सावधान, आ रहा… एक और इंडिया टीवी!

[caption id="attachment_15561" align="alignleft"]विकास कुमारविकास कुमार[/caption]जी हां……अगले छ: महीनों में ही एक और इन्डिया टीवी हमारे और आपके टीवी सेट पर आनेवाला है, कहें तो धमाका करने वाला है. मुख्य धारा की खबरों की परिभाषा बदलने वाले, समाचार को तरकारी की तरह हांक लगाकर बेचने वाले, किसी स्टोरी की छोटी-सी बात पर एक-एक घंटे का खास कार्यक्रम बनाने वाले, भूत-प्रेत को पसंद करने वाले, खबरों में स्वर्ग की सीढ़ी खोजने वाले और आपकी अदालत में वकील और जज की भूमिका में अकेले डटे रहने वाले वरिष्ट टीवी पत्रकार और एंकर रजत शर्मा एक और इन्डिया टीवी लाने की घोषणा कर चुके हैं.

भड़ास4मीडिया पर ‘शिल्पा-बाबा-किस’ किसलिए?

यशवंत जी, नमस्ते….. पिछले कुछ दिनों से ऐसा हो रहा है कि सुबह-सुबह नींद से जागने के बाद सबसे पहले भड़ास4मीडिया देखता हूँ और फिर आ आगे बढ़ता हूँ. ऐसा इसलिए हो पा रहा है क्योंकि आप लोगों ने अभी तक बड़े ही सटीक और सुन्दर लेख, वरिष्ट पत्रकारों के साथ बातचीत और मीडिया से सम्बंधित हर खबर को बेबाकी से रखा है हमारे सामने.  इसी का नतीजा है कि आज देश के हर कोने मे काम कर रहा पत्रकार इस पोर्टल से अपनापन महसूस करता है. लेकिन आज सुबह जब मैं पोर्टल पर गया और खबरों पर नज़र फेंकी तो एक खबर या लेख (पता नहीं इन दोनों मे से क्या था?) पर मेरी नज़र रुक गयी और मैंने उस खबर को पूरा पढ़ा लेकिन मेरी समझ मे ये नहीं आया कि इस खबर की यहां क्या उपयोगिता है? क्या आपका जो पाठक वर्ग है वो यह जानने के लिए यहां आता है कि एक साधू ने एक फिल्मी अदाकारा के गाल पे पप्पी क्यों ले ली?

बढिया रियलिटी है ‘सच का सामना’

[caption id="attachment_15337" align="alignleft"]फौजिया रियाजफौजिया रियाज[/caption]रियलिटी शो कोई मुद्दा नहीं :सच का सामना‘ शो हमारी संस्कृति के लिए कितना सही है और कितना गलत, ये तो उन पर निर्भर करता है, जिनकी जिन्दगी का एक हिस्सा वाकई टीवी देखने में जाता है। मैं आप सबके साथ एक किस्सा बांटना चाहूंगी। मेरी एक दोस्त है, जिसकी फैमिली काफी पुराने खयालात की है। यहां तक कि उनके घर में लड़कियों की पढ़ाई को भी बुरी नजर से देखा जाता है। यह तकरीबन पांच साल पहले की बात है, जब उनके घर में क्रिकेट मैचों के अलावा और कुछ नहीं देखा जाता था। यहां तक कि फिल्में भी घर वाले साथ में नहीं देखते थे। मगर आज वही लोग, वही परिवार साथ बैठकर ‘सच का सामना’ देखता हा। बताना चाहूंगी कि उस परिवार में माता-पिता के अलावा एक भाई और दो बहनें हैं। हमारा समाज और उसकी सोच बहुत तेजी से  बदली है। आज लोग उस तरह नहीं सोचते, जैसे दस साल पहले सोचते थे। हर इंसान का अपना नजरिया होता है और उसे क्या देखना है, क्या नहीं देखना, इसका फैसला वह खुद कर सकता है। इसके पीछे कोई जोर ज़बरदस्ती नहीं होती है। अभी कुछ साल पहले तक लोग बड़े चाव से सास-बहू सीरियल देखते थे, मगर अब ऐसे शो धीरे-धीरे बंद हो रहे हैं क्योंकि लोगों को लगता है कि ये बेहद बनावटी हैं कि घर की बहू हर वक्त कांजीवरम साड़ी और भारी मेकअप में रहे।  आज लोग इस तरह की फिल्में भी कम ही पसंद करते हैं, जिसमें एक्ट्रेस एक्टर से कहे “तुम्हारे चूमने से मैं मां तो नहीं बन जाऊंगी?”

जागरण ने एकतरफा फैसला दिया

[caption id="attachment_15334" align="alignleft"](खबर पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें)[/caption]मैं जरनैल सिंह को जानता हूं। जो कुछ उन्होंने किया, बेशक गलत था पर जिस प्रबंधन ने उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका, उसे कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। दैनिक जागरण प्रबंधन ने जहां तक संभव था, जरनैल का इस्तेमाल किया। जरनैल को याद होगा, जब वह जालंधर आए थे, विधानसभा चुनाव की कवरेज में। अकालियों के समर्थन में तैयार स्टोरी को किस दबाव में अकालियों के खिलाफ किया गया था, यह मैं भी जानता हूं। और जरनैल तो खैर भुक्तभोगी हैं ही। हम जिस पत्रकारिता में इन दिनों हैं, वहां फेस-वैल्यू सबसे अहम है। चिदंबरम की फेस-वैल्यू कांग्रेस आलाकमान ज्यादा मानता है। जब जरनैल ने चिदंबरम की ओर जूता उछाला था तो सन्न मैं भी रह गया था। पर, आप उसके बैकग्राउंड में जाकर देखें कि उसने ऐसा क्यों कर किया। बिना कारण जाने जरनैल को जो सजा मिली, वह उसके साथ ज्यादती है। सरकार ने तो कुछ नहीं किया, जागरण ने जरूर एकतरफा फैसला दे दिया। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता में अब शुचिता बची है। कहीं है भी, तो मैं नहीं देख पाता। संभवतः नेत्र रहते मैं अंधा हूं। पर, होती तो कहीं तो दिखती।