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अन्ना ने खाया धोखा पर होगी बाबा की जीत

आलोक कुमार: स्वामी रामदेव के आगे केंद्र सरकार के सारे दांव विफल होते नजर आ रहे हैं : रामदेव के आंदोलन में है लोहिया की खुशबू : योग गुरू रामदेव हठयोग की वैभवकारी मुद्रा में हैं। बाबा की मुद्रा से सियासी कुर्सी की चूलें हिली हुई है। सत्याग्रह का दायरा अन्ना हजारे की तुलना में व्यापक है।

आलोक कुमार: स्वामी रामदेव के आगे केंद्र सरकार के सारे दांव विफल होते नजर आ रहे हैं : रामदेव के आंदोलन में है लोहिया की खुशबू : योग गुरू रामदेव हठयोग की वैभवकारी मुद्रा में हैं। बाबा की मुद्रा से सियासी कुर्सी की चूलें हिली हुई है। सत्याग्रह का दायरा अन्ना हजारे की तुलना में व्यापक है।

देशभर के 624 जिलों में स्वामी रामदेव के योग शिविर चलाने वाले शिष्यों ने सत्याग्रह स्थल सजा रखा है। समर्थन में आए लोग के लिए बैठने ठहरने का जरूरी इंतजाम है। डंके की चोट पर सत्याग्रह पर खर्चों का हिसाब देने के बजाय स्वामी रामदेव सरकार से विदेशों में जमा काले धन का हिसाब मांग रहे हैं और दबंगता से कह रहे हैं कि जब तक सरकार ने गंभीर पहल नहीं की, वो सत्याग्रह के अष्टांग योग से उठने वाले नहीं हैं।

डा. मनमोहन सिंह की सरकार सत्याग्रह के असर की सोचकर हैरान परेशान हैं। स्वामी को मनाने की शुरुआती विफलता के बावजूद पुरजोर कोशिश जारी है कि बाबा के हठयोग को किसी तरह  राजयोग से मना लिया जाय। बाबा के आसन छूटने की देरी से सरकारी सियासत दां की जनता से हितैषी रिश्ते की डोर कमजोर पड़ रही है। इसका अगले साल उत्तर प्रदेश चुनाव के शुरू हो रहे केंद्र में अगली सरकार की कवायद के सेमीफाइनल पर काला असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

स्वामी रामदेव के हठयोग के निहितार्थ को समझने के लिए हाल की तीन बातों पर गौर करना होगा। पहला, अन्ना हजारे ने रालेगांव सिद्धि के घर से सवाल किया है कि जनहित में बनी सरकार ठीक से काम नहीं कर रही है। इसलिए बाबा रामदेव अथवा उन जैसों को आसान मसलों पर आंदोलन की राह पकडने को मजबूर होना पड़ रहा है। अन्ना के मत से साफ है कि सरकार ने ही लोकपाल लाने के लिए पहल की थी। जब भ्रष्टाचार मिटाने के इस सटीक पहल पर अमल में विलंब हुआ तो अन्ना हजारे को आंदोलन करना पड़ा। अब लोकपाल विधेयक की ड्राफ्टिंग कमेटी में बैठाकर सरकार के मंत्रियों ने वकालती दलीलों से अन्ना को परेशान कर रखा है। अन्ना ने स्वामी रामदेव को भविष्य में हो सकने वाली ऐसे किसी परेशानी के प्रति आगाह किया है।

दो महीने पहले अप्रैल में अनशन से दिल्ली की सियासत को हिलाने वाले अन्ना हजारे अब परेशान हैं। प्रणव मुर्खजी की अध्यक्षता में बनी लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी में सरकार  की तरफ से मौजूद बाकी चार सदस्यों की पृष्ठभूमि वकालत की है। दिग्गज वकील कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, पी चिदम्बरम कानून मंत्री वीरप्पा मोईली के साथ मिलकर सिविल सोसाईटी के नुमांईदों को कानून और संविधान के पाठ पढा रहे हैं। छठी बैठक पूरा होते होते इसकी उम्मीद कम पड़ती जा रही है कि सरकार की तरफ से तय किए गए 30 जून की तारीख तक लोकपाल विधेयक ड्राफ्ट करने का काम पूरा हो पाएगा। सरकार की तरफ से वकीलों की जोर अजमाईश को इसे देखकर सिविल सोसाईटी की तरफ से तमाम विवादों के बावजूद समिति में पिता-पुत्र के दो दिग्गज वकीलों की जोड़ी को बनाए रखने की हठ का मतलब समझ में आने लगा है।

इधर देश के सबसे पुराने राजनीतिज्ञों में शामिल प्रणव मुर्खजी ने राजनीतिक अनुभव के बल पर अलग दांव चल दिया है। समिति के अध्यक्ष के नाते उन्होने लोकपाल ड्राफ्ट पर राज्यों के मुख्यमंत्री से सलाह लेने की औपचारिकता को पूरा करने के बहाने विलंब का नया रास्ता तैयार कर दिया है। विवाद में फंसे लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी में सरकारी पक्ष की दलील है कि प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे से बाहर ऱखा जाए। दलील को कानून सम्मत बताने के साथ ही प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे में लाने से आशंका जताई जा रही है कि इससे लोकपाल के निरंकुश  होने का खतरा है। अब वातावरण तैयार किया जा रहा है कि लोकपाल की व्यवस्था लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर सकती है।

अन्ना हजारे को चकमा देकर अनशन से उठाने वाली सरकार अब लोकपाल बनाने की पूरी कोशिश की जड में मट्ठा डाल रही है। इस पर विरोध लाजिमी है। विरोध को कम करने के लिए रामदेव बाबा का इस्तेमाल किया गया। जिन्होने मध्यप्रदेश में कांग्रेस दिग्गज कमलनाथ के घर आहार लेने के साथ ही लोकपाल के दायरे से प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखने की पैरवी कर दी। इससे पैदा हुए आपसी दरार या भ्रम को दूर करने के लिए रविवार को अन्ना हजारे दिल्ली पहुंचकर बाबा रामदेव के आंदोलन में शिरकत करने वाले हैं।

गौर करने वाली दूसरी बात, बाबा रामदेव के एक शानदार शर्त को झटके में मान लेने से जुडी है। लोहिया के बाद पहली बार रामदेव ने हिंदी में तकनीकी विषयों की पढाई की व्यवस्था करने और अंग्रेजी के बजाय भारतीय भाषाओं को कामकाज में समुचित जगह देने की बात सरकार के सामने रखी और मुश्किल में फंसी सरकार ने इसे एक झटके में मान लिया। और कह दिया गया कि बाबा रामदेव के नब्बे प्रतिशत बात मान ली गई हैं। सवाल उठा कि वो कौन सी दस प्रतिशत बात है जिसे सरकार को मानने में दिक्कत आ रही है। इसका खुलासा होना बाकी है।

लेकिन जैसे ही अंग्रेजी का मोह त्यागकर भाषाई जरूरतों को पूरा करने की मानी गई बातों को पूरा करने के लिए टाइम फ्रेम तय करने की बात आई तो सरकार की तरफ से कहा गया कि इसे एक दिन में पूरा नहीं किया जा सकता है। अच्छा लगा कि समय को लेकर स्वामी रामदेव को अन्ना हजारे की तरह धोखा देने वाले टोटके को अजमाया नहीं गया। वैसे आसानी से सरकार के मान लेने से जाहिर है कि लोक कल्याण की कमजोर होती इच्छाशक्ति ने सरकार को इस दिशा में सोचने नहीं दिया। इस दरकार को सरकार ने हाल के बरसों में गंभीरता से महसूस ही नहीं किया था औऱ जैसे ही स्वामी रामदेव ने महसूस कराया तो आसानी से मान लेने की बात की गई।

तीसरी महत्वपूर्ण बात गोविंदाचार्य कर रहे हैं। उन्होने प्रतिपक्षी बीजेपी पर तोहमत जड़ा है। कभी बीजेपी के थिंक टैंक रहे और सोशल इंजीनियरिंग के रास्ते बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाने में अहम किरदार निभाने वाले गोविंदाचार्य इन दिनों स्वामी रामदेव के सिपहसलारों में हैं। उनका कहना है कि विपक्ष जनता की जरूरतों को आवाज  देने में फेल हो गया। विपक्ष के फेल होने से बनी रिक्तता का ही नतीजा है कि लोगों का राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग हो रहा है। अगर संसदीय व्यवस्था में सार्थक विपक्ष की भूमिका निभाई गई होती तो लोग सिविल सोसाइटी की तरफ उम्मीद भरी नजर से नहीं देखते। खेती और समाज सुधार में लगे अन्ना हजारे अथवा योग सिखाने वाले बाबा रामदेव को  राजनीतिक सुधार के लिए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन  नहीं करना पडता। उनके मुताबिक विपक्ष का कमजोर होना लोगों में व्यवस्था को बनाए रखने के लिए चोर-चोर मौसेरा भाई वाली स्थिति के भाव को भरता है। गोविंदाचार्य ने विदेशों में जमा कालाधन मामले में सोनिया गांधी को लिखे लालकृष्ण आडवाणी के माफीनामे को राजनीति क अपराध बताया है।

बाबा रामदेव की असली मांग विदेशों से काला धन लाने से जुडा है। इसे लेकर सरकार पर शक है। दुनिया के कई देश स्विस बैंक से अपने खातेदारों का विवरण मंगा चुके हैं। कार्रवाई कर चुके है लेकिन भारत में विदेशी बैंकों में गुपचुप कालाधन जमा करने वालो के खिलाफ कार्रवाई होनी बाकी है। इसे लेकर  सरकार को सुप्रीम कोर्ट तक से निर्देश मिल रहे हैं। लेकिन  कार्रवाई के नाम पर अब तक ढाक के तीन पात ही होता रहा है। बल्कि शर्मिंदगी की इंतहा तो तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट में दलीलों के सहारे सरकार ने विदेशी बैंकों के खातेदारों तक का नाम बताने से इंकार कर दिया। सरकार के ऐसे ही कई  रवैए बेतहाशा मंहगाई से मार खा रहे आम नागरिक को नागवार गुजर रहा है। लोग  अपनी हालात पर नाराजगी के गुस्से के प्रदर्शन के लिए ही बाबा रामदेव या अन्ना हजारे के पीछे हो ले रहे हैं।

बाबा रामदेव के वित्तीय सलाहाकारों के अध्ययन के मुताबिक  भारत का चार सौ लाख करोड़ रुपए का काला धन विदेशों में जमा है। विदेशों में जमा इस धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की मांग हो रही है। गौर करने वाली बात है कि पिछली बजट में देश के 59 लाख करोड रूपए के सकल घरेलू उत्पाद का अनुमान  है। ऐसे में विदेशों से चार सौ लाख  करोड़ रुपए  के काला धन का देश के विकास  के काम आने की सूरत में गरीब भारत की तस्वीर पूरी तरह से बदल जाने की उम्मीद है ।  उम्मीद भरे इसी ने अनुमान ने लोगों को बाबा के राजयोग की तरफ आकर्षित कर रखा है। फिर काला धन बनाने की मशीन पर चोट करने के लिए अन्ना हजारे की लोकपाल बिल  लाने की जरूरत  के साथ राजनीति  हो रही है। परेशान अन्ना हजारे ने  इस मामले में केंद्र सरकार से धोखा मिलने की बात करके लोगों की नाराजगी को बढा दिया है। नाराज लोग  सबक सिखाने के लिए बाबा रामदेव के साथ हो लिए हैं।

अन्ना में एक तरह से धोखा खाने का भाव भरने के लिए ही केंद्र सरकार ने बाबा रामदेव का ऐतिहासिक रेडकार्पेट वेलकम किया था। किराए के निजी विमान से आंदोलन के लिए दिल्ली पहुंचे बाबा रामदेव से मिलने के लिए देश के सबसे बड़े अफसर कैबिनेट सचिव के साथ सरकार के चार कैबिनेट मंत्री विमानतल पर मौजूद रहे। एयरपोर्ट पर ही ढाई घंटे तक स्वामी रामदेव के साथ बैठक कर गंभीरता से सुनने समझने का नाटक किया गया ताकि स्वामी में ये भाव घर करे कि नैतिक बल पर महाराष्ट्र में वक्त बेवक्त शरद पवार और बालासाहेब ठाकरे की चूलें हिला चुके अन्ना हजारे से कहीं ज्यादा उनको महत्व दिया जा रहा है। लेकिन दस साल से राजनेताओं को चराते हुए दनादन तरक्की कर रहे स्वामी रामदेव के आगे केंद्र सरकार के सारे दांव विफल होते नजर आ रहे हैं।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने ‘आज’, ‘देशप्राण’, ‘स्पेक्टिक्स इंडिया’, ‘करंट न्यूज’, होम टीवी, ‘माया’, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.

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0 Comments

  1. Namita

    June 4, 2011 at 1:14 pm

    bilkul…hatyog ….swiss bank me kiska bhoot baitha hai, ye to baba ke aandolan ke baad hi pata chalega……..we can hope something will happen ….this time

  2. Firoz Khan

    June 4, 2011 at 1:19 pm

    देखिये अन्ना जी के पास पैसा तो था नही…बाबा जी के पास काफी पैसा है…और आप जानते ही है….दुनियां मे पैसे का ही बोल बाला है…अपने भारत देश मे बेरोज़गारो की संख्या ज़्यादा है…इतनी सुख सुविधा दे दी जाये तो 10 दिन क्या 1 साल तक लोग अनशन पर बैठे रहेगे….

  3. धीरेन्द्र

    June 4, 2011 at 2:03 pm

    बहुत संतुलित और विषय से सम्बन्धित सभी पक्षों पर लिखा गया लेख…

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