जनार्दन को जूता दिखाने वाले शिक्षक सुनील कुमार की असली जिंदगी

योगेंद्र सिंह शेखावत
योगेंद्र सिंह शेखावत
तारीख 6 जून, 2011. आज जब ढलती दोपहर को मैं देश के तेजी से बदलते घटनाक्रम पर पल-पल जानकारी लेते हुए न्यूज़ पर पकड़ बनाये हुए था तो उस समय जनमर्दन द्विवेदी की प्रेस कांफ्रेंस का टेलीकास्ट किया जा रहा था। अचानक एक शख्स अपना जूता लेते हुए द्विवेदी पर चढ़ाई करता हुआ दिखाई पड़ा।

बाद में जो हुआ सब जानते ही हैं कि उसे पार्टी गुर्गों द्वारा साईड में ले जाकर धुन दिया गया। देखते ही मुझे चेहरा जाना पहचाना लगा। मैंने तुरंत अपने तत्कालीन विद्यालय मित्रों से संपर्क साधा। पूछने पर पता चला कि उन्हें भी ऐसा ही लग रहा है। कुछ ही क्षण में स्क्रीन पर नाम फ्लैश हुआ सुनील कुमार और अब मेरे लिए शक की कोई गुंजाइश नहीं बची थी। खासकर उनके व्यक्तित्व को देखते हुए।

इस दो-तीन मिनट के घटनाक्रम ने इस सुनील कुमार नामक व्यक्ति को पल भर में पूरे देश में हाईलाईट कर दिया। बाद में तरह-तरह की सियासी बयानबाजियां जो न्यूज़ चैनलों पर चली, उन्हें देखकर मैं हैरान था कि लोग बिना जाने सोचे समझे जल्दबाजी में कैसी-कैसी उलटी सीधी बकवास शुरू कर कर देते हैं। सुनील कुमार शर्मा काफी समय तक अंग्रेजी के अध्यापक रह चुके हैं। इनका राजस्थान के सीकर और झुंझुनू जिले के विद्यालयों में अच्छा नाम रह चुका है। जो विद्यार्थी इनसे पढ़े हैं वे सब इनके खासे फैन हैं। मैं ऐसे ही एक विद्यालय का विद्यार्थी रह चुका हूँ जिसमें वे पढाया करते थे। हालांकि वे मेरे सेक्शन में नहीं थे पर स्कूल में आने के पहले दिन ही उन्होंने सभी का ध्यान अपनी और आकर्षित कर लिया था। पहले दिन ही प्रेयर असेम्बली में उन्होंने जो फर्राटेदार अंग्रेजी में शानदार जुमलों के साथ अपना परिचय दिया और जो अलंकृत वचन सुनाये तो सभी की उनींदी तन्द्रा टूटी जो अमूमन प्रेयर असेम्बली में प्रार्थना करते-करते सबको पकड़ जाती है।

मैं जहाँ पढ़ा था वो विद्यालय था “झुंझुनू अकेडमी”। यहाँ से पहले सुनील शर्मा जी सीकर जिले के नामी विद्यालय “विद्या भारती” में पढ़ाकर आये थे जिसके मालिक श्रीमान बलवंत सिंह चिराना जी हैं। झुंझुनू एकेडमी से जाने के बाद वे झुंझुनू के ही एक दुसरे बड़े विद्यालय “टैगोर पब्लिक स्कूल” में गए जिसकी मालिक और पूर्व में इसकी प्रिंसिपल रह चुकीं श्रीमती संतोष अहलावत हमारे यहाँ से विधायक और सांसद के चुनाव भी लड़ चुकी हैं।  इनके अलावा उन्होंने “राजस्थान पब्लिक” स्कूल और शायद एक दो स्कूलों में और पढ़ाया था। ये झुंझुनू के आस-पास कई बड़े स्कूलों में अध्यापन कर चुके हैं क्योंकि इनकी प्रतिभा को लेकर किसी को शक-शुबहा नहीं था।  पर ऊपर बताये गए स्कूलों में से एक भी स्कूल का संघ जैसी संस्था से दूर-दूर तक कोई नाता होगा मैं सपने में भी नहीं सोच सकता उलट इसके ये कह सकते हैं ये सब स्कूलें खासे पूंजीपतियों की रही हैं। “झुंझुनू अकेडमी” स्कूल शुरू से लेकर आज तक उन सीढियों पर तेजी से चढ़ता चला गया है जिसे वर्तमान में सफलता के नाम से जाना जाता है। “झुंझुनू एकेडमी” भी उन्हीं दुसरे और आपके शहरों के बड़े नामी विद्यालयों की तरह ही है जो अपने शहर के पांच सितारा सुविधाओं वाले स्कूलों की श्रेणी में आते हैं। इनकी टेग लाईन है “मेरिट वाला विद्यालय”। पचासों मेरिट देने वाला ये स्कूल आपको अपनी इस दक्षता से आश्चर्यचकित कर सकता पर मुझे तो बिलकुल नहीं। क्योंकि इसके पीछे पूंजीवाद नियंत्रित भ्रष्ट तंत्र का बेजोड़ कर्मठ प्रयास है।

झुंझुनू अकेडमी के डायरेक्टर श्रीमान दिलीप मोदी आज न्यूज़ चैनल को फ़ोन पर कुछ ये बताते सुने गए कि सुनील शर्मा फर्राटेदार अंग्रेजी से लोगों पर झूठा प्रभाव ज़माने वाले और मानसिक रूप से थोडा डिस्टर्ब इंसान है और इसलिए उन्हें निकाल दिया गया और अन्य जगहों पर भी उनके साथ ऐसा ही हुआ। पर मैं श्रीमान मोदी जी से इतर विचार रखता हूँ। एक शब्द में अगर बयां करना हो तो कह सकते हैं कि ज़माना जिसे ज़मीर वाला इंसान कहता है सुनील कुमार वही शख्सियत है। बेबाक और अपने जज्बातों को पूरी तरह से अभिव्यक्त कर देने वाला आदमी कभी-कभी समाज में बीमार की संज्ञा पाता है और उसका बयां सच लोगों को हज़म नहीं होता इसमें कोई दो राय नहीं।

जिस साल सुनील सर मोदी जी के स्कूल से गए, असलियत में उस समय उन्हें निकाला नहीं गया बल्कि उन्होंने खुद स्कूल छोड़ा था। मैंने उससे एक साल पहले ही अपनी 12 वीं कक्षा उतीर्ण कर ली थी। पर जो सुनने में आया वो ये था कि श्रीमान मोदी जी ने उनकी तनख्वाह रोक कर रखी थी और अन्य अध्यापकों के साथ भी ऐसा ही होता है। ये लोग तनख्वाह को देने की फ्रीक्वेंसी कुछ महीने पीछे करके रखते हैं। घोर पूंजीवादी संस्थानों में किस तरह की गुलामी कर्मियों से करवाई जाती है उसे मित्र अच्छी तरह जानते हैं। पर सुनील कुमार शर्मा के लिए ये बर्दाश्त से बहार था। तनख्वाह की मांग सुनील कुमार कई दिनों से कर रहे थे। मोदी और उनके बीच की अंतरकलह एक दिन पूरे स्टाफ के सामने फूट पड़ी। बाद में जब दबे-छिपे स्वरों में खबर निकल कर आई वो ये थी सुनील कुमार ने हमारे महापूंजीपति मोदी जी का कॉलर पकड़ कर थप्पड़ मारते हुए जोरदार जुमलों के साथ जो लानत-मलानत पूरे स्टाफ के सामने की वो देखने लायक थी। मलानत करके उनके महंगे शीशों से सुसज्जित दरवाजे को लात मारते हुए सुनील जी अपना बजाज स्कूटर स्टार्ट कर बिना पैसे लिए अनजाने भविष्य की और निकल गए। उनके जीवन में ऐसे कई वाकये आये हैं जिन सबकी जानकारी तो शायद यहाँ देना संभव नहीं होगा पर जो यहाँ दी गयी है आशा है उससे आप वस्तु स्थिति को समझ जायेंगे।

सुनील कुमार एक बहुमुखी प्रतिभा वाला व्यक्ति हैं। अंग्रेजी के अध्यापक होने के नाते अंग्रेजी भाषा पर उनका जबरदस्त अधिकार तो है ही इसके अलावा उनमें अन्य कई गुण भी हैं। उनके आसपास के सर्कल में किसी कॉलेज या विद्यालय के मेगा इवेंट से लेकर मिनी-इवेंट तक में उनके शानदार संचालन को देखते हुए एक एंकर के रूप में सबकी पहली पसंद वही होते।

इसके अलावा जिन लोगों ने उनको गाते हुए सुना है वो अच्छी तरह जानते हैं कि उनका गायकी में भी खासा दखल था, खासकर रफ़ी उनकी पहली पसंद थे। जब हमारे बैच के विदाई समारोह पर उन्होंने मोहम्मद रफ़ी का “ओ दुनिया के रखवारे सुन दर्द भरे मेरे नाले….” खत्म किया तो पूरा हॉल तालियों के गड़गड़ाहट से काफी देर तक गूंजता रहा जिसमें ताली बजाने वाले श्रीमान मोदी जी भी थे जो आज इनकी भर्त्सना कर रहे हैं।

इस बात को मैं जरूर स्वीकार करूँगा कि वे एक हद तक एन्ग्जाईटी मानसिक रोग से ग्रस्त थे। पर उन्होंने कभी गलत व्यवहार प्रदर्शित नहीं किया। उन्हें देखकर मुझे ये एहसास जरूर था कि वे कहीं न कही समाज के दिखावटीपन से दिली तौर पर आहत हैं। पर उन्होंने हमेशा बहार से ऐसा प्रफुल्लित और जिन्दादिली वाला व्यवहार प्रदर्शित किया जैसा “अनुरानन” फिल्म में राहुल बोस ने किया।  वे अपनी बातों को बहुत ही ज्यादा सीधे अंदाज़ में लोगों के सामने अभिव्यक्त कर देते थे जो लोगों के लिए कई बार परेशानी का सबब बन जाता था, उन्हें अगर किसी की बुराई करनी होती तो उस शख्स की उसके सामने ही सच्चाई व्यक्त कर देते थे, पोल खोल देते थे। उनके दोस्ताना और खुले व्यवहार के कारण छात्रों को तो वे अत्यधिक प्रिय थे।

उनके बेबाक व्यवहार के कारण वे साल भर से ज्यादा कहीं टिकते नहीं थे। उनको किसी की गुलामी पसंद नहीं थी, काम के प्रति पूरे तरह समर्पित, एक सच्चे और स्वाभिमानी आदमी हैं वो। क्योंकि हम भी बड़े शरारती थे तो एक बार हमारी इनसे डायरेक्ट भिडंत भी हुयी पर इनके मजाकिया स्वभाव से घटना में कोई गंभीर मोड़ नहीं आया और पूरी कक्षा को बड़ा आनंद आया पर मैं वो घटना यहाँ नहीं बताऊंगा क्योंकि इन सर ने मेरी ओवर स्मार्टनेस की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी थीं।

आज जो कुछ हुआ उसे लेकर मेरे पास कुछ पत्रकार मित्रों से खबरें आई की वर्तमान समय में वे “दैनिक नवजागरण” जैसे नाम की किसी पत्रिका के लिए पत्रकार बने हैं। जिसका अभी पहला प्रकाशन भी शुरू नहीं हुआ है ये पत्रिका “मुकेश मूंड” नामक एक व्यक्ति शुरू करने जा रहा है जो झुंझुनू में पहले से ही अच्छा-खासा कोचिंग सेंटर चला रहा है। आज का घटनाक्रम सामने आने पर जब बड़े न्यूज़ चैनल वालों ने मूंड जी से  संपर्क साधा तो उन्होंने पूरी तरह से खुद को मामले से अलग करते हुए फिरकापरस्ती दिखाते हुए साफ़ इनकार किया की उनकी पत्रिका से सुनील कुमार का कोई सम्बन्ध है। और इस तरह हर तरफ न्यूज़ चैनल वालों ने यही दिखाया-कहा की वो कोई पत्रकार नहीं हैं। बेशक वो एक अध्यापक रहे हैं पर जहाँ तक मुझे जानकारी मिली है वो “मुकेश मूंड” की पत्रिका के पत्रकार की हैसियत से दिल्ली पहुंचे थे। पर शायद अपने गुस्से पर काबू न पा सके और गद्दारों के ऊपर जूता उठा लिया।

शाम को मेरे शहर की पत्रकार जमात में जो बीमारी फैली वो ये है कि ख़ास पूंजीवादियों के दबाव के चलते उनके कई जानकारों और पत्रकारों ने मोबाईल स्विच ऑफ कर लिए हैं और अगर कोई कुछ बोल रहा है तो उनके खिलाफ की बयानबाजी करता ही नज़र आ रहा है। पाठक समझ सकते हैं कि ये बदले की आग में भड़कता हुआ पूंजीवादी कौन है।

अगर सामाजिक ठेकेदारों के अलावा उन विद्यार्थियों से पूछा जाये जो उनसे पढ़ चुके हैं तो असलियत पता चलते देर न लगेगी। अब तो मेरे दिल मैं उनके प्रति सम्मान कई गुना बढ़ चुका है। ये आदमी ज़मीर से सच्चाई का पक्षधर है और मुखोटे में जीने वाले लोगों की आँख का किरकिरा। बिना किसी तथ्य के जाने आज जो पक्ष और प्रतिपक्ष पार्टियों ने आरोप लगाये उन्हें सुनकर हतप्रभ ही नहीं लोटपोट भी हुआ और आहत भी। पहली बार गहरे तक महसूस भी किया कि सामान्य से मुद्दों को भी राजनेता किस हद तक गिरते हुए क्या का क्या बनाकर रख देते हैं।

ये वीडियो भी देख सकते हैं-

जूता जनार्दन एक

जूता जनार्दन दो

जूता जनार्दन तीन

जूता जनार्दन चार

लेखक योगेंद्र सिंह शेखावत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

कांग्रेस कवर करने वाले इन पत्रकारों पर थू थू करिए

हद है. कांग्रेस कवर करने वाले कई पत्रकारों ने उस युवक को जमकर पीटा जिसने भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेस पार्टी के नेता जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाया. वो युवक चाहता तो द्विवेदी को जूतिया सकता था पर उसने केवल जूता दिखाकर अपना विरोध प्रदर्शित कर दिया. और उसने वह काम किया है जो इस देश का हर आदमी करना चाहता है पर कई वजहों से लोग अभी कर नहीं पा रहे हैं.

सुनील ने जनता की भावनाओं को अच्छे से कांग्रेसियों के पास पहुंचाया है. पर कांग्रेस कवर करने वाले कई वरिष्ठ पत्रकार इस कदर नपुंसक हो चुके हैं और कांग्रेस के टुकड़ों पर पलने वाले बन चुके हैं कि उन्हें जूता दिखाने वाले शख्स को पीटते देर न लगी. और जब एक ने हाथ छोड़ा तो कई पत्रकारों ने उसे पीटना शुरू कर दिया. कुछ ही देर बाद पीटे जाने को नंबर बढ़ाने से जोड़ दिया गया और फिर जिसे देखो वही पीट रहा है. युवक को पत्रकारों ने पीटने के बाद कांग्रेसी नेताओं के यहां जाकर बखान किया कि उन्होंने कितना पीटा. कांग्रेसी नेताओं ने पत्रकारों को बधाई दी, अच्छा काम करने के लिए.

कई टीवी जर्नलिस्ट तो वीडियो फुटेज जनार्दन द्विवेदी को दिखा रहे थे कि देखिए मैं कैसे मार रहा हूं उसको. पता चला है कि युवक को पीटने वालों में टीवी व प्रिंट के कई पत्रकार रहे हैं. कई पत्रकारों को जनार्दन द्विवेदी, मोतीलाल बोरा, दिग्विजय सिंह ने युवक को पीटने पर बधाई दी. एक उर्दू अखबार के पत्रकार ने सबसे पहले जूता दिखाने वाले युवक को पीटना शुरू किया. उसके बाद एनडीटीवी, जी, हेडलाइन टुडे आदि चैनलों के वरिष्ठ पत्रकारों ने भी युवक को पीटना शुरू कर दिया. जो मीडिया व पत्रकार रामदेव के अनुयायियों पर पुलिस के हमले को गलत बता रहे हैं, वही खुद एक उस युवक को बुरी तरह पीटने में जुट गए जिसने भ्रष्ट कांग्रेस के नेता को जूता दिखाया. भड़ास4मीडिया जल्द उन पत्रकारों के नाम प्रकाशित करेगा जिन्होंने युवक को पीटने में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाई.

ऐसे दलाल और कांग्रेसी टुकड़ों पर पलने वाले पत्रकारों के चेहरों से पर्दा हटाया जाना बहुत जरूरी है ताकि दुनिया जान सके कि मीडिया के नाम पर ये लोग किस तरह एक भ्रष्ट पार्टी व उसके नेता के बचाव में उतरे हैं और एक निर्दोष युवक को पीटने के बाद खुद की कथित वीरता का बखान कांग्रेसी नेताओं के यहां कर रहे थे ताकि वे खुद को कांग्रेसी नेताओं का प्रियपात्र बना सकें और भविष्य में इसका फायदा सत्ता से ले सकें. अगर आपको भी इस प्रकरण पर कुछ कहना, बताना हो तो नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं. ये पत्रकार जनार्दन द्विवेदी के कमरे में जाकर उनसे ये भी कह रहे थे कि जूता दिखाने वाले युवक को सिर्फ पीटकर ही नहीं छोड़ा जाना चाहिए बल्कि उसे कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए.

सोचिए, जिस देश के वरिष्ठ पत्रकारों की संवेदनशीलता का ये आलम है, उस देश की मीडिया का क्या हाल होगा. और मीडिया का क्या हाल है, ये आप सब देख ही रहे हैं. ज्यादातर मीडिया हाउसों के कांग्रेस कवर करने वाले पत्रकार दलाल के रूप में काम करते हैं और अपने अपने मीडिया हाउसों और सत्ता के बीच पुल का काम करते हैं. तो, ऐसे दलाल पत्रकार अगर कोई ऐसा मौका पाते हैं जिसमें किसी निरीह को पीटकर वे कांग्रेसी नेताओं की नजर में खुद को प्रियपात्र बना सकें तो भला क्यों पीछे रहेंगे. शर्म आनी चाहिए इन पत्रकारों को. पत्रकारिता और मीडिया के नाम पर ये कलंक हैं. इनमें अगर जरा भी इमान और ईमानदारी होगी तो वे उस युवक से जरूर माफी मांगेंगे जिसे इन लोगों ने सिर्फ इसलिए पीट दिया क्योंकि उसने एक नेता को जूता दिखा दिया.

दरअसल उस युवक ने तो देश की जनता का मान बढ़ाया है, ये संदेश सत्ता तक पहुंचाया है कि अगर हालात यही रहे तो कांग्रेसी सड़कों पर दौड़ा दौड़ा कर पीटे जाएंगे. पर कांग्रेस कवर करने वाले पत्रकार उस युवक को ही आरोपी व अपराधी ठहराकर पीटने में जुट गए. सच कहा गया है कि इस देश में शीर्ष स्तर पर मीडिया, नेता, अफसर और जजों की एक चांडाल चौकड़ी बन चुकी है जो लोकतंत्र को पलीता लगाने में लगी हुई है. इस चांडाल चौकड़ी को जो भी चुनौती देगा, उसे ये चारों मिलकर पीटेंगे और एक दूसरे को शाबासी देते मिलेंगे.

पत्रकार ने कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी को जूतियाने की कोशिश की

बाबा रामदेव और केन्द्र सरकार के बीच मचे घमासान के बीच नया घटनाक्रम सामने आया है.  कांग्रेस मुख्यालय में रामदेव के आरोपों पर मीडियाकर्मियों को जवाब दे रहे कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी को एक पत्रकार ने जूता मारने की कोशिश की. हालांकि सुरक्षाकर्मियों ने उसे पकड़ लिया और जमकर धुनाई की. पत्रकार राजस्‍थान का रहने वाला है.

24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्‍यालय में जर्नादन बाबा रामदेव से संबंधित मुद्दे पर पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे. जनार्दन द्विवेदी से एक सवाल किया गया जिसका उन्‍होंने जवाब भी दे दिया. इसके बावजूद यह पत्रकार जूता लेकर मंच पर चढ़ गया और जर्नादन द्विवेदी को जूता मारने की कोशिश की. हालांकि वह अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाया. कांग्रेस कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों ने उसे पकड़ लिया.

इस पत्रकार की पहचान सुनील कुमार के रूप में की गई है. राजस्‍थान के झुझनु के रहने वाला सुनील दैनिक नवसंचार में संवाददाता बताया जा रहा है. पत्रकार को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है. मामले की जांच की जा रही है. इस संदर्भ में जनार्दन द्विवेदी ने बताया कि यह हमला पूर्व नियोजित था.

मैं जेल गया तब भी मेरे न्यूज चैनल ने मुझे सेलरी दी

: इंटरव्यू (पार्ट-दो) : मुंतज़र अल ज़ैदी (इराकी पत्रकार) :

मुंतज़र अल ज़ैदी पिछले दिनों दिल्ली में थे. इराक में बुश पर जूता फेंककर दुनिया भर में चर्चित हुए ज़ैदी बेहद समझदार और तार्किक व्यक्ति हैं. न्यूज एक्सप्रेस के एडीटर (क्राइम) संजीव चौहान ने मुंतज़र अल ज़ैदी से कई सवाल किए और जै़दी ने सभी जवाब ऐसे दिए जिसे पढ़-सुनकर उनके प्रति प्यार बढ़ जाता है. पेश है इंटरव्यू का आखिरी पार्ट…

सवाल- दुनिया कह रही है मुंतज़र ने जूता कल्चर को जन्म दिया है…जो कि गलत है, ऐसा नहीं करना चाहिए था।

जबाब- अगर मैं, और मेरा जूता फेंकना गलत था, तो फिर इराक में बेकसूरों पर बम बरसाने वालों को क्या कहेंगे ?

सवाल- आपने बुश पर जूता फेंका। इसके बाद भारत में भी इस तरह की जूता फेंकने की कई घटनाएं हुईं। एक पत्रकार ने तो भारत के गृहमंत्री पर जूता फेंक कर मारा। यानि आपके द्वारा दिया गया जूता-कल्चर दुनिया फालो कर रही है?

जबाब- नहीं। बिल्कुल मुझे फालो नहीं करना चाहिए। हर किसी पर जूता फेकेंगे, तो जूते की मार की चोट कम हो जायेगी। जब तक आप पर, आपके देश और आपके समाज पर कोई बम-गोली न बरसाये, तब तक जूता न उठायें। जो जूते के लायक है, उसे जूता दें और जो गुलदस्ते के काबिल है, उसका इस्तकबाल गुलदस्ते से करें।

सवाल-  आपने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पर जूता फेंका, तो आपके चैनल के आधिकारियों और आपके हमपेशा साथियों (जहां आप नौकरी करते थे) की प्रतिक्रिया क्या थी? क्या आप नौकरी से बाहर कर दिये गये?

जबाब- सब खुश थे। देश खुश था। इराक के हमदर्द खुश थे। जब तक मैं जेल में रहा उतने महीने (…..करीब नौ महीने) की मेरी तनख्वाह मेरे घर भिजवाई गयी। और जब जेल से बाहर आया, तो पता चला कि न्यूज चैनल ने मुझे और मेरे परिवार को रहने के लिए एक फ्लैट का भी इंतज़ाम कर दिया था।

सवाल- जूता कांड के बाद आप इराक के हीरो बन गये, फिर भी आपको वीजा किसी अरब या यूरोपीय देश ने नहीं दिया, सिवाये भारत के? इसे क्या समझा जाये? मुंतज़र अल ज़ैदी की मुखालफत या इन देशों पर अमेरिका का भय?

जबाब- मुझे किसी ने दिया हो वीजा न दिया हो। क्यों नहीं दिया? सबका निजी मामला है। लेकिन भारत ने मुझे वीजा देकर साबित कर दिया, कि उसे किसी का डर नहीं है। मुझे लगता है कि वाकई आज भी दुनिया में भारत ही सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है।

सवाल- कैसे-कैसे लगवा पाये भारत का वीजा? क्या क्या मशक्कत करनी पड़ी?

जबाब- दिल्ली में रहने वाले इमरान जाहिद साहब मेरे दोस्त हैं। उन्होंने बात चलाई थी। मैं गांधी जी को करीब से छूना, देखना, उनसे बात करना चाहता था। मेरी साफ मंशा, इमरान भाई और महेश साहब (भारतीय फिल्म निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट) की कोशिशें कामयाब रहीं। और अब मैं गांधी और आपके सामने हूं।

सवाल- हिंदुस्तान की सर-ज़मीं को छुए हुए दो दिन हो गये हैं, कल चले जायेंगे आप इराक ? यहां से हमवतन (इराक) क्या लेकर जा रहे हैं?

जबाब- जिंदादिल भारत की मिट्टी की खुश्बू, यहां के लोगों से मिला प्यार और भारत की सर-ज़मीं पर जीया हर लम्हा, हिंदुस्तान की मेहमानवाजी अपने साथ लेकर जा रहा हूं।

सवाल- भारत में गांधी जी की समाधि ही देखने की तमन्ना क्यों थी ? कहने को दुनिया का अजूबा और प्यार का प्रतीक ताजमहल भी भारत में ही है।

जबाब- इराक ने कुर्बानियां दी हैं। गांधी ने कुर्बानी दी। वे आज़ादी के नुमाईंदे और आइकॉन थे। उन्होंने अत्याचारों के खिलाफ जिस चिंगारी से आग लगाई, वो देखिये (गांधी समाधी पर जल रही लौ की ओर इशारा करते हुए) आज भी जल रही है। ताजमहल पर भी क्या ऐसी ही लौ जलती है?

सवाल- आप गांधी से प्रभावित दिखते हैं, ज़िंदगी में गांधी का सा कुछ किया भी है?

जबाब- जेल के भीतर ही तीन दिन तक अनशन पर बैठ गया था।

सवाल- द लास्ट सैल्यूट लिखने के पीछे क्या मंशा थी ?

जबाब- “द लास्ट सैल्यूट”  एक बेगुनाह पर अत्याचारों का सच है। बिना मिर्च-मसाले के। वो सच जिसे भोगा पूरे देश ने,  लेकिन आने वाली पीढ़ियों के पढ़ने को कागज पर इतिहास लिखा सिर्फ मैने (मुंतज़र अल ज़ैदी ने)।

सवाल- इराक और भारत में फर्क?

जबाब- इराक का मैं बाशिंदा हूं। भारत के बारे में पढ़ा-सुना है। सिर्फ दो-तीन दिन ही रह पा रहा हूं यहां (हिन्दुस्तान की सर जमीं पर) । इराक में अमेरिका का अत्याचार है, और भारत में अपना लोकतंत्र। आप खुद अंदाजा लगा लीजिए दोनो देशों में । कौन पॉवरफुल है?

समाप्त

इंटरव्यू का पहला पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें– वे पीटते रहे, थक गए, मैं बेहोश हो गया

वे पीटते रहे, थक गये, मैं बेहोश हो गया

: इंटरव्यू (पार्ट-एक) : मुंतज़र अल ज़ैदी (इराकी पत्रकार) : बुश पर जूता फेंकना भी “पीसफुल” था… : वे बम बरसाते हैं, तब भी कुछ नहीं होता, हम हथियार पकड़ते हैं तो अपराधी हो जाते हैं : गांधी ज़िंदा हैं, ज़िंदगी की तरह :

दुनिया में जूते से विरोध की परंपरा शुरू करने वाले इराकी पत्रकार मुंतज़र अल ज़ैदी दो दिन की यात्रा पर भारत पहुंचे। ज़ैदी ने विरोध का पहला जूता अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश पर क्या फेंका, रातों-रात इराकी जनता के चहेते और दुनिया भर की सुर्खी बन बैठे। इस घटना से भयभीत ज़ैदी को दुनिया के किसी भी देश ने वीजा जारी करने की हिम्मत नहीं की। सिर्फ भारत को छोड़कर। दिल्ली प्रवास के दौरान बापू की समाधि राजघाट पर पहुंचे मुंतज़र अल ज़ैदी के साथ न्यूज एक्सप्रेस के एडीटर (क्राइम) संजीव चौहान की बातचीत के कुछ अंश…

सवाल- जॉर्ज बुश को जूता मारने की नौबत क्यों आई?

जबाब- जिस चीज ने गांधी जी को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ आंदोलन के लिए प्रेरित किया था, मेरा भी ऐसा ही उद्देश्य था। नाइंसाफी और ज़ुल्म के खिलाफ लड़ाई मेरा मकसद था।

सवाल- बुश पर जूता तैश में आकर फेंक दिया या भावनाओं में बहकर?

जबाब- प्रेस-कांफ्रेंस की खबर मिलते ही, मैंने जूता मारने की प्लानिंग की थी। मैं दुनिया को बताना चाहता था कि यूएस (अमेरिका) ऑक्यूपेशन फोर्सेज का स्वागत फूलों से नहीं किया गया। उन्हें जूतों से सलामी दी।

सवाल- देश में और भी लोग थे, वो इस घटना का किस तरह विरोध कर रहे थे?

जबाब- और भी काफी लोग थे, जो इराकी ऑक्यूपेशन  के खिलाफ थे, और सारे लोग  अपने-अपने हिसाब से इसका विरोध  कर रहे थे। मैंने जो विरोध  का तरीका अपनाया वो ‘पीसफुल’ था।

सवाल- जूता मारने के बाद जब पकड़े गये, उसके बाद जेल जाने तक क्या-क्या हुआ?

जबाब- जब मुझे अरेस्ट किया गया, तो उन्होंने मेरे दांत तोड़ डाले। नाक तोड़ दी। दोनों पांव तोड़ दिये। इलेक्ट्रिक-शॉक दिये गये। कड़ाके की ठंड थी। फिर भी ठंडे पानी से टार्चर किया गया। पूरे बदन से खून टपक-बह रहा था। तीन महीने तक अंधेरी कोठरी में रखा गया। उसके बाद आम बैरक में डाल दिया गया। उसके बाद जिस्मानी और ज़हनी तौर पर टार्चर किया। मेरे ऊपर प्रेशर बनाया गया, जिससे मैं जूता फेंकने के जुर्म में मांफी मांग लूं। लेकिन मैंने माफी नहीं मांगी। जूता, माफी मांगने के लिए नहीं फेंका था।

सवाल- जेल की पहली रात के बारे में कुछ बतायेंगे?

जबाब- जिंदगी की सबसे मुश्किल रात थी वो।  पहली रात जेल में न ले जाकर, किसी सूनसान जगह पर ले गये थे। वहां प्राइम-मिनिस्टर के सिक्योरिटी गार्ड भी थे।  लेट नाइट तक वहां टार्चर किया गया। दूसरों (अमेरिकियों) की हिदायतों पर अमल करके अपनों (इराकी गार्ड) के द्वारा। कोड़ों की मार से पूरे बदन सूज और जगह-जगह से फट गया था।

सवाल- पहली रात खाने में क्या दिया?

जबाब- मैंने उनका खाना खाने से मना कर दिया। इससे वे चिढ़ गये। पूरी रात रुक-रुककर पीटते रहे। वो थक गये और मैं बेहोश हो गया। जब-जब होश आता मुझे, तो वे पीटते। कहते जुर्म कबूल लो। बख्श दिये जाओगे। वरना ज़हन्नुम में भेज दिये जाओगे। लेकिन मैंने उनकी हर पेशकश ठुकरा दी।

सवाल- पकड़े जाने वाली रात किसकी याद सबसे ज्यादा आई?

जबाब- घर वालों की।

सवाल- गांधी कब और कैसे याद आये? जेल गये तब गांधी याद आये थे! या जेल जाने से पहले भी गांधी को जानते थे?

जबाब- मैंने गांधी को उस वक्त पढ़ा था, जब मेरी उम्र सिर्फ सोलह-सत्रह साल रही होगी। मैं उनके (गांधी) आज़ादी के लिए किये गये संघर्ष के तरीके से प्रभावित था, हूं और आइंदा भी रहूंगा।

सवाल- गांधी में क्या खास नज़र आया?

जबाब- भारतीयों के लिए उन्होंने जो कुर्बानी दी, उस कुर्बानी की मैं तारीफ करता हूं। गांधी जी आजादी के नुमाइंदे और आइकॉन थे। उनकी लड़ाई सिर्फ भारत की खातिर नहीं, दुनिया के लिए थी।

सवाल- मुंतज़र ने गांधी को पढ़ा है, सुना है। तो गांधी के बारे में कुछ याद है?

जबाब- हां-हां। क्यों नहीं। गांधी जी ने एक बार कहा था – “मैंने हज़रत हुसैन की ज़िंदगी से सीखा है कि मैं मज़लूम (जिस पर ज़ुल्म और ज्यादती हुई हो) बनूं। ताकि मुझे जीत हासिल हो। मैंने भी गांधी से यही सीखा है कि मैं मज़लूम बनूं। और जीत हासिल कर सकूं।”

सवाल- आज गांधी जी अगर आपके सामने आकर खड़े हो जायें, तो उनसे क्या कहेंगे?

जबाब- कौन कहता है गांधी मर गये ? गांधी जी उसी तरह आज भी ज़िंदा हैं, जिस तरह “ज़िंदगी”। इसी राजघाट पर अभी आपके सामने ही उनसे मेरी गुफ्तगू हुई है।

सवाल- जूता फेंकने से पहले उसके परिणाम के बारे में सोचा था!

जबाब- हां । मुझे पता था कि बुश पर पहला जूता फेंकते ही मुझे घेरकर मार दिया जायेगा।

सवाल- गांधी जूता-लाठी के खिलाफ थे। मुंतज़र ने तो इसके एकदम उल्टा ही कर डाला। बुश के मुंह पर जूता फेंक कर….

(सवाल के बीच में ही टोकते हुए…..)

जबाब- महात्मा (गांधी) ने पीसफुल (शांतिपूर्ण) तरीके से रिव्योलूशन की बात की थी। बुश पर जूता फेंकना भी “पीसफुल” ही था। उसमें कहां बम, गोली, तलवार, छुरे का इस्तेमाल किया मैंने?

सवाल- मुंतज़र, बराक ओबामा और जॉर्ज बुश को एक ही जेल में बंद कर दिया जाये, तो आपका रवैया क्या होगा?

जबाब- ऐसा कभी नहीं हो सकता। इराक में महज़ हथियार उठाने भर तक पर सज़ा मुकर्रर कर दी जाती है, वे (अमेरिका) बम बरसाते हैं, तब भी कुछ नहीं होता।

सवाल- बुश पर जूता फेंकने से भी ज्यादा ज़िंदगी का कोई खास लम्हा?

जबाब- महात्मा गांधी की समाधी का दीदार। गांधी की समाधी पर आना।

सवाल- क्या दुनिया में विरोध के लिए जूता परंपरा लाने और जेल जाने पर अफसोस है।

जबाब- कोई और जूता न फेंके। आप किसी वाकये  को दोनो आंखों से देखें। जेल जाने का अफसोस बिलकुल नहीं है।

…जारी…

जरनैल के जूते के बाद उत्सव का चाकू

न्याय में देरी और पीड़ितों को समय से इंसाफ न मिलने पर कानून-व्यवस्था को हाथ में लेने का सिलसिला बढ़ा : जब आक्रोश चरम पर जाता है तो विस्फोट होता है. ऐसी ही एक विस्फोट आज चंडीगढ़ में हुआ. मीडिया वालों के बीच में खड़े और खुद को फोटोग्राफर दिखा रहे एक युवक उत्सव शर्मा ने हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौर पर चाकू से हमला कर दिया. उनके चेहरे पर तीन वार मारे. चेहरे से खून टपकने लगा. राठौर रुचिका गिरहोत्रा छेड़छाड़ मामले में अपनी अपील पर सुनवाई में शामिल होने के लिए अदालत आए थे. जिस युवक उत्सव शर्मा ने हमला किया है, वह खुद को पत्रकार के रूप में पेश करते हुए राठौर की तस्वीरें लेने की कोशिश कर रहा था. हमलावर उत्सव शर्मा अहमदाबाद से फिल्म निर्माण का प्रशिक्षण ले रहा है. उसने राठौर के गाल पर तो चाकू मारा ही, दाएं हाथ से दूसरे गाल पर घूंसे भी मारे. 

उसने राठौर की बांह पर भी हमले की कोशिश की लेकिन पुलिसकर्मियों ने उसे दबोच लिया. उत्सव भागने की भी कोशिश कर रहा था पर पुलिस वालों ने उसे गिरा लिया. अचानक हुए हमले से राठौर भौंचक रह गए. उनकी वकील पत्नी आभा उनके पीछे थीं. हमलावर युवक बनारस का रहने वाला है.

उत्सव का कहना है कि वह लड़कियों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ एक मुहिम चला रहा है. रुचिका के साथ राठौर ने जो किया, उसके कारण गुस्सा था, वह गुस्सा ही उसने राठौर पर उतारा है. उत्सव के मुताबिक वह वाराणसी में भ्रूण हत्या पर फिल्म डिजाइन का काम करता है. पुलिस का कहना है कि युवक की मानसिक स्‍थिति सही नहीं है. इस बात की पुष्‍िट उत्‍सव के पिता और उसके डॉक्‍टर ने भी कर दी है. उत्‍सव एक महीने से ही चंडीगढ़ में एक धर्मशाला में रह रहा था.

जो भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि देश की जनता सिस्टम के नाकारेपन से क्रोधित होकर अपने अंदाज में रिएक्ट करती है. जरनैल का जूता और उत्सव का चाकू बताता है कि अगर न्याय व्यवस्था में इसी तरह देरी बढ़ती रही और पीड़ितों को समय से इंसाफ नहीं मिलता रहा तो कानून-व्यवस्था को हाथ में लेने का सिलसिला बढ़ता चला जाएगा. उत्सव द्वारा चाकू मारने की घटना के बाद छेड़छाड़ मामले की चश्मदीद गवाह अनुराधा ने लोगों से कहा है कि वे कानून अपने हाथ में न लें.

जागरण ने एकतरफा फैसला दिया

मैं जरनैल सिंह को जानता हूं। जो कुछ उन्होंने किया, बेशक गलत था पर जिस प्रबंधन ने उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका, उसे कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। दैनिक जागरण प्रबंधन ने जहां तक संभव था, जरनैल का इस्तेमाल किया। जरनैल को याद होगा, जब वह जालंधर आए थे, विधानसभा चुनाव की कवरेज में। अकालियों के समर्थन में तैयार स्टोरी को किस दबाव में अकालियों के खिलाफ किया गया था, यह मैं भी जानता हूं। और जरनैल तो खैर भुक्तभोगी हैं ही। हम जिस पत्रकारिता में इन दिनों हैं, वहां फेस-वैल्यू सबसे अहम है। चिदंबरम की फेस-वैल्यू कांग्रेस आलाकमान ज्यादा मानता है। जब जरनैल ने चिदंबरम की ओर जूता उछाला था तो सन्न मैं भी रह गया था। पर, आप उसके बैकग्राउंड में जाकर देखें कि उसने ऐसा क्यों कर किया। बिना कारण जाने जरनैल को जो सजा मिली, वह उसके साथ ज्यादती है। सरकार ने तो कुछ नहीं किया, जागरण ने जरूर एकतरफा फैसला दे दिया। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता में अब शुचिता बची है। कहीं है भी, तो मैं नहीं देख पाता। संभवतः नेत्र रहते मैं अंधा हूं। पर, होती तो कहीं तो दिखती।

आनंद सिंहखबरों की मार्केटिंग पहले भी होती थी, अब भी हो रही है। बाजारवाद की लड़ाई में अब प्रबंधन नंगई पर उतर आया है। एक लाख का विज्ञापन देने वालों को डीसी, इससे ज्यादा का एड देने वालों को टीसी, चार कालम छापने का रिवाज हिंदी अखबारों में धड़ल्ले से है। मास्ट हेड तक बेचे जा रहे हैं। पर, जरनैल ने यह सब नहीं किया। वह शराबी नहीं हैं, कवाबी नहीं हैं। वह सिक्ख है, जो झुकना नहीं जानता, तलवे सहलाना नहीं जानता। उन्हें जूता फेंकने की क्या गरज थी, अगर वह सेटिंगबाज होते। जरनैल ने पत्रकारिता का जो विद्रूप रूप जागरण में देखा है, देश के अन्य अखबारों की हालत उससे भी भयावह है। पर, लोग हैं जो जरनैल को संभालेंगे। हां, बहस जरूर होनी चाहिए कि नंगेपन की यह कथा कब समाप्त होगी?

-आनंद सिंह

anandsinghsahara@gmail.com 


एक जूता तो तबीयत से उछालो यारो!

‘कौन कहता हैं कि राजनीति में उबाल नहीं आ सकता, एक जूता तो तबीयत से उछालो यारो!’ मुझे नहीं लगता की जरनैल सिंह ने जो भी किया, वह कुछ गलत था। पत्रकारिता का आज का स्तर पूरी तरह से गिर चूका है। चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। एक जूते के जरिए भारतीय राजनीति और भारतीय मीडिया को सबक सिखा दिया है जरनैल सिंह ने। हर शख्स को गर्व होना चाहिए। जरा वे अपने गिरेबान में झाकें जो पत्रकारिता को बाजार में बेचकर दलाली की दहलीज तक पहुंच गए हैं। अब पत्रकारिता बाजार में बिकती नजर आ रही है। अगर आप कोई खबर अपने तरीके से करने की सोचें तो वह बिलकुल नहीं हो सकता क्योंकि जिसके खिलाफ आप खबर करना चाहते हैं, उसकी ऊपर तक पहुंच है! अब वे दिन भूल जायें जब हम ईमानदारी की पत्रकारिता करते थे। अब ईमानदारी की सजा के रूप में नौकरी तक दांव पर लग सकती है।

जरनैल सिंह ने जो किया, मुझे लगता है वह सही था क्योंकि हर आदमी को अहसास होना चाहिए। उनको सजा मिलने से में सहमत नहीं हूं क्योंकि आज कलम की ताकत कम होती नजर आ रही है और मीडिया विश्वसनीयता खोती जा रही है। हमारे ही बीच के लोग हमारे काम को बदनाम कर रहे हैं। आज जो कुछ भी अखबारों में लिखा जा रहा है, उसका प्रभाव कम होता जा रहा है। जो कुछ टीवी पर परोसा जा रहा है, उसको तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है। आखिर क्यों नहीं हम खुलकर कोई खबर करने में अपना विश्वास और साहस रख पा रहे हैं। इसलिए दूसरों पर आवाज उठाने वालों को सोचना होगा कि पहले वह खुद को देखें और पत्रकारिता की आवाज बुलंद करने वाले उस शख्स को सलाम करें, ताकि पूरा देश पत्रकारिता की जलती मशाल से तप सके।

दीपक गंभीर

deepak.journalist@gmail.com


फालतू में शर्मिंदा नहीं होना

विकास कुमार
विकास कुमार
जरनैल सिंह ने जो सवाल उठाए हैं, वाजिब हैं और बडे़ ही गम्भीर हैं लेकिन मुझे लगता है कि यहाँ भी कुछ खास नहीं होगा। होगा वही, जो अभी तक होता आया है। हम सब अपने-अपने विचार लिखेंगे और एक-दूसरे को पढेंगे। लेकिन क्या हम पत्रकार एक साथ होकर कुछ कर सकते हैं? अगर नहीं कर सकते तो सब कुछ बेकार है। जरनैल सिंह ने एक साथ बहुत से सवाल उछाल दिए हैं और ये सारे वही सवाल हैं जो हर सभा और सेमिनार में वक्ता माईक के सामने उठाते रहे हैं और अपना समय खत्म होने पर अपनी जगह पर वापस लौट जाते रहे हैं। उन्होंने अपने आलेख में कहा है कि जूता फेंक कर अपराध किया लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि कोई अपराध किया है। अगर जूता चलाकर अपराध किया है तो मुम्बई कांड का सीधा प्रसारण करके महान पत्रकारों ने मीडिया के किस धर्म का पालन किया है? सैकड़ों ऐसे और भी उदाहरण भरे पड़े हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता कि उन्होंने पत्रकारिता का कुछ नुकसान किया है या अपने पत्रकार धर्म का पालन नहीं किया है। उन्हें फालतू में शर्मिंदा नहीं होना चाहिए। शर्मिन्दा तो उस संस्थान को होना चाहिए, जिसने साथ छोड दिया। अच्छा हो कि उन्होंने जो सवाल उठाएं हैं, उनका जबाव बड़े पत्रकार और सम्पादक भी अपनी समझ-बूझ से दें क्योंकि पत्रकारिता की दशा और दिशा उन्हीं ‘महान’ लोगों से तय हो रही है। हम जैसे नौसिखियों की क्या बिसात।

-विकास कुमार

v.kummar86@gmail.com 


कुछ न होने से, कुछ होना बेहतर

फौजिया रियाजजरनैल जी, आज वाकई पत्रकारिता बड़ी सस्ती हो गयी है। एक वक़्त था, जब न्यूज़पपेर्स की हेडलाइंस और ब्रेकिंग न्यूज़ की खबर लोगों को बुरी तरह झिंझोड़ देती थी पर अब जिस तरह पत्रकार की आज़ादी और उसकी समझ को मज़ाक समझा जाता है उसी तरह जनता भी पत्रकारिता को मज़ाक समझने लगी है। इसमें दोष जनता का नहीं, बल्कि कमज़ोर पत्रकारिता का है। आपने कहा है कि जो आपने किया, वह ज्यादा गलत है या जो पत्रकारों से करवाया जा रहा है, वह? वैसे तो सही और ग़लत की कोई परिभाषा नहीं होती पर जो दिल को सही लगे, जो अंतरात्मा को सही लगे और जिसमें लोगों की भलाई हो, वह सही होता है। अगर उस दिन भावनाओं में बह कर आपका जूता न चलता तो जगदीश टाइटलर लोकसभा इलेक्शन से बाहर का रास्ता न देखते। जो हुआ, वह हजारों सिखों के खून का हिसाब तो नहीं चुका सकता पर कुछ न होने से कुछ होना बेहतर है। लोग भड़के तो सरकार ने मामले की नजाकत को समझा तो। चलो, कुछ तो हुआ।

-फौजिया रियाज़

fauziya.reyaz08@gmail.com