नीतीश राज में बिहार पुलिस के एक जवान के मर्डर के मायने

शशि सागर: पत्रकार साथियों से एक अपील : मेरे बाबू जी वामपंथी विचारधारा के हैं. जाति, गोत्र, धर्म से उन्हें कोई मतलब रखते नहीं देखा. उनका दिया संस्कार है कि मैं सामंती विचारधारा वाले मुहल्ले में पले-बढे होने के बावजूद खुद को इस घटिया मानसिकता से अलग रख सका. पर ऐसा भी नहीं कि मेरा मुहल्ले के कनिष्ठों-वरिष्ठों से कोई सरोकार नहीं.

हक जबसे जताने लगे, नक्सली कहलाने लगे

शशि सागरबहस खूब चल रही है छत्रधर महतो के पकड़े जाने के तरीके को लेकर। पत्रकारिता के प्रबुद्धजनों ने भी उसे हत्यारा करार दिया लेकिन मुझे लगता है कि इस बहस से कुछ छूटता जा रहा है। क्या ये बहस का मुद्दा नहीं होना चाहिए कि आखिर छत्रधर जैसों को बंदूक उठाने की जरूरत क्यों पड़ती है और क्यों उनका पोषण किया जाता है तब तक जब तक कि पानी नाक तक नहीं आ जाता। आखिर क्या कारण है कि समाज और राजनीति की मुख्यधारा से आदिवासी अलग हैं। शालबनी में इस्पात कारखाने के शिलान्यास के उपरांत मुख्यमंत्री को लक्षित कर बारूदी सुरंग का विस्फोट किया जाता है। इसके बाद पुलिस के साथ-साथ माकपा के अति उत्साही कार्यकर्ता तो मानो पूरे इलाके को माओवादी मान बैठते हैं। पूरे लालगढ़ की घेराबंदी कर दी जाती है और शुरू होता है अत्याचार व उत्पीड़न का घिनौना कृत्य। तो सवाल उठता है कि क्या सैकड़ों गांवों के हजारों आदिवासी एकाएक माओवादी हो गए थे और उन्हें मारकर कौन सी स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा की जा रही थी।