अल्पसंख्यक नेतृत्व की तरह दिशाहीन होती उर्दू पत्रकारिता

संजय कुमारभारतीय मीडिया में हिन्दी व अंग्रेजी की तरह उर्दू समाचार पत्रों का हस्तक्षेप नहीं दिखता है। वह तेवर नहीं दिखता जो हिन्दी या अंग्रेजी के पत्रों में दिखता है। आधुनिक मीडिया से कंधा मिला कर चलने में अभी भी यह लड़खड़ा रहा है।

सूखे को सैलाब बताने वाला उर्दू अखबार

: झूठी खबर या बदनाम करने की साजिश! : 9 जुलाई के उर्दू राष्ट्रीय सहारा में बिहार के पृष्ठ पर एक खबर प्रकाशित हुई। किशनगंज से लिखी गयी इस खबर में कहा गया है… ”दक्षिण बिहार के ठाकुर गंज ब्लॉक के पूबना नदी का पुश्ता टूट जाने से हज़ारों घर बह गए हैं और बेशुमार लोग खुले आसमान के नीचे ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं। तेज़ आँधी और बिजली के फ़ेल जाने की वजह से कश्ती से जो संपर्क था वह भी टूट गया है जिससे प्रभावित लोगों का जीवन बिल्कुल थम गया है।