नेता खुश हुआ क्योंकि उसकी खींची लकीर पर मीडिया चल पड़ा

पुण्य प्रसून वाजपेयीमीडिया न हो, तो अन्ना का आंदोलन क्या फ़ुस्स हो जायेगा. मीडिया न होता, तो क्या रामदेव की रामलीला पर सरकारी कहर सामने आ नही पाता. और, सरकार जो खेल महंगाई, भ्रष्टाचार या कालेधन को लेकर खेल रही है, वह खेल बिना मीडिया के सामने आ नहीं पाता. पर जो कुछ इस दौर में न्यूज चैनलों ने दिखाया और जिस तरह सरकार ने एक मोड़ पर आकर यह कह दिया कि अन्ना की टीम संसद के समानांतर सत्ता बनाना चाहती है…

जागरण ने एकतरफा फैसला दिया

[caption id="attachment_15334" align="alignleft"](खबर पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें)[/caption]मैं जरनैल सिंह को जानता हूं। जो कुछ उन्होंने किया, बेशक गलत था पर जिस प्रबंधन ने उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका, उसे कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। दैनिक जागरण प्रबंधन ने जहां तक संभव था, जरनैल का इस्तेमाल किया। जरनैल को याद होगा, जब वह जालंधर आए थे, विधानसभा चुनाव की कवरेज में। अकालियों के समर्थन में तैयार स्टोरी को किस दबाव में अकालियों के खिलाफ किया गया था, यह मैं भी जानता हूं। और जरनैल तो खैर भुक्तभोगी हैं ही। हम जिस पत्रकारिता में इन दिनों हैं, वहां फेस-वैल्यू सबसे अहम है। चिदंबरम की फेस-वैल्यू कांग्रेस आलाकमान ज्यादा मानता है। जब जरनैल ने चिदंबरम की ओर जूता उछाला था तो सन्न मैं भी रह गया था। पर, आप उसके बैकग्राउंड में जाकर देखें कि उसने ऐसा क्यों कर किया। बिना कारण जाने जरनैल को जो सजा मिली, वह उसके साथ ज्यादती है। सरकार ने तो कुछ नहीं किया, जागरण ने जरूर एकतरफा फैसला दे दिया। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता में अब शुचिता बची है। कहीं है भी, तो मैं नहीं देख पाता। संभवतः नेत्र रहते मैं अंधा हूं। पर, होती तो कहीं तो दिखती।