कौन बनेगा पीएम : नहीं जनाब! मोदी बनाम नीतिश में होगी जंग

आलोक कुमारराहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी। ना जाने कहां से इस सियासी जुमले का प्रादुर्भाव हो गया। जबकि साफ दिख रहा है कि भावी प्रधानमंत्री के लिए असली लडाई तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के बीच छिड़ी है। फिर न जाने क्यों नकली भूत बनाकर राहुल गांधी को खडा कर दिया गया। नरेन्द्र मोदी और नीतिश कुमार अखाड़ा में आमने-सामने हैं।

इन दोनों का मानना है कि अगला प्रधानमंत्री अंग्रेजी के एन नामाक्षर वाले एनडीए से होगा और बनने वाले प्रधानमंत्री का नाम भी एन नामाक्षर राशि से शुरू होगा। ऐसी कोई भवष्यवाणी करने वाले प्रकांड ज्योतिषाचार्य को यह गणना करने में मुश्किल आ रही है कि एन नाम का यह भावी प्रधानमंत्री पश्चिम के गुजरात से चलकर दिल्ली आएगा या पूरब के बिहार से। इसलिए बिहार के एन गुजरात के एन पर विफर गए। ऐसा करते वक्त बिहार के एन यह आंकलन करना भूल गए कि गुजरात के एन की बिहार के एन से ज्यादा बीजेपी के एल यानी लालकृष्ण आडवाणी को लेकर चिंता है। बीजेपी के एल ने रथयात्रा पर निकलने की एकतरफा घोषणा करके संघ समेत पार्टी के अगली कतार के तमाम दिग्गजों को चमका रखा है।

धवल साफ दिख रहे एनडीए के एन नाम के इन दो महारथियों के बीच छिड़ी जंग के बावजूद न जा क्यों धड़ल्ले से बताया जाने लगा कि 2014 का संसदीय चुनाव राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी के बीच रहेगा। ऐसा कहने और सोचने वालों का मतलब है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सियासत से थकने लगी हैं। अमेरिका से ऑपरेशन कराके लौटने के बाद उनमें विरासत को लेकर चिंता जगी है। वो अब युवराज राहुल गांधी में आत्मविश्वास जगाने की भरसक तैयारी में हैं ताकि 2014 संसदीय चुनाव में कांग्रेस की नैया के खेवनहार की स्टेयरिंग पर डॉ. मनमोहन सिंह की जगह राहुल गांधी ला बिठाया जा सके। फिलहाल यह कपोल कल्पना लगता है क्योंकि सोनिया गांधी की नजर में व्यापक बदलाव का कोई संकेत नजर नहीं आ रहा है।

दूसरी तरफ अहमदाबाद की घटना से यह सियासी भाव उमड़ा कि तीन दिनों तक सदभाव उपवास का उपहास कर नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी की सोच की पूरी धारा ही बदल दी। बताया जाने लगा कि नरेन्द्र मोदी के प्रताप से आरएसएस की व्यक्ति के बजाय विचार प्रधान रहने की पूरी सियासत ही चटक गई। नरेन्द्र मोदी ने पूरी पार्टी को खुद के पीछे इस तरह से खड़ा कर लिया कि बीजेपी विचार के बजाय व्यक्ति पूजा की मुद्रा में खड़ी हो गई। नरेन्द्र मोदी को ही भारत का भावी प्रधानमंत्री बनाने की अनुगूंज होने लगी। नरेन्द्र मोदी के जीवन के अबतक के सबसे बड़े सियासी तमाशे से जो समां बंधा है उसे पंचर करने के लिए भाई लोगों ने अंदर बाहर का पूरा जोर लगा रखा है। मोरचा दर मोरचा खुलने का सिलसिला तेज है। नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री मान लेने पर परस्पर विरोधी बातें की जाने लगी हैं।

इससे अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर मेहनत कर रहे बीजेपी के कई नेताओं का सूखा गला तर होने लगा है। मसलन संघ के निर्देश पर दिल्ली में बुजुर्ग लालकृष्ण आडवाणी को किनारे करने पर आमादा और नेता नंबर वन की होड़ में फंसे अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी राजनाथ सिंह और वेंकैया नायडू में नरेन्द्र मोदी के अचानक आसमान से टपक जाने की वजह से जो हवा गुल थी उसमें जान लौटने लगी है। नरेन्द्र मोदी ने दिन में तारे दिखा दिए हैं।

ये सब के सब एकसुर में केंद्र की राजनीति में गुजरात के मॉ़डल को अपनाने की पैरवी करने लगे हैं। सूखते गले से ही सही, सबको बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेन्द्र मोदी का नाम जपने को मजबूर होना पड़ रहा है। रथी बनकर एकबार फिर से संघ को चमकाने की तैयारी कर रहे लालकृष्ण आ़डवाणी भी हक्के बक्के नजर आए और झंझावात से बचने के लिए खुद को चुपचाप नरेन्द्र भाई मोदी के पीछे छिपा लिया। भारी अंगुलियों से ब्लॉग पर टाईप कर गए कि वो सदा की तरह अमेरिका की नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उपयुक्त उम्मीद्वार बनाने की राय से भी सहमत हैं।

आगे चाहे जो हो पर नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय नेतृत्वहीनता के दौर से गुजर रही बीजेपी को सही वक्त पर चोट किया है। यह वो वक्त है, जब संघ की निजी पसंद बनकर दिल्ली के घाघों की वाट लगा रहे नागपुर के नितिन गडकरी पार्टी का कायाकल्प करने में विफल रहने के बाद खुद का कायाकल्प करने के लिए अचानक अस्पताल का रुख कर लिया।  मीडिया मंडली में यह मजाक चल रहा है कि बीजेपी अध्यक्ष गडकरी ने सोनिया गांधी की देखादेखी अस्पताल में दाखिल होने का शौक पाल लिया। कहते हैं कि आडवाणी के रथयात्रा पर निकलने के एकतरफा फैसला पर गडकरी को मजबूरी में ठप्पा लगाना पड़ा। इस पर संघ के संरक्षक नेताओं ने नितिन को निक्कमेपन का तमगा दिया तो घबराए मन से अस्पताल में इस सोच के साथ दाखिल हो गए कि शायद कांग्रेस में सोनिया गांधी की तरह ही बीजेपी को भी उनकी गैरमौजूदगी खलने लगेगी।

लेखक आलोक कुमार करीब दो दशक से मीडिया में सक्रिय हैं. विभिन्न न्यूज चैनलों, अखबारों, मैग्जीनों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री अखबार के सम्‍पादकों के सामने तोड़ेंगे अपनी चुप्‍पी

महत्वपूर्ण मुद्दों पर कथित संवादहीनता के लिए सामाजिक संगठन के कार्यकर्ताओं, मीडिया और अपनी पार्टी के कुछ सदस्यों का निशाना बनने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मीडिया के साथ बातचीत करने का फैसला किया है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बुधवार को कुछ वरिष्ठ सम्पादकों से मुलाकात करेंगे. पीएम के मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि प्रधानमंत्री और संपादकों के समूहों के साथ बातचीत का यह तरजीही तरीका होगा.

ज्ञात हो कि मनमोहन सिंह ने अपने सात वर्षों के प्रधानमंत्रित्व काल में केवल तीन बार राष्ट्रीय स्तर पर टेलीविजन के जरिए संवाददाता सम्मेलन किया है.  वह कभी भी भारतीय मीडिया को साक्षात्कार देने के लिए नहीं जाने गए हैं. मनमोहन सिंह ने चार महीने पहले टेलीविजन चैनलों के सम्‍पादकों से मुलाकात की थी. गौरतलब है कि प्रधानमंत्री को अपनी चुप्पी तोडने की नसीहत कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दी है. बताया जाता है कि पिछले दिनों हुई सीडब्ल्यूसी की बैठक में सभी मसलों पर सरकार का पक्ष रखने के लिए मीडिया के बीच जाने की नसीहत प्रधानमंत्री को दी गई थी.

संसद सत्र एक अगस्त से शुरू होने वाला है और इसके पहले विपक्ष महंगाई और भ्रष्टाचार सहित कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है. इसे देखते हुए कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने बातचीत की एक नई रणनीति तैयार की है. सूत्रों के मुताबिक छवि सुधारने की योजना के हिस्से के रूप में नई रणनीति के तहत प्रधानमंत्री और प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्ठ सम्पादकों के बीच अक्सर बैठकें होंगी. आगे चलकर यह बैठक करीब प्रत्येक सप्ताह होगी.

”अमूल बेबी” के बोल कब फूटेंगे

भूमिका राय
भूमिका राय
: रामदेव से लेकर अन्ना और भाजपा तक को कुछ न कुछ मिला… हर बार की तरह इस बार भी ठगी गई सिर्फ जनता : एक बार फिर जनता ठगी-सी खड़ी है. अवाक है और परेशान भी। अवाक, क्योंकि जिन हाथों में उसकी सुरक्षा का दायित्व था, उन्हीं हाथों से उसे ज़ख्म मिले हैं और परेशान इसलिए, कि आखिर वो जाए तो जाए कहां?

बाबा रामदेव ने जब अनशन की शुरुआत की तो, एक आस बंधी थी कि शायद इस बार हम भ्रष्टाचार को कड़ी टक्कर दे पाएं। लेकिन सरकार की दमनकारी नीति ने सब कुछ तितर-बितर कर दिया। इससे पूर्व अन्ना हजारे के आन्दोलन का हश्र भी कुछ ऐसा ही हुआ। हालांकि उनके अनशन पर किसी तरह का हमला नहीं हुआ लेकिन आज तक कोई परिणाम भी नहीं निकला। बैठकों का दौर जारी है और हर बैठक के साथ एक नये विवाद का जन्म भी।

बीते हफ्ते रामदेव के सत्याग्रह ने पूरे देश को एक सूत्रा में पिरोने का काम किया। ऐसा नहीं था कि इसमें केवल बाबा के समर्थक ही मौजूद थे। वे भी थे जो बाबा से भले कोई वास्ता न रखते हों पर देशहित की बात ने उन्हें भी रामलीला मैदान तक पहुंचा दिया। पर अब….. अब ना तो मुद्दे हैं और न ही उनका कोई सरपरस्त। काले धन का मुद्दा तो कभी का पीछे छूट गया है और अगर कुछ शेष है तो नवविवादित जूता काण्ड, सुषमा का नाच, भाजपा का प्रदर्शन, बाबा-भाजपा-संघ का रिश्ता, लाठी चार्ज, सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार। लेकिन जिस विषय को लेकर जनता ने रामदेव बाबा का समर्थन किया था अब उनकी प्रासंगिकता धुंधली हो चुकी है।

सरकार की बात करें तो शायद ‘मौकापरस्त’ ही एक ऐसा शब्द मिले जो इसकी छवि का पर्याय बन सके। ये वही सरकार है और ये वही युवराज जो कभी आम जनता की आवाज बनने का दावा करते हैं तो कभी उनके साथ राज्य सरकार के विरोध में धरने पर बैठ जाते हैं। यही नहीं गिरफ्तारी तक देते हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तो सरकार की पोल बहुत पहले ही खुल चुकी है लेकिन शनिवार को जो हुआ, उसने सत्ता की रावणनीति को पूर्णतः स्पष्ट कर दिया। ‘अमूल बेबी’ तो लगता है बोलना ही भूल चुके हैं और दो दिन बाद जब प्रधनमंत्री के बोल फूटे तो बड़े ही नपे-तुले शब्दों में या यूं कहें कि डिक्टेटेड शब्दों में उन्होंने कहा कि हमारे पास कोई और चारा नहीं था। देश के प्रधनमंत्री की इस लाचारी पर तरस तो नहीं, गुस्सा जरूर आता है।

कहावत है कि ‘‘जाकै काज तेही को साजै और करे तो डंडा बाजै’’ लेकिन वरद हस्त की छाया में वे तो सुरक्षित है और डंडे की चोट पर है मासूम जनता। अगर सत्ता का ये हाल है तो विपक्ष भी पीछे नहीं है। गुमनामी के अन्धेरों में लगभग खो-सी गई भाजपा को भी टीवी स्क्रीन पर चमकने और अखबारों में हेडलाइन बनने का मुद्दा मिल गया है। उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और अब तक कोई ठोस मुद्दा ना होने के कारण भाजपा बुझी-बुझी नजर आ रही थी। लेकिन सत्याग्रह के मुद्दे ने उनमें भी नवसंचार कर दिया है। विपक्ष जनता की सोचने लगा है, और उसके लिए राष्ट्रपति तक से गुहार लगाने लगा है लेकिन ये नहीं कह सकतें कि ये सच्चाई है या ढोंग। जो भी हो एक सक्रीय विपक्ष नजर आने लगा है। पर यहां भी राजनीति ही हावी है और स्वयं का हित ही प्राथमिकता बना हुआ है।

रही बात अन्ना एण्ड पार्टी की तो, जो आवाज जन्तर-मन्तर से बुलन्द हुई अब चारदीवारी में ही दबकर रह गयी है। जब अन्ना ने अनशन शुरू किया था तो लगा कि देश में बदलाव की बयार आ गयी है और निश्चित तौर पर अब कुछ होकर रहेगा, लेकिन तमाम बुद्धजीवियों को ठेंगा दिखाते हुए अन्ततः सरकार वही कर रही है जो वो चाहती है।  अन्ना के चरित्र पर किसी को कोई शक नहीं लेकिन आपसी मतभेदों और सरकार की चालों में फंसकर अन्ना की टीम ने खुद ही अपनी मिट्टी-पलीद करवा ली है। कहीं न कहीं जनता का मोहभंग तो हुआ ही है और इसके लिए परिणामों से कहीं ज्यादा अन्ना और उनकी टीम की जल्दबाजी और अधूरी तैयारी जिम्मेदार है।

अब बात रामदेव के सत्याग्रह की। रामदेव ने सत्याग्रह तो बड़ी ही तैयारी से शुरू किया, और जब सत्ता के चार आला नेता उनके सम्मान में नतमस्तक दिखे तो लगा कि शायद इसबार काले धन का मुद्दा सुलझ जाए लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जो हुआ वो आपके और हमारे सामने है। रामदेव का अन्धानुकरण न करते हुए अगर सोचें तो क्या ऐसा नहीं लगता कि रामदेव को पहले ही अपनी सम्पत्ति का खुलासा कर देना चाहिए था और वैसे भी सांच को आंच क्या। अगर वे सच्चे हैं तो पहले या बाद में का कोई प्रश्न ही नहीं उठता और यदि उन्होंने किसी पत्र पर सहमति दी है तो उसका खुलासा, साफ-साफ तौर पर जनता से करते।

उन्हें क्यों ऐसा लगा कि ऐसा करने से वे कमजोर पड़ जाएंगे या जनता उनका साथ नहीं देगी? जो जनता भरोसा करके अपना कामधाम छोड़, भूखे-प्यासे आपके साथ खड़ी है क्या वो सच जानकर आपका साथ छोड़ देती? जनता रामदेव के साथ आयी क्योंकि ये मुद्दा उससे जुड़ा था और बाबा उसके लिए आवाज बुलन्द कर रहे थे, लेकिन कहीं न कहीं रामदेव ने बात छिपाकर जनता को छला तो है ही। अब सब कुछ सामने आ चुका है, शेष है तो सिर्फ राख के ढ़ेर पर पत्थरबाजी करने का दौर।

सरकार को जो करना था उसने किया और आज भी बिना किसी की परवाह किये वही कर रही है जो उसे करना है। भाजपा जिन टर्निंग प्वाइंट्स की खोज में थी वो उसे रामदेव के सत्याग्रह के रूप में बैठे-बिठाए मिल गया। अन्ना एण्ड ग्रुप को जो चाहिए था वो उसे मिला भी और खो भी गया। रामदेव को राजनीति में आने का रास्ता मिल गया और मुद्दा धुंआ हो गया, कल तक गर्मी दिखाने वाले बाबा आज केन्द्र को माफी देते नजर आ रहे हैं लेकिन जनता…..? जनता आज भी वहीं है जहां कल थी। आज भी भ्रष्टाचार उसी का निवाला छीन रहा है और सरकार भी उसी की गर्दन दबोच रही है। शनिवार के काण्ड ने उसके मन में रोष तो भरा है लेकिन साथ ही एक झिझक भी। झिझक, कि क्या उसे अब किसी आन्दोलन का हिस्सा बनना चाहिए? लेकिन अब अगर हम चुप रहे तो लाठियों की जगह गोलियां ही चलेंगी।

अब हमें ही ये समझना होगा कि वास्तव में ये हमारे हक की ही लड़ाई है और हमें ही इसकी कमान सम्भालनी होगी। अपने-अपने स्तर पर इस भ्रष्टाचार को दूर करने का प्रयास करना होगा और इसे अपनी आदत में शुमार करना होगा क्योंकि वार्षिक उत्सव के तौर पर मनाये जाने वाले इन आन्दोलनों का हश्र हम सबके सामने है। आने वाले कुछ दिनों में एक बार फिर सबकुछ सामान्य हो जाएगा। बाबा पतंजलि में ध्यान रमा लेंगे और राजनीतिक दल चुनावों में, लेकिन हमारा क्या? हमारे मुद्दों का क्या? वो तो आज भी जस के तस बने हुए हैं और अब अगर हमने कुछ नहीं किया तो संभव है ये धोखेबाज देश के साथ-साथ हमें भी बेच खाएं। तो इससे पहले की बहुत देर हो जाए आज से ही अपने स्तर पर भ्रष्टाचार की लड़ाई की शुरुआत करें।

लेखिका भूमिका राय दिल्ली विश्वविद्यालय के कम्युनिटी रेडियो में बतौर कार्यक्रम उदघोषक कार्यरत हैं. उन्होंने हाईस्कूल व इण्टरमीडिएट लखनऊ से और स्नातक की शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी की है. वर्तमान में भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा में अध्यनरत हैं.

अन्ना ने खाया धोखा पर होगी बाबा की जीत

आलोक कुमार: स्वामी रामदेव के आगे केंद्र सरकार के सारे दांव विफल होते नजर आ रहे हैं : रामदेव के आंदोलन में है लोहिया की खुशबू : योग गुरू रामदेव हठयोग की वैभवकारी मुद्रा में हैं। बाबा की मुद्रा से सियासी कुर्सी की चूलें हिली हुई है। सत्याग्रह का दायरा अन्ना हजारे की तुलना में व्यापक है।

देशभर के 624 जिलों में स्वामी रामदेव के योग शिविर चलाने वाले शिष्यों ने सत्याग्रह स्थल सजा रखा है। समर्थन में आए लोग के लिए बैठने ठहरने का जरूरी इंतजाम है। डंके की चोट पर सत्याग्रह पर खर्चों का हिसाब देने के बजाय स्वामी रामदेव सरकार से विदेशों में जमा काले धन का हिसाब मांग रहे हैं और दबंगता से कह रहे हैं कि जब तक सरकार ने गंभीर पहल नहीं की, वो सत्याग्रह के अष्टांग योग से उठने वाले नहीं हैं।

डा. मनमोहन सिंह की सरकार सत्याग्रह के असर की सोचकर हैरान परेशान हैं। स्वामी को मनाने की शुरुआती विफलता के बावजूद पुरजोर कोशिश जारी है कि बाबा के हठयोग को किसी तरह  राजयोग से मना लिया जाय। बाबा के आसन छूटने की देरी से सरकारी सियासत दां की जनता से हितैषी रिश्ते की डोर कमजोर पड़ रही है। इसका अगले साल उत्तर प्रदेश चुनाव के शुरू हो रहे केंद्र में अगली सरकार की कवायद के सेमीफाइनल पर काला असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

स्वामी रामदेव के हठयोग के निहितार्थ को समझने के लिए हाल की तीन बातों पर गौर करना होगा। पहला, अन्ना हजारे ने रालेगांव सिद्धि के घर से सवाल किया है कि जनहित में बनी सरकार ठीक से काम नहीं कर रही है। इसलिए बाबा रामदेव अथवा उन जैसों को आसान मसलों पर आंदोलन की राह पकडने को मजबूर होना पड़ रहा है। अन्ना के मत से साफ है कि सरकार ने ही लोकपाल लाने के लिए पहल की थी। जब भ्रष्टाचार मिटाने के इस सटीक पहल पर अमल में विलंब हुआ तो अन्ना हजारे को आंदोलन करना पड़ा। अब लोकपाल विधेयक की ड्राफ्टिंग कमेटी में बैठाकर सरकार के मंत्रियों ने वकालती दलीलों से अन्ना को परेशान कर रखा है। अन्ना ने स्वामी रामदेव को भविष्य में हो सकने वाली ऐसे किसी परेशानी के प्रति आगाह किया है।

दो महीने पहले अप्रैल में अनशन से दिल्ली की सियासत को हिलाने वाले अन्ना हजारे अब परेशान हैं। प्रणव मुर्खजी की अध्यक्षता में बनी लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी में सरकार  की तरफ से मौजूद बाकी चार सदस्यों की पृष्ठभूमि वकालत की है। दिग्गज वकील कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, पी चिदम्बरम कानून मंत्री वीरप्पा मोईली के साथ मिलकर सिविल सोसाईटी के नुमांईदों को कानून और संविधान के पाठ पढा रहे हैं। छठी बैठक पूरा होते होते इसकी उम्मीद कम पड़ती जा रही है कि सरकार की तरफ से तय किए गए 30 जून की तारीख तक लोकपाल विधेयक ड्राफ्ट करने का काम पूरा हो पाएगा। सरकार की तरफ से वकीलों की जोर अजमाईश को इसे देखकर सिविल सोसाईटी की तरफ से तमाम विवादों के बावजूद समिति में पिता-पुत्र के दो दिग्गज वकीलों की जोड़ी को बनाए रखने की हठ का मतलब समझ में आने लगा है।

इधर देश के सबसे पुराने राजनीतिज्ञों में शामिल प्रणव मुर्खजी ने राजनीतिक अनुभव के बल पर अलग दांव चल दिया है। समिति के अध्यक्ष के नाते उन्होने लोकपाल ड्राफ्ट पर राज्यों के मुख्यमंत्री से सलाह लेने की औपचारिकता को पूरा करने के बहाने विलंब का नया रास्ता तैयार कर दिया है। विवाद में फंसे लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी में सरकारी पक्ष की दलील है कि प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे से बाहर ऱखा जाए। दलील को कानून सम्मत बताने के साथ ही प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे में लाने से आशंका जताई जा रही है कि इससे लोकपाल के निरंकुश  होने का खतरा है। अब वातावरण तैयार किया जा रहा है कि लोकपाल की व्यवस्था लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर सकती है।

अन्ना हजारे को चकमा देकर अनशन से उठाने वाली सरकार अब लोकपाल बनाने की पूरी कोशिश की जड में मट्ठा डाल रही है। इस पर विरोध लाजिमी है। विरोध को कम करने के लिए रामदेव बाबा का इस्तेमाल किया गया। जिन्होने मध्यप्रदेश में कांग्रेस दिग्गज कमलनाथ के घर आहार लेने के साथ ही लोकपाल के दायरे से प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखने की पैरवी कर दी। इससे पैदा हुए आपसी दरार या भ्रम को दूर करने के लिए रविवार को अन्ना हजारे दिल्ली पहुंचकर बाबा रामदेव के आंदोलन में शिरकत करने वाले हैं।

गौर करने वाली दूसरी बात, बाबा रामदेव के एक शानदार शर्त को झटके में मान लेने से जुडी है। लोहिया के बाद पहली बार रामदेव ने हिंदी में तकनीकी विषयों की पढाई की व्यवस्था करने और अंग्रेजी के बजाय भारतीय भाषाओं को कामकाज में समुचित जगह देने की बात सरकार के सामने रखी और मुश्किल में फंसी सरकार ने इसे एक झटके में मान लिया। और कह दिया गया कि बाबा रामदेव के नब्बे प्रतिशत बात मान ली गई हैं। सवाल उठा कि वो कौन सी दस प्रतिशत बात है जिसे सरकार को मानने में दिक्कत आ रही है। इसका खुलासा होना बाकी है।

लेकिन जैसे ही अंग्रेजी का मोह त्यागकर भाषाई जरूरतों को पूरा करने की मानी गई बातों को पूरा करने के लिए टाइम फ्रेम तय करने की बात आई तो सरकार की तरफ से कहा गया कि इसे एक दिन में पूरा नहीं किया जा सकता है। अच्छा लगा कि समय को लेकर स्वामी रामदेव को अन्ना हजारे की तरह धोखा देने वाले टोटके को अजमाया नहीं गया। वैसे आसानी से सरकार के मान लेने से जाहिर है कि लोक कल्याण की कमजोर होती इच्छाशक्ति ने सरकार को इस दिशा में सोचने नहीं दिया। इस दरकार को सरकार ने हाल के बरसों में गंभीरता से महसूस ही नहीं किया था औऱ जैसे ही स्वामी रामदेव ने महसूस कराया तो आसानी से मान लेने की बात की गई।

तीसरी महत्वपूर्ण बात गोविंदाचार्य कर रहे हैं। उन्होने प्रतिपक्षी बीजेपी पर तोहमत जड़ा है। कभी बीजेपी के थिंक टैंक रहे और सोशल इंजीनियरिंग के रास्ते बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाने में अहम किरदार निभाने वाले गोविंदाचार्य इन दिनों स्वामी रामदेव के सिपहसलारों में हैं। उनका कहना है कि विपक्ष जनता की जरूरतों को आवाज  देने में फेल हो गया। विपक्ष के फेल होने से बनी रिक्तता का ही नतीजा है कि लोगों का राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग हो रहा है। अगर संसदीय व्यवस्था में सार्थक विपक्ष की भूमिका निभाई गई होती तो लोग सिविल सोसाइटी की तरफ उम्मीद भरी नजर से नहीं देखते। खेती और समाज सुधार में लगे अन्ना हजारे अथवा योग सिखाने वाले बाबा रामदेव को  राजनीतिक सुधार के लिए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन  नहीं करना पडता। उनके मुताबिक विपक्ष का कमजोर होना लोगों में व्यवस्था को बनाए रखने के लिए चोर-चोर मौसेरा भाई वाली स्थिति के भाव को भरता है। गोविंदाचार्य ने विदेशों में जमा कालाधन मामले में सोनिया गांधी को लिखे लालकृष्ण आडवाणी के माफीनामे को राजनीति क अपराध बताया है।

बाबा रामदेव की असली मांग विदेशों से काला धन लाने से जुडा है। इसे लेकर सरकार पर शक है। दुनिया के कई देश स्विस बैंक से अपने खातेदारों का विवरण मंगा चुके हैं। कार्रवाई कर चुके है लेकिन भारत में विदेशी बैंकों में गुपचुप कालाधन जमा करने वालो के खिलाफ कार्रवाई होनी बाकी है। इसे लेकर  सरकार को सुप्रीम कोर्ट तक से निर्देश मिल रहे हैं। लेकिन  कार्रवाई के नाम पर अब तक ढाक के तीन पात ही होता रहा है। बल्कि शर्मिंदगी की इंतहा तो तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट में दलीलों के सहारे सरकार ने विदेशी बैंकों के खातेदारों तक का नाम बताने से इंकार कर दिया। सरकार के ऐसे ही कई  रवैए बेतहाशा मंहगाई से मार खा रहे आम नागरिक को नागवार गुजर रहा है। लोग  अपनी हालात पर नाराजगी के गुस्से के प्रदर्शन के लिए ही बाबा रामदेव या अन्ना हजारे के पीछे हो ले रहे हैं।

बाबा रामदेव के वित्तीय सलाहाकारों के अध्ययन के मुताबिक  भारत का चार सौ लाख करोड़ रुपए का काला धन विदेशों में जमा है। विदेशों में जमा इस धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की मांग हो रही है। गौर करने वाली बात है कि पिछली बजट में देश के 59 लाख करोड रूपए के सकल घरेलू उत्पाद का अनुमान  है। ऐसे में विदेशों से चार सौ लाख  करोड़ रुपए  के काला धन का देश के विकास  के काम आने की सूरत में गरीब भारत की तस्वीर पूरी तरह से बदल जाने की उम्मीद है ।  उम्मीद भरे इसी ने अनुमान ने लोगों को बाबा के राजयोग की तरफ आकर्षित कर रखा है। फिर काला धन बनाने की मशीन पर चोट करने के लिए अन्ना हजारे की लोकपाल बिल  लाने की जरूरत  के साथ राजनीति  हो रही है। परेशान अन्ना हजारे ने  इस मामले में केंद्र सरकार से धोखा मिलने की बात करके लोगों की नाराजगी को बढा दिया है। नाराज लोग  सबक सिखाने के लिए बाबा रामदेव के साथ हो लिए हैं।

अन्ना में एक तरह से धोखा खाने का भाव भरने के लिए ही केंद्र सरकार ने बाबा रामदेव का ऐतिहासिक रेडकार्पेट वेलकम किया था। किराए के निजी विमान से आंदोलन के लिए दिल्ली पहुंचे बाबा रामदेव से मिलने के लिए देश के सबसे बड़े अफसर कैबिनेट सचिव के साथ सरकार के चार कैबिनेट मंत्री विमानतल पर मौजूद रहे। एयरपोर्ट पर ही ढाई घंटे तक स्वामी रामदेव के साथ बैठक कर गंभीरता से सुनने समझने का नाटक किया गया ताकि स्वामी में ये भाव घर करे कि नैतिक बल पर महाराष्ट्र में वक्त बेवक्त शरद पवार और बालासाहेब ठाकरे की चूलें हिला चुके अन्ना हजारे से कहीं ज्यादा उनको महत्व दिया जा रहा है। लेकिन दस साल से राजनेताओं को चराते हुए दनादन तरक्की कर रहे स्वामी रामदेव के आगे केंद्र सरकार के सारे दांव विफल होते नजर आ रहे हैं।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने ‘आज’, ‘देशप्राण’, ‘स्पेक्टिक्स इंडिया’, ‘करंट न्यूज’, होम टीवी, ‘माया’, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.

ये खबर सही है तो टीवी वालों को पीएम को दौड़ा लेना चाहिए

हिंदुस्तान अखबार में अंदर के पेज पर निर्मल पाठक की लिखी एक स्टोरी छपी है. इसमें उन्होंने बताया है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह टीवी जर्नलिस्टों से बहुत नाराज हैं और इसी कारण वे अपनी विदेश यात्रा में टीवी वालों को नहीं ले जाएंगे. यह स्टोरी चौंकाती है. क्या पीएम उन्हीं को ले जाएंगे जो उन्हें सूट करते हैं. जो उनको सुरक्षित करते हुए लिखते हैं. टीवी वालों से उनकी नाराजगी की वजह क्या है. क्या टीवी वालों ने घपलों-घोटालों को दिखा दिया तो यह गलत काम कर दिया.

कुल मिलाकर अगर ये स्टोरी सच है तो टीवी वालों को मनमोहन की खबर लेनी चाहिए. आखिर कैसे कोई पीएम ऐसा कर सकता है. क्या कांग्रेस फिर से इस देश में आपातकाल की तैयारी कर रही है? तभी तो जो उनके हिसाब से नहीं बोलता, उन्हें नष्ट करने, उन्हें साइडलाइन करने की तैयारी चल रही है. और ऐसा केंद्र में ही नहीं, बिहार-यूपी-उत्तराखंड समेत कई राज्यों में भिन्न-भिन्न सरकारें भी यही काम कर रही हैं. सत्ता को खुद के चरणों में लोटने वाला मीडिया ही क्यों पसंद है. इन सभी मुद्दों पर टीवी वालों को बहस की शुरुआत करनी चाहिए अन्यथा आज वे चुप रहेंगे तो कल उनकी मौत पर कोई कंधा देने भी नहीं आएगा. हिंदुस्तान में प्रकाशित पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- टीवी पत्रकार नहीं जाएंगे प्रधानमंत्री के साथ चीन

बेचारे प्रधानमंत्री की चरम बेचारगी, पर बेचारा पद न छोडे़गा

अपने देश के प्रधानमंत्री बेचारे हैं, मजबूर हैं, लाचार हैं, गल्तियां करने वाले हैं…. और ये सारी बातें वे खुद मानते भी हैं. लेकिन उन्हें शायद डाक्टर ने कह रखा है कि यह सब होने के बावजूद वे पद पर बने रहें. सच में, लाचार पीएम के लगातार पद पर बने रहने के कारण यह देश लाचार होता जा रहा है, इस देश की जनता लाचार होती जा रही है, इस देश की किस्मत में बेचारगी का भाव भरता जा रहा है.

पर पीएम हैं कि पद से ऐसे चिपके हैं जैसे फेवीकोल का जोड़ चिपका देता है, और जनता खींचे पड़ी है लेकिन मनमोहन और पीएम को जोड़ छूटने-टूटने का नाम नहीं ले रहा. जम्‍मू से सूचना है कि आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीवीसी पद पर दागी पीजे थॉमस की नियुक्ति में अपनी गलती मान ली है. प्रधानमंत्री ने जम्मू में पत्रकारों से कहा कि सीवीसी की नियुक्ति के लिए वह पूरी तरह जिम्‍मेदार हैं और गलती मानते हैं.

साथ ही यह भी बोले कि थॉमस की नियुक्ति गैरकानूनी करार देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का वह स्‍वागत करते हैं. क्या ऐसा करना उनकी मजबूरी थी, इस सवाल पर मनमोहन ने सतर्क होते हुए कहा कि नहीं, इस मामले में उनकी या गठबंधन की कोई मजबूरी नहीं थी. आपको याद होगा कि 2जी घोटाले के बारे में कुछ दिन पहले टीपी संपादकों की पीसी में प्रधानमंत्री ने अपना और अपने गठबंधन की मजबूरी का रोना रोया था. सोचिए, ये लाचार, निरीह, बेचारा, कमजोर, मजबूर मनमोहन कब तक प्रधानमंत्री की कुर्सी से चिपका रहेगा? कोई कुछ करो भाई…., कोई कुछ लिखो भाई… इस बेचारगी पर…

भड़ासी चुटकुला (20)

अपने मनमोहन सिंह ने जिस ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया, अपनी मजबूरी का रोना रोने के लिए, वह प्रेस कांफ्रेंस ही मनमोहन के गले की फांस बनने लगी है. उस पीसी के जरिए मनमोहन ने खुद को सबसे मजबूर आदमी के रूप में पेश कर दिया है. मनमोहन की उसी पेशकश पर कुछ चुटकुले तैयार होकर आजकल यहां वहां विचरण कर रहे हैं. अपने बेचारे पीएम मनमोहन को लेकर बने दो नए चुटकुले या कमेंट्स, जो कह लीजिए आपके सामने पेश हैं. इसे पढ़कर आप जरूर कहेंगे कि ये आज के दिन के दो सबसे मजेदार वाक्य हैं. जो लोग इसे पहले पढ़ चुके हैं, उनसे अनुरोध है कि वे भी इस चुटकुले को जहां-तहां फारवर्ड करें… ताकि बेचारे पीएम की मजबूरी वाली बात और उनका मजबूर दर्शन हर जगह पहुंच सके. जय हो. -यशवंत

1.) कम से कम महात्मा गांधी को छुट्टी तो मिली, अब “मजबूरी का नाम मनमोहन सिंह” हो गया है…

2.) ”दबंग” फ़िल्म का सीक्वल बनेगा, इसमें हीरो होंगे मनमोहन सिंह… और फ़िल्म का नाम रहेगा- “अपंग”…

भड़ास ब्लाग पर एक भड़ासी सदस्य द्वारा प्रकाशित

संपादकों के सवाल और प्रधानमंत्री के जवाब

प्रधानमंत्री साथ लगभग सत्‍तर मिनट के प्रेस कांफ्रेंस में संपादकों ने अनेक सवाल पूछे कुछ तीखे- कुछ हल्‍के। संपादक रूपी जीव भी अब आम आदमी से कितना दूर जा चुका है, यह प्रेस कांफ्रेंस में देखने को मिला। इन महान संपादकों ने आम आदमी से जुड़ा एक सवाल नहीं पूछा। युवाओं के सबसे बड़े देश में बेरोजगारों के लिए क्‍या कदम उठाया जा रहा है, किसी का ध्‍यान नहीं गया। कर्ज में डूबा किसान आत्‍महत्‍या कर रहा है, महंगाई आम आदमी को लील रही है, ऐसे सवाल हाशिए पर रहे। नीचे आप भी पढि़ए संपादकों के सवाल और पीएम के जवाब।

अरुण पुरी (इंडिया टुडे ग्रुप) : आपने ए राजा को दूरसंचार मंत्री क्यों बनाया जबकि उनकी भूमिका पर सवाल उठे थे ?

प्रधानमंत्री : हालांकि कई शिकायतें आई थीं, लेकिन मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था कि इतने गंभीर आरोप लगे हैं। उस समय तक मुझे नहीं पता था कि इतनी गंभीर चीज़ें हुई हैं, इसलिए मुझे राजा को कैबिनेट को रखने पर आपत्ति नहीं थी। कैबिनेट में कैसे राजा को शामिल किया गया, उसके बारे में मैं नहीं बताउंगा, लेकिन ये गठबंधन सरकार है और राजा और मारन द्रमुक की पसंद थे। पहले आओ और पहले पाओ की नीति के तहत किसको-किसको क्या मिला, इन सब बातों पर हमारे साथ या कैबिनेट में र्चचा नहीं हुई, ये दूरसंचार मंत्रालय का काम था, इसलिए मैंने इस बात पर ज़ोर नहीं दिया था। जब सभी संबंधित विभाग और मंत्रालय इसके पक्ष में नहीं, तो मैं क्यों इस पर ज़ोर दूं। बाद में वित्त मंत्री और दूरसंचार विभाग ने भी इस पर सहमति जताई थी कि 2-जी में ऑक्शन की आवश्यकता नहीं। उन्होंने कहा था कि 2-जी मामले में ट्राई, दूरसंचार आयोग और उनकी राय में ऑक्शन वाजिब नहीं है। ऑक्शन के समय राजा ने मुझे बताया था कि ट्राई ने इसका विरोध किया था। मैंने 2007 में पत्र लिखकर अपनी चिंता जताई थी। राजा ने मेरे पत्र का जवाब दिया था और कहा था कि उन्होंने इस मामले में पूरी तरह पारदर्शिता निभाई है और आगे भी निभा रहे हैं।

आर प्रशांत (एशियानेट ) : न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और केरल चुनाव पर आपका क्या कहना है ?

प्रधानमंत्री : हमारी पार्टी चुनाव में अच्छा करेगी और भ्रष्टाचार कहीं भी हो, उसकी जांच होनी चाहिए और उससे निपटना चाहिए।

प्रांजल (ब्लूमबर्ग) : सरकार कड़े सुधारवादी क़दम क्यों नहीं उठा रही है?

प्रधानमंत्री : गुजरात के एक मंत्री के खिलाफ़ कार्रवाई हुई है, उसकी वजह से ये हंगामा हो रहा है, लेकिन मैं इस मामले पर कुछ और नहीं कहना चाहता। विपक्षी पार्टी खासकर भारतीय जनता पार्टी ने बहुत ही गलत रुख अपना रखा है, लेकिन मैं इस पर ज्‍यादा नहीं कहना चाहता। जब संसद नहीं चलने दी जाती, तो काम कैसे हो।

राजदीप सरदेसाई (सीएनएन-आईबीएन) : क्या आपने इस्तीफ़ा देने का विचार किया था और जेपीसी और पीएएसी पर आपकी राय क्या है?

प्रधानमंत्री : गठबंधन सरकार में गठबंधन धर्म होता है और कई बार ऐसा होता है कि आप जिस तरह चाहते हैं, गठबंधन सरकार में वैसा नहीं होता, लेकिन मैं पद छोड़ने का कभी नहीं सोचता और मैं अपना कार्यकाल पूरा करूंगा। मैं किसी भी समिति के सामने पेश होने के लिए तैयार हूं। प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार आवश्यक है और इसकी ज़रूरत है। मुझे अनियमितताओं पर सबसे ज्‍यादा खेद है और अंतरराष्ट्रीय मंदी में अर्थव्यवस्था को बचाए रखना सबसे बड़ी उपलब्धि हैं। राष्ट्रमंडल घोटाले की जांच में थोड़ा समय लग रहा है, लेकिन मैं भरोसा दिलाता हूं कि गलती करनेवाले छोड़े नहीं जाएंगे। 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में राजस्व नुकसान की शुरुआती बिंदू समझने की आवश्यकता है, नुक़सान का आकलन करना मुश्किल काम है।

प्रेरणा सूरी (अल जज़ीरा) : मिस्र के बारे में आपका क्या कहना है?

प्रधानमंत्री : मिस्र में जो भी हुआ, वह चिंता का विषय है। वहां भारतीयों की भी चिंता है। मिस्र की तरह भारत में ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि यहां लोगों के पास सरकार बदलने का अधिकार है। यहां फ्री मीडिया है, इसलिए मिस्र में जो कुछ हुआ, वैसा भारत में नहीं हो सकता।

ईटीवी : तेलंगाना मामले पर केंद्र और पार्टी की नीति क्या है?

प्रधानमंत्री : यह जटिल मामला है। गृहमंत्री ने सभी राजनीतिक दलों से पहले दौर की बात की है, लेकिन अभी विचार-विमर्श की प्रक्रिया चलेगी।

सुभाशीष मोइत्रा (कोलकाता टीवी) : क्या भ्रष्टाचार के मामले पर यूपीए टूट सकता है और क्या वाममोर्चे से फिर गठबंधन होगा?

प्रधानमंत्री : फि़लहाल वाममोर्चे के साथ गठबंधन नहीं है और जो भी गठबंधन में शामिल हैं, सरकार के साथ मज़बूती से जुड़े हुए हैं।

संजय पुगलिया (सीएनबीसी-आवाज़) : आधारभूत क्षेत्र में दीर्घकालिक फंड के बारे में क्या योजना है?

प्रधानमंत्री : सबसे पहले हमें कॉरपोरेट माहौल अच्छा बनाना होगा। विदेशी निवेश के लिए कोशिश होनी चाहिए, इस पर विचार चल रहा है। वित्तमंत्री भी इस पर काम कर रहे हैं। कृषि क्षेत्र में सुधार पर राज्य सरकारों के साथ विचार चल रहा है। कहीं सफलता मिल रही है और कहीं नहीं मिल रही है।

प्रणय रॉय (एनडीटीवी) : आपकी हो रही आलोचना के बीच क्या आप अगली बार प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे?

प्रधानमंत्री : इस पर कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी, क्योंकि अभी अगले चुनाव काफ़ी दूर हैं। बजट सत्र के बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल होगा।

अनुराधा प्रसाद (न्यूज़ 24) : जेपीसी की मांग पर संसद की कार्यवाही नहीं चली थी, क्या बजट सत्र चलेगा?

प्रधानमंत्री : पूरी कोशिश की जा रही है और उम्मीद है कि कार्यवाही चलेगी।

सीएनएन : महंगाई का गरीबों पर पड़नेवाले असर के बारे में आपका क्या कहना है?

प्रधानमंत्री : महंगाई है, लेकिन हमने कई योजनाएं बनाई हैं और ग़रीबों का ख्याल रखा जा रहा है। जन वितरण प्रणाली में वर्ष 2002 से क़ीमतों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। हम ग़रीबी की मुश्किल समझते हैं। केंद्र सरकार गरीबों के लिए कई योजनाएं चला रही है।

एक पत्रकार : उल्फा समस्या के समाधान के लिए क्या कोई समयसीमा है?

प्रधानमंत्री : अभी प्रक्रिया शुरू हो रही है। ये कहना बेहतर होता कि हम तुरंत इसे कर लेंगे, लेकिन अभी प्रक्रिया शुरू हुई है, इसमें समय लगेगा और सरकार इसे काफ़ी गंभीरता से ले रही है। असम में कांग्रेस सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है। शांति की कोशिशें हो रही हैं।

शाजी ज़मां (स्टार न्यूज़) : भ्रष्टाचार के मामले में क्या आपको कभी लगा कि ये आपकी नैतिक जिम्मेदारी है?

प्रधानमंत्री : मैं अपनी ज़िम्मेदार समझता हूं, लेकिन गठबंधन सरकार की कुछ मजबूरी होती है। गठबंधन सरकार में कुछ समझौते करने पड़ते हैं। राजनीति में कुछ चीज़ें है जो मेरे हिसाब से नहीं है, लेकिन मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है।

अर्णव गोस्वामी (टाइम्स नाउ) : देवास समझौते में प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों पर आरोप है, उस पर क्या कहना है?

प्रधानमंत्री : सौदा अभी अमल में नहीं आया है और सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति इसे निरस्त करने के बारे में जल्द फैसला करेगी। इस बारे में पिछले साल दो जुलाई को फैसला हो चुका था। यह खबर भी गलत है कि प्रधानमंत्री कार्यालय पिछले साल नवम्बर तक परदे के पीछे कोई चर्चा कर रहा था जबकि सौदा निरस्त करने का फैसला उससे पहले ही हो चुका था। मैंने किसी से बात नहीं की पीएमओ ने किसी से बात नहीं की। जर्मनी के विदेश मंत्री ने भी मुझसे मुलाकात के दौरान इस मुद्दे पर र्चचा नहीं की। कानून मंत्रालय सहित विभिन्न विभागों ने सौदे को निरस्त करने की सिफारिश की थी लेकिन यह फैसला करने में केवल प्रक्रियागत विलंब हुआ है।

संजॉय मजूमदार (बीबीसी) : ब्रिटेन सरकार की ओर से फंड की क्या आवश्यकता है?

प्रधानमंत्री : भारत अब भी ग़रीब देश है और अगर कोई मित्र देश भारत में निवेश करता है तो हम उसका स्वागत करते हैं। मीडिया में भ्रष्टाचार की खबरों के कारण देश की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिगड़ रही है इसलिए मीडिया बिना किसी तथ्य के निष्कर्ष पर न पहुँचे।

सतीश के सिंह (जी न्यूज़) : आपने प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों बुलाई? आप कहते हैं कि आप भ्रष्टाचार पर गंभीर हैं, लेकिन मीडिया में रिपोर्ट आए बिना सरकार सामने क्यों नहीं आती?

प्रधानमंत्री : मैं यह नहीं कहता कि मुझसे गलती नहीं हुई, लेकिन मैं उतना दोषी नहीं हूं जितना दिखाया जा रहा है। ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स इस मामले को देख रहे हैं। काले धन के बारे में हम क़दम उठा रहे हैं और पैसा वापस लाने की हरसंभव कोशिश करेंगे।

उपेंद्र राय (सहारा नेटवर्क) : 2009 में फॉरेन एफडीआई फंड करीब 40 बिलियन डॉलर आया था जबकि 2010 के पहले 8 महीने में केवल 14 बिलियन डॉलर तक ही ये सिमट कर रह गया है। इसमे कहां गलती हुई ?

प्रधानमंत्री : गलती हमारे यहां नहीं हुई। अंतरराष्ट्रीय इनवायरमेंट ऐसा है कि पिछले दिनों में तमाम इमरजिंग मार्केट से फंड वापस गए हैं। हम लोग आज एक ऐसे माहौल में काम कर रहे हैं कि बाहर देशों में जो कुछ भी होता है उसका असर हम पर भी पड़ता है। इसलिए यह कहना इतना आसान नहीं जो कि कुछ भी हमारे फंडफ्लो के साथ होता है वह हमारी नीतियों की वजह से होता है। यह इस बात से भी प्रभावित होता है कि दूसरे देश खासतौर पर विकसित देश किस तरह की नीतियों को अपनाते हैं, लेकिन मैं इससे सहमत हूं कि हमें अपने फंड को और मजबूत करने की जरूरत है ताकि ऐसा माहौल बन सके जिसमें विदेशों से अधिक मात्रा में फंड आ सके।

मनमोहन सबसे कलंकित प्रधानमंत्रियों में से एक!

आलोक तोमर: झूठे, बेईमान, नादान मनमोहन! : प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शायद इस देश के इतिहास के अब तक के सबसे कलंकित प्रधानमंत्रियों में से एक साबित होने वाले हैं। वैसे तो वे अपने आपको महात्मा गांधी साबित करने में जुटे हुए हैं लेकिन जो भी घपला होता है उसके बारे में आधिकारिक और अदालती तौर पर पता चलता हैं कि जो हुआ वह मनमोहन सिंह की पूरी जानकारी में हुआ।

सबसे पहले तो यह कि मनमोहन सिंह पर अपनी ईमानदारी से कमाई गई इतनी दौलत है कि उनकी अगली दो पीढ़ियां बहुत आराम से रह सकती हैं अगर ठीक से निवेश करें तो आगे का रास्ता भी निकाल सकती हैं। उन्हें काली कमाई की जरूरत नहीं है। भारत की कीमत पर उन्होंने विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का जो भला किया है उसके बदले तीन लाख रुपए से ज्यादा टैक्स फ्री पेंशन भी उन्हें मिल ही रही है और पिछले करीब पंद्रह साल से किसी न किसी सरकारी पद पर हैं इसलिए खर्चा कुछ हैं नहीं। फिर भी इतने घपलों में एक साथ कोई प्रधानमंत्री नहीं फंसा रहा।

सिर्फ सीडब्ल्यूजी  कॉमनवेल्थ और टू जी घोटाले बीस हजार करोड़ के हैं। आईपीएल के घोटाले भी अभी तक गिनती नहीं हो सकी और आज की तारीख में दुनिया की क्रिकेट के मसीहा और अपने मंत्री शरद पवार का भी वे कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे जबकि देश में किसान मर रहे थे और बाजार में प्याज का भाव चाहे जो हो, विदर्भ के किसानों से वह डेढ़ रुपए किलो खरीदी जा रही है। विदर्भ की मंडियों में भी वह पांच रुपए किलो से ज्यादा नहीं बिक रही। और अब इसरो का संवेदनशील घोटाला सामने आया है। एक तो इसरो रक्षा के हिसाब से बहुत संवेदनशील है और दूसरे सीधे प्रधानमंत्री ही इसकी निगरानी के लिए जिम्मेदार हैं। इसरो इस समय देवस कंपनी को दिए गए एक अवैध ठेके में फंसा हुआ है जिसे वह पूरी तौर पर कानूनी कहता है। अरबों रुपए के इस ठेके में तमाम तरह के घपले हुए बताए जा रहे हैं और प्रधानमंत्री कार्यालय लगातार कह रहा है कि उसे कुछ पता नहीं।

मगर प्रधानमंत्री कार्यालय को जवाब देवस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राम विश्वनाथन ने करारा जवाब दिया है। देवस ने कहा है कि जो हुआ वह इसरो के प्रभारी और देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जानकारी में हुआ और केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठकों में मंजूर किया गया। अगर देवस वाले सही बोल रहे हैं तो पूछना पड़ेगा कि सरदार जी को लगातार झूठ बोलने की क्या जरूरत थी? सीवीसी  थॉमस की नियुक्ति के मामले में पहले तो मनमोहन सिंह की ही सरकार कहती रही कि जो हुआ, प्रधानमंत्री के निर्देश पर हुआ। अचानक वे ही वकील और वे ही अधिकारी अदालत पहुंचते हैं और कहते हैं कि हम प्रधानमंत्री को जानकारी देना भूल गए। इस देश में भ्रष्टाचार की जांच करने वाला एक सबसे बड़ा अधिकारी नियुक्त हो जाता हैं और देश का प्रधानमंत्री गोल डब्बे या छोले भटुरे खाता रहता है, इससे ज्यादा शर्म की बात हो सकती है।

कई घपले तो ऐसे हैं जो महाघपलों की छाया में डूब गए हैं। जीवन बीमा निगम हाउसिंग घोटाला बाकी घोटालों की तुलना  में छोटा यानी मात्र एक हजार करोड़ रुपए की लूट का है। कलेजे पर हाथ रखिए और बताइए कि एक हजार करोड़ तो छोड़िए, हम और आप में से दस करोड़ रुपए भी किसी ने कभी एक साथ देखे हैं? यह तब है जब यह पैसा हमारा है। इससे मनमोहन सिंह सोनिया गांधी का जमूरा होना का अभिनय कर के खेल रहे हैं।

सत्यम घोटाला, बोफोर्स, हर्षद मेहता, केतन पारिख, होम ट्रेड, तेलगी और यूटीआई घोटाला के अलावा एनरॉन और प्रसार भारती घोटाले ऐसे हैं जिन पर इतने आराम से जांच चल रही है जैसे जब बारात आई तब बैंड बजना शुरू होगा। बोफोर्स, एनरॉन और यूटीआई घोटालों को तो मनमोहन सिंह के नेतृत्व में बाकायदा छिपाने की कोशिश की गई। संचार मंत्रालय में भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला हुआ तो उसे दबाने के लिए प्रचंड प्रतिभाशाली वकील कपिल सिब्बल को ला कर बैठा दिया गया जो देश के कम और कलंकित राजा के राजा के वकील ज्यादा नजर आते हैं।

लेखक आलोक तोमर देश के जाने-माने पत्रकार हैं. उनका यह लिखा डेटलाइन इंडिया न्यूज एजेंसी से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.