आफिस में ईद : यूं लौटी सोहैब के चेहरे की रौनक

भड़ास4मीडिया पर एक अनाम मुस्लिम मीडियाकर्मी की पीड़ा ‘मीडिया हाउसेज में ये कैसी सांप्रदायिकता’ और उस पर उदयशंकर खवारे का गरमागरम पलटवार ‘मीडिया को सांप्रदायिक कहने वाला खुद सांप्रदायिक’, दोनों पढे़। लगा, दोनों ही अतिशय मानसिकता से भरे हैं। दोनों ही गलत हैं। ईद के दिन जिस छुट्टी को लेकर ये बहस-मुबाहिशा शुरू हुआ, उसी दिन भोपाल स्थित हमारे दफ्तर (राज एक्सप्रेस) में एक सुगंध बांटने वाला वाकया हुआ, जो  हम पत्रकार साथियों को नई बात बताता-सा लगता है। यकीनन इस पर भी कुछ लोगों की नजरें टेढी हो सकती हैं। मगर इसे पढ़ते वक्त अपने मन में निर्मलता, ह्दय में विशालता और सोच में पत्रकारिता वाली निष्पक्ष मानसिकता रखिएगा… आपको पूरा वाकया जरूर अच्छा लगेगा।

‘मीडिया को सांप्रदायिक कहने वाला खुद सांप्रदायिक’

मीडिया हाउसेज में यह कैसी सांप्रदायिकता‘ पढ़कर सबसे ज्यादा गुस्सा यशवंतजी पर ही आया कि पता नहीं आखिर बिना नाम के पत्र को वो क्यों प्रकाशित करते है. पता नहीं इसमें किसका हक़ मारा जाता है, कम से कम यशवंत जी को तो समझना चाहिए की जो व्यक्ति अपना नाम सामने रखने से डरता हो उसके विचार क्या क्रांति लायेंगे. चलिए जो भी हो, परन्तु ये सवाल जो उस व्यक्ति ने उठाया है, वो पूरी तरह से गलत है. मैं दावे के साथ कह सकता हूं की जिस व्यक्ति ने देश की मीडिया को साम्प्रदायिक कहा है, वो खुद ही सबसे बड़ा साम्प्रदायिक है. मैं एक घटना बताता हूं. मेरे एक मित्र हैं, नाम है ….आलम, मीडिया से ही जुड़े हैं और दिल्ली में हैं.

मीडिया हाउसेज में यह कैसी सांप्रदायिकता?

ईद के दिन यह पत्र भड़ास4मीडिया के एक पाठक ने भेजा। उन्होंने अपना नाम व पहचान उजागर न करने का अनुरोध किया है। वे पत्रकार हैं। उनकी अपनी पीड़ा है। वे चाहते हैं कि उनकी बात भड़ास4मीडिया पर जरूर छपे। वे मीडिया हाउसेज के बासेज से कुछ कहना चाहते हैं। सवाल उठाना चाहते हैं। अगर लगे कि उनका सवाल जायज है तो उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। -एडिटर, भड़ास4मीडिया