सेबी ने वाकई पीएसीएल के कई ठिकानों पर छापेमारी की या आजसमाज में फर्जी खबर छपी?

इन दिनों पीएसीएल चर्चा में है. यह पर्ल्स ग्रुप की मदर कंपनी है. पी7न्यूज चैनल, बिंदिया मैग्जीन, मनी मंत्रा मैग्जीन, शुक्रवार मैग्जीन यही ग्रुप निकालता है. मध्य प्रदेश में राज्य सरकार ने बिल्डरों और चिटफंडियों के खिलाफ अभियान चला रखा है. इसकी शुरुआत खासकर तब हुई जब कई बिल्डरों और चिटफंडियों ने राज्य सरकार को अपने मीडिया माध्यमों से ब्लैकमेल करना शुरू किया. जब ब्लैकमेलिंग की हद हो गई तो राज्य सरकार ने इन्हें सबक सिखाने के लिए इनकी मूल कंपनियों की चूले हिला दीं.

बड़े अखबारों में विज्ञापन छपवाकर और शहर शहर में होर्डिंग लगाकर राज्य सरकार ने जनता से अपील की कि वे अपना पैसे इन चिटफंडियों को न दें क्योंकि ये कभी भी भाग सकते हैं और इनके पास कानूनी कागजात पूरे नहीं हैं. राज्य सरकार ने अपने जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को बिल्डरों व चिटफंडियों को धरने-पकड़ने, संपत्ति जब्त करने, कागजात की छानबीन करने आदि में लगा दिया. तो ग्वालियर संभाग में करीब तीन दर्जन से ज्यादा कंपनियों पर पुलिस व प्रशासन ने गाज गिरा दी जिसमें पीएसीएल भी है. पीएसीएल वालों ने दिल्ली समेत कई राज्यों में विज्ञापन देकर यह स्पष्ट किया है कि वे कोई गलत काम नहीं कर रहे हैं.

पीएसीएल के खिलाफ नवभारत टाइम्स और स्टार न्यूज में खबरें छपी-दिखाई गईं. यह भी चर्चा है कि पी7न्यूज के कर्ताधर्ता दिल्ली में गोपालदास भवन में फर्जी निवेशकों को इकट्ठा कर उनके इंटरव्यू अपने पक्ष में जोरशोर से प्रसारित कर रहे हैं ताकि मीडिया में खिलाफ बने माहौल को धीरे धीरे ठीक किया जा सके. ताजी सूचना ये है कि आजसमाज अखबार के गुड़गांव एडिशन में पीएसीएल को निशाना बनाते हुए ऐसी खबर छाप दी जिसकी सत्यता संदिग्ध है. कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा के इस अखबार में जिसके प्रधान संपादक आजकल महान पत्रकार राहुल देव हैं, में खबर प्रकाशित हुई की पीएसीएल के कई शहरों के आफिसों पर सेबी के अधिकारियों ने छापेमारी की. पूरी खबर पढ़िए और बताइए कि क्या वाकई पीएसीएल के ठिकानों पर देशव्यापी छापे सेबी के लोगों ने डाले हैं?

हिंदी नहीं बचेगी तो भारत भी नहीं बचेगा : राहुल देव

सिरसा : दैनिक समाचार पत्र आज समाज के प्रधान संपादक राहुल देव ने कहा कि यदि भारत को बचाना है तो हिंदी को भी बचान पड़ेगा। अंग्रेजी के गुलाम होते समाज में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए हिंदी भाषी पत्रकारों को भाषा की गुणवत्ता का ध्यान रखना होगा। इसके अलावा उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के बदलते दौर में पत्रकार कंटेंट और क्वालिटी पर विशेष ध्यान दें और विश्वसनीयता को जिंदा रखने के लिए स्वच्छ पत्रकारिता का सहारा लें।

श्री देव आज हरियाणा जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन द्वारा पंचायत भवन में हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर बतौर मुख्य वक्ता संबोधित कर रह थे। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का लंबा इतिहास है और देश की आजादी और उसके बाद जनमानस की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम भी। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के विषय में कई महत्वपूर्ण जानकारियां भी दी।

कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्जवलित करके की गई। इसके बाद न्यू सतलूज स्कूल की छात्राओं ने मां सरस्वती की वंदना की। कार्यक्रम में पहुंचे मुख्यअतिथियों का बुके देकर स्वागत किया गया। इस मौके पर हजकां के वरिष्ठ नेता, पूर्व मंत्री एवं पूर्व सांसद धर्मपाल मलिक, पूर्व सांसद रामजी लाल, पूर्व सांसद डॉ. सुशील इंदौरा, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रतिनिधि होशियारी लाल शर्मा, भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेशाध्यक्ष रेणू शर्मा, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रतिनिधि गोबिंद कांडा, कांग्रेस ब्लाक कमेटी प्रधान भूपेश मेहता, देविवि के जनसंचार व पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह चौहान, कुलदीप भांभू, गोकुल सेतिया, डॉ. आरएस सांगवान, पार्षद रमेश मेहता, अमरपाल खोसा, अधिवक्ता सुरेश मेहता, विशिष्ट अतिथियों के तौर पर पहुंचे।

कार्यक्रम में शिरकत करने जालंधर से आए वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन शर्मा ने समाज व सियासत पर बोलते हुए कहा कि पत्रकार भी अब पेशेवर हो गए हैं। जिस प्रकार पैसे के बिना एक राजनेता राजनीति नहीं कर सकता वैसे ही आधुनिक पत्रकारिता भी पेड न्यूज में घिर चुकी है। उन्होंने कहा कि आज खबरों की मानिटरिंग खत्म हो चुकी है जिससे छोटे शहरों की समस्याएं बड़े शहरों में बैठे उच्च अधिकारियों तक नहीं पहुंच पाती। उन्होंने कहा कि नैतिक चिंतन का भी होना जरूरी है।

वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का उदभव पहले हिंदी समाचार उदंत मार्तंड के जरिये हुआ। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी की दास्ता से छुटकारा पाने के लिए हिंदी पत्रकारों को अपने काम में गुणवत्ता लाने की जरूरत है। इस मौके पर मंच संचालन प्राध्यापक हरभगवान चावला ने किया। कार्यक्रम के अंत में आए हुए गणमान्य व्यक्तियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए गए। कार्यक्रम में हरियाणा जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष नवदीप सेतिया, महासचिव अमित तिवाड़ी, कोषाध्यक्ष अंशुल छत्रपति, सत सिंह, राजकमल कटारिया, राजेंद्र ढाबा, इंद्रजीत अधिकारी, विकास तनेजा, रवि बंसल, कमल सिंगला, प्रवीण दुआ, भास्कर मुखर्जी, कुलदीप शर्मा, रविंद्र सिंह, विकास तनेजा, राम महेश्वरी, हितेश चतुर्वेदी, विजय जसूजा, प्रवीण कोशिक, संदीप चायल, अमरजीत सिंह, संदीप गाट, संजीव शर्मा ,अरिदमन छत्र पति, सहित अनेक पत्रकार साथी व लोग मौजूद थे।

रविंद्र सिंह की रिपोर्ट

अतियों को जीता एक न्यूज चैनल

एक ऐसा न्यूज चैनल जिसमें सुबह और शाम डेढ़-डेढ़ घंटे गुरुद्वारा से सीधा प्रसारण होता है, गुरुवाणी का. ऐसा इसलिए क्योंकि ये मालिकों का आदेश है. इस आदेश का पालन राहुल देव ने भी किया और अनुरंजन झा भी कर रहे हैं. आजकल की पत्रकारिता में मालिक ऐसा प्राणी होता है जो सारे महान महान संपादकों के लिए आदरणीय और भाई साहब और चेयरमैन सर या एमडी सर होता है.

बाकी दुनिया में चाहें जितने ऐब या गुण हों लेकिन मालिक में कोई ऐब-कमी की गुंजाइश नहीं क्योंकि मालिक मालिक होता है और मालिक इसलिए मालिक होता है क्योंकि वो लाखों रुपये और ढेर सारे सुख हमें देता है. वो चाहे सहारा हो या सीएनईबी, पी7न्यूज हो या इंडिया न्यूज, हर जगह चेयरमैन सर सर्वोच्च होते हैं. हर जगह मदर कंपनी अपनी असली मां से सगी होती है कर्मियों के लिए. और इन इन कंपनियों में काम करने वाले लोग अपनी मदर कंपनीज के खिलाफ कुछ नहीं सुनना चाहते. अन्ना हजारे में, प्रशांत भूषण में लाखों गुण दोष ये लोग निकालेंगे लेकिन अपनी अपनी कंपनीज के फ्राड, अपने अपने चेयरमैनों के फ्राड पर आंख मूंदे रहेंगे.

बात कुछ और कर रहा था और लिख कुछ और गया. लेकिन मुद्दा यही है कि मालिक ने कह दिया तो कह दिया. सीएनईबी के मालिक पंजाबी हैं. उनका अरबों खरबों का कारोबार है और सीएनईबी पर जो इनवेस्टमेंट है वो कारोबार से होने वाले मुनाफे में चुटकी बराबर है. सीएनईबी उनके लिए किसी आध्यात्मिक शांति की तरह है. इसीलिए इन मालिकों ने राहुल देव के जमाने में राहुल देव से कह रखा था कि क्राइम की खबर, अपराध की खबर न दिखाइए और सुबह शाम नियम से गुरुद्वारे की गुरुवाणी का सीधा प्रसारण करवाइए. राहुल देव मालिकों के आदेश को अच्छे शब्दों में ढालकर तार्किक तरीके से पेश करने की कला में माहिर हैं. उन्होंने मालिकों की इस उदारता को पत्रकारिता से कनेक्ट कर सीएनईबी को एनडीटीवी जैसा बता डाला.

खैर, सीएनईबी कभी एनडीटीवी तो बन नहीं पाया लेकिन हां इतना जरूर हुआ कि चैनल की बची-खुची साख खत्म होने लगी और चैनल से जुड़े प्रमुख लोग एक एक कर अलविदा कहते गए. अचानक अनुरंजन झा परिदृश्य में आए. छंटनी, इनक्रीमेंट, रंगरोगन, लेआउट-कलेवर, कंटेंट, विजन, लोगो, टीम… सभी में बदलाव की घोषणा की और सबको एक एक कर बदल डाला. अब जिस तरह का सीएनईबी सामने आया है, वो कितना अच्छा-बुरा है, ये तो नहीं पता लेकिन हां, पिछले कुछ दिनों तक चैनल देखने के बाद लगने लगा है कि ये चैनल अतियों को जीता है.

मतलब ये कि सुबह-शाम गुरुवाणी का सीधा प्रसारण और आधी रात को सेक्स समस्याओं का निराकरण. कोई डाक्टर जैन हैं जो सेक्सोलाजिस्ट हैं वह आधी रात में लिंग और योनि की सभी समस्याओं को एंकर के श्रीमुख से सुनते हैं और उसका मौखिक समाधान पेश करते हैं. सेक्स समस्याओं का प्रोग्राम आना चाहिए टीवी पर. अखबारों में भी इसे प्रकाशित होना चाहिए. मैं तो इसके पक्षधर हूं. हालांकि भारतीय परंपरा को हर बात पर सामने रखने वाले लोग कह सकते हैं कि सेक्स समस्याओं पर खुलेआम चर्चा नहीं होनी चाहिए क्योंकि बच्चों पर गलत असर पड़ सकता है लेकिन आधी रात को न्यूज चैनल पर सेक्स समस्याएं तो दिखाई ही जा सकती हैं.

पर सवाल ये भी है कि अपराध की खबरें न दिखाने वाले चैनल पर घनघोर सेक्सी सवाल जवाब आधी रात को भी कितना उचित है. लगता है कि सीएनईबी के मालिकों को भी सेक्स समस्याओं वाले कार्यक्रम में अच्छी खासी रुचि है तभी तो वे शाम को जनता को गुरुवाणी सुनाने के बाद देर रात को गुप्तांगवाणी सुनाने वाले कार्यक्रम को प्रसारित करा रहे हैं. मैं इन दो अतियों वाले कार्यक्रम को लेकर संशय में हूं कि इन्हें अच्छा कहूं या बुरा. हां, लेकिन ये अटपटा जरूर लगता है कि शाम के वक्त गुरुवाणी और रात के वक्त सेक्स समस्याएं. है न कंट्रास्ट. और, ये कंट्रास्ट ही किसी को भीड़ से अलग बनाता है. तो कह सकते हैं कि अनुरंजन झा ने सीएनईबी को कुछ अलग बना दिया है.

राहुल व कंचन ने ग्रहण किया पुरस्कार

: उत्तर प्रदेश दिवस पर पूरे देश की बात : पिया मेहंदी लिया दा मोतीझील से…, कारगिल नाही पूरा पाकिस्तान चाहत बा…. मंगरुआ बेमार बा… जैसे लोकप्रिय भोजपुरी गीत प्रस्तुत करते फिल्मस्टार मनोज तिवारी मृदुल, मुंबई के कोने-कोने से बड़े पैमाने पर उमड़ा जनसैलाब, देश की विभिन्नता में एकता की झांकीवाला खूबसूरत मंच…

और उस मंच पर भोजपुरी लहजे में गरजते हुए बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा, मुंबई के उत्तर भारतीयों की श्रम संस्कृति का बखान करते भाजपा नेता विधायक विनोद तावड़े, मुंबई के उत्तर भारतीयों की समस्याओं पर दिल्ली से आए वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव की चिंता, नई पीढ़ी में अपनी लोकभाषा के प्रति अनुराग भरने को प्रयत्नशील अभियान के आयोजक अमरजीत मिश्र और भोजपुरी धुनों पर थिरकते नन्हें बच्चों की टोली, यह दृश्य था मुंबई में उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस पर आयोजित ‘अभियान’ के लोक महोत्सव का.

सांताक्रुज (प.) के लायंस क्लब ग्राउंड पर आयोजित भोजपुरी, अवधी की लोककला, लोकभाषा व लोक संस्कृति से सराबोर शाम का वह बड़ा ही अनूठा क्षण था. अभियान के अध्यक्ष अमरजीत मिश्र द्वारा आयोजित कार्यक्रम के उद्घाटक मनपा में भाजपा के ग्रुप लीडर एड. आशीष शेलार ने उपस्थित लोगों का स्वागत किया. अभियान परिवार की ओर से अतिथियों का स्वागत वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शुक्ल ने किया. इस मौके पर आज समाज के ग्रुप एडिटर राहुल देव को डॉ.राममनोहर त्रिपाठी सम्मान व नवभारत टाईम्स की सिनियर कॉपी एडिटर कंचन श्रीवास्तव को राजेश मिश्र युवा पत्रकार सम्मान प्रदान किया गया. इस मौके पर भोजपुरी लोकगायक सुरेश शुक्ला ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किया.

मुंबई से विजय सिंह ‘कौशिक’ की रिपोर्ट

आज समाज से जाना पड़ा मधुकर उपाध्याय को

राहुल देव के आज समाज का समूह संपादक बनने के बाद अब तक समूह संपादक के रूप में काम कर रहे मधुकर उपाध्याय ने इस्तीफा दे दिया है. मधुकर उपाध्याय के नेतृत्व में ही आज समाज अखबार की शुरुआत हुई थी. पिछले कई महीनों से मधुकर साइडलाइन चल रहे थे और अखबार से जुड़े फैसलों में उनकी कोई राय नहीं ली जाती थी. अब जबकि एक नए ग्रुप एडिटर आ गए हैं, मधुकर के जाने की चर्चा तेज हो गई. बताया जाता है कि कल मधुकर उपाध्याय आफिस आए और अपना सामान समेटकर चले गए. उनकी प्रबंधन से जुड़े कुछ लोगों से कुछ देर तक बात हुई. उसके बाद वे आफिस छोड़कर चले गए.

सीईओ के रूप में राकेश शर्मा और मैनेजिंग एडिटर के रूप में रवीन ठुकराल के आने के बाद आज समाज में मधुकर उपाध्याय की पोजीशन पहले ही खराब हो गई थी. पर उपेक्षा के बावजूद मधुकर उपाध्याय आज समाज में बने रहे. भड़ास4मीडिया ने मधुकर उपाध्याय को जब उनके इस्तीफे के बाबत फोन किया तो उन्होंने फोन नहीं उठाया. उधर सूचना है कि राहुल देव 29 नवंबर से आज समाज के आफिस में बैठना शुरू कर देंगे. सूत्रों के मुताबिक राहुल ने ज्वाइन पहले ही कर लिया लेकिन कामकाज शुरू करने के लिए 29 नवंबर का दिन तय किया है. एक दिसंबर को आज समाज के गुड़गांव एडिशन को लांच होना है. इसके लिए भी तैयारियां जोरों से चल रही हैं.

‘आज समाज’ में कब तक दिन काटेंगे राहुल देव?

राहुल देवराहुल देव अब आज समाज अखबार चले गए हैं. कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा वाले इस अखबार में वे प्रधान संपादक बने हैं. सीएनईबी न्यूज चैनल से विदाई के बाद राहुल देव की कुछ जगहों पर बातचीत चली लेकिन ज्यादातर जगहों पर एडिटर-इन-चीफ की कुर्सी खाली न होने के कारण उन्हें मायूस होना पड़ा. ऐसे में उनके पास दोयम दर्जे के कुछ अखबारों-चैनलों के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था. सो, उन्होंने आज समाज का प्रधान संपादक बनना कुबूल किया. उल्लेखनीय है कि सीएनईबी में राहुल देव को अनुरंजन झा ने सीईओ और एडिटर इन चीफ की कुर्सी से अचानक हटवाने में कामयाबी पा ली थी. उस समय राहुल देव यही कहते रहे कि वे सीईओ और एडिटर इन चीफ हैं और रहेंगे भी. लेकिन समय ने उनके दावों को झुठला दिया.

राहुल देव को बेबसी व मायूसी में सीएनईबी से अलग होना पड़ा. बॉस के जाने के बाद राहुल देव के लोगों को एक-एक कर चैनल से जाने को मजबूर किया जाने लगा या खुद ही ये लोग छोड़कर जाने लगे. राहुल देव ने सीएनईबी से खुद को हटाए जाने को लेकर लंबे समय तक चुप्पी  साधे रखी. बातचीत में वे लगातार यही कहते रहे कि उन्हें सीएनईबी चेयरमैन ने सीईओ और एडिटर इन चीफ की कुर्सी पर बने रहने को कहा है और जो कुछ नया हो रहा है, वो सब तात्कालिक व्यवस्था के तहत है, बिहार चुनावों तक के लिए है.

पर अब यह स्पष्ट है कि हालात वो नहीं थे जो राहुल देव बता रहे थे. उन्हें प्रबंधन ने निजी तौर पर जाने को कह दिया था, सो वो कई जगहों पर हाथ-पांव मार रहे थे. लेकिन पब्लिकली यह कह रहे थे कि वे सीएनईबी में उनकी कुर्सी यथास्थान अब भी कायम हैं. अंततः जब उनकी सीएनईबी से विदाई की डेडलाइन पूरी हो गई तो उन्होंने अंतिम आप्शन ‘आज समाज’ को चुना. देखना ये है कि भारी भरकम तनख्वाह लेने वाले राहुल देव अब आज समाज में कितने दिन टिक पाते हैं. राहुल देव करीब 32 सालों से मीडिया में हैं.

घटिया ब्रांडों के साथ काम करने के पहले राहुल देव कई बड़े ब्रांडों यथा आज तक, दूरदर्शन, जी न्यूज आदि के साथ काम कर चुके हैं. जनसत्ता अखबार में वे आरई रहे हैं. लेकिन बदले समय के साथ उन्हें समझौता करते हुए छोटे व नए ब्रांडों के साथ एसोसिएट होना पड़ा. कभी वे जनमत चैनल में थे जिसे बंद होना पड़ा था. सीएनईबी में भारी भरकम फौज लाने के बावजूद वे लगभग नाकाम ही रहे. चर्चा है कि आज समाज में राहुल देव का दौर कहीं शुरू होने से पहले ही न बंद हो जाए. हालांकि राहुल देव के बारे में मशहूर यही है कि अखबार या चैनल भले बंद हो जाएं, उनकी नौकरी कहीं न कहीं ठीकठाक पद व पैकेज पर चलती रहती है.

सीएनईबी के सलाहकार संपादक बने किशोर

किशोर मालवीयकिशोर मालवीय सीएनईबी न्यूज चैनल से जुड़ गए हैं. वे सलाहकार संपादक बने हैं. इस तरह सीएनईबी में दो-दो सलाहकार हो गए हैं. आलोक तोमर पहले से ही सलाहकार के रूप में सीएनईबी में काम कर रहे हैं. फर्क बस इतना है कि किशोर मालवीय सीओओ अनुरंजन झा के राज में सलाहकार बने और आलोक तोमर सीईओ राहुल देव के राज में. सूत्रों का कहना है कि किशोर मालवीय की नियुक्ति से यह स्पष्ट होने लगा है कि राहुल देव अब संस्थान में वापसी के मूड में नहीं हैं. वे लंबी छुट्टी पर चले गए हैं.

राहुल देव के छुट्टी पर चले जाने और सीएनईबी के मामले में चुप्पी साध लेने से कई लोग उनके बारे में तरह-तरह की अफवाहें उड़ा रहे हैं. कुछ लोग मेलों के जरिए अनर्गल बातें विभिन्न जगहों पर पहुंचा रहे हैं. पर जानकारों का कहना है कि सीएनईबी मैनेजमेंट से राहुल देव के रिश्ते अच्छे हैं इसलिए राहुल देव के इस्तीफा देने और न देने को दोनों ही पक्ष मुद्दा नहीं बनाना चाहते. विवाद खड़ा किए बगैर स्मूथ ट्रांजीशन के रास्ते को प्रबंधन ने अपनाया है.

सीएनईबी में सलाहकार संपादक के रूप में आज ज्वाइन करने वाले किशोर मालवीय कई महीनों से विभिन्न राज्यों में विभिन्न ग्रुपों से जुड़कर सलाहकार के रूप में काम कर रहे थे. उससे पहले वे वायस आफ इंडिया में ग्रुप एडिटर थे. किशोर मालवीय ने करियर की शुरुआत 1990 में नभाटा, दिल्ली से की. 1997 में वे जी न्यूज से जुड़े. नलिनी के चैनल ‘नेपाल-1’ में हेड आफ न्यूज रहे. इंडिया टीवी में भी अच्छी खासी पारी खेली. इंडिया न्यूज में भी रहे. अनुरंजन और किशोर मालवीय, दोनों लोग इंडिया न्यूज में एक साथ काम कर चुके हैं. सीएनईबी में किशोर मालवीय कंटेंट देखेंगे और एंकरिंग भी करेंगे.

अनुरंजन के खिलाफ सीएनईबी चेयरमैन को चिट्ठी

किसी भी अखबार, चैनल में बदलाव स्वाभाविक नियम होता है. कभी टीम लीडर बदल दिया जाता है तो कभी टीम के सदस्य. सीएनईबी भी बदलाव के दौर से गुजर रहा है. राहुल देव के हाथों सीएनईबी को पूरी तरह सौंपने, उन्हें काम करने-कराने व टीम बनाने की पूरी आजादी देने के कई वर्ष बाद सीएनईबी के मालिकान ने फिर बदलाव का रास्ता पकड़ा है.

राहुल देव से पहले भी सीएनईबी में जो टीम लीडर हुआ करते थे, वे बदले गए, और राहुल देव भी एक न एक दिन बदले जाने थे. हालांकि वे अब भी सीएनईबी में हैं, उनका इस्तीफा नहीं हुआ है. लेकिन उनके लोग हटाए जाने लगे हैं. अपूर्व श्रीवास्तव व श्रीपति पर गाज गिरी है. इन्हें बचाने की कवायद हुई, राहुल देव ने इनके जाने को प्रेस्टीज इशू बनाया. पर संभवतः ये दोनों बच नहीं पा रहे हैं. इन्हें हटाए जाने के आदेश दुबारा आ गए हैं. कई और लोग निशाने पर हैं. अनुरंजन ने हाथ-पांव खोल लिया है अपना. बैटिंग शुरू कर दी है. सो, सीएनईबी में हलचल मची हुई है. अब जब दोनों खेमे आमने-सामने आ चुके हैं तो चरित्र-हनन का खेल भी शुरू हो चुका है. मेलबाजी का दौर प्रारंभ हो गया है.

फिलहाल राहुल देव के लोगों ने सीएनईबी के चेयरमैन को चिट्ठी लिखकर सीएनईबी के हालात व अनुरंजन के चरित्र के बारे में उनको बताया है. संभव है, कल अनुरंजन के लोग सीएनईबी के चेयरमैन को चिट्ठी लिखकर सीएनईबी के अब तक खराब रहे हालात की वजह और राहुल देव के चरित्र के बारे में बताने में जुट जाएं. आज अनुरंजन के खिलाफ सीएनईबी के चेयरमैन को गई चिट्ठी को हम यहां छाप रहे हैं. कल राहुल देव के खिलाफ जाने वाली चिट्ठी को भी हम छापेंगे, अगर प्राप्त हुई तो. पर सबसे मजेदार तथ्य यह है कि सीएनईबी के मालिकान भी चाह रहे हैं कि एक बार दोनों खेमों में जमकर दो-दो हाथ हो ही जाए.

आमतौर पर जब किसी अखबार या न्यूज चैनल में टीम लीडर के स्तर पर  बदलाव होता है तो सब कुछ हफ्ते भर में स्पष्ट हो जाता है. यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि अब किसकी चलेगी. ऐसे में पुराना टीम लीडर खुद ब खुद छोड़कर चला जाता है. उनके लोग भी एक-एक कर इस्तीफा दे जाते हैं. कुछ लोग होते हैं जो निष्ठा पलट कर खुद की कुर्सी बचा ले जाते हैं और नए राज में भी पुराने राज की तरह सुखों का भोग करते रहते हैं.

पर सीएनईबी में सरदार जी लोगों ने दोनों को लालीपाप थमा रखा है. राहुल देव इस्तीफा नहीं दे रहे हैं, अनुरंजन खुद को सीईओ और एडिटर इन चीफ से कम मान नहीं रहे हैं. जो नए डेवलपमेंट हैं, उससे तो पता यही लग रहा है कि अनुरंजन को सरदारजी लोगों का पूरा समर्थन प्राप्त है. लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि सरदार जी लोग राहुल देव से जाने को साफ-साफ क्यों नहीं कह पा रहे हैं या फिर राहुल देव बिना साफ-साफ सरदार जी लोगों के मुंह से सुने चैनल क्यों नहीं छोड़ रहे. अगर राहुल देव को रखना ही है तो उन्हें सीईओ और एडिटर इन चीफ के रूप में रखना चाहिए, जिस रूप में वे रहते आए हैं. फिर अनुरंजन में राहुल देव की शक्तियां क्यों ट्रांसफर कर दी गई हैं. चलिए, इस नूराकुश्ती के ताजा एपिसोड के बारे में जानें. वो पत्र पढ़ें जो सीएनईबी के चेयरमैन को भेजी गई है.

-एडिटर, भड़ास4मीडिया



आदरणीय चेयरमैन सर,

यह पत्र आपको आश्चर्य में भी डाल सकता है और नहीं भी। लेकिन यह हम उन लोगों की चिंता है जो श्री राहुल देव के निमंत्रण और आपकी शुभकामनाओं को साथ ले कर सीएनईबी को एक आदर्श चैनल बनाने में पिछले बहुत समय से लगे हुए है। हमें अच्छा लगता रहा कि हमारे मार्ग दर्शक के तौर पर आपने चैनल को आकार देने में पूरी रचनात्मक आजादी दी और खास तौर पर सिर्फ टीआरपी बटोरने के लिए अपराध और सस्ती लोकप्रियता के कार्यक्रमों से चैनल को दूर रखा। इसी वजह से संसाधनों की कमी के बावजूद चैनल को एक अलग तरीके की प्रतिष्ठा मिली। राहुल देव के तौर पर भारतीय पत्रकारिता का  एक सबसे बड़ा नाम चैनल के साथ था और इससे भी हमारी विश्वसनीयता और बढ़ी।

हाल के दिनों में चैनल में जो हो रहा है उससे हम लोग सिर्फ आहत ही नहीं, चैनल के भविष्य को ले कर काफी चिंतित भी है। चैनल के स्वामी आप है इसलिए फैसला निश्चित तौर पर आपका ही होगा किंतु हम नहीं चाहते कि अब यह चैनल भी दलालों द्वारा चलाया जाने वाला एक और विचारहीन चैनल मान लिया जाए।

जब अनुरंजन झा को चैनल में लाया गया था तो हममें से सब को उम्मीद बंधी थी कि आप प्रशासन और आमदनी के पक्ष की ओर भी सोच रहे हैं और इससे सबका भला होने वाला है। खुद श्री झा ने अलग अलग पोर्टलों और वेबसाइटों पर कहा था कि वे आपकी आज्ञा से राहुल देव के हाथ मजबूत करने आए हैं।

मगर जो हो रहा है उससे जो कहा गया था, उसका जरा भी आभास नहीं मिल रहा। हमे नहीं मालूम कि पता नहीं कब अनुरंजन झा संपादकीय मामलों के भी जिम्मेदार हो गए और अपनी मर्जी से लोगों को भर्ती करने और निकालने लगे? क्या श्री राहुल देव को प्रधान संपादक और सीईओ के पद और जिम्मेदारियों से मुक्ति दे दी गई थी? महाखबर के बहाने बहुत सारे महत्वपूर्ण लोग चैनल से जुड़े मगर अब तो हालत यह है कि उस अयोध्या फैसले पर हमारे यहां कोई कार्यक्रम नहीं गया जिसका स्वागत देश के हर वर्ग ने किया है। हमें यह कहने की अनुमति दीजिए कि हमारी इस एक गलती ने हमारी प्रतिष्ठा को बहुत चोट पहुंचाई है।

श्री अनुरंजन झा की कोई तो प्रतिभा होगी जिससे आप प्रभावित हुए होंगे। मगर जहां जहां उन्होंने काम किया है, वहां से पता लगा कर देखिए या किसी को जिस पर आप विश्वास करते हों, पता लगाने के लिए नियुक्त करिए तो आप जान पाएंगे कि श्री झा पर ब्लैकमेलिंग से ले कर प्रबंधन के खिलाफ बगावत करने तक के आरोप लग चुके हैं। हमारे चैनल में जहां हम सब आपके नेतृत्व में एक परिवार की तरह रह रहे थे वहां वरिष्ठ महिला सहयोगियों के साथ भी अब अमानवीय व्यवहार होने लगा है। चैनल में काम करने वाली महिलाएं भी इससे आहत और आतंकित हैं।

श्री झा पत्रकारिता का कितनी रुचि रखते हैं इसका उदाहरण ये ही है कि इस बिहार चुनाव में भी उन्होंने टिकट मांगा था और उनका कहना है कि आखिरकार तो उन्हें राजनीति में ही जाना है। आप इसकी पुष्टि बिहार के राजनेताओं और खासतौर पर जनता दल यूनाइटेड के अलावा कांग्रेस के नेताओं से भी कर सकते हैं। पत्रकारिता में उनकी छवि के बारे में आप खुद जिन्हे उचित समझे उनसे उनके बारे में पूछ सकते हैं। एस-1 चैनल से इन्हे निकाला ही ब्लैकमेलिंग के आरोप में गया था। और इसकी पुष्ठि आप एस-1 के मालिक विजय दीक्षित से कर सकते हैं… उनका मोबाइल नंबर 9811057970 है। इंडिया न्यूज जहां से भी इन्हें निकाला गया और अब वहां से बर्खास्त लोगों को सीएनईबी को कूड़ेदान समझकर पटका जा रहा है वहां श्री झा की प्रतिष्ठा कितनी है इसके लिए इस चैनल के मालिक कार्तिकेय शर्मा से 9910116669 पर बात की जा सकती है।

हम ने आपके साथ सपना देखा कि हमारे चैनल को समाज में आदर और विश्वास मिले और उस दिशा में हम काफी सीमा तक कामयाब भी हुए। और इसकी वजह कोई और नहीं राहुल देव का नाम है। जो प्रतिष्ठा पद और कद के अलावा ज्ञान में समकालीन पत्रकारिता में सबसे आगे माने जाते हैं। अब भी मीडिया बाजार में बात करिए तो हमारे चैनल को लोग राहुल देव वाला चैनल कह कर ही पहचानते हैं।

आप बड़े हैं इसलिए हम आपसे ही दिशा मिलने की उम्मीद करते हैं कि हमें अपने चैनल और पत्रकारिता के प्रति अपनी निष्ठा का ध्यान रखना चाहिए या  एक घोषित दलाल की हर बात मान लेनी चाहिए। यह दूसरा विकल्प हमें काफी कठिन महसूस हो रहा है फिर भी हम  नियमानुसार काम कर रहे हैं। सीएनईबी में काम करना हमारे लिए सिर्फ रोजगार नहीं है। हम पहले काम कर रहे थे बड़े चैनलों में काम कर रहे थे और काम तो हमे मिल ही जाएगा। जिस वाहे गुरु ने जन्म दिया है उसकी कृपा और अपनी क्षमता पर हमारी पूरी आस्था है।

चैनल आपका है। फैसला आपका होगा। लेकिन जिस दिशा में चैनल जा रहा है उसका भविष्य बहुत अच्छा नहीं लग रहा है और यही हमारी चिंता है। आपसे सवाल करने की हमारी हैसियत नहीं है लेकिन आप खुद अपने आप से सवाल करना चाहे तो पूछ सकते हैं। कहां क्या गलत हुआ है और क्या उसे सुधारा नहीं जा सकता। हम आपके साथ हैं और हमें पूरा विश्वास है कि आपका आशीर्वाद भी हमारे साथ हमेशा बना रहेगा।

(पत्र लेखकों का नाम नहीं दिया जा रहा है. मेल व पत्र की मूल प्रति भड़ास4मीडिया के पास सुरक्षित है)

सीएनईबी में ”राहुल राज” था कब?

आलोक तोमरअचानक सीएनईबी टीवी चैनल की इतनी ज्यादा चर्चा होने लगी है कि अगर यह चर्चा पहले से होती रहती तो चैनल की टीआरपी कुछ और बढ़ जाती। इस खबर का शीर्षक दिया गया है कि सीएनईबी में राहुल राज का खात्मा हो रहा है। शीर्षक आपत्तिजनक भले ही न हो मगर पत्रकारिता के संदर्भों को दूसरी ओर मोड़ कर ले जाता हैं।

सीएनईबी में राहुल राज था कब? आखिर एक टीवी चैनल में या किसी भी पत्रकारिता संस्थान में एक संपादक होता है और वह नेतृत्व करता है। राहुल देव ने भी नेतृत्व किया मगर राज तो उनका था और उनका है जिन्होंने इस चैनल में निवेश किया है और घाटा सह कर भी तीन साल चलाया है। बंद करने का उनका कोई इरादा नहीं हैं और अनुरंजन झा को लाया ही इसलिए गया है कि उनकी प्रतिभा से चैनल को चलाने में साधनों और संसाधनों का विकास हो सके। वैसे आप जानते हैं कि अनुरंजन झा पत्रकार भी हैं और कम से कम उन्होंने अभी तक राहुल देव के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा है।

आपको सीएनईबी में काम करने वाले किसी पत्रकार की टिप्पणी उसके असली नाम से नहीं मिलने वाली है। लेकिन मैं डंके की चोट लिख रहा हूं कि सीएनईबी और राहुल देव का साथ कभी किसी संशय में नहीं रहा। न सीएनईबी चलाने वाले पहली बार रोजगार कर रहे हैं और न राहुल देव पहली बार किसी मीडिया समूह का नेतृत्व कर रहे है। रही बात नए लोगों के आने की तो वे हर चैनल में आते जाते रहते हैं और इस पर खबर तो बनती है मगर विश्लेषण का इतना लंबा चौड़ा आयाम नहीं बनता। खबर में लिखा गया है कि राहुल देव के करीबी अपूर्व और पंकज शुकल ऑफिस नहीं आ रहे। मुद्रा कुछ ऐसी है कि या तो इनको निकाला जा रहा है या फिर ये विरोध में छुट्टी पर हैं। अपूर्व लगातार आ रहे हैं, पंकज शुक्ल ने एक दिन बीमारी की वजह से छुट्टी ली थी और कामाक्षी लगातार काम कर रही है।

और फिर आप अगर सीएनईबी की तुलना एस वन जैसे धोखेबाज चैनल या आजाद न्यूज जैसे अदृश्य चैनल या वाइस ऑफ इंडिया जैसे ठग चैनल से करेंगे तो सीएनईबी की ओर से कम से कम मेरा ऐतराज दर्ज कर लीजिए। मै कोई पट्टा लिखवा कर नहीं आया हूं और हो सकता है कि कल आप मुझे भी सीएनईबी में न पाए लेकिन इसके पीछे बहुत सारी कहानियां बनाना नादानी हैं और यशवंत सिंह आप इस नादानी से बचिए।

अनुरंजन झा की प्रतिभा और अतीत से सब परिचित है। उसे बार बार याद दिलाने से आपका या भारतीय पत्रकारिता का कोई लाभ नहीं होने वाला। जहां तक मुझे पता है, अनुरंजन झा आपके निजी मित्र भी हैं और इसके बावजूद आपको उनके बारे में अगर सूत्रों के हवाले से लिखना पड़े तो ऐसी दोस्ती पर खाक डालिए। प्रतिक्रियाओं में जैसा कि होता है, कुछ लोग राहुल देव को कोस रहे हैं तो कुछ अनुरंजन झा को। उनके पास अपने अपने कारण होंगे।

राहुल देव के बारे में, उन्हें लगभग पच्चीस साल से जानने के बाद उनके बारे में लिखने के लिए मेरे पास बहुत सारे कारण है मगर विस्तार में नहीं जाऊंगा। हिंदी और अंग्रेजी दोनों पर और वह भी शानदार अधिकार से लिखने और बोलने वाले पत्रकारों में राहुल देव जैसे कम ही मिलेंगे। इसके बावजूद वे हिंदी को लेकर लगभग आंदोलन की मुद्रा में जूझते रहते हैं और छोटी सी गोष्ठी से लेकर वॉशिंगटन के सेमिनार तक में जाने में उन्हें कोई दिक्कत महसूस नहीं होती। चरित्र पर लांछन आज तक लगा नहीं, कोई घोटाला घपला किया नहीं मगर यदि सीएनईबी में पैसा लगाने वालों को अनुरंजन झा में संभावना दिखती है तो इसमें भाई लोगों को तकलीफ क्यों हो रही है?

सीएनईबी में राहुल देव के रहते अभिव्यक्ति का एक लोकतंत्र सदा से मौजूद है और अगर आपकी कल्पना की उड़ान आपको यह कहने पर विवश करती है कि हमारे राजनैतिक संपादक प्रदीप सिंह को आने वाले दिनों का आभास हो गया था इसलिए छोड़ कर चले गए तो आप गलत कह रहे हैं। वे अनुरंजन के आने के पहले ही जा चुके थे और अच्छे पद पर और अच्छी संभावनाओं के साथ गए थे। अपूर्व, पंकज और कामाक्षी कोई नौसिखिए नहीं हैं और काम जानते हैं और जिन्हें अपना चैनल ठीक से चलाना होगा उनके यहां अगर इन्हें जरूरत पड़ी तो पर्याप्त जगह है।

और अगर आपको तुलनात्मक अध्ययन करना ही है तो इतना तो ज्ञान होगा ही कि आयु, प्रतिभा, अनुभव और दृष्टि के हिसाब से राहुल देव और अनुरंजन झा के बीच तुलना करके आप दोनों के साथ अन्याय कर रहे हैं और दोनों का अपमान कर रहे हैं। अनुरंजन और राहुल देव एक दूसरे के कपडे सरेआम नहीं फाड़ रहे हैं। राहुल देव को अगर कोई तकलीफ है भी तो उसे वे विलाप का विषय नहीं बना रहे हैं। मामले में सुलझने के लिए अगर कुछ बचा है तो उसे सीधे मालिकों से सुलझाने की कोशिश की जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि राहुल देव पत्रकारिता के अपने सरोकारों से समझौता नहीं नहीं करना चाहते। अपनी शैली पर और अपनी शर्तों पर कायम रहना चाहते हैं। और शायद इसी बात पर सीएनईबी से कुढ़ने वालों को तकलीफ हो रही है। रही मालिकों की बात तो, ये उन पर निर्भर है कि उन्हें क्या पसंद है, कैसी पत्रकारिता चाहिए, और उनकी राय में कौन महान है और कौन मामूली। चैनल उनका है, फैसला भी वे करेंगे और नतीजे भी उनके हिस्से आयेंगे। बाज़ार में अमिताभ बच्चन भी हैं और शक्ति कपूर भी–पसंद अपनी अपनी।

यह हमारा मामला है, हमे जैसे सुलझाना होगा, सुलझा लेंगे और नहीं सुलझा तो बहुत सारे विकल्प खुले हैं लेकिन अगर लोगों ने अपनी कुंठाए जाहिर करना शुरू किया तो फिर नाम लेकर सामने आएं और उन्हें उनकी जन्मपत्री सहित जवाब मिलेगा।

लेखक आलोक तोमर जाने-माने पत्रकार हैं और सीएनईबी न्यूज चैनल से जुड़े हुए हैं.

राहुल देव को रिपोर्ट करेंगे अनुरंजन

सीएनईबी न्यूज चैनल में चीफ आपरेटिंग आफिसर के पद पर ज्वाइन करने वाले पत्रकार अनुरंजन झा चैनल के चेयरमैन की बजाय चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ राहुल देव को रिपोर्ट करेंगे. इसकी पुष्टि खुद राहुल देव ने भड़ास4मीडिया से बात करते हुए की. भड़ास4मीडिया के संपर्क करने पर आज राहुल देव ने जो कुछ कहा, वह इस प्रकार है-

”अनुरंजन ने सीओओ के पद पर ज्वाइन कर लिया है. उन्हें स्पेसिफिक जिम्मेदारी दी गई है. कास्ट सेविंग, बिजनेस डेवलपमेंट, आपरेशन, वेहिकल मैनेजमेंट आदि एरियाज में वे कार्य करेंगे. खर्चा घटाने की कहां-कहां गुंजाइश है, वे उसको देखेंगे. निश्चित जिम्मेदारियां निभाएंगे. अनुरंजन मुझे असिस्ट करेंगे. साथ ही, वे रिपोर्ट भी मुझे ही करेंगे. मुझे विश्वास है कि अनुरंजन के अनुभव का हर तरह का लाभ चैनल को मिलेगा. मैं उनके सफल होने की कामना करता हूं.”

उल्लेखनीय है कि कल सीएनईबी ज्वाइन करने के बाद भड़ास4मीडिया द्वारा एसएमएस के जरिए संपर्क किए जाने पर अनुरंजन झा ने जवाब दिया था कि वे सीधे कंपनी के चेयरमैन को रिपोर्ट करेंगे. उधर, पता चला है कि अनुरंजन का न्यूज सेक्शन में कोई दखल नहीं होगा. वे विशुद्ध रूप से मार्केटिंग के काम देखेंगे. एक तरह से कहा जाए तो अनुरंजन ने अपने करियर में एक नया प्रयोग किया है और नई चुनौती स्वीकारी है.

अनुरंजन के आने के बाद सीएनईबी के अंदर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं. मीडिया इंडस्ट्री में भी कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सीएनईबी प्रबंधन अनुरंजन झा को बड़े पद पर लाकर पावर बैलेंस की रणनीति पर काम कर रहा है ताकि अंदरखाने चलने वाली हर गतिविधि की खबर उन तक पहुंचे.

उधर, कुछ का कहना है कि अनुरंजन ने कंपनी के चेयरमैन को बिहार चुनाव समेत कई आयोजनों के जरिए अच्छा बिजनेस दिलाने का वादा किया है और इसके लिए एक तय समयसीमा रखी गई है. प्रबंधन ने अनुरंजन के दावे को आजमाने के लिए उन्हें एक निश्चित समय तक मौका दिया है. जो भी हो, पर अनुरंजन ने सीओओ पद पर सीएनईबी में ज्वाइन करके साबित कर दिया है कि वे तमाम तरह के विरोधों व विवादों के बावजूद मेन स्ट्रीम मीडिया में शीर्ष पद हासिल करने की क्षमता रखते हैं.

सत्य वचन नहीं है राहुल देव का कथन

एसएन विनोद: पत्रकारिता नहीं, पत्रकार बिक रहे-2 : यह ठीक है कि आज सच बोलने और सच लिखने वाले उंगलियों पर गिने जाने योग्य की संख्या में उपलब्ध हैं। सच पढ़-सुन, मनन करने वालों की संख्या भी उत्साहवर्धक नहीं रह गई है। समय के साथ समझौते का यह एक स्याह काल है। किन्तु यह मीडिया में मौजूद साहसी ही थे जिन्होंने सत्यम् घोटाले का पर्दाफाश कर उसके संचालक बी. रामलिंगा राजू को जेल भिजवाया।

आईपीएल घोटाले का पर्दाफाश भी मीडिया के इसी साहसी वर्ग ने किया। आईपीएल को कारपोरेट जगत से जोड़ कर ही देखा जा रहा है। इसमें राजनेताओं के साथ-साथ ललित मोदी और उद्योगपति शामिल हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को खतरनाक रूप से नुकसान पहुंचाने वाले कालेधन के इस्तेमाल के आरोप आईपीएल की टीमों में निवेश करने वालों पर लग रहे हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब मीडिया ने कारपोरेट जगत के गोरखधंधों का पर्दाफाश किया है, इसलिए राजदीप सरदेसाई की बातों से पूरा सहमत नहीं हुआ जा सकता। कारपोरेट को एक्सपोज नहीं करने के पीछे की ताकतों के सामने समर्पण करने या रेंगने वाले पत्रकार निज अथवा किसी अन्य के स्वार्थ की पूर्ति करते हैं। पत्रकारीय मूल्यों का सौदा करने से ये बाज नहीं आते।

विडम्बना यह है कि ऐसे पत्रकार रसूखदार हैं, व्यापक सम्पर्क वाले हैं। बड़ी संख्या है इनकी। अपनी संख्या और प्रभाव के बल पर ईमानदार, साहसी पत्रकारों की आवाज को ये दबा देते हैं। चूंकि इनकी मौजूदगी प्राय: सभी बड़े मीडिया संस्थानों में उच्च पदों पर है, ये अपनी मनमानी करने में सफल हो जाते हैं। राजदीप की यह बात बिल्कुल सही है कि आज के युवाओं में काफी संभावना है लेकिन जब वह देखता है कि उसके ‘रोल माडल्स’ गलत हैं तो वह कुछ समझ नहीं पाता। नि:संदेह आज के युवा पत्रकारों में वह चिंगारी मौजूद है जिसे अगर सही दिशा में सही हवा मिल गई तो वह आग का रूप धारण कर इन कथित ‘रोल माडल्स’ को जला कर भस्म कर देगी। अब यक्ष प्रश्न यह कि इस वर्ग को ऐसी ‘हवा’ उपलब्ध करवाने के लिए कोई तैयार है?

पिछले दिनों राजनेताओं और कार्पोरेट जगत के बीच सक्रिय देश की सबसे बड़ी ‘दलाल’ नीरा राडिया के काले कारनामों को मीडिया के एक वर्ग ने उजागर किया था। इस दौरान मीडिया के 2 बड़े हस्ताक्षर बरखा दत्त और वीर सांघवी के नाम भी राडिया के साथ जोड़े गए। दस्तावेजी सबूतों से पुष्टि हुई कि बरखा और वीर ने अपने संपर्कों के प्रभाव का इस्तेमाल कर दलाल राडिया के हित को साधा। एवज में इन दोनों को राडिया ने ‘खुश’ किया। बरखा और वीर दोनों युवा पत्रकारों के ‘रोल माडल’ हैं। भारत सरकार के पद्म अवार्ड से सम्मानित इन पत्रकारों के बेनकाब होने के बाद भी बड़े अखबारों और बड़े न्यूज चैनलों की चुप्पी से पत्रकारों का युवा वर्ग स्वयं से सवाल करता देखा गया। वे पूछ रहे थे कि मीडिया ने बरखा व वीर के कारनामों को वैसा स्थान क्यों नहीं मिला जैसा ऐसे समान अपराध के दोषी अन्य दलालों को मिलता आया है। मीडिया के इस दोहरे चरित्र से युवा वर्ग संशय में है।

मीडिया यहीं चूक गया। अवसर था जब युवा वर्ग में मौजूद चिंगारी को हवा दे उस आग को पैदा किया जाता जो बिरादरी में मौजूद काले भेडिय़ों को तो झुलसा देती किन्तु व्यापकता में मीडिया तप कर कुन्दन बन निखर उठता। यह तो एक उदाहरण है, ऐसे अवसर पहले भी आए हैं और आगे भी आएंगे जब मीडिया की परीक्षा होगी। राहुल देव कार्पोरेट सेक्टर की ताकत के सामने असहाय दिखे। मीडिया को कार्पोरेट सेक्टर का प्राकृतिक हिस्सा निरूपित करते हुए राहुल देव यह मान बैठे हैं कि मीडिया चाह कर भी इससे बाहर नहीं निकल सकता।

राहुल देव का यह निज अनुभव आधारित मन्तव्य हो सकता है किन्तु यह पूर्ण सत्य नहीं है। हिन्दी के सर्वाधिक प्रसारित 2 बड़े अखबार ‘दैनिक जागरण’ व ‘दैनिक भास्कर’ तथा 2 बड़े न्यूज चैनल ‘आज तक’ और ‘इंडिया टीवी’ उदाहरण स्वरूप मौजूद हैं। इनका पाश्र्व वह ‘कार्पोरेट’ नहीं रहा है जिसकी चर्चा हम कर रहे हैं। इन संस्थानों ने अपनी व्यवसाय कुशलता और कंटेंट के कारण विशाल पाठक व दर्शक वर्ग तैयार किए। इनकी विशिष्ट पहचान बनी। आर्थिक रूप से मजबूत भी हुए ये। अब भले ही इन्हें ही कार्पोरेट जगत में शामिल कर लिया जाए किन्तु इनकी उपलब्धियां कार्पोरेट पाश्र्व के कारण कतई नहीं हैं। इन चार समूहों को आक्सीजन मिला तो पाठकों व दर्शकों द्वारा।

…जारी… (इससे पहले का पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें- पार्ट 1)

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं.

‘विधवा विलाप’ न करें : राहुल देव

: पसीना पोछता समाजवादी पत्रकार और एसी में जाते कारपोरेट जर्नलिस्ट : परिचर्चा ने बताया- फिलहाल बदलाव की गुंजाइश नहीं : जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा : कॉरपोरेट जगत अपनी मर्जी से मीडिया की दशा और दिशा तय करता रहेगा :

11 जुलाई को सुप्रसिद्ध पत्रकार स्वर्गीय उदयन शर्मा का जन्म दिन था। हर साल की तरह इस साल भी ‘संवाद 2010’ के तहत एक परिचर्चा ‘लॉबिंग, पेड न्यूज और समकालीन पत्रकारिता’ का आयोजन किया गया था। इस परिचर्चा में देश के कई जाने-पहचाने पत्रकार दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में जुटे और अपने विचार रखे। इस तरह से कार्यक्रमों की विशेषता यह होती है कि वक्ता और श्रोता किसी न किसी रूप में मीडिया से जुड़े लोग ही होते हैं। ऐसे अवसरों पर मीडिया के लोग अपने आप को कसौटी पर कसते हैं। लेकिन कभी भी कसौटी पर खरे नहीं उतरते। दरअसल, जो पत्रकार ऐसे आयोजनों में शामिल होते हैं, वे ‘आजाद’ नहीं होते बल्कि मालिकों के ‘नौकर’ होते हैं। कल हुई परिचर्चा में यही बात उभर कर सामने आयी। और कल क्यों, जब भी कहीं पत्रकारिता के गिरते स्तर की बात होती है, यही बात सामने आती है।

‘सीएनईबी’ के राहुल देव ने कल कुछ भी नहीं छिपाया। उन्होंने साफ कहा कि ‘पत्रकारिता के स्तर की बात हो तो अखबारों और चैनलों के मालिकों की भी भागीदारी होनी चाहिए। और मालिक लोग कभी यहां पर आएंगे नहीं।” मतलब साफ था कि पत्रकार अखबार या चैनल को उसी तरह से चलाने के लिए मजबूर हैं, जैसा मालिक चाहते हैं। उन्होंने साफ कहा कि ‘विधवा विलाप’ करने का कोई फायदा नहीं है।

इस परिचर्चा में सीएनएन-आईबीएन के राजदीप सरदेसाई भी वक्ता के रूप में मौजूद थे। वह पत्रकार होने के साथ-साथ मालिक भी हैं। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट जगत को माइनस करके अखबार और चैनल नहीं चलाए जा सकते। उन्होंने एक उदहारण देकर कहा कि ‘उनके एक चैनल ने एक कॉरपोरेट घराने के खिलाफ कैम्पेन चलाई। इसके नतीजे में उस कॉरपोरेट ने हमारे सभी नेटवर्क के चैनलों से अपने विज्ञापन वापस ले लिए।’

मतलब साफ है कि मीडिया कॉरपोरेट जगत के खिलाफ जाएगा तो चैनलों और अखबारों पर ताले लटक जाएंगे। ऐसे में भला मीडिया उन सत्तर प्रतिशत लोगों की बात क्यों करे, जो रोजाना पन्द्रह से बीस रुपए रोज पर अपना गुजारा करने के लिए मजबूर हैं। मीडिया को कॉरपोरेट जगत के हितों की बात करनी ही होगी।

‘नई दुनिया’ के प्रधान सम्पादक आलोक मेहता ने कहा कि मीडिया पर हमेशा से दबाव रहा है। उन्होंने पटना की एक घटना का जिक्र करते हुआ बताया कि जब हमने ‘नवभारत टाइम्स’ में पशुपालन घोटाला की खबर छापी तो लालू यादव ने हमारे ऑफिस में आग लगवा दी थी। उन्होंने कहा कि हमारा काम खबर छापना है, हमें हर हाल में इस काम को जारी रखना होगा। उनका कहना था कि आज ही नहीं, पहले भी मीडिया पूंजीपतियों के हाथों में रहा है। उन्होंने बीसी वर्गीज और एचके दुआ का उदाहरण देकर कहा कि मालिकों से अलग हटकर चलने पर सम्पादकों को सड़कों पर ही बर्खास्त किया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि ‘अखबार का मालिक अखबार चलाने के लिए कहां से पैसा लाता है, सम्पादक को इससे कोई मतलब नहीं होता।’

आईबीनएन-7 के मैनेजिंग एडीटर आशुतोष ने कहा कि पेड न्यूज सिर्फ वही नहीं, जो पैसे लेकर छापी जाती है। उन्होंने किसी विचारधारा के तहत लिखी गयी खबर को भी पेड न्यूज जितना ही गलत बताया। यहां यह बात बताना भी प्रांसगिक है कि जब भी किसी सेमिनार में आशुतोष मौजूद रहे हैं, अक्सर समाजवादी पत्रकारिता की बात करने वाले लोगों से उनकी बहस होती रही है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। लेकिन उन्होंने समाजवादी पत्रकारिता की बात करने वालों पर यह कहकर कटाक्ष किया कि समाजवाद की बात करने वाले पत्रकारों के दिल में भी क्या यह नहीं होता कि दिग्विजय सिंह कहीं कोई बंगला दिलवा दें?

‘दैनिक भास्कर’ समूह के श्रवण गर्ग का कहना था कि खराब अखबार निकालने का दोष मालिकों पर मढ़ना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को ऐसे कामों से बचना चाहिए, जिससे पाठकों में उसकी इमेज खराब हो। उन्होंने आलोचना को ज्यादा जगह देने की बात कही। उनके विचार से किसी भी कानून से ज्यादा जनता और पाठक की नजर हालात को सही करने में अपनी भूमिका निभा सकती है। उनका कहना था कि कानून बन जाएगा तो पेड न्यूज का सिलसिला दूसरे रास्तों से शुरू हो जाएगा।

पुण्य प्रसून बाजपेयी का कहना था कि पत्रकारिता अब खुलेआम बिक रही है. पत्रकारिता की बिक्री से निपट पाना बहुत मुश्किल हो गया है. पेड न्यूज के लिए और कोई नहीं बल्कि कॉरपोरेट जगत प्रमुख रूप से जिम्मेदार है. राजनीति और मीडिया, दोनों ही क्षेत्र इसके प्रभाव में हैं.

परिचर्चा में बतौर मुख्य अतिथि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि कानून की दीवार बना देने से कुछ नहीं होगा। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज के लिए सिर्फ पत्रकार ही जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए राजनीति भी जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि मुझसे खबर के बदले पैसों की डिमांड किसी अखबार या पत्रकार ने नहीं की।

कुल मिलाकर परिचर्चा में यह बात उभर सामने आयी कि फिलहाल बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है। जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा। कॉरपोरेट जगत अपनी मर्जी से मीडिया की दशा और दिशा तय करता रहेगा। परिचर्चा में ‘जी न्यूज’ के सलाहकार सम्पादक पुण्य प्रसून वाजपेयी, जी न्यूज के सम्पादक सतीश के सिंह, ‘प्रथम प्रवक्ता’ के रामबहादुर राय, इमेज गुरु के दिलीप चेरियन ने भी अपने विचार रखे। संचालन ‘नई दुनिया’ के राजनीतिक सम्पादक विनोद अग्निहोत्री ने किया। इनके अलावा ‘न्यूज 24’ के अजीत अंजुम, एचके दुआ, ‘इंडिया न्यूज’ के कुरबान अली, उर्दू साप्ताहिक ‘नई दुनिया’ के सम्पादक शाहिद सिद्दीकी, ‘चौथी दुनिया’ के प्रधान सम्पादक संतोष भारतीय, सुमित अवस्थी, पारांजय गुहा ठाकुरता, अमिताभ सिन्हा, विनीत कुमार, अविनाश सहित कई लोग थे।

अंत में कॉरपोरेट मीडिया और समाजवादी मीडिया का अंतर भी समझ लीजिए। परिचर्चा के बाद जब मैं, मेरे साथ आए धर्मवीर कटोच और मदनलाल शर्मा कांस्टीट्यूशन क्लब के बाहर निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन जाने के लिए बस स्टॉप पर बस का इंतजार कर रहे थे, वहीं एक समाजवादी पत्रकार भी पसीना पोंछते हुए बस की इंतजार में थे। दूसरी ओर कॉरपोरेट मीडिया के लोग शानदार एसी कारों में बैठकर जा रहे थे। शायद इसीलिए आशुतोष समाजवादी पत्रकारिता से लगभग नफरत और कॉरपोरेट मीडिया से प्यार करते हैं। आशुतोष एसी न्यूज रूम में बैठकर नक्सवादियों को इसलिए कोस सकते हैं क्योंकि सलीम अख्तर सिद्दीकीउनको कोसने से विज्ञापन जाने का डर नहीं होता। लेकिन यदि वे आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को हथियाने वाले पूंजीपतियों के खिलाफ कुछ कहेंगे तो उनके चैनल के विज्ञापन बंद हो जाएंगे। राजदीप सरदेसाई भी तो यही कह रहे थे। आशुतोष भला राजदीप सरदेसाई के खिलाफ कैसे जा सकते हैं? आखिर आशुतोष उनके चैनल में ही तो काम करते हैं।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीक़ी हिंदी के सक्रिय ब्लागर, सिटिजन जर्नलिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उदयन शर्मा से बेहद प्रभावित सलीम मेरठ में निवास करते हैं. विभिन्न विषयों पर वे लगातार लेखन करते रहते हैं.

‘चोर गुरु’ दिखाने पर राहुल देव को सम्मन

सीएनईबी न्यूज चैनल पर पिछले दिनों प्रसारित किए गए ‘चोर गुरु’ कार्यक्रम की एक कड़ी में दिखाए गए डा. अनिल कुमार उपाध्याय ने सीएनईबी न्यूज चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ राहुल देव के खिलाफ कोर्ट में मामला दायर कर दिया है. बनारस स्थित काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के अध्यापक डा. अनिल कुमार उपाध्याय द्वारा दायर मामले को अदालत ने स्वीकार करते हुए राहुल देव को सम्मन जारी किया है.

राहुल देव को 19 मार्च को अदालत में उपस्थित होने को कहा है. राहुल देव को आईपीसी की धारा 500 और 501 के तहत दोषी बताते हुए यह मुकदमा दायर किया गया है. अनिल ने दायर याचिका में कहा है कि चोर गुरु कार्यक्रम के जरिए संजय देव व कृष्णमोहन सिंह ने वरिष्ठ लेखकों को अपमानित व ब्लैकमेल करने का अपराध किया है. जो लोग इनकी धमकियों में नहीं फंसते, उन्हें ‘चोर गुरु’ बताकर पेश कर दिया जाता. ज्ञात हो कि सीएनईबी पर ‘चोर गुरु’ कार्यक्रम में डा. अनिल कुमार उपाध्याय के एपिसोड का प्रसारण पिछले साल 27 दिसंबर को किया गया था.

इस घटनाक्रम के बारे में राहुल देव का कहना है कि उनके पास एक लीगल नोटिस आया था, जिसका उन्होंने जवाब भिजवा दिया है. सम्मन के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. राहुल देव के मुताबिक हम लोग शिक्षा में पवित्रता का जो अभियान चला रहे थे, उसे आगे भी चलाएंगे. हम लोगों ने जो कुछ दिखाया, उसके सुबूत हमारे पास हैं. अगर किसी को लगता है कि उसके साथ गलत हुआ है तो उसे अपनी बात रखने का अधिकार है.

राहुल देव को पितृ शोक, श्रद्धांजलि सभा आयोजित

चिन्मय मिशन में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में गीता के श्लोकों की व्याख्या करते विद्वान.

सीएनईबी न्यूज चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ राहुल देव के पिता श्री ओमप्रकाश जी का बीते दिनों निधन हो गया। वे काफी समय से अस्वस्थ चल रहे थे। निधन पर एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन लोधी रोड स्थित चिन्मय मिशन पर किया गया। एक घंटे चली श्रद्धांजलि सभा में दिल्ली के अखबारों और न्यूज चैनलों के दिग्गज पत्रकारों ने भाग लिया। इस मौके पर चिन्मय मिशन से जुड़े विद्वानों ने जीवन-मृत्यु, हर्ष-विषाद, आत्मा-परमात्मा आदि मसलों पर उपस्थित लोगों को समझाने की कोशिश की। गीता के श्लोकों और हिंदू ग्रंथों में कही गई बातों के आधार पर कर्म और जीवन में शुचिता, सहृदयता व संत स्वभाव धारण करने का सभी से अनुरोध किया गया। शोक सभा में चिन्मय मिशन के विद्वानों ने समझाया कि दुखों का कारण तुलना करना है। इसका निवारण सच को स्वीकार करना है।

श्रद्धांजलि सभा में आज तक न्यू चैनल के हेड कमर वहीद नकवी, चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय, नई दुनिया के विनोद अग्निहोत्री, जी न्यूज की अलका सक्सेना, पत्रकार मुकेश कुमार, वीरेंद्र मिश्र, प्रदीप सिंह, ओंकारेश्वर पांडेय, अनुराग बत्रा, यशवंत सिंह समेत करीब 100 लोग मौजूद थे।

चिन्मय मिशन में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में शामिल लोग.

टीआरपी के लिए ‘हथकंडे’ नहीं अपनाएंगे : राहुल देव

राहुल देवसीएनईबी न्यूज चैनल के एक साल पूरे हो गए। वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव के नेतृत्व में सीएनईबी टीम ने इस मौके को बिलकुल अलग तरीके से सेलीब्रेट किया। चैनल ने देश के विभिन्न शहरों में अलग-अलग क्षेत्रों के जाने-माने लोगों से लाइव बातचीत का प्रसारण किया। बातचीत का विषय था कि ”प्रजातंत्र : हम, आप और मीडिया” (इस परिचर्चा की विस्तृत रिपोर्ट नीचे देखें)। चैनल के एक साल पूरे होने पर भड़ास4मीडिया ने राहुल देव से बातचीत की। सीएनईबी के सीईओ और एडिटर इन चीफ राहुल देव ने बताया कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती न्यूज चैनल से अच्छे लोगों को जोड़ने की थी जिसमें काफी हद तक सफलता मिली है।

राहुल देव के मुताबिक- ”हमने अच्छे लोगों को लाने और उनके सही इस्तेमाल की कोशिश की है और यह प्रक्रिया जारी है।” चैनल को आगे बढ़ाने के लिए अर्थात ज्यादा टीआरपी हासिल करने के लिए रणनीति के सवाल पर राहुल देव कहते हैं- ‘हम टीआरपी पाने के लिए कोई हथकंडा नहीं अपनाएंगे। हमारी घोषित नीति है कि हम अपराध, सेक्स और भूत-प्रेत पर आधारित कार्यक्रम नहीं दिखाएंगे। हम कंटेंट के आधार पर आगे बढ़ना चाहते हैं, हथकंडों के बूते नहीं। हम अपनी मर्यादा में रहते हुए अपनी कल्पनाशीलता से रेटिंग के लिए कोशिश करेंगे। हम आम लोगों तक अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं।’ ज्ञात हो, सीएनईबी न्यूज चैनल ने अभी कुछ महीने पहले ही खुद को टैम (टेलीविजन आडियेंस मीजरमेंट) में टीआरपी के लिए रजिस्टर्ड कराया है और इस चैनल ने एक फीसदी मार्केट शेयर हासिल करने में सफलता पा ली है।

सीएनईबी के कार्यक्रम 'लक्ष्य लोकसभा' के लिए प्रचार अभियानचुनाव पर किस तरह के प्रोग्राम दिखा रहे हैं? इस सवाल पर राहुल देव ने बताया- ” हम चुनाव में ‘लक्ष्य लोकसभा’, ‘प्रधानमंत्री कौन’ सहित कई कार्यक्रम चला रहे हैं। ‘वोट यात्रा’ के जरिए हम गांव के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने और संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी कोशिश है कि आम आदमी की सोच को हम राजनीति का हिस्सा बनाएं। ‘माननीय बाहुबली’ नामक कार्यक्रम में अपराधी छवि के उम्मीदवारों का कच्चा चिठ्ठा लोगों के सामने रख रहे हैं।” चैनल को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम की मजबूती के सवाल पर सीएनईबी के सीईओ और एडिटर इन चीफ ने बताया कि हमारी पहुंच कई राज्यों में है। हम विदेशों में भी देखे जा रहे हैं। हम लोगों के पास नाइजीरिया से भी फोन आते हैं। मगर हमें और विस्तार की जरूरत है। हमें बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब में खुद को आगे बढ़ाना है। डिस्ट्रीब्यूशन के सिस्टम को और मजबूत बनाने में हम लोग जुटे हैं।”

चैनल की पहली वर्षगांठ के मौके पर सीएनईबी पर ”प्रजातंत्र : हम, आप और मीडिया” नामक लाइव आयोजन किया गया था। इस आयोजन के बारे में चैनल प्रमुख ने कहा- ”आमतौर पर यह शिकायत रहती है कि मीडिया सिर्फ बड़े लोगों पर फोकस करती है। आम जनता को कम जगह मिलती है और गंभीर मुद्दे बेदखल हो गए हैं। हम इन शिकायतों को ध्यान में रख कर योजना बना रहे हैं। इसीलिए हम लोगों ने चैनल के एक साल पूरे होने पर देश के विभिन्न क्षेत्रो के वरिष्ठ लोगों से यह जानने की कोशिश की कि वे लोग हमसे चाहते क्या हैं। यह प्रोग्राम उसी दिशा में उठाया गया एक कदम है।” चैनल पर मंदी के असर के बारे में राहुल देव ने बताया कि सीएनईबी मंदी से बचा हुआ है। दूसरे जगहों पर छंटनी चल रही है तो हमारे यहां लगातार नए लोग जुड़ रहे हैं। एक अन्य सवाल पर राहुल देव चुनाव आयोग द्वारा एक्जिट पोल पर रोक लगाने का विरोध किया। आगामी योजनाओं के बारे में उनका कहना था कि हम कई नई चीजें करने वाले हैं। योजना बन रही है लेकिन अभी इसके बारे में बात करना ठीक नहीं होगा।


सीएनईबी के एक साल पूरे होने पर परिचर्चा ”प्रजातंत्र : हम, आप और मीडिया” की रिपोर्ट

जनता भी कुछ कहना चाहती है मीडिया से

अपनी तमाम सकारात्मक व रचनात्मक भूमिका के बावजूद दिल्ली स्थित राष्ट्रीय मीडिया दिल्ली की समस्याओं पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करता है, जबकि वह देश के बाकी हिस्सों में हो रही घटनाओं की उपेक्षा करता है। इतना ही नहीं, वह संपन्न क्षेत्रों व तबकों को ज्यादा तवज्जो देता है। ऐसा मानना है देश की जनता का, जो इस मीडिया के पाठक या दर्शक हैं। यह बात सीएनईबी समाचार चैनल द्वारा आयोजित एक परिचर्चा ‘प्रजातंत्रः हम, आप और मीडिया’ में उभर कर सामने आई। यह परिचर्चा सीएनईबी चैनल के एक साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित की गई थी। चैनल के प्रधान संपादक राहुल देव इस परिचर्चा का संचालन कर रहे थे।

राष्ट्र-समाज के प्रति राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका को लेकर समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की सोच में तीखापन था।  ‘पानी वाले बाबा’ के नाम से मशहूर मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह को वर्तमान मीडिया में गांधी व तिलक युग की झलक नही दिखाई पड़ती। उन्हें लगता है कि समाज और मीडिया में एक हद तक अलगाव है। जरूरत है कि मीडिया लोगों की जिंदगी की समस्याओं को उठाये, समाज के अच्छे काम को समझे और देश का मन समझने से पहले अपने मन को ठीक करे। कुछ ऐसी ही सोच प्रसिद्ध शिक्षाविद् जगमोहन सिंह राजपूत की भी सामने आई। उनकी दृष्टि में दिल्ली में बैठकर समाज को नहीं समझा जा सकता। मीडिया ने जनता की राजनीतिक समझ में जरूर बढ़ोतरी की है, लेकिन समाज के अहम मुद्दों (किसान, नक्सल हिंसा) के बजाय स्लमडाग मिलेनियर जैसे विषयों पर ज्यादा उर्जा खर्च कर रही है। जनसेवा और विकास के जनसेवी प्रयासों के प्रति मीडिया पर उपेक्षा भाव अपनाने की चर्चा करते हुए उन्होंने निष्पक्षता का सवाल भी उठाया।

एक सवाल के जवाब में पटना के समाजशास्त्री शैवाल गुप्ता का कहना था कि मीडिया में राष्ट्रीय मुद्दों पर ग्रहण लगता जा रहा है, जबकि क्षेत्रीय मुद्दे हावी होते जा रहे हैं। शैवाल की निगाह में राजनीति में जिस तरह से विचारधारा व मुद्दों का अभाव होता जा रहा है, उसकी अभिव्यक्ति मीडिया में हो रही है। दैनिक हरिभूमि के संपादक देशपाल सिंह पंवार ने खुद सवाल उठाया कि मीडिया का जनता से कितना जुड़ाव है। उन्होंने ब्रेकिंग न्यूज के बजाय ‘ब्रेकिंग इश्यू’ पर जोर देने की बात उठाई। वैसे जनता की दिलचस्पी गंभीर बातों के साथ-साथ मनोरंजन में भी प्रकट हुई।

समस्या के कारण रूप में मीडिया को बाजारोन्मुखी बताया गया। इस संदर्भ में टीआरपी होड़ की बात भी उठी। लेकिन क्या मीडिया बाजार से बाहर जा सकता है? क्या वह व्यावसायिकता की उपेक्षा करके अपने वजूद को कायम रख सकता है? इन चुभते सवालों के बीच अनुराग बत्रा का कहना था कि प्रसारक और विज्ञापनदाता कुछ समय के लिए रेटिंग को छोड़ दें,  हालांकि उन्होंने सरस्वती व लक्ष्मी के साथ रहने की जरूरत व्यक्त की। वहीं प्रसारकों व विज्ञापनदाताओं से प्रो. राजपूत की अपेक्षा थी कि वे अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करें। समस्या के समाधान स्वरूप मीडिया गुरु सुशील पंडित का कहना था कि दर्शकों के सर पर ठीकरा फोड़ने की बजाय सफलता की परिभाषा बदलनी होगी। ज्यादा दर्शक जुटाना सफलता की परिभाषा नहीं है, बल्कि प्रबुद्ध वर्ग पैदा करना ही सफलता की कसौटी हो सकती है। गंभीर विषयों के लिए नीरस होना भी जरूरी नहीं है। आज कुछ चैनल क्वालिटी की तरफ कदम बढ़ा भी रहे हैं।

राहुल देव सीएनईबी के सीओओ और एडीटर इन चीफ

राहुल देवसीएनईबी न्यूज चैनल के नए सीओओ और एडीटर इन चीफ मशहूर पत्रकार राहुल देव होंगे। अब तक यह जिम्मेदारी न्यूज चैनल के चेयरमैन अमनदीप सिंह सरन निभा रहे थे। राहुल देव प्रिंट और टीवी दोनों के पत्रकार रहे हैं। टीवी में उन्होंने आज तक, दूरदर्शन, जी न्यूज और जनमत जैसे चैनलों के साथ काम किया है। प्रिंट में वे जनसत्ता जैसे अखबार के संपादक रहे हैं।

सीएनईबी न्यूज चैनल को इसी साल 27 मई को लांच किया गया था। एचबीएन ग्रुप की कंपनी कंप्लीट न्यूज एंड इंटरटेनमेंट ब्राडकास्ट प्राइवेट लिमिटेड द्वारा लांच किए गए इस चैनल ने थोड़े ही दिनों में काफी उतार चढ़ाव देखे हैं। यहां कई पत्रकार आ और जा चुके हैं। चैनल को लांच करने वाली टीम  कुछ दिनों बाद ही यहां से चलती बनी। अब राहुल देव के हवाले चैनल सौंपकर प्रबंधन चैनल के नई ऊंचाई पर पहुंचने की उम्मीद लगाए है। सीएनईबी के चेयरमैन सरन का कहना है कि वे राहुल की नियुक्ति से बेहद खुश हैं। वे अनुभवी पत्रकार हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि वे चैनल को नई ऊंचाई पर ले जा सकेंगे। उधर, राहुल देव का कहना है कि मेरे लिए यह एक बड़ा मौका है। सीएनईबी नया चैनल है। यहां नौजवान और ऊर्जावान लोगों की टीम है। हम इस चैनल के कंटेंट को अर्थपूर्ण बनाने की कोशिश करेंगे।