थानाध्‍यक्ष ने ग्रामीणों पर चढ़ाई जीप, भड़के लोग, फूंका थाना, बिगड़ा माहौल, फायरिंग, पांच घायल

वैसे भी जिस बंदे के बदन पर खाकी होती है, उसके हाव-भाव-ताव सब अलग होते हैं. जनता उनके लिए कीड़े-मकोड़े से ज्‍यादा नहीं होती. खाकी बदन पर चढ़ते ही ये खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं और आईपीसी की धाराओं को अपनी रखैल. जब जैसा चाहा वैसा किया, फिर कानून की कमजोरी का फायदा उठाते हुए बच निकले. आज गाजीपुर जिले के बिरना थाने क्षेत्र में हुई घटना भी ऐसे ही एक पुलिस वाले की गुंडई तथा कानून से खुद को ऊपर समझने की मानसिकता का परिचायक है.

इस दारोगा का नाम है रणजीत राय. युवा है, जोश है, पर होश में कभी नहीं रहता है. यह खुद को दंबग का सलमान खान समझता है और जनता को भेड़-बकरी. पिस्‍टल दिखाने और चलाने का इसे बहुत ज्‍यादा ही शौक है. अब आते हैं कानून के इस दबंग के चलते बिगड़ी कानून-व्‍यवस्‍था की कहानी पर. जो बात थोड़ी समझदारी और नरमी से सलट सकती थी, वह इस दारोगा की दबंगई के चलते हादसा बन गई. घटना बन गई. पर इसका कुछ बिगड़ेगा इसकी उम्‍मीद ना के बराबर है. क्‍यों कि यह दबंग अपने अफसरों का काफी चहेता है. हां, जो घायल हुए हैं, जिनका बिगड़ा है वो अपने बारे में सोचे, अपना सोचे.

अब आते हैं मूल घटना पर. गाजीपुर जिले के बिरना थाना क्षेत्र का कबूतरी गांव. यहां के एक स्‍कूल के प्रबंधक तथा पेशे से शिक्षक धर्मेंद्र बिंद, उनकी लाश उनके ही स्‍कूल में फंदे से लटकी मिलती है. पुलिस को सूचना दी जाती है. शाम की घटना है, पर पुलिस रात को पहुंचती है. पहुंचते ही धर्मेंद्र की मौत को आत्‍म हत्‍या घोषित कर देती है. अब जब खाकी वालों ने आत्‍महत्‍या घोषित कर दिया तो फिर यह हत्‍या या कोई संदिग्‍ध मौत कैसे हो सकती है. आखिर इनके मुंह से निकले वाक्‍य खुद कानून जो बन जाते हैं. परिजन-ग्रामीण कहते हैं कि धर्मेंद्र की हत्‍या हुई है. वो मुकदमा दर्ज करने की बात करते हैं, पोस्‍टमार्टम कराने की बात करते हैं. पर जब खाकी ने एक बार कह दिया कि आत्‍महत्‍या तो फिर किसी और जांच का सवाल ही कहां रह जाता है.

धर्मेंद्र के परिजन और ग्रामीण अपना विरोध जताते हैं. सुबह वे थाने के सामने पहुंचकर सड़क पर बैठ जाते हैं तथा उनकी मांग होती है कि मामला दर्ज कर जांच की जाए. अगर एक तरीके से देखा जाए तो किसी की मौत पर उसके परिजनों को शक है तो पुलिस को इसकी जांच करनी चाहिए, पर इन खाकी वाले दबंगों की कही बात पत्‍थर की लकीर बन जाती है. बिरना पुलिस मुकदमा लिखने और जांच करने को तैयार नहीं हुई. ग्रामीण भी मौके पर जमे रहे. इस बीच इस जाम-प्रदर्शन की सूचना जिले के आला हाकिमों को दी जाती है. आला हाकिम अपने प्रिय दबंग दारोगा और जंगीपुर थाने के थानाध्‍यक्ष रणजीत राय तथा मरहद थाने के थानेदार को मौके पर पहुंचने को कहती है.

मरदह थानाध्‍यक्ष मौके पर पहुंच जाते हैं. अब बारी आती है दबंग थानाध्‍यक्ष रणजीत राय की. यह दबंग स्‍टाइल में अपनी सरकारी जीप धरनारत ग्रामीणों की भीड़ में घुसा देता हैं. भगदड़ मचती है. कुछ लोग घायल होते हैं. कुछ को चोट लगती है. इसके बाद यह दारोगा ग्रामीणों की मां-बहन करता है तथा पिस्‍टल हाथ में लहराने लगता है. इस अमानवीय व्‍यवहार के बाद जनता भड़क जाती है और पुलिस विरोधी नारे लगाने लगती है. इसके बाद भी रणजीत राय का मन नहीं भरता है. वो पिस्‍टल लेकर भीड़ को दौड़ा लेता है. इसके साथ कुछ पुलिसकर्मी लाठीचार्ज कर देते हैं. फिर भीड़ उग्र हो जाती है और पथराव शुरू कर देती है. तब यह दबंग अपने सिपाहियों के साथ वापस भागता है. थाने में आकर घुस जाता है.

उग्र भीड़ अब अनियंत्रित हो जाती है. कई वाहनों को तोड़ने-फोड़ने के बाद थाना परिसर में रखे गए पुराने वाहनों को आग लगा देती है. थाने की चहारदीवारी तोड़ डालती है. फिर मामला और बिगड़ जाता है और पुलिस गोलियां चलाती है, जिसमें कम से कम पांच ग्रामीणों को छर्रा लगता है तथा कई गिर-पड़कर घायल हो जाते हैं. सूचना पाकर एसपी, डीआईजी तथा आईजी भी मौके पर पहुंच गए. इन वरिष्‍ठ अधिकारियों ने पूछताछ के बाद घटना की मजिस्‍ट्रेटियल जांच की घोषणा किया है. मौके पर पहुंचे सांसद राधामोहन सिंह ने पुलिस की लापरवाही बताते हुए सीबीआई जांच की मांग की.

उल्‍लेखनीय है कि पूरे मामले को बिगाड़ने वाले यह दारोगा नंदगंज थाने में तैनाती के दौरान भी नियम कानून की धज्जियां उड़ाते हुए महिलाओं को कई घंटे थाने पर बैठाए रखा था, जिसमें इसे लाइन हाजिर भी किया गया था.रणजीत राय को हाथ में पिस्‍टल लेकर लोगों को डराने का शौक है. इसे इसमें बहुत मजा आता है. कई बार पिस्‍टल लहराकर यह अपने इस शौक का सार्वजनिक प्रदर्शन कर चुका है. बीते 25 मई को भी जंगीपुर थाना क्षेत्र में एक सड़क हादसे के बाद प्रदर्शन कर रहे लोगों पहले लाठियों से पिटवाया. जब ग्रामीण भी विरोध करने लगे तो इस दारोगा ने हाथों में पिस्‍टल लेकर प्रदर्शनकारियों पर टूट पड़ा था.

इस पागल, नंगे व खतरनाक शख्स को पुलिस ने मारकर क्या गलत किया?

: देखें सीसीटीवी फुटेज और अन्य वीडियो : सतना (मध्य प्रदेश) की घटना याद होगी. न्यूज चैनलों पर बार-बार दिखाया गया. एक मानसिक रूप से बीमार आदमी को पुलिसवालों द्वारा मिलकर सरेराह पीटा जाना. और इसी के चलते उस आदमी की मौत हो जाना. पिटाई की सीन को जिसने भी देखा, उसने पुलिसवालों को जमकर गालियां दी और देश में अंग्रेजी राज जैसे पुलिस दमन की कल्पना की.

पर इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू भी है. जिसे मानसिक रूप से बीमार बताया जा रहा है, वह आदमी एक दुकान में बड़ी-सी हंसिया लेकर घुसता है और दुकानदार के गर्दन के आसपास ले जाकर उसे कत्ल कर देने की धमकी देता है. वह दुकान के टेबल आदि पर चढ़ जाता है. वह हाफ पैंट और बनियान निकालकर पूरी तरह नंगा हो जाता है और नंगा होने के बाद फिर हंसिया लेकर दुकानदार को कत्ल करने की धमकी देता है. दुकान में मौजूद लोग चिल्लाने लगते हैं. यह सब दृश्य एक वीडियो में कैद है. दुकान में लगे सीसीटीवी कैमरे में सब कुछ कैद है. इस फुटेज को कुछ लोगों ने भड़ास4मीडिया के पास भेजा है, एक पत्र लिखकर. पत्र यूं है-

Dear Yashwant ji

Namaskaar

As discussed about the matter over phone please find below two videos. It is clear that the famous “mentally challenged” person was about to KILL a jewellery shop owner and was even moving around in the market of Satna (M.P.) with a sickle & baton in his hand & could have harmed/killed other people if the Police has not reached on time. The public & the business community is in favour of the Police Action but this fact is being hidden by the popular news channels in order to gain fake TRP & mislead the public without probing about the real matter which lead to such a Police action.

As a responsible Police Officer Mr. B.S. Jaggi controlled the situation by first catching the accused person & then to put a psycological pressure on him he used some force to calm-down this guy. But a local News Channel & other popular channels in order to defame the Police Officer only showed HALF TRUTH where only the Police is shown as beating the person but the FULL TRUTH of the nuisance created by that person is deliberately not shown….It was done just to gain TRP but the result is that the diligent & responsible Police Officer – Mr. B.S. Jaggi, Kotwali Incharge, Satna was suspended without even trying to know the real story.

I request your intervention in the matter & request JUSTICE for the Police Officer for his efforts in controlling the person by the medium of your MEDIA which will open the eyes of others & show them what RESPONSIBLE JOURNALISM means….Hope to get your support in the matter on urgent basis.

Thanx & Regards,

Varinder

जिन सज्जन ने ये पत्र भेजा है, उन्हें मैं नहीं जानता. उनका फोन आया तो उन्होंने सारी बात बताई. मीडिया पर आरोप लगाया कि एकतरफा कवरेज करके पुलिस वालों का मनोबल डाउन किया गया और पुलिस वालों को सस्पेंड करा दिया गया. मैंने उनसे वीडियो और डिटेल भेजने को कहा. नीचे तीन वीडियो के लिंक दिए जा रहे हैं. पहला वीडियो सीसीटीवी फुटेज है जिसे देखकर कोई भी कह सकता है कि इस पागल आदमी को दुकान के भीतर ही गोली मार देनी चाहिए, प्राण रक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए. दूसरे वीडियो में दुकान के बाहर पुलिस, जनता और पागल आदमी के दृश्य हैं. पर इस दूसरे वीडियो में पुलिस द्वारा पीटे जाने के सीन को कम-कट कर दिया गया है.

तीसरा वीडियो स्टार न्यूज पर प्रसारित खबर है, जिसमें पुलिस वाले उस पागल को पीटते दिख रहे हैं. तीनों वीडियो के देखने के बाद मुझे यही लगता है कि उस पागल आदमी ने जो कुछ किया, वह बहुत खतरनाक था, कई लोगों की जान ले सकता था वह. पर पुलिस वाले भी पागल हो जाएंगे, यह कतई उम्मीद न थी. पुलिस वालों को उस व्यक्ति को लोकल नागरिकों की मदद से पकड़कर बांधकर थाने ले जाने चाहिए था और किसी इलनेस सेंटर वगैरह में भर्ती करा देना चाहिए या किसी पागलों के डाक्टरों से उसे दवा-इंजेक्शन वगैरह दिलाकर काबू में कर लेना चाहिए था. इसकी बजाय पुलिस ने सारे नियम कानूनों को ताकपर रखकर अपने आखिरी ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, दे दनादन मारना शुरू कर दिया. यह बिलकुल गलत, निंदनीय और अलोकतांत्रिक है.

इन पुलिसवालों को निलंबित किया जाना छोटा सा दंड है. कायदे से इन्हें नौकरी से बर्खास्त कर देना चाहिए क्योंकि उन्होंने पागल आदमी को कंट्रोल करने के नाम पर खुद को और पूरे पुलिस विभाग को पागल साबित कर दिया है. एक मानसिक रूप से विक्षिप्त और खतरनाक दिख रहे आदमी को पांच-दस पुलिसवाले मिलकर कंट्रोल नहीं कर सकते तो ये किसी शातिर शूटर से मुठभेड़ में कैसे जीत पायेंगे. आखिर क्यों पुलिस वाले छोटी-मोटी घटनाओं में भी आपा खोकर लाठी-डंडा लेकर टूट पड़ते हैं, इन्हें क्यों नहीं समझ में आता कि बल प्रयोग हर हालत में अंतिम विकल्प होना चाहिए और वह भी सीमित मात्रा में.

किसी को मारने, जेल भेजने या फांसी पर लटकाने का फैसला देने का काम करने के लिए अदालतों की व्यस्था इसीलिए है. अगर अदालतों का काम भी पुलिस वालों ने ले लिया है और तालिबानियों की तरह सड़क पर फैसला करने लगे हैं तो फिर इस देश का भगवान मालिक. प्रोग्रेसिव और माडर्न पुलिसिंग के लिए हमारे देश की सरकारें भी कुछ नहीं करतीं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है. कैसे अपराधियों को हैंडल किया जाए, कैसे उन्हें पकड़ा जाए, कैसे उनसे निपटा जाए… इसको लेकर शिक्षण-प्रशिक्षण और जागरूरकता का काम लगातार करते रहना चाहिए. पर सरकारें पुलिस विभाग को पालतू और दिमागविहीन बनाकर रखने में ही खुश रहती हैं क्योंकि ऐसा रखकर सरकारें अपने गलत-सही कानून विरोधी काम इन्हीं पुलिसवालों से बिना ना नुकूर के करा लेती हैं.

सतना की घटना पूरे देश के पुलिसवालों के लिए नसीहत है. सबक है. पुलिस वालों को एक बार फिर अपने मैनुवल, नियम-कानून पढ़ने चाहिए और स्मार्ट पुलिसिंग के लिए खुद के स्तर पर पहल करना चाहिए. वर्दी पहन लेने का मतलब किसी पर भी डंडा चला देना नहीं होता है. वर्दी पहनने का मतलब चीजों को इंटेलीजेंट तरीके से टैकल कर समाज में सुख शांति कायम रखना होता है. सतना में पुलिस वालों ने सड़क पर जिस तरह से पीट पीटकर एक पागल आदमी को मार डाला, उसे देखकर कई संवेदनशील लोगों को डिप्रेशन हो गया होगा. यह सच है. क्योंकि हम पढ़े लिखे लोग यह कतई उम्मीद नहीं करते कि अपने भारत देश में कहीं भी तालिबानियों का राज हो. पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए दिन खबरें आती हैं कि किस तरह वहां पुलिसवालों ने निर्दोष युवकों को घेरकर गोली मार दी, सड़क पर ही तालिबानियों ने (अ)न्याय कर दिखाया.. आदि आदि. तब वह सब देखकर लगता है कि चलो अच्छा है, हम लोगों का देश, हम लोगों की व्यवस्था उनसे ज्यादा मेच्योर और डेमोक्रेटिक है. पर सतना जैसी स्थितियां देखकर लगता है कि नहीं, हम लोग गलत हैं. हमारे यहां भी सिस्टम में पागलों की भयंकर भरमार है.

हां, इस मामले में मीडिया ने यह गलती जरूर की है कि उसने सिर्फ पुलिसवालों द्वारा पीटे जाने का ही दृश्य दिखाया. मीडिया को पागल आदमी के कारनामों को भी दिखाना चाहिए था. सीसीटीवी फुटेज को भी प्रसारित करना चाहिए था. आम लोगों के रिएक्शन को भी दिखाना चाहिए था, भले ही वे आम लोग पुलिस कार्रवाई का समर्थन कर रहे हों. और, मीडिया को वरिष्ठ विश्लेषकों की राय को भी प्रसारित करना चाहिए था. तब जाकर इस प्रकरण के जरिए मीडिया पूरे देश के दर्शकों और पुलिसवालों को ट्रेंड, जागरूक और सचेत कर पाता. पर टीआरपी के भूखे न्यूज चैनलों को चेतना और जागरूकता से क्या लेना देना. वे तो एक ही सीन को बार बार दिखाते रहेंगे और दर्शकों में जुगुप्सा, उत्तेजना पैदा करते रहेंगे. मीडिया के इस एकतरफा और सनसनीखेज रवैये की भी हम लोग भर्त्सना करते हैं.

तीनों वीडियो देखने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक करें-

सीसीटीवी फुटेज : दुकान में

दुकान के बाहर का हालचाल

स्टार न्यूज पर चली खबर

मैंने अपनी बात रख दी. संभव है, मैं गलत होऊं. यह एक बड़ा मुद्दा है जिस पर बात होनी चाहिए. अगर आप अपने विचार रखेंगे तो अच्छा रहेगा. नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं या फिर bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं.

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

यूपी में फिर एक मां का अपमान, डा. निशीथ राय के घर पुलिसवालों का तांडव

पत्रकारों पर सरकारी और प्रशासनिक दमन का कहर यूपी में लगातार ऊफान पकड़ता जा रहा है। शलभमणि त्रिपाठी पर हुए पुलिसिया हमले पर छीछालेदर के बाद भी पुलिसवालों का रवैया मीडियावालों के प्रति लगातार हमलावर बना हुआ है। ताजा घटना इलाहाबाद में हुई जहां डेली न्‍यूज एक्‍सप्रेस के प्रबंध सम्‍पादक डॉ निशीथ राय के घर छह थानों की पुलिस ने दबिश डाली।

गुरूवार की शाम हुई इस घटना के दौरान वहां केवल डॉ राय की बूढ़ी मां ही थीं, जबकि पुलिसवालों के साथ एक भी महिला पुलिसकर्मी नहीं थी। हालांकि बाद में इलाहाबाद के आईजी और डीआईजी ने पुलिसिया कार्रवाई पर खेद व्‍यक्‍त करते हुए क्षमा मांग ली। लेकिन इस घटना ने यूपी में सरकारी आतंक की एक नयी इबारत तो दर्ज हो ही गयी है। निशीथ राय इसके पहले भी सरकारी प्रताड़ना झेल चुके हैं जब उनका राजभवन कालोनी के आवास को खाली कराने गये पुलिस व प्रशासनिक अफसरों ने नियम-कानूनों को धता बताते हुए सारा सामान निकाल कर सड़क पर फेंक दिया था।

इलाहाबाद में अल्‍लापुर में बाघम्‍बरी गद्दी मठ के निकट डॉ निशीथ राय का मकान है। लखनऊ विश्‍वविद्यालय में कार्यरत प्रो निशीथ राय डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के प्रबंध संपादक भी हैं। इलाहाबाद के मकान में 84 साल की उनकी बीमार माता राजकुमारी कुछ नौकरों के साथ ही रहती हैं। प्रो निशीथ राय के छोटे भाई उत्‍पल राय मऊ में रहते हैं। वे मधुबनी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

गुरूवार को देर शाम करीब साढ़े आठ बजे इलाहाबाद के छह थानों के करीब पांच दर्जन पुलिसवालों ने अचानक इस घर को घेर लिया। अंदाज था जैसे किसी आतंकवादी की घेराबंदी की जा रही हो। धड़धड़ाते हुए पुलिसवाले घर के भीतर घुसे और पूरी गुंडई के साथ पहले तो सारे फोन कब्‍जे में ले लिये और सारे दरवाजे बंद कर लिए। इस पुलिसिया गिरोह के साथ एएसपी और सीओ स्‍तर के भी अधिकारी मौजूद थे। घर के एक-एक कोने की तलाशी ली गयी, सारा सामान उलट-पुलट दिया गया। इस अभियान में डॉ राय के घर के कई कीमती चीजें भी टूट गयीं।

लेकिन पुलिस को यहां से कुछ भी नहीं मिला। करीब दो घंटे की इस जंगली कार्रवाई के बाद पुलिसवाले वापस लौटे। हालांकि श्रीमती राजकुमारी के अनुसार यह पुलिसवाले उनसे बार बार किन्‍हीं शातिर शूटरों के छिपे होने की जानकारी मांगते रहे, लेकिन हैरान-परेशान और बीमार-बुजुर्ग महिला उन्‍हें ऐसी किसी जानकारी से इनकार करती रहीं। हैरत की बात रही कि इस कवायद में पुलिसदल में एक भी महिला पुलिसकर्मी शामिल नहीं थी।

पुलिसवालों के लौटने के बाद ही श्रीमती राजकुमारी अपने बेटों से बात कर पायीं। सूचना मिलते ही उत्‍पल राय ने सम्‍बन्धि आईजी और डीआईजी से घटना की कैफियत पूछी। बताते हैं कि इस पर इन अधिकारियों ने उत्‍पल राय से क्षमा मांगी। हालांकि उन अधिकारियों ने यह कहा कि उन्‍हें उस मकान में कुछ शातिर शूटरों के छिपे होने की खबर मिली थी। इन सवालों को इन अधिकारियों ने कोई भी सफाई नहीं दी कि बिना महिला पुलिस के वे पुलिसवाले किसकी इजाजत से घर में घुसे। वे बस यही कहते रहे कि इसे अदरवाइज मत लीजिए।

कहने की जरूरत नहीं कि सन 05 में डॉ निशीथ राय के पिता और उद्भट विद्वान प्रो रामकमल राय की मृत्‍यु होने के बाद से ही श्रीमती राय अकेले ही इस मकान में रहती हैं। गौरतलब है कि प्रो राय के छोटे भाई उत्‍पल राय पहले बसपा में राज्‍यमंत्री के पद पर थे, लेकिन बसपा की अंदरूनी चालों से रूष्‍ट होकर उन्‍होंने बसपा से इस्‍तीफा दे दिया था। इसके बाद से ही उनके और उनके परिवारीजनों के खिलाफ बसपा सरकार के इशारे पर साजिशों का कहर टूटना शुरू हो गया था। अभी कुछ साल पहले ही प्रो निशीथ राय को राजभवन कालोनी में आबंटित 31 नम्‍बर के मकान को आनन-फानन और बिना किसी सूचना के ही खाली करा लिया गया था। बहरहाल, प्रो राय के घर हुई इस पुलिसिया कार्रवाई के बाद से पत्रकारों में जबर्दस्‍त रोष फैल गया है।

खीरी रेपकांड : पूर्व एसपी डीके राय लापरवाही में मुअत्‍तल

: लखीमपुर गैंगरेप कांड की जांच सीबीआई से कराने को मायावती तैयार : राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दल निघासन पहुंचा : प्रदेश सरकार ने सोनम हत्‍याकांड की जांच सीबीआई को सौंपने का इरादा जाहिर कर दिया है, लेकिन साथ ही कहा है कि इस बारे में अगर पीडित परिजनों की कोई अर्जी आयी तो सीबीआई जांच करायी जा सकती है। लेकिन इस हादसे की आंच से सहमी यूपी सरकार ने आज एक प्रेस कांफ्रेंस में मुख्‍यमंत्री मायावती ने लखीमपुर से हटाये गये पुलिस कप्‍तान डीके राय को निलंबित भी कर दिया है।

सरकार का मानना है कि डीके राय लापरवाही के दोषी पाये गये हैं। उधर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के निघासन थाने में हुई नाबालिक लड़की सोनम की हत्या के मामले में आज राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(एनएचआरसी)का  जांच दल आज लखीमपुर खीरी पहुंच गया। इस दो सदस्‍य वाली टीम ने सोनम का पहला पोस्टमार्टम करने वाले तीनों डाक्टरों से पूछताछ की. इनमें डॉ एके अग्रवाल, डॉ एसपी सिंह और डॉ एसके शर्मा शामिल थे.इन तीनों ही डॉक्‍टरों को दूसरी बार किये गये पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में गला दबाकर हत्या किये जाने की बात तय हो जाने के बाद निलंबित कर दिया गया था. कहने की जरूरत नहीं कि इस पूरे मामले में इन तीनों का किरदार अहम माना जा रहा है।

करीब घंटा भर इस टीम ने पूछताछ की। पता चला है कि इस टीम में शामिल एक चिकित्‍सक डॉ एके अग्रवाल ने कहा कि पुलिस ने उनसे नहीं कहा था की पीएम रिपोर्ट में क्या लिखना है। उन्‍होंने इस बात से भी इनकार किया कि उन्‍हें ऐसे कोई निर्देश मिले थे कि पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट में हत्या लिखनी है या फिर आत्महत्या का मामला बनाना है। फिलहाल इस मामले में दो पुलिसकर्मियों का नाम आ रहा है जो इस थाने में तेनात थे। इनमें से एक शिव कुमार और विनय कुमार हैं। वहीं सीबीसीआईडी के भरोसेमंद सूत्र मानते हैं कि मामले में दुराचार कि संभावनाओं को नाकारा नहीं जा सकता। सीबीसीआईडी इन तीनों डाक्टरों और सीएमओ जेपी भार्गव से भी पूछताछ कर चुकी है।

यूपी में एक और बलात्कार, पुलिस का रिपोर्ट लिखने से इनकार

यूपी में महिलाओं के साथ उत्पीड़न थमने का नाम नहीं ले रहा है. लखीमपुर खीरी में दिलदहला देने वाली घटना का खुलासा हुआ था कि जिसमें पुलिसवालों ने ही थाना परिसर में एक किशोरी के साथ गैंगरेप कर उसे मारकर पेड़ से लटका दिया, अब एक और रेप कांड का पता चला है. इस रेप कांड में पुलिस पीड़ितों की रिपोर्ट नहीं दर्ज कर रही है. घटना 30 मई की है. जिसके साथ घटना हुई है, वह एक गरीब घर की बेटी है, इसलिए पुलिस वालों ने तहरीर रख ली.

पुलिस वालों ने जांच कराने की बात कहकर भगा दिया पर अब तक कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई है. किन्हीं सज्जन ने उस तहरीर को स्कैन कराकर भड़ास4मीडिया के पास भेजा है ताकि रामपुर में हुए इस रेपकांड पर यूपी की पुलिस और यूपी के प्रशासन की चुप्पी टूट सके व पीड़ित को न्याय मिल सके. जो घटनाक्रम हुआ है, वह पीड़ित लड़की के पिता ने लिखकर पुलिस को दे दिया है. उस अप्लीकेशन की कापी को नीचे प्रकाशित किया जा रहा है. अप्लीकेशन में लिखे पीड़िता के नाम को काले रंग से पेंट कर दिया गया है ताकि लड़की के पहचान को छुपाया जा सके.

मिडडे में छपी पत्रकार अकेला की दास्तान

मुंबई से प्रकाशित मिडडे अखबार ने पत्रकार ताराकांत द्विवेदी उर्फ अकेला की दास्तान प्रकाशित की है. अकेला ने कहा है कि अगर उनके साथ पुलिस ऐसा बर्ताव कर सकती है तो आम आदमियों की क्या दशा-दुर्दशा ये पुलिस बनाती होगी, सोचा जा सकता है. स्टोरी में अकेला ने पूरा किस्सा बताया है, पढ़िए…

Nothing can break me now : Akela

Released on bail after being kept in police custody for five days under the draconian Official Secrets Act, MiD DAY reporter Tarakant Dwivedi AKA Akela writes that the entire plot reeked of conspiracy, but that the experience has only made him stronger and more determined

अकेला
अकेला
As a crime reporter for nearly 15 years, I have witnessed the lines between criminals and those entrusted with stopping them getting increasingly blurred. I have come across and exposed absolute crooks masquerading as policemen and was aware that my reports were rubbing people in high places the wrong way. I knew it was only a matter of time before someone from the establishment, armed with a misguided notion of revenge, sought to come after me and implicate me in a fabricated case. But, the scale and planning of last week’s act of personal vendetta took even me by surprise.

On Tuesday, May 17, hours after three policemen whisked me away from office claiming they wanted to record my statement in a trespassing case, I was taken to St George Hospital for a medical exam. However, no doctor came to examine me and I was declared fit for police custody after the cops got a few medical papers stamped. I overheard a man, who looked like the complainant in my case, speaking to a police constable who was accompanying me. “Sir, I’ve been after this case for the last two days. I haven’t eaten or met my family.

You will take care of me, right?” the man asked the constable. I was stunned. It began to sink in that taking my statement was just a ruse and my arrest was pre-planned down to the last detail.

Fear creeps in

I was then lodged in a 300-sq ft police lock-up at CST railway station. There, in that dingy, stinking cell, which was devoid of even a fan or a ventilator, fear struck me for the first time. I wasn’t afraid of letting the law taking its course but what did scare me were the innumerable stories of torture and other excesses in police custody that I’d heard from the victims first hand. People had told me repeatedly that all voices that spoke against the police force were systematically crushed by the men in uniform.

And my fears did not prove unfounded, for, soon, ACP Anil Mahabole of the Azad Maidan division walked menacingly into the lock-up. “I wanted to see you behind bars,” he spat out. “Tum bohut bade aadmi ho. Mera phone bhi nahi lete ho,” he said, leading me to think that I had hurt his big ego. “Main aapka darshan karne aaya hoon,” he sniggered.

I knew I was a victim of Mahabole’s personal vendetta and he confirmed my suspicion when he said, just before he left, that ACP Bapu Thombre, Inspector Pandharinath Yeram and Pradip Sonthalia (the complainant in my case) were his chelas. “I hope you get my point. Baaki bahar milenge,” he said, glee dripping from his voice.

Till I was produced in court on Wednesday, I had no idea they were slapping sections of the draconian Official Secrets Act (OSA) on me. I have done stories on the Act and knew exactly how stringent it was.

Hospitalisation

Sitting alone in the lock-up that night, I was worrying where the case was going when the stench and stuffiness began to get to me. I started feeling a bout of nausea and uneasiness, accompanied by chest pain. I requested the lock-up officer for a medical check-up. After preliminary examination, the doctor advised that I stay in the hospital. While I was being taken to the ward, the detection officer, PSI Gajur, tried to coax the doctor into not admitting me because I was a journalist. “He is a dangerous criminal,” he told the doctor.

The next morning, ACP Bapu Thombre came to visit me in the hospital. “Since you are admitted, I will have to seek further police custody,” he said in a menacing tone. On Saturday, five days after I was taken into custody and the day my bail application was scheduled to be heard, I saw the cops arm-twist the law. The case papers that were needed to be produced in the hospital were deliberately delayed so that I would miss my date. I saw my colleagues and fellow journalists argue and fight with the police and the hospital authorities to speed up the procedure.

Finally, at 3.15 pm, I was produced in court, which granted me bail. I have now resolved to seek judicial inquiry in this case. Yesterday, as I was readying to leave the hospital, I felt stronger and more determined to speak the truth. Nothing can bend or break me, I kept reassuring myself. As I strode out, a couplet came to mind: Jab paida hui police, toh khush hua iblees, Ki ab hum bhi sahibe aulaad ho gaye (The evil men rejoiced when the police force was formed; for they now had their own children to nurture).

On my way back to work, I kept thinking that if the police can do this to a journalist, who can speak out for himself in the media, what must the ordinary citizen have to go through?

जीआरपी की पोलखोलने वाले अकेला को मिली जमानत

मुंबई से खबर है कि पत्रकार ताराकांत द्विवेदी अकेला को जमानत मिल गई है. रेलवे अदालत ने उन्हें दस हजार रुपए के निजी मुचलके पर जमानत दे दी. उन्हें सरकारी गोपनीयता कानून भंग के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. इस मामले में अदालत ने उन्हें 21 मई तक पुलिस हिरासत में भेज दिया था. जीआरपी की इस मनमानी के खिलाफ मुंबई में पत्रकारों ने रैली निकाली थी और गृहमंत्री आरआर पाटील से मिलकर रोष व्यक्त किया था.

गृहमंत्री ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि वे पत्रकार अकेला के साथ किसी भी तरह की नाइंसाफी नहीं होने देंगे. शनिवार को सुनवाई के लिए जब उन्हें पेश किया गया, तो पुलिस ने अदालत को बताया कि उसकी जांच पूरी हो चुकी है. इस पर कोर्ट ने अकेला को न्यायिक हिरासत में भेजने और उनके वकील को जमानत अर्जी दाखिल करने के निर्देश दिये. इसके बाद अदालत ने जमानत की अर्जी स्वीकार कर ली. पत्रकार अकेला ने एक खबर के जरिये खुलासा किया था किस तरह जीआरपी की लापरवाही के कारण देश की सुरक्षा के लिए लाये गए हथियार पानी लीक होने से जंग खा रहे हैं. उन्होंने उन हथियारों का फोटो भी प्रकाशित किया था. इस मामले में पहले उन पर घुसपैठ और बाद में सरकारी गोपनीयता कानून के तहत मामला दर्ज किया गया.

भट्टा में महिलाओं के कपड़े उतारकर परेड कराया गया

राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्लू) की टीम ने भट्टा-पारसौल गांव से लौटकर जो बयान दिया है, उससे पता चलता है कि किस तरह यूपी सरकार भट्टा में हुए प्रशासनिक उत्पीड़न को दबाने को तत्पर है. राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा यासमीन अबरार ने कहा कि ग्रेटर नोएडा के भट्टा-परसौल गांव में पुलिस वालों ने महिलाओं के कपड़े उतारे और उनका परेड कराया. महिलाओं के साथ छेड़छाड़ भी की गई.

महिला आयोग की अध्यक्षा ने इस वीभत्स कांड की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है. एनसीडब्लू की रिपोर्ट में कहा गया है कि 7 मई को विरोध प्रदर्शन के दौरान कई महिलाओं के कपड़े उतार दिए गए और उनसे पुलिस वालों ने छेड़छाड़ की. 10-12 पुलिस वालों ने महिलाओं के कपड़े फाड़े, उनसे परेड कराई और गांव वालों को धमकाया. एनसीडब्लू की यह रिपोर्ट आयोग की टीम द्वारा 12 मई को किए गए दौरे पर आधारित है.

कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में राष्ट्रीय महिला आयोग का कामकाज देख रहीं यासमीन ने कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी के उस दावे का समर्थन किया जिसमें राहुल ने कहा था कि भट्टा-परसौल गांवों में कई लोगों की हत्या कर उनके शव जला दिए गए हैं और महिलाओं के साथ रेप किया गया है. यासमीन अबरार ने कहा कि एक महिला ने आरोप लगाया कि उसके बच्चे को जिंदा जला दिया गया है. उनका कहना है कि हड्डियां राख में अब भी पड़ी हैं. गांव की महिलाओं का कहना है कि उनके कपड़े उतार दिए गए और उनसे छेड़छाड़ की गई. महिलाओं का कहना है कि उन्हें पुलिस से डर लगता है.  हमारे पास सुबूत और तस्वीरें हैं. हम यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप रहे हैं.

पत्रकारों ने बचाई पुलिस अधिकारी की जान

रायपुर में पुलिस दिखी लाचार…. पुलिस को पड़ गए जान के लाले.. अपने ही पुलिस अधिकारियों को छोड़ भाग खड़े हुए पुलिसकर्मी.. भीड़ के सामने पुलिस बेबस… मीडियाकर्मियों ने बचाई पुलिस अधिकारी की जान.. राजधानी के समीप मंदिरहसौद में एक हत्या के मामले में जमकर बवाल हुआ.. गांव वालों ने आरोपी अखिलेश मिश्रा औऱ उसके परिवार वालों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर पहले उसके घर औऱ बाद में पुलिस वालों पर पथराव किया.. जिससे आरंग के थानेदार लालचंद मोहले सहित तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए..

मंदिरहसौद में आक्रोशित भीड़ के सामने पुलिस लाचार दिखी.. लिहाजा पुलिस वाले अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागते नजर आए.. वहां मौजूद मीडियाकर्मियों ने पुलिस वालों पर बरसते पत्थर से उन्हें बचाया और उन्हें अस्पताल तक पहुँचाने में मदद की. यहां मीडिया ने अपनी जवाबदारी समझी.. लेकिन पुलिस ने 4 मई को हुई घटना के बाद से अपनी जवाबदारी से मुंह मोड़ा.. जिसकी वजह से इतना बवाल खड़ा हुआ.. दरअसल मंदिर हसौद थाना अंतर्गत बजरंग चौक इलाके से 4 मई की रात एक युवक को गंभीर रूप से घायल अवस्था में सड़क पर पाया गया.. बाद में स्थानीय लोगों की सहायता से युवक को अस्पताल में भर्ती कराया गया..

युवक की पहचान मंदिर हसौद के राकेश उर्फ खाती यादव के रूप में की गई.. पूछताछ में राकेश ने अखिलेश मिश्रा द्वारा उस पर कातिलाना हमले की बात कही.. लेकिन पुलिस ने इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की.. घायल युवक राकेश की मौत के बाद गांव वाले एकाएक भड़क उठे.. मंदिरहसौद में आए इस जलजले के आगे पुलिस बेबस हो गई.. पुलिस की ही नासमझी के कारण गांव में भारी तनाव उत्पन्न हो हुआ.. युवक की मौत से खाकी से खौफ खाने वाले लोगों ने खाकी वर्दी वालों की जमकर धुनाई कर दी.. पत्थरों की वर्षा के बीच पुलिस असहाय बनी रही.

असहाय पुलिस वालों के वहां कवरेज कर रहे पत्रकार वरदान साबित हुए.. पत्रकारों ने अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए पुलिस वालों को भीड़ के चंगुल से निकाला.. और अस्पताल तक पहुँचाने में मदद की.. इस घटना में कई पत्रकारों को गंभीर चोटें भी आई हैं. कठिन परिस्थितियों में मीडियाकर्मी अपनी सजग भूमिका का निर्वहन करते है.. अपनी जान जोखिम में डालकर कई बार मीडियाकर्मी दूसरों की जान बचाते नजर आते हैं.. इन सबके बीच मीडिया पर कई बार सवाल खड़े किए जाते रहे हैं.. इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों पर कुछ चंद सेकंड के विजुअल के लिए अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ लेने के कई बार आरोप लग चुके हैं.. बावजूद इसके मीडिया ने अपने सामाजिक दायित्वों का कई बार निर्वहन किया है.. जिसका ताजा उदाहरण रायपुर के मंदिरहसौद की यह घटना है..

रायपुर से पत्रकार आरके गांधी की रिपोर्ट

मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल करने का आरोप! लखनवी पत्रकार बना उत्तराखंड पुलिस का शिकार

: उत्तराखंड सरकार की मीडिया को पालतू बनाने या परेशान करने की घटिया मानसिकता का विरोध करें : लखनऊ में लाइवन्यूज नाम से न्यूज एजेंसी चला रहे पत्रकार आसिफ अंसारी को उत्तारखंड की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. मिली जानकारी के मुताबिक आसिफ अंसारी पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को ब्लैकमेल करने का आरोप है.

देहरादून में आसिफ के खिलाफ 19 फरवरी को जिला सूचना अधिकारी मैलखुरी ने सरकार को ब्लैकमेल करने का मुकदमा लिखाया था. जानकारी होने के बावजूद आसिफ न तो कोर्ट से स्टे ले आए और न ही अग्रिम जमानत कराई. आसिफ ने इस प्रकरण को सामान्य घटनाक्रम माना. पर कल रात उत्तराखंड की पुलिस ने चुपके से लखनऊ पहुंच गई और अचानक धावा बोलकर आसिफ को उनके घर से पकड़ लिया. उन्हें पकड़कर देहरादून ले जाया गया. बताया जा रहा है कि आसिफ अंसारी को आज कोर्ट में पेश किया गया जहां कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई की तारीख दी है.

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड सरकार मीडिया को लेकर बहुत पजेसिव और कंजर्वेटिव है. उत्तराखंड के अखबारों और पत्रिकाओं को या तो विज्ञापन के बल पर खरीद लिया गया है या फिर जो नहीं बिके उन्हें उत्पीड़ित कर अलग-थलग भागने-भटकने को मजबूर कर दिया है. आसिफ पहले उसी न्यूज एजेंसी एनएनआई में काम करते थे जिसके मालिक उमेश कुमार के खिलाफ उत्तराखंड सरकार ने कई मुकदमें लिखा दिए हैं. उमेश की भी गिरफ्तारी की कोशिशें लंबे समय से जारी है लेकिन उमेश उत्तराखंड की पुलिस और सरकार को चकमा देने में कामयाब हैं. दरअसल उमेश पर सबसे बड़ा लेकिन अघोषित आरोप यही है कि उन्होंने क्यों मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के घपले-घोटालों की पोल खोली, स्टिंग करवाया और इससे संबंधित खबरें न्यूज चैनलों को मुहैया कराई. इसी बात से खफा उत्तराखंड सरकार ने उमेश के व्यवसाय को तबाह करने से लेकर उनके परिजनों और उनकी निजी जिंदगी को तबाह करने का सिलसिला तेज कर दिया है.

इसी कड़ी में उत्तराखंड पुलिस ने दूसरे राज्य उत्तर प्रदेश में घुसकर वहां के पत्रकार को पकड़कर ले आई है. सवाल यह भी उठता है कि पहले पत्रकार रह चुके और अब मुख्यमंत्री की गद्दी पर विराजमान रमेश पोखरियाल निशंक को ही सब लोग हर बार क्यों ‘ब्लैकमेल’ करते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि निशंक के घर की दाल कुछ ज्यादा ही काली है जिसे देख पत्रकार अगर पोलखोल अभियान शुरू करते हैं तो सरकार या तो उनसे समझौता कर लेती है या फिर उन्हें सरकारी मशीनरी के जरिए प्रताड़ित करती है. यहां यह भी बताना जरूरी है कि सीएम निशंक ने उत्तराखंड में दलाल पत्रकारों की एक लंबी फौज तैयार कर दी है जो खुद को बताते तो पत्रकार हैं पर वे सरकारी टुकड़ों पर पलकर मीडिया के विभिन्न माध्यमों के में निशंक का जयकारा करते रहते हैं.

दलाल पत्रकारों की फौज में भारी संख्या में युवा पत्रकारों से लेकर बुजुर्ग पत्रकार तक हैं. ये लोग अपने अपने छोटे मोटे अखबारों, ब्लागों, वेबसाइटों आदि के जरिए निशंकनामा लिखते बांचते बताते बेचते रहते हैं. बड़े अखबारों-मैग्जीनों-चैनलों में तो सीधे उपर से ही डील होने की चर्चाएं हैं, सो, इनके पत्रकार उपरी अघोषित निर्देश के तहत वही लिखते हैं जो सरकार और निशंक को सूट करता है. देश में दो दर्जन से ज्यादा राज्य हैं लेकिन किसी राज्य का मुख्यमंत्री कभी किसी पत्रकार की ब्लैकमेलिंग का शिकार नहीं हुआ. सिवाय एक अपवाद को छोड़ कर जिसमें आजतक के चंडीगढ़ संवाददाता रहे भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी ने हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल किया और इस क्रम में भुप्पी की सीडी तैयार हो गई जिसके कारण उन्हें आजतक जैसे बड़े न्यूज चैनल से हाथ धोना पड़ा. तब भी हिमाचल प्रदेश की धूमल सरकार ने न तो भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी के खिलाफ कोई रिपोर्ट दर्ज कराई और न ही उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस भेजा. धूमल ने आजतक प्रबंधन से शिकायत की और आजतक की कार्रवाई पर भरोसा किया.

आप सवाल कर सकते हैं कि आसिफ अंसारी तो अपनी बनाई कंपनी में ही काम करते थे, इसलिए उनकी शिकायत किससे की जा सकती थी? इसका जवाब यह होगा कि निशंक को गिरफ्तारी जैसा आखिरी कदम उठाने से पहले आसिफ अंसारी को लीगल नोटिस भिजवाना चाहिए था, कोर्ट में मुकदमा करना चाहिए था और अदालत के फैसले का इंतजार करना चाहिए था. और भी कई तरीके हो सकते थे. निशंक का सूचना अधिकारी सरकार को ब्लैकमेल किए जाने का प्रेस रिलीज जारी कर सकता था, बयान जारी कर सकता था, प्रेस कांफ्रेंस कर सकता था, ब्लैकमेल किए जाने का स्टिंग कर उसे सार्वजनिक कर सकता था. कई लोकतांत्रिक रास्ते हो सकते थे. लेकिन मीडिया को डराने-धमकाने-आतंकित करने या फिर नोटों के बल पर अपने चरणों में लोटने के लिए मजबूर करने में विश्वास रखने वाले भूतपूर्व पत्रकार और वर्तमान मुख्यमंत्री निशंक को कोई और रास्ता नहीं सूझता. उन्होंने गिरफ्तारी का फरमान जारी कर दिया. बिना मुख्यमंत्री के आदेश के दूसरे प्रदेश में पुलिस गिरफ्तार करने जा नहीं सकती.

नहीं पता कि आसिफ अंसारी पर लगे आरोप कितने सच या झूठ हैं, लेकिन उत्तराखंड सरकार ने मीडिया के लोगों को आतंकित करने का जो तौर-तरीका अपनाया है, वह प्रशंसनीय नहीं है. कई तरह के घपलों-घोटालों-विवादों से घिरे निशंक खुद अपने बुने जाल में फंसते जा रहे हैं. पत्रकारों को परेशान करना उन्हें भारी पड़ेगा. यह धमकी नहीं हकीकत है. मीडिया के वे लोग जो निशंक के सत्ता में होने के कारण उनका गुणगान उनके मुंह पर करते हैं, वही लोग पीठ पीछे निशंक सरकार की बुराइयों का बखान करते हैं और इस बीजेपी सरकार के फिर जीत कर न आने की भविष्यवाणी करते हैं.

उत्तराखंड में भाजपा नेताओं के बीच विवाद की वजह से ”बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा” वाली जो परिघटना हुई, उसी के कारण निशंक सत्ता में आए. पर सत्ता में आते ही यह शख्स जिस जिस तरह की कारस्तानियां करता जा रहा है, उससे वह खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है. और, ऐसा करके वह अपने पार्टी के ही विरोधियों को मजबूत कर रहा है जो चाहते हैं कि किसी भी प्रकार निशंक विवादों-विरोधों में घिरे फंसे रहें. निशंक ने किसी एक आसिफ या उमेश को ही परेशान नहीं कर रखा है, उत्तराखंड के करीब दर्जन भर पत्रकार होंगे जो निशंक का कोप झेल रहे हैं.

मीडिया समुदाय के लोगों से अपील है कि वे छोटे-मोटे स्वार्थों से उपर उठकर आसिफ अंसारी की गिरफ्तारी का विरोध करें वरना कल को किसी भी प्रदेश की पुलिस किसी भी पत्रकार के घर में घुसकर उस पर सरकार को ब्लैकमेल करने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर सकती है. हम आप सभी जानते हैं कि देश-प्रदेशों के बड़े नेता बड़े मीडिया हाउसों के मालिकों से तो ब्लैकमेल हो जाते हैं, इसी कारण उन्हें भरपेट विज्ञापन, सस्ती जमीन आदि देते रहते हैं. लेकिन कोई आम पत्रकार सरकार, शासन-सत्ता के विरोध में खबर लिखे तो उस पर ब्लैकमेलर का आरोप लगाकर उसका उत्पीड़न शुरू कर दिया जाता है.

अगर कोई पत्रकार किसी दूसरे के यहां सेलरी लेकर सरकार के विरोध में कलम चला रहा होता है तो सरकारें या तो उसका तबादला करा देती हैं या फिर उसे नौकरी से निकालने के जिद पर अड़ जाती हैं. सरकार से पंगा नहीं, पैसा लेने की नीति पर चलने वाले अपने मीडिया मालिक फौरन उस पत्रकार का ट्रांसफर कर देते हैं या नौकरी से निकाल देते हैं. ऐसा होता रहता है. पटना में हुआ है. लखनऊ में हुआ है. कई बार तो सरकार लोगों की नाराजगी के कारण संपादक लोगों को चलता कर दिया जाता है. ऐसा दिल्ली में हुआ है, लखनऊ में हुआ. होता रहता है. इसी कारण बड़े मीडिया हाउसों में काम करने वाले पत्रकारों के दिमाग का एक तरह का अनुकूलन हो जाता है जिसमें उन्हें पता होता है कि क्या कहना है, क्या लिखना है, कैसे जीना है, कैसे बचना है.

अगर पत्रकार खुद का अखबार, एजेंसी या पोर्टल चला रहा है और सत्ता की पोलखोल में लगा है तो उसे सबक सिखाने के लिए उसे ब्लैकमेलर बताकर पुलिस-प्रशासन के जरिए उठवा लिया जाता है. आने वाले दिनों में जब ज्यादा से ज्यादा बहादुर पत्रकार खुद का ब्लाग, अखबार, एजेंसी, पोर्टल, वेब टीवी, एसएमएस एलर्ट सर्विस आदि चला रहे होंगे तो जो भी सत्ता या नेता या अफसर के आगे नहीं झुकेगा, उसे ये नेता, नौकरशाह ब्लैकमेलर बताकर उठवा लेंगे और सींखचों के पीछे डलवा देंगे. पर ये जान लें. रेलें, जेलें, अदालतें बहादुर पत्रकारों के लिए हमेशा से ट्रेनिंग सेंटर हुआ करती हैं. इससे निकलकर आदमी और मजबूत इरादों वाला बनता है. आसिफ अंसारी आज जिस मुश्किल में हैं, उस हालात में अगर वे टूटे नहीं तो वहां से लौटकर वे ज्यादा जिगर और ऊर्जा वाले पत्रकार बनेंगे. हम सब उनके साथ हैं और उत्तराखंड सरकार की घटिया मानसिकता की निंदा करते हैं.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

तानाशाह बृजलाल की नींद नहीं खुली तो पुलिसकर्मियों का सब्र टूट जाएगा

उत्तर प्रदेश पुलिस वेलफेयर एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुबोध यादव ने मुरादाबाद में डीआईजी द्वारा महिला रगरुटों से अश्लील डांस के मामले में डीआईजी को तत्काल निलंबित करने की मांग करते हुए कहा कि पूरे प्रदेश की पुलिस को कानून का पाठ पढ़ाने वाले तानाशाह बृजलाल की नींद कब खुलेगी और अगर जल्द नहीं खुली तो अराजपत्रित पुलिस कर्मियों का सब्र टूट जायेगा.

एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुबोध यादव ने आज इटावा में बताया कि कई आईपीएस अधिकारी हम लोगों के संगठन के पदाधिकारियों का उत्पीड़न कर रहे हैं.  इन में मुख्य रूप से स्पेशल डीजी कानून व्यवस्था बृजलाल और डीजी रेलवे अरविन्द कुमार जैन हैं.  श्री यादव ने चेतावनी देते हुए कहा कि इन्होंने जल्द अपनी मानसिकता को नहीं बदला तो अराजपत्रित पुलिसकर्मियों का सब्र टूट जायेगा.  उन्होंने कहा प्रदेश की कानून व्यवस्था में अहम भूमिका निभाने वाले 4 लाख पुलिसकर्मीं अब उत्पीड़न नहीं बर्दास्त करेंगे.

सुबोध यादव ने कहा कि मुरादाबाद और बिजनौर की घटनाओं को स्पेशल डीजी कानून व्यवस्था बृजलाल जल्द संज्ञान लें. क्योकि दोनों घटनाओं ने उत्तर प्रदेश पुलिस को शर्मसार किया है. उन्होंने कहा अश्लील डांस देखने का शौक रखने वाले अफसर डांस पार्टियों में क्यों नहीं जाकर काम करते पुलिस को शर्मसार करने का उनको कोई हक़ नहीं है.  अश्लील डांस देखने वाले ये पुलिस अफसर भूल जाते हैं कि इनके घरों में भी बेटियां और बहिनें हैं.

इटावा से नीरज महेरे की रिपोर्ट.

कमल के परिवार ने देखा हरामखोर यूपी पुलिस का क्रूर चेहरा

कितनी निरंकुश हो गई है उत्‍तर प्रदेश की पुलिस. आम आदमी के साथ तो बिना वजह मारपीट-गाली ग्‍लौज की घटनाएं तो अक्‍सर सुनाई देती हैं, लेकिन अब तो भक्‍त और महिलाएं भी इन हरामखोर पुलिसवालों का निशाना बनने लगी हैं. ऐसी ही एक घटना है मथुरा जिले के वृंदावन की, जहां बांके बिहारी की दर्शन करने जा रही एक महिला और उसके परिवार वालों की पिटाई कर दी.

दिल्‍ली के नवीन शाहदरा निवासी कमल जैन अपनी पत्‍नी और बच्‍चों के साथ बांके बिहारी मंदिर में दर्शन करने आए थे. बैरियर पर तैनात पुलिसकर्मियों से  कमल ने यह कहते हुए इजाजत मांगी कि उनकी पत्‍नी पैरो से ज्‍यादा पैदल चल पाने में असमर्थ है, लिहाजा उसे रिक्‍शे से जाने की अनुमति दी जाए. इस पर पुलिसवालों ने उनके पुत्र को धक्‍का मार दिया. जब कमल ने बीच बचाव किया तो शुरू हो गया पुलिसिया तांडव. पुलिस वाले इतने उत्‍तेजित हो गए कि जमकर धुनाई शुरू कर दी. कमल और उनके पुत्र के हाथ-पैर में काफी चोटें आईं.

इतना ही नहीं पुलिसकर्मियों ने उनकी पत्‍नी और बेटियों के साथ भी बदतमीजी की. उनको भद्दी-भद्दी गालियां भी दी गई. जब कमल अपने साथ हुई घटना के बारे में वृंदावन कोतवाली में मौजूद डीएसपी कायम सिंह को बताई तो इस पर कोई कार्रवाई करने की बजाय घटना को चटखारे लेकर सुनते नजर आए. उन्‍होंने कमल जैने को अपनी कहानी मीडिया तक को बताने का मशविरा दे डाला. जिससे कमल जैन और उनका परिवार काफी आहत हुआ.

इतना ही नहीं वो मीडिया वालों को देखकर भड़क गए. उन्‍होंने यहां तक कह डाला कि वृंदावन बांके बिहारी के दर्शन को आने वाले श्रद्धालु उनके लिए मुसीबत बने हुए हैं. जब मीडिया ने उनसे जानना चाहा कि क्‍या घटना हुई है तो उन्‍होंने पहले तो घटना की जानकारी होने से ही इनकार कर दिया. फिर जब बाद में जानने की बात सामने आई तो अपने सिपाहियों का ही बचाव करते नजर आए. बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप मीडिया पर ही जड़ दिया.

इधर, कमल जैन और उनका परिवार आए तो थे बांके बिहारी के दर्शन को, पर बांके बिहारी की कृपा तो नहीं हुई मगर यूपी पुलिस का असली चेहरा का दर्शन जरूर हो गया. कमल का कहना था कि उन्‍हें तथा उनके परिवार के सदस्‍यों को यूपी पुलिस का यह चेहरा कभी नहीं भूलेगा.

मथुरा से मोहन शर्मा की रिपोर्ट.

उस एसपी को अपने किए पर पश्चाताप है!

मैंने जब भड़ास पर अपनी आने वाली किताब ”तीस आईपीएस अफसरों की जिंदगी पर किताब लिखेंगे अमिताभ” के बारे में जानकारी दी तो मुझे इस सम्बन्ध में कई सारी टिप्पणियां मिलीं. दोस्तों ने इसे एक सराहनीय कार्य बताया और इस कृत्य के लिए मेरी प्रशंसा की एवं शुभकामनाएं दीं. स्वाभाविक है अपने सभी मित्रों के प्रति मेरे मन में भी उतनी ही शुभिक्षा जाग्रत हुई जितनी उन्होंने अपने शब्दों से व्यक्त की.

इन्ही टिप्पणियों में एक टिप्पणी अखिलेश कृष्ण मोहन की थी. मैं उन्हें स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ क्योंकि यह नाम मुझे एकदम से दिमाग में आ नहीं पा रहा है. पर उनकी बातों से इतना अवश्य प्रतीत होता है कि वे बस्ती के होंगे. इन्होने एक घटना का जिक्र किया है और इसके लिए तत्कालीन एसपी को दोषी ठहराया है. इन्होने कहा- “क्या आप को याद है कि बस्ती जिले का एसपी जब आप थे तो किस तरह खुलेआम गुंडई के बल पर एक दबंग नेता की मां को जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाने के लिये सारे नियम कानून ताक पर रख दिये थे.  अमित जी याद रखिये बस्ती में अमिताभ ठाकुर के एसपी रहते जो प्रशासनिक नकारापन दिखा था वह हमने कभी भी नहीं देखा.”

मैं यहाँ उनकी बात उस एसपी का बचाव करने या उसको पाक-साफ़ दिखने के लिए नहीं कर रहा हूँ. वैसे चूँकि अपने यहाँ आँखों के सामने भी गलती कर के उससे इनकार कर देने की परंपरा रही है, अतः वह एसपी भी इस काफी पहले बीत चुकी घटना को बड़े आराम से गलत करार कर सकता है, झूठा बता सकता है और अखिलेश जी को किसी प्रकार से अपना विरोधी कह कर इनको गलत या प्रायोजित दोषारोपित करने का आरोप लगा सकता है. थोडा ज्यादा सक्रीय होना चाहे तो वह व्यक्ति तुरंत मानहानि का मुकदमा भी दर्ज करा सकता है जैसा आज-कल का एक अच्छा रिवाज है. यह कह देना बहुत मुश्किल भी नहीं है. आरोप-प्रत्यारोप के खेल में मूल बात समाप्त हो जाती है और सामने केवल मनोरंजन बच जाता है. दुर्भाग्य ऐसा कि हमारे यहाँ कई बार आरोपों को ले कर जो जांच हुआ करते हैं वे इतने लंबे समय तक चलते हैं कि उनका नतीजा निकलने से पहले ही आरोपित व्यक्ति ही दुनिया से निकल पड़ता है. फिर तो वही कहावत शेष रह जाती है-“ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी.” जब जिस व्यक्ति पर आरोप लगा, वही रुखसत हो गया तो मुक़दमा किस पर चलाओ, अदालतों में बहस किस पर होगी और जेल किसे भेजोगे. इसीलिए आदमी निश्चिन्त रहता है और सच और झूठ के उहापोह का फायदा उठाते हुए अपना समय निकाल लेता है. एक और बहुत महत्वपूर्ण फैक्टर यहाँ काम करता है- मुद्दों की बहुतायत का. चूँकि काफी बड़ा देश है, काफी तरह की समस्याएं हैं. काफी सारे लोग हैं, इनमे कई सारे शूरमा और खलीफा भी हैं जो ऐसे बड़े धमाके करते ही रहते हैं जिन पर आज तो सारी दुनिया की निगाह चली जाती है और कल होते ही किसी और मामले के सामने आ जाने पर वह बात अतीत की गुमनाम गर्त का हिस्सा बन जाता है.

अरे, अपने देश में तो मैंने और आपने आँखों के सामने टीवी के परदे पर दिन-दहाड़े देश की संसद में सवाल के लिए पैसे मांगने के कार्यक्रम देखे, रक्षा मंत्री के आवास पर एक कथित रक्षा सौदे के लिए पैसे के आदान-प्रदान की बात सुनी, कई सारे बड़े राजनेताओं को आकर्षक और पुष्टिवर्धक नव-यौवानाओं के साथ विभिन्न लोलुप अवस्थाओं में देखा और अत्यंत गण-मान्य और परम आदरणीय संत-महंतों को उनके पेशे से इतर कुत्सित कर्मों में पकडे जाते देखा है. बड़ा हल्ला मचा, बहुत शोर-गुल हुआ पर संभवतः इनमे से किसी भी मामले में प्रकरण अपनी परिणति तक नहीं पहुँच सका. उससे भी मजेदार बात यह कि मैंने इनमे से किसी भी प्रकरण में ऐसा नहीं देखा कि किसी व्यक्ति ने इतना भर भी ईमान दिखाया हो कि हाँ, वह मैं था अथवा हाँ, उसमे कुछ बात सच्ची है. मुझे तो जहां तक याद है कि एक बड़े नेता को एक महिला के साथ आपत्तिजनक स्थिति में जब कैमरे में कैद कर लिया गया था तो उनका उत्तर था- “हाँ, यह सही है कि ऊपर वाला हिस्सा मेरा था, पर नीचे वाला हिस्सा मेरा नहीं था. लगता है बाद में जोड़ दिया गया था.” अर्थात कि चेहरा तो उनका है, यह सही है, पर बाकी जो भाव-भंगिमाएं दिखाई जा रही हैं उससे उनका कोई मतलब नहीं है.

वह व्यक्ति चाह कर भी इस परंपरा का निर्वहन नहीं कर पाता क्योंकि पता नहीं क्यों वह दूसरे लोगों से ज्यादा, सारी दुनिया से ज्यादा अपने आप से डरता है. मैं आपको तो बड़े आराम से बेवकूफ बना सकता हूँ, बनाता भी रहता हूँ, वैसे ही जैसे आप मुझे बना रहे हैं और हम सब एक-दूसरे को बेवकूफ बनाते हुए दिख रहे हैं और खुद पर प्रसन्न भी हो रहे हैं. पर मेरा प्रश्न है कि आदमी अपने आप को कैसे धोखा दे सकता है. ठीक है, अखिलेश कृष्ण जी ने जो बात कही, यदि वह एसपी उसे एक शब्द में कह दे- “गलत”, तो क्या उस एसपी का मन भी इस बात को मान लेना. तो क्या ऐसा कह देने से उसका अच्छा- बुरा समाप्त हो जाएगा, यह ठीक है कि उस घटना को घटे कई साल हो गए हैं, यह भी ठीक है कि अब उस घटना को शायद बहुत सारे लोग याद नहीं करते हों. पर अंत में बात तो इतनी ही है कि सत्य हमेशा एक ही होता है, सत्य हमेशा एक ही रहेगा, चाहे हम उसे किसी भी रूप में प्रत्यारोपित करने का प्रयास करें और बहुत संभव है, कर भी लें.

मैंने पढ़ा है, हिटलर का एक मंत्री था गोएबल्स, जो इस बात का बड़ा पुरोधा था कि कैसे सच को झूठ और झूठ को सच बनाया जाए. उसके नाम दुनिया का एक बहुत बड़ा आविष्कार दर्ज है- “यदि एक झूठ को हम सौ बार सच बोलें तो यह सच ही मान लिया जाता है.” यद्यपि मैं समझता हूँ कि वह इसका प्रयोग करने वाला पहला व्यक्ति नहीं होगा पर इस वाक्य पर पेटेंट तो आज उसी का है. यह अलग बात है कि आज हमारे देश में ना जाने कितने हो लोग इस पेटेंट को अपना ब्रह्मसूत्र माने घूमते रहते हैं.

लेकिन गोएबल्स के सिद्धांत में भी यही है कि झूठ सत्य मान लिया जाता है, झूठ सच हो नहीं जाता है. वह सम्बंधित व्यक्ति यदि यह कह देगा कि एसपी के रूप में जिला पंचायत चुनावों के दौरान उसकी बहुत शानदार भूमिका थी और इस बात को हर समय कहता रहेगा और कई लोगों से कहलवाने लगेगा और कई सारे प्रमाण दे देगा तो जाहिर है लोग इसे सच मानेंगे ही. लेकिन बात सच मानी ही जायेगी, मात्र मान लेने से सच नहीं हो जायेगी. सच तो वही रहेगा जो हुआ था. सच तो वही रहेगा जैसा नहीं होता तो बेहतर था. और सच तो यही रहेगा कि इस बात का एहसास, इस बात का कष्ट, इस बात की कसक, इस बात की तकलीफ, इस बात का दैत्य हमेशा उस आदमी के मन में बसा रहेगा, भले वह इसे कहे या नहीं कहे.

वह व्यक्ति अपनी इस भूल के कई कारण बता सकता है, एक कथित दोस्ती की खातिर कर्तव्यपथ पर चूक जाने की बात कह सकता है, एक बड़े से व्यवस्था में कई लोगों के बीच चाह  कर भी  कुछ नहीं कर पाने की बात कर सकता है, पर क़यामत के दिन का इन्साफ का निर्मोही तराजू यही कहेगा कि ऐसे बहानों से धरती के इन्साफ बदल सकते हैं, इन बहानों से ईश्वर का न्याय नहीं बदलता. मैं अखिलेश कृष्ण मोहन जी को धन्यावाद देता हूँ, उनका सम्मान करता हूँ कि उन्होंने मुझे इस व्यक्ति ने सच से सामना कराया. यदि आपकी आँखों से “वो मंजर कभी भी नहीं भूल सकता जो एक एसपी कर रहा था” तो विश्वास मानिए, उस व्यक्ति के ह्रदय में भी वह दृश्य उसी तरह सतत अपनी उपस्थिति बनाए रखता है कि – “ये ना होता तो अच्छा था.”

लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं, इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.

पुलिस चौकी में महफूज नहीं हैं सिपाही

सवाई माधोपुर में एसएचओ फूल मोहम्मद को जनता द्वारा फूंके जाने की घटना के एक सप्ताह ही बीते थे कि एक 20 वर्षीय युवक ने कोटा शहर की एक पुलिस चौकी में घुसकर तोड़फोड़ की और कांस्टेबल बलदेव सिंह पर जानलेवा हमला किया। कांस्टेबल चौकी के दरवाजे बंद कर अपनी जान बचाई।

आमजन में विश्‍वास और अपराधियों में भय, राजस्थान पुलिस का यह श्‍लोगन किसी भी तरह से फिट नजर नहीं आ रहा है। आए दिन जिस तरह से घटनाएं हो रही हैं उससे तो पुलिस कर्मी किसी भी तरह से महफूज नहीं समझे जा रहे हैं। अपराधी आमजन में विश्‍वास बनाए रखने वाली पुलिस को ही अपना निशाना बना रहे हैं।

घटना एक- कोटा शहर के थाना विज्ञान नगर अंतर्गत बाइक पर बैठे संदिग्ध लोगों को थाना विज्ञान में तैनात पुलिस कर्मी अफजल ने टोका तो आरोपियों ने पुलिस कर्मी पर फायर कर दिया। हालांकि गोली अफजल के पेट को छूते हुए निकल गई, अगर अपराधियों का निशाना थोड़ा सा ऊपर या नीचे होता तो उसकी जान भी जा सकती थी।

घटना दो- कोटा शहर के थाना उद्योग नगर अंतर्गत अभी हाल ही में कुछ दिन पूर्व इंदिरा नगर चौकी में तैनात सिपाही नंदराम मेघवाल की चौकी में घुसकर आरोपी ऑटो चालक रामेश्वर गुर्जर ने हत्या कर दी थी।

कोटा से शैलेंद्र दीक्षित की रिपोर्ट.

होली के दिन गाजियाबाद पुलिस ने दिखाया अपना बर्बर चेहरा

: गाड़ी सहित उठा ले गए ढाई साल की बच्‍ची को : विरोध करने पर बरसाई लाठियां : 20 फरवरी को होली के दिन गाजियाबाद में प्रताप विहार पुलिस चौकी, पुलिस की कायरता और बर्बरता की गवाह बनी। पुलिस ने न केवल एक अबोध बच्ची के अपहरण की कोशिश की बल्कि विरोध करने पर उसकी मां समेत अन्य महिलाओं पर लाठियां बरसाईं। पुलिस ने इतनी हिमाकत तब की जब वो पीड़ित पक्ष को अच्छी तरह जानती-पहचानती थी।

घटना प्रताप विहार निवासी तेजेश चौहान, जो कि पंजाब केसरी में रिपोर्टर हैं, के साथ घटी। इससे पहले तेजेश वॉयस ऑफ इंडिया चैनल में गाजियाबाद के संवाददाता थे। तेजेश चौहान और उनके भाई राजीव चौहान से रविवार को होली मिलने के लिए उनके रिश्तेदार दीपक अपने परिवार के साथ आए। लेकिन उनका घर बंद पाकर वे अपनी कार से वापस लौटने लगे, इतने में तेजेश चौहान के पड़ोसियों ने उन्हें होली खेलने के लिए रोक लिया। दीपक और उनकी पत्नी अपनी ढाई साल की बच्ची आस्था को गाड़ी में अपने भाई के साथ छोड़ कर पड़ोसियों को गुलाल लगाने उतर पड़े। अभी उन्होंने गुलाल लगाया भी नहीं था कि बगल में ही स्थित पुलिस चौकी से चौकी इंचार्ज नरेंद्र शर्मा ने आकर गाड़ी का दरवाजा खोला और चलता बना। दीपक और उनकी पत्नी ने पीछे मुड़ कर देखा तो गाड़ी  गायब थी। इस पर बच्ची की मां का बुरा हाल हो गया।

सामने खड़े एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि एक पुलिस वाला जबरदस्ती गाड़ी ले गया है। आनन-फानन सबको फोन मिलाया गया। होली के कारण अधिकांश लोगों ने अपने मोबाइल घर पर छोड़ रखे थे। इतने में पत्रकार तेजेश चौहान के छोटे भाई राजीव मौके पर पहुंच गए और उन्होंने चौकी इंचार्ज को फोन करके अपना हवाला दिया। इस पर चौकी इंचार्ज ने बताया कि गाड़ी और बच्ची विजय नगर थाने में सुरक्षित है। गाड़ी और बच्ची को वो क्यों ले गया, इसका उसने कोई जवाब नहीं दिया। इतना सुनते ही परिजनों ने प्रताप विहार पुलिस चौकी पर हंगामा कर दिया। हंगामे की खबर फैलते ही चौकी इंचार्ज ने थाने पर ये कहकर चौकी पर फोर्स बुला ली कि स्थानीय लोगों ने शराब पीकर चौकी पर हमला कर दिया है।

इसके बाद एसओ विजय नगर अनिल कप्परवान के नेतृत्व में आए तकरीबन 50 पुलिस वालों की फोर्स ने ऐसी लाठियां बरसाईं कि कई लोगों को लहुलुहान कर दिया। लाठीचार्ज में एक व्यक्ति का हाथ भी टूट गया, जिससे बाद में पुलिस ने झूठी गवाही भी दिलवा दी। बर्बरता का स्तर ये था कि पुरुषों को बचाने आई महिलाओं को भी उन्होंने नहीं बख्‍शा और उनपर भी लाठियां बरसाईं। इस कायराना हरकत को अंजाम देते वक्त एसओ विजयनगर की नेमप्लेट भी मौके पर गिर गई। ये हंगामा देखकर तकरीबन पूरा प्रताप विहार पुलिस चौकी पर आ गया। इतनी भीड़ देखकर पुलिस के होश फाख्‍ता हो गए और पुलिस हवाई फायरिंग करने की प्लानिंग करने लगी। इतने में कॉलोनी के कुछ लोगों ने आकर मामला शांत कराया।

भीड़ ने जब हंगामा खड़ा किया तो एसओ विजय नगर अपने मोबाइल से भीड़ की वीडियो बनाने लगे। इस पर कुछ महिलाओं ने उनका मोबाइल ये कहकर छीनने की कोशिश की कि उस समय उन्होंने वीडियो क्यों नहीं बनाई जब पुलिस महिलाओं पर डंडे बरसा रही थी। प्रताप विहार वासियों ने पूरी पुलिस फोर्स के सामने एसओ विजय नगर को बुरा भला कहा, दबाव बढ़ता देख एसओ विजय नगर ने मौके से खिसकने में ही भलाई समझी और कुछ लोगों को जबरदस्ती गाड़ी में ठूंसकर थाने पर आकर बात करने को कहा।

विजयनगर थाने पर लोगों का भारी हुजूम पहुंच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सीओ सिटी आरके सिंह थाने पहुंच गए। उनके सामने ही लोगों ने एसओ विजयनगर और चौकी इंचार्ज प्रताप विहार को आड़े हाथों लिया। दोनों के दोनों इस बात का स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए कि बच्ची को क्यों उठाया गया। इस शर्मनाक कृत्य के बावजूद दोनों के चेहरे पर न तो कोई शर्म थी और न अपने किए का पछतावा। अगर प्रताप विहार के लोगों का दवाब नहीं होता तो पुलिस क्या करती कहा नहीं जा सकता।

सीओ सिटी ने बच्ची आस्था की मां, जो खुद ज्यूडिशियरी की तैयारी कर रही हैं, के बयान लिए। उनके बयान सुनकर सीओ भी सन्न रह गए। लेकिन एसओ विजय नगर अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था। उसका बार-बार यही कहना था कि जब पता चल गया कि बच्ची सुरक्षित है तो हंगामा क्यों किया गया। लेकिन वो इस बात का जवाब नहीं दे पाया कि पूरे देश में एक आदमी ऐसा बता सकते हैं, जो ये मानने को तैयार हो जाए कि उनकी बहू-बेटी पुलिस की कस्टडी में सुरक्षित है। इस देश की पुलिस ने आज तक आम लोगों का विश्वास तोडा है, जीता नहीं।

बहरहाल हुआ वही जिसकी उम्मीद थी, न्याय नहीं मिला। प्रताप विहार वाहिसयों के दबाव को देखते हुए पकडे़ गए लोगों को तो छोड़ दिया गया, लेकिन गाड़ी को सीज कर दिया। गाड़ी में रखा पर्स, जिसमें पांच हजार रुपये थे, भी गाड़ी से गायब था। आज पुलिस ने गाड़ी को छोड़ते हुए दिखाया है कि गाड़ी बेढंगी तरह से चौराहे पर खड़ी थी। गाड़ी में कागज नहीं थे। गाड़ी को बच्ची के ताऊ (जिनको गाड़ी चलानी नहीं आती) खुद चलाकर थाने ले गए। किसी भी पुलिस वाले के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। अगर यही काम किसी और ने किया होता तो क्या पुलिस उस पर अपहरण का मामला नहीं दर्ज करती। तो फिर चौकी इंचार्ज पर अपहरण का मुकदमा क्यों नहीं दर्ज किया गया। होली के अवसर पर गाजियाबाद एसएसपी के आदेश थे कि किसी भी गाड़ी को सीज न किया जाए, फिर उनके आदेशों की अवहेलना क्यों की गई।

एक रिहायशी मकान में चल रही प्रताप विहार पुलिस चौकी एक सफेद हाथी मात्र है। लोगों को इस चौकी से अपनी सुरक्षा की कोई अपेक्षा नहीं है। रेजिडेंट्‌स वेलफेयर एसोसिएशन अपने दम पर अपनी दमड़ी खर्च करके प्राइवेट गाड्‌र्स से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करती है। आए दिन होने वाली छोटी-मोटी चोरियों और चेन स्नेचिंग की भी रपट कोई लिखाने नहीं जाता, क्योंकि पुलिस का रवैया सबको पता है। यूपी पुलिस की नस्ल ही कुछ ऐसी है कि आतंकवादियों और गुंडा तत्वों के सामने घुटने टेकती है और सारी हेकड़ी आम लोगों पर जमाती है।

महिलाओं पर लाठियां तब बरसाई गई हैं, जब कुछ दिन पहले गाजियाबाद के दौरे पर आईं मुखयमंत्री मायावती ये कहकर गईं थीं कि महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करना पुलिस की प्राथमिकता हो। वो तो मामला मीडिया से जुड़े लोगों का था, तो पुलिस इतना दब भी गई वरना क्या होता कह नहीं सकते। लेकिन कौन सुनता है तूती की नक्कारखाने में। इस तरह की सैकड़ों घटनाएं हर रोज घटती हैं, लेकिन पुलिस की कार्यशैली को सुधारने की कोई कोशिश नहीं की जाती। समझौता कराने आए सीओ सिटी ने ये तो माना कि पुलिस ने गलत काम किया है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर उन्होंने कुछ नहीं किया। समझौते के अंत में उनका डायलॉग था- ”ये घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इसका हमें भी गहरा दुख है।”

पुलिस ने मुर्गी लूटी, व्‍यापारी ने डीआईजी से न्‍याय मांगा

कानपुर। जहाँ एक ओर नगर में बड़ी-बड़ी लूट और चोरी का खुलासा पुलिस कर नहीं पाती वहां के डीआईजी के पास एक व्यापारी पुलिस वालों द्वारा अपनी मुर्गी लूट लिए जाने की शिकायत करने पहुंच गया। खाकी वर्दी धारियों ने एक हाइवे पर एक व्यापारी की मुर्गी लूट ली। जिसकी शिकायत करने व्यापारी डीआईडी राजेश कुमार राय के कार्यालय पहुंच गया।

कार्यालय पर डीआईजी के उपस्थित न रहने पर एक दरोगा ने उक्त व्यापारी से शिकायत पत्र लेकर उसे दोषी सिपाहियों के ऊपर कार्रवाई करने तथा उसे मुर्गी के पैसे दिलाने का आश्वास दे वापस भेज दिया। जानकारी के मुताबिक फत्तेपुर गांव निवासी शकील अहमद मुर्गी पालन का काम करता है। वह परेड बजार के व्यापारियों को मुर्गियां बेचता है। गांव से करीब 40 मुर्गियां लेकर परेड जा रहा था। तभी हराजपुर थाना क्षेत्र हाइवे पर उसे तीन पुलिस वालों ने इशारे से रोक लिया। पास आने पर सिपाहियों ने उससे मुफ्त में मुर्गी देने को कहा।

जब उसने मुर्गी देने से मना किया तो सिपाही उसे गालियां देने लगे और धमकाते हुए एक मुर्गी जबरन छीन ली। शकील वहां से परेड पहुंचा और व्यापारियों को पूरी बात बताई तो व्यापारी उसे लेकर डीआईजी राजेश कुमार राय से मामले की शिकायत करने पहुंच गए। अब देखना यह है कि क्या वाकई में शकील को डीआईजी के दरबार से न्याय मिलेगा और मिलेगा भी तो कितने दिनों में।

ये चोर हैं, आइए इन्हें हम-आप मिलकर पीटें

: जनता ने खुद चोर पकड़ा और उन्हें बांधकर सरेआम पीटकर अधमरा किया : : पुलिस वाले आए तो तमाशबीन बन पिटाई देखते रहे : चंदौली जिले की घटना की गवाह कुछ तस्वीरें : ये दृश्य पाकिस्तान या अफगानिस्तान के नहीं हैं. ये यूपी के हैं. जी हां, उसी यूपी में जहां आजकल पुलिस परपीड़क बनी हुई है, उगाही में लगी हुई है और जनता है कि चोर-उचक्कों को पकड़ कर प्राकृतिक न्याय देने में जुटी है.

ये तस्वीरें चंदौली जिले के अलीनगर थाना क्षेत्र के टडिया गांव की हैं. जब पुलिस से फरियाद कर लोग उब जाये और उसका कोई परिणाम न निकले तो लोगो को कानून अपने हाथ में लेने को मजबूर हो जाते हैं. फिर भी, कानून के इस राज में कानून को हाथ में लेने कि इजाजत दी जा सकती है, नहीं ना. पर ऐसा चंदौली में हुआ है. अलीनगर थाना क्षेत्र के टडिया गांव में चोरों के आतंक से त्रस्त लोगों ने पुलिस के सामने कई बार फरियाद लगाई और जब उसका कोई परिणाम नहीं निकला तो कल दो कथित चोरों को रंगे हाथ पकड़ने के बाद पहले तो इन चोरों को एक पेड़ से बांधा लेकिन उसके बाद जब इन लोगों को चोरों की दी गई सजा कम दिखी तो पकड़े गए चोरों को  ११००० बोल्ट वाले बिजली के खम्भे से बांध कर इतना पीटा की दोनों चोर अधमरा हो गए.

चोर पकडे़ जाने और पीटे जाने की सूचना पर पुलिस गांव पहुंची तो वो भी पहले तमाशाई बनी रही और घंटों इस पिटाई को देखती रही. गांव के लोगों का कहना है कि गांव में चोरियों की बाढ़ सी आई है. लेकिन पुलिस आज तक एक भी चोर नहीं पकड़ पाई. लोगों का कहना है कि उन्होंने खुद चोरों को रंगे हाँथ पकड़ा है तो उसे इस तरह पीट कर वे कोई गलती नहीं कर रहे हैं. बहरहाल पुलिस इस मामले में अब चोरों की पिटाई करने वालों के खिलाफ कार्यवाही की बात कर रही है. पर मुख्य सवाल यही है कि जिनके कंधों पर ला एंड आर्डर की जिम्मेदारी है, वे सिर्फ इसी काम को छोड़कर बाकी सभी काम कर रहे हैं. इसी कारण यूपी में घनघोर अराजकता का माहौल बन चुका है. याद करिए, मुलायम सिंह यादव का कार्यकाल. उस समय भी आलम कुछ ऐसा ही था. अब लगता है कि अराजकता के मामले में मुलायम के राज को मायावती के राज ने मात दे दी है.

बिजेंद्र यादव थाने में बैठाये गए

ब्रिजेंद्र यादवधन्य है हमारी उत्तर प्रदेश की पुलिस व्यवस्था जो अपराधियों पर कार्रवाई करने की अपेक्षा निर्दोषों की ही धरपकड़ में ज्यादा विश्वास रखती है. ऐसे ही एक व्यक्ति को यूपी पुलिस इन दिनों प्रताड़ित कर रही है जो पुलिस के निचले तबके के लोगों के कल्याण के लिये संघर्षरत है. तभी तो आज इलाहाबाद पुलिस द्वारा बिजेंद्र यादव को कैन्ट थाने में पकड़ लाया गया, जब वह अपने मामले की सुनवाई के लिये इलाहाबाद हाईकोर्ट गए थे.

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि श्री यादव ने पुलिस के निचले कर्मचारियों के लिए ”कल्याण” नामक संस्था बनायी है जिसका उद्देश्य पुलिस कान्स्टेबलों और उनके परिवार की सहायता करना है. इसी संस्था को बनाये जाने के कारण उन्हें बार-बार प्रताड़ित किया जा रहा है. उन्हें सेवा से बर्खास्त तक किया गया और अभी हाल ही में उन्हें निलंबित किया गया था जबकि उच्च न्यायालय के आदेश पर ही उनकी बहाली की गयी थी. अब उन्हें परेशान करने के लिए उनकी यह गिरफ़्तारी की गयी है. पूछने पर उन्होंने बताया कि पुलिस वाले यह नहीं बता रहे हैं कि उन्हें क्यों पकड़ा गया है पर बार-बार ”कल्याण” संस्था का नाम ले रहे हैं. उन्होंने यह भी बताया कि इस मामले की सुनवाई आज रात को स्पेशल कोर्ट में होगी और वहीं से उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है.

लखनऊ से नूतन ठाकुर की रिपोर्ट

ये माया मैम की जूती है, इसे चमकाओ

: शर्म करो यूपी के पुलिस वालों : अगर महिला सामान्य या गरीब घर की है, तो यूपी के पुलिस वाले, सिपाही से लेकर आईपीएस तक, उसे जेल या थाने में डालने से हिचकेंगे नहीं, बिना किसी जुर्म.

पर अगर वो महिला मायावती हों, तो यही सिपाही से लेकर आईपीएस, उसकी जूती चमकाने में भी गुरेज नहीं करेंगे. देखिए नीचे दिए गए वीडियो को. मायावती औरैया जिले के अछाल्दा इलाके के गांव नौनिकपुर में हेलीकाप्टर से पहुंचती हैं. मायावती हेलीकाप्टर से निकलकर नीचे उतरती हैं. अफसरों से बातचीत शुरू करती हैं, खड़े-खड़े. अफसर कागज-पत्तर दिखाते हैं. तभी मायावती का पीएसओ (परसनल सेक्युरिटी आफिसर) सक्रिय होता है. इसका नाम पदम सिंह है. बताया जाता है कि यह बंदा सिपाही पद से प्रोन्नत होकर एडिशनल एसपी की पोस्ट तक पहुंचा है. वह रुमाल निकालकर मायावती की एक जूती को झुककर चमकाने लगता है. फिर खड़ा होता है और मायावती के दूसरे पैरों की तरफ आकर फिर झुकता है और दूसरी जूती को आगे-पीछे से चमकाता है. उसके बाद वह एक दूसरे पीएसओ की मदद से जूती पोछने से गंदे हो चुके रुमाल को पानी से धोता है.

पदम सिंह जब मायावती की जूती को चमका रहा होता है तो मायावती को कोई परेशानी नहीं होती. वे बेफिक्र अपने काम में लगी रहती हैं. इससे तो यही जाहिर होता है कि वो अक्सर इस बंदे से जूती साफ कराती रहती हैं. नीचे वीडियो देखिए. सारी कहानी मालूम चल जाएगी. ये वीडियो 6 फरवरी को औरैया में मौके पर तैयार किया गया था. इस दृश्य को सभी मीडियावालों ने देखा लेकिन कितने मीडियावालों ने इस दृश्य को आम जन को भी दिखाया, ये नहीं मालूम.

वीडियो देखने के लिए क्लिक करें…

यूपी की सीएम मायावती की जूती साफ करता एक अधिकारी

अवैध वसूली में टोटल टीवी के दो पत्रकार गए जेल

टोटल टीवी का गिरफ्तार पत्रकारमध्‍य प्रदेश के सिवनी जिले में टीआई बनकर अवैध वसूली करते दो पत्रकारों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है. दोनों टोटल टीवी के पत्रकार हैं. दोनों एक ट्रक चालक को धमकाकर उससे पचास हजार रूपये की मांग कर रहे थे. शक होने पर चालक ने इसकी सूचना पुलिस को दी. जिसके बाद पुलिस ने दोनों को रंगेहाथ पकड़ लिया. अपराध पर नियंत्रण के लिए सिवनी पुलिस पिछले कई दिनों से चेकिंग अभियान चला रही थी. इसका फायदा उठाकर कुछ लोग उन सड़कों पर अवैध वसूली का काम कर रहे थे, जिन पर पुलिस नहीं रहती थी.

ऐसी घटनाओं की शिकायत ट्रक मालिकों द्वारा लगातार पुलिस के उच्‍चाधिकारियों और मीडिया वालों से की जा रही थी. कल भी कुछ लोग सड़क पर टीआई, कन्‍हीवाडा बनकर एक ट्रक, जिसका नम्‍बर- सीजी 10 बीडी 6050 था, के  चालक से पचास हजार रूपये की मांग करने लगे. पैसा न देने पर ट्रक के कागजात लेने के बाद फर्जी रूप से ट्रक को चालान करने की कार्रवाई करने का नाटक करने लगे. परेशान ट्रक चालक इन लोगों के कार के पास गया तो देखा कि कार में दो युवतियां आपत्तिजनक स्थिति में दो अन्‍य युवकों के साथ मस्‍ती कर रही थी, जिसे देखकर चालक को शक हुआ.

उसने की इसकी सूचना फोन से अपने साथियों को दी. इसकी सूचना उसके साथियों ने पुलिस को भी दी. सूचना पाकर मौके पर पहुंची पुलिस ने दो युवकों को पकड़ लिया. जिसमें एक आरपी सिंह खुद को टोटल टीवी, महाकौशल का ब्‍यूरोचीफ बता रहा था. जबकि दूसरा रितेश सूर्यवंशी ऊर्फ गोलू सिवनी जिला संवाददाता है. इस बारे में जब भोपाल में टोटल टीवी के ब्‍यूरोचीफ राहुल सक्‍सेना से बात की गई तो उन्‍होंने कोई जानकारी होने से इनकार कर दिया. सिवनी के पुलिस अधीक्षक रमन सिंह ने बताया कि टोटल टीवी के दो पत्रकारों को टीआई बनकर अवैध वसूली करने के मामले में गिरफ्तार किया गया है. दोनों का चालान आईपीसी की धारा 419, 420 के तहत करके जेल भेज दिया गया.

पत्रकारों को ऐसे पीटते हैं यूपी के पुलिसवाले

मुरादाबाद में थाना मझोला की खुशहालपुर पुलिस चौकी में तैनात हैं दरोगा प्रेम प्रकाश. इनके साथ सिपाही देवदत्त और ब्रज पाल हर रोज सुबह रास्ते से गुजरने वाले छात्रों, व्यापारियों और इलाके में रहने वाले सभ्य लोगों से वाहन चेकिंग के नाम पर अवैध वसूली का धंधा करते हैं. घटना परसों की है. समय सुबह ग्याराह बजे.

पुलिस चौकी से दस कदम दूरी पर रहने वाला सिटी न्यूज़ का पत्रकार लवलीन यादव अपने घर से ऑफिस जाने के लिए निकला. चौकी प्रभारी प्रेम प्रकाश वाहन चेकिंग और वसूली के काम में लगे हुए थे. इनकी निगाह लवलीन पर पड़ गई. लवलीन चौकी से दस कदम की दूरी पर रहता है. प्रेम प्रकाश ने रास्ते के बीच में अपने सहयोगी सिपाहियों को खड़ा कर दिया. सिपाही देवदत्त गौढ़ और ब्रजपाल सिंह ने लवलीन को रोक लिया. लवलीन से वाहन चेकिंग के नाम पर बदतमीजी शुरू कर दी. जैसे ही लवलीन ने अपने बारे में बताया, पुलिस वालों ने सबके सामने उसकी पिटाई शुरू कर दी. वो गिड़गिड़ाता रहा. लेकिन चौकी इंचार्ज प्रेम प्रकाश पर जुनून सवार था. दोनों सिपाही उस पर ताबड़तोड़ डंडे बरसा रहे थे.

समय दोपहर लगभग 12 बजे. वाहन चेकिंग के नाम पर पत्रकार लवलीन को जनता की रक्षक मुरादाबाद पुलिस के दरोगा प्रेम प्रकाश और उनके सहयोगी दोनों सिपाही इतनी बुरी तरह पीट रहे थे कि वहां मौजूद लोगों ने उसे बचाने का प्रयास किया लेकिन नतीजा कुछ नहीं देख अन्य पत्रकारों को फोन पर सूचना दे दी कि यहाँ पत्रकार को पीटा जा रहा है.

समय दोपहर साढ़े 12 बजे. सूचना पाकर दो अन्य पत्रकार जनसंदेश चैनल के जवाहर सुल्तान व उनके साथ अनसुल वहां पहुंच गए और पत्रकार को पीटने का कारण जैसे ही प्रेम प्रकाश से पूछा तो वो इन दो पत्रकारों पर भी पिल पड़ा. इनके साथ भी मारपीट की गयी. कई दृश्य इन पत्रकारों के कैमरे में कैद हुए. इन दोनों पर गुंडा और क्रिमिनल कहते हुए डंडे बरसाने शुरू कर दिए. इलाके के लोग अपने घरों से बाहर आ गए. लोगों के सामने ही इन तीनों पत्रकारों की पिटाई की गई. इन्हें पीटते घसीटते हुए चौकी के अन्दर ले जाया गया और चौकी के अन्दर बंद कर बुरी तरह पीटा गया. जनता जो भलीभांति सभी पत्रकारों जानती थी, उनके माध्यम से खबर बाहर निकली और मुरादाबाद के इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया से जुड़े सभी पत्रकार बंधु वहां पहुंच गए. वहां का नजारा देख सभी पत्रकारों की आँखों में आंसू छलक पड़े. मुरादाबाद में ऐसी घटना या यूं कहिये की ऐसा बर्ताव पुलिस द्वारा पहली बार किया गया था. मामला तूल पकड़ने लगा. इधर जनता भी पत्रकारों के साथ हुए इस वहशियाना सुलूक से गुस्से में आ गई और चौकी पर सैकड़ों लोगो का जमावड़ा लग गया. सूचना एसओ मझोला फ़तेह सिंह को मिली की पत्रकारों को बुरी तरह पीटा गया है. वो तुरंत वहां पहुंचे.

समय दोपहर एक बजे. एसओ मझोला जो इन पत्रकारों को भली भाँति जानते थे, पत्रकारों की इतनी बुरी हालत देख कर अपना सर पकड़ कर बैठ गए. उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को फोन पर सूचित किया. थोड़ी देर में सीओ हाइवे मनोज पांडे आ गए. वो भी इन पत्रकारों की हालत को देख हैरान और परेशान हो गए. पत्रकारों को गंभीर चोट आई थी. खून बह रहा था. सीओ ने पता लगा लिया कि गलती चौकी इंचार्ज प्रेम प्रकाश की है. सीओ ने डीआईजी को पूरे मामले से अवगत कराया. डीआईजी ने दोषी के खिलाफ कार्यवाही करने को कहा. जैसे ही चौकी इंचार्ज को कार्यवाही होने की भनक लगी, वो माफ़ी मांगने की बात कहने लगा. लेकिन लोगो में गुस्सा फूट पड़ा. लोग सामने आए और बताने लगे कि इस चौकी पर जबसे प्रेम प्रकाश को तैनात किया गया है वो वाहन चैकिंग के नाम पर अवैध वसूली करता है. लोगो ने जानकारी दी कि वे घर में बाइक होते हुए भी साइकिल पर सवार होकर यहाँ से गुजरने लगे हैं. यदि वो ऐसा न करें तो उन्हें 500 से 1000 रुपये तक देने पड़ते हैं.

समय दोपहर ढाई बजे. सी.ओ. पशोपेश में थे कि आखिर क्या किया जाए. एक तरफ उनका मातहत और दूसरी तरफ पत्रकार जो सामने कलम और कैमरे लेकर खड़े थे. प्रेम प्रकाश को अपने किये पर कोई पछतावा नहीं हो रहा था. सीओ फुटेज देख चुके थे, लिहाजा उनके मुंह से कुछ नहीं निकल रहा था. बाद में प्रेम प्रकाश आगे आये और सबके सामने अपने द्वारा किये गए कुकृत्य के लिए माफ़ी माँगी. सभी के सामने प्रेम प्रकाश, देव दत्त और ब्रजपाल ने पत्रकारों से माफ़ी मांगी.

और आखिर में, पत्रकार पड़े नरम, जबरन मिले गले और हो गई सुलह!
और आखिर में, पत्रकार पड़े नरम, जबरन मिले गले और हो गई सुलह!

थाना मझोला के एसओ फ़तेह सिंह ने अपने हाथों से फैसलानामा लिखा कि जो मारपीट व गाली गलौच पुलिस द्वारा कि गई है वो दुर्भाग्यवश हुई है, हमें उसका अफ़सोस है. कहने को तो पूरा मामला निपट गया है लेकिन चौकी इंचार्ज प्रेम प्रकाश अब भी अपने खाकी रौब में है. इस मसले पर देखा जाए तो हार पत्रकारों की ही हुई है क्योंकि प्रेम प्रकाश व दोषी सिपाहियों के खिलाफ कोई मुकदमा नहीं लिखा गया और न ही उन्हें निलंबित या बर्खास्त किया गया. कल को ये ही लोग फिर किसी पत्रकार के गिरेबां पर हाथ डालेंगे तो इन्हें कौन और कैसे रोक सकता है. सवाल वही है कि क्या प्रेम प्रकाश, देवदत्त और ब्रजपाल जैसे पुलिसकर्मी नागरिक पुलिस में रहने लायक हैं?

मुरादाबाद से भीष्म सिंह देवल की रिपोर्ट

पुलिस बर्बरता का शिकार पत्रकारिता का छात्र

: आंख में गंभीर चोट, पांच टांके लगे : दरोगा का बेटा होने के बावजूद नहीं बख्शा : देहरादून। मित्रता, सेवा, सुरक्षा को अपना मूल ध्येय और खुद को जन मित्र होने का दावा करने वाली उत्तराखंड पुलिस ने मंगलवार को इन वाक्यों के ठीक विपरीत आचरण करते हुए पत्रकारिता के एक छात्र के साथ जमकर बदसलूकी। एसपी सिटी देहरादून की गाडी पर सवार पुलिसकर्मियों ने उसे बेवजह रोक कर बेरहमी से पीटा। उसकी आंख पर गंभीर चोट आई और पांच टांके लगे हैं।  युवक का नाम संदीप सिंह धारीवाल है और वह राजधानी के मोहिनी रोड क्षेत्र का निवासी है। संदीप ने पुलिस कर्मियों पर आरोप लगाते हुए बताया कि पुलिस ने उसकी सोने की चेन और कुछ नगदी भी छीन ली। जब उसने घटना की सूचना अपने परिजनों को देने कि कोशिश की तो उसका मोबाइल भी छीनकर तोड़ दिया गया।

मॉसकॉम का छात्र संदीप देर रात कहीं से लौट रहा था। जब वह राजधानी के राजीव नगर पहुंचा तो सफेद रंग की बुलेरो सवार पुलिसकर्मियों ने उसे रोक लिया और उसके बुलेट मोटरसाईकिल की चाभी छीन ली और जब उसने इसका कारण जानना चाहा तो उससे मारपीट की गई। संदीप के अनुसार पुलिसकर्मियों की संख्या चार से पांच थी और इनमें बगैर वर्दी वालों ने उसकी पिटाई की, जिनमें वह नेहरू कॉलोनी थाने में तैनात एक कांस्टेबल को पहचानता है।

पिटाई करने के बाद पुलिस वालों ने उसे वहां से भगा दिया। सुबह जब संदीप के घरवालों ने देखा तो उसे नजदीकी अस्पताल पहुंचाया जहां उसकी दांयी आंख के नीचे पांच टांके चले है। सूत्रों के अनुसार संदीप के पिता खुद पुलिस विभाग में हैं और इस समय हरिद्वार जनपद के मंलौर थाने में बतौर दरोगा तैनात हैं। संदीप ने मामले की लिखित तहरीर दी है और पुलिस मामले की जांच का आश्वासन दे रही है। इस मामले पर एसपी सिटी अजय जोशी का कहना है कि संभव है कि रात में पुलिस लाइन से उनकी कार को पुलिसकर्मी खाने के लिए ले गए हों। पर सबसे ये है कि क्या कोई पुलिसकर्मी किसी उच्चाधिकारी की कार से कोई अपराध कर दे तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। बहरहाल इस घटना ने मानवाधिकारों की मुखर वकालत करने वाले प्रदेश के पुलिस प्रमुख ज्योति स्वरूप पांडे के दावे को पलीता लगाने का काम किया है।

देहरादून से धीरेन्द्र प्रताप सिंह की रिपोर्ट

दिल्‍ली में पत्रकार बना चोरों का शिकार

दिल्‍ली में गाड़ी के शीशे तोड़कर सामान चुराने वाला गिरोह बेखौफ हो गया है. इस गिरोह के शिकार तिलक नगर थाना क्षेत्र में एक पत्रकार बने. चोरों ने उनकी गाड़ी से लैपटॉप, कैमरे, मोबाइल और अन्‍य सामान चुरा लिया. पत्रकार सुमित चौहान ने चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा दी है. पुलिस को अभी तक चोरों का कोई सुराग नहीं मिल पाया है.

दैनिक इंडिया दपर्ण के स्‍पेशल कॉरास्‍पांडेंट सुमित चौहान सोमवार की दोपहर अपनी कार जनकपुरी के पंखा रोड पर खड़ा कर किसी काम से गए थे. पन्‍द्रह मिनट बाद जब वे वापस लौटे तो उन्‍होंने अपनी कार का शीशा टूटा हुआ पाया. चोरों ने कार का शीशा तोड़कर उसके अंदर रखा हुआ लैपटाप, तीन स्‍पाई कैमरे, एक स्‍टील कैमरा, दो मोबाइल, कुछ जरूरी कागजात पर हाथ साफ कर दिया था. इसकी सूचना उन्‍होंने 100 नम्‍बर पर दी. मौके पर पहुंची पुलिस ने आसपास पूछताछ की. कोई खास जानकारी नहीं मिल पाई.

सुमित ने तिलक नगर थाना में इस चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराई है. अब तक पुलिस किसी भी सामान का पता लगा पाने में सफल नहीं हो पाई है. सुमित ने बताया कि सारे सामानों का मूल्‍य लगभग डेढ़ लाख रुपये के आसपास है. उन्‍होंने पुलिसिया कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए बताया कि पिछले छह महीने में इस तरह की ढाई सौ से ज्‍यादा वारदात हो चुकी है.

पुलिस की पिटाई ने ली पत्रकार की जान!

: फतेहपुर में आपस में ही उलझे पुलिसकर्मी : उत्तर प्रदेश पुलिस को जनता से मित्रवत व्यवहार करने की नसीहत देने वाले पुलिस महानिदेशक करमवीर सिंह की मित्र पुलिस की परिकल्पना को प्रदेश मे स्वेक्षाचारी पुलिसकर्मियों द्वारा ही पलीता लगाया जा रहा है। अपने ही अधिकारियों पर हमलावर होने वाली पुलिस का वीभत्स चेहरा फतेहपुर मे भी देखा जा रहा है। यहां लगभग एक सप्ताह पूर्व क्षे़त्रीय पत्रकार से खुन्नस खाये एक दरोगा ने उसे मानसिक और शारीरिक संत्रास देकर जेल क्या भेजा, उसकी मौत ही हो गयी।

ना! ना! डीजीपी साहब, हमारी मंशा आपकी मित्र पुलिस पर बेवजह उंगली उठाने की बिल्कुल नही है। पर इसे आप क्या कहेंगे, जब आप प्रदेश में आने वाले समय में खड़ी हो सकने वाली कानून व्यवस्था से सम्बंधित चुनौतियों को लेकर पूरे प्रदेश का तूफानी दौरा कर रहे हैं। अपने सहयोगियों को पुलिस मित्र होने की नसीहत दे रहे हैं। आज जब आप अपने तूफानी दौरों के क्रम में फतेहपुर पुलिस लाइन में हेलीकाप्टर से उतरे तो भले ही आपने सलामी लेने को महत्व न दिया हो, लेकिन उसी पुलिस लाइन की एक बैरिक मे आपके आगमन की पूर्व संध्‍या पर मित्र पुलिसकर्मियों ने दारू के पैसे को लेकर अपने ही एक साथी को पीट-पीट कर मरणासन्न करते हुए ‘भइया आल इज वेल‘ की तर्ज पर सलामी दे दी थी।

दोनों मामलों की जानकारी यह है कि जनपद के किशनपुर थाना क्षेत्र की चौकी विजईपूर के चौकी प्रभारी मनोज पाठक ने एक सप्ताह पूर्व क्षेत्रीय पत्रकार दलित राम भरोसे गौतम को उसकी आये दिन की खबरों से तंग आ कर जुए के फर्जी मामले पकड़ा। इस दौरान उसे इस तरह की मानसिक एवं शारीरिक प्रताणना दी कि उसकी मौत हो गयी। मित्र पुलिस इससे इनकार कर रही है लेकिन मित्र पुलिस के दूसरे कारनामे के रूप में 12 सितम्बर की रात लगभग साढ़े नौ बजे पुलिस लाइन की बैरक में दारू के पैसों के लेनदेन को लेकर श्रीकृष्णसिंह तोमर नामक सिपाही को मित्र पुलिस के दो सिपाहियों धर्मेन्द्र सिंह बाबा व महेन्द्र सिंह ने लोहे की राड से इतना पीटा कि उसे मरणासन्न हालत में अस्पताल ले जाना पड़ा।

पुलिस लाइन में पुलिस मित्रों के बीच घटी इस घटना को आला अधिकारी किस प्रकार लेते है? यह देखने की जरूरत से पहले जनपद में मठाधीशी कर रहे पुलिस के पत्रकार मित्रों से भी दलित और गरीब ग्रामीण पत्रकार रामभरोसे गौतम की मौत की कैफियत मांगने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। सीबी सिंह त्‍यागी

फतेहपुर से सीबी सिंह त्‍यागी की रिपोर्ट.

पत्रकारों को सबक सिखाने की तैयारी में बाड़मेर पुलिस!

यूपी के बाद राजस्‍थान में भी पत्रकारों को सबक सिखाने की तैयारी हो रही है. एक खबर से नाराज पुलिस पत्रकारों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. भू-माफियाओं से मिलकर गरीबों की जमीन हड़पने की खबर से नाराज बाड़मेर पुलिस दो पत्रकारों से बदला लेने के लिए इनके खिलाफ फाइल खोल दिया है.

बताया जा रहा है कि बाड़मेर के औद्योगिक शहर बालोतरा में भू-माफियाओं का आतंक जोरों पर है. भू-माफिया स्‍थानीय सत्‍ताधारी नेताओं और पुलिस के साथ मिलकर गरीब लोगों की जमीन हड़प रहे हैं. इस पूरे धंधे में स्‍थानीय थाने के प्रभारी भी भागीदार बने हुए हैं. इसी संबंध में स्‍थानीय मीडियाकर्मियों ने भू-माफियाओं और पुलिस की मिलीभगत की एक रिपोर्ट छापी थी. इस खबर के बाद से पुलिस खबर देने वाले पत्रकारों से गुस्‍सा है. अब इन पत्रकारों के फंसाने की साजिश रची जा रही है.

सूत्रों का कहना है कि पुलिस ने भू-माफियाओं को बेनकाब करने वाले एक इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के संवाददाता और एक स्‍थानीय अखबार के संवाददाता के खिलाफ थाने में फाइल खोली है. इन्‍हें फंसाने की हरसंभव तैयारी की जा रही है. दोनों पत्रकारों का अतीत खंगाला जा रहा है. इस जानकारी के बाद मीडियाकर्मी भी पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोलकर तैयार हो गए हैं.

बंशीलाल चौधरी की रिपोर्ट.

वीआईपी की सुरक्षा के लिए ये कैमरामैन खतरा हैं!

हाल में बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के मीडिया कर्मियों को जो अनुभव स्थानीय पुलिस से मिले हैं, उसमे अभी कई रंग और मिलने वाले हैं, क्योंकि प्रेस क्लब के वरिष्ठ सदस्य अपना दुखड़ा लेकर जब पुलिस के आला अधिकारी से मिले तो जो सलाह उन्हें दी गई, उससे वो सकते में हैं. प्रस्तुत है पुलिस के आला अधिकारी से प्राप्त नसीहतों के कुछ अंश-

* अरे इतने कैमरों की जरूरत क्या है? आप लोग मिल बैठ कर तय कर लो कि किस कार्यक्रम में किसको जाना है? बाद में सभी लोग उससे फोटो या वीडियो शेयर कर लें.

* मैं तो मीडिया को रेगुलेट कर के ही रहूँगा! मेरे सामने ये भभड़ नहीं चलेगा, ये क्या तरीका है कि राज्यपाल भवन का उदघाटन करने के बाद पौधरोपण करने जा रहे तो पच्चीस-तीस कैमरा उनके आगे-पीछे दौड़ने लगे? अरे भाई कितनी फोटो खींचोगे, कितनी फोटो छपती है?

* ये कैमरामैन वीआईपी की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं. ये इनके लिए निर्धारित जगह पर कभी नहीं रहते, सब तरफ घूम-घूमकर कैमरा चलाते रहते हैं, अरे कितने एंगल चाहिए?

* जहां धक्का-मुक्की होगी वहाँ पुलिस आएगी और उनको बाहर निकालेगी ही, क्योंकि पुलिस का काम ही है वव्यस्था बनाना.

* आप को प्रशासन के साथ बैठकर ये तय कर हमें बताना होगा कि किसी कार्यक्रम में कितने स्टिल और कितने वीडियो कैमरे जायेंगे. इसके लिए आप चाहे सोनमणि के साथ बैठे या बैजेन्द्र कुमार के साथ, बैजेन्द्र का नंबर दूं? मैंने उन्हें पत्र भी लिखा है, या फिर मुख्यमंत्री से ही मिल कर ये बातें तय कर लें.

बाहर वाले मीडिया कर्मियों को बता दूं कि बिलासपुर में बाइट लेने गए कैमरामैन को सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप लगा कर हवालात में डाल दिया गया, पत्रकारों ने जब गुहार लगाईं तो उनसे कहा गया कि उनकी जमानत का बंदोबस्त करो!

* एक कार्यक्रम में सुआ नाच की फोटो खींच रहे सीनियर फोटोग्राफर से कहा गया, “तू भी उनके साथ नाचेगा क्या? निकल वहाँ से.” इससे वहाँ मौजूद पत्रकारों में हलचल होने लगी तो उनसे कहा गया कि अभी आप लोग भी बाहर जाओ जब जरूरत होगी आप को बुला लिया जाएगा.

बहरहाल आगे क्या-क्या होता है? हम सब देखेंगे, हाँ इतना जरूर हुआ कि आलाअधिकारी के कमरे से बाहर निकलते हुए एक वरिष्ट पत्रकार ने कहा कि ये तो वैसे ही हो गया जैसे गली में यहाँ-वहाँ, कहीं भी पेशाब कर देने वाले बच्चे की शिकायत करने मोहल्लेवाले जब उसके बाप के पास पहुंचे तो देखा कि वो खुद अपनी छत में खड़ा होकर दूसरे की छानी में मूत रहा है.

इन घटनाओं के विरोध में बिलासपुर प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष और पत्रकार महासंघ के सदस्‍य 14 सितम्‍बर को रायपुर में आमरण अनशन पर बैठेंगे. इस अनशन में पूरे छत्‍तीसगढ़ से पत्रकार शामिल होंगे.

बिलासपुर से कमल दुबे की रिपोर्ट.

गैंग रेप, प्रेस, पुलिस, नेता और लोकतंत्र

फांस दिए तीन पत्रकार : सोनभद्र की तीन आदिवासी नाबालिग लड़कियों से सामूहिक बलात्कार की कवरेज करने वाले पत्रकार को मिली नौकरी से निलंबन और कोर्ट के चक्कर लगाते रहने की सजा। साथ में दो और पत्रकारों को पुलिस ने फांस दिया है। इतने संगीन मामले की लीपापोती में पुलिस, प्रेस और सत्ताधारी दल के नेता एक हो गए। महिला आयोग की भी भूमिका संदिग्ध रही। इस पूरे घिनौने खेल में उत्तर प्रदेश के राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त एक सीनियर आईपीएस की करतूत सबसे शर्मनाक रही। पुलिस के दबाव में पीड़ित लड़कियों के अनपढ़ और सीधे-सादे पिता को ही पीड़ित पत्रकारों के खिलाफ गवाह बना दिया गया। इस तरह पूरा वाकया ही उलट गया। 

वाकया पुराना है। मुकदमा जारी है। खबर छपने के अगले ही दिन पलटीमार-खंडन छाप देने वाले अपने बड़े मीडिया घराने की नाइंसाफी से मजबूर पत्रकार आवेश तिवारी ने आपबीती कुछ इस तरह बयान की है- ”वह मेरे अखबारी जीवन का सबसे खराब दिन था। बरसात की बूंदें चेहरे पर थप्पड़ जैसे लग रही थीं। गाँव के बाहर एक झोपडी में पूरी तरह से भीगी चंदा, रूपा और तारा (काल्पनिक नाम) एक कोने में सिमटी हुई थीं। उनके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था। ये पुलिस, प्रेस और पोलीटीशियंस के गठजोड़ का सबसे घिनौना अध्याय था। लगभग 14 से 16 साल की लड़कियों के चेहरे पर प्रेस कैमरे के चमकते फ्लैश जैसे मुझे और मेरी कलम, दोनों को गाली दे रहे थे। लगभग चार-पांच सौ ग्रामीणों की भीड़ के बीच चंदा ने बिलखते हुए गांव वालों से पूछा कि हमारी क्या गलती थी? हमें क्यूँ निकाल दिया गाँव से?’ सवाल का जवाब मेरी रातों की नींद उडाने वाला रहा। पंचों ने इन लड़कियों को अस्पृश्य घोषित कर गांव-निकाला की सजा सुना दी थी। वे गांव से बाहर कर दी गई थीं। लड़कियों का कहना था कि पुलिस ने उन्हें आपबीती पर कत्तई मुंह न खोलने का आदेश दिया है। हमारे बाबा को बन्दूक की  नोक पर धमकाया गया है। बसपाई ग्राम प्रधान ने अपने तीन लड़कों के दुष्कर्म की पांच सौ रुपये कीमत लगाकर हमसे छुटकारा पा लिया है। इस घटना पर पर्दा डालने में मुख्य भूमिका निभाने वाला राष्ट्रपति पदक से सम्मानित आईपीएस उत्तर प्रदेश के एक जिले का एसएसपी है। मानहानि का ये मुकदमा इस आईपीएस के व्यक्तिगत खर्चे से पीड़ित बालिकाओं के अनपढ़ परिजनों द्वारा लड़ा जा रहा है। पीड़ित लड़कियों का पिता कहता है कि वह मुकदमा नहीं लड़ेगा तो पुलिस उसे नक्सली बताकर जेल भेज देगी।”

वह 23 अप्रैल 2006 की रात थी, जब उत्तर प्रदेश के दलित इतिहास में यह एक और काला अध्याय लिखा गया। पीड़ित पत्रकार आवेश तिवारी ने भड़ास4मीडिया को बताया कि ”उस वक़्त मैं देश के नंबर वन अखबार ‘दैनिक जागरण’ का संवाददाता हुआ करता था। शाम को तकरीबन सात बजे मुझे जानकारी मिली कि दुर्गम आदिवासी गांव बीरपुर में तीन आदिवासी लड़कियों के साथ गैंग रेप हुआ है और पुलिस ने सूचना के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की है। मैंने जब इस संबंध में पुलिस से जानकारी मांगी आवेश तिवारीतो उसके होश फाख्ता हो गए। तत्काल गाडी भेजकर पीड़ित लड़कियों और उनके परिजनों को बुलवा लिया गया। चूँकि रात दस बजे के बाद अखबार के क्षेत्रीय संस्करण छूटने लगते हैं, सो मैं एफआईआर दर्ज होने तक खबर भेजने का इन्तजार नहीं कर सकता था। मैंने तत्काल लड़कियों और उनके पिता का बयान रिकॉर्ड किया जो कि आज भी मेरे पास सुरक्षित है और खबर प्रेस मुख्यालय को प्रकाशनार्थ भेज दी। अपने बयान में लड़कियों ने बताया कि पिछली रात जब वे तीनों गांव की ही एक शादी से लौट रही थीं,  उन्हीं के गांव के तीन लड़कों ने चाकू के बल पर उन्हें अंधेरे, सुनसान रास्ते से उठा लिया और सामूहिक बलात्कार किया। वे लड़के बसपा नेता और ग्राम प्रधान के बेटे हैं। परिजनों ने बताया कि घटना के बारे में बताने पर आरोपियों के समर्थकों ने हमें गांव में ही बंधक बना लिया। हमने जैसे-तैसे पुलिस को सूचना कराई है। अगले दिन ये खबर पीड़ितों के कल्पित नामों से दैनिक जागरण और दो अन्य अखबारों में प्रकाशित हुई।”

उस काली दास्तान से पर्दा उठाते हुए आवेश तिवारी ने भड़ास4मीडिया को आगे बताया है कि ”खबर छपने के बाद 24 अप्रैल को सबेरे सात बजे मैंने स्थानीय एसएचओ से फ़ोन पर जानना चाहा कि आरोपियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई है?  हिरासत में एक दलित की  मौत के मामले में जांच का सामना कर रहे  उस एसएचओ का जवाब सुनते ही मेरे पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। उस राष्ट्रपति पदक सम्मानित एसएसपी के खास एसएचओ ने मुझे बताया कि वे लड़कियां तो अपने साथ ऐसा कोई वाकया होने से साफ़ इनकार कर रही हैं। मैं पूरी तरह स्तब्ध। तुरंत थाने पहुंचा। बेहद डरे-सहमे पीडि़तों-परिजनों के बयान मनमाफिक बदले जा चुके थे। इसके पहले कि मैं कुछ समझ पाता, जागरण के ब्यूरो चीफ का मेरे पास फोन आ गया कि ‘आप इस मामले में ज्यादा रुचि मत लीजिये। कप्तान साहब ने व्यक्तिगत तौर पर इस मामले को ज्यादा तवज्जो नहीं देने को कहा है।’ फिर तो सारी हकीकत मुझे समझते देर न लगी। इस बीच पुलिस ने पूरे मामले को झूठा साबित करने के लिए पीड़ित लड़कियों के मनमाफिक बयान की विडियो रिकॉर्डिंग भी करा ली। शाम को एक रेस्ट हाउस में दारू और मुर्गे की दावत में हमारे ब्यूरो चीफ के अलावा अन्य प्रमुख अखबारों के पत्रकारों व पुलिस अधिकारियों के बीच आगे की साझी रणनीति बनाई गई। अब ख़बरों का बलात्कार होना था। लेकिन मैं अब भी उन लड़कियों के बयान से पलटने की बात पर यकीन नहीं कर पा रहा था। मुझे अपने सूत्रों से मालूम हुआ कि पुलिस ने लड़कियों व उसके परिजनों को खूब डराने-धमकाने के बाद पांच सौ रुपये का लालच देकर फर्जी बयान कलमबद्ध किया है। दो दिन बाद मैं अपने कुछ ईमानदार पत्रकार साथियों को लेकर बीरपुर गांव जा पहुंचा। पूरे गांव में डर और दहशत का माहौल था। पता चला कि गाँव के जिस युवक अरविन्द ने पुलिस को घटना की सूचना दी थी, चार दिन से बिना किसी जुर्म के हिरासत में है। उसके छोटे भाई ने बताया कि हमारे भाई को बुरी तरह से पुलिस ने पीटा है। वे उसे झूठे जुर्म में जेल भेज देंगे। पीड़ित लड़कियों से मिलने से पहले हमने उनकी माताओं से बात की। उन्होंने बताया कि ‘हम जुबान खोलेंगे तो पुलिस जीने नहीं देगी। हमारी लड़कियों को पंचायत ने गाँव से बाहर का दिया। हम कुछ नहीं कर सकते।”

आवेश तिवारी ने आगे बताया है कि ‘बैरपुर से लौटने के तत्काल बाद मुझे जागरण प्रबंधन ने निलंबित कर दिया। अखबार ने एक खंडन भी प्रकाशित किया, जिसमें एसएसपी के हवाले से कहा गया कि ‘उन लड़कियों ने मुआवजे के लालच में झूठा बयान दिया था।’  जबकि ‘सहारा समय’ और कुछ साप्ताहिक पत्रों ने पुलिस की लीपापोती की पोल खोल दी। कहानी सिर्फ यहीं ख़त्म नहीं हुई। इस घटना के 15 दिन  बाद मुझे आगजनी के एक मामले में अभियुक्त बना दिया गया, हालांकि प्रेस काउंसिल के कड़े तेवर से मात्र चौबीस घंटे के भीतर मेरा नाम पुलिस को हटाना पड़ा। उधर, बलात्कार की शिकार लड़कियों को मोहरा बनाकर ‘राष्ट्रीय महिला आयोग’ में भी मेरे साथ-साथ तीन अन्य पत्रकारों के खिलाफ मानहानि की शिकायत दर्ज करा दी गई। बाद में हमने आयोग से इसका प्रतिवाद भी किया कि वास्तविकता जाने बगैर हमे नोटिस जारी कर दिया गया।….पीड़ित लड़कियों का पिता आज भी कहता है कि ‘भैया, हमको तो न कोर्ट मालूम, न थाना-कचहरी, हमसे पुलिस ने जो कहा, हम करने को मजबूर हैं। अब वो हमसे मुकदमा लड़वा रहे हैं। इससे तो अच्छा था कि हमें मार दिए होते।’

निलंबन के बाद आवेश तिवारी को जागरण की नौकरी हमेशा के लिए छोड़नी पड़ी। अब वह डेली न्यूज एक्टिविस्ट अखबार के सोनभद्र के ब्यूरो चीफ हैं। सोनभद्र जनपद न्यायालय में केस जारी है। लिखित प्रतिवाद के बाद महिला आयोग शांत हो गया था। मामले के तीनों आरोपी आवेश तिवारी, ‘सहारा समय’ के तत्कालीन ब्यूरो चीफ अश्विनी सिंह और ‘इंडिका टाइम्स’ के संपादक एमएम खान अब अदालत के चक्कर काट रहे हैं। 


इस प्रकरण के संबंध में किसी अन्य जानकारी के लिए आवेश तिवारी से संपर्क awesh29@gmail.com के जरिए किया जा सकता है। आवेश ने अपनी पीड़ा अपने ब्लाग पर भी प्रकाशित की है, जिसे पढ़ने के लिए क्लिक करें- कतरनें