भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग तीन)

: अलास्का के आवारा रास्तों पर : रेगिस्तान, समंदर और शहर-दर-शहर आवारगी : ”रेगिस्तान कभी भी सुखदायी जगह नहीं रहा, मगर इसका रूप हमेशा से जोगियों की तरह संवेदनशील साधारणता ओढे हुए, रहस्यों को उजागर करनेवाला और अभीभूत कर देने वाले सौंदर्य का अजनबी सा चेहरा लिए रहता है, जिसे देखने पर ही यह महसूस होता है कि यह जगह धरती पे नहीं, कहीं और है।

कहीं कुछ यहां छिपा नहीं रहता, सब उजागर दिखता है। चारों तरफ फैला उजाला और आकाशीय विस्तार, सूखा-सूखा सा गतिमय माहौल, अधिक तापमान और हवाएं दिलो-दिमाग को झकझोरती रहती हैं। रेगिस्तान का घुमावदार आकाश विशाल होने के साथ-साथ डरावना होता है।  अन्य जगहों पर आकाश का घेरा क्षितिज के बाद धुंधला होने लगता है लेकिन रेगिस्तान में यह अनन्त विस्तार लिए होता है। इतना विस्तार जंगल के ऊपर के आकाश का भी नहीं होता। बिना किसी रुकावट के दिखता बादलो से भरा खुला आकाश इतना विशाल कि कभी-कभी दूर पृथ्वी की सतह की गोलाई घूमती हुई नीचे की तरफ जाती महसूस होती है। रेगिस्तान का यह पैराबोलिक सौंदर्य यहां की जमीन के साथ बादलों को प्राचीन इमारत सा सुंदर रूप देता है। इसी रेगिस्तान से होकर कितने पैगम्बर और सन्यासी अपने-अपने मंजिल की ओर गए। धर्मों को स्थापित करने वाले नेताओं ने दुनिया छोड़कर यहां आने के अध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया, दुनिया से पलायन करने के लिए नहीं बल्कि सत्य की खोज के लिए।” -पॉल शेफर्ड की पुस्तक मेन इन दी लैंडस्केपः ए हिस्टोरिक व्यू ऑफ दी एस्थेटिक्स ऑफ नेचर से उद्धृत

माजेव रेगिस्तान के अलग-थलग कोने में एक जंगली फूल, आर्कटॉमेकॉन केलिफोमिका, खिलता है जो दुनिया में और कहीं नहीं मिलता। बसंत के आखिर में कोमल और सुनहले रंग का यह आकर्षक फूल इस रेगिस्तान में खिलता है, लेकिन बाकी मौसम की सूखी जमीन पर यह फूलों से रहित घनी झाड़ियों के रूप में किसी की नजर को आकर्षित नहीं करता। कैलिफोमिका का यह फूल इतना दुर्लभ है कि इसे खत्म होती पौधे की प्रजाति के रुप में चिह्नित किया गया है।

मैकेंडलेस के अटलांटा छोड़ने के लगभग तीन महीने से ऊपर हो चुके थे। अक्टूबर 1990 को संघीय सरकार ने  नेशनल पार्क सर्विस के एक रेंजर बुड वॉल्श को ‘लेकमीड नेशनल रिक्रिएशन एरिया’ के देहाती इलाके में इसी कैलिफोमिका को खोजने भेजा गया ताकि यह जाना जा सके कि यह फूल कितना दुर्लभ है। कैलिफोमिका जिप्सम वाली मिट्टी मे उगता है जो लेक मीड के दक्षिणी किनारे पर प्रचुर मात्रा में मिलता है। इसलिए वाल्श अपनी टीम को लेकर उधर ही गया। टेम्पल बार रोड से होते हुए डेट्रिटल वाश की तरफ दो मील आगे जाने पर वाल्श और उसकी टीम ने झील के किनारे अपनी गाड़ियां खड़ी की और आगे उजले जिप्सम वाले पूर्वी किनारे के ढलान की ओर सब धीरे-धीरे संभलकर उतरने लगे। कुछ मिनट बाद जैसे ही वे किनारे को नजदीक गए, एक रेंजर की नजर किसी चीज पर पड़ी, जिसे देखकर उसकी सांसे थम सी गई। वह चिल्लाया, “ यहां देखो, नीचे देखो, यह कौन सी चीज है??”

घनी झाड़ियों के बीच सूखी नदी के किनारे पर एक बड़ा सा सामान गहरे भूरे रंग के प्लास्टिक के नीचे छिपाया हुआ था। जैसे ही रेंजरों ने प्लास्टिक हटाया, वहां एक पुरानी सी पीले रंग की बिना लाईसेंस प्लेट की डॉटसन कार खड़ी थी। उस कार पर एक कागज चिपका था, जिसपर लिखा थाः ‘यह बेकार चीज यहां छोड़ दिया गया है। जिसे भी यह मिले वह इसे शौक से ले जा सकता है।‘

कार का दरवाजे का ताला खुला था। उसकी नीचले सतह पर कीचड़ भर चुका था। अंदर झांकने पर वाल्श को एक गिटार, एक सॉसपेन में रखा 4.93 डालर खुदरा, एक फुटबॉल, पुराने कपड़े से भरा एक बैग, एक फिशिंग रॉड, एक इलेक्ट्रिक रेजर, एक हार्मोनिका, पच्चीस पौंड चावल और गाड़ी की चाबी मिली।

रेंजरों ने और किसी संदिग्ध चीज की खोज में आसपास छान मारा और वहां से सब चले गए। कुछ दिनों बाद एक रेंजर आकर कार को बिना किसी परेशानी के स्टार्ट कर टेम्पल बार के नेशनल पार्क सर्विस मैंटेनेंस यार्ड तक ले आया। बुड वाल्श ने उस वाकये को याद करते हुए कहा कि गाड़ी को साठ मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ाता हुआ वह रेंजर ले आया और बोला ‘यह गाड़ी तो चैंपियन की तरह चलती है’।

यह जानने के लिए कि यह कार किसकी है, रेंजरों ने सभी कानूनी एजेंसियों को सूचना भेज दिया और साउथवेस्ट के सभी कम्प्यूटर रेकार्डों को खंगाल डाला, यह देखने के लिए कि यह डॉटसन कार किसी अपराध से तो नहीं जुड़ा था। लेकिन कुछ पता नहीं चला।

कार के सीरियल नंबर से इसके असली मालिक हर्ट्ज तक रेंजर पहुंच गए लेकिन हर्ट्ज ने कहा कि बहुत बार इस्तेमाल हो चुकी इस कार को बहुत साल पहले उसने किसी को बेच दिया था और अब उसमें उन्हें कोई रुचि नहीं है। वाल्श ने गर्व से इस कार को याद करते हुए कहा, “इस बेहतरीन कार का उपयोग हमलोग अगले तीन साल तक ड्रग तस्करों को पकड़ने के लिए अंडरकवर के रुप में करते रहे और इसने गजब का काम किया। इस डॉटसन कार की मदद से पार्क सर्विस कई ड्रग तस्करों को पकड़ने में कामयाब रही। यह कार आज भी अच्छा माईलेज देती है। थोड़े से इंधन में दिन भर चलती है। और इतनी अच्छी कार का मालिक होने का दावा करने कोई नहीं आया तो मुझे आश्चर्य हुआ।“

वह डॉटसन कार क्रिस मैकेंडलेस की थी। अटलांटा से पश्चिम की ओर निकलने के बाद, ऑफरोड ड्राईविंग ना करने की चेतावनी वाले होर्डिंग को नजरअंदाज करते हुए इमर्शन हाई की चढाई पर कार चलाते हुए 6 जुलाई 1990 को वह लेक मीड नेशनल रिक्रिएशन एरिया में पहुंचा था। मैकेंडलेस अपनी कार को रास्ते पर से उतार कर अंदर दो मील तक रेतीले रिवरबेड पर चलाते हुए लेक के दक्षिणी किनारे तक ले गया। दूर तक फैला किनारे का य़ह खाली रेगिस्तान 120 डिग्री फारेनहाईट तापमान में तपकर गर्म था। इधर-उधर किधर से भी निकल जाने वाली गिरगिटों से भरे उस रेगिस्तान में मैकेंडलेस अपना छोटा टेंट टेमेरिस्क पेड़ की छांव में लगाकर इस नयी आजादी का मजा लेने लगा।

डेट्रिटल वाश का रेगिस्तान, लेक मीड से पचास मील के दायरे में किंगमेन के पहाड़ों तक फैला है और साल मे अधिकांश दिन सूखा पड़ा रहता है। गरमी के मौसम में फटी धरती से तपती हवाएं ऊपर की तरफ केतली से उबलते हुए भाप की तरह तेजी से उठती है। यही हवाएं ऊपर उठकर गठीले, हथौड़े की तरह सख्त दिखने वाले गहरे भूरे बादल बनकर मोजेव के आसमान में तीस हजार फीट से ऊपर उठ जाते हैं। मैकेंडलेस के लेक मीड में आने के दो दिन बाद, दोपहरी में घने काले बादल पूरे डेट्रिटल घाटी में घनघोर पानी बरसाने लगे। मैकेंडलेस का कैंप कुछ फीट ऊंचाई पर था इसलिए जब तक भूरे पानी की तेज और ऊंची धारा उसके टैंट को बहा ले जाती, वह अपना सामान समेट चुका था। कार को चलाने के लिए अब कोई जगह नहीं बची थी क्योंकि अब सिर्फ एक ही रास्ता दिख रहा था, वह था पानी से लबालब बहती हुई नदी। पानी की बाढ में इतनी ताकत नहीं थी कि वह कार को बहा ले जाती या कोई नुकसान पहुंचाती। लेकिन ईंजन को यह गीला कर चुकी थी। मैकेंडलेस ने इसे स्टार्ट करने की बहुत कोशिश की लेकिन बैटरी खत्म हो गई, ईंजन ने साथ नहीं दिया। बैटरी के खत्म होते ही अब कोई संभावना नहीं थी कि डॉटसन आगे जा सके। अगर उसे कार को वापस सड़क तक लाना होता तो उसे पैदल चलकर पहले अधिकारियों से सूचित करना पड़ता। लेकिन रेंजरों के पास अगर वह जाता तो उसे सवालों का सामना करना पड़ता, जैसे कि वह नियम को तोड़कर उस दिशा में क्यों गया, जिधर न जाने की हिदायत रास्ते किनारे लिखी हुई थी। उसके कार का रजिस्ट्रेशन दो साल पहले एक्सपायर हो चुका था। रेंजर पूछ सकते थे कि रजिस्ट्रेशन का रिन्यूअल उसने क्यों नहीं कराया। उसका ड्राईविंग लाईसेंस भी एक्सपायर हो चुका था और गाड़ी का इंश्योरेंस भी नहीं था। अगर वह रेंजरों को सही जबाब देता तो परेशानी में पड़ सकता था। मैकेंडलेस अगर उन्हें समझाने की कोशिश करता कि उसने किसी बड़े नैतिक शक्ति द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करते हुए सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों को तोड़ा है जैसा कि उसने थोरो के निबंध ‘ऑन दी ड्यूटी ऑफ सिविल डिसऑबिडिएंस’ से सीखा था, तो फेडरल सरकार के अधिकारी शायद ही उसकी बातें समझ पाते और उसे लाल फीतशाही का सामना करते हुए दंड भुगतना पड़ता। उसके माता-पिता से भी संपर्क किया जाता। और इन सबसे बचने के लिए मैकेंडलेस के पास एक ही रास्ता था कि डॉटसन को वहीं छोड़कर वह आगे की आवारगी पैदल ही करे। उसने यही किया।

इन सब घटनाओं को देखकर मैकेंडलेस परेशान होने के बदले और खुश हुआ क्योंकि यह अच्छा अवसर था कि वह सारे गैरजरुरी चीजों को वहीं रेगिस्तान में छोड़ दे। उसने कार को अच्छी तरह से भूरे प्लास्टिक से ढंक दिया और उसका नंबर प्लेट खोलकर छिपा दिया। उसने अपनी विंचेस्टर रायफल और कुछ चीजों के जमीन के नीचे दबा दिया ताकि बाद में उसे निकाल सके। उसके बाद उसने ऐसा काम किया जिससे थोरो और टॉल्सटॉय दोनों खुश होते। उसने अपने सारे पैसे में आग लगा दिया और कुछ ही पल में 123 डॉलर का कागज राख हो चुका था।

ये सभी बातें उस डायरी से पता चली जिसमें मैकेंडलेस सारी घटनाओं को लिखा करता था और जिसे उसने अलास्का जाने से पहले वायन वेस्टरबर्ग के पास कार्थेज में सुरक्षित रखने के लिए छोड़ दिया था। सुबूत से ये साबित होता है कि डायरी में उसने बिल्कुल सच लिखा था औऱ सच को मैकेंडलेस काफी गंभीरता से लेता था।

बचे हुए सामान को बैग में डालकर मैकेंडलेस 10 जुलाई 1990 को लेक मीड की तरफ चल पड़ा। मैकेंडलेस ने अपनी डायरी में लिखा कि यह उसने बहुत बड़ी गलती की क्योंकि गर्मी अपने चरम पर थी और उसे लू लग गई। फिर भी उसने कुछ नाविकों को रोकने में सफलता पायी, जिन्होंने उसे कालविले की खाड़ी तक लिफ्ट दिया। उसके बाद वह अपना अंगूठा उठाकर सड़क पर फिर निकल पड़ा। मैकेंडलेस दो महीनों तक पश्चिम की तरफ आवारगी करता रहा। उधर के लैंडस्केप के सौंदर्य पर वह काफी मुग्ध था। जगह-जगह उसे अपनी तरह के आवारे मिलते रहे और उनके साथ वह आनंद उठाता रहा। लेक ताहो तक वह लिफ्ट लेकर गया। आगे सियरा नेवाडा तक पैदल चलते हुए उत्तर की ओर पैसिफिक क्रेस्ट सेंट्रल तक के पहाड़ों में वह घूमता रहा, उसके बाद फिर से सड़क पर आ गया। जुलाई के अंत में वह एक आदमी की गाड़ी से सफर कर रहा था जो खुद को क्रेजी ईर्नी कहता था। उसने मैंकेडलेस को उत्तरी कैलिफोर्निया के एक रैंच में नौकरी का प्रस्ताव दिया। वहां एक खंडहरनुमा मकान था जिसके इर्द-गिर्द बकरियां और मुर्गे, गद्दे, टूटे टेलीविजन, पुराने सामान और कचरों का अंबार दिखता था। छह और आवारों के साथ मैकेंडलेस वहां ग्यारह दिन तक काम करता रहा लेकिन जल्द ही उसे लग गया कि क्रेजी ईर्नी उसे ये काम करने के एक पैसे नहीं देगा तो उसने वहां से एक लाल साईकिल चुराई और चलता बना। चिको तक वह साईकिल से आया और एक मॉल की पार्किंग मे साईकिल को छोड़कर फिर से उसने आगे की आवारगी, उसी तरह लिफ्ट मांगने के लिए अंगूठा खड़ा करते हुए लगातार करता रहा। उत्तर और पश्चिम से होते हुए वह रेड ब्लफ, वीवरले और विलो क्रीक से गुजरा। कैलिफोर्निया के आर्कटा और पैसिफिक क्षेत्र के किनारे से होते हुए मैकेंडलेस यूएस हाईवे 101 तक आया और समुद्री किनारे की ओर चलता रहा।

ओरेगॉन लाईन के साठ मील दक्षिण में ओरिक शहर के पास एक पुराने वैन में घूमते रबरट्रैंप आवारे जोड़े की नजर सड़क किनारे झाड़ियों में बैठकर कुछ खोजते एक लड़के पर पड़ी। जेन अपने ब्वाय फ्रेंड बॉब के साथ वैन में बैठी थी।

“उसने एक लॉंग शर्ट और बेकार सी टोपी पहन रखी थी। उसके हाथ में पौधों के बारे में लिखी गई एक किताब थी जिसमें देख-देखकर वह एक गैलन में खाने लायक बेरी के फल जमा कर रहा था। वह बहुत परेशान दिख रहा था इसलिए मैने उसे पुकारकर पूछा कि वह उनके साथ कहीं जाना चाहेगा गाड़ी में। हमने सोचा कि उसे हम कुछ खाने को दे सकते हैं।“ चालीस पार कर चुकी रबरट्रैंप जेन ये बातें बता रही थी। “उसने हमसे बात करनी शुरु की। वह बहुत अच्छा था। उसने अपना नाम एलेक्स बताया। वह बहुत समय से भूखा था लेकिन उसके चेहरे से सच्ची खुशी छलक रही थी। उसने बड़े गर्व से बताया कि वह किताब से खोज-खोजकर खाने लायक फलों के खाकर जी रहा  है। वह सच में इस बात पर काफी खुश था। उसने बताया कि वह देश में एक साहसिक यात्रा करने के लिए आवारगी कर रहा है। उसने अपने कार को छोड़ने से लेकर पैसे जलाने तक की सारी दास्तां हमसे कही। मैने जब उससे पूछा कि तुम ऐसा क्यों कर रहे हो तो उसका जबाब था कि उसे पैसे की जरुरत नहीं है।“

जेन ने बताया कि एलेक्स की उम्र का ही उसका एक बड़ा लड़का था जो अब उससे अलग रहता है I इसलिए उसने बॉब से कहा, “इस बच्चे को वह अपने साथ रखेंगे, तुमको इसे कुछ सिखाना पड़ेगा, जीवन जीना।“

“एलेक्स हमारे साथ ओरिक बीच तक आया और हमारे साथ कैंप मे एक सप्ताह तक रुका। वह सच में बहुत अच्छा था। हमने उसके लिए सपने बुने थे। जब हम अलग हो रहे थे तो हमें आशा नहीं थी वह हमसे फिर कभी मिलेगा लेकिन उसने संपर्क में रहने का वादा किया। अगले दो साल तक एलेक्स हमें एक-दो महीने पर पोस्टकार्ड लिखता रहा।“

ओरिक से मैकेंडलेस समुद्री किनारे की तरफ आगे बढता रहा। पिस्टल नदी पारकर, कूस बे, सील रॉक, मंजानिटा, एस्टोरिया; होकियम, हम्पट्युलिप्स; क्वीट्स, फार्क्स, पोर्ट एंजेल्स, पोर्ट टाउनसेंड से गुजरते हुए सिएटल में उसने आवारगी की। जेम्स जॉयस के उपन्यास ‘आर्टिस्ट एज ए यंग मैन’ के कैरेक्टर स्टीफन डेडलस की तरह मैकेंडलेस अकेला था। जॉयस लिखते हैं, “वह अकेला था। उसपर कोई ध्यान नहीं देता था लेकिन वह खुश था और दिल से आवारा। वह बिल्कुल अकेला था। जवान और दृढ ईच्छाशक्ति वाला। समुद्री किनारे के नमकीन लहरें, आवारा हवाओं, सीपों और भूरे रंग के सूरज के रौशनी के बीच तन्हा।“

जेन और बॉब से मिलने से ठीक पहले दस अगस्त को विलो क्रीक के पास यूरेका के पूर्व की तरफ, लिफ्ट लेकर चलने के जुर्म में मैकेंडलेस को एक अधिकारी ने पकड़ लिया। जब अधिकारी ने उससे स्थाई पता के बारे में पूछा तो उसने घर का असली पता दे दिया। अगस्त के अंत तक वाल्ट और बिली के मेलबॉक्स में दंड का पैसा भुगतान करने की चिट्ठी पड़ी थी।

वाल्ट और बिली क्रिस के गायब हो जाने के बाद बहुत चिंतित थे। उन्होंने अन्नाडेल पुलिस को सूचित किया था लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जब कैलिफोर्निया से दंड वाली चिट्ठी आई तो उनको अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रहा। वाल्ट का एक पड़ौसी यूएस डिफेन्स इंटेलीजेंस एजेंसी में निदेशक था। वाल्ट उस आर्मी जेनरल से सलाह लेने के लिए गया। जेनरल ने उसे एक प्राईवेट इन्वेस्टीगेटर पीटर कालित्का से मिलाया, जो डिफेंस एजेंसी और सीआईए दोनों के लिए काम करता था। जेनरल ने वाल्ट को भरोसा दिलाया कि अगर क्रिस वहां होगा तो पीटर उसे खोज निकालेगा।

उस चिट्ठी के सहारे पीटर ने मैकेंडलेस को वीलो क्रीक से खोजना शुरु किया लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा। दिसम्बर में पीटर को टैक्स रेकार्ड से पता चला कि क्रिस ने अपना सारा पैसा ऑक्सफैम को दे दिया है।

वाल्ट ने बताया, “इस बात ने हमें डरा दिया कि उस वक्त तक क्रिस के बारे में हमें कुछ भी पता नहीं चला। उसको डॉटसन कार से इतना प्यार था कि मुझे यकीन नहीं हो रहा कि वह उसे कहीं पर छोड़कर पैदल चल देगा। लेकिन मुझे आश्चर्य नहीं होना चाहिये था क्योंकि पीठ पर जितना लादकर चल सकें, उतना ही सामान क्रिस हमेशा अपने पास रखना चाहता था।“

पीटर क्रिस को कैलिफोर्निया में खोज रहा था लेकिन वह तो वहां से काफी दूर कास्केड रेंज से होते हुए पूरब की तरफ कोलम्बिया के नदी बेसिन के लावा भरी सतहों और झाड़ियों भरे उच्च भूमि होते हुए मोन्टाना पहुंच चुका था। वहीं कटबैंक के पास उसे वायन वेस्टरबर्ग मिला था और सितम्बर तक कार्थेज में उसके साथ काम कर रहा था। जब वेस्टरबर्ग को जेल हुई तो वहां का काम रुक गया। जाड़े की दस्तक हो चुकी थी इसलिए मैकेंडलेस अब गर्म जलवायु वाले जगह की ओर चल पड़ा।

28 अक्टूबर 1990 को एक ट्रक से वह कैलिफोर्निया के नीडल्स पहुंचा। वहां कोलोराडो नदी के पास पहुंचकर मैकेंडलेस बेहद खुश था। यह बात मैकेंडलेस ने अपने डायरी में नोट किया। उसके बाद वह हाईवे पकड़कर दक्षिण मे रेगिस्तान की तरफ चलना शुरु किया। बारह मील धूल भरे रास्ते से चलने के बाद क्रिस एरिजोना के टोपोक पहुंचा। टोपोक शहर में सेकेंडहेंड डोंगी(छोटी नाव) को बिकते देखकर उसने अचानक भावावेग से उसे खरीदने की सोची, जिससे उसने कोलारोडो नदी से चार सौ मील दक्षिण मैक्सिको के बार्डर से होते हुए कैलिफोर्निया की खाड़ी तक जाने की योजना बनाई।

नदी के नीचले फैलाव में हूवर डैम से खाड़ी तक के रास्ते में टोपोक से 250 मील बाद ग्रैंड कैनयन से तेज और अनियंत्रित लहर फूटती थी। नहरों और बांधो से कमजोर हो चुकी कोलोराडो नदी इस महाद्वीप के कुछ बेहद गर्म और दिखने में साधारण प्रदेशों से होकर धीरे-धीरे गुजरती थी। मैकैंडलेस इस लैंडस्केप की सादगी भरे सौंदर्य से बहुत आह्लादित था। रेगिस्तान के सूखी वादी और क्षितिज से आती साफ रौशनी में उसकी आवारगी ने उसके अंदर जीवन के उस आनंद भरे दर्द को बढा दिया था, जो उसे आगे का रास्ता दिखा रहा था।

टोपोक से दक्षिण हावासू झील के साफ, विशाल और सूने आकाश के गुंबद के नीचे वह अपनी डोंगी में चला और रास्ते में कोलोराडो की एक सहायक नदी बिल विलियम्स में थोड़ी दूर आवारगी की। उसके बाद कोलोराडो रीवर इंडियन रिजर्वेशन, किबोला नेशनल वाईल्डलाईफ रिफ्यूज, इंपेरियस नेशनल वाईल्डलाईफ रिफ्यूज होते हुए वह कैक्टस भरे रेगिस्तान और क्षारीय प्लेन को पीछे छोड़ते हुए, एक बहुत पुराने पत्थर के नीचे अपना कैंप जमाया। दूर नुकीली चोटियों वाले भूरे रंग के पहाड़ों की कतार पानी की सतह पर तैरता महसूस हो रहा था। एक दिन नदी से दूर जंगली घोड़ों के साथ रेस लगाते हुए मैकेंडलेस को यूएस आर्मी द्वारा प्रतिबंधित क्षेत्र यूमा प्रोविंग ग्राउंड का साईनबोर्ड दिखा। चेतावनी की बिल्कुल परवाह न करते हुए वह नवंबर के अंत में यूमा को डोंगी से पारकर रुका और वायन वेस्टरबर्ग को ग्लोरी हाउस, सिऔक्स फाल्स के पते पर एक पोस्टकार्ड लिखा जहां वेस्टरबर्ग अपना समय बिता रहा था।

कार्ड में लिखा थाः- ‘ हे! वेस्टरबर्ग! कैसे हो। आशा करता हूं कि तूम पहले से अच्छे होगे। मैं एरीजोना में एक महीने से आवारगी करता रहा। बहुत सुंदर जगह है। बहुत बढिया जलवायु और सुंदर प्राकृतिक दृश्यों से भरा। इस चिट्ठी का उद्देश्य तुम्हें आभार कहना है, तुम्हारे अच्छे व्यवहार के लिए। तुम्हारे जैसे अच्छे स्वभाव का उदार आदमी मिलना मुश्किल है। कभी-कभी लगता है कि तुमसे ना मिलता तो अच्छा रहता क्योंकि तुम्हारे पास रहके कमाए गए इतने पैसे के साथ आवारगी करने में बड़ी आसानी सी महसूस होती है। जबकि मुझे वो दिन ज्यादा मजेदार लगते थे जब मेरे पास एक भी पैसा नहीं था और मुझे एक वक्त के भोजन के लिए संघर्ष करना पड़ता था। लेकिन एरीजोना में बिना पैसे के खाना मिलना मुश्किल था क्योंकि यहां फलों की खेती बहुत कम है आजकल। केविन को धन्यवाद देना उसके दिए गर्म कपड़ों के लिए जिसके बगैर मैं सर्दी में जमकर मर जाता। मुझे लगता है कि केविन ने तुमको वार एंड पीस किताब दी होगी। जरुर पढना, ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि तुम उच्च नैतिक चरित्र वाले आदमी हो। वार एंड पीस प्रतीकों से भरी काव्यात्मक किताब है। इसमें ऐसी बातें लिखी हैं, जिसे तुम समझोगे। ऐसी बातें जिसे सामान्यतः लोग समझ नहीं पाते। मैं कुछ दिन और इस तरह की आवारगी भरी जिंदगी जीउंगा। इस तरह की आजादी और सादगी भरा जीवन मैं छोड़ नहीं सकता। एक दिन मैं तुम्हारे पास लौटूंगा वायन और तुम्हारे दयालुता के बदले कुछ तुम्हारे लिए भी करना चाहूंगा। तब तक तुम हमेशा मेरे दोस्त रहोगे। गॉड ब्लेस यू।‘

2 दिसम्बर 1990 को वह मैक्सिकन बार्डर के पास मोरेलोस डैम तक पहुंचा। कोई परिचय पत्र ना होने के कारण उसे भय था कि उसे आगे जाने नहीं दिया जाएगा, इसलिए डैम के खुले फ्लडगेट से होते हुए वह निकल गया। एलेक्स ने तेजी से चारों तरफ देखा कि किसी ने उसे देख तो नहीं लिया। लेकिन “मेक्सिको में यह गैरकानूनी प्रवेश किसी की नजर में नहीं आया। एलेक्जेंडर बहुत खुश था“, एलेक्स ने डायरी में लिखा।

यह खुशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी। मोरेलोस डैम के बाद नदी से सिंचाई की कई नहरें फूटती थी और मैकेंडलेस उसमें रास्ता भटक गया। नहरें कई तरफ जाती थी और एलेक्स यह देखकर हतप्रभ था। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। तभी उसका सामना कुछ कैनाल अधिकारियों से हुआ जिसने बताया कि वह दक्षिण में कैलिफोर्निया की तरफ नहीं बल्कि पश्चिम में बेजा पेनिनसिला की तरफ जा रहा था। एलेक्स हताश हो गया। उसने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि कैलिफोर्निया की खाड़ी की तरफ जाने के लिए कोई ना कोई रास्ता जरुर होना चाहिए। अधिकारी एलेक्स को इस तरह देख रहे थे जैसे वह पागल हो। लेकिन तभी मैप के ऊपर पेंसिल के साथ सभी ये जानने के लिए जुटे कि क्या सच में ऐसा कोई रास्ता हो सकता था। दस मिनट के बाद उन्होंने एलेक्स को एक रास्ता सुझाया जो उसे कैलिफोर्निया के समंदर की तरफ ले जा सकता था। आशा जगते ही एलेक्स के अंदर वापस आनंद फूट पड़ा।

मैप के अनुसार नहर में वह कुछ पीछे लौटा और कैनाल डे इंडिपेंडेसिया पकड़कर पूर्व की ओर गया। मैप में वह कैनाल,  वैल्टेको कैनाल से जा मिलता था जहां से दक्षिण की तरफ जाने वाला हर रास्ता समंदर तक ले जाता था। लेकिन, उसकी सारी आशा मिट्टी में तब मिल गई जब नहर जाकर दलदली झाड़ियों से भरे क्षेत्र के बीच में जाकर खत्म हो गई। एलेक्स ने पाया कि वह जगह कोलोराडो नदी का सूख रहा रिवरबेड है। मैप में उस क्षेत्र में आधा मील आगे एक और नहर था जहां तक जाने में मैकेंडलेस को तीन दिन लग गए।

एलेक्स ने अपनी डायरी में लिखाः- “आखिर में एलेक्स ने वाल्टेको कैनाल को खोज ही लिया। उसमें अपनी डोंगी उतार वह दक्षिण की तरफ चल पड़ा। उसकी डर और चिंता और बढने लगी जब आगे नहर छोटी होती जा रही थी। मेक्सिको के स्थानीय लोगों ने एलेक्स को वहां के बैरियर से आगे जाने में मदद की और एलेक्स ने मेक्सिकन्स को अमेरिकन से ज्यादा दोस्ताना और सेवाभाव वाला पाया।“

लेकिन 9 दिसम्बर 1990 को फिर उसने लिखा- ‘सारी आशाएं समाप्त हो चुकी हैं। यह नहर भी समंदर में न जाकर एक दलदल से भरे जंगली झाड़ियों वाले जगह में खत्म हो गई। एलेक्स संकट से घिर चुका है। उसने तय किया कि समंदर तक जाने का रास्ता तो खोजना ही है। एलेक्स दिन भर डोंगी को झाड़ियों और दलदल के बीच खींचता रहा लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। उसे थोड़ी सी सूखी जमीन मिली जहां उसने अपना कैंप लगाया। अगले दिन, 10 दिसंबर 1990 को एलेक्स फिर से समंदर को खोजने में लगा लेकिन भ्रमित होकर दिन भर एक गोले में चक्कर लगाता रहा। पूरी तरह निराश और हताश एलेक्स दिन के खत्म होने पर डोंगी के बगल में बैठा रोने लगा।  लेकिन तभी मेक्सिकन डक(बत्तख) शिकारी उधर से गुजरे। एलेक्स ने उनसे अपनी कहानी कही और समंदर तक पहुंचने की बात भी कही। शिकारियों ने कहा कि उधर से समंदर की तरफ जाने का कोई रास्ता नहीं था। फिर उनमें से एक शिकारी, एलेक्स को अपने बेसकैंप से समंदर तक पहुंचाने को राजी हो गया। यह चमत्कार से कम नहीं था।‘

डक शिकारियों ने एलेक्स को मछुआरों के एक गांव एल गोल्फो डे सांता क्लारा पहुंचा दिया जो कैलिफोर्निया की खाड़ी के तट पर बसा था। वहां से मैकेंडलेस समंदर में फिर उतर गया और दक्षिण की तरफ जाते हुए खाड़ी के पूर्वी छोड़ तक पहुंच गया। वहां जाने के साथ ही वह और चिंतनशील हो गया। उसने हवाओं में उड़ते रेतों के गुंबद के चित्र, डूबते सूरज, समुद्री किनारे के घुमावदार अर्द्धवृताकार चित्र उसने खींचे। एलेक्स अब डायरी में विस्तार से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे नोट लिखने लगा। अगले एक महीने के अंदर उसने सौ से भी कम शब्द लिखे।

डोंगी चलाते-चलाते थकने के बाद 14 दिसम्बर को वह समंदर के किनारे डोंगी को घसीटते हुए उसे ऊंचे चट्टान की तरफ ले गया और उसने वहीं ऊपर के समतल और एकांत वाले हिस्से में अपना कैंप लगा दिया। वह दस दिन तक वहीं रहा। तेज हवाओं ने उसे उसी चट्टान के दूसरी तरफ के गुफानुमा जगह में जाने को मजबूर कर दिया और अगले दस दिनों तक वह वहीं जमा रहा। उसने ऩए साल को उत्तरी अमेरिका के 17000 वर्गमील में फैले रेतीले गुंबदों वाले विशाल दी ग्रेट डेजर्ट के ऊपर चमकते हुए पूर्णिमा के चांद को देखते हुए मनाया। एक दिन बाद वह फिर से समंदर में उतर पड़ा।

11 जनवरी 1991 को उसने अपनी डायरी में लिखा- “यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण दिन था।“ उस दिन कुछ दूर दक्षिण में जाने के बाद डोंगी को रेत के टीले से लगाकर दूर से आते ज्वारभाटा को देख ही रहा था कि एक घंटे बाद रेगिस्तान की तरफ से आती तेज हवाएं और समंदर में उठती तेज और ऊंची लहरों ने उसे फिर से समंदर में ला पटका। लहरें इतनी ऊंची और तेज थी कि ऐसा लगता था उसके छोटे डोंगी को निगल जाएगी। हवाएं और तेज हो चुकी थीं। गुस्से में आकर एलेक्स डोंगी को पतवार से पीटने लगा। एक पतवार टूटने के बाद उसे होश आया तो उसने खुद को शांत किया क्योंकि दूसरा पतवार भी अगर टूट जाता तो एलेक्स की कहानी वहीं खत्म हो जाती। बहुत जोर लगाने के बाद एलेक्स डोंगी को किनारे लगाने में कामयाब रहा और रेत पर गिर पड़ा। तब तक शाम ढल चुकी थी। एलेक्स ने सोचा कि अब डोंगी से किसी तरह मुक्ति पाकर वह उत्तर की तरफ जाएगा।

16 जनवरी को मैकेंडलेस ने उस मोटे चदरे से बनी डोंगी को एल गोल्फो डे सांटा क्लारा गांव के दक्षिण-पश्चिम में घास के ऊंचे टीले पर छोड़कर उत्तर की तरफ समंदर के रेगिस्तानी किनारे में पैदल निकल पड़ा। छत्तीस दिनों से उसने किसी से बात नहीं की थी। वह इतने दिन तक सिर्फ पांच पौंड चावल के सहारे और समंदर से मिले कुछ चीजों को खाते हुए जी गया। इसी बात ने क्रिस को आगे अलास्का की यात्रा पर बहुत कम राशन ले जाने की प्रेरणा दी। वह 18 जनवरी 1991 तक यूनाईटेड स्टेट्स के बार्डर पर था। वहां उसे सीमा अधिकारियों ने पकड़ लिया और बिना परिचय पत्र के चलने के जुर्म में जेल में डाल दिया। वहां उसने एक झूठी कहानी गढी और उस आधार पर एक दिन बाद छूट गया लेकिन उसका .38 कैलिबर रिवाल्वर वहीं ले लिया गया, जिससे एलेक्स को बहुत लगाव था।

मैकेंडलेस अगले छह हफ्तों तक दक्षिण-पश्चिम की तरफ घूमता रहा। पूर्वी दिशा की ओर ह्वेस्टन तक, पश्चिम की तरफ प्रशांत सागर के किनारे तक। किसी  शहर में घुसने से पहले उसने पैसे को जमीन में दबा देता था क्योंकि वहां घूमने और सोने के दौरान उसे चोर-बदमाशों से खतरा था। लौटते वक्त मैकेंडलेस पैसे वापस निकाल लेता था। तीन फरवरी को वह लास एंजेल्स पहुंच गया। वहां वह परिचय पत्र बनवाने और एक नौकरी की खोज में गया था। लेकिन वहां समाज में उसे जीने में बहुत परेशानी होने लगी और वह सड़क की जिंदगी में वापस लौट आया।

छह दिन बाद वह ग्रैंड कैनयन घाटी में नीचे एक जर्मन जोड़े थामस और कैरीन के साथ रुका जिन्होंने उसे लिफ्ट दिया था। एलेक्स ने लिखा, “ क्या यह वही एलेक्स है जो जुलाई 1990 को आवारगी पर निकला था। रोड की जिंदगी और पौष्टिक खाने के अभाव में उसका वजन 25 पौंड कम हो गया। लेकिन आत्मा से वह बहुत ऊंचा उठ चुका था।”

24 फरवरी को, साढे सात महीने बाद मैकेंडलेस फिर से वहीं लौटा, जहां उसने अपना डॉटसन कार छोड़ा था। कार तो रेंजर ले जा चुके थे लेकिन नंबर प्लेट के साथ-साथ कुछ सामान खोज निकाला जिसे उसने वहां जमीन में दबाया था। उसके बाद उसने लास वेगास की ओर रुख किया और वहां एक इटालियन रेस्टूरेंट में उसे काम मिल गया।

उसने डायरी में लिखा, “एलेक्जेंडर ने अपना सारा सामान रेगिस्तान में दबा दिया और बिना पैसे और परिचय पत्र के 27 फरवरी को लास वेगास में घुस गया। वह लास वेगास की गलियों में आवारों, बम्पों और शराबियों के साथ कई सप्ताह रहा। लेकिन, लास वेगास उसकी मंजिल नहीं थी। 10 मई को वह नौकरी छोड़कर उल्टे पांव लौटा और रेत में दबे अपना बैग निकालकर फिर सड़क पर आ गया। उसने पाया कि बैग में रखा कैमरा जमीन के नीचे दबा रहके खराब हो चुका था। इसलिए, 10 मई 1991 से 7 जनवरी 1992 के बीच की कोई तस्वीर एलेक्स की कहानी फोटोफाईल में नहीं है। लेकिन यह महत्वपूर्ण नहीं है।  अब तक एलेक्स ने काफी अनुभव पाये, उसके पास यादों का खजाना है। उसने आवारगी में अपने जीवन का असली अर्थ और आनंद पाया है। हे ईश्वर! शुक्रिया! तुमने हमें जिन्दा रखा।“

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबे क्रिस्टोफर ने खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। सारे पैसे दानकर, परिचय-पत्र फेंककर और परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी-घुमक्कड़ी राजीव कुमार सिंहका जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया। वहां जीवन की विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए जीवन की खोज जारी रखी। वह ऐसा क्यों बना… अलास्का में उसके साथ क्या हुआ.. यह सब-कुछ जॉन क्राउकर नाम के पत्रकार ने बहुत शोध के बाद अपने किताब ‘Into the wild’ में लिखा। सीन पेन ने इसी नाम से एक बेहतरीन फिल्म बनाई जो विश्व के सौ महान सिनेमा में गिनी जाती है। Into the wild’ का हिंदी में अनुवाद कर रहे हैं युवा पत्रकार राजीव कुमार सिंह। इसका पहला और दूसरा पार्ट आप लोग पढ़ चुके हैं। ये था तीसरा पार्ट। राजीव ने इस उपन्यास का अनुवाद करके पत्रकारिता क्षेत्र में दस्तक दी है। उनके अनुवाद में कई कमियां-गल्तियां हैं, ऐसा उनका कहना है। पर इसे एक युवा पत्रकार का शुरुआती गंभीर प्रयास मानते हुए कमियों की अनदेखा की जाए, ऐसा वह अनुरोध करते हैं। राजीव की इच्छा है कि उनके परिचय में लिखा जाए- एक बेरोजगार पत्रकार जिसे एक अदद नौकरी की तलाश है। राजीव से संपर्क rajeevsinghemail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग दो)

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबे क्रिस्टोफर ने खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। सारे पैसे दानकर, परिचय-पत्र फेंककर और परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी-घुमक्कड़ी का जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया। वहां जीवन की विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए जीवन की खोज जारी रखी।

वह ऐसा क्यों बना… अलास्का में उसके साथ क्या हुआ.. यह सब-कुछ जॉन क्राउकर नाम के पत्रकार ने बहुत शोध के बाद अपने किताब ‘Into the wild’ में लिखा। सीन पेन ने इसी नाम से एक बेहतरीन फिल्म बनाई जो विश्व के सौ महान सिनेमा में गिनी जाती है। राजीव कुमार सिंह‘Into the wild’ का हिंदी में अनुवाद कर रहे हैं युवा पत्रकार राजीव कुमार सिंह।

इसका पहला पार्ट आप लोग पढ़ चुके हैं। पेश है दूसरा पार्ट। राजीव की इच्छा है कि उनके परिचय में लिखा जाए- एक बेरोजगार पत्रकार जिसे एक अदद नौकरी की तलाश है। राजीव से संपर्क rajeevsinghemail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है। राजीव ने इस उपन्यास का अनुवाद करके पत्रकारिता क्षेत्र में दस्तक दी है। उनके अनुवाद में कई कमियां-गल्तियां हैं, ऐसा उनका कहना है। पर इसे एक युवा पत्रकार का शुरुआती गंभीर प्रयास मानते हुए कमियों की अनदेखा की जाए, ऐसा वह अनुरोध करते हैं। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

अलास्का के आवारा रास्तों पर

क्रिस्टोफर मैकेंडलेस की जीवनी

बियाबान की ओर, आवारा कदमों का पहला निशान

”मैंने हमेशा आवारा होना चाहा। शांत और एक जगह स्थिर अस्तित्व मुझे नहीं चाहिए थी.. मैंने उत्साह और साहस के साथ खतरों से जूझते हुए अपने प्यार के लिेए जान कुर्बान कर देना चाहा… मैने अपने अंदर इतनी उर्जा महसूस की जो मुझे बाहरी शांत जिंदगी में कभी नहीं मिल पाती.”

-क्रिस्टोफर के पास मिली लियो टाल्सटॉय की किताब ‘फैमिली हैप्पीनेस’ के एक पृष्ठ पर छपी पंक्तियां, जिसे क्रिस ने कलम से हाईलाइट किया था.

”इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि आवारा होने की कल्पना हमें असीम आनंद से भर देता है… यह चाहत हमारे मन की उस आजादी से जुड़ी है जो इतिहास, क्रूर शोषण, कानून और प्रताड़ित करने वाले सामाजिक दायित्वों से मुक्त होकर पूर्ण स्वतंत्र हो जाना चाहती है.”

-वालेस स्टेगनर की किताब ‘दी अमेरिकन वेस्ट एज ए लिविंग स्पेस’ से उद्धृत.

अमेरिका के साउथ डाकोटा में एक छोटा सी जगह का नाम था कार्थेज। सुव्यवस्थित चहारदीवारियों से घिरे, लकड़ी से ढंके दीवारों के मकानों वाले कार्थेज में रहनेवालों की संख्या महज 274 थी। अमेरिका के उत्तरी मैदानों में बसे इस छोटे से सुस्त शहर में सिर्फ एक राशन का दुकान, एक बैंक, एक गैस स्टेशन और एक शराब का बार – कैबरेट, जहां कॉकटेल पीते हुए और सिगार का मीठा स्वाद लेते हुए वॉयन वेस्टरबर्ग एक अजीब विचारों वाले नौजवान को याद कर रहा था, जिसे वह एलेक्स के नाम से जानता था।

कैबरेट की प्लाईवुड लगी दीवारो पर हिरणों के सिंग, पुराने मिलवॉकी बियर के पोस्टर्स, उड़ान भरते पक्षियों के मंहगे पेंटिंग्स टंगे थे। सिगरेट के धुएं की कई लकीरें,एक साथ वहां बैठे किसानों के बीच से उठ रही थी जिनका धूल से सना चिंतित चेहरा कोयला खदान में काम करनेवालों की याद दिलाता था। वे सब खराब मौसम के कारण दुखी थे क्योंकि सुरजमुखी के खेत इतने सूखे नहीं थे कि उसे काटा जा सके।

क्रिस मैकेंडलेस की लाश मिले दो महीने बीत चुके थे ।

ह्वाईट रसीयन ड्रिंक में बर्फ का टुकड़ा डालते हुए उदासी भरे आवाज में वेस्टरबर्ग ने कहा- ‘एलेक्स यही पीता था। वह बार के उस कोने में बैठा करता था और अपनी आवारगी के अद्भुत किस्से सुनाया करता था। वह घंटो बात कर सकता था। इस शहर के कई लोग एलेक्स को प्यार करने लगे थे। यकीन नहीं हो रहा, उसके साथ ये हादसा कैसे हो गया।’

मजबूत कंधो और सख्त मांसल बदन वाले वेस्टरबर्ग के पास खेती का काम करने के लिए दो ग्रेन एलीवेटर था-एक कार्थेज में और दूसरा कुछ मील दूर एक दूसरे शहर में। पूरी गर्मी वह अपने आदमियों के साथ टेक्सास से लेकर कनाडा के बार्डर तक के खेतों में अपनी एलीवेटर लेकर काम करता था। 1990 के पतझड़ में वह नार्थ सेंट्रल मोंटाना से अपना काम समेटकर वापस लौटने की तैयारी कर रहा था। कट बैंक से अपने एलीवेटर के कुछ पार्ट खरीदकर वापस लौट रहा था कि रास्ते में एक नौजवान को उसने लिफ्ट दी। नौजवान ने अपना नाम एलेक्स बताया।

मैकेंडलेस कद का छोटा था लेकिन उसका बदन मेहनतकश मजदूरों की तरह कठोर और उभरी हुई नसों वाला दिखता था। इस नौजवान की आंखों में कुछ था जो लोगों को अपनी तरफ खींचता था। गहरी काली और भावुक आंखे- जो संकेत करती थी कि उसके अंदर किसी बाहरी प्रजाति का खून बह रहा है-शायद यूनानियों का। कुछ था उसकी आंखों में जिसने वेस्टरबर्ग को उसे अपने पास रखने को मजबूर कर दिया। ऐसा संवेदनशील चेहरा जिसे देखकर स्त्रियां ममत्व से भर उठती हैं, एलेक्स के पास था।

वेस्टरबर्ग एलेक्स का चेहरा याद कर बयां कर रहा था। एलेक्स के चेहरे में गजब का लचीलापन थाः एक क्षण में वह भावनाहीन दिखता था और दूसरे ही पल अचानक जब भावप्रण होकर मुंह खोलता था तब उसके बड़े-बड़े दांतों की दीवारे हंसने के दौरान बाहर छलक पड़ती थी। उसको दूर की चीजें साफ नहीं दिखाई पड़ती था इसलिए स्टील-फ्रेम वाला चश्मा वह पहनता था।

वेस्टरबर्ग को लगा कि एलेक्स को भूख लगी है। एलेक्स को लिफ्ट देने के दस मिनट बाद वेस्टरबर्ग एथरिज शहर में अपने दोस्त के पास एक पैकेज देने के लिए रुका। दोस्त ने दोनों को बीयर पीने के लिए दिया और एलेक्स से पूछा कि वह कितने दिनों से भूखा है। एलेक्स ने स्वीकार किया कि पैसे खत्म हो जाने के कारण उसे दो दिन हो चुके थे फाकाकशी किये हुए। यह सुनकर दोस्त की बीबी ने जल्दी से उसके लिए ढेर सारा खाना बनाया जिसे एलेक्स जल्दी-जल्दी पेट में डालकर वहीं टेबल पर सो गया।

मैकेंडलेस ने वेस्टरबर्ग से कहा कि वह आगे साको के गर्म झरने तक जाएगा, जो यूएस हाईवे 2 से 240 मील दूर था और जिसके बारे में उसने रबर ट्रैंपो से सुन रखा था। रबरट्रैंप, जो गाड़ी से आवारगी करते हैं और लेदरट्रैंप जो पैदल या लिफ्ट लेकर घुमक्कड़ी का मजा उठाते हैं। मैकेंडलेस लेदरट्रैंप था। वेस्टरबर्ग ने उसे बताया कि वह सिर्फ दस मील आगे तक जाएगा, उसके बाद उसे उत्तर की तरफ सनबर्स्ट शहर जाना है जहां खेतों की कटाई के लिए उसका ट्रेलर पड़ा है।  जब सड़क किनारे मैकेंडलेस को उतारने के लिए वेस्टरबर्ग ने गाड़ी रोकी तब तक रात के साढे दस बज चुके थे और घनघोर बारिश हो रही थी। वेस्टरबर्ग ने मैकेंडलेस से कहा कि इस शैतानी बारिश में उसे छोड़ना अच्छा नहीं लगेगा। “तुम्हारे पास तो स्लीपींग बैग है। तुम क्यों नहीं आज की रात सनबर्स्ट के ट्रेलर में गुजार लेते हो?” अगले तीन दिनों तक मैकेंडलेस वेस्टरबर्ग के कामगारों के साथ सुबह से ही, पके सुनहले गेंहू के खेतों के समंदर में कटाई का काम करता रहा। विदा लेते समय मैकेंडलेस से वेस्टरबर्ग ने कहा कि अगर उसे नौकरी की जरुरत हो तो कार्थेज में वह उससे आकर मिले। और, दो हफ्ते बाद मैकेंडलेस कार्थेज शहर में दिख गया।

वेस्टरबर्ग उस क्षण को याद करते हुए कह रहा था। उसने मैकेंडलेस को ग्रेन एलीवेटर को खेत में चलाने की ट्रेनिंग देकर काम पर रख लिया और कम किराए पर रहने के लिए अपने दो मकानों में से एक में कमरा भी दिया।

वेस्टरबर्ग बताता जा रहा था। “मैं कई आवारगी करने वालों को सालों से नौकरी पर रखता रहा हूं। उनमें से अधिकांश काम नहीं करना चाहते थे। लेकिन एलेक्स का रवैया कुछ अलग था। मेरे पास काम करने वाले लोगों में वह अब तक का सबसे ज्यादा मेहनती कामगार था। वह जो करता था, मेहनत से करता था। जिस काम को एलेक्स शुरु करता था उसे पूरा करके ही दम लेता था, बीच में नहीं छोड़ता था। इसे वह नैतिक नियम मानकर चलता था। वह बहुत ज्यादा नैतिक था। उसने अपने लिए काफी बड़े सिद्धांत बना रखे थे।

अपनी तीसरी ड्रिंक पीते हुए वेस्टरबर्ग बोलता जा रहा था। “एलेक्स का दिमाग बेहद तेज था। वह बहुत पढता था। बातचीत में बड़े भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करता था। मुझे लगता है जिस चीज ने उसे मुसीबत में डाला था वह था उसका बहुत ज्यादा सोचना। वह बहुत ज्यादा दुनिया के इस रुप को समझने की कोशिश करता था कि आखिर लोग एक दूसरे के प्रति इतने बुरे क्यों होते हैं। मैंने दो-तीन बार उसे समझाने की कोशिश की कि इतनी गहराई से जीवन के बारे में सोचकर वह बहुत बड़ी गलती कर रहा है लेकिन एलेक्स कहां समझने वाला था। एलेक्स तो हमेशा किसी प्रश्न का आखिरी उत्तर जानने की कोशिश में लगा रहता है। उसके बाद ही कुछ और सोच-समझ सकता था।“

वेस्टरबर्ग के हाथ एक बार मैकेंडलेस का कागज लगा, जिसमें उसका नाम क्रिस लिखा था, ना कि एलेक्स। वेस्टरबर्ग ने बताया, “उसने कभी नहीं बताया कि उसने नाम क्यूं बदला। उसकी बातों से लगता था कि उसके और उसके परिवार बीच का रिश्ता कुछ ठीक नहीं है। लेकिन मैं किसी के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता इसलिए मैंने उससे कभी कुछ नहीं पूछा।“

मैकेंडलेस को अगर अपने परिवार से कोई दुराव था तो उसने वेस्टरबर्ग और उसके कामगारों में नया परिवार पाया था जो कार्थेज के उस मकान में एक साथ रहते थे. मैकेंडलेस को जल्दी ही कार्थेज मोहने लगा। उसे कार्थेज के लोगों की सामान्य और सुगठित जिंदगी, सामान्य रहन-सहन और दोस्ताना व्यवहार पसंद आया। वह जगह दुनिया की मुख्य धारा से कटा हुआ अलग-थलग एक नया जीवन बसाए हुए था, जो मैकेंडलेस को पसंद था। उसने कार्थेज शहर और वायन वेस्टरबर्ग के साथ गहरा जुड़ाव बना लिया था।

तीस से चालीस के बीच की उम्र वाले वेस्टरबर्ग को बचपन में कार्थेज के दंपति ने गोद लिया था। वह किसान के साथ-साथ वेल्डर, बिजनेसमेन, मशीन बनाने वाला, मेकेनिक, कमोडिटी जांचकर्ता, एयर पायलट, कम्प्यूटर प्रोग्रामर, इलेक्ट्रानिक सामान ठीक करनेवाला और वीडियोगेम रिपेयरमेन भी था। वेस्टरबर्ग एक ऐसे ब्लैक बॉक्स को बनाकर बेचने की योजना मे लगा हुआ था जिसके जरिए लोग बिना पैसा चुकाए केबल टीवी के कार्यक्रम देख सकते थे। एबबीआई को इसकी भनक लगी और वेस्टरबर्ग गिरफ्तार हो गया। उसे चार महीने की जेल हुई। वेस्टरबर्ग के चले जाने के बाद ग्रेन एलीवेटर से खेत काटने का काम बंद रहा। 23 अक्टूबर को मैकेंडलेस ने कार्थेज छोड़ दिया और फिर से आवारा जीवन जीना शुरु कर दिया। कार्थेज के साथ मैकेंडलेस का गहरा भावनात्मक लगाव था। जाते-जाते वह वेस्टरबर्ग को लियो टॉल्सटॉय की वार एन्ड पीस किताब देकर गया जिसके अंदर के टायटल पेज पर उसने लिखा –वेस्टरबर्ग के लिए एलेक्स की ओर से। अक्टूबर 1990।

मैकेंडलेस जब तक पश्चिम की ओर घूमता रहा, वेस्टरबर्ग के संपर्क में रहा। हरेक एक-दो महीने पर वह वेस्टरबर्ग से फोन से बात करता था या चिट्ठी लिखा करता था। उसके बाद उसने सारी चिट्टियां वेस्टरबर्ग के पते पर लिखी और जो भी मिला उसे अपना घर दक्षिण डाकोटा बताया।

सच ये था कि मैकेंडलेस वर्जिनिया के अन्नाडेल में एक उच्च मध्यमवर्गीय परिवार में सुख-सुविधा के बीच पला-बढा था। उसके पिता नासा में एयरोस्पेस इंजिनियर थे जिन्होंने स्पेस शटल के लिए एडवांस रडार सिस्टम का डिजाईन तैयार किया था और अन्य बड़े प्रोजेक्ट पर वह काम कर रहे थे। 1978 में वाल्ट ने अपना एक कन्सल्टिंग फर्म शुरु किया जिसका नाम था-यूजर सिस्टम्स। इस बिजनेस में उन्होंने क्रिस की मां बिली को बिजनेस पार्टनर बनाया। क्रिस का अपनी बहन कैरीन के साथ भावनात्मक लगाव बहुत ज्यादा था। मई, 1990 में क्रिस ने अटलांटा के इमोरी विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया जहां वह स्टूडेन्ट न्यूजपेपर का संपादक था और स्तंभ लिखा करता था। उसने वहां इतिहास और मानव विज्ञान की पढाई की थी। वहां उसे एक सम्मान देने का प्रस्ताव हुआ लेकिन यह कहते हुए लेने मना कर दिया कि उपाधि या सम्मान बेहद गैरजरुरी चीजें हैं। वहां से पास करने के बाद क्रिस के पास 24,000 डॉलर बच गए थे, जिससे वह आगे कानून की पढाई करने वाला था।

मैकेंडलेस के पिता ने स्वीकार किया कि वे अपने बेटे को समझ नहीं सके। वाल्ट, बिली और कैरीन जब कॉलेज के डिग्री प्रदान करने वाले सामारोह में क्रिस से मिलने गए थे तब उनको ये मालूम नहीं था कि क्रिस कुछ ही दिन बाद अपना सारा पैसा भूख से लड़ने वाली संस्था ऑक्सफैम अमेरिका नाम के चैरिटी को दान कर देने वाला था।

12 मई, शनिवार को वह सामारोह था। उस सामारोह में मैकेंडलेस की तस्वीर, बिली ने खींची थी जब वह डिग्री लेने जा रहा था। अगले दिन मदर्स डे था और मैकेंडलेस ने अपनी मां को कैंडी, फूल और एक भावप्रण कार्ड दिया था। उसकी मां उस दिन काफी आश्चर्यचकित और खुश हुई थी क्योंकि उसका बेटा उसे दो साल बाद कोई गिफ्ट दे रहा था। मैंकेंडलेस ने अपने घर में यह घोषणा कर रखी थी कि सैद्धांतिक रुप से वह गिफ्ट ना तो देगा और ना ही लेगा।

असल में कुछ दिन पहले वाल्ट और बिली ने क्रिस को नए कार खरीद कर देने की और आगे पढने के लिए खर्च देने की बात कही थी जिसे क्रिस ने मानने से इंकार कर दिया था। मैकेंडलेस का कहना था कि उसके पास पहले से जो कार है, वह अभी बिल्कुल ठीक है। 1982 के डॉटसन B210 मॉडल की वह कार थोड़ी पुरानी दिखने लगी थी लेकिन 128,000 मील चल चुकी इस कार के पार्ट-पुर्जे अभी ठीक से काम कर रहे थे।

उसने कैरीन से बाद में कहा, ‘मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मेरे मां-बाप नई कार लेने को कह रहे हैं। उन्होंने ये भी कैसे सोच लिया कि आगे की पढाई के लिए कोई खर्च लूंगा। मैंने लाखों बार ये बात दुहराई है कि मेरे पास दुनिया की सबसे अच्छी कार है जिसे मैंने मियामी से अलास्का तक खूब बिना किसी परेशानी के दौड़ाया है और अब तक एक भी समस्या सामने नहीं आयी; जिस कार से मैं इतना प्यार करता हूं कि कभी उसे बेचने की नहीं सोच सकता; इसके बावजूद भी वह मेरी भावनाओं को ना समझकर ये सोचते हैं कि मैं नई कार स्वीकार कर लूंगा! मैं आगे से बिल्कुल सावधान रहूंगा कि उनसे कोई भी गिफ्ट ना लूं क्योंकि वह सोचेंगे कि मेरा सम्मान कर उन्होंने मुझे खरीद लिया है।‘

क्रिस की डॉटसन कार सेकेन्डहेंड थी जिसे उसने तब खरीदा था जब हाईस्कूल में था। उसके बाद वह कई बार स्कूल की छुट्टियों में अकेले इस कार को लेकर लम्बे ट्रिप पर निकल जाता था। ग्रेजुएशन के आखिरी सप्ताह में उसने ऐसे ही एक बार मां-बाप से कहा था कि अगली गरमी वह रोड की जिंदगी जीते हुए बिताना चाहता है। उसने कहा था,”मैं सोचता हूं कि कुछ दिन के लिए मैं गायब हो जाउंगा।“

उसके मां-बाप ने उसके घोषणा को उस पल गंभीरता से नहीं लिया। वाल्ट ने प्यार से अपने बेटे से कहा,” जाने से पहले हमसे जरुर मिल लेना”। क्रिस यह सुनकर मुस्कुराकर हां कहने की मुद्रा में सिर को हल्के से ऊपर-नीचे किया था जिससे वाल्ट और बिली ने समझा कि कहीं जाने से पहले मैकेंडलेस उनसे मिलने अन्नाडेल जरुर आएगा।

जून के आखिरी सप्ताह में क्रिस ने अटलांटा से अपने मां-बाप के ग्रेजुएशन फाईनल का ग्रेड रिपोर्ट भेजा जिसके साथ एक चिट्ठी भी थी जिसमे लिखा थाः

‘यह मेरे पढाई के रिपोर्ट की आखिरी कॉपी है। अच्छे ग्रेड से पास हुआ हूं। आपने पेरिस से जो तस्वीरें, शेविंग के सामान और पोस्टकार्ड भेजे हैं उसके लिए धन्यवाद। ऐसा लगता है कि ट्रिप का आपने काफी आनंद लिया है। बहुत मजा आया होगा। अभी कुछ नया नहीं है कहने को। गर्मी और उमस का मौसम शुरू हो चुका है।‘

यह क्रिस का अपने परिवार के साथ हुआ आखिरी संवाद था। ग्रेजुएशन के फाईनल में ही क्रिस ने कॉलेज कैंपस छोड़ दिया था और साधु जैसे कमरे में रहने लगा था जिसमें जमीन पर एक पतला गद्दा बिछा था और टेबल था। वह कमरे को हमेशा इतना साफ और व्यवस्थित रखता था जैसे कि मिलिटरी बैरक हो। उसने कोई फोन नहीं रखा था इसलिए वाल्ट और बिली उसे कॉल नहीं कर पाते थे। अगस्त 1990 के शुरूआत के बाद तक वाल्ट और बिली को जब क्रिस की कोई खबर नहीं मिली तो दोनों अटलांटा चल पड़े। जब वे मैकेंडलेस के कमरे पर पहुंचे तो वह खाली था और उस पर ‘फार रेंट’ लिखा था। मैनेजर ने कहा कि जून के अंत में ही क्रिस ने कमरा छोड़ दिया था। वाल्ट और बिली जब वापस लौटे तो उनके द्वारा क्रिस को लिखी गई सारी चिट्ठियां डाक से वापस लौट चुकी थी।

“क्रिस ने डाकखाने को उन चिट्ठियों को एक अगस्त तक रोककर रखने को कहा था इसलिए हम जान नहीं पाए कि आगे कुछ होने जा रहा है।‘ बिली कह रही थी, “इस बात से हम चिंतित हो गए।“

तब तक क्रिस बहुत दूर जा चुका था। पांच सप्ताह पहले ही अपने कार में सामान लादकर वह पश्चिम की ओर बिना कोई मंजिल तय किए चल पड़ा था। यह ट्रिप ऐतिहासिक साबित होने वाला था, सबकुछ उलट-पलट कर देनेवाला।

क्रिस ने चार साल तक ग्रेजुएशन करते हुए एक निरर्थक ड्यूटी सी लगने वाले काम को अंजाम दिया था। लेकिन अब हर भार से वह मुक्त था; अपने माता-पिता और दोस्तों की घुटन भरी दुनिया से आजाद था; अतिभौतिकता और सुरक्षित दुनिया को छोड़ चुका था,जिसमें जीकर उसे लगता कि अपने अस्तित्व से वह कट गया है।

अटलांटा के पश्चिम दिशा में जाते हुए उसने अपने लिए एक नयी दुनिया खोजनी शुरु की जिसमें वह अपने अनुभवों के साथ पूर्ण रुप से मुक्त रह सके। उस जीवन की शुरुआत करते हुए उसने सबसे पहले अपना नाम बदल लिया।

अब वह क्रिस मैकेंडलेस नहीं था। नया नाम था- एलेक्जेंडर सुपरट्रैंप, जो अब अपना सबकुछ खुद तय कर रहा था।

….जारी…

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भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग एक)

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबकर क्रिस्टोफर ने वापस खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। अपने सारे पैसे दानकर और अपने सारे परिचय-पत्र फेंककर अपने परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी और घुमक्कड़ी जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया।

वहां जीवन की सारी विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए उसने जीवन की खोज जारी रखी। वह ऐसा क्यों बना… अलास्का में उसके साथ क्या हुआ.. यह सब-कुछ जॉन क्राउकर नाम के पत्रकार ने बहुत शोध के बाद अपने किताब ‘Into the wild’ में लिखा। सीन पेन ने इसी नाम से एक बेहतरीन फिल्म बनाई जो विश्व के सौ महान सिनेमा में गिनी जाती है। ‘Into the wild’ का हिंदी में अनुवाद कर रहे हैं युवा पत्रकार राजीव कुमार सिंह। राजीव की

राजीव कुमार सिंह
राजीव कुमार सिंह
इच्छा है कि उनके परिचय में लिखा जाए- एक बेरोजगार पत्रकार जिसे एक अदद नौकरी की तलाश है। राजीव से संपर्क rajeevsinghemail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है। राजीव ने इस उपन्यास का अनुवाद करके पत्रकारिता क्षेत्र में दस्तक दी है। उनके अनुवाद में कई कमियां संभव है। पर इसे एक युवा पत्रकार का शुरुआती गंभीर प्रयास मानते हुए अनुवाद की कमियों को अनदेखा किया जाना चाहिए। -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


अलास्का के आवारा रास्तों पर (क्रिस्टोफर मैकेंडलेस की जीवनी)

बियाबान की ओर

अमेरिका के अलास्का सिटी में फेयरबैंक से मीलों आगे बर्फीले निर्जन इलाके में जिम गिलियन की नजर दूर सड़क किनारे खड़े किसी अंजाने पर पड़ी जो ठंड से ठिठुर रहा था औऱ लिफ्ट की गुजारिश में अंगूठा उठाए इशारे कर रहा था। वह अलास्का के उस बर्फीले बियाबान में और आगे जाना चाहता था। अठारह-उन्नीस साल के उस नौजवान के पीठ पर सेमीऑटोमेटिक रायफल टंगा था जिसे देखकर अलास्का के इस फोर्टी-नाइन्थ स्टेट में शायद ही कोई मोटरवाला लिफ्ट देने के लिए रुकता। लेकिन, गिलियन ने उसके दोस्ताना हाव-भाव को देखकर सड़क के किनारे की ओर अपनी ट्रक रोकी और उस बच्चे को अंदर आने को कहा।

नौजवान उछलकर ट्रक में चढा और अपना नाम एलेक्स बताया।

‘एलेक्स’- गिलियन प्रश्न करने की मुद्रा में बोला। वह एलेक्स का पूरा नाम जानना चाहता था।

“सिर्फ एलेक्स’- नौजवान ने उसके जिज्ञासा पर पानी फेर दिया। पांच फीट सात-आठ ईंच का गठीले बदन वाले एलेक्स ने अपनी उम्र 24 साल बताई और अपना घर दक्षिण डाकोटा बताया। उसने बताया कि वह सुदूर अलास्का मे देनाली नेशनल पार्क के अंतिम छोड़ पर उतरेगा और आगे की झाड़ियों वाले रास्ते से पैदल चलकर दुनिया को छोड़कर और लोगों से दूर अकेले में कुछ महीने बिताएगा।

पेशे से इलेक्ट्रिसियन गिलियन देनाली नेशनल पार्क वाले रास्ते पर 240 मील दूर एंकरेज जा रहा था; उसने एलेक्स से कहा कि वह जहां चाहेगा, उसे वह वहां तक छोड़ देगा। गिलियन को एलेक्स के बैग का वजन बमुश्किल 25-30 पौंड लग रहा था। शिकार का शौकीन और जंगलों में समय बिता चुके गिलियन को इस बात ने चौंकाया क्योंकि वह जानता था कि इतने कम सामान के सहारे ऐसे निर्जन इलाके में महीनों नहीं बिताया जा सकता जबकि अभी बसंत आने में देर है और अलास्का में चारों तरफ जमीन पर सिर्फ बर्फ बिछा है। गिलियन याद करने लगा कि इस तरह के ट्रिप पर वह इतने कम सामान के साथ कभी नहीं गया और जाना संभव भी नहीं था।

धूप निकल जाने से दिन धीरे-धीरे निखर रहा था। जब ट्रक तनाना नदी के किनारे के उंचे ढलानों से नीचे उतर रही थी तब एलेक्स दूर तक दक्षिण में फैले तेज और सर्द हवाओं में झूमते जंगल और पहाड़ियों से भरे दृश्य को देखने में खो गया। गिलियन अचंभित था। उसने सोचा कि कहीं वह किसी क्रेजी आवारा को तो ट्रक में नहीं बैठा लिया है जो बदनाम जैक लंडन की नेचर फैंटेसी जीने के लिए उत्तर के इस निर्जन में भागता है। अलास्का वैसे भी इस तरह के स्वप्नजीवी और समाज में मिसफिट लोगों का गढ रहा है जो सोचते हैं कि उत्तर के आखिरी छोड़ पर शुद्ध हवाओँ वाला ये सुनसान-विस्तार फलक उसके जीवन के सभी जख्मों को भर देगा।

गिलियन जानता था कि अलास्का से बाहर रहने वाले लोग मैगजीनों में अलास्का के बारे में पढकर फैंटेसी में डूब जाते हैं औऱ अपना बोरिया-बिस्तरा उठाकर यह सोचकर चल देते हैं कि वह दुनिया-समाज से दूर स्वर्ग में जीने जा रहे हैं जहां उन्हें बेहतर जीवन मिलेगा। लेकिन जब वह यहां पहुंचते हैं तब मैगजीन में लिखे झूठ का पता उन्हें चलता। यहां की जंगली झाड़ियां किसी को आशा, आनंद और जीवन नहीं देती। बड़ी-बड़ी नदियों का बहाव बहुत तेज है। यहां के मच्छड़ आदमी को जिंदा खा जाने को तैयार रहते हैं। यहां शिकार के लिए जंगली-जानवर भी बहुत कम हैं। यहां का जीवन पिकनिक नहीं है।

फेयरबैंक से देनाली पार्क के अंतिम छोड़ तक जाने में लगभग दो घंटे लगे। एलेक्स की बातें सुनकर गिलियन को वह पागल सा लगा। फिर भी, गिलियन को उसकी चिंता हुई। एलेक्स ने बताया कि उसके बैग में सिर्फ दस पाउंड चावल है। अप्रील की इतनी भयानक सर्दी को झेलने के लिए एलेक्स ने पर्याप्त कपड़े भी नहीं लिए थे। एलेक्स के सस्ते चमड़े का जूता वाटरप्रूफ और सर्दी से बचाने वाला नहीं था। उसका रायफल भी महज .22 बोर की क्षमता वाला था जिससे बड़े जानवरों का शिकार करना मुश्किल था, जिसे मारकर वह ऐसे बियाबान में ज्यादा दिन तक खाने का इंतजाम कर सकता था। उसके पास और कोई हथियार नहीं था। दिशा का पता लगाने के लिेए कम्पास भी नहीं था। उसके पास सिर्फ एक पुराना मैप था।

फेयरीबैंक से अलास्का पहाड़ियों के बीच के रास्ते में नेनाना नदी पर बने पुल से जब ट्रक गुजर रहा था तो एलेक्स ने नदी के तेज धार को देखकर कहा कि उसे नदी के पानी से डर लगता था। एक साल पहले मैक्सिको में वह समंदर में डोंगी लेकर निकल पड़ा था और वह डूबने ही वाला था कि तेज लहर के तूफान ने उसे किनारे ला पटका। कुछ देर बाद एलेक्स ने मैप निकाला और उस पर लाल निशान के द्वारा चिह्नित किए गए एक रास्ते के बारे में बताया जिसे स्टेम्पेड ट्रेल कहा जाता था। इस रास्ते का निशान अलास्का के रोडमैप पर भी नहीं मिलता था। इस रास्ते पर शायद ही आज तक कोई चला था। एलेक्स ने बताया कि वह रास्ता 40 मील का था और वह रास्ता आगे चलकर धीरे-धीरे गुम हो जाता था। माउंट मैकिनले पहाड़ों के उस दिशाहीन उत्तरी इलाके में एलेक्स जाना चाहता था।

गिलियन को एलेक्स की योजना मूर्खतापूर्ण लगी और उसने एलेक्स को लौट जाने को कहा। गिलियन ने एलेक्स से कहा कि वहां उसे शिकार करने के लिए आसानी से कोई जानवर नहीं मिलेगा। जब उसकी बातों का एलेक्स पर कोई असर नहीं हुआ तो गिलियन ने उसे वहां के खतरनाक भालुओं की कहानी सुनाकर डराने की कोशिश की। एलेक्स बिल्कुल नहीं डरा। उसने कहा कि भालू के आने पर वह पेड़ पर चढ जाएगा। तब गिलियन ने बताया कि उस जगह कोई बड़ा पेड़ नहीं है, जिसे भालू गिरा नहीं सकता। लेकिन एलेक्स अपने इरादे से एक ईंच पीछे नहीं नहीं हटा। उसे गिलियन ने जो-जो कहा, वह उसे उसका जबाब देता गया। गिलियन ने उसे अपने साथ एंकरेज शहर चलने को कहा जहां वह उसे जरूरत के सामान खरीद देगा; उसके बाद वह जहां जाना चाहे, चला जाय। एलेक्स ने यह कहते हुए गिलियन का प्रस्ताव ठुकरा दिया कि उसके पास जितना सामान है, उसे वह अपने लिए काफी समझता है।

‘क्या तुम्हारे पास शिकार करने का लाईसेंस है’ गिलियन के इतना पूछने पर एलेक्स ने व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, “नहीं, लाईसेंस नहीं है। मैं कैसे अपना पेट भरूंगा, सरकार को इससे कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। मारो, साले उसके नियम-कानुनों को।”

क्या तुम्हारे मां-बाप या दोस्त तुम्हारे इस आवारगी के बारे में जानते हैं- गिलियन के ऐसा पूछने पर एलेक्स ने कहा कि उसकी अपने परिवार से दो साल से बातचीत नहीं हुई थी और उसके इस योजना के बारे में किसी को ऩहीं मालूम। ” मैं अपने उपर आए किसी भी खतरे से अकेले लड़ सकता हूं।” एलेक्स की दृढता देखकर गिलियन को लगा कि वह सच में यह जुनुनी था।

एलेक्स जल्दी से जल्दी स्टेम्पेड ट्रेल को पारकर दिशाहीन रास्ते की ओर बढ जाना चाहता था। स्टेम्पेड ट्रेल के आखिरी छोड़ तक जाने में गिलियन के ट्रक को तीन घंटे लगे। कुछ दूर तक तो सड़क अच्छी थी लेकिन बाद का रास्ता बेहद खराब था। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ था। गर्मियों में यह रास्ता चलने लायक रहता है लेकिन जाड़े में नहीं। हाईवे से स्टेम्पेड ट्रेल पर दस मील आगे जाने पर गिलियन को लगा कि आगे जाने पर ट्रक के फंसने का खतरा है। उत्तरी अमेरिका के विशालकाय पहाड़ों की चोटियों क्षितिज को चूमती हुई चमक रही थी।

ट्रक रुका और एलेक्स उतर गया। एलेक्स ने गिलियन को अपने पास बची हुई आखिरी संपत्ति; घड़ी, कंघी और 85 सेंट देने की कोशिश की लेकिन गिलियन ने नहीं लिया।

“अगर तुम नहीं भी लोगे, फिर भी मैं इसे फेंक दूंगा। मैं नहीं जानना चाहता कि कितना समय हुआ है .या आज कौन सा दिन है या मैं अभी किस जगह पर हूं। ये सब बातें जानना निरर्थक है।” एलेक्स हंसते हुए बोला। इससे पहले कि एलेक्स अपने रास्ते पर जाना शुरु करता, गिलियन ने ट्रक के सीट के पीछे रखे रबड़ के मजबूत, पुराने जूते को एलेक्स को देते हुए कहा, “इसे रख लो। ये थोड़े बड़े हैं, तुम इसे अपने जूते को उपर से पहन लो। तुम्हारा पैर गर्म रहेगा।”

“मुझपर कितना एहसान करोगे गिलियन?”

“कोई बात नहीं, एलेक्स”- गिलियन ने उसे अपना फोन नंबर दिया, जिसे एलेक्स ने अपने नाईलॉन के वॉलेट में संभालकर रख लिया।

“एलेक्स अगर तुम जिंदा लौटे तो मुझे फोन करना। मैं तुमको बताउंगा कि ये पुराने जूते तुम मुझे कैसे लौटाओगे।”

गिलियन की पत्नी ने उसे लंच के लिए सैंडविच, पनीर और कॉर्नचिप्स दिया था, उसे भी उसने एलेक्स को दे दिया। एलेक्स ने गिलियन को अपना कैमरा देकर उसे एक तस्वीर लेने को कहा। कैमरा वापस लेकर धीरे-धीरे एलेक्स अपने रास्ते पर चल पड़ा और बर्फीली वादियों में गिलियन की नजर से ओझल हो गया। मंगलवार, 28 अप्रैल 1992 का दिन था वह। गिलियन वापस हाईवे पर लौट गया। एंकरेज के रास्ते पर एक पुलिस चौकी को उसने एलेक्स के बारे में बता दिया। गिलियन ने सोचा कि एलेक्स को भूख लगेगी तो वह वापस लौट आएगा। लेकिन एलेक्स नहीं लौटा।

गुमशुदा पगडंडी पर एक बस की अंजान त्रासदी

स्प्रूस के काले घने जंगल उस बर्फीले रास्ते के दोनों तरफ खड़े थे। हवा के झोंकें पेड़ों के ऊपर जमे बर्फ के सफेदी को उड़ा ले गए थे और कम रौशनी में एक-दूसरे की तरफ झुके हुए ये बेहद डरावने और खतरनाक लग रहे थे। चारों तरफ गहरी शान्ति छाई थी। वह जगह इतनी अकेली, सुनसान, जीवन- विहीन और सर्द थी कि उस माहौल को उदासी भरा भी नहीं कहा जा सकता था। लेकिन ऐसे माहौल के अंदर एक स्याह हंसी छुपी थी, ऐसी हंसी जो उदासी से भी ज्यादा दर्द देनेवाली हो; ऐसी हंसी जिसमें खुशी का नामो-निशान न हो; बर्फ के क्रिस्टल से भी ज्यादा सर्द हंसी, जिसमें हमेशा खुद को सही कहने वाली क्रूरता हो। जीवन की निरर्थकता और जीवन जीने के प्रयासों को देखकर आत्मा की अतल गहराईयों से निकली एक अबूझ हंसी। कुछ ऐसी ही हंसी अपनी नीरवता में छुपाए था यह सर्द दिलवाला, जंगली और खतरों से भरा था उत्तर का ये सुनसान सरजमीं।  (जैक लंडन की किताब ह्वाईट फैंग से उद्दृत)

कांतिष्णा मैदान के ऊपर झुके हुए माउंट मैकिनले के विशाल पहाड़ों की सीमा शुरु होने से ठीक पहले  अलास्का रेंज के पहाड़ों के उत्तरी किनारे पर ऊंचा उठते और नीचे ढलान वाले आऊटर रेंज कहलाने वाली छोटे रिजों की श्रृंखला जमीन पर इस तरह लग रही था जैसे बेतरतीब बिस्तर पर कोई मुड़ा-तुड़ा कम्बल पड़ा हो। पूरब से पश्चिम दिशा तक फैले इस आऊटर रेंज के दोनों छोरों के ऊंची चोटियों के बीच पांच मील के इस लहरदार रिज के ऊपर दलदली सतह थी जिसमें झाड़ियों और स्प्रूस के पत्तों और छालों का मिलावट थी। इसी उतार-चढाव वाले घुमावदार रास्ते के जमीनी हिस्से पर स्टेम्पेड ट्रेल बनाया गया था, जिस पर चलकर क्रिस मैकेंडलेस आगे गया था।

स्टेम्पेड ट्रेल को 1930 में अलास्का के अर्ल पिलग्रिम ने बनवाया था। अर्ल पिलग्रिम अलास्का के महान माईनर थे जिन्होंने तालकोट नदी के पास स्टेम्पेड क्रीक पर मौजूद एन्टीमनी धातु के अयस्कों को ढोने के लिए यह रास्ता बनवाया था। 1961 में फेयरबैंक के युतान कंस्ट्रक्शन कम्पनी ने इस रास्ते को बेहतर बनाने का ठेका लिया। इस कम्पनी ने इसे मजबूत सड़क बना दिया ताकि ट्रक के द्वारा अयस्कों को ढोया जा सके। सड़क बनाने वाले मजदूरों को रहने के लिए कम्पनी ने तीन बसों को रखा, जिसमें सोने के लिए एक बेड और रसोई के लिेए स्टोव सहित अन्य सामान रखा था। इस प्रोजेक्ट को 1963 में रोक दिया गया। तब तक लगभग पचास मील सड़क बन चुकी थी लेकिन नदियों पर एक भी पुल नहीं बनाया जा सका था जिसके कारण बरसात मौसम में बाढ वाले इन ऩदियों को पार करना असंभव सा था। प्रोजेक्ट के रुकने के बाद युतान दो बसों को वापस ले आई, लेकिन एक बस उसने शिकारियों के ठहरने के लिए छोड़ दिया। उसके तीन दशक बाद, सड़क का नामो-निशान मिट चला था और उसपर उत्तरी अमेरिकन जंतु बीवरों ने तालाब बना डाले थे और जंगली घनी झाड़ियां उग आयी थी।

युतान द्वारा छोड़ा गया बस वहीं का वहीं था। 1940 में बना जंग खा रहा ये पुराना इंटरनेशनल हार्वेस्टर बस स्टेम्पेड ट्रेल के उस जंगली इलाके में दूर से बड़ी काली मक्खी की तरह लगता था। उसका इंजन नष्ट हो चुका था। खिड़की के शीशे टूट चुके थे और उसके फर्श पर ह्विस्की के पुराने बोतल बिखड़े पड़े थे। उसके ऊपर चढा हरा-उजला पेंट उखड़ रहा था। मौसम इतना खराब रहता था कि साल में छह-सात महीने इस बस को शायद ही किसी आदमी का दर्शन होता होगा।

1980 में देनाली नेशनल पार्क के अंदर कांतिष्णा की पहाड़ियों और उत्तरी पहाड़ी श्रृंखला को शामिल किया गया लेकिन नीचले क्षेत्रों को उसके अंदर नहीं रखा गया जिसमें स्टेम्पेड ट्रेल का आधा हिस्सा आता था। साढे सात मील का यह दायरा तीन ओर से नेशनल पार्क के सुरक्षित क्षेत्र से घिरा था और इसके अंदर भेड़िये, भालू, हिरण, मूज और अन्य जानवर रहते थे। यह रहस्य उन स्थानीय शिकारियों को मालूम था। जैसे ही मूज इस इलाके में निकलने शुरु होते थे, कुछ शिकारी इस बस में आकर अपना डेरा डाल लेते थे।

6 दिसम्बर 1992 में एंकरेज शहर के आटो बॉडी शॉप के मालिक केन थॉम्पसन, उसका एक कर्मचारी गार्डन सेमेल और केन का दोस्त फ्रेडी सॉनसन, अपने-अपने ट्रक में सवार होकर तीनों मूज का शिकार करने के लिेए उस बस की ओर रवाना हुए। वहां तक पहुंचना जोखिम भरा सफर था। स्टेम्पेड ट्रेल सड़क जहां तक ठीक था, वहां से दस मील आगे खराब रास्ते पर चलने के बाद तेक्लानिका हिमनदी मिलता था जिसका बर्फीला पानी पारदर्शी था। एक संकरा रास्ता इस हिमनदी को स्टेमपेड ट्रेल से मिलाता था। उस संकरे रास्ते को पार करने के बाद अचानक सामने तेक्लानिका नदी के तेज बहाव का सामना होता था जो आगे बढने से लोगों को रोक देता था।

थाम्पसन, सेमेल और स्वान्सन भी साहसी अलास्कियन थे। तेक्लानिका नदी के किनारे पहुंचकर तीनों आगे जाने का रास्ता तलाशने लगे। खोजते-खोजते एक ऐसा जगह दिखा जहां नदी की गहराई कम नजर आ रही थी। आगे-आगे थाम्पसन अपना ट्रक लेकर चला। उसके गाड़ी में लगा हुक पीछे से आ रहे गार्डन के ट्रक में लगा था, ताकि गाड़ी के बहने की स्थिति में वह उसे पीछे खींच सके। उसके पीछे सॉनसन की गाड़ी थी। तीनों उस पार सुरक्षित पहुंचने में कामयाब रहे।

उसके आगे ट्रक का जाना मुमकिन नहीं था। तीनों पूरी तैयारी के साथ इधर आते थे। आगे जाने के लिए एक तिपहिया वाहन और एक फोर-व्हीलर ट्रक पर लदा था। दोनों गाडियों को उतारकर तीनों उसे लेकर आगे चल पड़े। तीनों का लक्ष्य उसी खटारे बस तक पहुंचना था, जिसे युतान कम्पनी वहां छोड़ आयी थी। वहां से कुछ सौ गज बाद रास्ते पर वहां रहने वाले एक जल-जंतु वीबर द्वारा बनाए गए कई छोटे-छोटे तालाब थे। डायनामाइट से इन तालाबों का तटबंध तीनों ने उड़ा दिया और पानी बहा दिया। आगे पत्थरों से भरे छोटे-छोटे नाले औऱ घने झाड़ियों को पार करते हुए तीनों दोपहर देर बाद तीनों बस तक पहुंचे। तीनों की नजर बस से करीब पचास फुट की दूरी पर एक युवक औऱ युवती पर पड़ी। दोनों डरे-सहमे से खड़े थे। दोनों एंकरेज शहर से थे।

दोनों मे से कोई बस के अंदर नहीं जा रहा था लेकिन वे बस के इतने करीब खड़े थे कि अंदर से आते दुर्गंध को महसूस कर सकते थे। बस के पिछले हिस्से के दरवाजे के ऊपर लकड़ी से लाल रंग का सिग्नल फ्लैग लगा था, जिसमें फ्लैग के रुप में एक लाल मोजे को बांध दिया गया था। दरवाजा हल्का सा खुला था और इसके ऊपर एक कागज चिपका था जिसपर कुछ लिखा हुआ था। यह सब किसी गड़बड़ की तरफ इशारा कर रहा था।

वह कागज निकोलॉय गोगोल के किताब से फाड़ा गया था और उसके ऊपर अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में यह लिखा हूआ थाः-

“एस. ओ. एस. मेरी मदद करो। मैं घायल हूं और मरने वाला हूं। इतना कमजोर हूं कि उठकर चल नहीं सकता। मैं बिल्कुल अकेला हूं। भगवान कसम, मैं मजाक नहीं कर रहा। मेरी जान बचा लो। मैं अपने लिए पास से जंगली बेरी लाने जा रहा हूं। शाम तक लौटूंगा। धन्यवाद, क्रिस मैंकेंडलेस।”

एंकरेज से आया हुआ जोड़ा उस नोट को पढकर और अंदर से आते दुर्गंध के कारण बस के अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। सेमेल हिम्मत जुटाकर आगे बढा। खिड़की के पास से देखने पर अंदर एक रेमिंगटन रायफल, गोलियों का एक डब्बा, आठ या नौ किताबें, कुछ फटे जीन्स, खाना बनाने का सामान और एक मंहगा बैग दिखा। बस के पिछले हिस्से में बेड के ऊपर नीले रंग का एक स्लीपिंग बैग पड़ा था जिसे देखने से लग रहा था कि कुछ उसके अंदर था। लेकिन सेमेल के लिए यह विश्वास करना कठिन था कि अंदर कोई आदमी हो सकता था। गाड़ी के पिछले हिस्से में एक लकड़ी के टुकड़े पर खड़े होकर सेमेल ने उस नीले बैग को हिलाया। उसे अब विश्वास था कि बैग के भीतर कुछ था लेकिन जो भी था, वह ज्यादा वजनी नहीं था। उस बैग के दूसरी तरफ जाकर देखने पर अंदर से एक सिर बाहर निकला हुआ दिखा और तब जाकर सेमेल को पता लगा कि अंदर क्या है। क्रिस्टोफर मैकेंडलेस अलास्का के इस सुनसान में ढाई हफ्ते पहले मर चुका था।

सेमेल ने उस लाश को वहां से निकाल ले जाने की सोची। लेकिन ना तो थाम्पसन के, ऩा ही उसके और ना ही उस जोड़े की गाड़ी में इतनी जगह थी कि इस मरे आदमी को ले जाया जा सके। कुछ देर बाद वहां एक शिकारी पहुंच गया जिसका नाम बुच किलियन था और जो पास के हिली शहर का रहने वाल था।

किलियन के पास आठ चक्केवाली गाड़ी थी। सेमेल ने उसे लाश को गाड़ी से ले जाने को कहा लेकिन किलियन तैयार नहीं हुआ। उसका कहना था कि यह काम अलास्का स्टेट के पुलिस पर छोड़ दिया जाय।

किलियन कोल माईनर था और फायर डिपार्टमेंट में इमर्जेंसी मेडिकल टेक्नीसियन का भी काम करता था। उसके ट्रक पर टू-वे रेडियो था। लेकिन किलियन जब किसी से संपर्क स्थापित कर पाने में असफल रहा तब वह ट्रक लेकर हाईवे की तरफ पीछे लौटा। लगभग पांच मील जाने के बाद उसके रेडियो का संपर्क हिली के रेडियो आपरेटर से हुआ। आपरेटर को उसने पुलिस को यह सूचित करने को कहा कि सुषाना नदी के पास बस में एक आदमी प़ड़ा था जो लगता था कि मर चुका था।

अगली सुबह लगभग साढे आठ बजे एक पुलिस हेलिकॉप्टर तेज गर्जना करता हुआ, धूल और एस्पन की पत्तियों को उड़ाता हुआ बस के करीब उतरा। पुलिस ने बस की बारीकी से जांच की और क्रिस मैकेंडलेस की लाश,उसका कैमरा और डायरी लेकर फिर वापस उड़ चली। उस डायरी में अंतिम दो पन्नों पर क्रिस्टोफर ने अपने आखिरी सप्ताह के बारे में लिखा था। डायरी में कुल 113 प्रविष्टियां लिखी गई थी। हर प्रविष्टि में कुछ रहस्य भरी बातें बहुत कम शब्दों में बयान की गई थी।

क्रिस की लाश को एंकरेज ले जाया गया जहां साईंटिफिक क्राईम डिटेक्शन लेबोरेटरी में उसकी चीड़-फाड़ की गई। शरीर इतने बुरे तरीके से सड़ चुका था कि यह पता लगाना मुश्किल था कि मौत कब हुई थी। जांच करने वाले को किसी प्रकार के अंदरुनी चोट का पता नहीं चला। शरीर में वसा का नामोनिशान नहीं था। मरने से बहुत पहले हड्डियां सूखने लगी थी। क्रिस के मौत का कारण भूखमरी बताया गया।

क्रिस का हस्ताक्षर एस. ओ. एस को लिखे नोट के नीचे लिखा था इसलिए उसके नाम का पता चल गया। उसके कैमरे में खुद अपने द्वारा खींची गई कई तस्वीरें थी जिससे उसके असली हुलिए के बारे में जानकारी हो गई। लेकिन, चूंकि उसके पास कोई पहचान-पत्र नहीं था इसलिेए किसी को यह मालूम नहीं था कि वह कौन था, कहां से आया था और अलास्का में उधर क्या करने गया था?

….जारी…

ठाकुर साहब को दो तीन थप्पड़ रसीद कर बोली- ‘कुत्ते, तेरी यह हिम्मत!’

: उपन्यास – लोक कवि अब गाते नहीं (4) : कल परसों में तो जैसा कि पत्रकार ने लोक कवि को आश्वासन दिया था बात नहीं बनी लेकिन बरसों भी नहीं लगे। कुछ महीने लगे। लोक कवि को इसके लिए बाकायदा आवेदन देना पड़ा। फाइलबाजी और कई गैर जरूरी औपचारिकताओं की सुरंगों, खोहों और नदियों से लोक कवि को गुजरना पड़ा।

बाकी चीजों की तो लोक कवि को जैसे आदत सी हो चली थी लेकिन जब पहले आवेदन देने की बात आई तो लोक कवि बुदबुदाए भी कि, ‘इ सम्मान तो जइसे नौकरी हो गया है।’ फिर उन्हें अपने आकाशवाणी वाले ऑडिशन टेस्ट के दिनों की याद आ गई। जिस में वह कई बार फेल हो चुके थे। उन दिनों की याद कर के वह कई बार घबराए भी कि कहीं इस सम्मान से भी ‘आउट’ हो गए तो ? फिर फेल हो गए तो ? तब तो समाज में बड़ी फजीहत हो जाएगी। और मार्केट पर भी असर पड़ेगा। लेकिन उन्हें अपनी किस्मत पर गुमान था और पत्रकार पर भरोसा। पत्रकार पूरे मनोयोग से लगा भी रहा। बाद में तो उसने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया।

और अंततः लोक कवि के सम्मान की घोषणा हो गई। बाकी तिथि, दिन, समय और स्थान की घोषणा शेष रह गई थी। इसमें भी बड़ी दिक्कतें पेश आईं। लोक कवि एक रात शराब पी कर होश और पेशेंस दोनों खो बैठे। कहने लगे, ‘जहां कलाकार हूं वहां हूं। मुख्यमंत्री के यहां तो भडुवे से भी गई गुजरी स्थिति हो गई है हमारी।’ वह भड़के, ‘बताइए सम्मान के लिए अप्लीकेशन देना पड़ा जैसे सम्मान नहीं नौकरी मांग रहे हों। चलिए अप्लीकेशन दे दिया। और भी जो करम करवाया कर दिया। सम्मान ‘एलाउंस’ हो गया। अब डेट एलाउंस करवाने में पापड़ बेल रहा हूं। हम भी और पत्रकार भी। वह और जोर से भड़के, ‘बताइए इ हमारा सम्मान है कि अपमान! बताइए आप ही लोग बताइए!’ वह दारू महफिल में बैठे लोगों से प्रश्न पूछ रहे थे। पर इस के भी उत्तर में सभी लोग ख़ामोश थे। लोक कवि की पीर को पर्वत में तब्दील होते देख सभी लोग दुखी थे। चुप थे। पर लोक कवि चुप नहीं थे। वह तो चालू थे, ‘बताइए लोग समझते हैं कि मैं मुख्यमंत्री का करीबी हूं, मेरे गाए बिना उनका भाषण नहीं होता और न जाने क्या-क्या!’ वह रुके और गिलास की शराब देह में ढकेलते हुए बोले, ‘लेकिन लोग का जानें कि जो सम्मान बंबई के भडुवे बेभाव यहां से बटोर कर ले जा रहे हैं वही सम्मान यहां के लोग पाने के लिए अप्लीकेशन दे रहे हैं। नाक रगड़ रहे हैं।’ इस दारू महफिल में संयोग से लोक कवि का एकालाप सुनते हुए चेयरमैन साहब भी उपस्थित थे लेकिन वह भी सिरे से ख़ामोश थे। दुखी थे लोक कवि के दुख से। लोक कवि अचानक भावुक हो गए और चेयरमैन साहब की ओर मुख़ातिब हुए, ‘जानते हैं, चेयरमैन साहब, ई अपमान सिर्फ मेरा अपमान नहीं है सगरो भोजपुरिहा का अपमान है।’ बोलते-बोलते अचानक लोक कवि बिलख कर रो पड़े। रोते-रोते ही उन्होंने जोड़ा, ‘एह नाते जे ई मुख्यमंत्री भोजपुरिहा नहीं है।’

‘ऐसा नहीं है।’ कहते-कहते चेयरमैन साहब जो बड़ी देर से ख़ामोशी ओढ़े हुए लोक कवि के दुख में दुखी बैठे थे, उठ खड़े हुए। वह लोक कवि के पास आए खड़े-खड़े ही लोक कवि के सिर के बालों को सहलाया, उनकी गरदन को हौले से अपनी कांख में भरा लोक कवि के गालों पर उतर आए आंसुओं को बड़े प्यार से हाथ से ही पोंछा और पुचकारा। फिर आह भर कर बोले, ‘का बताएं अब हमारी पार्टी की सरकार नहीं रही, न यहां, न दिल्ली में।’ वह बोले, ‘लेकिन घबराने और रोने की बात नहीं। कल ही मैं पत्रकार को हड़काता हूं। दो-एक अफसरों से बतियाता हूं। कि डेट डिक्लेयर करो!’ वह थोड़ा अकड़े और बोले, ‘ख़ाली सम्मान डिक्लेयर करने से का होता है?’ फिर वह लोक कवि के पास ही अपनी कुर्सी खींच कर बैठ गए। और लोक कवि से बोले, ‘लेकिन तुम धीरज काहे को खोते हो। सम्मान डिक्लेयर हुआ है तो डेट भी डिक्लेयर होगा ही। सम्मान भी मिलेगा ही।’

‘लेकिन कब ?’ लोक कवि अकुलाए, ‘दुई महीना त हो गया।’

‘देखो ज्यादा उतावलापन ठीक नहीं।’ चेयरमैन साहब बोले, ‘तुम्हीं कहा करते हो कि ज्यादा कसने से पेंच टूट जाता है तो का होगा ? जइसे दो महीना बीता चार छः महीना और सही।’

‘चार छः महीना !’ लोक कवि भड़के।

‘हां भई, ज्यादा से ज्यादा।’ चेयरमैन साहब लोक कवि को दिलासा देते हुए बोले, ‘एसे ज्यादा का सताएंगे साले।’

‘यही तो दिक्कत है चेयरमैन साहब।’

‘का दिक्कत है ? बताओ भला ?’

‘आप कह रहे हैं न कि ज्यादा से ज्यादा चार छः महीना !’

‘हां, कह रहा हूं।’ चेयरमैन साहब सिगरेट जलाते हुए बोले।

‘तो यही तो डर है कि का पता छः महीना इ सरकार रहेगी भी कि नहीं। कहीं गिर गिरा गई तो ?’

‘बड़ा दूर का सोचता है तुम भई।’ चेयरमैन साहब दूसरी सिगरेट सुलगाते हुए बोले, ‘कह तुम ठीक रहे हो। इ साले रोज तो अखाड़ा खोल रहे हैं। कब गिर जाए सरकार कुछ ठीक नहीं। तुम्हारी चिंता जायज है कि यह सरकार गिर जाए और अगली सरकार जिस भी किसी की आए, क्या गारंटी है कि इस सरकार के फैसलों को वह सरकार भी माने ही!’

‘तो ?’

‘तो का। कल ही कुछ करता हूं।’ कह कर घड़ी देखते हुए चेयरमैन साहब उठ गए। बाहर आए। लोक कवि के साथ और लोग भी आ गए।

चेयरमैन साहब की एंबेसडर स्टार्ट हो गई और इधर दारू महफिल बर्खास्त।

दूसरी सुबह चेयरमैन साहब ने पत्रकार से इस विषय पर फोन पर चर्चा की, रणनीति के दो तीन गणित बताए और कहा कि, ‘क्षत्रिय हो कर भी तुम इस अहिर मुख्यमंत्री के मुंहलगे हो, अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग करवा सकते हो, लोक कवि के लिए सम्मान डिक्लेयर करवा सकते हो, पचासियों और काम करवा सकते हो लेकिन लोक कवि के सम्मान की डेट नहीं डिक्लेयर करवा सकते?’

‘का बात करते हैं चेयरमैन साहब। बात चलाई तो है डेट के लिए भी। डेट भी जल्दी एनाउंस हो जाएगी।’ पत्रकार निश्चिंत भाव से बोला।

‘कब एनाउंस होगी डेट जब सरकार गिर जाएगी तब ? उधर लोक कविया अफनाया हुआ है।’ चेयरमैन साहब भी अफनाए हुए बोले।

‘सरकार तो अभी नहीं गिरेगी।’ पत्रकार ने, गहरी सांस ली और बोला, ‘अभी तो चेयरमैन साहब, चलेगी यह सरकार। बाकी लोक कवि के सम्मान की डेट एनाउंसमेंट ख़ातिर कुछ करता हूं।’

‘जो भी करना हो भाई जल्दी करो।’ चेयरमैन साहब बोले, ‘यह भोजपुरिहों के आन की बात है। और फिर कल यही बात कर के लोक कवि रो पड़ा।’ वह बोले, ‘और सही भी यही है कि इस अहिर मुख्यमंत्री ने किसी और भोजपुरिहा को तो अभी तक इ सम्मान दिया नहीं है। तुम्हारे कहने सुनने से लोक कवि को अहिर मान कर जो कि वह है नहीं किसी तरह सम्मान डिक्लेयर कर दिया लेकिन डेट डिक्लेयर करने में उसकी क्यों फाट रही है?’

‘ऐसा नहीं है चेयरमैन साहब।’ वह बोला, ‘जल्दी ही मैं कुछ करता हूं।’

‘हां भाई, जल्दी कुछ करो कराओ। आखि़र भोजपुरी के आन-मान की बात है!’

‘बिलकुल चेयरमैन साहब !’

अब चेयरमैन साहब को कौन बताता कि इन पत्रकार बाऊ साहब के लिए भी लोक कवि के सम्मान की बात उन की जरूरत और उनके आन की भी बात थी। यह बात चेयरमैन साहब को भी नहीं, सिर्फ लोक कवि को ही मालूम थी और पत्रकार बाऊ साहब को। पत्रकार ने कहीं इसकी फिर चर्चा नहीं की। और लोक कवि ने इस बात को किसी को बताया नहीं। बताते भी कैसे भला? लोक कवि खुद ही इस बात को भूल चुके थे।

डांसर निशा तिवारी की बात !

लेकिन पत्रकार को यह बात याद थी। चेयरमैन साहब से फोन पर बात के बाद पत्रकार की नसें निशा तिवारी के लिए फिर तड़क गई। नस-नस में निशा का नशा दौड़ गया। और दिमाग को भोजपुरी के आन के सवाल ने डंस लिया।

पत्रकार चाहता तो जैसे मुख्यमंत्री से कह कर लोक कवि का सम्मान घोषित करवाया था, वैसे ही उन से कह कर तारीख़ भी घोषित करवा सकता था। पर जाने क्यों ऐसा करने में उसे हेठी महसूस हुई। सो चेयरमैन साहब की बताई रणनीति को तो पत्रकार ने ध्यान में रखा ही खुद भी एक रणनीति बनाई। इस रणनीति के तहत उसने कुछ नेताओं से फोन पर ही बात की। और बात ही बात में लोक कवि के सम्मान का जिक्र चलाया और कहा कि आप अपने क्षेत्र में ही क्यों नहीं इस का आयोजन करवा लेते? कमोवेश हर नेता से उसके क्षेत्र के मुताबिक गणित बांध कर लगभग अपनी ही बात नेता के मुंह में डाल कर उस से पत्रकार ने प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी ले ली। एक मंत्री से कहा कि बताइए उसका गृह जनपद और आपका क्षेत्र सटे-सटे हैं तो क्यों नहीं सम्मान समारोह आप अपने क्षेत्र में करवाते हैं, आपकी धाक बढ़ेगी। किसानों के एक नेता से कहा कि बताइए लोक कवि तो अपने गानों में किसानों और उनकी माटी की ही बात गाते हैं और सही मायने में लोक कवि का श्रोता वर्ग भी किसान वर्ग है। किसानों, मेड़, खेत खलिहानों में गानों के मार्फत जितनी पैठ लोक कवि की है, उतनी पैठ है और किसी की? नहीं न, तो आप इसमें पीछे क्यों हैं? और सच यह है कि इस सम्मान समारोह के आयोजन का संचालन सूत्र सही मायने में आपके ही हाथों होना चाहिए। जब कि मजदूरों की एक बड़ी महिला नेता और सांसद से कहा कि शाम को थक हार कर मजदूर लोक कवि के गानों से ही थकावट दूर करता है तो मजदूरों की भावनाओं को समझने वाले गायक का सम्मान मजदूरों के ही शहर में होना चाहिए। और जाहिर है सभी नेताओं ने लोक कवि के सम्मान की क्रेडिट लेने, वोट बैंक पक्का करने के फेर में लोक कवि का सम्मान अपने-अपने क्षेत्रों में कराने की गणित पर अपनी-अपनी टिप्पणियों में जोर मारा। बस पत्रकार का काम हो गया था। उसने दो एक दिन और इस चर्चा को हवा दी और हवा ने चिंगारी को जब शोला बनाना शुरू कर दिया तभी पत्रकार ने अपने अख़बार में एक स्टोरी फाइल कर दी कि लोक कवि के सम्मान की तारीख़ इस लिए फाइनल नहीं हो पा रही है कि क्यों कि कई नेताओं में होड़ लग गई है। अपने-अपने क्षेत्र में लोक कवि का सम्मान हर नेता करवाना चाहता है। तब जब कि पत्रकार भी जानता था कि योजना के मुताबिक लोक कवि का सम्मान उनके गृह जनपद में ही संभव है फिर भी लगभग सभी नेताओं की टिप्पणियों को वर्बेटम कोड करके लिखी इस ‘स्टोरी’ से न सिर्फ लोक कवि के सम्मान की तारीख़ जल्दी ही घोषित हो गई बल्कि उन के गृह जनपद की जगह भी घोषित हो गई। साथ ही लोक कवि की ‘लोकप्रियता’ की पब्लिसिटी भी हो गई।

लोक कवि की लय इन दिनों कार्यक्रमों में देखते ही बनती थी। ऐसे ही एक कार्यक्रम में पत्रकार भी पहुंच गया। ग्रीन रूम में बैठ कर शराब पीते हुए बार-बार कपड़े बदलती हुई लड़कियों की देह भी वह कभी कनखियों से तो कभी सीधे देखता रहा। पत्रकार की मयकशी में मंच से आते-जाते लोक कवि भी शरीक होते रहे। दो तीन लड़कियों को भी चोरी छुपे पत्राकर ने दो एक पेग पिला दी। एक लड़की पर दो चार बार हाथ भी फेरा। इस फेर में डांसर निशा तिवारी को भी उसने पास बुलाया। लेकिन वह पत्रकार के पास नहीं फटकी। उलटे तरेरने लगी। पत्रकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और शराब पीता रहा। जाने उसकी ठकुराई उफना गई कि शराब का सुरूर था कि निशा की देह की ललक, चद्दर ओढ़ कर कपड़े बदलती निशा को पत्रकार ने अचानक लपक कर पीछे से दबोच लिया। वह उसे वहीं लिटाने के उपक्रम में था कि निशा तब तक संभल चुकी थी और उसने पलट कर ठाकुर साहब को दो तीन थप्पड़ धड़ाधड़ रसीद किए और दोनों हाथों से पूरी ताकत भर ढकेलते हुए बोली, ‘कुत्ते, तेरी यह हिम्मत!’ ठाकुर साहब पिए हुए तो थे ही निशा के ढकेलते ही वह भड़भड़ा कर गिर पड़े। निशा ने सैंडिल पैर से निकाले और ले कर बाबू साहब की ओर लपकी ही थी कि मंच पर इस बारे में ख़बर सुन कर ग्रीन रूम में भागे आए लोक कवि ने निशा के सैंडिल वाले हाथों को पीछे से थाम लिया। बोले, ‘ये क्या कर रही है ?’ वह उस पर बिगड़े भी, ‘चल पैर छू कर माफी मांग।’

‘माफी मैं नहीं ये मुझसे मांगें गुरु जी!’ निशा बिफरी, ‘बदतमीजी इन्होंने मेरे साथ की है।’

‘धीरे बोलो ! धीरे।’ लोक कवि खुद आधे सुर में बोले, ‘मैं कह रहा हूं माफी मांगो।’

‘नहीं, गुरु जी।’

‘मांग लो मैं कह रहा हूं।’ कह कर लोक कवि बोले, ‘यह भी तुम्हारे लिए गुरु हैं।’

‘नहीं गुरु जी !’

‘जैसा कह रहा हूं फौरन करो!’ वह बुदबुदाए, ‘तमाशा मत बनाओ। और जैसा यह करें करने दो।’ लोक कवि और धीरे से बोले, ‘जैसा कहें, वैसा करो।’

‘नहीं !’ निशा बोली तो धीरे से लेकिन पूरी सख़्ती से। लोक कवि ने यह भी गौर किया कि इस बार उसने ‘नहीं’ के साथ ‘गुरु जी’ का संबोधन भी नहीं लगाया। इस बीच पत्रकार बाबू साहब तो लुढ़के ही पड़े रहे पर आंखों में उनकी आग खौल रही थी। ग्रीन रूम में मौजूद बाकी लड़कियां, कलाकार भी सकते में थे पर ख़ामोशी भरा गुस्सा सबकी आंखों में सुलगता देख लोक कवि असमंजस में पड़ गए। उन्होंने अपनी एक ‘लेफ्टीनेंट’ लड़की को आंखों ही आंखों में निशा को संभालने के लिए कहा और खुद पत्रकार की ओर बढ़ गए। एक कलाकार की मदद से उन्होंने पत्रकार को उठाया। बोले, ‘आप भी ई सब का कर देते हैं बाबू साहब?’

‘देखिए लोक कवि मैं और बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकता।’ बाबू साहब दहाड़े, ‘जरा सा पकड़ लिया इस छिनार को तो इसकी ये हिम्मत।’

‘धीरे बोलिए बाबू साहब।’ लोक कवि बुदबुदाए, ‘बाहर हजारों पब्लिक बैठी है। का कहेंगे लोग !’

‘चाहे जो कहें। मैं आज मानने वाला नहीं।’ बाबू साहब बोले, ‘आज यह मेरे नीचे सोएगी। बस! मैं इतना ही जानता हूं।’ नशे में वह बोले, ‘मेरे नीचे सोएगी और मुझे डिस्चार्ज करेगी। इससे कम पर कुछ नहीं!’

‘अइसेहीं बात करेंगे?’ लोक कवि बाबू साहब के पैर छूते हुए बोले, ‘आप बुद्धिजीवी हैं। ई सब शोभा नहीं देता आप को।’

‘आप को शोभा देता है ?’ बाबू साहब बहकते हुए बोले, ‘आपका मेरा सौदा पहले ही हो चुका है। आपका काम तो डन हो गया और मेरा काम ?’

बाबू साहब की बात सुन कर लोक कवि को पसीना आ गया। फिर भी वह बुदबुदाए, ‘अब इहां यही सब चिल्लाएंगे ?’ वह भुनभुनाए, ‘ई सब घर चल कर बतियाइएगा।’

‘घर क्यों ? यहीं क्यों नहीं !’ बाबू साहब लोक कवि पर बिगड़ पड़े, ‘बोलिए आज यह मुझे डिस्चार्ज करेगी कि नहीं ? मेरे नीचे लेटेगी कि नहीं ?’

‘इ का-का बोल रहे हैं ?’ लोक कवि हाथ जोड़ते हुए खुसफुसाए।

‘कोई खुसफुस नहीं।’ बाबू साहब बोले, ‘क्लियर-क्लियर बता दीजिए हां कि ना!’

‘चुप भी रहेंगे कि अइसेही बेइज्जती कराएंगे?’

‘मैं समझ गया आप अपने वायदे से मुकर रहे हैं।’

लोक कवि चुप हो गए।

‘ख़ामोशी बता रही है कि वादा टूट गया है।’ बाबू साहब ने लोक कवि को फिर कुरेदा।

लेकिन लोक कवि फिर भी चुप रहे।

‘तो सम्मान कैंसिल !’ बाबू साहब ने बात जरा और जोर से दोहराई, ‘लोक कवि आपका सम्मान कैंसिल ! मुख्यमंत्री का बाप भी अब आप को सम्मान नहीं दे पाएगा।’

‘चुप रहीं बाबू साहब !’ लोक कवि के एक साथी कलाकार ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘बाहर बड़ी पब्लिक है।’

‘कुछ नहीं सुनना मुझे !’ बाबू साहब बोले, ‘लोक कवि ने निशा कैंसिल की और मैंने सम्मान कैंसिल किया। बात ख़त्म।’ कह कर बाबू साहब शराब की बोतल और गिलास एक-एक हाथ में लिए उठ खड़े हुए। बोले, ‘मैं चलता हूं।’ और वह सचमुच ग्रीन रूम से बाहर निकल गए। माथे पर हाथ रखे बैठे लोक कवि ने चैन की सांस ली। कलाकारों को हाथ के इशारे से आश्वस्त किया। निशा के सिर पर हाथ रख कर उसे आशीर्वाद दिया, ‘जीती रहो।’ फिर बुदबुदाए, ‘माफ करना !’

‘कोई बात नहीं गुरु जी।’ कह कर निशा ने भी अपनी ओर से बात ख़त्म की। लेकिन लोक कवि रो पड़े। भरभर-भरभर। लेकिन जल्दी ही उन्होंने कंधे पर रखे अंगोछे से आंख पोंछी, धोती की निचली कोर उठाए, हाथ में तुलसी की माला लिए मंच के पीछे पहुंच गए। उन्हीं का लिखा युगल गीत उन के साथी कलाकार गा रहे थे, ‘अंखिया बता रही है लूटी कहीं गई है।’ लोक कवि ने पैरों को गति दे कर थोड़ा थिरकने की कोशिश की और एनाउंसर को इशारा किया कि मुझे मंच पर बुलाओ।

एनाउंसर ने ऐसा ही किया। लोक कवि मंच पर पहुंचे और इशारा कर कंहरवा धुन पकड़ी। फिर भरे गले से गाने लगे, ‘नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला।’ गाते-गाते पैरों को गति दी पर पैर तो क्या मन ने भी साथ नहीं दिया। अभी वह पहले अंतरे पर ही थे कि उनकी आंख से आंसू फिर ढलके। लेकिन वह गाते ही रहे, ‘नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला।’ इस समय उनकी इस गायकी की लय में ही नहीं, उन के पैरों की थिरकन में भी अजीब सी करुणा, लाचारी और बेचारगी समा गई थी। वहां उपस्थित श्रोताओं दर्शकों ने ‘इस सब’ को लोक कवि की गायकी का एक अविरल अंदाज माना लेकिन लोक कवि के संगी साथी भौचक्के भी थे और सन्न भी। लेकिन लोक कवि असहज होते हुए भी गायकी को साधे हुए थे। हालांकि सारा रियाज रिहर्सल धरा का धरा रहा गया था संगतकार साजिंदों का। लेकिन जैसे लोक कवि की गायकी ने बेचारगी की लय थाम ली थी संगतकार भी ‘फास्ट’ की जगह ‘स्लो’ हो गए थे बिन संकेत, बिन कहे।

और यह गाना ‘नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला’ सचमुच विरल ही नहीं, अविस्मरणीय भी बन रहा था। ख़ास कर तब और जब वह ठेका दे कर गाते, ‘हमरी न मानो….’ बिलकुल दादरा का रंग टच दे कर तकलीफ का जो दंश वह बो दे रहे थे अपनी गायकी के मार्फत वह बिसारने वाला था भी नहीं। वह जैसे बेख़बर गा रहे थे, और रो रहे थे। लेकिन लोग उन का रोना नहीं देख पा रहे थे। कुछ आंसू माइक छुपा रहा था तो काफी कुछ आंसू उनकी मिसरी सी मीठी आवाज में बहे जा रहे थे। कुछ सुधी श्रोता उछल कर बोले भी कि, ‘आज तो लोक कवि ने कलेजा निकाल कर रख दिया।’ उनकी गायकी सचमुच बड़ी मार्मिक हो गई थी।

यह गाना अभी ख़त्म हुआ भी नहीं था कि लोक कवि एक दूसरे गाने पर आ गए, ‘माला ये माला बीस, आने का माला!’ फिर कई भगवान, देवी देवताओं से होते हुए वह कुछ महापुरुषों तक माला महिमा का बखान करते इस गाने में तंज, करुणा और सम्मान का कोलाज रचने लग गए। कोलाज रचते-रचते अचानक वह फिर से पहले वाले गाने, ‘नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला।’ पर आ गए। सुधी लोगों ने समझा कि लोक कवि एक गाने से दूसरे गाने में फ्यूजन जैसा कुछ कर रहे हैं। या कुछ नया प्रयोग, नई स्टाइल गढ़ रहे हैं। पर सच यह था कि लोक कवि माला को सम्मान का प्रतीक बता उसे पैसे से जोड़ कर अपने अपमान का रूपक रच रहे थे। अनजाने ही। अपने मन के मलाल को धो रहे थे।

….जारी….

दयानंद पांडेयउपन्यासकार दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले के भागों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- 1 2 3

‘अपने-अपने युद्ध’ और पत्रकारों की बिरादरी

अमिताभ ठाकुर
अमिताभ ठाकुर
दयानंद जी एक स्थापित पत्रकार और लब्धप्रतिष्ठ उपन्यासकार हैं और इस रूप में उनके उपन्यासों में पत्रकार बिरादरी और पत्रकारिता का एक अच्छा-खासा ब्यौरा स्वाभाविक तौर पर रहता है. जाहिर है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पृष्ठभूमि से अलग नहीं हो सकता. सूरदास जी के “जैसे उड़े जहाज के पंछी, पुनि जहाज़ पे आवे” की तरह हम में से हर व्यक्ति अपने पास्ट से इस कदर जुड़ा होता है कि वह चाह कर भी उससे जुदा नहीं हो पाता.

मैं कुछ लिखूंगा-पढूंगा या बातें करूँगा तो अपने जन्मस्थान सीतामढ़ी, अपने निवास स्थान बोकारो, अपने कॉलेज आईआईटी कानपुर, अपनी नौकरी आईपीएस जैसी बातों से बहुत अलग कैसे रह पाऊंगा, घूम-फिर कर इन पर आ ही जाऊँगा. इसी तरह दयानंद जी जब कुछ लिखेंगे तो अपने गोरखपुर, अपने पूर्वांचल, अपनी पत्रकारिता, जनसत्ता, स्वतंत्र भारत, लखनऊ प्रेस क्लब आदि से बहुत दूर कैसे जा सकते हैं. जिस प्रकार अपने-अपने युद्ध का हर पात्र अपनी-अपनी परिधि में, अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार अपनी लड़ाइयों में लगा रहता है, उसी प्रकार से ज्यादातर उपन्यासकार भी अपने स्वयं के जीवनवृत्त से प्रभावित होते रहते हैं.

इस उपन्यास में मुख्य पात्र संजय स्वयं ही पत्रकार हैं और लगभग हर तरह से वह एक नायक की तरह प्रस्तुत है, जो अनवरत व्यवस्था से लड़ता रहता है और हार-जीत की परवाह किये बगैर अपने उसूलों पर खड़ा रहता है. संजय जैसे पत्रकार शायद अब गिनती में हों. अपना इतना नुकसान करा कर, अपने उसूलों के लिए अपने आप को क्षति पहुंचा कर और अद्वितीय क्षमता के धनी होने के बावजूद लघु स्वार्थों को निरंतर तिरस्कृत करते हुए, अपनी मान्यताओं और अपने नैतिक मानदंडों पर स्वयं को खड़ा रख पाने की चाहत में नुकसान पाता हुआ संजय जिस प्रकार से पूरे उपन्यास में एक पारदर्शी और समरूप आचरण करता है, वह निश्चित तौर पर अनुकरणीय है. संजय के पात्र में मुझे साफ़ तौर पर दयानंद जी का स्वयं का अक्स नज़र आता है और इस रूप में उपन्यासकार के प्रति आदर के भाव जागृत होते हैं.

लेकिन इसके साथ मुझे इसमें जो तीन मजेदार किस्म के पत्रकार नज़र आये मैं उनका ही विषद विवरण पेश करना चाहूँगा. इसमें पहले हैं अलोक जोशी, जो संजय जी के साथ नयी दिल्ली में काम करते हैं. उपनाम जोशी लिखा है पर जितनी मेरी जानकारी है ये एक वास्तविक, बहुत ही जीवंत, जुझारू, होनहार पत्रकार हैं, जिनका लोहा आज भी हर कोई मानता है. मस्तमौला, झक्की और कुछ लड़ाका सा, यह व्यक्ति तान कर लिखता है, अपनी मर्जी से लिखता है, ऐसा लिखता है जिसे लोग पढ़ते और पसंद करते हैं और जिसे चाहने वालों के साथ उससे नाराज़ लोगों की भी एक अच्छी-खासी संख्या रहती है, जो उनके पीछे पड़े तो रहते हैं पर उनका कुछ खास बिगाड़ नहीं पाते, क्योंकि इस मर्जी के मालिक और प्रतिभाशाली पत्रकार में इतनी सारी खासियतें भी हैं कि बड़े से बड़ा संस्थान इनकी अनिवार्यता को स्वीकार करता है. जो मन हो सो कहा, जो मन हो लिखा, जिस तरह मन हो बर्ताव किया, फिर भी अपनी शर्तों पर इस दम से बने रहे क्योंकि प्रतिभा ऐसी है कि क्या कर लोगे. तभी तो संपादकों से सीधी कच-कच करते रहते, एक बात के बदले तीन उत्तर देते पर फिर भी अपने आप को सुरक्षित रख पाते. मैं यही सोचता हूँ कि काश इस तरह के लोग और अधिक संख्या में हो सकें. ऐसा इसीलिए कह रहा हूँ कि अब ये आम मान्यता हो गयी है कि अब पत्रकारों में भी ऐसे लोगों की भारी कमी होती जा रही है जो अपनी मर्जी के मालिक हों, जो अपने मन से चल सकें और जिनकी रीढ़ की हड्डी पूरी तरह लचीली नहीं हो गयी हो. “जंजीर” फिल्म में प्राण अमिताभ बच्चन के पात्र के लिए कहते हैं कि उनकी पूरी रक्षा होनी चाहिए, क्योंकि जंगल में शेर बहुत कम रह गए हैं, यही बात अलोक जोशी के लिए भी लागू होती है.

दूसरे पात्र हैं दिल्ली में संजय के कार्यकाल में उसी अखबार के एक दूसरे पत्रकार, सुरेन्द्र मोहन तल्ख़, उर्दू में सिद्धहस्त पर हिंदी में काफी दिक्कत महसूस करने वाले ये महोदय कोई कम खिलाड़ी नहीं हैं, पर अपनी एक अलग विधा के. मैं उनके चरित्र के दो पहलुओं को खास तौर पर चित्रित करना चाहूँगा. एक तो उनके ऐंठे रहने की अदा और दूसरे उनके रसिक मिजाज होने का मामला. मैंने स्वयं अपने जीवन में छोटे-बड़े हर जगह पर कुछ ऐसे वरिष्ठ पत्रकार देखे हैं जो बने-ठने रहते हैं, अपने बनाव-श्रृंगार को ले कर काफी चिंतित रहते है और साथ ही घमंड में फूले भी रहते हैं. ऐसे पात्र बहुधा अपने वर्क-प्लेस पर तथा पत्रकार बिरादरी में अन्य साथी पत्रकारों से कोई खास सम्बन्ध नहीं बना पाते और इस तरह दूसरे पत्रकार इन्हें परेशान करने, चिढ़ाने का कोई ना कोई बहाना खोजते ही रहते हैं. जैसा तल्ख़ साहब के साथ हुआ, जब उन्होंने रस-सिद्धि और मौजमस्ती के लिए अपने दफ्तर की टेलीफोन ऑपरेटर को एक शो के टिकट दिए, जो एक हाथ से दूसरे हाथ चल के एक दूसरे पत्रकार सुजानपुरिया के हाथों में चला गया और इस तरह जब तल्ख़ अपने बगल में बैठे सुजानपुरिया को वह टेलीफोन ऑपरेटर समझते हुए उनका हाथ मसलने की कोशिश करते हैं और उनकी भयानक भद्द होती है. फिर उनका अकड़ा हुआ स्वभाव भी उनकी इस कहानी को तुरंत पूरे दफ्तर में फैलाने और दूसरे पत्रकारों को मज़ा ले कर किस्सागोई करने का काम करता है, लेकिन मजेदार बात यह दिखती है कि इतना सब के होने के बाद भी तल्ख़ महोदय की पेशानी पर बल नहीं आता और वे अपनी मगरूरी में उतने ही मगन रहते हैं, जितना पहले रहा करते थे. “कुत्ते की पूंछ” मुहावरा ऐसे ही थोड़े बनाया गया है.

अब मैं तीसरे पात्र को प्रस्तुत करता हूँ. ये वही हैं जो अंत में संजय को चित-पट करने में सफल होते हैं. संयोग से मैंने ऐसे भी कुछ पत्रकारगण अपने वास्तविक जीवन में देखे है जो श्याम सिंह सरोज की तरह ही हैं- पूरी तरह. गज़ब के चिपकू, पूरी तरह घाघ, ऊपर से बाहरी तौर पर बहुत ही मासूम, देखने के सीधे-सादे, चौबीस घंटे अपने स्वार्थ-हित में लगे हुए, अंदर से बहुत ही क्रूर और भयानक पर बाहर से बहुत साधारण तथा सरल. हद दर्जे के महत्वाकांक्षी पर निरंतर बहुत चतुराई से अपने मन की उछालों को छिपा कर रख सकने में निपुण. सरोज जी, जैसा कि उन्हें सब कहते हैं और स्वयं संजय भी नहीं चाहते हुए उनके लिए इसी नाम का प्रयोग करते हैं, ऐसी शख्सियत हैं जिनके बगैर कोई भी अखबारी (या शायद कोई भी) दफ्तर पूरा नहीं हो सकता. अंदर से भयानक सांप-जहरीले और खतरनाक और ऊपर से बेहद निरीह, इन श्याम सिंह सरोजों की यह खासियत होती है कि वे ना कुछ करते हैं और ना कुछ नहीं करने देते हैं- बस बैठे बैठे अपनी गोटियां खेलते रहते हैं. और चूँकि वे कभी मैदान छोड़ते नहीं, इसीलिए आगे-पीछे कुछ ना कुछ हासिल भी कर लेते हैं- किसी भी शर्त पर.

अंत में इन तीनों के अलावा मैं संजय जी के लखनऊ प्रवास के दौरान उनके पहले संपादक नरेन्द्र जी का जिक्र करूँगा, जिन्होंने अपने संपादक काल में मुख्यमंत्री तक के रात्रिभोज के प्रस्ताव को अपने और अपने अखबार की गैरत के लिए, अपनी प्रतिष्ठा के लिए एक सिरे से ठुकरा दिया. मैं ऐसे सभी नरेन्द्र जी को सलाम करता हूँ और दयानंद जी से निवेदन करूँगा कि इस महान व्यक्तित्व का वास्तविक नाम हम लोगों को भी बताने की कृपा करें.

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों लखनऊ में पदस्थ हैं.

सेक्स, प्यार और मोरालिटी

अमिताभ ठाकुर
अमिताभ ठाकुर
मैं इधर दयानंद पाण्डेय जी का चर्चित उपन्यास “अपने-अपने युद्ध” पढ़ रहा था. मैंने देखा कि इसका नायक संजय, जो एक पत्रकार है और कई दृष्टियों से अपनी नैतिकता के प्रतिमानों को लेकर काफी सजग और चौकन्ना है. विभिन्न प्रकार की लड़कियों के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने में भी उतना ही महारथी है. पूरे उपन्यास में उसके संबंधों के बनने और फिर अलग-अलग कारणों से बिखर जाने का कार्यक्रम चलता ही रहता है.

यह भी सही है कि दयानंद जी संभवतः उन कतिपय हिंदी उपन्यासकारों में होंगे जो सेक्स सम्बंधित घटनाक्रम या दृश्यावलियों का इतना विषद और खुला वर्णन करते हों. कारण यह कि हमारे देश में सेक्स एक टैबू की तरह माना जाता है, जिसमे बहुधा यह अवधारणा होती है कि जिसे जो करना हो सो करे, इस विषय पर बहुत ज्यादा चर्चा की जरूरत नहीं है. यानी कि एक लुका-छिपा शास्त्र.

आप और हम यह देखते हैं कि अंग्रेजी के तमाम उपन्यासों में सेक्स एक अनिवार्य आवश्यकता होती है. यानी कि हर कुछ पन्नों के बाद कुछ ऐसे दृश्य शुरू हो जायेंगे जिनमे उपन्यास के पात्र शारीरिक रतिक्रिया में संलग्न हो जायेंगे. यानी कि उस पूरी प्रक्रिया का विधिवत विवरण होगा, काफी विस्तार से होगा और खास कर पाठक की सेक्स-जन्य जुगुप्सा तथा उत्तेजना के दृष्टिगत होगा. कई बार तो ऐसा साफ़ दिख जाएगा कि इस सेक्स सीन की और कोई जरूरत नहीं थी, सिवाय पाठक को बहलाने, फुसलाने और उसकी काम-इच्छाओं को टारगेट करने के, कुछ वैसे ही जैसे हमारी पुरानी फिल्मों में जानी वाकर या महमूद का किसी भी प्रकार से अधिरोपण मात्र इसीलिए किया जाता था ताकि दर्शकों को किसी भी तरीके से हंसा दिया जाए. यानी कि कहानी की मांग हो, ना हो इस बात से फर्क नहीं पड़ता. बस हँसाना है तो हँसाना है या फिर सेक्स सीन दिखाने हैं तो दिखाने हैं.

पर हिंदी के उपन्यासों में यह लगभग ना के बराबर रहा है और संभवतः आज भी यही स्थिति होगी. मैं इस रूप में दयानंद जी के इस कार्य की सराहना करता हूँ कि जो बात आम तौर पर परदे में छिपी रही थी उसे उन्होंने उत्साह और निर्भीकता के साथ सामने लाने का कार्य किया. सेक्स की मानव जीवन में महत्ता के विषय में मुझे या किसी और को लेक्चरर बनने की कोई जरूरत नहीं है. हम लोगों के परमप्रिय विद्वान मनोविज्ञानी फ्रायड ने इस पर अद्भुत कृतियाँ लिख कर इसे हमेशा के लिए सामने ला कर रख दिया है. बाद में फ्रायड के सिद्धांतों पर बड़ी बहसें हुईं, आलोचनाएं हुईं, वाद-प्रतिवाद हुए पर फ्रायड इतने सशक्त निकले कि लोग उनकी आलोचना तो करते रहे पर उन्हें खारिज नहीं कर सके.

भारत में फ्रायड के वैज्ञानिक सिद्धांतों की स्वीकार्यता भले हुई हो पर साहित्य में उनके असर के कारण सेक्स को सीधे-सीधे प्रकट किये जाने की परंपरा बहुत नहीं बन सकी है, कम से कम हिंदी साहित्य में तो नहीं. इसे और अधिक सीमित करते हुए यदि कहूँ तो कम से कम मेरी जानकारी और विस्तार के अनुसार. मैं यह नहीं कह रहा कि दयानंद जी ने जिस प्रकार से सेक्स को अपने उपन्यास में स्थान दिया है वह बिलकुल जेम्स बोंड का भारतीय प्रतिरूप बन गया हो, जहां मौके के सम्बन्ध का मतलब मात्र उसी क्षण के शारीरक सम्बन्ध से हो- ना आगा ना पीछा. यानी कि बैंकॉक गए, टोक्यो गए, लिस्बन गए या वाशिंगटन, बस कोई कन्या जेम्स भाईसाहब के संपर्क में आई, सम्बन्ध बना और फिर अगले ही क्षण दोनों अपने-अपने रास्ते.

इसके विपरीत दयानंद जी के संजय सम्बन्ध तो बनाते ही रहे, कभी रीना तो कभी साधना तो कभी मनीषा या चेतना से. पर फिर भी ये सम्बन्ध, सिवाय मनीषा वाले मामले को ले कर, कभी भी भावनात्मक अनुरागों और राग-विराग से अलग नहीं हो पाते. इसमें भी एक काबिलेगौर बात यह है कि इन समस्त सम्बंधों में भी स्त्री और पुरुष की मानसिकता में अंतर बहुत ही साफ़ तरीके से दिखता है. अखबार की टेलीफोन ऑपरेटर नीला को देखें या मंत्री की बेटी रीना को या फिर दूरदर्शन की कैजुवल एनाउंसर को या फिर लखनऊ की दिल पर चोट खायी लड़की को, इनमे से हर लड़की संजय से सेक्स सम्बन्ध बनाने के साथ ही उससे नियमित और वैधानिक सम्बन्ध (अर्थात विवाह बंधन) के पीछे भी पड़ जाती है. बल्कि उनमे से कई तो संजय को इस प्रकार से सम्बन्ध बना लेने और उसे एक स्थायी नाम और रूप नहीं देने के लिए उसे आरोपित भी करती हैं. मतलब यह हुआ कि आज भी, तमाम आधुनिकताओं और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों में बाद भी भारतीय स्त्री के मन की कई सारी वर्जनाएं यथावत हैं, जो बिना स्थायी और सामाजिक रूप से मान्य रिश्तों के, शरीर का सम्बन्ध बना तो लेती हैं पर कहीं ना कहीं उसकी मानसिक पीड़ा और बोझ से ग्रसित जरूर रहती हैं.

दूसरी बात जो देखने लायक है वह यह कि संजय एक विवाहित पुरुष है और उसकी पत्नी उपन्यास में हैमलेट के पिता के भूत की तरह अचानक आती-जाती रहती है. कुछ ऐसा लगता है कि संजय की पत्नी एक ऐसी व्यक्तित्व हो जिसका कोई वजूद ही नहीं हो, जिसकी कोई सोच या बुद्धि ही नहीं हो और जो मात्र एक चलती-फिरती जीव हो जिसका ना तो संजय से कोई विशेष लगाव हो, ना ही कोई हक हो और ना ही कोई इंसानी भावनाएं. तभी तो संजय महाराज जो चाहते हैं कर के आते हैं, जहां चाहते हैं सोते-जागते हैं और अपने पारिवारिक और विवाहित जीवन को ले कर पूरी तरह निश्चिन्त रहते हैं. इसके विपरीत यदि यह बात सोची जाए कि संजय की पत्नी भी एक भरा-पूरा और आज़ाद व्यक्तित्व होती और आचार्य रजनीश के देह, काम और सम्भोग विषयक सिद्धांतों का उसी हद तक, उसी तरीके से पालन कर रही होती जैसे संजय कर ले पा रहे थे, तब ही संजय के वास्तविक मन-मस्तिष्क और उसकी विचारधर्मिता की सच्ची परीक्षा हो पाती और इन सिद्धांतों का उचित निरूपण हो सकता.

कहने का अर्थ यह है कि सेक्स और काम-विषयक तमाम सिद्धांत एक पूरे सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए, ना सिर्फ केवल एक ऐसे पुरुष की मानसिकता से जिसे दोनों तरह के सुख मिल रहे हों- घर में एक स्थायी पत्नी की सुरक्षा और बाहर इच्छानुसार बदल-बदल कर मनभावन कन्या. साथ ही इस पूरी प्रक्रिया का नैतिकता के प्रश्न से जुड़ाव भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रश्न है. जैसा कि रीना संजय से प्रश्न भी करती है कि एक तरफ आप किसी की चमचागिरी या चरणचुम्बन को अनैतिक मानते हैं, किसी को अन्य प्रकार से धोखा देना अनैतिक मानते हैं, ससुर के बल पर आगे बढ़ने को अनैतिक मानते हैं पर क्या एक पत्नी के रहते हुए अन्येतर सम्बन्ध कायम करने को धोखागिरी या अनैतिक कर्म नहीं मानते. संजय इस प्रश्न का उत्तर देते हैं जिसमे वे देह के विज्ञान और शरीर की जरूरतों को विशेष बल देते हुए उसे मन के लगाव से अलग बताते हैं और कहते हैं कि उनका रीना (और इसी तरह शायद अन्य तमाम लड़कियों) से सम्बन्ध बनाना इसीलिए अनैतिक नहीं है क्योंकि यह पूरी तरह दोनों की रजामंदी से हुई थी, जिसमे संजय ने कोई छलावा नहीं किया था और ना ही किसी प्रकार के कोई सब्ज-बाग दिखाए थे. यह सही हो सकता है पर फिर भी रीना यह कह ही देती है कि ना चाहते हुए भी इस तरह के सम्बन्ध के पूर्व उसके मन में स्थायी रिश्ता बना लेने की चाह अवश्य थी.

मैं इससे बढ़ कर मात्र यह प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि यदि संजय या कोई भी व्यक्ति आचार्य रजनीश या किसी भी विचारक के सोच या स्वयं के विचारों के परिप्रेक्ष्य में फ्री सेक्स या परस्पर सहमति से शारीरिक संबंधों को बनाना इतना जायज़ और सहज मानता है तो फिर वह अपनी पत्नी के सामने यह भेद खुल जाने के डर से यकबयक क्यों घबराने लगता है? क्यों वह ऐसे कार्य उन तमाम लड़कियों के परिवारों से छिप-छिपा कर करना चाहता? इसके अलावा वह क्यों अपने और अपनी पत्नी के इस आयाम के प्रति समरूपी दृष्टिकोण नहीं अपना पाता है?

मैं इन प्रश्नों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि दयानंद जी द्वारा संजय के जरिये उठाये गए प्रश्न इतने सरल नहीं हैं जो मैं चंद शब्दों में उसका निश्चित और अंतिम उत्तर दे दूँ. मैंने भी यही उचित समझा है कि मैं इसी दिशा में कतिपय अन्य प्रश्न प्रस्तुत करूँ, जो इस डिबेट को आगे बढाने में सहायक हो सके.

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों लखनऊ में पदस्थ हैं.

अपने-अपने युद्ध (3)

भाग-2 से आगे : खैर, अजय अलका को लेकर बाहर आया। बाहर आकर अलका ने अपने घुंघरू उतारे। और दूसरे दिन उसने कथक नृत्य को तो नहीं पर कथक केंद्र को अलविदा कहने की सोची। अजय को उसने रोते-रोते यह बात बताई। जो अजय को भी नहीं भाई। अजय ने उसे ढांढस बंधाया और कहा कि महाराज कोई ठेकेदार तो नहीं है कथक नृत्य का। और यह कथक केंद्र उसके बाप का नहीं है। फिर भी अलका तीन दिन तक नहीं गई कथक पढ़ने-सीखने। कमरे ही में गुमसुम पड़ी लेटी रहती। चौथे दिन सुबह-सुबह अजय उससे हॉस्टल में मिलने आया। उसने फिर हौसला बंधाया। अलका कथक केंद्र जाने लगी। कथक केंद्र क्या जाने लगी, अजय से भेंट बढ़ने-बढ़ाने लगी। यह एन. एस. डी. में शायद पहली बार हो रहा था कि कोई लड़का एन. एस. डी. में इतर लड़की के साथ जोड़ा बनाकर घूम रहा था। नहीं ऐसे तो कुछ मामले जरूर थे जिनमें एन. एस. डी. के बाहर का नाम पर एन. एस. डी. रेपेट्री के साथ खास कर किसी लड़की  ने जोड़ा  एडॉप्ट किया हो। पर इससे कहीं और नहीं।

अजय को इधर एन. एस. डी. में और उधर अलका को कथक केंद्र में यह आपत्ति एक नहीं कई बार मजाक-मजाक में झेलनी पड़ी। पर शायद लोकेंद्र त्रिवेदी ही नाम था उस लड़के का। उसने एक दिन अचानक ही यह आपत्ति खारिज कर दी कि, ”एन. एस. डी. से बाहर अजय ने पेंग जरूर मारी है पर है कैम्पस के भीतर ही। यानी बहावलपुर हाउस के भीतर सो अबजेक्शन ओवर रूल।” कहते हुए उसने दिया सलाई की डब्बी कैरम की गोटी की तरह ऐसे उछाली कि वह गिलास में घुस गई। यह खेल उन दिनों एनएसडियनों के बीच आम था।

अलका-अजय अब दो जिस्म और एक जान थे। इत्तफाक से दोनों यू.पी. के थे। तो यह लगाव भी काम आया। पर दोनों विजातीय थे। सो दोनों ने अचानक जब शादी की ठान ली तो जाहिर है कि दोनों के परिवार वालों ने विरोध किया। पर विरोध को भाड़ में डाल कर शादी कर डाली उन्होंने। अलका-अजय से अब वह अजय-अलका हो गए थे। अब तक अजय एन. एस. डी. से एन. एस. डी. रेपेट्री आ गया था। अलका ने कथक केंद्र बीच में ही छोड़ दिया। जाहिर है कि महाराज जी ही अंततः कारण बने। पर अलका को कभी इसका पछतावा नहीं हुआ। बल्कि कभी-कभी तो वह इस घटना को अपने लिए शुभ भी मानती। कहती, ” नहीं अजय कैसे मिलते।”

संजय जब अलका-अजय से मिला तब तक अजय एन. एस. डी. रेपेट्री भी छोड़-छाड़ बिजनेस के जुगाड़ में लग गया था। एक लैंब्रेटा स्कूटर सेकेंड हैंड लेकर उसी पर दौड़ता रहता था। नाटक-वाटक उसके लिए अब उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया था। एन. एस. डी. की डिग्री उसे बेमानी जान पड़ती। और अंततः अलका ही की तरह वह भी एन. एस. डी. और नाटक को ”यों ही” मानने के बावजूद महत्वपूर्ण इसलिए मानता था कि इसी वजह से उसे अलका मिली थी।

अलका-अजय ने, ओह सारी, अजय-अलका ने शादी भले ही पारिवारिक विरोध के बावजूद की थी। पर अब दोनों परिवारों की स्वीकृति की मुहर भी लग गई थी और दोनों पक्षों का बाकायदा आना-जाना शुरू हो गया था। अजय को बिजनेस के लिए उसके पिता ने ही उकसाया था और कुछ हजार रुपए भी इस खातिर उसे दिए थे।

एक रोज संजय अचानक ही अजय-अलका के घर पहुंचा तो दोनों कहीं गए हुए थे। पर उसी समय अजय के पिता भी पहुंचे हुए थे। छूटते ही संजय से बोले, ”तुम भी नाटक करते हो?” उनके पूछने का ढंग कुछ अजीब-सा था। ऐसे जैसे वह पूछ रहे हों, ” तुम भी चोरी करते हो?”

पर जब संजय ने लगभग उसी अंदाज में कि, ”क्या तुम भी चोर हो?” कहा कि, ”नहीं।” और बड़ी कठोरता से दुहराया,”नहीं, बिलकुल नहीं।” तो उसके पिता थोड़ा सहज हुए और बताया कि वह अजय के पिता हैं। तो संजय ने उन्हें आदर और विनयपूर्वक नमस्कार किया।

वह बहुत खुश हुए।

फिर बात ही बात में जब उन्होंने जाना कि संजय पत्रकार है तो वह कुछ अनमने से हुए और जब यह जाना कि वह नाटकों आदि की समीक्षाएं भी लिखता है तो फिर से संजय से उखड़ गए। जिस संजय के लिहाज और संस्कार की वह थोड़ी देर पहले तारीफ करते नहीं अघा रहे थे उसी संजय में उन्हें अब अवगुण ही अवगुण दिखने लगे थे। वह धाराप्रवाह चालू हो गए थे,”आजकल के छोकरों का दिमाग ही खराब है। काम-धंधा छोड़कर नौटंकी में चले जाते हैं।” वह हांफने लगे थे, ” और तुम पेपर वाले इन छोकरों का छोकरियों के साथ फोटू छाप-छाप, तारीफ छापछूप कर और दिमाग खराब कर देते हो। जानते हो, इस नौटंकी और अखबार में छपी फोटू से कहीं जिंदगी की गाड़ा चलती है।” वगैरह-वगैरह वह गालियों के संपुट के साथ बड़ी देर तक उच्चारते रहे थे। फिर जब वह थककर चुप हो गए तो संजय उनसे लगभग विनयपूर्वक आज्ञा मांगते हुए चला तो वह फिर फूट पड़े, ” नौटंकी वालों के साथ रहते-रहते तुमको भी एक्टिंग आ गई है। मैं इतना भला बुरा तबसे बके जा रहा हूं और तुम फिर भी चरण चांपू अंदाज में इजाजत मांग रहे हो।”

”नहीं मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा। और फिर आप बुजुर्ग हैं। अजय के पिता हैं। मैं ऐक्टिंग क्यों करूंगा। आती भी नहीं मुझे।” संजय बोला तो वह फिर सामान्य हो गए। बोले, ”ऐक्टिंग नहीं आती तो ऐक्टरों के बारे में लिखना छोड़ दो। बहुतों का भला होगा।” संजय हंसते हुए चल पड़ा। फिर उसने सोचा अजय रंगकर्म कैसे निबाहता है?

और आज प्रेस क्लब जाते हुए अजय के पिता की यह बात सोच कर फिर हंसी आ रही थी कि ऐक्टिंग से छोकरे बरबाद होते हैं। फिर उसने खुद सोचा, क्या ऐक्टिंग से भी छोकरे बरबाद होते हैं? बिलकुल पाकीजा फिल्म के उस संवाद की तर्ज पर कि ”अफसोस कि लोग दूध से भी जल जाते हैं।” फिर अचानक उसने सोचा कि ऐक्टिंग करने वाले छोकरे  बरबाद होते हैं कि नहीं, इसपर वह बाद में सोचेगा। फिलहाल तो उसे यह सोचना है कि ऐक्टिंग सीखने वाले छोकरे आत्महत्या क्यों करते हैं? वह भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में। कभी पेड़ पर फांसी लगाकर, कभी छत के पंखे से फांसी लगाकर। तो कुछ नाखून ही उंगली से निकाल कर काम चला लेते हैं। और आत्महत्या पर विराम लगा देते हैं।

तो क्या यह एन. एस. डी. के डायरेक्टर पद से इब्राहिम अल्काजी के चले जाने का गैप था, या कारंत की निदेशकीय क्षमता का हास था। या कि कारंत और अल्काजी के बारी-बारी चले जाने की छटपटाहट की आंच थी, अनुशासन की, प्रशासन की नपुंसकता की थाह लेते समय की चाल थी, या एनएसडियनों की टूटती महत्वाकांक्षाओं का विराम थीं ये आत्महत्याएं ? या नये निदेशकों की अक्षमताओं और अनुभवहीनता का नतीजा?

कुछ ऐसा वैसा ही सोचते, सिगरेट फूंकते जब दूसरे दिन वह एन. एस. डी. की कैंटीन में पहुंचा तो विभा वहा दियासलाई की डब्बी कैरम की गोटी की तरह उछाल कर गिलास में गोल करने वाला खेल खेलती हुई चाय पीती जा रही थी। आज वह खुश भी थी। उसने संजय को विश भी किया और नमस्कार भी। बोली, ”चाय पिएंगे?”

”नहीं, मैं चाय नहीं पीता।”

”अजीब बात है सिगरेट पीते हैं और चाय नहीं।” और कंधे उचकाती हुई बोली, ”कुछ और मंगाऊं क्या?”

”नो थैंक्यू। शाम को कभी।”

”तो वह शाम कभी नहीं आने वाली।” कहती हुई वह इतराई और उठ खड़ी हुई। संजय ने टोका तो वह बोली, ”डायलॉग्स याद करने हैं और रूम रिहर्सल भी।”

संजय आज विभा का खुश मूड देखते हुए कल की तरह फिर से उसे मिस नहीं करना चाहता था। सिगरेट जो वह कैजुअली पीता था, फूंकते-झाड़ते उसके साथ-साथ हो लिय़ा।

चलते-चलते विभा बोली, ”सुना है आप एन. एस. डी. पर फीचर लिख रहे हैं?”

”हां।”

”क्या-क्या फोकस कर रहे हैं?”

”फोकस क्या प्रॉब्लम फीचर है। मेनली सुसाइड।”

”क्या मतलब?” कहते हुए विभा लगभग बिदकी।

”कुछ मदद करेंगी?”

”मतलब?”

”कुछ जानकारी….।”

”सॉरी। मुझे माफ करिए। इस बारे में मैं कुछ मदद नहीं कर सकती आपकी।”

”देखिए आप लखनऊ की हैं….।”

”तो?” उसने अजीब-सी नजरों से घूरा और बोली, ”आप को ऐक्टिंग, नाटक स्क्रिप्ट वगैरह के बारे में, यहां की पढ़ाई-लिखाई, रिहर्सल एटसेक्ट्रा आई मीन एकेडमिक प्वाइंट्स, डिटेल्स जानना हो तो जरूर बताऊंगी। फालतू बातें नहीं बताऊंगी।”

”आप के साथी मर रहे हैं। और आप इसे फालतू बता रही हैं।”

”हां।” कह कर वह चलते-चलते रूक गई। बोली, ”मेरे लिए यह फिर भी फालतू है। मैं यहां पढ़ने आई हूं। एन. एस. डी. की पॉलिटिक्स डील करने नहीं।”

”पर मुश्किल क्या है?”

”मुश्किल यह है कि मैंने आपको गंभीर किस्म का पत्रकार मानने की भूल की। आपकी कुछ रिपोर्टे और समीक्षाएं पढ़ी हैं मैंने। पर आप मनोहर कहानियां ब्रांड रिपोर्टिंग भी करते हैं, यह नहीं जानती थी। कहते-कहते वह चलने को हुई और बोली, ”गु़डबाई कहें?”

संजय के साथ एक दिक्कत यह भी हमेशा से रही कि अगर उससे कोई जरा भी तिरछा होकर बोलता था उससे वह और तिरछा होकर कट जाता था। चाहे वह लड़की ही क्यों न हो, चाहे वह संपादक ही क्यों न हो। उसका बाप ही क्यों न हो। सो, जब विभा ने उससे कहा कि, ”गुडबाई कहें?” तो हालांकि उसके इस कहने में भी मिठास तिर रही थी पर संजय फिर भी फैल गया और ”यस, गुड बाई”  कहने की जगह, ”हां, गुडबाई।” कहकर फौरन पलटा और सिगरेट फेंकते हुए ऐसे चल दिया, गोया उसने सिगरेट नहीं विभा को फेंका हो और उसे रौंदता हुआ चला जा रहा हो। जाहिर है विभा को ऐसी उम्मीद नहीं थी।

”सुनिए।” वह जैसे बुदबुदाई।

पर संजय-चिल्लाया, ”फिर कभी।” लगभग कैंटीन वाले अंदाज में। पर उसकी बोली इतनी कर्कश थी कि दो तीन एनएसडियन जो उधर से गुजर रहे थे अचकचा कर ठिठके और उसे घूरने लगे।

विभा सकपका गई। और कमरे में भाग गई। संजय ने ऐसा रास्ता मुड़ते हुए कनखियों से देखा। संजय फिर एन. एस. डी. नहीं गया। चार-पांच दिन हो गए तो उस पत्रिका के संपादक ने उसे फोन पर टोका कि, ”एन. एस. डी. वाली रिपोर्ट तुमने अभी तक नहीं दी?”

संजय को बड़ा बुरा लगा।

दूसरे ही क्षण वह खुद फोन घुमाने लगा। उसने सोचा अब वह टेलीफोनिक रिपोर्टिंग क्यों न कर डाले। उसने फटाफट एन. एस. डी. के चेयरमैन, डायरेक्टर समेत दो तीन लेक्चरर्स को फोन मिलाए। पर कोई भी फोन पर तुरंत नहीं मिला। लेकिन वह फोन पर जूझता रहा। आखिर थोड़ी देर बाद डायरेक्टर मिले और एक दिन बाद का समय देते हुए कहा कि, ”आप समझ सकते हैं फोन पर डिसकसन ठीक नहीं है। इत्मीनान से मिलिए।”

संजय को निदेशक का इस तरह बतियाना अच्छा लगा। निदेशक शाह जो खुद भी एक अच्छे अभिनेता, निर्देशक तो थे ही कुछ नाटक भी लिखे थे उन्होंने। मिले भी वह बड़े प्यार और अपनेपन से। आधे घंटे की तय मुलाकात बतियाते-बतियाते कब दो घंटे से भी ज्यादा में तब्दील हो गई। दोनों ही को पता नहीं चला। बिलकुल नहीं।

शाह बड़ी देर तक स्कूल की योजनाओं, परियोजनाओं, सिस्टम, इतिहास, तकनीक, रंगकर्मियों की विवशता, बेरोजगारी, दर्शकों की घटती समस्या, अल्काजी, शंभु मित्रा और कभी-कभार निवर्तमान निदेशक कारंत के बारे में बड़े मन और  पन से बतियाते रहे। संजय उनकी बातों में इतना उलझ गया कि मेन प्वाइंट छात्रों की आत्महत्या का सवाल बावजूद बड़ी कोशिश के वह बातचीत में शुमार नहीं कर पा रहा था।

तो क्या विभा का मनोहर कहानियां वाला तंज उसे तबाह किए हुए था? या कुछ और था? या कि शाह के वाचन से वशीभूत वह आत्महत्या वाले सवाल को बाहर लाने के बजाय भीतर ढकेलता जा रहा था? आखिर क्या था? शायद यह सब कुछ था-गड्डमड्ड। पर तभी अनायास ही सवाल छात्रों की समस्याओं पर आ गया था तो शाह तौल-तौल कर कहने लगे कि, ”मैं खुद चूंकि इस स्कूल का कभी छात्र रह चुका हूं। पढ़ाया भी यहां। चिल्ड्रन एकेडमी के बावजूद जिंदगी यहां गुजारी है, सो छात्रों की समस्याओं से भी खूब वाकिफ हूं। और आप देखिएगा, जल्दी ही कोई समस्या नहीं रहा जाएगी। बिलकुल नहीं। बस बजट इतना कम है कि क्या बताऊं?”  वह कह ही रहे थे कि संजय पूछ ही बैठा,”पर आप के छात्र आत्महत्या क्यों करते जा रहे हैं?”

शाह बिलकुल अचकचा गए। उन्होंने जैसे इस सवाल की उम्मीद नहीं की थी। शायद इसीलिए अकादमिक बातों को ही वह अनवरत फैलाते जा रहे थे। लेकिन आत्महत्या के सवाल पर वह सचमुच जैसे हिल से गए थे, ”हमारे तो बच्चे हैं ये।” शाह जैसे छटपटा रहे थे। और संजय ने नोट किया कि उनकी इस छटपटाहट में अभिनय नहीं कातरता थी, असहायता थी, और वह कठुआ से गए थे। साथ ही दहल भी। वह भाववेश में संजय के और करीब आ गए। और, ”ये मेरे ही बच्चे हैं। मैं इनके बीच बैठ रहा हूं। उन्हें सुन रहा हूं, समझ रहा हूं वन बाई वन।” जैसी भावुकता भरी बातें करते-करते अचानक जैसे उनका निदेशक पद जाग बैठा, ”देखिए मुझे अभी दो महीने ही हुए हैं यह जिम्मेदारी संभाले। और यह आत्महत्याएं हमारे कार्यकाल में नहीं हुईं।” वह जरा रूके और संजय के करीब से हटते हुए कुर्सी पीछे की ओर खींच ली और बोले, ” फिर भी मै देखता हूं। आई विल डू माई बेस्ट।” कह कर उन्होने भी चाहा कि अब वह फूट ले। पर इसी बीच दुबारा काफी आ गई थी। और ”नहीं-नहीं” कहते हुए भी उसे काफी पीने के लिए ऱुकना पड़ा। इस काफी का फायदा यह हुआ कि आत्महत्या प्रकरण से गंभीर और कसैले हुए माहौल को औपचारिक बातचीत ने कुछ सहज किया। इतना कि निदेशक महोदय उसे बाहर तक छोड़ने आए। हां, जो व्यक्ति उसे बाहर तक छोड़ने आया था, वह शाह नहीं, निदेशक ही आया था।

यह आत्महत्या प्रसंग की त्रासदी थी।

दयानंद पांडेय…. जारी ….


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए लेखक दयानंद पांडेय की तस्वीर पर क्लिक करें। पार्ट (4) पढ़ने के लिए अगले हफ्ते का इंतजार करें।

अपने-अपने युद्ध (2)

भाग-1 से आगे : बेचारा अजय ! एनएसडी में जब उसने दाखिला लिया तो घर में चौतरफा विरोध हुआ। वह नाटकों में एक्टिंग पहले भी करता था और तब घर वालों का ऐतराज तो था पर विरोध-जैसा विरोध नहीं। लेकिन जब एनएसडी में दाखिला लेने चला तो घर में जैसे कुहराम मच गया। पर अजय तो जैसे लंगोट बांध कर तैयार था। एक अजीब सा रोमेंटिसिज्म उसके सिर पर सवार था। और उसने एनएसडी में दाखिला आखिरकार ले लिया। यह वह दिन थे, जब एनएसडियनों के पंख जहां तहां उड़ और पसर रहे थे। तब यह ढेर सारे टीवी चैनल नहीं थे। फिर दूरदर्शन के डैने भी बड़े छोटे थे और फिल्मों में ओम शिवपुरी तक झण्डा गाड़ रहे थे। यह समानांतर फिल्मों के दिन थे। नसीर, राजबब्बर, कुलभूषण, रंजीत, रैना को एनएसडियन अजीब उत्साह से उच्चारते हुए अपने को भी उन्हीं के साथ पाते थे। पर सचमुच सभी के भाग्य में तो वह रूपहला परदा पैबंद बन कर ही सही नहीं लिखा था। अजय के भाग्य में भी नहीं लिखा था।

अजय जब एनएसडी आया था तो यह सोच कर कि वह अभिनय के नए प्रतिमान से तहलका मचा देगा। पर जब दूसरे साल उसे क्राफ्ट में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए चुना गया तो वह अवाक रह गया। बहुत हाथ पांव मारने पर उसे निर्देशन में डाला गया। पर वह हार मानने वाला नहीं था। निदेशक को उसने कनविंस किया। वह मान गए और वह अनिभय में फिर आ गया। पर बाद में उसे क्या लगा, उसके बैच मेट से लेकर लेक्चरर्स तक यह एहसास कराने लगे कि एक्टिंग के जर्म्स उसमें हैं ही नहीं। वह बेकार ही वक्त जाया कर रहा है।

अजय का पहला सपना यहीं टूटा।

अजय ने उन दिनों पहली बार दाढ़ी ब़ढ़ानी शुरू की। दाढ़ी बढ़ा लेने से एक बात यह हुई कि लोग कहने लगे कि अजय के मुखाभिनय में भारी फर्क आ गया है। अब वही लोग जो कहते थे कि अभिनय अजय के बूते की बात नहीं, वही लोग अब कहने लग गए कि अजय नसीर की नकल करता है। पर बकौल अजय वह नसीर की नकल नहीं करता था। उसके मुखाभिनय में कोई फर्क भी नहीं आया था। अभिनय की वही रेखाएं वह अब भी ग़ता था। फर्क बस यही था कि उसके चेहरे पर दाढ़ी जम गई थी। दाढ़ी शायद उसका नया सपना था। उन्हीं दिनों मोहन राकेश के ‘’आषाढ़ का एक दिन’ में जब अजय ने क्राफ्ट और अभिनय दोनों ही जिम्मेदारी एक साथ निभाई तो निर्देशक फ्रिट्ज वेनविट्ज ने उसे गले लगा लिया। फिर तो वह उनका प्रिय हो गया। इतना कि उसे लगने लगा कि उसको अभिनेता नहीं, निर्देशक ही होना चाहिए। अजय की उधेड़बुन ब़ढ़ती जा रही थी। वह ठीकठीक तय नहीं कर पा रहा था कि क्या बने, अभिनेता कि निर्देशक, कि क्राफ्टस में ही वापस हो ले। हालांकि अब कुछ भी संभव नहीं था। यही वह दिन थे जब वह चरस भी पीने लगा था।

एक रोज एनएसडी के सामने वाले लॉन में बैठा वह सुट्टा लगा रहा था कि अचानक कथक केंद्र के भीतर से एक लड़की के जोरजोर से बोलने की आवाज सुनाई दी। पर यह आवाज रहरह कर रुक जाती थी या कि आते-आते ठहर जाती थी। चरस अभी उस पर असर नहीं कर पाई थी या कि शायद असर अभी आधा अधूरा था। चरस का उसे ठीकठीक याद नहीं। पर वह एकाएक उठ पड़ा और लगभग दौड़ते हुए कथक केंद्र में घुस गया। उस लड़की की आवाज में अजीब-सी कातरता और विवशता समाई हुई थी कि अजय अचानक हिंसक हो उठा। कथक केंद्र के महाराज जी को उसने मारा तो नहीं पर जोर से धक्का दिया और वह फर्श पर गिर पड़े। जांघिया पहने महाराज मुंह के बल फर्श पर ऐसे गिरे थे कि मुंह से खून गिरने लगा। इस तरह महाराज जी के भुजपाश से वह लड़की छिटक कर दीवार से ऐसे जा भिंड़ी कि उसकी रूलाई उसके घुंघरुओं की झंकार में झनझना कर रह गई। उसकी आंख से आंसू ऐसे लुढ़के कि अजय को बेगम अख़्तर की गायकी याद आ गई।’’ हालांकि यह गायकी यहां मौजू नहीं थी। पर उसे सूझा यही। 

यह अलका थी।

हुआ यह था कि अलका का कथक केंद्र में पहला साल था सो महाराज जी उस पर कुछ ज्यादा कृपालु हो गए। उनको उसमें अप्रतिम प्रतिभा दिखाई देने लगी। सो उसे उन्होंने अपने शिष्यत्व में रख लिया। शिष्या तो अलका बन गई पर महाराज जी की सेवा’’ करने में वह आनाकानी करने लगी। और महाराज की अदा यह थी कि बिना सेवा’’ कराए वह सिखाते नहीं थे। सेवा’ और सीखने’’ में जो अंतद्वरंद्व चला तो वह खिंचता ही गया। अक्सर महाराज जी उसे शाम को अकेले बुलाते। कुछ ख़ास सिखाने के लिए। पर छोटे शहर की अलका पहुंचती तो किसी न किसी सहेली को लेकर। महाराज जी जो कथक नृत्य के पुरोधा थे, कई-कई पुरस्कारों, प्रशस्तियों से विभूषित थे, उनके ‘आशीर्वाद’’ के बिना कथक में किसी को ‘‘एंट्री’’ नहीं मिलती थी, कोई कलाकार नहीं बन सकता था और कम से कम उनके कथक केंद्र की डिगरी तो नहीं पा सकता था। उन्हीं महाराज जी की आंखों में कौंध गई थी वह अलका नाम की कन्या। और ऐसा कभी हुआ नहीं कि कथक केंद्र की कन्या उनकी आंखों में समाए तो उनकी बांहों में समाए बिना, जांघों पर बैठे बिना रह जाए। तो जो कन्या उनकी आंखों को कौंधती थी, उनकी नसों में उमंग भरती थी, उनकी आहों में रमती थी, उसे वह शिष्या’’ बनाने की जिज्ञासा बड़े ही शाकाहारी ढंग से प्रगट करते थे। और भला किस कन्या में यह हसरत न हो। इतने बड़े गुरु महाराज की शिष्या बनने की उसमें चाह न हो। तो वह उसे अकेले बुलाते। पहले पैर दबवाते, पैर दबवाते-दबवाते कन्या का हाथ दबाते। यह दूसरा चरण था। तीसरे चरण में वह कन्या का हाथ अपनी जंघाओं के बीच धीरे से खींचते। और कन्या जो कुछ संकोच खाती तो उसे बड़े मनुहार से नृत्य की चकमक और जगमग दुनिया से नहलाते। ज्यादातर कन्याएं नहा जातीं और जो नहाने में अफनातीं तो उन्हें वह गंडा बांधने की ताबीज देते तो कुछ गंडे की गंध में आ जातीं और बिछ जातीं गुरु महाराज की ‘‘सेवा’’ में। कुछ फिर भी महाराज जी को अपने को अर्पित करने के बजाय अपना चप्पल या थप्पड़ अर्पित कर देती थीं।

अलका उन थोड़ी-सी कुछ कन्याओं में से ही एक थी।

अलका को जब महाराज जी ने शुरू में अकेले आने का आमंत्रण दिया तो पहले तो वह टाल गई। पर आमंत्रण का दबाव जब ज्यादा ब़ढ़ गया तो उसे जाना ही पड़ा। पर गई वह सहेली के साथ। और जब भी कभी गई तो सहेली के साथ। सहेली के सामने ही उसने महाराज जी के पैर दबाए पर थोड़ी झिझक के साथ। हफ्ते भर उसकी झिझक और अपनी हिचक के साथ लड़ते रहे महाराज जी। अलका की सहेली उनको खटकती रही। तो एक दिन उन्होंने उसकी सहेली को बड़ी बेरूखी कहिए, बदतमीजी कहिए, के साथ उसे लगभग अपमानित करते हुए टरका दिया। अलका तब बाथरूम गई हुई थी। और जाहिर है कि नहाने नहीं गई थी। क्योंकि उसे तो महाराज जी नहलाने वाले थे।

दूसरे दिन अलका के साथ उसकी सहेली नहीं आई। अलका को अकेली आना पड़ा। महाराज जी को राहत मिली। और पैर दबवाते-दबवाते उन्होंने अलका का हाथ दबा दिया। हौले से। अलका इसे अनायास ही मान कर महाराज जी के पैर दबाते हुए शिष्या धर्म निभा ही रही थी कि उन्होंने फिर उसका हाथ दबाया। और भरपूर दबाया। अलका कुछ झिझकी। पर पैर दबाती रही। महाराज जी सोफे पर बड़ी-सी जांघिया पहने बैठे थे। उसने गौर किया कि महाराज की जांघिया आज कुछ ज्यादा ही ऊपर खिसकी हुई है। वह थोड़ा-सा घबराई। और इसी घबराहट में उसने महाराज जी की उंगलियां पुटकानी शुरू कर दी। पर महाराज जी ने ‘ऊंहूं’’ कहते हुए उसका हाथ ऊपर खींच लिया। बिलकुल निर्विकार भाव से। वह फिर से पांव दबाने लगी। बाहर शाम का अंधेरा गहरा हो चला था। अलका का मन थरथराने लगा था, कि तभी महाराज जी ने फिर उसका हाथ हौले से ऊपर खींचा। पर बिलकुल अन्यमनस्क ढंग से। वह महाराज जी का अर्थ अब समझ गई। क्योंकि महाराज जी उसका हाथ अपने पुरुष अंग की ओर खींचने की अनायास नहीं सायास कोशिश कर रहे थे। पर चेहरे की मुद्रा अनायास वाली ही थी। और अलका गुरु जी के भारी व्यक्तित्व के वशीभूत विरोध के बजाय संकोच बरत रही थी। और फिर वह सोच रही थी कि अगर उसने विरोध किया तो बदनामी उसी की होगी। वह लड़की जात ठहरी। महाराज जी का क्या, फिर उसे अचानक एक जासूसी किताब की याद आ गई। मोहनलाल भास्कर की संस्मरणात्मक जासूसी किताब- ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’।’’ इस किताब में अलका ने यों तो कई रोचक किस्से पढ़े थे। पर इस समय उसे एक किस्सा तुरंत याद आ रहा था। पाकिस्तान के उस शहर का तो नाम याद नहीं आ रहा था अलका को। पर वह किस्सा मुख़्तसर यह था कि पाकिस्तान के किसी शहर में एक मौलवी साहब थे। झाड़ फूंक करते थे औरतों की अकेले में। किसिम-किसिम की औरतें उनकी शरण में पहुंचती थीं। मौलाना का जब किसी सुंदर स्त्री पर दिल आ जाता था तो झाड़ फूंक करते वह लगभग डांटते हुए बोलते थे, ‘नाड़ा खोल!’’ ज्यादातर औरतें मौलवी की डपट में आ कर अपना नाड़ा खोल बैठती थीं। और मौलवी साहब का काम आसान हो जाता था। औरतें बदनामी के डर से मौलवी के खिलाफ जुबान नहीं खोलती थीं। पर जब एकाध औरतें मौलवी की डपट के बावजूद‘नाड़ा खोलने पर ऐतराज करती हुई उन्हें भलाबुरा कहने पर आतीं तो मौलवी फौरन अपना पैतरा बदल लेते। कहते, कमबख़्त औरत ! नीयत तेरी ख़राब और इल्जाम हम पर लगाती है।’’ और वह वहीं दीवार पर लगी एक खूंटी दिखाते जिसमें एक नाड़ा बंधा रहता तो मौलवी साहब गरजते, ‘मैं तो उस खूंटी पर बंधे नाड़े को खोलने को कह रहा था। और तू कमबख़्त बदजात औरत मुझ पर तोहमत लगाने लग पड़ी। भाग कमबख़्त, तेरा इलाज अब अल्ला पाक के कर्म से हम नहीं कर सकते।’’ बेचारी मौलवी की मारी औरत पलट कर मौलवी के पैरों में गिरगिर कर गिड़गिड़ाने लगती। 

‘‘उफ !’’ अलका महाराज जी द्वारा बारबार हाथ दबाने और रह-रह कर खींचते रहने से बुदबुदाई। उसे लगा बाहर से भी कहीं ज्यादा अंधेरा उस कमरे में घिर आया है। और उसके मन में तो पूरी तरह घुप्प अंधेरा पसर गया। वह सोचती जा रही थी कि कैसे महाराज जी से पिंड छुड़ाए। कि तब तक महाराज जी ने उसका हाथ पूरी शक्ति से खींच कर जहां चाहते थे, जांघों के बीच रख दिया। और पैरों से उसके नितंबों को कुरेदा। अलका पूरी तरह अफनाई हुई खड़ी हुई कि पास के स्विच से लाइट जला दे। वह उठी। उठी ही थी कि महाराज जी जैसे किसी शिकारी की तरह उसे खींच कर बांहों में भींचने लगे। उनकी गोद में बैठे-बैठे ही उनकी सारी आनमान भुला कर अलका ने खींच कर उन्हें एक थप्पड़ मारा और उनसे छिटक कर अलग होती हुई लपक कर लाइट जला दी।

महाराज जी की कनपटी लाल हो गई थी। पर वह जैसे हार मानने वाले नहीं थे। लगभग नृत्य मुद्रा में उन्होंने फिर से अलका को पीछे से दबोच लिया। लाइट की परवाह नहीं की। यह भी नहीं सोचा कि खिड़कियां, दरवाजे सब खुले हैं। अपनी आनमान और उमर का भी ख़याल वह भूल बैठे। जैसे सुधबुध खो गई थी उनकी।

पर अलका गरजी। उनको धिक्कारा। चीख़-चीख़ कर धिक्कारा। शर्म-हया और उमर का पाठ पढ़ाते हुए अलका ने उन्हें फिर धकियाया। पर महाराज जी जैसे शिष्या से कुछ सीखने-सुनने को तैयार नहीं थे। वह तो बस अपना ही पाठ पढ़ाने की उतावली में अलका नामधारी कन्या को काबू करते हुए नृत्य की दूसरी मुद्रा धारण कर उसे फिर दबोच बैठे। अलका फिर चीख़ी। वह चिल्लाई, ‘दुष्ट-पापी, अधम-कुत्ते, हरामी !’’ जितने भी तरह के शब्द उसकी जुबान की डिक्शनरी में समा पाए, वह उचारती रही और चिल्लाती रही। पर महाराज जी हर अलंकार’’ सहज भाव से स्वीकार कर बार-बार नृत्य मुद्राएं बदल लेते थे। अद्भुत था उनका यह नर्तन जो अलका के अशिष्ट वाचन के बावजूद सहज रूप से जारी था। जब उन्हें अचानक अजय ने धकेला, तो भी वह अलका को दयानंद पांडेयलगभग दबोचे, बाहुपाश में लिए किसी नृत्य मुद्रा में ही थे।

….जारी…


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए लेखक दयानंद पांडेय की तस्वीर पर क्लिक करें। पार्ट (3) पढ़ने के लिए अगले शनिवार का इंतजार करें। 

अपने-अपने युद्ध (1)

उपन्यासवह तब भी फ्रीलांसर था जब देवेंद्र से बारह बरस पहले मिला था। और आज जब फिर देवेंद्र से मिल रहा था तो फ्रीलांसिंग भुगत रहा था। फर्क बस यही था कि तब वह दिल्ली में मिला था और अब की लखनऊ में मिल रहा था। …..और देवेद्र?

देवेंद्र तो तब भी फ्रीलांसर थे, अब भी फ्रीलांसर। और शायद आगे भी फ्रीलांसर रहेंगे ही नहीं, फ्रीलांसिंग ही करेंगे। शायद आजीवन। रंगकर्म और पत्रकारिता का यह फर्क है। तो जब वह नाटक के मध्यांतर में लगभग सकुचाते हुए मिला देवेंद्र से कि, ‘‘मैं संजय!’’ तो वह हलके से मुसकुराए। संजय को लगा कि शायद देवेंद्र ने पहचाना नहीं। तो कह भी दिया, ‘‘शायद आप ने पहचाना नहीं।’’ तो देवेंद्र हाथ मिलाते हुए बोले, ‘‘अरे, दिल्ली में हम मिले थे।’’ सुन कर संजय खुश हुआ। बोला, ‘‘हमने सोचा, क्या पता आप भूल गए हों।’’ तो देवेंद्र अपनी गंभीरता की खोल से जरा और बाहर निकले, ‘‘आपने मेरे बारे में लिखा था। गोल मार्केट में रहते थे आप। कैसे भूल जाऊंगा।’’

अब गंभीर होने की संजय की बारी थी, ‘‘बड़ी अच्छी याददाश्त है आपकी। नहीं, लिखता तो मैं जाने कितनों के बारे में हूं पर लोग इतने बरस बाद छोड़िए, छपने के दूसरे दिन से याद करना तो दूर, पहचानना ही भूल जाते हैं। कन्नी काट कर, बगल से कौन कहे, सामने से ही बड़ी बेशर्मी से निकल जाते हैं।’’

देवेंद्र हलका-सा मुस्कुराए। तब तक उन्हें और भी कई लोग घेर चुके थे। इसी बीच नाटक की घंटी बजी और एक अभिनेता आकर देवेंद्र से पूछने लगा, ‘‘शुरू करें?’’ देवेंद्र बिलकुल निर्देशकीय अंदाज और आवाज में सिर हिलाकर बोले, ‘‘हूं।’’ फिर संजय ने उनसे पूछा, ‘‘ठहरे कहां हैं। कल कैसे भेंट होगी?’’ देवेंद्र बोले, ‘‘ठहरा तो अप्सरा होटल में हूं। पर कल दिन दस से बारह यहीं रिहर्सल करेंगे। यहीं मिलते हैं।’’ संजय चाहता था कि कह दे ‘‘ठीक है।’’ पर कुछ कहा नहीं। कहते-कहते रह गया। अचानक उसे याद आया कि ग्यारह बजे उसने अपनी महिला मित्र चेतना को टाइम दे रखा है। बोला, ‘‘तो ठीक है कल शाम को ही मिलते हैं।’’ सिर्फ कहानियां निर्देशित करने वाले देवेंद्र का सहज न रहना, खोल से बाहर न आना संजय को खल गया। शायद इसलिए कि सचमुच ही दूसरी प्रस्तुति ढीली थी, उसके लिए ठीक-ठीक तय कर पाना मुश्किल था। पर यह तो तय था कि इसके पहले वाली कहानी की प्रस्तुति काफी सशक्त थी। हालांकि दोनों कहानियां भुवनेश्वर की ही थीं। फिर भी पहली कहानी का कथ्य और प्रस्तुति दोनों ही कसे हुए थे। अभिनय की आंच भी पुरजोर थी। हालांकि कहानी के नायक का किरदार निभाने वाला लगातार तो नहीं पर लगभग हर तीसरे संवाद में मनोहर सिंह ‘‘बन’’ जाता था। आंगिक में कम पर वाचन में तो समूचा ही। मनोहर सिंह उस पर पूरी तरह हावी थे। हालांकि पूरे नाटक में उस के प्रिय कवि-लेखक की बेटी हेमा जो नायिका की भूमिका निभा रही थी, सब पर भारी थी। कहानी थी ही स्त्री-पुरुष संबंधों की सुलगन, थकन और जेहन के जद्दोजहद की। पर हेमा का अभिनय जिस तरह देह के द्वंद्व और मन के अंतरद्वद्व को परोस रहा था, वह अप्रतिम था, अद्वितीय था।

यह कहानी जब ख़त्म हुई तो मध्यांतर में संजय भागा-भागा मंच के पीछे चला गया, देवेंद्र की तलाश में। पर देवेंद्र के बजाय वह ‘‘मनोहर सिंह’’ मिल गया तो संजय आदत के मुताबिक उससे लगभग पूछते हुए बोला, ‘‘अगर आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं?’’

‘‘बिलकुल !’’ वह बोला।

‘‘आप सचमुच बुरा मत मानिएगा,’’ दुहराते हुए संजय बोला, ‘‘आपको नहीं लगता कि मनोहर सिंह आप में बुरी तरह तरह गूंजते हैं ?’’

‘‘हो सकता है।’’

‘‘हो सकता है नहीं, है। और मैं समझता हूं कम से कम सत्तर प्रतिशत।’’

‘‘हां, पहले भी कुछ लोगों ने ऐसा कहा है। पर मैं इसे गुड सेंस में मानता हूं। अगर ऐसा है।’’ उसने कंधे उचकाए ‘‘क्रेडिट है !’’

‘‘आप का शुभ नाम जानूं ?’’

‘‘हां, वागीश।’’

‘‘ओह तो आप हेमा के पति हैं।’’ झिझकते हुए संजय बोला, ‘‘और जाहिर है एनएसडियन भी होंगे ?’’

‘‘हां।’’

‘‘तो रेपेट्री में भी रहे होंगे ?’’

‘‘हां।’’

‘‘तभी मनोहर सिंह आप में गूंजते हैं।’’

‘‘हां, वह मेरे माडल हैं। उन के साथ रेपेट्री में सात-आठ साल काम किया है।’’

‘‘कब थे रेपेट्री में आप ?’’

‘‘अस्सी इक्यासी में।’’

‘‘तब तो मैं भी दिल्ली में था,’’ संजय चहकते हुए बोला, ‘‘और तभी मनोहर सिंह को गिरीश कनार्ड के ‘‘तुगलक’’ में अल्काजी के निर्देशन में देखा था। इसके पहले उन के बारे में सुनता ही था। हां, ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म में भी देखा था। पर मिला ‘‘तुगलक’’ में ही था। सुरेका सीकरी भी थीं।’’

‘‘रेपेट्री का कोई और प्रोडक्शन नहीं देखा आपने ?’’

‘‘नहीं, देखा तो था।’’ संजय बोला, ‘‘घासीराम कोतवाल देखा।’’

‘‘पर घासीराम कोतवाल तो रेपेट्री ने तब किया ही नहीं।’’

‘‘नहीं भाई, मेघदूत में देखा था। मुझे अच्छी तरह याद है। डॉ॰ लक्ष्मीनारायण लाल के साथ देखा था।’’

‘‘ऊहूं।’’ वागीश ने सिर हिलाया।

‘‘हां, हां आप ठीक कह रहे हैं। एन॰ एस॰ डी॰ सेकेंडियर वालों ने किया था।’’ बात लंबी खिंच गई थी। और संजय देवेंद्र से मिलने को आतुर था। आगे बढ़ा तो हेमा आती दिखी। उसके चाचा विजय ने मिलवाया, ‘‘ये संजय हैं। पहले हमारे ही अख़बार में थे। दिल्ली में भी थे। तुम जानती होगी।’’ सुन कर हेमा अचकचाई तो संजय ने याद दिलाया, ‘‘जब आप एन॰ एस॰ डी॰ में पढ़ती थीं। हास्टल में विभा आप के बगल में रहती थी। वानी इरफाना, शरद, उपेंद्र सूद वगैरह थे। तो मैं आता था….’’ बात बीच में ही काटते हुए हेमा बोली, ‘‘हां, हां याद आया।’’ जाने उसे सचमुच याद आ गया था कि याद आने का अभिनय कर रही थी। संजय को लगा जैसे अभिनय कर रही थी। आखिर दस-बारह बरस बीत गए थे, तब से अब में। संजय अब थोड़ा सा मुटा भी गया था। और फिर उसे याद आया कि जब वह एन॰ एस॰ डी॰ पर फीचर लिखने के सिलसिले में गया तो वहां के बारे में संजय लिखे, हेमा नहीं चाहती थी। उसने कभी स्पष्ट रूप से तो यह नहीं कहा पर उसके हाव भाव से संजय को ऐसा ही लगा था। फिर तब हेमा अभिनय सीख रही थी, पक्की नहीं थी, सो तब संजय को उसकी मंशा जानने में दिक्कत नहीं हुई।

हेमा क्यों नहीं चाहती थी कि संजय एन॰ एस॰ डी॰ के बारे में लिखे? एन॰ एस॰ डी॰ मतलब दिल्ली का नेशनल स्कूल आफ ड्रामा।

कारण दो थे।

एक तो शायद यह कि जिस पत्रिका के लिए संजय एन॰ एस॰ डी॰ पर फीचर तैयार कर रहा था, उस पत्रिका के संपादक पद से उसके पिता जल्दी ही हटाए गए थे और अब जो संपादक थे, उसके पिता को वह भाते नहीं थे। दूसरे यह कि एन॰ एस॰ डी॰ में उन दिनों अराजकता पनपने लगी थी। दूरदराज से रंगकर्म पढ़ने आने वाले छात्र आत्महत्या पर आमादा हो गए थे।

क्यों कर रहे थे आत्महत्या?

संजय इस पर ख़ास तौर से फोकस करना चाहता था। इस फोकस करने के बाबत उसने कुछ एनएसडियनों से दोस्ती गांठी। इस दोस्ती के बहाने धीरे-धीरे मंडी हाउस का कीड़ा उसमें बैठने लगा।

हालांकि अंततः मंडी हाउस का कीड़ा वह फिर भी नहीं बन पाया। बावजूद तमाम कोशिशों और चाहत के।

तो सवाल यह था कि एनएसडिएन आत्महत्या क्यों कर रहे थे? देश की तमाम समस्याओं के मद्देनजर यह कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं थी। पर तब जाने क्या था कि संजय इस समस्या को लेकर लगभग झूल गया था।

कि आज उसे सोच कर अपने इस बचपने पर हंसी आती है।

सचमुच संजय के लिए वो दिन मंडी हाउस ओढ़ने-बिछाने के दिन थे। और वह मंडी हाउस ही ओढ़ने-बिछाने लगा। ‘‘लंच’’ और ‘‘डिनर’’ भी वह एनएसडियनों के साथ करने लगा। दो तीन ‘‘जोड़ों’’ के बीच अकेला घसीटता हुआ वह बंगाली मार्केट घूमने लगा। एनएसडियनों की कैंटीन साधते-साधते वह लड़कियों के हास्टल में भी घुस गया तो उसे लगा कि अब पहली बाजी वह मार ले गया। लड़कियों के हास्टल में घुसना जैसा कि संजय समझता था, मुश्किल होगा, सचमुच जरा भी मुश्किल नहीं था। क्योंकि एन॰ एस॰ डी॰ का ‘‘कल्ट’’ ही कुछ ऐसा था कि कोई बिना ‘‘जोड़े’’ के रह ही नहीं सकता था। एकाध जो बिना जोड़े के थे वह या तो ‘‘क्रेक’’ डिक्लेयर हो जाते थे या अछूतों सा बरताव होता था उनके साथ। तो विवशता कहिए या अराजकता, चाहे लड़का हो या लड़की, जोड़ा बनाना ही पड़ता था। बिना जोड़े के गुजारा ही नहीं था एन॰ एस॰ डी॰ में।

यह देख और महसूस कर बहुत अच्छा लगा संजय को। तब संजय भी इत्तफाक से कुंवारा था। पर इस मामले में जरा संकोची था।

और वह आज भी पछताता है कि क्यों था संकोची तब ?

वह सचमुच संकोची था और थोड़ा बेशऊर भी। लड़कियों को देखने का सलीका तो उसे आ गया पर उन्हें ‘‘कनविंस’’ करने का न तो उसे शऊर था, न समय था, न ही साथ-साथ लगे रहने का बेहयाई वाला माद्दा। और यह लड़कियां? चाहे कहीं की हों, कोई हों, दो चीज तो मांगती ही मांगती हैं। एक तो समय, दूसरे बेहयाई। तीसरे, फूंकने को भरपूर पैसा भी हो तो क्या बात है। यह ध्रुव सत्य है। चाहे जितनी क्रांति हो जाए, मूल्य बदल जाएं, समय और इतिहास बदल जाएं पर यह सत्य नहीं बदलने वाला। ‘‘ध्रुव सत्य’’ जो ठहरा !

तो संजय को दो, क्या इन तीनों सत्य के सांचे की सोच से भी घिन आती थी। कि, ‘‘पटती है लड़की, पटाने वाला चाहिए’’ वाला चलन उसे नहीं सुहाता था। बल्कि वह तो मेंटल हारमनी तलाशता था।

वह आज भी तलाशता है।

वह मानता था कि कम से कम बंगाली मार्केट में घूमने वाली लड़कियां, मंडी हाउस के ‘‘कल्ट’’ में समाई लड़कियां, और नहीं तो कम से कम रंगकर्म पढ़ने वाली एन॰ एस॰ डी॰ की लड़कियां तो इस मेंटल हारमनी को समझती ही होंगी। और ‘‘उसे’’ भी।

दिल्ली नया-नया गया था न ! पर काफी तलाश के बाद भी संजय को ऐसी कोई लड़की जब नहीं मिली, मतलब जब किसी भी लड़की ने उसे अपने को ‘‘आफर’’ नहीं किया तो वह जैसे नींद से जागा। वह समझ गया कि सेंट से महकती, मंडी हाउस में इतराती हाथ में हाथ डाले, पुरुष देह से लगभग चिपट कर चलती-बैठती लड़कियां उसकी कुंडली में नहीं लिखी हैं। पर इसी बीच एक दिन विभा मिली। तब तक उसका ‘‘जोड़ा’’ नहीं बन पाया था। वह तो बहुत बाद में पता चला कि वह बिछड़ी हुई कबूतरी थी। विभा को तो अब तक शायद संजय की याद भी नहीं होगी। देखे, तो भी शायद न पहचाने। आखिर हेमा ने भी तो नहीं पहचाना था। हो सकता है संजय भी अब विभा को न पहचाने। हो सकता है क्या बिलकुल हो सकता है। खै़र ! तो विभा उन दिनों अकेली ही घूमा करती थी। लखनऊ से गई थी। लखनऊ में वह कई नाटक कर चुकी थी। साथ ही भारतेंदु नाट्य अकादमी की डिग्री भी। संजय जब उसे पहली बार हास्टल में मिला तो वह बड़ी उदास सी थी। और कहीं जा रही थी। वह हास्टल के बूढ़े चौकीदार को बड़ी आत्मीयता से अपने कमरे की देख-रेख की जिम्मेदारी डाल रही थी। हालांकि कमरे में उसकी रूममेट सोई हुई थी। फिर भी विभा चौकीदार से कह रही थी, ‘‘आप तो इसकी लापरवाही जानते ही हैं।’’

‘‘हां बिटिया। पर तुम निश्चिंचत रहो।’’ कहते हुए चौकीदार ने तसल्ली दी।

विभा लखनऊ की थी, मतलब यू॰ पी॰ की। और संजय को तब दिल्ली में यू॰ पी॰ के नाम पर मेरठ, हापुड़ का भी कोई मिल जाता था तो उससे अनायास आत्मीयता सी हो जाती थी। इस आत्मीयता में कई बार उसे दिक्कतें भी पेश आईं पर वह इससे कभी उबर नहीं पाया। हालांकि कई बार ऐसा भी होता था कि अगला आदमी उसे वही आत्मीयता नहीं भी परोसता तो भी संजय से वह आत्मीयता का राग नहीं छूटता। वह आलापता ही रहता। चाहे वह ब्यूरोक्रेट हो, पॉलिटिशियन, रिक्शेवाला, मजदूर या किसी भी तबके का। एक बार उसने अपनी इस कमजोरी का हवाला अपने एक जर्मनी पलट पत्रकार मित्र को दिया जो मध्य प्रदेश के थे तो वह बोले, ‘‘आप यह कह रहे हैं। अभी आप हिंदुस्तान से कहीं बाहर चले जाइए तो जो दिल्ली में जिस बदकती पंजाबियत या खदबदाती हरियाणवी से आप चिढ़ते रहते हैं, वही वहां भली लगेगी। और जो यह लुंगी उठाए मद्रासी यहां कार्टून जान पड़ते हैं वहां बिलकुल अपने हो जाते हैं। यहां तक कि पाकिस्तानी भी वहां सगे हो जाते हैं। बल्कि कहूं कि समूचे एशियाई अपने हो जाते हैं।

फिर संजय जब इसके संक्षिप्त ब्योरे में उतर गया कि कैसे जब वह गांव से शहर में आया और उसे अपनी तहसील का जो कोई मिल जाता था तो अपना सा लगता था। और जो गांव जवार का जो कोई मिल जाए तो क्या कहने। और ऐसे ही जब वह अपने शहर से दिल्ली आया तो जिस मेरठ की बोली से वह यू॰ पी॰ में चिढ़ता था, दिल्ली में यू॰ पी॰ के नाम पर वह भी अच्छे लगने लगे। और जो कोई पूर्वांचल मतलब पूर्वी उत्तर प्रदेश का हो तो फिर तो वह उसके गले ही पड़ जाता। पूछने लग जाता कि, ‘‘भोजपुरी बोलते हैं कि नहीं?’’ और फिर, ‘‘कहां घर है? का करीले? कब से बाड़ीं इहां?’’ जैसे सवालों का सिलसिला थमता ही नहीं था। पर ज्यादातर लोग भोजपुरी न बोल पाने का स्वांग करते तो संजय उन्हें धिक्कारता। ख़ूब धिक्कारता। तो उनमें से कुछ तो भोजपुरी पर उतर आते पर जो फिर भी ढिठाई करते, ‘‘का बताएं प्रैक्टिस नहीं रहा। समझ लेते हैं, बोल नहीं पाते।’’ जैसे जुमले उछालते, संजय उन्हें ‘‘शर्म शर्म,’’ सरीखी कुछ और खुराकें खिलाता और कहता, ‘‘सिंधियों को देखो, सिंध छोड़ दिया पर सिंधी नहीं छोड़ी। और ये दो दिन से दिल्ली क्या आ गए अपनी बोली भूल गए। कल थोड़ी और तरक्की कर लेंगे तो अपनी मां को भी भूल जाएंगे। क्या तो वह अनपढ़ गंवार है, फिगर ठीक नहीं है। और परसों जो विदेश चले गए तो अपना देश भूल जाएंगे। क्या तो पिछड़ा है।’’ वगैरह-वगैरह जब संजय सुनाता तो ज्यादातर भोजपुरी क्षेत्र से आए लोग और बिदक जाते और उससे कतराते रहते। पर संजय को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

वह तो चालू रहता।

पर विभा के साथ संजय भोजपुरी पर चालू नहीं हुआ। हां, इतना एहतियात के तौर पर जरूर कर लिया कि विभा से उस का जिला पूछ लिया। और जब उसने लखनऊ बता कर पिंड छुड़ाना चाहा तो संजय उसके पीछे पड़ा भी नहीं। उसे जाने दिया। और तभी हेमा अशोक के साथ आती दिखी। कंधे पर झोला लटकाए। संजय ने यहां और समय ख़राब करने के बजाय हेमा से औपचारिकता वश हालचाल पूछ चलता बना। बाहर आकर उसने देखा, विभा आटो रोकने के चक्कर में पड़ी थी। पर उसने उधर ध्यान देने के बजाय सोचा कि क्यों न बंगाली मार्केट चल कर मिठाई खाए। फिर उसने सोचा कि उधर से ही अजय अलका के घर भी हो लेगा। फिर जाने क्या हुआ कि वह अचानक बस स्टॉप की ओर मुड़ गया। पर यह सोचना अभी बाकी था कि वह कहां जाए। आई॰ टी॰ ओ॰, कनॉट प्लेस कि प्रेस क्लब? पर तब तक उसे शास्त्री भवन की ओर जाने वाली बस दिख गई और वह दौड़ा, फिर लटक कर चढ़ गया। और सोचा कि प्रेस क्लब चल कर पहले बियर पिएगा फिर कुछ खा कर थोड़ा उठंगेगा। फिर जो टाइम मिलेगा तो वापसी में अजय-अलका के घर। इस तरह मिठाई मुल्तवी होते हुए भी मुल्तवी नहीं हुई थी।

दयानंद पांडेयतो क्या यह विभा का नशा था? कि बीयर पीने का सुरूर? वह कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था। पर वह यह अब तक जान गया था कि आज अजय-अलका के यहां जाना जरूर पड़ेगा।


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बी4एम के पाठक पढ़ेंगे एक चर्चित उपन्यास

मीडिया का महाभारत है ‘अपने-अपने युद्ध’ : भड़ास4मीडिया पर प्रत्येक शनिवार को चर्चित उपन्यास ‘अपने-अपने युद्ध’ का धाराविहक रूप में प्रकाशन किया जाएगा। मौजूदा दशक में मीडिया के भीतर, और बाहर भी चर्चित रहे दयानंद पांडेय के उपन्यास ‘अपने-अपने युद्ध’ को जितनी बार पढ़ा जाए, अखबारी दुनिया की उतनी फूहड़ परतें उधड़ती चली जाती हैं। मीडिया का जितनी तेजी से बाजारीकरण हो रहा है, उसके भीतर का नर्क भी उतना ही भयावह होता जा रहा है। ऐसे में  ‘अपने-अपने युद्ध’ को बार-बार पढ़ना नितांत ताजा-ताजा सा-लगता है। यह महज कोई औपन्यासिक कृति भर नहीं, मीडिया और संस्कृति-जगत के दूसरे घटकों थिएटर, राजनीति, सिनेमा, सामाजिक न्याय और न्यायपालिका की अंदरूनी दुनिया में धंस कर लिखा गया तीखा, बेलौस मुक्त वृत्तांत है। इसमें बहुत कुछ नंगा है- असहनीय और तीखा। लेखक के अपने बयान में—‘जैसे किसी मीठी और नरम ईख की पोर अनायास खुलती है, अपने-अपने युद्ध के पात्र भी ऐसे ही खुलते जाते हैं।’

‘अपने-अपने युद्ध’ दरअसल एक कंट्रास्ट भरा कोलाज है, जिसके फलक पर कई-कई चरित्र अपनी-अपनी लड़ाइयां लड़ रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं मीडिया, खास कर प्रिंट मीडिया के लोग। अपना-अपना महाभारत रचते हुए जिस्म और आत्मा की सरहद पर। संजय इसका मुख्य पात्र है—अर्जुन की भूमिका करते-करते अभिमन्यु और फिर एक नए अभिमन्यु की भूमिका में बंधा नहीं, बिंधा हुआ। शराब और कैरियर के तर्क इसके भी हथियार हैं—अपनों से और अपने से लड़ने के लिए। ‘अपने-अपने युद्ध’ में प्रेम भी है और प्यार करती स्त्रियां भी, कहीं मन जीती हुई, कहीं देह जीती हुई, अपना अस्तित्व खोजती-हेरती हुई, अकेलापन बांटती, जोड़ती, तोड़ती। अपने-अपने दुख हैं। अपने-अपने संत्रास। यह एक जटिल नग्न आत्मयुद्ध है—मीडिया, राजनीति, थिएटर, सिनेमा, सामाजिक न्याय और न्यायपालिका की दुनिया के चरित्रों का एक अंतहीन आपसी युद्ध, जिसमें पक्ष-प्रतिपक्ष बदलते रहते हैं। इसी अर्थ में यह उपन्यास एक अंतहीन सवाल है—जिनका जवाब फिलहाल उपलब्ध नहीं! 

2001 में जब यह उपन्यास छपकर आया था तो उस पर आरोपों की बौछार सी हो गई थी। अश्लीलता से लेकर अवमानना तक की बात हुई थी। यह उपन्यास प्रिंट मीडिया के नरक को लेकर लिखा गया था और प्रिंट मीडिया में ही इसको लेकर ब्लैक-आउट जैसी स्थितियां थीं। भाई लोगों ने कहा कि कुत्ता कुत्ते का मांस नहीं खाता। अजब था यह तर्क भी। अखबार मालिकों की नजर में पतिव्रता सती सावित्री रहने का जैसा दौर आज है, तब भी था। चुभन और तड़प के बावजूद गहरी खामोशी थी। चूंकि उपन्यास प्रिंट मीडिया को लेकर था, सो और भी सरोकार थे इसके। न्यायपालिका से भी गहरे अर्थों में सरोकार था इस उपन्यास का। प्रिंट मीडिया में भले ब्लैक-आउट जैसी स्थिति थी पर न्याय पालिका को यह उपन्यास चुभ गया। कंटेंम्ट ऑफ कोर्ट हो गया इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में तो जैसे लोग नींद से जागे। पर खामोशी की चादर ओढ़े हुए ही। साहित्य से जुड़ी पत्रिकाओं ने सांस ली। तमाम पत्रिकाओं में चर्चा, समीक्षा की जैसे बाढ़ आ गई। हंस में राजेंद्र यादव ने समीक्षा तो छापी ही, चार पन्ने की संपादकीय भी लिखी, केशव कही ना जाये क्या कहिए, शीर्षक से और सुविधाभोगियों, व्यवस्थाजीवियों को दौड़ा लिया। जनसत्ता में राजकिशोर ने अपने कालम में लंबी चर्चा की और लिखा कि अगर पत्रकारिता का भी कोई अपना हाईकोर्ट होता तो हमारा विश्वास है कि उपन्यासकार वहां भी प्रतिवादी के रूप में खड़ा होता। रवींद्र कालिया ने मान दिया और बताया कि कमलेश्वर पर भी एक बार अवमानना का मामला चल चुका है। कमलेश्वर ने इससे छुट्टी पाने का तरीका भी बताया और हौसला भी बढ़ाया। खैर, हालत यह है कि प्रिंट मीडिया में यातनाओं का घनत्व और बढ़ा है। चैनलों का घटाटोप सबको लील लेना चाहता है, प्रिंट मीडिया को भी, पर कोई कहीं सांस लेता नहीं दिखता इसके प्रतिकार में। अखबार अब विज्ञापन के साथ ही खबरें छापने का रेट कार्ड खुल्लमखुल्ला छापने लगे हैं। संपादकीय के नाम पर, खबर देना प्राथमिकता में नहीं है, अब व्यवसाय देना प्राथमिकता है। ब्यूरो अब नीलाम हो रहे हैं। मेधावी लोग वहां काम करने को अभिशप्त हैं। कोई कुछ बोलना तो दूर, सुविधाओं की चासनी में लटपटा कर इस बढ़ते कोढ़ की तरफ देखना भी नहीं चाहता। क्यों? इसीलिए यहां भड़ास4मीडिया पर ‘अपने-अपने युद्ध’ की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। अब यह उपन्यास क्रमशः प्रत्येक शनिवार को भड़ास4मीडिया के लाखों-लाख पाठकों के बीच प्रस्तुत होने जा रहा है। इंतजार करिए आने वाले शनिवार का।

दयानंद पांडेय : एक परिचय

दयानंद पांडेयपिछले बत्तीस सालों से पत्रकारिता के पेशे में सक्रिय दयानंद पांडेय अपनी कहानियों और उपन्यासों के लिए चर्चित हैं। उनकी अब तक एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके दो उपन्यास और एक कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन हैं। गोरखपुर जिले के गांव बैदौली के निवासी दयानंद पांडेय को उनके उपन्यास ‘लोक कवि अब गाते नहीं’ को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से प्रेमचंद सम्मान और ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ कहानी संग्रह पर यशपाल सम्मान मिल चुका है। ‘अपने-अपने युद्ध’ उनका अब तक सबसे चर्चित उपन्यास रहा है। अन्य उपन्यास हैं- दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल और कहानी संग्रह हैं- बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष-प्रश्न। सूरज का शिकारी बाल कहानी संग्रह है।  दयानंद पांडेय से संपर्क इन माध्यमों से किया जा सकता है

पोस्टल एड्रेस- दयानंद पांडेय, 5/7, डालीबाग, लखनऊ.

फोन नंबर : 0522-2207728, मोबाइल नंबर :  9335233424

मेल : dayanand.pandey@yahoo.com