पूरा कार्यक्रम बाबुओं की टीम देखती। जो तस्वीरें हटवानी होती, जो कमेंट हटाने होते, उसे हटवाया जाता।

उसके बाद निजी चैनलों का दौर आया तो शुरुआत में मॉनिटरिंग स्क्रिप्ट को लेकर ही रही। लेकिन इसके लिये पहले से स्क्रिप्ट मंगवाने की जगह महीने भर देखने के बाद चैनलों को नोटिस भेजने का सिलसिला जारी रहा। लेकिन एनडीए सरकार के दौर में सूचना प्रसारण मंत्री प्रमोद महाजन ने न्यूज चैनलों की मॉनिटरिंग यह कह कर बंद करायी कि जो कन्टेंट टीवीटुडे के अरुण पुरी या एनडीटीवी के प्रणव राय तय करते हैं, उनसे ज्यादा खबरों की समझ नौकरशाहों में कैसे हो सकती है। उस वक्त न्यूज चैनलों की मॉनिटरिंग करने वाले नौकरशाहों ने सरकारी गाइडलाइन्स का सवाल उठाया। तब प्रमोद महाजन ने सरकारी गाइडलाइन्स किसने बनायी और उसका औचित्य क्या है, इन्हीं मामलो में नौकरशाहों को उलझाया और धीरे-धीरे मॉनिटरिंग खानापूर्ति में तब्दील हो गई।

लेकिन अब सरकार ने दो स्तर पर काम शुरु किया है, जिसमें पहले स्तर पर उन नौकरशाहों को याद किया जा रहा है जो न्यूज चैनलों की मॉनिटरिंग के माहिर माने जाते हैं और फिलहाल रिटायर जीवन बीता रहे हैं। और दूसरे स्तर पर वर्तमान नौकरशाहों के जरिये ही मॉनिटरिंग की नयी गाइडलाइन्स बनाने की प्रक्रिया शुरु की गई है। चूंकि 7 अक्टूबर को कैबिनेट ने अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग गाइडलाइन्स, 2005 को मंजूरी देते हुये न्यूज चैनलों की संहिता के भी सवाल उठाये और यह भी कहा गया कि कोई टेलीविजन चैनल कार्यक्रम और विज्ञापन संहिता के पांच उल्लंघनों का दोषी पाया गया तो सूचना प्रसारण मंत्रालय के पास उसका लाइसेंस रद्द करने का अधिकार होगा। लेकिन वे उल्लंघन होंगे क्या? या फिर उल्लंघन के दायरे में क्या लाना चाहिये, इस पर चिंतन-मनन की प्रक्रिया शुरु हो गई है। और जो निकल कर आ रहा है, अगर वह लागू हो गया तो टीआरपी की दौड़ में लगे उन न्यूज चैनलों का लाइसेंस तो निश्चित ही रद्द हो दायेगा, जो खबरों के नाम पर कुछ भी दिखाने से परहेज नहीं करते।

नयी गाइडलाइन्स के तहत नौकरशाह का मानना है कि नंबर एक की दौड़ में न्यूज चैनल अव्वल नंबर पर बने रहने या पहुंचने के लिये खबरों से खिलवाड़ की जगह बिना खबर या दकियानूस उत्साह को दिखाने लगते हैं। मसलन, कैसे कोई नागमणि देश का भविष्य बदल सकती है। कैसे अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम भारत को बरबाद कर सकता है। कैसे कंकाल रोबोट का काम कर सकता है। वहीं दूरदर्शन में रहे कुछ पुराने नौकरशाहों का मानना है कि जिस तरह कॉलेज से निकली नयी पीढ़ी रिपोर्टिंग और एंकरिंग कर रही है, और वह किसी भी विषय पर जिस तरह कुछ भी बोलती है उस पर लगाम कैसे लगेगी। क्योंकि मीडिया अगर यह सवाल करेगा कि जो न्यूज चैनल बचकाना होगा, उसे खुद ही लोग नहीं देखेंगे। यानी न्यूज चैनलों की साख तो खबरों को दिखाने-बताने से खुद ही तय होगी। लेकिन मुंबई हमले के दौरान जिस तरह की भूमिका बिना साख वाले चैनलों ने निभायी और उसे देखकर पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी संगठनों ने अपनी रणनीति बनायी, उसे आगे कैसे खुला छोड़ा जा सकता है।

खास बात यह भी है कि नौकरशाह नयी गाइडलाइन्स बनाते वक्त न्यूज ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन और ब्रॉडकास्ट एडिटर्स को लेकर भी सवाल खड़ा कर रहे हैं। सूचना मंत्रालय के पुराने खांटी नौकरशाहों का मानना है कि बिना साख वाले न्यूज चैनल या खबरों से इतर कुछ भी दिखाने वाले न्यूज चैनलों के संपादक भी जब न्यूज ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन और ब्रॉडकास्ट एडिटर्स से जुड़े हैं और बाकायदा पद पाये हुये हैं तो फिर इनका कितना भी आत्ममंथन कैसे न्यूज चैनलों को खबरों में बांध सकता है। और फिर जो न्यूज चैनल बिना खबर के खबर दिखाने का लाइसेंस लेकर धंधे कर मुनाफा बनाते है तो उन्हें मीडिया का हिस्सा भी कैसे माना जाये और उन पर नकेल कसने का मतलब सेंसर कैसे हो सकता है। लेकिन खास बात यह भी है कि सरकार के भीतर नौकरशाहों के सवालों से इतर अन्ना हजारे आंदोलन के दौरान मीडिया कवरेज ने परेशानी पैदा की है और नयी आचार संहिता की दिशा कैसे खबर दिखाने वाले न्यूज चैनलों को पकड़ में लाये, इस पर भी चितंन हो रहा है। और पहली बार सरकार की नयी गाइडलाइन्स में इमरजेन्सी की महक इसलिये आ रही है क्योंकि न्यूज चैनलों के जरिये सरकार को अस्थिर किया जा रहा है, यह शब्द जोड़े गये हैं।

गाइडलाइन्स में सरकार को अस्थिर करने को सही ठहराने के लिये खबरों के विश्लेषण और सरकार के कामकाज को गलत ठहराने पर जोर दिया जा रहा है। मसलन चुनी हुई सरकार की नीतियों को जनविरोधी कैसे कहा जा सकता है। सड़क के आंदोलन को संसदीय राजनीति का विकल्प बताने को अराजक क्यों नहीं माना जा सकता। तैयारी इस बात को लेकर है कि गाइडलाइन्स की कॉपी यूपी चुनाव से पहले तैयार कर ली जाये, जिससे पहला परीक्षण भी यूपी चुनाव में ही हो जाये। और गाइडलान्स की कॉपी हर चैनल को भेज कर लाइसेंस रद्द करने की तलवार लटका दी जाये क्योंकि गाइडलाइन्स को परिभाषित तो नौकरशाहों की टीम करेगी जो यह समझ चुकी है कि न्यूज चैनलों के भीतर के अंतर्विरोध में सेंध लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है क्योंकि न्यूज चैनलों में चंद चेहरों की ही साख है, जिसे आम आदमी सुनता-देखता है। बाकी तो हंसी-ठहाका के प्रतीक हैं।

लेखक पुण्‍य प्रसून वाजपेयी वरिष्‍ठ पत्रकार तथा जी न्‍यूज के संपादक हैं. यह लेख उनके ब्‍लॉग पुण्‍य प्रसून वाजपेयी से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

राजस्‍थान मीडिया एक्‍शन फोरम की प्रदेश कार्यकारिणी घोषित

: उपजा, मोदीनगर के अध्‍यक्ष बने मनोज नेहरा : राजस्थान मीडिया एक्‍शन फोरम की प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा अध्यक्ष ने सलाहाकार मंडल की सलाह से कर दी है। प्रदेश कार्यकारिणी में राजस्थान के सभी सात सभांगों से पत्रकारों को सम्मिलित किया गया है। राजस्थान मीडिया एक्‍शन फोरम की प्रदेश महासचिव शकुन्तला सरूपरिया ने बताया कि फोरम के अध्यक्ष अनिल सक्सेना ने सलाहाकार वरिष्ठ पत्रकार किशोर मालवीय, दिल्ली व वीर सक्सेना, जयपुर के निर्देश पर कार्यकारिणी की घोषणा की गई है।

कार्यकारिणी के उपाध्यक्ष पद पर जयपुर संभाग से महिपाल सिंह सीकर, जोधपुर से विक्रम राजपुरोहित, अरूण हर्ष, अजमेर संभाग से ओम कसारा भीलवाडा से कोषाध्यक्ष पद पर शरद मेहता, चित्तौडगढ़ से संगठन महामंत्री हरिओम गर्ग, बीकानेर से ज्योति पाठक कोटा को मनोनित किया है। इसी तरह राजस्थान मीडिया एक्‍शन फोरम के सचिव पद पर भरतपुर से योगेन्द्र शर्मा, टोंक के अशोक सक्सेना और नसीराबाद, अजमेर से अतुल सेठी को सम्मिलित किया है। सरूपरिया ने बताया कि कार्यकारिणी सदस्य के रूप में जयसिंह भाटी, विनोद जोशी, अनुपम परदेसी, नितिन द्विवेदी, मनोज सोनी को लिया गया है। उन्होंने बताया कि शीघ्र ही राजस्थान के प्रत्येक जिले के जिला अघ्यक्षों की घोषणा की जाएगी और साथ ही प्रदेश कार्यकारिणी का भी विस्तार किया जाएगा।

दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन की शाखा मोदीनगर में रविवार को हुए चुनाव में राष्ट्रीय सहारा के संवाददाता मनोज नेहरा को तहसील मोदीनगर क्षेत्र का अध्यक्ष चुना गया। चुनाव के दौरान 25 में से 20 पत्रकारों ने मतदान में शिरकत की। जिसमें 17 मत मनोज नेहरा को मिले। चुनाव में चार उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन चुनाव की पूर्व संध्या पर दो उम्मीदवारों ने नाम वापस ले लिए और आखिरी समय में दो उम्मदीवारों में से एक उम्मदीवार राकेश शर्मा ने भी मनोज नेहरा को समर्थन दे दिया। चुनाव में राकेश शर्मा को दो मत मिले, जबकि एक मत ब्लैंक निकला।

सहारा समय, बनारस के पूर्व ब्यूरो चीफ राजेश गुप्ता हैं ‘फुल वाल्यूम’ चैनल के मालिक

वाराणसी से लांच हुए न्‍यूज चैनल ‘फुल वाल्‍यूम’ के साथ कई लोगों ने नई पारी शुरू की है. सहारा समय, बनारस के पूर्व ब्‍यूरोचीफ राजेश गुप्‍ता के इस चैनल का मैनेजिंग डायरेक्‍टर साध्‍वी खन्‍ना को बनाया गया है. सहारा समय से अपने करियर की शुरुआत करने वाली साध्‍वी खन्‍ना के पास डाक्‍यूमेंट्री फिल्‍म क्षेत्र में भी काम करने का अनुभव है. इनकी साइंटिफिक रिसर्च ऑन गंगा को गंगा बेसिन अथारिटी की ओर से सर्वश्रेष्‍ठ डाक्‍युमेंट्री का अवार्ड मिल चुका है.

इस चैनल का प्रोग्राम एक्‍जीक्‍यूटिव संजीव भारद्वाज को बनाया गया है. लखनऊ दूरदर्शन से बतौर फ्रीलांस डायरेक्‍टर के रूप में पत्रकारिता में कदम रखने वाले संजीव कई म्‍यूजिक एलबमों को भी डायरेक्‍ट किया है. गंगा समेत कई मुद्दों पर ज्‍वलंत  डाक्‍यूमेंट्री भी बनाई है. इस चैनल में बतौर प्रोडक्‍शन कंट्रोलर तरूण कुमार दीक्षित ने ज्‍वाइन किया है, जो पूर्वांचल के कई नेताओं के आफिसियल फोटोग्राफर रह चुके हैं. इन्‍हें डाक्‍यूमेंट्री और डाक्‍यूड्रामा बनाने का एक्‍सपर्ट माना जाता है. महुआ न्‍यूज में काम करने वाले अमित कुमार ने वहां से इस्‍तीफा देकर फुल वाल्‍यूम में एंकर कम कॉपी राइटर बनाए गए हैं. महुआ धाम और जाग मुसाफिर जैसे कार्यक्रम बनाने के अलावा ये भोजपुरी कांफ्रेंस की स्‍पेशल कवरेज के लिए मारीशस भी जा चुके हैं.

फुल वाल्‍यूम में क्रियेटिव डायरेक्‍टर के रूप में मनीष शर्मा ने ज्‍वाइन किया है. इन्‍हें यशराज बैनर और शाहरुख-जूही के रेड चिली प्रोडक्‍शन हाउस में बतौर एडिटर काम करने का अनुभव है. रब ने बना दी जोड़ी, बिल्‍लू बार्बर, फिर और रेड अलर्ट जैसी बड़ी फिल्‍मों के पोस्‍ट प्रोडक्‍शन टीम में शामिल रहे हैं. यहां सूर्या ने एडिटर के रूप में ज्‍वाइन किया है. एल्‍बम मेकिंग एवं डाक्‍यूमेंट्री एडिटिंग में इनके पास लम्‍बा अनुभव है. प्रोग्राम प्रोड्यूसर के रूप में भारती सिंह ने ज्‍वाइन किया है. जामिया मिलिया से पत्रकारिता करने वाले भारती इंडिया न्‍यूज के क्राइम डेस्‍क पर असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर के रूप में काम कर चुकी हैं. रेड एफएम में रेडियो जाकी और कॉपी राइटर भी रह चुकी हैं. महुआ में असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर रहीं हिमानी अमित पाण्‍डेय ने भी फुल वाल्‍यूम ज्‍वाइन किया है. एस टीवी के साथ बतौर एंकर पत्रकारिता शुरू करने वाली प्रिया गुप्‍ता ने यहां भी एंकर के रूप में ज्‍वाइन किया है. ये लक्‍मे समेत कई ब्रांडों के लिए माडलिंग भी कर चुकी हैं. विजय वेद भी इस नए लांच हुए चैनल के हिस्‍सा बने हैं.

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हिंदुस्‍तान : रायबरेली के पत्रकार हड़ताल पर, सर्वेश को औरैया भेजा गया

हिंदुस्‍तान के वरिष्‍ठ लोग अपने यूनिटों में एक रोग का इलाज कर रहे हैं, तभी दूसरा रोग निकलकर सामने आ जा रहा है. कानपुर यूनिट को लेकर परेशान आला हाकिम इस यूनिट से जुड़े जिलों के दौरों पर हैं. हिंदुस्‍तान के कार्यकारी संपादक नवीन जोशी भी कानपुर में चार दिनों से कैंप करके समाचार संपादक अंशुमान तिवारी की जमकर क्‍लास ले रहे हैं, पर उनके लखनऊ यूनिट से जुड़े रायबरेली जिले में ही बवाल खड़ा हो गया है.

रायबरेली जिले में तो कांग्रेस का रागदरबारी गा रहे सभी अखबारों के पत्रकारों का हाल तो लोग जानते ही हैं, पर हिंदुस्‍तान का हाल इससे भी ज्‍यादा बुरा हो गया है. ब्‍यूरोचीफ अखिलेश ठाकुर के रवैये से नाराज उनके सहकर्मियों ने तीन दिन की सामूहिक अवकाश ले लिया है. उन्‍होंने स्‍थानीय संपादक नवीन जोशी से शिकायत करके ब्‍यूरोचीफ अखिलेश ठाकुर द्वारा किए जा रहे उत्‍पीड़न के जांच की मांग की है. कर्मचारियों ने  ब्‍यूरोचीफ पर कई प्रकार के आरोप लगाकर प्रधान संपादक शशि शेखर को भी ई-मेल भेजा है. इन लोगों ने चेतावनी दी है कि अगर तत्‍काल जांच कराकर अखिलेश ठाकुर को वापस नहीं बुलाया गया तो वो लोग सामूहिक रूप से इस्‍तीफा दे देंगे. अवकाश पर जाने वालों में आलोक मिश्रा, मनोज ओझा, सतीश मिश्रा, मनोज मिश्रा, ऑपरेटर विमल मौर्य व मनीष कुमार तथा आफिस ब्‍वॉय बबलू बताए गए हैं.

इस सामूहिक अवकाश से लखनऊ यूनिट में हड़कम्‍प है. रायबरेली में अखिलेश ठाकुर किसी तरह इधर-उधर से लड़के बुलाकर काम चला रहे हैं.  एक तरफ दिल्‍ली के दो आला हाकिमों का यूपी दौरा उस पर इस तरह की परेशानी, लखनऊ वाले वरिष्‍ठ परेशान हैं. मामले को सलटाने तथा डैमेज कंट्रोल करने के प्रयास किए जा रहे हैं. इस संदर्भ में जब अखिलेश ठाकुर से बात की गई तो उन्‍होंने इस तरह की किसी बात से इनकार करते हुए कहा कि सभी लोग काम कर रहे हैं. हमने आलोक मिश्रा को हटा दिया है. सामूहिक अवकाश जैसी कोई बात नहीं है.

इधर, इटावा का दौरा करने वाले एचएमवीएल के सीईओ अमित चोपड़ा तथा प्रधान संपादक शशि शेखर इटावा के संपादकीय कर्मच‍ारियों से खुश नहीं दिखे. कमजोर टीम बताकर मजबूत करने की सलाह दे डाली. हिंदुस्‍तान के टैग लाइन ‘नया नजरिया तरक्‍की का’ मतलब पूछे जाने पर कोई पत्रकार नहीं बता सका. औरैया से भी पिछले दिनों कई लोगों के दूसरे अखबारों में चले जाने के बाद डैमेज कंट्रोल करने के लिए अनिल शुक्‍ला को ब्‍यूरोचीफ बनाकर भेजा गया था. बीस सालों से हिंदुस्‍तान की सेवा करने वाले आनंद कुशवाहा को सेकेंड मैन बना दिया गया था. आनंद बीमारी के चलते आजकल आफिस नहीं आ रहे हैं, हालांकि इसके और दूसरे निहितार्थ भी निकाले जा रहे हैं. पर दोनों वरिष्‍ठों के दौरों को देखते हुए रविवार को सर्वेश मिश्रा को यहां का नया ब्‍यूरोचीफ बनाकर मामला संभालने को भ्‍ोजा गया है. अनिल शुक्‍ला सेकेंड मैन बना दिए गए हैं. अब देखना है कि ये लोग हिंदुस्‍तान का कितना भला कर पाते हैं.

अमर उजाला की इस गलती के लिए जिम्‍मेदार कौन है?

यशवन्त जी, मैं आपका ध्यान पत्रकारिता की दुहाई देने वाले हिन्दी के महान अखबार अमर उजाला, आगरा के द्वारा 15 अक्टूबर को प्रकाशित प्रथम (मुख्य पेज) की खबर हेडिंग ‘प्रदेश के दो और मंत्रियों की लोक आयुक्त से शिकायत’ की ओर दिलना चाहूंगा, जिसमें जिक्र तो सिंचाई मंत्री लक्ष्मी नरायण यादव और सिंचाई यांत्रिक राज्य मंत्री जयवीर सिंह के बारे में है।

परन्‍तु अमर उजाला के मूर्धन्य पत्रकारों ने चित्र मंत्री ग्रामीण अभियन्त्रण सेवा व एग्रीकल्चर विदेश व्यापार के जयवीर सिंह का छाप दिया है। छपे चित्र वाले मंत्री कैबिनेट प्रभार के अलीगढ़ निवासी जयवीर सिंह हैं। जब कि ब्यौरा, जो कि लोकायुक्त से शिकायत के बारे में है, सिरसागंज जनपद फिरोजाबाद में रह रहे राज्य मंत्री जयवीर सिंह के बारे में है। आखिर अमर उजाला की इस महान गलती की जिम्मेदारी कौन लेगा। क्या हजारों रुपये प्रतिमाह लेने वाले अमर उजाला के पत्रकारों का सामान्य ज्ञान इतना कमजोर हो गया है?

पतंजलि दुबे

पत्रकार

फिरोजाबाद

क्या किसी लड़की के साथ इससे भी ज्यादा बुरा हो सकता है!

मीडिया से सीधे तौर पर जुड़ने के बाद रेप, मर्डर, चोरी, धोखाधड़ी की खबरें बहुत ज्यादा चौंकाती नहीं हैं। कन्ट्रोल रूम में बैठकर हर रोज ऐसी ही बातें सुनने, लिखने और बांचने लगी हूं। कभी 70 साल की वृद्धा के साथ बलात्कार.. फिर लूट तो कभी 2 साल की मासूम के साथ रेप के बाद कत्ल। कभी कुछ तो कभी कुछ… पहले अफेयर वर्ड सुनकर भी कान खड़े हो जाते थे पर अब तेजाब फेंकने की घटना भी कॉमन लगने लगी है…

इसका मतलब ये नहीं कि भावनाशून्य हो गई हूं… बस ये कि कानों को अब ये सबकुछ नया नहीं लगता। लेकिन कल जो कुछ पढ़ा… उससे दिल दहल गया। सदमा भी कहूं तो सच ही होगा क्योंकि पूरे दिन उसी के बारे में सोचती रही… कुछ फंसा सा हो जैसे….। इससे पहले ऐसा प्रेमचन्द की कहानियां पढ़कर ही होता था कि शब्द चित्र बनकर तैरने लगते थे लेकिन इस लड़की की कहानी पढ़कर भी वैसा ही हुआ।

16-17 साल की एक लड़की की कहानी है… सिर्फ कहानी नहीं दर्द और हैवानियत बयान करने वाली कहानी है। एक लड़की..44 दिन… और सोच से परे की यातना….। हिन्दू धर्म में स्वर्ग और नरक की मान्यता है कि स्वर्ग सुख का तो नरक दुख और तकलीफों का घर माना जाता है.. जहां प्रताणित किया जाता है… शायद ये सब कुछ काल्पनिक हो लेकिन नरक की कल्पना इस कहानी से सच लगने लगती है….

Junko Furuta. The girl who went through 44 days of torture.

DAY 1: November 22, 1988: Kidnapped Kept captive in house, and posed as one of boy’s girlfriend. Raped (over 400 times in total). Forced to call her parents and tell them she had run away Starved and malnutritioned. Fed cockroaches to eat and urine to drink. Forced to masturbate. Forced to strip in front of others. Burned with cigarette lighters. Foreign objects inserted into her vagina/anus.

DAY 11: December 1, 1988: Severely beat up countless times. Face held against concrete ground and jumped on. Hands tied to ceiling and body used as a punching bag. Nose filled with so much blood that she can only breath through her mouth. Dumbbells dropped onto her stomach. Vomited when tried to drink water (her stomach couldn’t accept it). Tried to escape and punished by cigarette burning on arms. Flammable liquid poured on her feet and legs, then lit on fire. Bottle inserted into her anus, causing injury.

DAY 20: December10, 1989: Unable to walk properly due to severe leg burns. Beat with bamboo sticks. Fireworks inserted into anus and lit. Hands smashed by weights and fingernails cracked. Beaten with golf club. Cigarettes inserted into vagina. Beaten with iron rods repeatedly. Winter; forced outside to sleep in balcony. Skewers of grilled chicken inserted into her vagina and anus, causing bleeding.

DAY 30: Hot wax dripped onto face. Eyelids burned by cigarette lighter. Stabbed with sewing needles in chest area. Left nipple cut and destroyed with pliers. Hot light bulb inserted into her vagina. Heavy bleeding from vagina due to scissors insertion. Unable to urinate properly. Injuries were so severe that it took over an hour for her to crawl downstairs and use the bathroom. Eardrums severely damaged. Extreme reduced brain size.

DAY 40: Begged her torturers to “kill her and get it over with”

संबंधित घटनाक्रम की गवाही देतीं कुछ तस्वीरें

January 1, 1989: Junko greets the New Years Day alone. Body mutilated. Unable to move from the ground.

DAY 44: January 4, 1989: The four boys beat her mutilated body with an iron barbell, using a loss at the game of Mah-jongg as a pretext. She is profusely bleeding from her mouth and nose. They put a candle’s flame to her face and eyes.

Then, lighter fluid was poured onto her legs, arms, face and stomach, and then lit on fire. This final torture lasted for a time of two hours. Junko Furuta died later that day, in pain and alone. Nothing could compare 44 days of suffering she had to go through.

When her mother heard the news and details of what had happened to her daughter, she fainted. She had to undergo a psychiatric outpatient treatment. Imagine her endless pain. Her killers are now free men. Justice was never served, not even after 20 years. They deserve a punishment much greater than they had put upon Furuta, for putting an innocent girl through the most unbearable suffering.

ये बस एक सारांश भर है…कहानी से जुड़ी बहुत सी बातें इण्टरनेट पर हैं…। खुद एक लड़की हूं… शायद इसीलिए जुंको की तकलीफ को खुद के ज्यादा करीब महसूस कर रही हूं… लेकिन शायद इसे पढ़ने के बाद आप भी कुछ वैसा ही दर्द महसूस कर रहे होंगे। घर पर पापा को नहीं पढ़ाया ये सब, क्योंकि वैसे ही बाप अपनी बेटियों की चिंता से कभी बाहर निकल पाते… ऐसे में ये सब पढ़कर कहीं न कहीं ये डर और बढ़ ही जाएगा… सच कहूं तो खुद भी थोड़ा डर गई हूं कि जो जुंको के साथ हुआ वो मेरे साथ भी तो हो सकता है या मेरे किसी जानने वाले के साथ…या आपके साथ..आपके घर में…।

अक्सर बड़ों को कहते सुना है कि कोई लड़की को तब तक परेशान नहीं कर सकता.. जब तक वो खुद ना चाहे… लेकिन सोचिए तो कितनी सच्चाई है इसमें…? समाज में शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है… हर दूसरे इलाके में कॉलेज खुल रहे हैं.. पर क्या फायदा अगर सोच का स्तर इतना गिरता जाए तो…। हालांकि ये कहानी जापान की है पर अपने देश में ऐसी कितनी जुंको होंगी… जो आज भी यही सब सह रही होंगी.. आज तरह-तरह के आन्दोलन हो रहे हैं.. महंगाई के खिलाफ, भ्रष्टाचार के खिलाफ… एक आनदोलन और भी होना चाहिए.. समाज में व्याप्त असभ्यता के खिलाफ….।

भूमिका राय पत्रकार व ब्‍लॉगर हैं. नवाबों के शहर में पत्रकारिता कर रही हैं. यह लेख उनके ब्लाग बतकुचनी से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

सिर्फ सुंदर चेहरे नहीं बल्कि विषय पर अच्‍छी पकड़ से बनती है एंकरों की पहचान : रमा

भोपाल। डीडी न्यूज की एंकर रमा त्यागी का कहना है कि एंकर सिर्फ एक सुंदर चेहरे का नाम नहीं है, वह अंततः विषय पर अपनी पकड़ के चलते ही अपनी पहचान बना सकते हैं। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग में आयोजित कार्यशाला में विद्यार्थियों के साथ एंकरिंग के टिप्स पर बात कर रही थीं। उनका कहना था कि एंकरिंग साधारण कर्म नहीं है। अनुभव और ज्ञान इसके पीछे एक बड़ी ताकत है।

उनका कहना था कि जिस तरह खबरें बदल रही हैं, मीडिया में खबर को देने की गति बढ़ रही है, एंकरिंग ज्यादा चुनौतीपूर्ण कर्म में बदल गय