मैंने खुले शब्दों में गंगेश मिश्र पर उंगली उठाई थी

[caption id="attachment_19547" align="alignleft" width="80"]व्यालोकव्यालोक[/caption]: व्‍यालोक बनने की पूर्व शर्त है शरीर में एक अदद रीढ़ होना : बर्बाद गुलिस्तां करने को बस….. : तो आखिर अभिषेक श्रीवास्तव का भी भास्कर से मोहभंग हो ही गया। वजह, एक बार फिर से वही…। भास्कर दरअसल एक ऐसा संस्थान बन चुका है, जहां यथास्थितिवाद को तो सराहा जा सकता है, लेकिन प्रगतिशीलता, नई सोच और आपकी गत्यात्मकता को नहीं। भास्कर के दिल्ली कार्यालय में हॉट सीट पर ऐसे बुजुर्ग विराजे हैं, जो किसी भी तरह अपनी नौकरी बचाने की ही जुगत में लगे हैं।