बज गया बिगुल

गिरीश मिश्रबिहार का आगामी विधानसभाई चुनाव क्या जातियों का पारंपारिक व्यूहचक्र तोड़ रहा है? चुनावी शतरंज पर जातियों की बिसात क्या नई शक्ल अख्तियार कर रही है? क्या जातियों का नया गठजोड़ अब सिर्फ जातीय संदर्भ में न होकर सुशासन, विकास और शांति-व्यवस्था के नए पैमाने पर भी निर्मित होगा, जिसकी संरचना कुछ-कुछ वर्गीय होगी? क्या ऐसे अनेक सवाल बिहार को एक नए खांचे में वाकई बांट रहे हैं या फिर एक तबके द्वारा इसे एक नए चश्मे से देखने-दिखाने का प्रयास भर है?