वे चले गए, अधूरी रह गई मेरी ख्‍वाहिश

आदरणीय आलोक तोमर नहीं रहे. सुनकर भरोसा नहीं होता. सच कहें तो ऐसी जिजीविषा और जीवट वाला व्यक्ति जीवन में कभी देखा ही नहीं था, इसलिए मन यह मानने को कतई तैयार ही नहीं हुआ कि मौत ऐसे शख्स को भी इस तरह हम सब से छीन सकती है. सालों पहले जनसत्ता में उनकी एक झलक देखने के सिवाय आलोक जी से मेरा कभी सीधे साक्षात्कार नहीं हुआ. चौदह जनवरी की रात अचानक आलोक जी फेसबुक पर संपर्क में आ गये. लगा मन की मुराद पूरी हो गयी. पहले ही सन्देश के साथ ऐसा लगा जैसे एक दूसरे को दशकों से जानते हों.