भारतीय मीडिया में कोई भी खबर आसानी से प्लांट कराई जा सकती है!

सुमंत भट्टाचार्यादेश की मीडिया का हाल वाकई दुखदाई है। खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का। कल की बड़ी खबर से साफ था, भारतीय मीडिया में कोई भी खबर आसानी से प्लांट कराई जा सकती है। उदाहरण है कांग्रेसनल रिसर्स सर्विसेस (सीआरएस) की रिपोर्ट। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बाबत सीआरएस की रिपोर्ट में जुटाई गई टिप्पणियों पर खबरिया चैनल्स ने कल दिन भर हंगामा ही बरपा दिया।

राहुल गांधी नहीं मधु लिमये को याद कीजिए

आज जब सोनिया गांधी की बीमारी के बरक्स राहुल गांधी की ताजपोशी की खबर मीडिया, खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में धुआंधार तरीके से चलाई जा रही तो बरबस मधु लिमये याद आ गए। सन 1985 में मधु लिमये एकमात्र आवाज थे जिन्होंने दल बदल विरोध कानून का विरोध किया था। उस वक्त बिल के समर्थकों ने यही दलील थी कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के लगातार दल बदल से संविधान की मूल आत्मा की हत्या हो रही है…एक ऐसी राजनैतिक अपसंस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है जो सिर्फ और सिर्फ सत्ता को लक्ष्य में रखकर काम करती है।

सुमंत के नेतृत्व में निकलेगा अखबार, दिनेश चंद्रा छोड़ देंगे जागरण

जो ग्रुप न्यूज एक्सप्रेस नामक न्यूज चैनल ला रहा है, वही ग्रुप एक अखबार भी निकालने की तैयारी में है. अखबार के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसके संपादक का नाम तय हो चुका है. संपादक बनाए गए हैं सुमंत भट्टाचार्या. ये इन दिनों आउटलुक में हैं. उसके पहले मुकेश कुमार के साथ वायस आफ इंडिया न्यूज चैनल में हुआ करते थे. सूत्रों के मुताबिक सुमंत भट्टाचार्य ने अपनी ज्वायिंग की हरी झंडी न्यूज एक्सप्रेस के हेड मुकेश कुमार को दे दी है.

अमिताभ बाबू, तनि इहरी लखा!!!

तकलीफ हुई मिड डे की खबर पर आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर। ऐसा लगा कि प्रतिक्रिया नहीं, तिलमिला कर कोई असंवेदनशील व्यक्ति निरर्थक बहस पर उतारू हो। मैं खुद भी उस शहर का हूं जहां से आप निकले। इलाहाबाद का। पर मेरे जेहन में आपका चस्पा सन 1981 तक खत्म हो चुका था और विश्वविद्यालय पहुंचने के बाद हरिवंशजी कहीं ज्यादा श्रद्य़ेय हो गए। इलाहाबाद से जब आप चुनाव लड़ रहे थे और मेडिकल कॉलेज के पीछे राजन साहब (शायद आपके मामाजी) की कोठी में आप ठहरे हुए थे और वहीं से चुनाव अभियान चला थे। उस दौर में विश्विवद्यालय के कुछ छात्रों का जत्था कोठी से आपकी चौकड़ी के निकलने का बेसब्री से इंतजार करता ताकि हरिवंश जी तक पहुंच सके। मैं उन खुशनसीबों में हूं, जिन्होंने फिराक साहब और हरिवंश जी को देखा और सुना भी।