अमेरिका क्या, हम भारतीय कम दोगले हैं!

फौजिया रियाजहाल ही में अमेरिका के एक एअरपोर्ट पर अपने शाहरुख़ खान, “द सुपर स्टार”, के साथ दो घंटों तक पूछताछ हो गई.  इस घटना पर इस कदर हंगामा बरपा कि पूछो मत. कहा गया- भारतीयों की इज्ज़त से खिलवाड़ हो रहा है. और भी न जाने क्या क्या कहा गया. कई लोगों का कहना है- ये भारतीयों के साथ ज़्यादा होता है, मुसलमान के साथ ज़्यादा होता है, अमेरिका एक रेसिस्ट देश है, वहां नाम देख कर पूछताछ की जाती है, साथ ही कि ये हमारे मान की बात है, हमे भी अमेरिकिओं से इसी तरह पेश आना चाहिए… या रब, हद हो गई! हम ख़ुद कितने रेसिस्ट हैं, दोगले हैं, इसका एहसास ही नही है. ख़ुद हमारे यहाँ हर दाढ़ी वाले को शक की नज़र से देखा जाता है, ख़ुद हमारे यहाँ नॉर्थ ईस्टर्न लोगों को अपना नहीं समझा जाता, ख़ुद हमारे यहाँ विदेशी पर्यटकों को तंग किया जाता है, ख़ुद हमारे यहाँ बिहार के लोगों को नीचा दिखाने के लिए बिहारी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है…

स्वतंत्रता दिवस का जश्न कहीं ढोंग तो नहीं!

[caption id="attachment_15545" align="alignleft"]फौजिया रियाजफौजिया रियाज[/caption]हम आजाद हैं और और इसकी ख़ुशी लफ्जों में बयां नहीं की जा सकती, तो चलो करोड़ो रूपए खर्च करके इंडिया गेट से लाल किला तक परेड कराई जाए, अपनी जेब से तो पैसा जाना नहीं है तो खर्च करो जम कर खर्च करो, पिछली सरकार के वक़्त जैसा सेलेब्रेशन हुआ था उससे अच्छा होना चाहिए, उससे शानदार होना चाहिए. भाई यह तो सोच हुई अपने नेताओं की पर आप और हम तो आम इंसान हैं. हमारी कमाई कई साल से पानी की तरह बहाई जा रही है और हम हैं की टीवी पर प्रदेशों की झाकियां देख कर खुश होते हैं.

बढिया रियलिटी है ‘सच का सामना’

[caption id="attachment_15337" align="alignleft"]फौजिया रियाजफौजिया रियाज[/caption]रियलिटी शो कोई मुद्दा नहीं :सच का सामना‘ शो हमारी संस्कृति के लिए कितना सही है और कितना गलत, ये तो उन पर निर्भर करता है, जिनकी जिन्दगी का एक हिस्सा वाकई टीवी देखने में जाता है। मैं आप सबके साथ एक किस्सा बांटना चाहूंगी। मेरी एक दोस्त है, जिसकी फैमिली काफी पुराने खयालात की है। यहां तक कि उनके घर में लड़कियों की पढ़ाई को भी बुरी नजर से देखा जाता है। यह तकरीबन पांच साल पहले की बात है, जब उनके घर में क्रिकेट मैचों के अलावा और कुछ नहीं देखा जाता था। यहां तक कि फिल्में भी घर वाले साथ में नहीं देखते थे। मगर आज वही लोग, वही परिवार साथ बैठकर ‘सच का सामना’ देखता हा। बताना चाहूंगी कि उस परिवार में माता-पिता के अलावा एक भाई और दो बहनें हैं। हमारा समाज और उसकी सोच बहुत तेजी से  बदली है। आज लोग उस तरह नहीं सोचते, जैसे दस साल पहले सोचते थे। हर इंसान का अपना नजरिया होता है और उसे क्या देखना है, क्या नहीं देखना, इसका फैसला वह खुद कर सकता है। इसके पीछे कोई जोर ज़बरदस्ती नहीं होती है। अभी कुछ साल पहले तक लोग बड़े चाव से सास-बहू सीरियल देखते थे, मगर अब ऐसे शो धीरे-धीरे बंद हो रहे हैं क्योंकि लोगों को लगता है कि ये बेहद बनावटी हैं कि घर की बहू हर वक्त कांजीवरम साड़ी और भारी मेकअप में रहे।  आज लोग इस तरह की फिल्में भी कम ही पसंद करते हैं, जिसमें एक्ट्रेस एक्टर से कहे “तुम्हारे चूमने से मैं मां तो नहीं बन जाऊंगी?”

जागरण ने एकतरफा फैसला दिया

[caption id="attachment_15334" align="alignleft"](खबर पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें)[/caption]मैं जरनैल सिंह को जानता हूं। जो कुछ उन्होंने किया, बेशक गलत था पर जिस प्रबंधन ने उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका, उसे कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। दैनिक जागरण प्रबंधन ने जहां तक संभव था, जरनैल का इस्तेमाल किया। जरनैल को याद होगा, जब वह जालंधर आए थे, विधानसभा चुनाव की कवरेज में। अकालियों के समर्थन में तैयार स्टोरी को किस दबाव में अकालियों के खिलाफ किया गया था, यह मैं भी जानता हूं। और जरनैल तो खैर भुक्तभोगी हैं ही। हम जिस पत्रकारिता में इन दिनों हैं, वहां फेस-वैल्यू सबसे अहम है। चिदंबरम की फेस-वैल्यू कांग्रेस आलाकमान ज्यादा मानता है। जब जरनैल ने चिदंबरम की ओर जूता उछाला था तो सन्न मैं भी रह गया था। पर, आप उसके बैकग्राउंड में जाकर देखें कि उसने ऐसा क्यों कर किया। बिना कारण जाने जरनैल को जो सजा मिली, वह उसके साथ ज्यादती है। सरकार ने तो कुछ नहीं किया, जागरण ने जरूर एकतरफा फैसला दे दिया। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता में अब शुचिता बची है। कहीं है भी, तो मैं नहीं देख पाता। संभवतः नेत्र रहते मैं अंधा हूं। पर, होती तो कहीं तो दिखती।